← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय सत्ताईसवां: भगवान इंद्र और माता सुरभि प्रार्थना करते हैं
10.27शाश्रीशुक उबाचगोवर्धने धृते शैले आसाराद्रक्षिते व्रजे ।
गोलोकादाकद्रजत्कृष्णं सुरभि: शक्र एवच ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; गोवर्धने--गोवर्धन को; धृते-- धारण करने के बाद; शैले--पर्वत;आसारातू--मूसलाधार वर्षा से; रक्षिते--रक्षित हो जाने पर; ब्रजे--ब्रज में; गो-लोकात्--गो-लोक से; आब्रजत्--आई;कृष्णम्--कृष्ण के पास; सुरभि:ः--माता सुरभि; शक्र:--इन्द्र; एव-- भी; च--तथा
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाने तथा भयंकर वर्षा से व्रजवासियोंकी रक्षा करने के बाद गौवों की माता सुरभि गो-लोक से कृष्ण का दर्शन करने आईं।
उनके साथ इन्द्र था।
शाविविक्त उपसडुम्य ब्रीडीतः कृतहेलन: ।
पस्पर्श पादयोरेनं किरीटेनार्कवर्चसा ॥
२॥
विविक्ते--एकान्त स्थान में; उपसड्रम्य--जाकर; ब्रीडित:--लज्जित; कृत-हेलन:--अपराध किये जाने से; पस्पर्श --उसने स्पर्शकिया; पादयो: --दोनों पैरों का; एनम्ू--उनको; किरीटेन--अपने मुकुट से; अर्क--सूर्य के समान; वर्चसा--तेज वालाभगवान् का अपमान करने के कारण इन्द्र अत्यन्त लज्जित था।
एकान्त स्थान में उनके पासजाकर इन्द्र उनके चरणों पर गिर पड़ा और सूर्य के समान तेज वाले मुकुट को भगवान् केचरणकमलों पर रख दिया।
दृष्टश्रुतानुभावोस्य कृष्णस्यामिततेजस: ।
नष्ठत्रिलोकेशमद इृदमाह कृताझ्ञलि: ॥
३॥
इृष्ट--देखा हुआ; श्रुत--सुना हुआ; अनुभाव: --शक्ति; अस्य--इस; कृष्णस्य-- भगवान् कृष्ण की; अमित--अपार;तेजस:--जिसकी शक्ति; नष्ट--नष्ट; त्रि-लोक--तीनों जगतों का; ईश--स्वामी होने का; मदः--नशा; इदम्--ये शब्द;आह--कहे; कृत-अद्जलि:--याचना में अपने हाथ जोड़े
अब तक इन्द्र सर्वशक्तिमान कृष्ण की दिव्य शक्ति को सुन तथा देख चुका था और इसतरह तीनों जगतों के स्वामी होने का उसका मिथ्या गर्व चूर हो चुका था।
याचना के लिए दोनोंहाथ जोड़कर उसने भगवान् को इस प्रकार सम्बोधित किया।
इन्द्र उबाच शाविशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तंतपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् ।
मायामयोयं गुणसम्प्रवाहोन विद्यते ते ग्रहणानुबन्ध: ॥
४॥
इन्द्र: उबाच--इन्द्र ने कहा; विशुद्ध-सत्त्वम्-दिव्य सतोगुण दिखाने वाला; तब--तुम्हारा; धाम--स्वरूप; शान्तम्--अपरिवर्तनीय; तपः-मयम्--ज्ञान से पूर्ण; ध्वस्त--विनष्ट; रज:--रजोगुण; तमस्कम्--तथा तमोगुण को; माया-मय:--मायापर आधारित; अयम्ू--यह; गुण-- भौतिक प्रकृति के गुणों की; सम्प्रवाह:--धारा; न विद्यते--उपस्थित नहीं है; ते--तुम्हारेभीतर; अग्रहण-इग्नोरन्चे; अनुबन्ध:-व्हिछ इस् दुए तो
