← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय उनतीसवाँ: कृष्ण और गोपियाँ रास नृत्य के लिए मिलते हैं
10.29श्रीबादरायणिरुवाचभगवानपि ता रात्री: शारदोत्फुल्लमल्लिका: ।
वीक्ष्य रन्तुं मनश्चक्रे योगमायामुपाअ्रित: ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उवाच-- श्रील बादरायण व्यासदेव के पुत्र श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; भगवान्--कृष्ण; अपि--यद्यपि;ताः--वे; रात्री:--रातें; शारद--शरदकालीन; उत्फुल्ल--खिले; मल्लिका: -- चमेली के फूल; वीक्ष्य--देखकर; रन्तुम्--प्रेमका आनन्द लेने के लिए; मन: चक्रे--मन में निश्चय किया; योगमायाम्--असम्भव को सम्भव बनाने वाली उनकी आध्यात्मिकशक्ति का; उपाश्रित:--सहारा लेकर।
श्रीबादरायणि ने कहा : श्रीकृष्ण समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण भगवान् हैं फिर भी खिलते हुएचमेली के फूलों से महकती उन शरदकालीन रातों को देखकर उन्होंने अपने मन को प्रेम-व्यापारकी ओर मोड़ा।
अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपनी अन्तरंगा शक्ति का उपयोग किया।
तदोड़ुराज: ककुभः करैर्मुखंप्राच्या विलिम्पन्नरुणेन शन्तमैः ।
स चर्षणीनामुदगाच्छुचो मृजन्प्रियः प्रियाया इव दीर्घदर्शन: ॥
२॥
तदा--उस समय; उडु-राज:--तारों का राजा, चन्द्रमा; ककुभ:--क्षितिज का; करैः--अपने ' हाथों ' ( किरणों ) से; मुखम्--मुखमण्डल; प्राच्या:--पश्चिमी; विलिम्पन्--रंजित करते हुए; अरुणेन--लाल रंग से; शम्-तमैः--अत्यन्त आराम पहुँचानेवाली ( किरणों ) से; सः--वह; चर्षणीनाम्--देखने वालों के; उदगात्--उदय हुआ; शुच्च: --दुख; मृजन्--मिटाते हुए;प्रियः--प्रिय पति; प्रियाया:-- अपनी प्रियतमा पत्नी का; इब--सहृश; दीर्घ--काफी देर बाद; दर्शन:--फिर से देखे जाने पर।
तब चन्द्रमा अपनी लाल रंग की सुखदायी किरणों से पश्चिमी क्षितिज को रंजित करते हुएउदय हुआ और इस तरह उसने उदय होते देखने वालों की पीड़ा दूर कर दी।
यह चन्द्रमा उस प्रियपति के समान था, जो दीर्घकालीन अनुपस्थिति के बाद घर लौटता है और अपनी प्रियतमा पत्नीके मुखमण्डल को लाल कुंकुम से सँवारता है।
इृष्ठा कुमुद्वत्तमखण्डमण्डलंरमाननाभं नवकुड्डू मारुणम् ।
वनं च तत्कोमलगोभी रक्ञितंजगौ कल वामहृशां मनोहरम् ॥
३॥
इृष्टा--देखकर; कमुत्-वन्तम्--रात्रि में खिलने वाले कुमुद फूलों को खोलता हुआ; अखण्ड--अटूट; मण्डलम्--मुख कागोला; रमा--लक्ष्मी के; आनन--मुखमण्डल ( सहश ); आभम्--जिसका प्रकाश; नव--नया; कुड्ढु म-सिंदूर से;अरुणम्--लाल हुआ; वनम्--वन को; च--तथा; तत्ू--उस चन्द्रमा का; कोमल--सुकुमार; गोभि:--किरणों से; रक्चितम्--रँगा हुआ; जगौ--वंशी बजाई; कलम्--सुरीली; वाम-दहृशाम्--मोहक नेत्रों वाली तरुणियों के लिए; मनः-हरम्--मुग्ध करनेबाली
भगवान् कृष्ण ने नवलेपित सिंदूर के लाल तेज से चमकते पूर्ण चन्द्रमा के अविच्छिन्नमण्डल को देखा।
ऐसा लग रहा था मानो लक्ष्मीजी का मुखमण्डल हो।
उन्होंने चन्द्रमा कीउपस्थिति से खिलने वाले कुमुदों को तथा उसकी किरणों से मन्द मन्द प्रकाशित जंगल को भीदेखा।
इस तरह भगवान् ने अपनी वंशी पर सुन्दर नेत्रों वाली गोपियों के मन को आकृष्ट करनेवाली मधुर तान छेड़ दी।
निशम्य गीतां तदनडुवर्धनब्रजस्त्रिय: कृष्णगृहीतमानसा: ।
आजम्मुरन्योन्यमलक्षितोद्यमा:स यत्र कान्तो जवलोलकुण्डला: ॥
४॥
निशम्य--सुनकर; गीतम्--संगीत; तत्--वह; अनड्र--कामदेव को; वर्धनम्--प्रबल करने वाला; ब्रज-स्त्रियः--व्रज कीयुवतियाँ; कृष्ण--कृष्ण द्वारा; गृहीत--जकड़ी; मानसा:--मन वाली; आजमग्मु: --गईं; अन्योन्यम्--एक-दूसरे से; अलक्षित--अनदेखी; उद्यमा:--आगे बढ़ती; सः--वह; यत्र--जहाँ; कान्तः--उनका बाल-सखा; जव--जल्दी के कारण; लोल--हिलतेहुए; कुण्डला:--कान के कुण्डल।
जब वृन्दावन की युवतियों ने कृष्ण की बाँसुरी का संगीत सुना जो प्रेम-भावनाओं कोउत्तेजित करता है, तो उनके मन भगवान् द्वारा वशीभूत कर लिये गये।
वे वहीं चली गईं जहाँउनका प्रियतम बाट जोह रहा था।
वे एक-दूसरे की अनदेखी करके इतनी तेजी से आगे बढ़ रहीथीं कि उनके कान की बालियाँ आगे-पीछे हिल-डुल रही थीं।
दुहन्त्योडभिययु: काश्िद्दोहं हित्वा समुत्सुका: ।
'पयोडधिश्रित्य संयावमनुद्वास्यथापरा ययु: ॥
५॥
दुहन्त्यः--दुहने के बीच में ही; अभिययु:--चली गईं; काश्चित्--उनमें से कुछ; दोहम्--दुहना; हित्वा--त्यागकर;समुत्सुका: --अत्यधिक उत्सुक; पय: --दूध; अधिशभ्रित्य--चूल्हे पर रखकर; संयावम्--आटे की बनी रोटियों ( हलवा );अनुद्वास्य--चूल्हे से उतारे बिना; अपरा:--अन्य; ययु:--चली गईं।
कुछ गोपियाँ दूध दुह रही थीं जब उन्होंने कृष्ण की बाँसुरी सुनी।
उन्होंने दुहना बन्द करदिया और वे कृष्ण से मिलने चली गईं।
कुछ ने चूल्हे पर दूध को उबलते छोड़ दिया और कई नेचूल्हें में रोटियों को सिकते हुए छोड़ दिया।
परिवेषयन्त्यस्तद्ध्ित्वा पाययन्त्य: शिशून्पयः ।
