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अध्याय अट्ठाईसवां: कृष्ण ने नंद महाराज को वरुण के निवास से बचाया

10.28श्रीबादरायणिरुवाचएकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्‌ ।

स्नातुंनन्दस्तु कालिन्द्रां द्वादश्यां जलमाविशत्‌ ॥

१॥

श्री-बादरायणि: उबाच-- श्रीबादरायणि ( शुकदेव गोस्वामी ) ने कहा; एकादश्यामू--एकादशी के दिन; निराहार: --बिनाखाये, उपवास करते हुए; समभ्यर्च्य--पूजा करने के बाद; जनार्दनम्‌--जनार्दन की, भगवान्‌ की; स्नातुम्‌-स्नान करने केलिए ( ब्रत तोड़ने के पूर्व आवश्यक है ); नन्‍्दः--नन्द महाराज ने; तु--लेकिन; कालिचन्द्यामू--यमुना नदी में; द्वादश्याम्‌--द्वादशी के दिन; जलम्‌--जल में; आविशत्‌--प्रवेश किया।

श्रीबादरायण ने कहा : भगवान्‌ जनार्दन की पूजा करके तथा एकादशी के दिन ब्रतरखकर नन्द महाराज ने द्वादशी के दिन स्नान करने के लिए कालिन्दी के जल में प्रवेश किया।

त॑ गृहीत्वानयद्धृत्यो वरुणस्यासुरोउन्तिकम्‌ ।

अवज्ञायासुरी वेलां प्रविष्टमुदकं॑ निशि ॥

२॥

तम्‌--उसको; गृहीत्वा--पकड़कर; अनयत्‌--ले आया; भृत्य:--नौकर; वरुणस्य--समुद्र के स्वामी, वरूण का; असुर:--असुर के; अन्तिकम्‌--समक्ष; अवज्ञाय--अवहेलना करके; आसुरीम्‌-- अशुभ; वेलामू--समय; प्रविष्टम्‌ू-- प्रवेश करके;उदकम्‌--जल में; निशि--रात्रि के समय |

चूँकि नन्‍्द महाराज ने इस बात की अवहेलना करके कि यह अशुभ समय था, रात्रि केअंधकार में जल में प्रवेश किया था अत: वरुण का आसुरी सेवक उन्हें पकड़ कर अपने स्वामीके पास ले आया।

चुक्रुशुस्तमपश्यन्त: कृष्ण रामेति गोपकाः ।

भगवांस्तदुप श्रुत्य पितरें वरुणाहतम्‌ ।

तदन्तिकं गतो राजन्स्वानामभयदो विभु: ॥

३॥

चुक़ुशु;--जोर से पुकारा; तम्‌ू--उसको, नन्द को; अपश्यन्त:--न देखकर; कृष्ण --हे कृष्ण; राम--हे राम; इति--इस प्रकार;गोपकाः-ग्वालों ने; भगवान्‌-- भगवान्‌ कृष्ण ने; तत्‌ू--वह; उपश्रुत्य--सुनकर; पितरम्‌--अपने पिता को; वरुण--वरुणद्वारा; आहतम्‌--ले जाया गया; तत्‌ू--वरुण के; अन्तिकम्‌--समक्ष; गत:ः--गया; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; स्वानामू-- अपनेभक्तों के; अभय--निडरपन; दः --देने वाले; विभु:--सर्वशक्तिमान स्वामी

हे राजन, नन्द महाराज को न देखकर ग्वाले जोर से चिल्ला उठे, 'हे कृष्ण, हे राम, 'भगवान्‌ कृष्ण ने उनकी चीखें सुनीं और समझ लिया कि मेरे पिता वरुण द्वारा बन्दी बना लियेगये हैं।

अतः अपने भक्तों को निडर बनाने वाले सर्वशक्तिमान भगवान्‌ वरुणदेव के दरबार जापहुँचे।

प्राप्तं वीक्ष्य हषीकेशं लोकपाल: सपर्यया ।

महत्या पूजयित्वाह तदर्शनमहोत्सवः ॥

४॥

प्राप्तम्‌--आया हुआ; वीक्ष्य--देखकर; हषीकेशम्‌--इन्द्रियों के नियन्‍्ता भगवान्‌ कृष्ण को; लोक--उस लोक ( जल ) का;'पाल:--मुख्य देवता ( वरुण ); सपर्यया--सादर भेंटों के साथ; महत्या--बड़े पैमाने पर; पूजयित्वा--पूजा करके; आह--बोला; तत्‌--कृष्ण के; दर्शन--दर्शन से; महा--अत्यन्त; उत्सव:--हर्ष |