राजा इन्द्र ने कहा : आपका दिव्य रूप शुद्ध सतोगुण का प्राकट्य है, यह परिवर्तन सेविचलित नहीं होता, ज्ञान से चमकता रहता है और रजो तथा तमोगुणों से रहित है।
आपके भीतरमाया तथा अज्ञान पर आअ्रित भौतिक गुणों का प्रबल प्रवाह नहीं पाया जाता।
शालोभादयो येडबुधलिन्ग भावा: ।
तथापि दण्डं भगवान्बिभर्तिधर्मस्य गुप्त्ये खलनिग्रहाय ॥
५॥
कुतः--कैस; नु--निश्चय ही; तत्--उस ( भौतिक शरीर के अस्तित्व ) के; हेतवः--कारण; ईश--हे प्रभु; तत्-कृता:--भौतिक देह से सम्बन्ध होने से उत्पन्न; लोभ-आदय: --लोभ इत्यादि; ये--जो; अबुध--अज्ञानी व्यक्ति के; लिन्ग-भावा:--लक्षण; तथा अपि--तो भी; दण्डम्--दण्ड; भगवान्-- भगवान्; बिभर्ति--घुमाता है; धर्मस्य-- धर्म का; गुप्त्यै--सुरक्षा केलिए; खल--दुष्ट व्यक्तियों के ; निग्रहाय--दण्ड के लिए
तो भला आपमें अज्ञानी व्यक्ति के लक्षण--यथा लोभ, कामक्रोध तथा ईर्ष्या--किस तरहरह सकते हैं क्योंकि इनकी उत्पत्ति संसार में मनुष्य की पूर्व-लिप्तता के कारण होती है और येमनुष्य को संसार में अधिकाधिक जकड़ते जाते हैं ? फिर भी हे परमेश्वर, आप धर्म की रक्षा करनेतथा दुष्टों का दमन करने के लिए उन्हें दण्ड देते हैं।
शापिता गुरुस्त्वं जगतामधीशोदुरत्ययः काल उपात्तदण्ड: ।
हिताय चेच्छातनुभिः समीहसेमानं विधुन्वन्जगदीशमानिनाम् ॥
६॥
पिता--पिता; गुरु: --गुरु ; त्वमू--तुम; जगताम्--सारे विश्व के; अधीश: -- परम नियन्ता; दुरत्यय:ः--दुर्लध्य; काल: --काल;उपात्त--घुमाता है; दण्ड:--दण्ड; हिताय--लाभ हेतु; च--तथा; इच्छा--स्वेच्छा से धारण किया गया; तनुभि:--आपकेदिव्य स्वरूपों द्वारा; समीहसे--आप प्रयास करते हैं; मानम्--मिथ्या गर्व; विधुन्चन्--समूल नष्ट करके; जगत्-ईश--ब्रह्माण्डके स्वामी; मानिनाम्--बनने वालों के |
आप इस सम्पूर्ण जगत के पिता, आध्यात्मिक गुरु और परम नियन्ता भी हैं।
आप दुरलघ्यकाल हैं, जो पापियों को उन्हीं के हित के लिए दण्ड देता है।
निस्सन्देह स्वेच्छा से लिये जानेवाले विविध अवतारों में आप उन लोगों का मिथ्या दर्प दूर करते हैं, जो अपने को इस जगत कास्वामी मान बैठते हैं।
ये मद्विधाज्ञा जगदीशमानिन-स्त्वां वीक्ष्य कालेभयमाशु तन्मदम् ।
हित्वार्यमार्ग प्रभजन्त्यपस्मयाईहा खलानामपि तेडनुशासनम् ॥
७॥
