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अध्याय छब्बीसवाँ: अद्भुत कृष्ण
10.26श्रीशुक उबाचएवंविधानि कर्माणि गोपा: कृष्णस्य वीक्ष्य ते ।
अतद्ठीर्यविद: प्रोचु: समभ्येत्य सुविस्मिता: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्-विधानि--इस तरह के; कर्माणि--कार्यों को; गोपा:--ग्वाले;कृष्णस्य--कृष्ण के; वीक्ष्य--देखकर; ते--वे; अतत्-वीर्य-विदः --उनकी शक्ति को समझने में असमर्थ; प्रोचु:--बोले;समभ्येत्य--( नन्द महाराज के ) पास जाकर; सु-विस्मिता: --अत्यन्त विस्मित होकर।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब गोपों ने गोवर्धन पर्वत उठाने जैसे कृष्ण के कार्यों को देखातो वे विस्मित हो गये।
उनकी दिव्य शक्ति को न समझ पाने के कारण वे नन््द महाराज के पासगये और इस प्रकार बोले।
बालकस्य यदेतानि कर्माण्यत्यद्भधुतानि वै ।
कथर्मईत्यसौ जन्म ग्राम्येष्वात्मजुगुप्सितम् ॥
२॥
बालकस्य--बालक के; यत्--क्योंकि; एतानि--इन; कर्माणि--कर्मों को; अति-अद्भुतानि--अत्यन्त अद्भुत; बै--निश्चयही; कथम्--कैसे; अहति--चाहिए; असौ--वह; जन्म--जन्म; ग्राम्येषु--संसारी लोगों के बीच; आत्म--अपने लिए;जुगुप्सितम्ू-घृणित |
[ग्वालों ने कहा : जब यह बालक ऐसे अद्भुत कार्य करता है, तो फिर किस तरह हमजैसे संसारी व्यक्तियों के बीच उसने जन्म लिया ? ऐसा जन्म तो उसके लिए घृणित लगेगा।
यः सप्तहायनो बाल: करेणैकेन लीलया ।
कथं बिभ्रद्गरिवरं पुष्कर गजराडिव ॥
३॥
यः--जो; सप्त-हायन: --सात वर्ष की आयु का; बाल:--बालक; करेण--हाथ से; एकेन--एक; लीलया--खेल खेल में;कथम्-कैसे; बिभ्रतू--उठाये रहा; गिरि-वरम्--पर्वतों में श्रेष्ठ, गोवर्धन को; पुष्करमू--कमल के फूल को; गज-राट्--बलशाली हाथी; इब--सहृश |
यह सात वर्ष का बालक किस तरह विशाल गोवर्धन पर्वत को खेल खेल में एक हाथ सेउसी तरह उठाये रह सकता है, जिस तरह बलशाली हाथी कमल के फूल को उठा लेता है ?
तोकेनामीलिताक्षेण पूतनाया महौजसः ।
पीतः स्तनः सह प्राण: कालेनेव वयस्तनो: ॥
४॥
तोकेन--नन््हें बालक द्वारा; आ-मीलित--प्राय: बन्द; अक्षेण-- आँखों से; पूतनाया: --पूतना डाइन का; महा-ओजसः --महान्पराक्रम वाली; पीत:--पिया हुआ; स्तन:--स्तन; सह--साथ; प्राणैः--प्राण वायु के; कालेन--काल की शक्ति से; इब--सहश; वय: --आयु; तनो: -- भौतिक शरीर का।
अभी इसने अपनी आँखें भी नहीं खोली थीं और निरा बच्चा ही था कि इसने बलशालीराक्षसी पूतना के स्तन का दूध पिया और उसी के साथ उसके प्राण चूस लिये जिस तरह कालकी शक्ति मनुष्य के शरीर से यौवन को चूस लेती है।
हिन्वतोधः शयानस्यथ मास्यस्थ चरणावुदक् ।
अनोपतद्विपर्यस्तं रूदतः प्रपदाहतम् ॥
५॥
