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अध्याय चौबीसवाँ: गोवर्धन पर्वत की पूजा करना
10.24श्रीशुक उबाचभगवानपि तत्रैव बलदेवेन संयुतः।
अपश्यन्निवसन्गोपानिन्द्रयागकृतोद्यमान् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; भगवान्-- भगवान्; अपि-- भी; तत्र एब--उसी स्थान पर; बलदेवेन--बलराम द्वारा; संयुत:--के साथ; अपश्यत्--देखा; निवसन्--निवास करते हुए; गोपान्-ग्वालों को; इन्द्र--स्वर्ग के राजा इन्द्रके लिए; याग--यज्ञ के लिए; कृत--किया हुआ; उद्यमान्--महान् प्रयास |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : उस स्थान पर ही अपने भाई बलदेव के साथ रहते हुए कृष्ण नेग्वालों को इन्द्र-यज्ञ की जोर-शोर से तैयारी करते देखा।
तदभिज्ञोपि भगवास्सर्वात्मा सर्वदर्शनः ।
प्रश्रयावनतोपृच्छद्दृद्धान्नन्दपुरोगमान् ॥
२॥
तत्ू-अभिज्ञ:--इसके विषय में पूर्ण ज्ञान रखने वाले; अपि--यद्यपि; भगवान्-- भगवान् ने; सर्व-आत्मा--हर एक के हृदय मेंस्थित परमात्मा; सर्व-दर्शन: --सर्वज्ञ भगवान्; प्रश्रय-अवनत:--विनयपूर्वक झुक कर; अपृच्छत्--पूछा; वृद्धान्ू--बूढ़े लोगोंसे; नन्द-पुरः-गमान्--नन्द महाराज इत्यादि
सर्वज्ञ परमात्मा होने से भगवान् कृष्ण पहले से ही सारी स्थिति जानते थे फिर भी विनीतभाव से उन्होंने अपने पिता नन््द महाराज इत्यादि गुरुजनों से पूछा।
कथ्यतां मे पित: कोयं सम्भ्रमो व उपागतः ।
कि फल॑ कस्य वोद्श: केन वा साध्यते मख: ॥
३॥
कथ्यताम्--आप बतलायें; मे--मुझे; पित:--मेरे पिता; कः--क्या; अयम्--यह; सम्भ्रम:--बड़ा भारी काम; व:ः--आप पर;उपागतः--आया हुआ; किम्--क्या; फलम्--परिणाम; कस्य--किसके ; वा--त था; उद्देश:--हेतु; केन--किस तरह; वा--तथा; साध्यते--सम्पन्न किया जाना है; मखः--यह यज्ञ |
[भगवान् कृष्ण ने कहा : हे पिताश्री, आप कृपा करके मुझे बतलायें कि आप इतना सारामहत् प्रयास किसलिए कर रहे हैं? आप कया करना चाह रहे हैं ? यदि यह कर्मकाण्डी यज्ञ है, तोयह किसकी तुष्टि हेतु किया जा रहा है और यह किन साथनों से सम्पन्न किया जायेगा ?
एतद्ूहि महान्कामो मह्मं शुश्रूषतरे पित: ।
न हि गोप्यं हि साधूनां कृत्यं सर्वात्मनामिह ।
अस्त्यस्वपरदृष्टीनाममित्रोदास्तविद्विषाम् ॥
४॥
एतत्--यह; ब्रूहि--बतलाइये; महान्--महती; काम:--इच्छा; महाम्--मुझको; शुश्रूषबे--सुनने के लिए; पित:--हे पिताश्री;न--नहीं; हि--निस्सन्देह; गोप्यम्ू--गोपनीय; हि--निश्चय ही; साधूनाम्--सन्त पुरुषों के; कृत्यम्ू--कार्यकलाप; सर्व-आत्मनाम्--अपने तुल्य सबों को देखने वाला; इह--इस जगत में; अस्ति--है; अस्व-पर-दृष्टीनामू--जो अपने तथा पराये मेंभेद नहीं करता; अमित्र-उदास्त-विद्विषाम्--जो मित्रों, उदासीन दलों तथा शत्रुओं में अन्तर नहीं करते |
हे पिताश्री, कृपा करके इसके विषय में मुझे बतलायें।
मुझे जानने की बड़ी इच्छा है और मैंश्रद्धापूर्वक सुनने को तैयार हूँ।
जो अन्यों को अपने तुल्य मानते हैं, जिनमें अपनी तथा पराये काभेदभाव नहीं है और जो यह नहीं विचार करते कि कौन मित्र है, कौन शत्रु है और कौन उदासीनहै ऐसे सन्त पुरुषों को कुछ भी छिपाकर नहीं रखना चाहिए।
उदासीनोरिवद्वर्ज्य आत्मवत्सुहृदुच्यते ॥
५॥
उदासीन:--विरस रहने वाला; अरि-वत्--शत्रु के समान; वर्ज्य:--बचना चाहिए; आत्म-वत्--अपने ही समान; सुहृत्--मित्रको; उच्यते--कहना चाहिए।
जो उदासीन ( निरपेक्ष ) होता है उससे शत्रु की तरह बचना चाहिए, किन्तु मित्र को अपने हीसमान समझना चाहिए ॥