शुश्रूषन्त्यः पतीन्काश्चिदश्नन्त्योडपास्थ भोजनम् ॥
६॥
लिम्पन्त्य: प्रमृजन्त्योउन्या अज्जन्त्य: काश्व लोचने ।
व्यत्यस्तवस्त्रा भरणा: काश्ित्कृष्णान्तिकं ययु: ॥
७॥
परिवेषयन्त्य: --वस्त्र पहने; तत्ू--उसे; हित्वा--एक ओर रखकर; पाययन्त्य:--पिलाती हुई; शिशून्-- अपने शिशुओं को;'पय:--दूध; शुश्रूषन्त्य:--सेवा करती हुई; पतीन्ू--अपने पतियों की; काश्चित्ू--उनमें से कुछ; अशनन्त्य:--खाती हुई;अपास्थ--छोड़कर; भोजनम्--अपने अपने भोजन; लिम्पन्त्य:--अंगराग लगाये; प्रमृजन्त्य:--तेल लगाती; अन्या: --अन्य;अज्जञन्त्यः--कजल लगाती; काश्च-- कुछ; लोचने-- अपनी आँखों में; व्यत्यस्त-- अस्त-व्यस्त; वस्त्र--कपड़े; आभरणा:--तथा गहने; काश्चित्--उनमें से कुछ; कृष्ण-अन्तिकम्--कृष्ण के निकट तक; ययु:--गईं |
उनमें से कुछ वस्त्र पहन रही थीं, कुछ अपने बच्चों को दूध पिला रही थीं या अपने पतियोंकी सेवा में लगी थीं किन्तु सबों ने अपने-अपने कार्य छोड़ दिये और वे कृष्ण से मिलने चलीगईं।
कुछ गोपियाँ शाम का भोजन कर रही थीं, कुछ नहा-धोकर शरीर में अंगराग या अपनीआँखों में कजजल लगा रही थीं।
किन्तु सबों ने तुरन्त अपने अपने कार्य बन्द कर दिये और यद्यपिउनके वस्त्र तथा गहने अस्त-व्यस्त थे वे कृष्ण के पास दौड़ी गईं।
ता वार्यमाणा: पतिभि: पितृभिर्श्नातृबन्धुभि: ।
गोविन्दापहतात्मानो न न्यवर्तन्त मोहिता: ॥
८॥
ताः--वे; वार्यमाणा: --रोके जाने पर; पतिभि:--अपने पतियों द्वारा; पितृभि: --अपने पिताओं द्वारा; भ्रातृ-- भाई; बन्धुभि: --तथा अन्य सम्बन्धियों द्वारा; गोविन्द--कृष्ण द्वारा; अपहत--चुराई गई; आत्मान:--स्वयं से; न न्यवर्तन्त--वापस नहीं आईं;मोहिता:--मोहित
उनके पतियों, पिताओं, भाइयों तथा अन्य सम्बन्धियों ने उन्हें रोकने का प्रयत्न किया किन्तुकृष्ण उनके हृदयों को पहले ही चुरा चुके थे।
उनकी बाँसुरी की ध्वनि से मोहित होकर उन्होंनेलौटने से इनकार कर दिया।
अन्तर्गृहगता: काश्चिद्गोप्योडलब्धविनिर्गमा: ।
कृष्णं तद्धावनायुक्ता दध्युमीलितलोचना: ॥
९॥
अन्तः-गृह--अपने घरों के भीतर; गता:--उपस्थित; काश्चित्ू--कुछ; गोप्य:--गोपियाँ; अलब्ध--न प्राप्त करके;विनिर्गमा: --रास्ता; कृष्णम्-- श्रीकृष्ण पर; तत्ू-भावना--उनके प्रति भावात्मक प्रेम से; युक्ता:--युक्त; दध्यु;--ध्यान किया;मीलित--बन्द किये; लोचनाः--अपनी आँखें ।
किन्तु कुछ गोपियाँ अपने घरों से बाहर न निकल पाईं अतः वे अपनी आँखें बन्द किये शुद्ध दुःसहप्रेष्ठविरहतीब्रतापधुताशुभा: ।
ध्यानप्राप्ताच्युताश्लेषनिर्व॒त्या क्षीणमड्रला: ॥
१०॥
तमेव परमात्मानं जारबुद्धय्ापि सड़ताः ।
जहुर्गुणमयं देहं सद्यः प्रशक्षीणबन्धना: ॥
११॥
दुःसह--असह्ढा; प्रेष्ट--अपने प्रिय से; विरह--वियोग से; तीब्न--तीक्षण; ताप--जलन से; धुत--दूर हो गये; अशुभा:--उनकेहृदयों की सारी अशुभ बातें; ध्यान--ध्यान से; प्राप्त--प्राप्त किया हुआ; अच्युत--अच्युत भगवान् श्रीकृष्ण के; आश्लेष--चुम्बन से उत्पन्न; निर्व॒त्या--हर्ष से; क्षीण--अत्यन्त दुर्बल; मड़ला:--उनके शुभ कर्मफल; तम्--उस; एव-- भले ही; परम-आत्मानम्-परमात्मा को; जार--उपपति; बुद्धब्या--सोचते हुए; अपि--तो भी; सड्भता:--प्रत्यक्ष संगति पाकर; जहुः--त्यागदिया; गुण-मयम्-प्रकृति के गुणों से निर्मित; देहम्ू--उनके शरीर को; सद्यः--तुरन्त; प्रक्षीण--पूरी तरह शिथिल कर दिया;बन्धना:--कर्म के बन्धनों को |
जो गोपियाँ कृष्ण का दर्शन करने नहीं जा सकीं, उनके लिए अपने प्रियतम से असहाविछोह तीब्र वेदना उत्पन्न करने लगा, जिसने उनके सारे अशुभ कर्मो को भस्म कर डाला।
उनकाध्यान करने से गोपियों को उनके आलिंगन की अनुभूति हुई और तब उन्हें जो आनन्द अनुभवहुआ उसने उनकी भौतिक धर्मनिष्ठा को समाप्त कर दिया।
यद्यपि भगवान् कृष्ण परमात्मा हैंकिन्तु इन युवतियों ने उन्हें अपना प्रेमी ही समझा और उसी घनिष्ठ रस में उनका संसर्ग प्राप्तकिया।
इस तरह उनके कर्म-बन्धन नष्ट हो गये और उन्होंने अपने स्थूल भौतिक शरीरों को त्यागदिया।
श्रीपरीक्षिदुवाचकृष्णं विदुः परं कान््तं न तु ब्रह्मतया मुने ।
गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम् ॥
१२॥
श्री-परीक्षित् उबाच-- श्री परीक्षित ने कहा; कृष्णम्--कृष्ण को; विदु:--वे जानती थीं; परम्--एकमात्र; कान्तम्-- अपने प्रेमीके रूप में; न--नहीं; तु--लेकिन; ब्रह्मतया-- परम सत्य के रूप में; मुने--हे मुनि, शुकदेव; गुण--तीनों गुणों की; प्रवाह--प्रबल धारा का; उपरम:--रुक जाना; तासाम्ू--उनके लिए; गुण-धियाम्--इन गुणों के वशीभूत बुद्धि है जिनकी; कथम्--कैसे।
श्रीपरीक्षित महाराज ने कहा : 'हे मुनिवर, गोपियाँ कृष्ण को केवल अपना प्रेमी मानतीथीं, परम पूर्ण सत्य के रूप में नहीं मानती थीं।
तो फिर ये युवतियाँ जिनके मन प्रकृति के गुणोंकी लहरों में बह रहे थे, किस तरह से अपने आपको भौतिक आसक्ति से छुड़ा पाईं ?