हिन्वतः--हिलाते हुए; अध:--नीचे; शयानस्य--लेटे हुए; मास्यस्य--कुछ मास वाले बालक को; चरणौ--दो पाँव; उदक्--ऊपर की ओर; अनः--छकड़ा; अपतत्--गिर पड़ा; विपर्यस्तम्--उलटा हुआ; रुदतः--रोते हुए; प्रपद-- अपने पाँव केअग्रभाग से; आहतम्--प्रताड़ित |
एक बार जब कृष्ण तीन मास के छोटे शिशु थे, तो रो रहे थे और एक बड़े से छकड़े केनीचे लेटे हुए अपने पाँवों को ऊपर चला रहे थे।
तभी यह छकड़ा गिरा और उलट गया क्योंकिउन्होंने अपने पाँव के अँगूठे से उस पर प्रहार किया था।
एकहायन आसीनो हियमाणो विहायसा ।
दैत्येन यस्तृणावर्तमहन्कण्ठग्रहातुरम् ॥
६॥
एक-हायन:--एकवर्षीय; आसीन:--बैठा हुआ; हियमाण:--हरण किया गया; विहायसा--आकाश् में; दैत्येन-- असुर द्वारा;यः--जिसने; तृणावर्तम्-तृणावर्त को; अहन्ू--मारा; कण्ठ--गला; ग्रह--पकड़ा जाकर; आतुरम्--सताया गया।
एक वर्ष की आयु में, जब वे शान्तिपूर्वक बैठे थे तो तृणावर्त नामक असुर उन्हें आकाश में उड़ा ले गया।
किन्तु बालक कृष्ण ने उस असुर की गर्दन दबोच ली जिससे उसे महान् पीड़ा हुईऔर इस तरह उसे मार डाला।
क्वचिद्धैयड्रवस्तैन्ये मात्रा बद्ध उदूखले ।
गच्छन्नर्जुनयोर्म ध्ये बाहु भ्यां तावपातयत् ॥
७॥
क्वचित्--एक बार; हैयड्रवब--मक्खन; स्तैन्ये--चुराते हुए; मात्रा--अपनी माता द्वारा; बद्ध:--बाँधे गये; उदूखले--ऊखल में;गच्छन्--जाते हुए; अर्जुनयो:--दो अर्जुन वृक्षों के; मध्ये--बीच में; बाहुभ्याम्--अपने हाथों से; तौ अपातयत्--दोनों को गिरादिया, उखाड़ डाला।
एक बार उनकी माता ने उन्हें रस्सियों से एक ऊखल से बाँध दिया क्योंकि माता ने उन्हेंमक्खन चुराते पकड़ लिया था।
तब वे अपने हाथों के बल रेंगते हुए उस ऊखल को दो अर्जुनवृक्षों के बीच खींच ले गये और उन वृक्षों को उखाड़ डाला।
बने सनञ्ञारयन्वत्सान्सरामो बालकैर्वृतः ।
हन्तुकामं बकं दोर्भ्या मुखतोरिमपाटयत् ॥
८ ॥
वने--जंगल में; सज्ञारयन्--चराते हुए; वत्सानू--बछड़ों को; सराम:--बलदेव के साथ; बालकै:--ग्वालबालों के द्वारा;बृतः--घिरा हुआ; हन्तु-कामम्--मार डालने की इच्छा से; बकम्--बकासुर; दोर्भ्यामू-- अपनी बाँहों से; मुखतः--मुख से;अरिम्--शत्रु को; अपाटयतू्--चीर डाला।
अन्य समय जब वे बलराम तथा ग्वालबालों के साथ वन में गौवें चरा रहे थे तो राक्षसबकासुर उनको मार डालने की मंशा से वहाँ आया।
किन्तु कृष्ण ने इस शत्रु राक्षस का मुँह(चोंच ) पकड़ लिया और उसको चीर डाला।
वत्सेषु वत्सरूपेण प्रविशन्तं जिघांसया ।
हत्वा न्यपातयत्तेन कपित्थानि च लीलया ॥
९॥
वत्सेषु--बछड़ों के बीच; वत्स-रूपेण--अन्य बछड़े के रूप में प्रकट होकर; प्रविशन्तम्--घुसकर; जिघांसया--मार डालनेकी इच्छा से; हत्वा--मारकर; न्यपातयत्--गिरा दिया; तेन--उससे; कपित्थानि--कैथे के फल; च--तथा; लीलया--खेलखेल में |