शाये--जो लोग; मत्-विध--मेरी तरह; अज्ञा: --मूर्ख व्यक्ति; जगत्-ईश--जगत के स्वामियों की तरह; मानिन:--अपनी झूठीपहचान करने वाले; त्वाम्ू--तुमको; वीक्ष्य--देखकर; काले--( भय के ) समय में; अभयम्--निर्भय; आशु--तुरन्त; तत्--उनका; मदम्--मिथ्या गर्व; हित्वा--त्यागकर; आर्य--आध्यात्मिक जीवन में प्रगति करने वाले भक्तों का; मार्गभम्--पथ;प्रभजन्ति--ग्रहण करते हैं; अप-स्मया:--गर्व से मुक्त; ईहा--कर्म; खलानाम्--दुष्टों का; अपि--निस्सन्देह; ते--तुम्हारे द्वारा;अनुशासनम्--आदेश |
मुझ जैसे मूर्खजन जो अपने को जगत का स्वामी मान बैठते हैं तुरन्त ही अपने मिथ्या गर्वको त्याग देते हैं और जब वे आपको काल के समक्ष भी निडर देखते हैं, तो वे तुरन्तआध्यात्मिक प्रगति करने वाले भक्तों का मार्ग ग्रहण कर लेते हैं।
इस तरह आप दुष्टों को शिक्षादेने के लिए ही दण्ड देते हैं।
शास त्वं ममैश्चर्यमदप्लुतस्यकृतागसस्तेविदुष: प्रभावम् ।
क्षन्तुं प्रभो थाहसि मूढचेतसोमैवं पुनर्भून्मतिरीश मेउसती ॥
८॥
सः--वह; त्वमू--आप; मम--मेरे; ऐश्वर्य--शासन के; मद--नहशे में; प्लुतस्थ--निमग्न रहने वाले; कृत--किया हुआ;आगस: --अपराध; ते--आपका; अविदुष:--न जानने के कारण; प्रभावम्--दिव्य प्रभाव को; क्षन्तुमू-- क्षमा करने के लिए;प्रभो-हे प्रभु; अथ--अतएव; अर्हसि--आपको चाहिए; मूढ--मूर्ख; चेतस:--जिसकी बुद्धि; मा--कभी नहीं; एवमू--इसप्रकार; पुन:--फिर; भूतू--होए; मतिः--चेतना; ईश-हे प्रभु; मे--मेरी; असती --अशुद्ध ।
अपनी शासनशक्ति के मद में चूर एवं आपके दिव्य प्रभाव से अनजान मैंने आपका अपमानकिया है।
हे प्रभु, आप मुझे क्षमा करें।
मेरी बुद्धि मोहग्रस्त हो चुकी थी किन्तु अब मेरी चेतनाको कभी इतनी अशुद्ध न होने दें।
'तवावतारोयमधोक्षजेह शाभुवो भराणामुरु भारजन्मनाम् ।
चमूपतीनामभवाय देवभवाय युधष्मच्चरणानुवर्तिनाम् ॥
९॥
तब--आपका; अवतार: -- अवतरण; अयम्--यह; अधोक्षज--हे दिव्य प्रभु; इहह--इस; भुव:--पृथ्वी के; भराणामू-- भारस्वरूप; उरु-भार--अनेक उत्पातों के प्रति; जन्मनाम्--जन्म देने वालों; चमू-पतीनाम्--सैन्य नायकों के; अभवाय--विनाशके लिए; देव--हे भगवान्; भवाय--मंगल के लिए; युष्मत्--आपके ; चरण--चरणकमल; अनुवर्तिनामू--सेवकों का
हे दिव्य प्रभुआप इस जगत में उन सेनापतियों को विनष्ट करने के लिए अवतरित होते हैं,जो पृथ्वी का भार बढ़ाते हैं और अनेक भीषण उत्पात मचाते हैं।
हे प्रभु, उसी के साथ साथ आपउन लोगों के कल्याण के लिए कर्म करते हैं, जो श्रद्धापूर्वक्क आपके चरणकमलों की सेवाकरते हैं।
शानमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने ।