ज्ञत्वाज्ञात्वा च कर्माणि जनोउयमनुतिष्ठति ।
विदुषः कर्मसिद्द्धि: स्याद्यथा नाविदुषो भवेत् ॥
६॥
ज्ञात्वा--जान लेने पर; अज्ञात्वा--अनजाने; च--भी; कर्माणि--कर्म; जन: --सामान्य लोग; अयम्--ये; अनुतिष्ठति--सम्पन्नकरते हैं; विदुष:--विद्वान; कर्म-सिद्द्धिः:--कर्म के वांछित लक्ष्य की पूर्ति; स्थातू--होती है; यथा--जिस तरह; न--नहीं;अविदुष:--मूर्ख के लिए; भवेत्--होता है
जब इस जगत में लोग कर्म करते हैं, तो कभी तो वे समझते हैं कि वे क्या कर रहे हैं औरकभी नहीं समझते।
जो लोग यह जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं उन्हें अपने कार्य में सफलताप्राप्त होती है, जबकि अज्ञानी लोगों को सफलता नहीं मिलती।
तत्र तावत्क्रियायोगो भवतां कि विचारितः ।
अथ वा लौकिकस्तन्मे पृच्छतः साधु भण्यताम् ॥
७॥
तत्र तावत्ू--ऐसा होने से; क्रिया-योग: --यह सकाम उद्यम; भवताम्--आपका; किम्--क्या; विचारित:--शास्त्रसम्मत; अथवा--या कि; लौकिक:--लोकरीति के अनुसार; तत्--वह; मे--मुझको; पृच्छत:ः --पूछ रहे; साधु--स्पष्ट; भण्यताम्ू--बतलादिया जाय।
ऐसा होने से, आप मुझे स्पष्ट रूप से अपने इस अनुष्ठान विषयक उद्योग को बतला दें।
कयायह उत्सव शास्त्रसम्मत है या केवल समाज की एक साधारण रीति ?
श्रीनन्द उवाचपर्जन्यो भगवानिन्द्रो मेघास्तस्यात्ममूर्तय: ।
तेभिवर्षन्ति भूतानां प्रीणनं जीवनं पय: ॥
८॥
श्री-नन्दः उबाच-- श्री नन्द महाराज ने कहा; पर्जन्य:--वर्षा के; भगवान्--महा प्रभु; इन्द्र: --इन्द्र; मेघा:--बादल; तस्य--उसके; आत्म-मूर्तय:--साकार प्रतिनिधि; ते--वे; अभिवर्षन्ति--सीधे वर्षा करते हैं; भूतानाम्--सारे जीवों की; प्रीणनम्--तुष्टि; जीवनम्--जीवनदायी शक्ति; पयः--दूध ( के तुल्य )॥
नन्द महाराज ने उत्तर दिया: महान् ईश्वर इन्द्र वर्षा के नियंत्रक हैं।
ये बादल उन्हीं के साक्षात्प्रतिनिधि हैं और वे ही वर्षा करते हैं जिससे समस्त प्राणियों को सुख और जीवनदान मिलता है।
त॑ तात वयमन्ये च वार्मुचां पतिमी श्वरम् ।
द्रव्यैस्तद्रेतसा सिद्धैर्यजन्ते क्रतुभिर्नरा: ॥
९॥
तम्--उसको; तात-हे पुत्र; वयम्--हम; अन्ये-- अन्य लोग; च-- भी; वा:-मुचाम्--बादलों के; पतिम्--स्वामी; ई श्वरमू--शक्तिशाली नियंत्रक को; द्रव्यैः--विविध वस्तुओं से; तत्-रेतसा--उसके वीर्य से; सिद्धैः--उत्पन्न; यजन्ते--पूजा करते हैं;क्रतुभि:ः--यज्ञ द्वारा; नराः--लोग
हे पुत्र, केवल हम ही नहीं अपितु अन्य लोग भी वर्षा करने वाले इन बादलों के स्वामी कीपूजा करते हैं।
हम उन्हें अन्न तथा अन्य पूजा-सामग्री भेंट करते हैं, जो वर्षा रूपी उन्हीं के वीर्य सेउत्पन्न होती है।
तच्छेषेणोपजीवन्ति त्रिवर्गफलहेतवे ।
पुंसां पुरुषकाराणां पर्जन्य: फलभावन: ॥
१०॥
तत्--उस यज्ञ के; शेषेण--जूठन से; उपजीवन्ति--अपना पेट पालते हैं; त्रि-वर्ग--जीवन के तीन लक्ष्य ( धर्म, अर्थ तथाकाम ); फल-हेतवे--फल पाने के हेतु; पुंसामू--मनुष्यों को; पुरुष-काराणाम्--मानवीय प्रयास में लगे; पर्जन्य:--इन्द्र; फल-भावन:--वांछित लक्ष्यों को प्रभावित करने वाले साधन |
इन्द्र के लिए सम्पन्न यज्ञों से बचे जूठन को ग्रहण करके लोग अपना जीवन-पालन करते हैंतथा धर्म, अर्थ और काम रूपी तीन लक्ष्यों को प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार भगवान् इन्द्र उद्यमीपुरुषों की सकाम सफलता के लिए उत्तरदायी अभिकर्ता हैं।
य एन विसूजेद्धर्म परम्पर्यागतं नर: ।
कामाद्द्वेषाद्धयाललोभात्स वै नाप्नोेति शोभनम् ॥