कृष्ण को मार डालने की इच्छा से राक्षस वत्सासुर बछड़े का वेश बनाकर उनके बछड़ों केबीच घुस गया।
किन्तु कृष्ण ने इस असुर को मार डाला और इसके शरीर से कैथे के वृक्षों से'फल नीचे गिराने का खिलवाड़ किया।
हत्वा रासभदैतेयं तद्वन्धूंश्व बलान्वितः ।
चक्रे तालवनं क्षेमं परिपक्वफलान्वितम् ॥
१०॥
हत्वा--मारकर; रासभ--गधा के रूप में प्रकट हुए; दैतेयम्--दिति के वंशज को; तत्ू-बन्धून्ू--उस असुर के संगियों को;च--भी; बल-अन्वितः--बलराम के साथ; चक्रे --बनाया; ताल-वनम्--तालवन को; क्षेमम्ू--कल्याणप्रद, मंगलमय;परिपक्व--पके; फल--फलों से; अन्वितम्ू-पूर्णभगवान्
बलराम समेत कृष्ण ने राक्षस धेनुकासुर तथा उसके सभी साथियों का वध कियाऔर इस तरह तालवन जंगल को, जो पके हुए ताड़ फलों से भरापुरा था, सुरक्षित बनाया।
प्रलम्बं घातयित्वोग्रं बलेन बलशालिना ।
अमोचयद्व्रजपशून्गोपां श्वारण्यवद्धित: ॥
११॥
प्रलम्बम्--प्रलम्बासुर को; घाययित्वा--मरवा डालने की व्यवस्था करके; उग्रमू-- भीषण; बलेन--बलराम द्वारा; बल-शालिना--बलशाली; अमोचयत्--उबारा; ब्रज-पशून्--ब्रज के पशुओं को; गोपानू--ग्वालबालों को; च--तथा; आरण्य--जंगल की; वह्वित:ः-- अग्नि से |
भीषण दैत्य प्रलम्बासुर को बलशाली भगवान् बलराम द्वारा मरवाकर कृष्ण ने ब्रज के ग्वालबालों तथा उनके पशुओं को दावानल ( जंगल की आग ) से बचाया।
आशीविषतमाहीन्द्रं दमित्वा विमदं हृदातू ।
प्रसह्योद्वास्य यमुनां चक्रे सौ निर्विषोदकाम् ॥
१२॥
आशी--उसके विषदन्तों का; विष-तम--सबसे शक्तिशाली विषैला; अहि--साँप के; इन्द्रमू--प्रधान को; दमित्वा--दमनकरके; विमदम्--मद को चूर करके; हृदात्--सरोवर से; प्रसहा--बलपूर्वक; उद्दास्य-- भगाकर; यमुनाम्--यमुना नदी को;चक्रे--बनाया; असौ--इसी ने; निर्विष--विषरहित; उदकाम्ू--जल को
कृष्ण ने अति विषैले नाग कालिय को दण्ड दिया और उसे विनीत बनाकर यमुना केसरोवर से बलपूर्वक निकाल बाहर किया।
इस तरह भगवान् ने उस नदी के जल को साँप केप्रचण्ड विष से मुक्त बनाया।
दुस्त्यजश्चानुरागोउस्मिन्सवेंषां नो व्रजौकसाम् ।
नन्द ते तनयेउस्मासु तस्याप्यौत्पत्तिक: कथम् ॥
१३॥
दुस्त्यज:--त्याग पाना असम्भव; च--तथा; अनुराग: --प्रेम; अस्मिन्ू--उनके लिए; सर्वेषामू--सब; न:--हम; ब्रज-ओकसाम्--ब्रजवासियों का; नन्द--प्रिय नन््द महाराज; ते--तुम्हारे; तनये--पुत्र के लिए; अस्मासु--हम सबों के प्रति;तस्य--उसका; अपि--भी; औत्पत्तिक: --स्वाभाविक; कथम्--किस तरह से |
हे नन््द महाराज, हम तथा ब्रज के सारे वासी क््योंकर आपके पुत्र के प्रति अपना निरन्तरस्नेह त्याग नहीं पा रहे हैं? और वे हम लोगों के प्रति स्वतः इतना आकृष्ट क्योंकर हैं ?