श्रीशुक उबाचउक्त पुरस्तादेतत्ते चैद्यः सिद्धि यथा गतः ।
द्विषन्नपि हषीकेशं किमुताधोक्षजप्रिया: ॥
१३॥
श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; उक्तम्--कहा गया; पुरस्तात्--इसके पूर्व; एतत्--यह; ते--तुमसे; चैद्य :--चेदि नरेश शिशुपाल; सिद्द्धिमू--सिद्धि, पूर्णता; यथा--जिस तरह; गत:--प्राप्त हुआ; द्विषन्ू--द्वेष रखने के कारण; अपि--भी; हषीकेशम्-- भगवान् हषीकेश को; किम् उत--तो फिर क्या कहा जा सकता है; अधोक्षज-- भगवान् के, जो सामान्यइन्द्रियों की परिधि से बाहर रहते हैं; प्रियाः:--प्रिय भक्तों का।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह विषय आपको पहले बताया जा चुका था।
चूँकि कृष्ण से घृणा करने वाला शिशुपाल तक सिद्धि प्राप्त कर सका तो फिर भगवान् के प्रिय भक्तों के विषयमें कहना ही क्या है?
नृणां निः श्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप ।
अव्ययस्थाप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मन: ॥
१४॥
नृणाम्ू--मनुष्यता के लिए; नि: श्रेयस-- सर्वोच्च लाभ; अर्थाय--के हेतु; व्यक्ति:--साकार रूप; भगवतः--भगवान्; नृप--हेराजन; अव्ययस्य--अव्यय का; अप्रमेयस्थ--मापविहीन; निर्गुणस्थ--गुणों के स्पर्श से दूर; गुण-आत्मन:--गुणों के नियन्ता।
हे राजनू, भगवान् अव्यय तथा अप्रमेय हैं और भौतिक गुणों से अछूते हैं क्योंकि वे इन गुणोंके नियन्ता हैं।
इस जगत में साकार रूप में उनका आविर्भाव मानवता को सर्वोच्च लाभ दिलानेके निमित्त होता है।
काम क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहदमेव च ।
नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते ॥
१५॥
कामम्ू--कामवासना; क्रोधम्-क्रो ध; भयम्-- भय; स्नेहम्--स्नेह; ऐक्यम्ू--एकता; सौहदम्--मित्रता; एव च-- भी;नित्यमू--सदैव; हरौ-- भगवान् हरि के प्रति; विदधत:--प्रकट करते हुए; यान्ति--प्राप्त करते हैं; तत्ू-मयताम्--तल्लीनता;हि--निस्सन्देह; ते--ऐसे व्यक्ति।
जो व्यक्ति अपने काम, क्रोध, भय, रक्षात्मक स्नेह, निर्विशेष एकत्व का भाव या मित्रता कोसदैव भगवान् हरि में लगाते हैं, वे निश्चित रूप से उनके भावों में तल्लीन हो जाते हैं।
न चैवं विस्मय: कार्यो भवता भगवत्यजे ।
योगेश्वरेश्वेर कृष्णे यत एतद्विमुच्यते ॥
१६॥
न च--न तो; एवम्--इस प्रकार का; विस्मय:--आश्चर्य; कार्य: --किया जाना चाहिए; भवता--आपके द्वारा; भगवति--भगवान्; अजे--अजन्मा; योग-ईश्वर--योग के स्वामियों के; ईश्वेर--परम स्वामी; कृष्णे--कृष्ण के विषय में; यत:--जिनसे;एतत्--यह ( संसार ); विमुच्यते--मुक्ति प्राप्त करता है आपको योगेश्वरों के अजन्मा
ई श्वर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के विषय में इस तरहचकित नहीं होना चाहिए।
अन्ततः भगवान् ही इस जगत का उद्धार करने वाले हैं।
ता इृष्ठटान्तिकमायाता भगवान्त्रजयोषित: ।
अवदद्वदतां श्रेष्ठो वाचः पेशै्विमोहयन् ॥
१७॥
ताः--उनको; हृष्टा--देखकर; अन्तिकम्--निकट; आयाता:--आया हुआ; भगवान्-- भगवान् ने; ब्रज-योषित:--व्रज कीबालाएँ; अवदत्--कहा; वदताम्--वक्ताओं में; श्रेष्ठ: -- श्रेष्ठ वाच:--वाणी के; पेशै:--अलंकरणों से युक्त; विमोहयन्--मोहित करने वाली
यह देखकर कि ब्रज-बालाएँ आ चुकी हैं, वक्ताओं में श्रेष्ठ भगवान् कृष्ण ने उनके मन कोमोहित करने वाले आकर्षक शब्दों से उनका स्वागत किया।
श्रीभगवानुवाचस्वागतं वो महाभागा: प्रियं कि करवाणि व: ।
ब्रजस्यानामयं कच्चिट्वूतागमनकारणम् ॥
१८॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; सु-आगतम्--स्वागत है; व: --तुम लोगों का; महा-भागा:--ओरे भाग्यशालिनियो;प्रियम्ू-- अच्छा लगने वाला; किमू--क्या; करवाणि--कर सकता हूँ; वः--तुम लोगों के लिए; ब्रजस्थ--व्रज की;अनामयम्--कुशल-मंगल; कच्चित्--क्या; ब्रूत--कहिये; आगमन--अपने आने का; कारणम्--कारण |
भगवान् कृष्ण ने कहा : हे अति भाग्यवंती नारीगण, तुम्हारा स्वागत है।
मैं तुम लोगों कीप्रसन्नता के लिए क्या कर सकता हूँ? ब्रज में सब कुशल-मंगल तो है? तुम लोग अपने यहाँआने का कारण मुझे बतलाओ।
रजन्येषा घोररूपा घोरसत्त्वनिषेविता ।
प्रतियात ब्र॒जं नेह स्थेयं स्त्रीभि: सुमध्यमा: ॥
१९॥
रजनी--रात; एषा--यह; घोर-रूपा--देखने में भयानक; घोर-सत्त्व-- भयानक प्राणियों से; निषेविता--बसी हुई; प्रतियात--लौट जाओ; ब्रजम्--ब्रज ग्राम को; न--नहीं; इह--यहाँ; स्थेयम्--रुकना चाहिए; स्त्रीभि:--स्त्रियों के लिए; सु-मध्यमा:--क्षीण कटि वाली |
यह रात अत्यन्त भयावनी है और भयावने प्राणी इधर उधर फिर कर रहे हैं।
हे पतली कमरवाली स्त्रियो, ब्रज लौट जाओ।
स्त्रियों के लिए यह उपयुक्त स्थान नहीं है।
मातरः पितरः पुत्रा भ्रातरः पतयश्च व: ।
विचिन्वन्ति ह्पश्यन्तो मा कृढ्वं बन्धुसाध्वसम् ॥
२०॥
मातरः--माता; पितर:--पिता; पुत्रा:--पुत्र; भ्रातर:-- भाई; पतय:-- पति; च--तथा; व: --तुम्हारे; विन्चिन्वन्ति--खोज रहे हैं;हि--निश्चय ही; अपश्यन्त:--न देखकर; मा कृढ्वम्--मत उत्पन्न करो; बन्धु--अपने परिवार वालों के लिए; साध्वसम्--चिन्ता