११॥
यः--जो कोई; एनम्--इसको; विसूजेत्-- बहिष्कार कर देता है; धर्मम्-- धर्म को; परम्पर्य--परम्परा से; आगतम्--प्राप्तकिया हुआ; नरः--व्यक्ति; कामात्--काम के वशीभूत होकर; द्वेषात्-शत्रुतावश; भयात्-- भयवश; लोभात्--या लालच केवश में आकर; सः--वह; बै--निश्चय ही; न आप्नोति--नहीं प्राप्त करता है; शोभनम्ू--मंगल ६यह धर्म स्वस्थ परम्परा पर आश्रित है।
जो कोई काम, शत्रुता, भय या लोभ वश इसकाबहिष्कार करता है उसे निश्चय ही सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सकेगा।
श्रीशुक उबाचवचो निशम्य नन्दस्य तथान्येषां ब्रजौकसाम् ।
इन्द्राय मनन््युं जनयन्पितरं प्राह केशव: ॥
१२॥
श्री शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; वच:--शब्द; निशम्य--सुनकर; नन्दस्य--महाराज नन्द के; तथा-- और;अन्येषाम्-- अन्य; ब्रज-ओकसाम्--ब्रज के निवासियों के; इन्द्राय--इन्द्र हेतु; मन्युमू--क्रोध; जनयन्--उत्पन्न करते हुए;पितरम्ू--अपने पिता से; प्राह--बोले; केशव:-- भगवान् केशवशुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् केशव
कृष्ण ने अपने पिता नन्द तथा ब्रज केअन्य गुरुजनों के कथनों को सुना तो इन्द्र के प्रति क्रोध उत्पन्न करने के उद्देश्य से उन्होंने अपनेपिता को इस प्रकार सम्बोधित किया।
श्रीभगवानुवाचकर्मणा जायते जन्तु: कर्मणैव प्रलीयते ।
सुखं दुःखं भयं क्षेम॑ कर्मणैवाभिपद्यते ॥
१३॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; कर्मणा--कर्म के बल से; जायते--उत्पन्न होता है; जन्तु:--जीव; कर्मणा--कर्म से;एव--ही; प्रलीयते--अपना विनाश करता है; सुखम्--सुख; दुःखम्--दुख; भयम्-- भय; क्षेमम्--सुरक्षा; कर्मणा एब--कर्मसे ही; अभिपद्यते--प्राप्त किये जाते हैं
भगवान् कृष्ण ने कहा : कर्म से ही जीव जन्म लेता है और कर्म से ही उसका विनाश होताहै।
उसके सुख, दुख, भय तथा सुरक्षा की भावना का उदय कर्म के प्रभावों के रूप में होता है।
अस्ति चेदीश्वर: कश्चित्फलरूप्यन्यकर्मणाम् ।
कर्तारें भजते सोपि न ह्कर्तुः प्रभुर्ठि सः ॥
१४॥
अस्ति--है; चेत्--यदि मान लें; ईश्वर: --परम नियन्ता; कश्चित्--कोई; फल-रूपी--सकाम फल प्रदान करने वाला; अन्य-कर्मणाम्-- अन्य व्यक्तियों के कर्मों का; कर्तारमू-कर्म का कर्ता; भजते--आश्रित होता है; सः--वह; अपि-- भी; न--नहीं;हि--अन्ततः; अकर्तुः--कर्म न करने वाले का; प्रभुः--स्वामी; हि--निश्चय ही; सः--वह
यदि कोई परम नियन्ता हो भी, जो अन्यों को उनके कर्मो का फल प्रदान करता हो तो उसेभी कर्म करने वाले पर आश्रित रहना होगा।
वस्तुतः जब तक सकाम कर्म सम्पन्न न हो ले तबतक सकाम कर्मफलों के प्रदाता के अस्तित्व का प्रश्न ही नहीं उठता।
किमिन्द्रेणेह भूतानां स्वस्वकर्मानुवर्तिनाम् ।
अनीशेनान्यथा कर्तु स्वभावविहितं नृणाम् ॥
१५॥
किम्--क्या; इन्द्रेण--इन्द्र से; हह--यहाँ; भूतानाम्ू--जीवों के लिए; स्व-स्व--अपना अपना; कर्म--सकाम कर्म का;अनुवर्तिनामू--फल भोगने वाले; अनीशेन-- असमर्थ ( इन्ध ); अन्यथा--अन्यथा; कर्तुमू--करने के लिए; स्वभाव--अपने बद्धस्वभावों से; विहितम्-- भाग्य में लिखा हुआ; नृणाम्--मनुष्यों के |
इस जगत में जीवों को अपने किसी विशेष पूर्व कर्म के परिणामों का अनुभव करने के लिएबाध्य किया जाता है।
चूँकि भगवान् इन्द्र किसी तरह भी मनुष्यों के भाग्य को बदल नहीं सकतेजो उनके स्वभाव से ही उत्पन्न होता है, तो फिर लोग उनकी पूजा क्यों करें ?