क्व सप्तहायनो बालः क््व महाद्विविधारणम् ।
ततो नो जायते शट्ड्ा बत्रजनाथ तवात्मजे ॥
१४॥
क्व--कहाँ तो; सप्त-हायन:--सप्तवर्षीय; बाल:--यह बालक; क्व--कहाँ; महा-अद्वि--विशाल पर्वत का; विधारणम्--उठाया जाना; तत:--इस प्रकार; नः--हमारे लिए; जायते--उत्पन्न करता है; शद्भा--सन्देह; ब्रज-नाथ--हे ब्रज के स्वामी;तब--तुम्हारे; आत्मजे--पुत्र के विषय में कहाँ
तो यह सात वर्ष का बालक और कहाँ उसके द्वारा विशाल गोवर्धन पर्वत का उठायाजाना, अतएव, हे ब्रजराज, हमारे मन में आपके पुत्र के विषय में शंका उत्पन्न हो रही है।
श्रीनन्द उवाचश्रूयतां मे बच्चो गोपा व्येतु शट्जा च वो$र्भके ।
एनम्कुमारमुदिश्य गर्गो मे यदुबाच ह ॥
१५॥
श्री-नन्दः उवाच-- श्रीनन्द महाराज ने कहा; श्रूयताम्--सुनो; मे--मेरे; वच:--शब्द; गोपा:--हे ग्वालो; व्येतु--दूर करो;शट्ढा--सन्देह; च--तथा; वः--अपनी; अर्भके --बालक के विषय में; एनम्--इस; कुमारम्ू--बालक को; उद्िश्य--दिखलाते हुए; गर्ग:--गर्ग मुनि ने; मे--मुझसे; यत्--जो; उबाच--कहा; ह--था |
नन्द महाराज ने उत्तर दिया: हे ग्वालो, जरा मेरी बातें सुनो और मेरे पुत्र के विषय में जोअपनी शंकाएँ हों उन्हें दूर कर दो।
कुछ समय पहले गर्ग मुनि ने इस बालक के विषय में मुझसेइस प्रकार कहा था।
वर्णास्त्रय: किलास्यासन्गृह्नतोनुयुगं तनू: ।
शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गत: ॥
१६॥
वर्णा: त्रय:--तीन रंग; किल--निस्सन्देह; अस्य--तुम्हारे पुत्र कृष्ण के; आसनू-- थे; गृह्कतः--ग्रहण किये गये; अनु-युगम्तनू:--विभिन्न युगों के अनुसार दिव्य शरीर; शुक्ल:--कभी श्वेत; रक्त:--कभी लाल; तथा--और; पीत:--कभी पीला;इदानीम् कृष्णताम् गत:--सम्प्रति उसने श्याम वर्ण धारण किया है।
[गर्ग मुनि ने कहा था: आपका पुत्र कृष्ण हर युग में अवतार के रूप में प्रकट होता है।
भूतकाल में उसने तीन रंग--श्रेत, लाल तथा पीला धारण किये थे और अब वह श्यामवर्ण मेंप्रकट हुआ है।
प्रागयं वसुदेवस्य क्वचिज्ञातस्तवात्मज: ।
वासुदेव इति श्रीमानभिज्ञा: सम्प्रचक्षते ॥
१७॥
प्राकु--पहले; अयम्--यह बालक; वसुदेवस्थ--वसुदेव का; क्वचित्--क भी; जात: --उत्पन्न हुआ था; तब--तुम्हारा;आत्मज:--बालक के रूप में जन्मा कृष्ण; वासुदेव:ः --अतः उसका नाम वासुदेव रखा जा सकता है; इति--इस प्रकार;श्रीमान्--अत्यन्त सुन्दर; अभिज्ञा:--विद्वज्जन; सम्प्रचक्षते--यह कहते हैं कृष्ण ही वासुदेव हैं ।
अनेक कारणों से आपका यह सुन्दर पुत्र कभी वसुदेव के पुत्र रूप में प्रकट हो चुका है।
अतएव विद्वज्न कभी कभी इस बालक को वासुदेव कहते हैं।
बहूनि सन्ति नामानि रूपाणि च सुतस्य ते ।
गुण कर्मानुरूपाणि तान्यहं वेद नो जना: ॥
१८॥
बहूनि--विविध; सन्ति-- हैं; नामानि--नाम; रूपाणि-- स्वरूप; च--कभी; सुतस्य--पुत्र के; ते--तुम्हारे; गुण-कर्म-अनुरूपाणि--अपने गुणों तथा कर्मों के अनुसार; तानि--उन्हें; अहम्--मैं; वेद--जानता हूँ; न उ जना:--सामान्य पुरुष नहीं।