यह देखकर कि भगवान्‌ हषीकेश पधारे हैं, वरूणदेव ने धूमधाम से उनकी पूजा की।

वहभगवान्‌ को देखकर अत्यन्त प्रमुदित था और वह इस प्रकार बोला।

श्रीवरुण उवाचअद्य मे निभूतो देहोउद्यैवार्थोधिगतः प्रभो ।

त्वत्पादभाजो भगवत्नवापु: पारमध्वन: ॥

५॥

श्री-वरुण: उबाच-- श्रीवरुण ने कहा; अद्य--आज; मे--मेरे द्वारा; निभृत:--सफलतापूर्वक पूरा किया गया; देह: --मेराभौतिक शरीर; अद्य--आज; एव--निस्सन्देह; अर्थ:--जीवन का लक्ष्य; अधिगत:--अनुभव किया जाता है; प्रभो-हे प्रभु;त्वत्‌ू--आपके; पाद--चरणकमल; भाज:--सेवा करने वाले, पात्र; भगवन्‌--हे परम पुरुष; अवापु:--प्राप्त हो गया; पारमू--चरमावस्था; अध्वन:--पथ की ( सांसारिक )।

श्रीवरुण ने कहा : आज मेरे शरीर ने अपना कार्य पूरा कर लिया।

हे प्रभु, निस्सन्देह अबमुझे अपना जीवन-लक्ष्य प्राप्त हो चुका।

हे भगवन्‌, जो लोग आपके चरणकमलों को स्वीकारकरते हैं, वे भौतिक संसार के मार्ग को पार कर सकते हैं।

नमस्तुभ्यं भगवते ब्रह्मणे परमात्मने ।

न यत्र श्रूयते माया लोकसृष्टिविकल्पना ॥

६॥

नमः--नमस्कार; तुभ्यमू--आपको; भगवते-- भगवान्‌ को; ब्रह्मणे--परम सत्य को; परम-आत्मने--परमात्मा को; न--नहीं;यत्र--जिसमें; श्रूयते--सुना जाता है; माया--माया, भौतिक शक्ति; लोक--इस जगत की; सृष्टि--सृष्टि; विकल्पना--व्यवस्थाकरती है।

हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌, परम सत्य परमात्मा, मैं आपको नमस्कार करता हूँ; आपकेभीतर इस सृष्टि को अपने अनुरूप बनाने वाली माया-शक्ति का लेशमात्र भी नहीं है।

अजानता मामकेन मूढेनाकार्यवेदिना ।

आनीतोऊयं तब पिता तद्धवान्क्षन्तुमहति ॥

७॥

अजानता--अज्ञानी; मामकेन--मेंरे सेवक द्वारा; मूढेन--मूर्ख; अकार्य-वेदिना-- अपने कर्तव्य को न जानने से; आनीत:ः--लायेगये; अयम्‌--यह व्यक्ति; तब--तुम्हारे; पिता--पिता; तत्‌ू--वह; भवान्‌--आप; क्षन्तुम्‌ अहति--क्षमा कर दें।

यहाँ पर बैठे हुए आपके पिता मेरे एक मूर्ख अज्ञानी नौकर द्वारा मेरे पास लाये गये हैं, जोअपने कर्तव्य को नहीं समझता था।

कृपा करके हमें क्षमा कर दें।

ममाप्यनुग्रह कृष्ण कर्तुमहस्यशेषहक्‌ ।

गोविन्द नीयतामेष पिता ते पितृवत्सल ॥

८॥

मम--मुझपर; अपि-- भी; अनुग्रहम्‌--दया; कृष्ण--हे कृष्ण; कर्तुम्‌ अहंसि--कीजिये; अशेष--हर वस्तु के; हक्‌--देखनेवाले आप; गोविन्द--हे गोविन्द; नीयतामू-- ले जाया जा सकता है; एष:--यह; पिता--पिता; ते-- आपका; पितृ-वत्सल--हेअपने माता-पिता के अत्यन्त स्नेहिल |

हे कृष्ण, हे सर्वद्रष्टठा, आप मुझे भी अपनी कृपा प्रदान करें।

हे गोविन्द, आप अपने पिता केप्रति अत्यधिक स्नेहवान्‌ हैं।

आप उन्हें घर ले जाँय।

श्रीशुक उबाचएवं प्रसादितः कृष्णो भगवानीश्वरेश्वर: ।

आदायागात्स्वपितरं बन्धूनां चावहन्मुदम्‌ ॥

९॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; प्रसादित:--संतुष्ट; कृष्ण: --कृष्ण; भगवान्‌-- भगवान्‌;ईश्वर--समस्त नियन्ताओं के; ईश्वर: --परम नियन्ता; आदाय--लेकर; अगात्‌--चले गये; स्व-पितरम्‌--अपने पिता को;बन्धूनाम्‌--अपने सम्बन्धियों के लिए; च--तथा; आवहनू--लाते हुए; मुदम्‌-हर्ष