स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते ।
स्वभावस्थमिदं सर्व सदेवासुरमानुषम् ॥
१६॥
स्वभाव--अपने बद्ध स्वभाव के; तन्त्र:--नियंत्रण में; हि--निस्सन्देह; जन:--व्यक्ति; स्वभावम्--अपने स्वभाव का;अनुवर्तते--पालन करता है; स्वभाव-स्थम्--बद्ध लालसा पर आधारित; इृदम्--यह संसार; सर्वम्--सम्पूर्ण; स--समेत;देव--देवतागण; असुर-- असुरगण; मानुषम्--तथा मनुष्य जाति।
प्रत्येक व्यक्ति अपने ही बद्ध स्वभाव के अधीन है और उसे उस स्वभाव का ही पालन करनाचाहिए।
देवताओं, असुरों तथा मनुष्यों से युक्त यह सम्पूर्ण जगत जीवों के बद्ध स्वभाव परआश्रित है।
देहानुच्चावचाज्न्तुः प्राप्योत्सूजति कर्मणा ।
शत्रु्मित्रमुदासीन: कर्मव गुरुरी श्वर: ॥
१७॥
देहानू-- भौतिक शरीरों को; उच्च-अवचानू--उच्च तथा निम्न श्रेणी के; जन्तु:--बद्धजीव; प्राप्प--पाकर; उत्सूजति--त्यागदेता है; कर्मणा--अपने कार्यों के फलों के द्वारा; शत्रु:ः--उसका शत्रु; मित्रमू--मित्र; उदासीन:--तथा निरपेक्ष पक्ष; कर्म--भौतिक कार्य; एब--अकेला; गुरुः--उसका गुरु; ईश्वरः --उसका स्वामी |
चूँकि कर्म के ही फलस्वरूप बद्धजीव उच्च तथा निम्न श्रेणी के विविध शरीरों को स्वीकारकरता है और फिर त्याग देता है अतएव यह कर्म उसका शत्रु, मित्र तथा निरपेक्ष साक्षी है, उसकागुरु तथा ईश्वर है।
तस्मात्सम्पूजयेत्कर्म स्वभावस्थ: स्वकर्मकृत् ।
अज्जसा येन वर्तेत तदेवास्य हि दैवतम् ॥
१८॥
तस्मात्ू--अतः; सम्पूजयेत्--पूरी तरह से पूजा करनी चाहिए; कर्म--अपना नियत कार्य; स्वभाव--अपने स्वभाव में; स्थ: --बने रहकर; स्व-कर्म--अपना नियत कर्तव्य; कृतू--करते हुए; अज्ञ़सा--बिना कठिनाई के; येन--जिससे; वर्तेत--जीवितरहता है; तत्ू--वह; एव--निश्चय ही; अस्य--उसका; हि--निस्सन्देह; दैवतम्--पूज्य अर्चाविग्रह
अतएबव मनुष्य को चाहिए कि वह कर्म की ही ठीक से पूजा करे।
मनुष्य को अपने स्वभावके अनुरूप स्थिति में बने रहना चाहिए और अपने ही कर्तव्य का निर्वाह करना चाहिए।
निस्सन्देह जिससे हम अच्छी तरह रह सकते हैं वही वास्तव में हमारा पूज्य अर्चाविग्रह है।
आजीव्यैकतर भावं यस्त्वन्यमुपजीवति ।
न तस्माद्विन्दते क्षेमं जारान्रार्यसती यथा ॥
१९॥
आजीव्य--जीवन निर्वाह करने वाला; एकतरम्--एक; भावम्--जीव; यः--जो; तु-- लेकिन; अन्यम्--दूसरा; उपजीवति--स्वीकार करता है; न--नहीं; तस्मात्--उससे ; विन्दते--प्राप्त करता है; क्षेमम्ू-- असली लाभ; जारातू--परपति ( उपपति ) से;नारी--एक स्त्री; असती--दुष्टा; यथा--जिस तरह |
जो वस्तु वास्तव में हमारे जीवन का निर्वाह करती है यदि हम उसे छोड़कर अन्य वस्तु कीशरण ग्रहण करते हैं, तो भला हमें असली लाभ कैसे प्राप्त हो सकता है? हम उस कृतषघ्न स्त्रीकी भाँति होंगे जो जारपति के साथ प्रेमालाप करके कभी भी असली लाभ नहीं उठा पाती।