वासुदेवाय कृष्णाय सात्वतां पतये नमः ॥
१०॥
नम:--नमस्कार; तुभ्यमू-- आपको; भगवते-- भगवान् को; पुरुषाय--सबों के हृदयों में वास करने वाले प्रभु को; महा-आत्मने--महान् आत्मा; वासुदेवाय--सर्वत्र निवास करने वाले को; कृष्णाय--कृष्ण को; सात्वताम्--यदु कुल के; पतये--स्वामी को; नम:--नमस्कार।
सर्वव्यापी तथा सबों के हृदयों में निवास करने वाले हे परमात्मा, आपको मेरा नमस्कार।
हेयदुकुलश्रेष्ठ कृष्ण, आपको मेरा नमस्कार।
स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।
सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥
११॥
स्व--अपने ( भक्तों ) की; छन्द--इच्छानुसार; उपात्त-- धारण करने वाले; देहाय--दिव्य शरीर वाले को; विशुद्ध--नितान्तशुद्ध; ज्ञान--ज्ञान; मूर्तये-- स्वरूप वाले; सर्वस्मै--जो सर्वस्व है उसे; सर्व-बीजाय--सबों का बीज स्वरूप; सर्व-भूत--समस्तप्राणियों के; आत्मने--अन्तरात्मा स्वरूप; नम:--नमस्कार।
अपने भक्तों की इच्छा के अनुसार दिव्य शरीर धारण करने वाले, शुद्ध चेतना रूप, सर्वस्व,समस्त वस्तुओं के बीज तथा समस्त प्राणियों के आत्मा रूप आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
शामयेदं भगवन्गोष्ठनाशायासारवायुभि: ।
चेष्टितं विहते यज्ञे मानिना तीव्रमन्युना ॥
१२॥
मया-मेरे द्वारा; इदम्--यह; भगवनू-हे प्रभु; गोष्ठ--आपके ग्वाल समुदाय के; नाशाय--विनाश हेतु; आसार--मूसलाधारवर्षा से; वायुभि:--तथा हवा से; चेष्टितम्--चेष्टा किया गया; विहते--विध्वंस हो जाने पर; यज्ञे--मेरा यज्ञ; मानिना--मिथ्यागर्वित होने के कारण मेरे द्वारा; तीव्र-- प्रखर; मन्युना--क्रोध होने से |
हे प्रभु, जब मेरा यज्ञ भंग हो गया, तो मैं मिथ्या अहंकार के कारण बहुत क्रुद्ध हुआ।
इसतरह मैंने घनघोर वर्षा तथा वायु के द्वारा आपके ग्वाल समुदाय को विनष्ट कर देना चाहा।
त्वयेशानुगृहीतो उस्मि ध्वस्तस्तम्भो वृथोद्यम: ।
ईश्वरं गुरुमात्मानं त्वामहं शरणं गतः ॥
१३॥
त्वया--आपके द्वारा; ईश--हे प्रभु; अनुगृहीत:ः--दया दिखाया हुआ; अस्मि--हूँ; ध्वस्त--छिन्न-भिन्न; स्तम्भ:--मेरा मिथ्याअभिमान; वृथा--व्यर्थ; उद्यम: --मेरा प्रयास; ईश्वरम्--परमे श्वर की; गुरुम्--गुरु की; आत्मानम्--आत्मा की; त्वामू--आपकी; अहमू--मैं; शरणम्--शरण में; गतः--आया हुआ।
हे प्रभु, मेरे मिथ्या अहंकार को चकनाचूर करके तथा मेरे प्रयास ( वृन्दावन को दण्डितकरने का) को पराजित करके आपने मुझपर दया दिखाई है।
अब मैं, परमेश्वर, गुरु तथापरमात्मा रूप आपकी शरण में आया हूँ।