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह वरुणदेव से प्रसन्न होकर ई श्वरों के ईश्वर पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ कृष्ण अपने पिता को लेकर घर लौट आये जहाँ उनके सम्बन्धी उन्हें देखकर अत्यधिकरर्षित शे।

नन्दस्त्वतीन्द्रियं ृष्टा लोकपालमहोदयम्‌ ।

कृष्णे च सन्नतिं तेषां ज्ञातिभ्यो विस्मितोब्रवीत्‌ ॥

१०॥

नन्दः--नन्द महाराज; तु--तथा; अतीन्द्रियम्‌ू--इसके पूर्व न देखा गया; हृष्टा--देखकर; लोक-पाल--( समुद्र ) लोक केअधिष्ठाता देवता, वरुण का; महा-उदयम्‌--महान्‌ ऐश्वर्य; कृष्णे--कृष्ण के प्रति; च--तथा; सन्नतिम्‌ू--नमस्कार करना;तेषाम--उनके ( वरुण तथा उसके अनुयायियों ) द्वारा; ज्ञातिभ्य:--अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों से; विस्मित:--चकित;अब्रवीतू--कहा |

नन्द महाराज समुद्र लोक के शासक वरुण के महान्‌ ऐश्वर्य को पहली बार देखकर तथा यहदेखकर कि वरुण तथा उसके सेवकों ने किस तरह कृष्ण का आदर किया था, आश्चवर्यच्कितथे।

नन्द ने इसका वर्णन अपने साथी ग्वालों से किया।

ते चौत्सुक्यधियो राजन्मत्वा गोपास्तमी श्वरम्‌ ।

अपि नः स्वगतिं सूक्ष्मामुपाधास्यदधी श्वर: ॥

११॥

ते--वे; च--तथा; औत्सुक्य--उत्सुकता से पूर्ण; धिय:--उनके मन; राजन्‌--हे राजा परीक्षित; मत्वा--सोचकर; गोपा: --ग्वाले; तमू--उस; ईश्वरम्‌--ईश्वर को; अपि--शायद; न:--हमको; स्व-गतिम्‌ू--अपने धाम; सूक्ष्माम्‌-दिव्य; उपाधास्यत्‌ --प्रदान करने वाले हैं; अधी श्वरः --परम नियन्ता

वरुण के साथ कृष्ण की लीला को सुनकर ग्वालों ने विचार किया कि कृष्ण अवश्यही भगवान्‌ हैं।

हे राजनू, उनके मन उत्सुकता से भर गये।

उन्होंने सोचा, 'क्या भगवान्‌ हम सबोंको भी अपना दिव्य धाम प्रदान करेंगे ?

इति स्वानां स भगवान्विज्ञायाखिलहक्स्वयम्‌ ।

सड्जूल्पसिद्धये तेषां कृपयैतद्चिन्तयत्‌ ॥

१२॥

इति--ऐसा; स्वानामू--अपने भक्तों का; सः--वह; भगवान्‌-- भगवान्‌; विज्ञाय--समझकर; अखिल-हक्‌--हर वस्तु कोदेखने वाला; स्वयम्‌-स्वयं; सट्डल्प--कल्पित इच्छा की; सिद्धये--अनुभूति के लिए; तेषामू--उनकी; कृपया--कृपापूर्वक;एतत्‌--यह; अचिन्तयत्‌--सोचा |

सर्वदर्शी होने के कारण भगवान्‌ कृष्ण स्वतः समझ गये कि ग्वाले क्या अभिलाषा कर रहेहैं।

उनकी इच्छाओं को पूरा करके उनपर कृपा प्रदर्शित करने के लिए भगवान्‌ ने इस प्रकारसोचा।

जनो वै लोक एतस्मिन्नविद्याकामकर्मभि: ।

उच्चावचासु गतिषु न वेद स्वां गतिं भ्रमन्‌ ॥

१३॥

जनः--लोक; बै--निश्चय ही; लोके--जगत में; एतस्मिन्‌ू--इस; अविद्या--ज्ञानविहीन; काम--इच्छाओं के कारण;कर्मभि: --कार्यों से; उच्च-- श्रेष्ठ, अवचासु--तथा निम्न; गतिषु--लक्ष्यों के बीच; न वेद--नहीं पहचानता; स्वाम्‌--निजी;गतिमू--लक्ष्य; भ्रमन्‌-घूमते हुए