वर्तेत ब्रह्मणा विप्रो राजन्यो रक्षया भुवः ।
वैश्यस्तु वार्तया जीवेच्छूद्रस्तु द्विजसेवया ॥
२०॥
वर्तेत--जीवित रहता है; ब्रह्मणा--वेदों से; विप्र:--ब्राह्मण; राजन्य:--शासक वर्ग का सदस्य; रक्षया--रक्षा द्वारा; भुव:ः--पृथ्वी की; वैश्य:--वैश्य; तु--दूसरी ओर; वार्तबा--व्यापार द्वारा; जीवेतू--जीवित रहता है; शूद्र:--शूद्र; तु--तथा; द्विज-सेवया-दद्विजों अर्थात् ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों की सेवा द्वारा
ब्राह्मण वेदों का अध्ययन और अध्यापन करके, शासक वर्ग का सदस्य पृथ्वी की रक्षाकरके, वैश्य व्यापार करके तथा शूद्र अपने से ऊँची श्रेणी के द्विजों की सेवा करके अपनाजीवन-निर्वाह करता है।
कृषिवाणिज्यगोरक्षा कुसीदं तूर्यमुच्यते ।
वार्ता चतुर्विधा तत्र वयं गोवृत्तयोडनिशम् ॥
२१॥
कृषि--खेती; वाणिज्य--व्यापार; गो-रक्षा--तथा गौवों की रक्षा; कुसीदम्--लेन-देन; तूर्यमू--चौथा; उच्यते--कहलाता है;वार्ता--वृत्तिपरक कार्य; चतु:-विधा--चार प्रकार का; तत्र--इनमें से; वयम्--हम; गो-वृत्तय:--गोरक्षा में लगे हुए;अनिशम्--अनवरत |
वैश्य के वृत्तिपरक कार्य चार प्रकार के माने गये हैं-कृषि, व्यापार, गोरक्षा तथा धन कालेन-देन।
हम इनमें से केवल गोरक्षा में ही सदेव लगे रहे हैं।
सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहेतवः ।
रजसोत्पद्यते विश्वमन्योन्यं विविधं जगत् ॥
२२॥
सत्त्ममू--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम:--तथा तमोगुण; इति--इस प्रकार; स्थिति--पालन; उत्पत्ति--सृजन; अन्त--तथाविनाश के; हेतव: --कारण; रजसा--रजोगुण से; उत्पद्यते--उत्पन्न होता है; विश्वम्--यह ब्रह्माण्ड; अन्योन्यम्--नर तथा मादाके संयोग से; विविधम्--अनेक प्रकार का बन जाता है; जगत्--संसार।
सृजन, पालन तथा संहार का कारण प्रकृति के तीन गुण--सतो, रजो तथा तमोगुण-हैं।
विशिष्टतः रजोगुण इस ब्रह्माण्ड को उत्पन्न करता है और संभोग के द्वारा यह विविधता से पूर्णबनता है।
रजसा चोदिता मेघा वर्षन्त्यम्बूनि सर्वतः ।
प्रजास्तैरेव सिध्यन्ति महेन्द्र: कि करिष्यति ॥
२३॥
रजसा--रजोगुण से; चोदिता: -- प्रेरित; मेघा:--बादल; वर्षन्ति--वर्षा करते हैं; अम्बूनि-- अपना जल; सर्वतः--सर्वत्र;प्रजा:--जनता; तैः--उस जल से; एव--ही; सिध्यन्ति--अपना अस्तित्व बनाये रहती है; महा-इन्द्र:--महान् इन्द्र; किमू--क्या;'करिष्यति--कर सकता है |
रजोगुण द्वारा प्रेरित बादल सर्वत्र अपने जल की वर्षा करते हैं और इस वर्षा से ही सारेप्राणियों की जीविका चलती है।
इस व्यवस्था से भला इन्द्र को क्या लेना-देना ?