तुम्हारी माताएँ, पिता, पुत्र, भाई तथा पति तुम्हें घर पर न पाकर निश्चित रूप से तुम्हें ढूँढ़ रहेहोंगे।
अपने परिवार वालों के लिए चिन्ता मत उत्पन्न करो।
इृष्टे बन कुसुमितं राकेशकररझ्लितम् ।
यमुनानिललीलैजत्तरुपललवशोभितम् ॥
२१॥
तद्यात मा चिरं गोष्ठ शुश्रूषध्वं पतीन्सतीः ।
क्रन्दन्ति वत्सा बालाश्न तान्पाययत दुह्मत ॥
२२॥
इृष्टमू--देख लिया; वनम्--जंगल; कुसुमितम्--पुष्पित; राका-ईश--पूर्णमासी के अधिष्ठाता देव, चन्द्रमा के; कर--हाथ से;रक्ितम्--रँगा गया; यमुना--यमुना नदी से निकलते हुए; अनिल--वायु से; लीला--खेल-खेल में; एजत्--हिलते-डुलते;तरु--वृक्षों की; पललव--पत्तियों से; शोभितम्--शोभायमान; तत्--अत:; यात--वापस चली जाओ; मा चिरम्--देर लगायेबिना; गोष्ठम्--गाँव को; शुश्रूषध्वम्--जाकर सेवा करो; पतीन्--अपने पतियों की; सती:--हे सतियो; क्रन्दन्ति--रो रहे हैं;वत्सा:--बछड़े; बाला: --बच्चे; च--तथा; तान्ू--उनको; पाययत--अपना दूध पिलाओ; दुह्मत--गाय का दूध पिलाओ।
अब तुम लोगों ने फूलों से भरे तथा पूर्ण चन्द्रमा की चाँदनी से सुशोभित इस वृन्दावन जंगलको देख लिया।
तुम लोगों ने यमुना से आने वाली मन्द मन्द वायु से हिलते पत्तों वाले वृक्षों कासौन्दर्य देख लिया।
अतः अब अपने गाँव वापस चली जाओ।
देर मत करो।
हे सती स्त्रियो,जाकर अपने पतियों की सेवा करो और क्रन्दन करते बच्चों तथा बछड़ों को दूध दो।
अथ वा मदभिस्नेहाद्धवत्यो यन्त्रिताशया: ।
आगता ह्युपपन्न॑ व: प्रीयन्ते मयि जन्तवः ॥
२३॥
अथ वा--या कि; मत्-अभिस्नेहात्--मेरे लिए प्रेम के कारण; भवत्य:--तुम्हारे; यन्त्रित-- अधीन हुआ; अशया:--हृदय;आगता:--आई हुई; हि--निस्सन्देह; उपपन्नम्ू--उपयुक्त; व:ः--तुम लोगों के लिए; प्रीयन्ते--स्नेह करते हैं; मयि--मुझसे;जन्तव:--समस्त जीव
अथवा तुम लोग कदाचित् मेरे प्रति अगाध प्रेम के कारण यहाँ आई हो क्योंकि इस प्रेम नेतुम्हारे हृदयों को जीत लिया है।
यह सचमुच ही सराहनीय है क्योंकि सारे जीव मुझसे सहज भावसे स्नेह करते हैं।
भर्तु: शुश्रूषणं स््रीणां परो धर्मो ह्मायया ।
तद्ठन्धूनां च कल्याण: प्रजानां चानुपोषणम् ॥
२४॥
भर्तुः--पति की; शुश्रूषणम्--निष्ठापूर्ण सेवा; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के लिए; पर:--परम; धर्म:--कर्तव्य; हि--निस्सन्देह;अमायया--बिना द्वैत के; तत्-बन्धूनामू--अपने पतियों के सम्बन्धियों के प्रति; च--तथा; कल्याण:--शुभ कृत्य; प्रजानाम्ू--सन््तानों की; च--तथा; अनुपोषणम्--देखरेख, पालनपोषण |
स्त्री का परम धर्म है कि वह निष्ठापूर्वक अपने पति की सेवा करे, अपने पति के परिवार केप्रति अच्छा व्यवहार करे तथा अपने बच्चों की ठीक देखरेख करे।
दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोपि वा ।
पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरषातकी ॥
२५॥
दुःशीलः-- भ्रष्ट चरित्र वाला; दुर्भप:--अभागा; वृद्धः--बूढ़ा; जड:--मन्द; रोगी--बीमार; अधन: --गरीब; अपि वा--तो भी;'पतिः--पति; स्त्रीभि:--स्त्रियों द्वारा; न हातव्य:--परित्याग नहीं करना चाहिए; लोक--अगले जीवन में उत्तम स्थान;ईप्सुभि:--चाहने वाली; अपातकी--( यदि ) पतित न हो |
जो स्त्रियाँ अगले जीवन में उत्तम लोक प्राप्त करना चाहती हैं उन्हें चाहिए कि उस पति काकभी परित्याग न करें जो अपने धार्मिक स्तर से नीचे न गिरा हो चाहे वह दुश्चरित्र, अभागा,वृद्ध, अज्ञानी, बीमार या निर्धन क्यों न हो।
अस्वर्ग्यमयशस्यं च फल्गु कृच्छुं भयावहम् ।
जुगुप्सितं च सर्वत्र ह्यौपपत्यं कुलस्त्रियः ॥
२६॥
अस्वर्ग्यमू-स्वर्ग को न ले जाने वाला; अयशस्यम्--अच्छी ख्याति के लिए अनुपयुक्त; च--तथा; फल्गु--नगण्य; कृच्छुम्--कठिन; भय-आवहम्-- भय उत्पन्न करने वाला; जुगुप्सितम्--निन्दनीय; च--तथा; सर्वत्र--सभी तरह से; हि--निस्सन्देह;औपपत्यम््-परपति के साथ सम्बन्ध, व्यभिचार; कुल-स्त्रियः:--अच्छे कुल की अर्थात् कुलीन स्त्री के लिए
कुलीन स्त्री के लिए क्षुद्र व्यभिचार सदा ही निन्दनीय हैं, इनसे स्वर्ग जाने में बाधा पहुँचतीहै, उसकी ख्याति नष्ट होती है और ये उसके लिए कठिनाई तथा भय उत्पन्न करनेवाले होते हैं।
श्रवणाइर्शनाद््ध्ञानान््मयि भावो<नुकीर्तनात् ।
न तथा सन्निकर्षेण प्रतियात ततो गृहान् ॥
२७॥
श्रवणात्--( मेरे यश का ) श्रवण करने से; दर्शनात्--( मन्दिर में मेरे अर्चाविग्रह का ) दर्शन करने से; ध्यानात्-- ध्यान करनेसे; मयि--मुझमें, मेरे लिए; भाव:--प्रेम; अनुकीर्तनात्ू--बाद में कीर्तन करने से; न--नहीं; तथा--उसी प्रकार से;सन्निकर्षण--शारीरिक सामीप्य से; प्रतियात--लौट जाओ; तत:ः--अतः; गृहान्--अपने अपने घरों को |
मेरे विषय में सुनने, मेरे अर्चाविग्रह रूप का दर्शन करने, मेरा ध्यान करने तथा मेरी महिमाका श्रद्धापूर्वक कीर्तन करने की भक्तिमयी विधियों से मेरे प्रति दिव्य प्रेम उत्पन्न होता है।
केवलशारीरिक सात्रिध्य से वैसा ही फल प्राप्त नहीं होता।
अत: तुम लोग अपने घरों को लौट जाओ।
श्रीशुक उबाचइति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभाषितम् ।