श्रीशुक उबाचएवं सड्डजीतितः कृष्णो मघोना भगवानमुम् ।
मेघगम्भीरया वाचा प्रहसबन्निदमब्रवीत् ॥
१४॥
शाश्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; सड्डीतित:--महिमा बखान किये जाने पर; कृष्ण:--कृष्ण; मघोना--नद्र द्वारा; भगवान्ू-- भगवान्; अमुम्--उससे; मेघ--बादलों की तरह; गम्भीरया--गम्भीर; वाचा--वाणी से;प्रहसन्--हँसते हुए; इदम्--यह; अब्रवीत्--बोले |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार इन्द्र द्वारा वन्दित होकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्णहँसे और तब बादलों की गर्जना जैसी गम्भीर वाणी में उससे इस प्रकार बोले।
श्रीभगवानुवाचमया तेकारि मघवन्मखभझ्लेनुगृह्वता ।
मदनुस्मृतये नित्य मत्तस्येन्द्रअया भूशम् ॥
१५॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; मया--मेरे द्वारा; ते--तुम्हारें; अकारि--किया गया; मघवनू--हे इन्द्र; मख--यज्ञ का;भड्ढ:--अवरोध; अनुगृह्ता--तुम पर दया दिखाते हुए; मत्-अनुस्मृतये--मेरा स्मरण करने के लिए; नित्यम्--निरन्तर;मत्तस्य--उन्मत्त का; इन्द्र-अिया--इन्द्र के ऐश्वर्य से; भूशम्--अत्यधिक |
भगवान् ने कहा : हे इन्द्र, मैंने तो दयावश ही तुम्हारे निमित्त होने वाले यज्ञ को रोक दियाथा।
तुम स्वर्ग के राजा के अपने ऐश्वर्य से अत्यधिक उन्मत्त हो चुके थे और मैं चाहता था कि तुमसदैव मेरा स्मरण कर सको।
शामामैश्चर्यश्रीमदान्धो दण्ड पाणिं न पश्यति ।
त॑ भ्रंशयामि सम्पद्भ्यो यस्य चेच्छाम्यनुग्रहम् ॥
१६॥
माम्--मुझको; ऐश्वर्य--ऐश्वर्य; श्री--तथा वैभव के; मद--नशे से; अन्ध:--अन्धा; दण्ड--दण्ड देने वाला डंडा लेकर;'पाणिमू--अपने हाथ में; न पश्यति--नहीं देखता है; तम्--उसको; भ्रंशयामि--गिरा देता हूँ; सम्पद्भ्यः--उसकी भौतिकसम्पत्ति से; यस्थ--जिसका; च--तथा; इच्छामि--चाहता हूँ; अनुग्रहमू--लाभ |
अपनी शक्ति तथा ऐश्वर्य के नशे में उन्मत्त मनुष्य मुझे अपने हाथ में दण्ड का डंडा लिये हुएअपने निकट नहीं देख पाता।
यदि मैं उसका वास्तविक कल्याण चाहता हूँ तो मैं उसे भौतिकसौभाग्य के पद से नीचे घसीट देता हूँ।
गम्यतां शक्र भद्गं व: क्रियतां मेडनुशासनम् ।
स्थीयतां स्वाधिकारेषु युक्तैर्व: स्तम्भवर्जिते: ॥
१७॥
शागम्यताम्--जा सकते हो; शक्र--हे इन्द्र; भद्रमू--कल्याण; व:--तुम्हारा; क्रियताम्--तुम्हें पालन करना चाहिए; मे--मेरी;अनुशासनम्--आज्ञा का; स्थीयताम्--तुम रहे आओ; स्व--अपने; अधिकारेषु--उत्तरदायित्वों में; युक्ते:--लगे रहकर; व:ः--तुम; स्तम्भ--मिथ्या अहंकार; वर्जितैः--से रहित।