ननः पुरोजनपदा न ग्रामा न गृहा वयम् ।
वनौकसस्तात नित्यं वनशैलनिवासिन: ॥
२४॥
न--नहीं; नः--हमारे लिए; पुरः--नगर; जन-पदाः--विकसित आबाद क्षेत्र; न--नहीं; ग्रामा:ः--गाँव; न--नहीं; गृहा:--स्थायी घरों में रहने वाले; वयम्--हम; वन-ओकसः--बनों में रहने वाले; तात--हे पिता; नित्यमू--सदैव; वन--वनों में;शैल--तथा पर्वतों में; निवासिन:--रहने वाले ।
हे पिताश्री, हमारे घर न तो नगरों में हैं, न कस्बों या गाँवों में हैं।
वनवासी होने से हम सदैव जंगल में तथा पर्वतों पर रहते हैं।
तस्मादगवां ब्राह्मणानामद्रेश्वारभ्यतां मख: ।
य इन्द्रयागसम्भारास्तैरयं साध्यतां मखः ॥
२५॥
तस्मात्ू--अतएव; गवाम्--गौवों का; ब्राह्मणानाम्--ब्राह्मणों का; अद्वेः--तथा पर्वत ( गोवर्धन ) का; च-- भी; आरभ्यताम्--प्रारम्भ करना चाहिए; मख: --यज्ञ; ये--जो; इन्द्र-याग--इन्द्र यज्ञ के लिए; सम्भारा:--सामग्री; तैः--उनके द्वारा; अयम्--यह; साध्यतामू--सम्पन्न करना चाहिए; मख: --यज्ञ |
अतः गौवों, ब्राह्मणों तथा गोवर्धन पर्वत के आनन्द हेतु यज्ञ का शुभारम्भ हो।
इन्द्र के पूजनके लिए जितनी सामग्री एकत्र की गई है उससे यह यज्ञ सम्पन्न किया जाय।
पच्यन्तां विविधा: पाका: सूपान्ता: पायसादय: ।
संयावापूपशष्कुल्यः सर्वदोहश्च गृह्मयताम् ॥
२६॥
पच्यन्ताम्--लोग पकावें; विविधा: --नाना प्रकार के; पाका:--पकवान्न से लेकर; सूप-अन्ता:--शोरबा तक; पायस-आदयः:--खौर इत्यादि; संयाव-आपूप--तले हुए पापड़; शष्कुल्य: --पूड़ियाँ; सर्व--सब; दोह:--गौवों के दुहने से प्राप्तव्य;च--तथा; गृह्मताम्--ले लिया जाय।
खीर से लेकर तरकारी के शोरवे तक के विविध पकवान तैयार किये जायूँ।
अनेक प्रकारके बढ़िया पापड़ तल लिए जाय॑ँ या सेंक लिए जायें तथा दूध के जितने भी पदार्थ बन सकें उन्हेंइस यज्ञ के लिए एकत्र कर लिया जाय।
हूयन्तामग्नय: सम्यग्ब्राह्मणैब्रह्मवादिभि: ।
अन्न बहुगुणं तेभ्यो देयं वो धेनुदक्षिणा: ॥
२७॥
हूयन्तामू--आह्वान किया जाय; अग्नयः--यज्ञ की अग्नियों का; सम्यक्--उचित रीति से; ब्राह्मणै:--ब्राह्मणों के द्वारा; ब्रह्म-वादिभि:--वेदविद्; अन्नम्ू-- भोजन; बहु-गुणम्--अच्छी तरह से तैयार; तेभ्य:--उनको; देयम्--दिया जाय; व: --तुम्हारेद्वारा; धेनु-दक्षिणा:--गौवों की दक्षिणा।
वैदिक मंत्रों में पटु-ब्राह्मणों को चाहिए कि यज्ञ की अग्नियों का ठीक से आवाहन करें।
तत्पश्चात् तुम लोग पुरोहितों को उत्तम भोजन कराओ और उन्हें गौवें तथा अन्य भेंटें दान में दो।
अन्येभ्यश्वाश्रचचाण्डालपतितेभ्यो यथाईतः ।
यवसं च गवां दत्त्वा गिरये दीयतां बलि: ॥
२८॥
अन्येभ्य:--औरों के लिए; च--भी; आ-श्व-चाण्डाल--कुत्तों तथा चाण्डालों तक; पतितेभ्य:--ऐसे पतित लोगों के लिए;यथा--जिस तरह; अर्हत:--चाहिए; यवसम्--घास; च--तथा; गवाम्--गौवों को; दत्त्वा--देकर; गिरये--गोवर्धन नामकपर्वत को; दीयताम्--प्रदान की जानी चाहिए; बलि:ः--आदरपूर्ण भेंट ।
कुत्तों तथा चाण्डालों जैसे पतितात्माओं समेत हर एक को उपयुक्त भोजन देने के बाद तुमसबों को चाहिए कि गौवों को घास दो और तब गोवर्धन पर्वत को अपनी सादर भेंटें चढ़ाओ।
स्वलड्डू ता भुक्तवन्तः स्वनुलिप्ता: सुवासस: ।
प्रदक्षिणां च कुरुत गोविप्रानलपर्वतान् ॥