विषण्णा भग्नसड्डल्पश्रिन्तामापुर्दुरत्ययाम् ॥
२८॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; विप्रियम्ू--अरूचिकर, अप्रिय; आकर्ण्य--सुनकर; गोप्य:--गोपियों ने; गोविन्द-भाषितम्--गोविन्द के वचन; विषण्णा:--अत्यन्त खिन्न; भग्न--उदास; सड्डूल्पा:--प्रबल इच्छाएँ;चिन्तामू--चिन्ता; आपु:--अनुभव किया; दुरत्ययाम्--दुर्लघ्य |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : गोविन्द के इन अप्रिय बचनों को सुनकर गोपियाँ खित्न हो उठीं।
उनकी बड़ी बड़ी आशाएँ ध्वस्त हो गईं और उन्हें दुर्लघ्य चिन्ता होने लगी।
कृत्वा मुखान्यव शुच: श्वसनेन शुष्यद् -बिम्बाधराणि चरणेन भुव: लिखन्त्य: ।
अस््रैरुपात्तमसिभि: कुचकुड्जू मानितस्थुर्मृजन्त्य उरुदु:खभरा: सम तूष्णीम् ॥
२९॥
कृत्वा--करके; मुखानि--अपने मुखों को; अव--नीचे; शुच्ः --शोक से; श्रसनेन--आहें भरती; शुष्यत्--सूखते हुए;बिम्ब--लाल बिम्ब फल रूपी; अधराणि--होठों को; चरणेन--अपने पैरों के अँगूठों से; भुव:ः--पृथ्वी को; लिखन्त्य:--कुरेदते हुए; अस्नैः--आँसुओं से; उपात्त--बहाती हुई; मसिभि:--आँखों के कज्जल से; कुच--स्तनों पर; कुल्डु मानि--सिन्दूर;तस्थु:--निश्चल खड़ी रहीं; मृजन्त्य:--धोते हुए; उरू--अत्यधिक; दुःख--दुख के; भरा:-- भार का अनुभव करती हुईं; स्म--निस्सन्देह; तृष्णीम्--चुपचाप
गोपियाँ अपना सिर झुकाये तथा शोकपूर्ण गहरे श्वास से लाल लाल होंठों को सुखाते हुएअपने पैर के अँगूठे से धरती कुरेदने लगीं।
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे जिन्होंने अपने साथउनके कज्जल को बहाते हुए उनके स्तनों पर लेपित सिन्दूर को धो डाला।
इस तरह गोपियाँ अपनेदुख के भार को चुपचाप सहन करती हुईं खड़ी रहीं।
प्रेष्ठ प्रियेतरमिव प्रतिभाषमाणंकृष्णं तदर्थविनिवर्तितसर्वकामा: ।
नेत्रे विमृज्य रुदितोपहते सम किझ्ञित्-संरम्भगद्गदगिरोउब्रुवतानुरक्ता: ॥
३०॥
प्रेष्ठमू-- अपने प्रेमी; प्रिय-इतरम्--प्रिया, प्रेमी का उल्टा; इब--मानो; प्रतिभाषमाणम्---उन्हें सम्बोधित करते हुए; कृष्णम्--कृष्ण को; ततू-अर्थ--उसके लिए; विनिवर्तित--विलग रहकर; सर्व--सभी; कामा:-- भौतिक इच्छाएँ; नेत्रे--अपनी आँखोंको; विमृज्य--पोंछकर; रुदित-- अपना रोना; उपहते--बन्द करके ; स्म--तब; किझ्ञित्ू--कुछ; संरम्भ--क्षोभ सहित;गदगद--अवरूद्ध; गिर:ः--वाणी; अब्लुवत--बोलीं; अनुरक्ता:--हढ़ता से लिप्त
यद्यपि कृष्ण उनके प्रेमी थे और उन्हीं के लिए उन सबों ने अपनी सारी इच्छाएँ त्याग दी थींकिन्तु वे ही उनसे प्रतिकूल होकर बोल रहे थे।
तो भी वे उनके प्रति उसी तरह अनुरक्त बनी रहीं।
अपना रोना बन्द करके उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं और क्षोभ से युक्त अवरुद्ध वाणी से वे कहनेलगीं।
श्रीगोष्य ऊचु:मैवं विभोहति भवान्गदितु नृशंसंसन्त्यज्य सर्वविषयांस्तव पादमूलम् ।
भक्ता भजस्व दुरवग्रह मा त्यजास्मान्देवो यथादिपुरुषो भजते मुमुक्षून् ॥
३१॥
श्री-गोप्य: ऊचु:--सुन्दरी गोपियों ने कहा; मा--नहीं; एवम्--इस तरह; विभो--हे सर्वशक्तिमान; अर्हति--चाहिए; भवान्--आपको; गदितुम्--बोलना; नू-शंसम्--क्रू रतापूर्वक; सन्त्यज्य--पूर्णतया परित्याग करके; सर्व--समस्त; विषयान्--विविधप्रकार की इन्द्रिय तृप्ति; तब--आपके; पाद-मूलम्--चरणों को; भक्ता:--पूजने वाली; भजस्व--कृपया बदले में प्रेम करें;दुरवग्रह--ओेरे हठीले; मा त्यज--मत त्यागें; अस्मानू--हमको; देवा:-- भगवान्; यथा--जिस तरह; आदि-पुरुष: --आदिभगवान्, नारायण; भजते--प्रेम करते हैं; मुमुक्षून्--मुक्ति चाहने वालों को |
सुन्दर गोपिकाओं ने कहा : हे सर्वशक्तिमान, आपको इस निर्दयता से नहीं बोलना चाहिए।
आप हमें ठुकरायें नहीं।
हमने आपके चरणकमलों की भक्ति करने के लिए सारे भौतिक भोगोंका परित्याग कर दिया है।
अरे हठीले, आप हमसे उसी तरह प्रेम करें जिस तरह श्रीनारायणअपने उन भक्तों से प्रेम करते हैं, जो मुक्ति के लिए प्रयास करते हैं।
यत्पत्यपत्यसुहृदामनुवृत्तिरड़ःस्त्रीणां स्वधर्म इति धर्मविदा त्वयोक्तम् ।
अस्त्वेबमेतदुपदेशपदे त्वयीशेप्रेष्ठी भवांस्तनुभूतां किल बन्धुरात्मा ॥
३२॥
यत्--जो; पति--पतियों की; अपत्य--सन्तानों; सुहदाम्--तथा शुभचिन्तक सम्बन्धियों और मित्रों की; अनुवृत्ति:-- अनुगमन;अड्ढड-हे कृष्ण; स्त्रीणाम्-स्त्रियों के; स्व-धर्म: --उचित धार्मिक कर्तव्य; इति--इस प्रकार; धर्म-विदा--धर्म को जानने वाले;त्ववा--तुम्हारे द्वारा; उक्तमू--कहा गया; अस्तु--होए; एवम्--वैसा ही; एतत्--यह; उपदेश--इस उपदेश के; पदे--असलीलक्ष्य; त्वयि--तुममें; ईशे--हे ईश्वर; प्रेष्ठ; --अत्यन्त प्रिय; भवान्--आप; तनु-भूताम्--समस्त देहधारी जीवों के लिए;किल--निश्चय ही; बन्धु:--निकट सम्बन्धी; आत्मा--साक्षात् आत्मा।
हे प्रिय कृष्ण, एक धर्मज्ञ की तरह आपने हमें उपदेश दिया है कि स्त्रियों का उचित धर्म हैकि वे अपने पतियों, बच्चों तथा अन्य सम्बन्धियों की निष्ठापूर्वक सेवा करें।
हम मानती हैं कियह सिद्धान्त वैध है किन्तु वास्तव में यह सेवा तो आपकी की जानी चाहिए हे प्रभु, आप ही तोसमस्त देहधारियों के सर्वप्रिय मित्र हैं।