हे इन्द्र, अब तुम जा सकते हो।
मेरी आज्ञा का पालन करो और स्वर्ग के राज-पद पर बनेरहो।
किन्तु मिथ्या अभिमान से रहित होकर गम्भीर बने रहना।
अथाह सुर्षि: कृष्णमभिवन्द्य मनस्विनी ।
स्वसन्तानैरुपामन्त्य गोपरूपिणमी श्ररम् ॥
१८॥
अथ--तब; आह--बोली; सुरभि:--गौवों की माता, सुरभि; कृष्णम्--कृष्ण को; अभिवन्द्य--वन्दना करते हुए; मनस्विनी--शान्त मन वाली; स्व-सन्तानैः:--अपनी सन््तानों, गौवों समेत; उपामन््रय--ध्यानाकर्षण की याचना करते हुए; गोप-रूपिणम्--ग्वालबाल रूपी; ईश्वरम्-- भगवान् को |
तब अपनी सनन््तान गौवों समेत माता सुरभि ने भगवान् कृष्ण को नमस्कार किया।
उनसेध्यान देने के लिए सादर प्रार्थना करते हुए उस भद्गर नारी ने भगवान् को, जो उसके समक्षग्वालबाल के रूप में उपस्थित थे, सम्बोधित किया।
सुरभिरुवाचकृष्ण कृष्ण महायोगिन्विश्वात्मन्विश्वसम्भव ।
भवता लोकनाथेन सनाथा वयमच्युत ॥
१९॥
सुरभि: उबाच--सुरभि ने कहा; कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण; महा योगिन्ू--हे महान् योगी; विश्व-आत्मनू्--हे विश्व कीआत्मा; विश्व-सम्भव--हे विश्व के उद्गम; भवता--तुम्हारे द्वारा; लोक नाथेन--विश्व के स्वामी द्वारा; स-नाथा:--नाथ से युक्त;वयम्--हम सभी; अच्युत--हे अच्युत।
माता सुरभि ने कहा : हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे योगियों में श्रेष्ठ, हे विश्व की आत्मा तथा उद्गम, शाआप विश्व के स्वामी हैं और हे अच्युत, आपकी ही कृपा से हम सबों को आप जैसा स्वामी मिलाहै।
त्वं नः परमकं दैवं त्वं न इन्द्रो जगत्पते ।
भवाय भव गोविप्र देवानां ये च साधव: ॥
२०॥
त्वमू--तुम; न:ः--हमारे; परमकम्-- परम; दैवम्-- आराध्य देव; त्वमू--तुम; न:ः--हमारे; इन्द्र:--इनद्र; जगत्-पते--हे जगत केस्वामी; भवाय--कल्याण के लिए; भव--होओ, बनो; गो--गौवों; विप्र--ब्राह्मणों; देवानामू--तथा देवताओं के; ये--जो;च--तथा; साधव:--सनन््त पुरुषों |
आप हमारे आराध्य देव हैं।
अतएव हे जगत्पति, गौवों, ब्राह्मणों, देवताओं एवं सारे सन्तपुरुषों के लाभ हेतु आप हमारे इन्द्र बनें।
इन्द्र नस्त्वाभिषेक्ष्यामो ब्रह्मणा चोदिता वयम् ।
अवतीर्णोसि विश्वात्मन्भूमेर्भारापनुत्तये ॥
२१॥
इन्द्रमू--इन्द्र रूप में; न:--हमारे; त्वा--तुमको; अभिषेक्ष्याम:--हम सभी अभिषेक करेंगे; ब्रह्मणा--ब्रह्म द्वारा; चोदिता: --आदिष्ट; वयम्--हम; अवतीर्ण: असि--तुम अवतीर्ण हुए हो; विश्व-आत्मन्--हे विश्वात्मा; भूमे:--पृथ्वी का; भार-- भार;अपनुत्तये--कम करने के लिएशाब्रह्माजी के आदेशानुसार हम इन्द्र के रूप में आपका राज्याभिषेक करेंगी।