तुम्हारे इस पुत्र के अपने दिव्य गुणों तथा कर्मों के अनुसार अनेक रूप तथा नाम हैं।
मैं उन्हेंजानता हूँ किन्तु सामान्य जन उन्हें नहीं समझते।
एष वः श्रेय आधास्यद्गोपगोकुलनन्दनः ।
अनेन सर्वदुर्गाणि यूयमञ्जस्तरिष्यथ ॥
१९॥
एष:--यह बालक; व:ः--तुम सबों के लिए; श्रेयः आधास्यत्--कल्याण करने वाला होगा; गोप-गोकुल-नन्दन:--मानोंगोकुल के पुत्र के रूप में ग्वालों के परिवार में उत्पन्न ग्वालबाल हो; अनेन--इसके द्वारा; सर्व-दुर्गाणि--सभी प्रकार के कष्टोंको; यूयम्--तुम सभी; अज्भध:ः --सरलता से; तरिष्यथ--तर सकोगे।
गोकुल के ग्वालों के दिव्य आनन्द में वृद्धि करने के लिए यह बालक सदैव तुम सबकाकल्याण करेगा।
और उसकी कृपा से ही तुम लोग सारे कष्टों को पार कर सकोगे।
पुरानेन ब्रजपते साधवो दस्युपीडिता: ।
अराजके रक्ष्यमाणा जिग्युर्दस्यून्समेधिता: ॥
२०॥
पुरा--प्राचीन काल में; अनेन--कृष्ण द्वारा; ब्रज-पते--हे ब्रजराज; साधव: --ईमानदार लोग; दस्यु-पीडिता: --चोर-उचक्कोंद्वारा पीड़ित किये जाकर; अराजके-- अनियमित सरकार के होते हुए; रक्ष्यमाणा: --रक्षा किये जाते थे; जिग्यु;--जीत लिया;दस्यूनू--चोर-उचक्कों को; समेधिता:--फलते-फूलते
हे नन््द महाराज, इतिहास में यह अंकित है कि जब अनियमित तथा अक्षम सरकार थी, जबइन्द्र को सिंहासन से उतार दिया गया था और जब ईमानदार लोग चोरों द्वारा सताये जा रहे थे तोयह बालक उचक्कों का दमन करने तथा लोगों की रक्षा करने और उन्हें फलने-फूलने योग्यबनाने के लिए प्रकट हुआ था।
य एतस्मिन्महाभागे प्रीतिं कुर्वन्ति मानवा: ।
नारयोभिभवन्त्येतान्विष्णुपक्षानिवासुरा: ॥
२१॥
ये--जो व्यक्ति; एतस्मिनू--इस बालक को; महा-भागे--परम भाग्यशाली; प्रीतिम्--स्नेह; कुर्वन्ति--करते हैं; मानवा:--ऐसेमनुष्य; न--नहीं; अरयः--शत्रुगण; अभिभवन्ति--पराजित करते हैं; एतान्ू--कृष्ण से अनुराग करने वाले; विष्णु-पक्षान् --जिनके पक्ष में सदैव विष्णु रहते हैं उन देवताओं को; इब--सहृश; असुराः:--असुरगण |
असुरगण देवताओं को हानि नहीं पहुँचा सकते क्योंकि भगवान् विष्णु सदैव उनके पक्ष में रहते हैं।
इसी प्रकार सर्वमंगलमय कृष्ण से अनुरक्त कोई भी व्यक्ति या समूह शत्रुओं द्वारापराजित नहीं किया जा सकता।
तस्मान्नन्द कुमारोयं नारायणसमो गुणै: ।
प्रिया कीर्त्यानुभावेन तत्कर्मसु न विस्मय: ॥
२२॥
तस्मातू--इसलिए; नन्द--हे नन््द महाराज; कुमार: --बालक; अयम्--यह; नारायण-समः--नारायण के समान; गुणैः-- अपनेगुणों से; भ्रिया--अपने ऐश्वर्य से; कीर्त्या--विशेषतया अपने नाम तथा यश से; अनुभावेन--तथा अपने प्रभाव से; तत्ू--उसके; कर्मसु--कर्मों के सम्बन्ध में; न--नहीं है; विस्मयः--आश्चर्यअतएव
हे नन्द महाराज, आपका यह बालक नारायण सरीखा है।
यह अपने दिव्य गुण,ऐश्वर्य, नाम, यश तथा प्रभाव में बिल्कुल नारायण जैसा ही है।
अतः इसके कार्यों से आपकोचकित नहीं होना चाहिए।
इत्यद्धा मां समादिश्य गर्गे च स्वगृहं गते ।