असल में आप उनके घनिष्टतम सम्बन्धी तथा उनकीआत्मा हैं।
कुर्वन्ति हि त्वयि रतिं कुशला: स्व आत्मन्नित्यप्रिये पतिसुतादिभिरार्तिदे: किम् ।
तन्नः प्रसीद परमेश्वर मा सम छिन्द्याआशां धृतां त्वयि चिरादरविन्दनेत्र ॥
३३॥
कुर्वन्ति--दिखलाते हैं; हि--निस्सन्देह; त्ववि--तुम्हारे लिए; रतिमू--आकर्षण; कुशला:--पटु व्यक्ति; स्वे-- अपने हेतु;आत्मनू--आत्मा; नित्य--शा श्वत; प्रिये--प्रिय; पति--अपने पतियों समेत; सुत--पुत्र; आदिभि: --तथा अन्य सम्बन्धियोंसमेत; आर्ति-दैः--कष्ट पहुँचाने वाले; किम्ू--क्या; तत्ू--अतएव; नः--हम पर; प्रसीद--कृपालु हों; परम-ई श्वर--हे परमनियन्ता; मा सम छिन्द्या:--कृपा करके छिन्न-भिन्न नहीं करें; आशाम्--हमारी आशाओं को; धृताम्-- धारण की गई; त्वयि--तुम्हारे लिए; चिरात्--दीर्घकाल से; अरविन्द-नेत्र--हे कमलनयन।
सुविज्ञ अध्यात्मवादीजन सदैव आपसे स्नेह करते हैं क्योंकि वे आपको अपनी असलीआत्मा तथा शाश्वत प्रेमी मानते हैं।
हमें अपने इन पतियों, बच्चों तथा सम्बन्धियों से क्या लाभमिलता है, जो हमें केवल कष्ट देने वाले हैं? अतएवं हे परम नियन्ता, हम पर कृपा करें।
हेकमलनेत्र, आप अपना सात्निध्य चाहने की हमारी चिर-पोषित अभिलाषा आशा को छिन्न मतकरें।
चित्तं सुखेन भवतापहतं गृहेषुयन्निर्विशत्युत करावपि गृह्मकृत्ये ।
पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्याम: कथं व्रजमथो करवाम कि वा ॥
३४॥
चित्तमू--हमारे मन; सुखेन--आसानी से; भवता--आपके द्वारा; अपहतम्--चुराये गये; गृहेषु--घर के कामकाज में; यत्--जो; निर्विशति--लीन रहते थे; उत--और भी; करौ--हमारे हाथ; अपि-- भी; गृह्य-कृत्ये--घर के काम में; पादौ--हमारे पैर;'पदम्--एक पग; न चलतः--नहीं बढ़ रहे; तब--तुम्हारे; पाद-मूलात्ू--चरणों से दूर; याम:--हम जायेंगी; कथम्--कैसे;ब्रजमू--त्रज को वापस; अथ उ--तथा फिर; करवाम--हम करेंगी; किमू-- क्या; वा--आगे।
आज तक हमारे मन गृहकार्यों में लीन थे किन्तु आपने सरलतापूर्वक हमारे मन तथा हमारेहाथों को हमारे गृहकार्य से चुरा लिया है।
अब हमारे पाँव आपके चरणकमलों से एक पग भीदूर नहीं हटेंगे।
हम ब्रज वापस कैसे जा सकती हैं ? हम वहाँ जाकर क्या करेंगी ?
सिद्ञाड़ नस्त्वदधरामृतपूरकेणहासावलोककलगीतजहच्छयाग्निम् ।
नो चेद्बयं विरहजाग्न्युपयुक्तदेहाध्यानेन याम पदयो: पदवीं सखे ते ॥
३५॥
सिज्न--कृपा करके उलेड़िये; अड़--हे प्रिय कृष्ण; न:ः--हमारे; त्वत्--तुम्हारे; अधर--होंठों के; अमृत--अमृत की;पूरकेण--बाढ़ से; हास--हँसी युक्त; अवलोक--तुम्हारी चितवन से; कल--सुरीला; गीत--तथा ( तुम्हारी वंशी के ) गीत से;ज--उत्पन्न; हत्ू-शय--हमारे हृदयों में स्थित; अग्निमू--अग्नि; न उ चेत्ू--यदि नहीं; वयम्--हम सभी; विरह--वियोग से;ज--उत्पन्न; अग्नि--अग्नि में; उपयुक्त--रखते हुए; देहा: --अपने शरीर; ध्यानेन--ध्यान के द्वारा; याम--जायेंगी; पदयो: --चरणों के; पदवीम्--स्थान तक; सखे--हे मित्र; ते--तुम्हारे
हे कृष्ण, हमारे हृदयों के भीतर की अग्नि, जिसे आपने अपनी हँसी से युक्त चितवन के द्वारातथा अपनी वंशी के मधुर संगीत से प्रज्वलित किया है उस पर कृपा करके अपने होठों काअमृत डालिए।
यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो हे सखा, हम आपके वियोग की अग्नि में अपनेशरीरों को भस्म कर देंगी और इस प्रकार योगियों की तरह ध्यान द्वारा आपके चरणकमलों केधाम को प्राप्त करेंगी।
यहाम्बुजाक्ष तब पादतलं रमायादत्तक्षणं क्वचिद्रण्यजनप्रियस्य ।
अस्प्राक्ष्म तत्प्रभूति नान्यसमक्षमञ्धःस्थातुस्त्वयाभिरमिता बत पारयाम: ॥
३६॥
यहि--जब; अम्बुज--कमल सहश; अक्ष--आँखों वाले; तव--तुम्हारे; पाद--पैरों के; तलम्ू--नीचे; रमाया:-- श्रीमतीलक्ष्मीदेवी के लिए; दत्त--प्रदान करते हुए; क्षणम्--उत्सव; क्वचित्--कभी कभी; अरण्य--जंगल में रहने वाले; जन--लोगों के ; प्रियस्थ--प्रिय का; अस्प्राक्ष्म--हम छू लेंगी; तत्-प्रभृति--उसी क्षण से आगे; न--कभी नहीं; अन्य--किसी दूसरेव्यक्ति के; समक्षम्ू--सामने; अज्ज:-प्रत्यक्षतः; स्थातुम्-खड़े रहने के लिए; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अभिरमिता:--हर्ष से पूरित;बत--निश्चय ही; पारयाम:--समर्थ होंगी।
हे कमलनेत्र, जब भी लक्ष्मीजी आपके चरणकमलों के तलुवों का स्पर्श करती हैं, तो वेइसे उल्लास का अवसर मानती हैं।
आप वन-वासियों को अत्यन्त प्रिय हैं अतएव हम भी आपकेउन चरणकमलों का स्पर्श करेंगी।
उसके बाद हम किसी भी व्यक्ति के समक्ष खड़ी तक नहींहोंगी क्योंकि तब हम आपके द्वारा पूरी तरह तुष्ठ हो चुकी होंगी।
श्रीर्यत्पदाम्बुजरजश्चकमे तुलस्यालब्ध्वापि वक्षसि पदं किल भृत्यजुष्टम् ।
यस्या: स्ववीक्षण उतान्यसुरप्रयासस्तद्ठद्वयं च तब पादरज: प्रपन्ना: ॥
३७॥