हे विश्वात्मा, आपपृथ्वी का भार उतारने के लिए इस संसार में अवतरित होते हैं।
बाचएवं कृष्णमुपामन्त्रय सुरभिः पयसात्मन: ।
जलैराकाशगड़ाया ऐरावतकरोदधूृते: ॥
२२॥
इन्द्र: सुर्षिभि: साक॑ चोदितो देवमातृभिः ।
अभ्यसिश्जञत दाशाई गोविन्द इति चाभ्यधात् ॥
२३॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण से; उपामन्त्रय--अनुरोध करके;सुरभि:--माता सुरभि ने; पयसा--दूध से; आत्मन:--अपने; जलै:--जल से; आकाश-गड़ाया:--आकाश गंगा ( मन्दाकिनी )के; ऐरावत--इन्द्र के वाहन, ऐरावत हाथी के; कर--सूँड़ से; उद्धृतेः-- ले जाया जाकर; इन्द्र:--इन्द्र; सुर--देवताओं;ऋषिभि:--तथा ऋषियों द्वारा; साकम्--साथ में; चोदित:--प्रोत्साहित; देव--देवताओं की; मातृभि:--माताओं द्वारा ( अदितिइत्यादि ); अभ्यसिज्ञत--नहलाया; दाशाहईम्--दशाई के वंशज, भगवान् कृष्ण को; गोविन्द: इति--गोविन्द के रूप में; च--तथा; अभ्यधात्-हे नमेद् थे लोर्द
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् कृष्ण से इस तरह याचना करने के बाद माता सुरभि नेअपने दूध से उनका अभिषेक किया और इन्द्र ने अदिति तथा देवताओं की अन्य माताओं सेआदेश पाकर अपने हाथी ऐरावत की सूँड़ से आकाश गंगा के जल से भगवान् का जलाभिषेककिया।
इस तरह देवताओं तथा ऋषियों की संगति में इन्द्र ने दशाई वंशज भगवान् कृष्ण काराज्याभिषेक किया और उनका नाम गोविन्द रखा।
शातत्रागतास्तुम्बुरुनारदादयोगन्धर्वविद्याधरसिद्धचारणा: ।
जगुर्यशो लोकमलापहं हरेःसुराड्रना: सन्ननृतुर्मुदान्विता: ॥
२४॥
तत्र--उस स्थान पर; आगताः -- आकर; तुम्बुरु--तुम्बुरु नामक गन्धर्व; नारद--नारदमुनि; आदय: --इत्यादि देवता; गन्धर्व-विद्याधर-सिद्ध-चारणा: --गन्धर्व, विद्याधर, सिद्ध तथा चारणगण ने; जगुः--गाया; यशः--कीर्ति; लोक--समस्त जगत;मल--कल्मष; अपहम्--विनष्ट करने वाले; हरेः -- भगवान् हरि का; सुर--देवताओं की; अड्डना:--पत्नियाँ; सन्ननृतु:--एकसाथ नाचीं; मुदा अन्विता:--हर्ष से पूरित होकर |
वहाँ पर तुम्बरु, नारद तथा विद्याधरों, सिद्धों और चारणों समेत अन्य गन्धर्वगण समस्तजगत को शुद्ध करने वाले भगवान् हरि के यश का गुणगान करने आये।
और देवताओं कीपत्नियाँ हर्ष से भरकर भगवान् के सम्मान में एकसाथ नाचीं।
त॑ तुष्ठवुर्देवनिकायकेतवोछावाकिरंश्राद्धुतपुष्पवृष्टिभि: ।
लोकाः परां निर्वृतिमाण्ुव॑स्त्रयोगावस्तदा गामनयन्पयोद्गुताम् ॥
२५॥