२९॥
सु-अलड्डू ता:--सुन्दर आभूषण पहन कर; भुक्तवन्त:--भरपेट खाकर; सु-अनुलिप्ता:--शुभ चन्दनलेप करके; सु-वासस:--अच्छे वस्त्र पहन कर; प्रदक्षिणाम्--प्रदक्षिणा; च--तथा; कुरुत--तुमलोगों को करनी चाहिए; गो--गौवों; विप्र--ब्राह्मणों;अनल--यज्ञ की अग्नियों; पर्वतान्ू--तथा गोवर्धन पर्वत की भी |
भरपेट भोजन करने के बाद तुममें से हरएक को वस्त्र तथा आभूषण से खूब सजना चाहिए,अपने शरीर में चन्दनलेप करना चाहिए और तत्पश्चात् गौवों, ब्राह्मणों, यज्ञ की अग्नियों तथा गोवर्धन पर्वत की प्रदक्षिणा करनी चाहिए।
एतन्मम मतं तात क्रियतां यदि रोचते ।
अयं गोब्राह्मणाद्रीणां मह्ं च दयितो मख: ॥
३०॥
एतत्--यह; मम--मेरा; मतमू--विचार; तात--हे पिताश्री; क्रियताम्ू--किया जाय; यदि--यदि; रोचते-- अच्छा लगे;अयम्--यह; गो-ब्राह्मण-अद्रीणाम्--गौवों, ब्राह्मणों तथा गोवर्धन पर्वत को; महाम्ू--मेरे लिए; च-- भी; दयित:--प्रिय;मखः--यज्ञ |
हे पिताश्री, यह मेरा विचार है और यदि आपको अच्छा लगे तो आप इसे कीजिये।
ऐसा यज्ञगौवों, ब्राह्मणों तथा गोवर्धन पर्वत को एवं मुझको भी अत्यन्त प्रिय होगा।
श्रीशुक उबाचकालात्मना भगवता शक्रदर्पजिघांसया ॥
प्रोक्त निशम्य नन्दाद्या: साध्वगृहन्त तद्बचच: ॥
३१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; काल-आत्मना--काल की शक्ति के रूप में प्रकट होकर; भगवता--भगवान् द्वारा; शक्र--इन्द्र का; दर्प--गर्व; जिघांसया--विनष्ट करने की इच्छा से; प्रोक्तमू--कहा गया; निशम्य--सुनकर;नन्द-आद्या:--नन्द तथा अन्य वृद्ध गोपजन; साधु--सर्वोत्तम कहकर; अगृह्नन्त--स्वीकार कर लिया; ततू-वचः--उनके शब्दोंको
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : शक्तिमान काल स्वरूप भगवान् कृष्ण इन्द्र के मिथ्या गर्व कोनष्ट करना चाहते थे।
जब नन्द तथा वृन्दावन के अन्य वृद्धजनों ने श्रीकृष्ण का बचन सुना तो उन्होंने इसे उचित मान लिया।
तथा च व्यदधु: सर्व यथाह मधुसूदन: ।
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं तद्द्रव्येण गिरिद्विजानू ॥
३२॥
उपहत्य बलीन्सम्यगाहता यवसं गवाम् ।
गोधनानि पुरस्कृत्य गिरिं चक्कुः प्रदक्षिणम् ॥
३३॥
तथा--इस तरह; च-- और; व्यदधु:--सम्पन्न किया; सर्वम्--हर बात; यथा--जिस तरह; आह--बतलाया; मधुसूदन: --भगवान् कृष्ण ने; वाचयित्वा--( ब्राह्मणों से ) वाचन कराया; स्वस्ति-अयनम्--शुभ मंत्र; तत्-द्रव्येण--इन्द्र यज्ञ के निमित्तएकत्र की गई सामग्री से; गिरि--पर्वत; द्विजानू--तथा ब्रह्मणों को; उपहत्य-- भेंट करके; बलीन्--उपहार; सम्यक् --सभीएकसाथ; आहता:ः--आदर पूर्वक; यवसम्--घास; गवाम्--गौवों को; गो-धनानि--साँड़ों, गौवों तथा बछड़ों को; पुरस्कृत्य--आगे करके ; गिरिम्--पर्वत की; चक्रु:-- की; प्रदक्षिणम्--प्रदक्षिणा |
तत्पश्चात् ग्वाल समुदाय ने मधुसूदन द्वारा प्रस्तावित सब कुछ पूरा किया।
उन्होंने शुभ वैदिकमंत्रों का वाचन करने के लिए ब्राह्मणों की व्यवस्था की और इन्द्र-यज्ञ के निमित्त संग्रहीत सारीसामग्री को उपयोग में लाते हुए गोवर्धन पर्वत तथा ब्राह्मणों को सादर भेंटें दीं।
उन्होंने गौवों कोभी घास दिया।
तत्पश्चात् गौवों, साँड़ों तथा बछड़ों को आगे करके गोवर्धन पर्वत की प्रदक्षिणाकी।