श्री:--भगवान् नारायण की पत्नी, लक्ष्मीजी; यत्ू--जिस तरह; पद-अम्बुज--चरणकमलों की; रज:--धूल; चकमे--वांछित;तुलस्या--तुलसीदेवी के साथ; लब्ध्वा--प्राप्त करने के बाद; अपि--भी; वक्षसि--उनके वक्षस्थल पर; पदम्-- अपना स्थान;किल--निस्सन्देह; भृत्य--नौकरों के द्वारा; जुष्टम्ू--सेवित; यस्या:--जिसके ( लक्ष्मी के ); स्व--अपने; वीक्षणे--चितवन केलिए; उत--दूसरी ओर; अन्य--दूसरे; सुर--देवताओं का; प्रयास:--प्रयत्न; तद्बत्ू--उसी तरह से; वयम्--हम; च--भी;तव--तुम्हारे; पाद--चरण की; रज:--धूल; प्रपन्ना:--शरण के लिए आई हुई हैं
जिन लक्ष्मीजी की कृपा-कटाक्ष के लिए देवतागण महान् प्रयास करते रहते हैं उन्हें भगवान्नारायण के वक्षस्थल पर सदैव विराजमान रहने का अनुपम स्थान प्राप्त है।
फिर भी वे उनकेचरणकमलों की धूल पाने के लिए इच्छुक रहती हैं, यद्यपि उन्हें इस धूल में तुलसीदेवी तथाभगवान् के अन्य बहुत से सेवकों को भी हिस्सा देना पड़ता है।
इसी तरह हम भी शरण लेने केलिए आपके चरणकमलों की धूलि लेने आई हैं।
तन्नः प्रसीद वृजिनार्दन तेडन्ध्रिमूलंप्राप्ता विसृज्य वसतीस्त्वदुपासनाशा: ।
त्वत्सुन्दरस्मितनिरीक्षणती व्रकाम -तप्तात्मनां पुरुषभूषण देहि दास्यम् ॥
३८॥
तत्ू--अतः; नः--हम पर; प्रसीद--अपना अनुग्रह प्रदर्शित करें; वृजिन--सारे कष्टों को; अर्दन--विनष्ट करने वाले; ते--तुम्हारे; अड्घ्रि-मूलम्--पाँवों को; प्राप्ता:--आई हुई हैं; विसृज्य--त्यागकर; बसती:--अपने घरों को; त्वत्-उपासना--आपकी पूजा की; आशा: --आश्ा से; त्वतू--आपके; सुन्दर--सुन्दर; स्मित--हास; निरीक्षण--चितवन के कारण; तीब्र--अत्यधिक, उत्कट; काम--कामेच्छा से; तप्त--जली हुई; आत्मनाम्--जिनके हृदय; पुरुष--सारे मनुष्यों के; भूषण--आभूषण; देहि-- प्रदान करें; दास्यम्ू--दासता |
अतः हे सभी संतापों का हरण करने वाले, हम पर कृपा करें।
आपके चरणकमलों तकपहुँचने के लिए हमने अपने परिवारों तथा घरों को छोड़ा है और हमें आपकी सेवा करने केअतिरिक्त कुछ भी नहीं चाहिए।
हमारे हृदय आपकी सुन्दर हासमयी चितवन से उत्पन्न तीत्रइच्छाओं के कारण जल रहे हैं।
हे पुरुष-रल, हमें अपनी दासियाँ बना लें।
वीक्ष्यालकाबृतमुखं तब कुण्दलश्री-गण्डस्थलाधरसुधं हसितावलोकम् ।
दत्ताभयं च भुजदण्डयुगं विलोक्यवक्ष: अयैकरमणं च भवाम दास्य: ॥
३९॥
वीक्ष्य--देखकर; अलक--आपके बालों से; आवृत--ढके; मुखम्--मुख को; तव--तुम्हारे; कुण्डल--कुण्डलों की; श्री--सुन्दरता से; गण्ड-स्थल--गाल; अधर--होठों के; सुधम्--तथा अमृत; हसित--मन्द हँसी समेत; अवलोकम्--चितवन;दत्त--प्रदान करते हुए; अभयम्-- अभय; च--तथा; भुज-दण्ड--आपकी शक्तिशाली बाँहें; युगम्--दो; विलोक्य--देखकर;वक्ष:--आपका वक्षस्थल; श्री--लक्ष्मी का; एक--एकमात्र; रमणम्-- आनन्द स्रोत; च--तथा; भवाम--हम बनना चाहतीहैं; दास्य:--आपकी दासियाँ।
बालों के घुंघराले गुच्छों से घिरे हुए आपके मुख, कुण्डलों से विभूषित आपकी गालों,अमृत से पूर्ण आपके होठों तथा आपकी स्मितपूर्ण चितवन को देखकर तथा हमारे भय कोभगाने वाली आपकी दो बलिष्ठ भुजाओं को एवं लक्ष्मीजी के आनन्द के एकमात्र स्रोत आपकेवक्षस्थल को देखकर हम भी आपकी दासियाँ बनना चाहती हैं।
का स्त्र्यड़ ते कलपदायतवेणुगीत-सम्मोहितार्यचरितान्न चलेत्बरिलोक्याम् ।
औैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं॑यदगोद्विजद्रुममृगा: पुलकान्यबिभ्रन् ॥
४०॥
का--कौनसी; स्त्री--स्त्री; अड़--हे कृष्ण; ते--तुम्हारा; कल--मधुर; पद--पदों वाले; आयत--निकले हुए; वेणु--तुम्हारीबंशी के; गीत--गीत से; सम्मोहिता--पूर्णतया मोहित; आर्य--सभ्य व्यक्तियों के; चरितातू--उचित आचरण से; न चलेत्--हटता नहीं; त्रि-लोक्याम्ू--तीनों लोकों में; त्रै-लोक्य--तीनों लोकों का; सौभगम्ू--कल्याण का कारण; इृदम्ू--यह; च--तथा; निरीक्ष्य--देखकर; रूपम्--सौन्दर्य; यतू--जिसके कारण; गो--गौवें; द्विज--पक्षी; द्रुम--वृक्ष; मृगा:--तथा हिरन;पुलकानि--रोमांच; अबिभ्रन्ू--हो आया।
हे कृष्ण, तीनों लोकों में ऐसी कौन स्त्री होगी जो आपकी वंशी से निकली मधुर तान सेमोहित होकर अपने धार्मिक आचरण से विचलित न हो जाय ? आपका सौन्दर्य तीनों लोकों कोमंगलमय बनाता है।
दरअसल गौवें, पश्ली, वृक्ष तथा हिरण तक भी आपके सुन्दर रूप कोदेखकर रोमांचित हो उठते हैं।
व्यक्त भवान्ब्रजभयार्तिहरोभिजातोदेवो यथादिपुरुष: सुरलोकगोप्ता ।
तन्नो निधेहि करपड्जूजमार्तबन्धोतप्तस्तनेषु च शिरःसु च किड्डूरीणाम् ॥
४१॥
व्यक्तम्-स्पष्ट है कि; भवान्ू--आप; ब्रज--ब्रजवासी के; भय-- भय; आर्ति--तथा कष्ट के; हर:--हरने वाले; अभिजात: --उत्पन्न हुआ; देव:-- भगवान्; यथा--जिस प्रकार; आदि-पुरुष: --आदि भगवान्; सुर-लोक--देव-लोक का; गोप्ता--रक्षक;ततू--अतः; नः--हम सबों का; निधेहि--कृपा करके रखें; कर--अपना हाथ; पड्लजमू--कमल सहश; आर्त--सताया हुआ;बन्धो--हे मित्र; तप्त--जलते हुए; स्तनेषु--स्तनों पर; च--तथा; शिरःसु--सिरों पर; च--भी; किड्डूरीणाम्--अपनी दासियोंके
स्पष्ट है कि आपने व्रजवासियों के भय तथा कष्ट को हरने के लिए इस जगत में उसी तरहजन्म लिया है, जिस तरह आदि भगवान् देव-लोक की रक्षा करते हैं।
अतः हे दुखियारों के मित्र,अपना करकमल अपनी दासियों के सिरों पर तथा तप्त स्तनों पर रखिये।
श्रीशुक उबाचइति विक्लवितं तासां श्रुत्वा योगेश्वरेश्वर: ।
प्रहस्य सदयं गोपीरात्मारामोप्यरीरमत् ॥