भगवान्‌ कृष्ण ने सोचा निश्चय ही इस जगत में लोग ऊँचे तथा नीचे गन्तव्यों के बीचभटक रहे हैं, जिन्हें वे अपनी इच्छाओं के अनुसार तथा पूरी जानकारी के बिना किये गये कर्मोंके माध्यम से प्राप्त करते हैं।

इस तरह लोग अपने असली गन्तव्य को नहीं जान पाते।

इति सद्ञिन्त्य भगवान्महाकारुणिको हरिः ।

दर्शयामास लोकं स्वं गोपानां तमसः परम्‌ ॥

१४॥

इति--इन शब्दों में; सश्चिन्य--अपने आप सोच कर; भगवान्‌-- भगवान्‌; महा-कारुणिक: --अ त्यन्त कृपालु; हरि: -- भगवान्‌हरि ने; दर्शयाम्‌ आस--दिखलाया; लोकम्‌--लोक, वैकुण्ठ; स्वम्‌--अपना; गोपानाम्‌-ग्वालों को; तमस:-- भौतिकअंधकार से; परम्‌-परे।

इस प्रकार परिस्थिति पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते हुए परम दयालु भगवान्‌ हरि ने ग्वालोंको अपना धाम दिखलाया जो भौतिक अंधकार से परे है।

सत्य॑ ज्ञानमनन्तं यद्वह्मज्योति: सनातनम्‌ ।

यद्द्धि पश्यन्ति मुनयो गुणापाये समाहिता: ॥

१५॥

सत्यमू--अनश्वर; ज्ञानमू--ज्ञान; अनन्तम्‌ू-- अनन्त; यत्‌--जो; ब्रह्म--ब्रह्म का; ज्योति:--तेज; सनातनम्‌--नित्य; यत्‌--जो;हि--निस्सन्देह; पश्यन्ति--देखते हैं; मुन॒यः--मुनिगण; गुण-- भौतिक प्रकृति के गुण; अपाये--शमित होने पर; समाहिता:--समाधि में लीन।

भगवान्‌ कृष्ण ने अनश्वर आध्यात्मिक तेज प्रकट किया जो असीम, चेतन तथा नित्य है।

मुनिजन उस आध्यात्मिक जीव को समाधि में देखते हैं जब उनकी चेतना भौतिक प्रकृति केगुणों से मुक्त रहती है।

लोक था।

ते तु ब्रह्महदम्नीता मग्ना: कृष्णेन चोद्धृता: ।

दहशुर्ब्रह्मणो लोकं यत्राक्रूरोध्यगात्पुरा ॥

१६॥

ते--वे; तु--तथा; ब्रह्म-हदम्‌--ब्रह्महद नामक सरोवर में; नीता: --लाये गये; मग्ना:--डुबाये गये; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा;च--तथा; उद्धृता: --ऊपर निकाले गये; दहशु:--देखा; ब्रह्मण: --परब्रह्म का; लोकम्‌--दिव्य लोक; यत्र--जहाँ; अक्रूर:--अक्रूर ने; अध्यगात्‌--देखा था; पुरा--इसके पूर्व

भगवान्‌ कृष्ण सारे ग्वालों को ब्रह्महद ले आये, उनसे जल के भीतर डुबकी लगवाई औरफिर ऊपर निकाल लिया।

जिस महत्त्वपूर्ण स्थान से अक्रूर ने वैकुण्ठ को देखा था, वहीं इनग्वालों ने भी परम सत्य के लोक को देखा।

नन्दादयस्तु त॑ दृष्ठा परमानन्दनिवृता: ।

कृष्णं च तत्र च्छन्दोभि: स्तूयमानं सुविस्मिता: ॥

१७॥

नन्द-आदय:--नन्द महाराज तथा अन्य ग्वाले; तु--तथा; तम्--उसको; हृष्ठा--देखकर; परम--परम; आनन्द--आनन्‍द द्वारा;निवृता:--प्रसन्नता से अभिभूत; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; च--तथा; तत्र--वहाँ; छन्दोभि:--वैदिक स्तोत्रों से;स्तूयमानम्‌-स्तुति किये जाते हुए; सु--अत्यधिक; विस्मिता:--चकित |

जब नन्द महाराज तथा अन्य ग्वालों ने वह दिव्य धाम देखा तो उन्हें परम सुख की अनुभूतिहुई।

वे स्वयं कृष्ण को साक्षात्‌ वेदों से घिरे एवं उनके द्वारा स्तुति किये जाते देखकर विशेष रूपसे चकित थे।

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