अनांस्यनडुद्ुक्तानि ते चारुह्म स्वलड्डू ता: ।
गोप्यश्च कृष्णवीर्याणि गायन्त्य: सद्विजाशिष: ॥
३४॥
अनांसि--छकड़े; अनड्त्-युक्तानि--बैलों से नँधे; ते--वे; च--और; आरुह्म--चढ़कर; सु-अलड्डू ता:--उत्तम आभूषणपहने; गोप्य:--गोपियाँ; च--तथा; कृष्ण-वीर्याणि-- भगवान् कृष्ण की महिमाओं को; गायन्त्य:--गाती हुई; स--के साथ;द्विज--ब्राह्मणों के; आशिष:--आशीर्वाद |
बैलों द्वारा खींचे जा रहे छकड़ों में चढ़कर सुन्दर आभूषणों से अलंकृत गोपियाँ भी साथ होलीं और कृष्ण की महिमा का गान करने लगीं और उनके गीत ब्राह्मणों के आशीष के साथसमामेलित हो गये।
कृष्णस्त्वन्यतमं रूपं गोपविश्रम्भणं गतः ।
शैलोउस्मीति ब्रुवन्भूरि बलिमादद्गहद्वपु: ॥
३५॥
कृष्ण:-- भगवान् कृष्ण; तु--और तब; अन्यतमम्--दूसरा; रूपमू--स्वरूप; गोप-विश्रम्भणम्-गोपों में श्रद्धा उत्पन्न करने केलिए; गत:--धारण किया; शैल:--पर्वत; अस्मि--हूँ; इति--ये वचन; ब्रुवन्--कहते हुए; भूरि--प्रचुर; बलिम्-- भेंट;आदतू--निगल गये; बृहत्-वपु:--अपने विराट रूप में
तत्पश्चात् कृष्ण ने गोपों में श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए अभूतपूर्व विराट रूप धारण करलिया और यह घोषणा करते हुए कि 'मैं गोवर्धन पर्वत हूँ' प्रचुर भेंटें खा लीं।
तस्मै नमो व्रजजनै: सह चक्र आत्मनात्मने ।
अहो पश्यत शैलोसौ रूपी नो३नुग्रह॑ व्यधात् ॥
३६॥
तस्मै--उनको; नमः --नमस्कार; ब्रज-जनै:--ब्रज के लोगों के; सह--साथ; चक्रे --बनाया; आत्मना-- अपने से; आत्मने--अपने में; अहो--ओह; पश्यत--जरा देखो; शैल:--पर्वत ने; असौ--यह; रूपी --रूप धारण किये; न:ः--हम पर; अनुग्रहम्--कृपा; व्यधात्--प्रदान की |
कृष्ण ने ब्रजवासियों समेत गोवर्धन पर्वत के इस स्वरूप को नमन किया और इस तरहवास्तव में अपने को ही नमस्कार किया।
तत्पश्चात् उन्होंने कहा, 'जरा देखो तो, यह पर्वत किसतरह पुरुष रूप में प्रकट हुआ है और इसने हम पर कृपा की है।
एषोवजानतो मर्त्यान््कामरूपी वनौकसः ।
हन्ति हास्मै नमस्याम:ः शर्मणे आत्मनो गवाम् ॥
३७॥
एष: --यह; अवजानत: --लापरवाह; मर्त्यानू--मर्त्यों को; काम-रूपी--इच्छानुसार रूप धारण करने वाले ( यथा पर्वतों में रहनेवाले सर्प )) वन-ओकस:--वनवासी; हन्ति--मार डालेंगे; हि--निश्चय ही; अस्मै--उसको; नमस्याम: -- नमस्कार करें;शर्मणे--रक्षा करने के लिए; आत्मन:--हम सबकी; गवाम्--तथा गौवों की |
यह गोवर्धन पर्वत इच्छानुसार रूप धारण करके अपनी उपेक्षा करने वाले वन के किसी भीनिवासी को मार डालेगा।
अतः अपनी तथा गौवों की सुरक्षा के लिए हम उसको नमस्कार करें।
इत्यद्विगोद्विजमखं वासुदेवप्रचोदिता: ।
यथा विधाय ते गोपा सहकृष्णा ब्रजं ययु: ॥
३८॥
इति--इस प्रकार से; अद्वि--गोवर्धन पर्वत; गो--गौवें; द्विज--तथा ब्राह्मणों को; मखम्--विशाल यज्ञ; वासुदेव--कृष्ण द्वारा;प्रचोदिता:--प्रेरित; यथा--उचित ढंग से; विधाय--सम्पन्न करके; ते--वे; गोपा:--गोपजन; सह-कृष्णा: --कृष्ण के साथ;ब्रजम्-ब्रज को; ययु:--गये
इस प्रकार भगवान् वासुदेव द्वारा समुचित ढंग से गोवर्धन-यज्ञ सम्पन्न करने के लिए प्रेरितकिये गये गोपजन गौवें तथा ब्राह्मण कृष्ण के साथ अपने गाँव ब्रज लौट आये।