४२॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इन शब्दों में; विक््लवितम्ू--विकल वाणी; तासाम्ू--उनकी; श्रुत्वा--सुनकर; योग-ई श्वर-ई श्र: -- योगशक्ति के ईश्वरों के ईश्वर; प्रहस्थ--हँसकर; स-दयम्--दयापूर्वक; गोपी:--गोपियों को; आत्मआराम:ः--आत्म-तुष्ट; अपि--यद्यपि; अरीरमत्--उन्होंने सन्तुष्ट कर दिया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा: गोपियों के व्याकुल शब्दों को सुनकर हँसते हुए, समस्तयोगेश्वरों के भी ईश्वर भगवान् कृष्ण ने उन सबों के साथ कृपा करके आनन्द मनाया यद्यपि वेआत्पतुष्ट हैं।
ताभिः समेताभिरुदारचेष्टितःप्रियेक्षणोत्फुल्लमुखीभिरच्युत: ।
उदारहासद्ठिजकुन्ददीधति-व्यरोचतैणाडु इवोडुभिवृत: ॥
४३॥
ताभिः--उनके साथ; समेताभि:--एकसाथ मिलकर; उदार--उदार, वदान्य; चेष्टित:--चेष्टाओं वाला; प्रिय--प्यारा; ईक्षण--अपनी चितवन से; उत्फुल्ल--खिले हुए; मुखीभि:--मुखों वाली; अच्युत:--अच्युत भगवान्; उदार--विस्तृत, खुली; हास--हँसी; द्विज--दाँतों की; कुन्द--चमेली के फूल जैसी; दीधति: --तेज युक्त; व्यरोचत--शानदार लगा; एण-अड्जू:--कालेहिरण जैसे धब्बे वाला, चन्द्रमा; इब--सहृश; उडडुभि:--ताराओं के द्वारा; वृत:--घिरा हुआ
एकत्र गोपियों के बीच में अच्युत भगवान् कृष्ण वैसे ही लग रहे थे जैसे कि तारों से घिराहुआ चन्द्रमा लगता है।
इतने उदार कार्यकलापों वाले कृष्ण ने अपनी स्नेहमयी चितवनों से उनके मुखों को प्रफुल्लित कर दिया और उनकी खिली हुई हँसी से चमेली की कली जैसे दाँतों कातेज प्रकट हो रहा था।
उपगीयमान उद््गायन्वनिताशतयूथपः ।
मालां बिभ्रद्ैजयन्तीं व्यचरन्मण्डयन्वनम् ॥
४४॥
उपगीयमान:--गान किया हुआ; उद्गायन्ू-- अपने से जोर जोर गाते हुए; वनिता--स्त्रियों के; शत--सैकड़ों; यूथप:--सेनानायक; मालाम्ू--हार या माला; बिभ्रतू- पहने; वैजयन्तीम्--वैजयन्ती नाम के ( पाँच भिन्न रंगों के फूलों से बनी );व्यचरन्ू--विचरण करते हुए; मण्डयन्--शोभा बढ़ाते हुए; वनम्--जंगल की |
जब गोपियाँ उनका महिमा-गान करने लगीं तो सैकड़ों स्त्रियों के नायक ने प्रत्युत्तर में जोरजोर से गाना शुरू कर दिया।
वे अपनी वैजयन्ती माला धारण किये हुए उनके बीच घूम घूम करवृन्दावन के जंगल की शोभा बढ़ा रहे थे।
नद्या: पुलिनमाविश्य गोपीभिर्हिमवालुकम् ।
जुष्टे तत्तरलानन्दि कुमुदामोदवायुना ॥
४५॥
बाहुप्रसारपरिरम्भकरालकोरू -नीवीस्तनालभननर्मनखाग्रपातै: ।
_वेल्यावलोकहसितैव्रजसुन्दरीणा -मुत्तम्भयन्नतिपतिं रमयां चकार ॥
४६॥
नद्या:--नदी के; पुलिनमू--तट पर; आविश्य-- प्रवेश करके; गोपीभि: --गोपियों के साथ; हिम--शीतल; वालुकम्--बालूके द्वारा; जुष्टमू--सेवा की; तत्--उसका; तरल--लहरों से; आनन्दि--आनन्दित बनाया; कुमुद--कमलों की; आमोद--सुगन्ध लिये हुए; वायुना--वायु के द्वारा; बाहु--अपनी भुजाओं का; प्रसार--फैलाना; परिरम्भ--आलिंगन समेत; कर--उनकेहाथों के; अलक--बाल; ऊरु--जाँघें; नीवी--नाभि; स्तन--तथा स्तन; आलभन--स्पर्श से; नर्म--खेल में; नख--अँगुलियोंके नाखूनों की; अग्र-पातैः--चिऊँटी से; क्ष्वेल्या--विनोद, खेलवाड़ से भरी बातचीत; अवलोक--चितवन; हसितैः--तथाहँसी से; ब्रज-सुन्दरीणाम्--वत्रज की सुन्दरियों की; उत्तम्भयन्--उत्तेजित करते हुए; रति-पतिम्--कामदेव को; रमयाम्चकार--आनन्द मनाया
श्रीकृष्ण गोपियों समेत यमुना के किनारे गये जहाँ बालू ठंडी पड़ रही थी और नदी कीतरंगों के स्पर्श से वायु में कमलों की महक थी।
वहाँ कृष्ण ने गोपियों को अपनी बाँहों में समेटलिया और उनका आलिंगन किया।
उन्होंने लावण्यमयी व्रज-बालाओं के हाथ, बाल, जाँवें,नाभि एवं स्तन छू छू कर तथा खेल खेल में अपने नाखूनों से चिकोटते हुए उनके साथ विनोदकरते, उन्हें तिरछी नजर से देखते और उनके साथ हँसते हुए उनमें कामदेव जागृत कर दिया।
इसतरह भगवान् ने अपनी लीलाओं का आनन्द लूटा।
एवं भगवतः कृष्णाल्लब्धमाना महात्मनः ।
आत्मानं मेनिरे स्त्रीणां मानिन््यो हाधिकं भुवि ॥
४७॥
एवम्--इस प्रकार से; भगवत:--भगवान्; कृष्णात्--कृष्ण से; लब्ध--प्राप्त हुई; मानाः--विशेष आदर; महा-आत्मन:--परमात्मा से; आत्मानम्--अपने आपको; मेनिरे--माना; स्त्रीणाम्--स्त्रियों में; मानिन्य:--मानिनी, गर्वित; हि--निस्सन्देह;अधिकम्--सर्वश्रेष्ठ; भुवि--पृथ्वी पर।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण से ऐसा विशेष आदर पाकर गोपियाँ अपने पर गर्वित होउठीं और उनमें से हरएक ने अपने को पृथ्वी की सर्व श्रेष्ठ स्त्री समझा।
तासां तत्सौभगमदं वीक्ष्य मानं च केशव: ।
प्रशमाय प्रसादाय तत्रैवान्तरधीयत ॥
४८॥
तासाम्--उनकी; तत्--वह; सौभग--उनके सौभाग्य के कारण; मदम्--उन्मक्त अवस्था; वीक्ष्य--देखकर; मानमू--मिथ्यागर्व; च--तथा; केशव: -- भगवान् कृष्ण; प्रशमाय--कम करने के लिए; प्रसादाय--कृपा करने के लिए; तत्र एब--वहीं पर;अन्तरधीयत--अन्तर्धान हो गये |
गोपियों को अपने सौभाग्य पर अत्यधिक गर्वित देखकर भगवान् केशव ने उनके इस गर्व सेउबारना चाहा और उनपर और अधिक अनुग्रह करना चाहा।
अतः वे तुरन्त अन्तर्धान हो गये।