मन्ये नारायणस्यांशं कृष्णमक्लिष्टकारिणम् ॥
२३॥
इति--इस प्रकार कह कर; अद्धघा-प्रत्यक्ष; मामू--मुझको; समादिश्य--आदेश देकर; गर्गें--गर्गाचार्य; च--तथा; स्व-गृहम्--अपने घर; गते-- चले गये; मन्ये--मैं विचार करता हूँ; नारायणस्य-- भगवान् नारायण का; अंशम्--शक्त्याविष्ट अंश;कृष्णम्--कृष्ण को; अक्लिष्ट-कारिणम्--हमें क्लेश से मुक्त रखने वाले |
[नन्द महाराज ने कहा : जब गर्ग ऋषि ये शब्द कहकर अपने घर चले गये तो मैं विचारकरने लगा कि जो कृष्ण हमें क्लेश से दूर रखता है, वह वास्तव में भगवान् नारायण का अंशहै।
इति नन्दवच: श्रुत्वा गर्गगीतं तं ब्रजौकसः ।
मुदिता नन्दमानर्चु: कृष्णं च गतविस्मया: ॥
२४॥
इति--इस प्रकार; नन्द-वच: --नन्द महाराज के शब्द को; श्रुत्वा--सुनकर; गर्ग-गीतम्--गर्ग ऋषि के कथन को; ब्रज-ओकस:--ब्रजवासी; मुदिता:--प्रसन्न; नन्दम्--नन्द महाराज को; आनर्चु:--सम्मानित किया; कृष्णम्--कृष्ण को; च--तथा;गत--दूर हो गया; विस्मया:--उनका विस्मय ।
[शुकदेव गोस्वामी ने कहा : नन््द महाराज द्वारा कहे गए गर्ग मुनि के कथन को सुनकरवृन्दावन के वासी परम प्रमुदिति हुए।
उनका विस्मय जाता रहा और उन्होंने आदरपूर्वक नन््द तथाभगवान् कृष्ण की पूजा की।
देवे वर्षति यज्ञविप्लवरुषा वज्जास्मवर्षानिलै:सीदत्पालपशुस्त्रियात्मशरणं इृष्ठानुकम्प्युत्मयन् ।
उत्पाट्यैककरेण शैलमबलो लीलोच्छिलीन्श्रं यथाबिभ्रद्गोष्ठमपान्महेन्द्रमदभित्प्रीयान्न इन्द्रो गवाम् ॥
२५॥
देवे--जब इन्द्रदेव ने; वर्षति--वर्षा कराई; यज्ञ--अपने यज्ञ के; विप्लव--उत्पात के कारण; रुषा--क्रो धवश; वज्ञ--वज् से;अश्म-वर्ष--उपल; अनिलै: --तथा वायु से; सीदत्--कष्ट उठाते हुए; पाल--ग्वाले; पशु--पशु; स्त्रि--तथा स्त्रियाँ; आत्म--स्वयं; शरणम्ू--एकमात्र आश्रय; इृष्ठा--देखकर; अनुकम्पी--अत्यन्त दयालु; उत्स्मयन्--हँसते हुए; उत्पाट्य--उखाड़ कर;एक-करेण--एक हाथ से; शैलम्--पर्वत, गोवर्धन को; अबल:--छोटा बालक; लीला--खेल में; उच्छिलीन्ध्रम्ू--कुकुरमुत्ताको; यथा--जिस प्रकार; बिभ्रत्ू--पकड़ लिया; गोष्ठम्--गोपजाति को; अपात्--बचाया; महा-इन्द्र--इन्द्र का; मद-गर्वको; भित्--नाश करने वाला; प्रीयात्-प्रसन्न हो जाय; नः--हमपर; इन्द्र: --स्वामी; गवामू--गौवों का |
अपना यज्ञ भंग किये जाने पर इन्द्र क्रेधित हुआ और उसने गोकुल पर वर्षा की तथावज्रपात और तेज हवा के साथ साथ ओले गिराये जिनसे गौवों, पशुओं तथा स्त्रियों को अतीवकष्ट हुआ।
जब दयालु प्रकृति वाले भगवान् कृष्ण ने उन सबों की यह दशा देखी जिनके उन्हें छोड़कर कोई दूसरी शरण नहीं थी तो वे मन्द-मन्द हँसने लगे और एक हाथ से उन्होंने गोवर्धनपर्वत को उठा लिया जिस तरह कोई छोटा सा बालक खेलने के लिए कुकुरमुत्ते को उखाड़ लेताहै।
इस तरह से उन्होंने ग्वाल-समुदाय की रक्षा की।
गौवों के स्वामी तथा इन्द्र के मिथ्या गर्व कोखंडित करने वाले वे ही गोविन्द हम सबों पर प्रसन्न हों।