तम्--उनकी; तुष्ठुवु:--प्रशंसा की; देब-निकाय--सारे देवताओं के; केतव:--सर्वाधिक प्रमुख ने; हि--निस्सन्देह;अवाकिरन्--आच्छादित कर दिया; च--तथा; अद्भुत--आश्चर्यजनक; पुष्प--फूलों की; वृष्टिभि:--वर्षा से; लोका:--जगतोंने; पराम्--परम; निर्वृतिमू--सन्तोष; आप्नुबन्--अनुभव किया; त्रय:--तीनों; गाव: --गौवें; तदा--तब; गाम्--पृथ्वी को;अनयनू--बना दिया; पय:--अपने दूध से; द्रतामू-सिक्त सर्व
प्रमुख देवताओं ने भगवान् की प्रशंसा की और उनपर चारों ओर से फूलों की अद्भुतवर्षा की।
इससे तीनों लोकों को परम संतोष का अनुभव हुआ और गौवों ने अपने दूध से पृथ्वीकी सतह भाग को सिक्त कर दिया।
शानानारसौघा: सरितो वृक्षा आसन्मधुस्त्रवा: ।
अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोउबि भ्रनुन्मणीन् ॥
२६॥
नाना--विविध; रस--द्रव; ओघा:--बाढ़-सी लाते हुए; सरित:ः--नदियाँ; वृक्षा:--वृक्ष; आसन्--बन गये; मधु--मधुर रस से;स्त्रवा:--बहते हुए; अकृष्ट--बिना जोते-बोये ही; पच्य--पका हुआ; ओषधय:--पौधे; गिरय:--पर्वत; अबि भ्रनू--ले गये;उत्-- धरती के ऊपर; मणीन्ू--मणियाँ।
नदियाँ विविध प्रकार के स्वादिष्ट द्रवों से युक्त होकर बहने लगीं, वृक्षों ने मधु निकाललिया, खाद्य पौधे बिना जोते ही परिपक्व हो उठे और पर्वतों ने अपने गर्भ में छिपी मणियों कोबाहर निकाल दिया।
कृष्णेउभिषिक्त एतानि सर्वाणि कुरुनन्दन ।
निर्वेराण्यभवंस्तात क्रूराण्यपि निसर्गतः ॥
२७॥
कृष्णे-- भगवान् कृष्ण; अभिषिक्ते--- अभिषेक किये गये; एतानि--ये; सर्वाणि--समस्त; कुरु-नन्दन--हे कुरुवंशी;निर्वरणि--शत्रुता से रहित; अभवन्--हो गये; तात--हे परीक्षित; क्रूराणि--क्रूर; अपि--यद्यपि; निसर्गतः--प्रकृति द्वारा |
हे कुरुनन्दन परीक्षित, भगवान् कृष्ण को अभिषेक कराने के बाद सभी जीवित प्राणी, यहाँतक कि जो स्वभाव के क्रूर थे, सर्वथा शत्रुतारहित बन गये।
इति गोगोकुलपतिं गोविन्दमभिषिच्य सः ।
अनुज्ञातो ययौ शक्रो वृतो देवादिभिर्दिवम् ॥
२८ ॥
शाइति--इस प्रकार; गो--गौवों के; गो-कुल--तथा ग्वाल-जाति के; पतिम्--स्वामी को; गोविन्दम्-- भगवान् कृष्ण को;अभिषिच्य--अभिषेक कराकर; सः--वह, इन्द्र; अनुज्ञात:-- अनुमति दिये जाने पर; ययौ--चला गया; शक्र:--इन्द्र; वृत:--घिरा हुआ; देव-आदिभि:--देवताओं तथा अन््यों से; दिवम्--स्वर्ग को |
गौवों तथा ग्वाल-जाति के स्वामी भगवान् गोविन्द को अभिषेक कराने के बाद इन्द्र नेभगवान् की अनुमति ली और देवताओं तथा अन्य उच्च प्राणियों से घिरकर वह अपने स्वर्ग-धामको लौट गया।
