← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय तीस: गोपियाँ कृष्ण की खोज करती हैं
10.30श्रीशुक उबाचअन्तर्हिते भगवति सहसैव ब्रजाड्रना: ।
अतप्यंस्तमचक्षाणा: 'करिण्य इब यूथपम् ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अन्तर्हिते--अन्तर्धान हो जानेपर; भगवति-- भगवान् के; सहसा एव--एकाएक;ब्रज-अड्भना:--ब्रज की युवतियाँ; अतप्यन्--खिन्न हो उठीं; तम्ू--उसको; अचक्षाणा: --न देखकर; करिण्य:--हथिनियाँ;इब--सहश; यूथपम्-- अपने नर नायक को।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भगवान् कृष्ण इस तरह एकाएक विलुप्त हो गये तोगोपियाँ उन्हें न देख सकने के कारण अत्यन्त व्यधित हो उठीं जिस तरह हथिनियों का समूहअपने नर के बिछुड़ जाने पर खिन्न हो उठता है।
गत्यानुरागस्मितविश्रमेक्षितै-मनोरमालापविहारविश्रमै: ।
आश्षिप्तचित्ता: प्रमदा रमापते-स्तास्ता विचेष्टा जगृहुस्तदात्मिका: ॥
२॥
गत्या--उनके हिलने डुलने से; अनुराग--स्नेहमय; स्मित--मन्द हँसी; विभ्रम--क्रीड़ापूर्ण; ईक्षितै:--तथा चितवनों से; मनः-रम--मोहक; आलाप--उनकी बातचीत से; विहार--क्रीड़ा; विभ्रमैः--तथा अन्य आकर्षण से; आक्षिप्त--अभिभूत;चित्ताः:--हृदयों वाली; प्रमदा:--बालिकाएँ; रमा-पतेः--रमा के पति का या सौंदर्य तथा ऐश्वर्य के स्वामी का; ता: ताः--उनमेंसे हरएक; विचेष्टा:--अद्भुत कार्यकलाप; जगृहु:--अनुकरण करने लगी; तत्-आत्मिका:--उनमें लीन होकर
भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करते ही गोपियों के हृदय उनकी चाल-ढाल तथा प्रेममयीमुसकान, उनकी कौतुकपूर्ण चितवन तथा मोहने वाली बातों तथा अपने साथ की जानेवालीअन्य लीलाओं से अभिभूत हो उठे।
इस तरह रमा के स्वामी कृष्ण के विचारों में लीन वे गोपियाँउनकी विविध दिव्य लीलाओं ( चेष्टाओं ) का अनुकरण करने लगीं।
गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषुप्रिया: प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तय: ।
असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिकान्यवेदिषु: कृष्णविहारविभ्रमा: ॥
३॥
गति--उसकी चाल में; स्मित--हँसी; प्रेक्षण--देखने; भाषणा--बातचीत करने; आदिषु--त्यादि में; प्रिया:--प्रिय गोपियाँ;प्रियस्थ--अपने प्रेमी के ; प्रतिरूढ--पूर्णतया लीन; मूर्तव:--उनके शरीर; असौ--वह; अहम्--मैं; तु--वास्तव में ; इति--इसप्रकार कहते हुए; अबला: --स्त्रियों ने; तत्-आत्मिका: --उनके स्वरूप में; न््यवेदिषु:--घोषित किया; कृष्ण-विहार--कृष्ण कीलीलाओं से उत्पन्न; विभ्रमा:--मादकता, नशा।
चूँकि प्रेमप्रिय गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण के विचारों में लीन थीं अतः कृष्ण गोपियों केशरीर के चलने तथा हँसने के ढंग, उनके देखने के ढंग, उनकी वाणी तथा उनके अन्य विलक्षणगुणों का अनुकरण करने लगे।
उनके चिन्तन में गहरी डूबी हुई तथा उनकी लीलाओं का स्मरणकरके उन्मत्त हुई गोपियों ने परस्पर घोषित कर दिया कि 'मैं कृष्ण ही हूँ।
'गायन्त्य उच्चैरमुमेव संहताविचिक्युरुन्मत्तकवद्वनाद्वनम् ।
पप्रच्छुशाकाशवदन्तरं बहि-भूतेषु सन््तं पुरुष वनस्पतीन् ॥
४॥
गायन्त्य:--गाती हुई; उच्चै:--जोर जोर से; अमुम्--उनके विषय में; एब--निस्सन्देह; संहता:--टोली में मिलकर;विचिक्यु:--खोज किया; उन्मत्तक-वत्--पगली स्त्रियों की तरह; वनात् वनम्--एक जंगल से दूसरे जंगल में; पप्रच्छु:--पूछा;आकाश-वत्--आकाश की तरह; अन्तरम्- भीतर से; बहि:ः--तथा बाहर से; भूतेषु--समस्त प्राणियों में; सन््तम्ू--उपस्थित;पुरुषम्--परम पुरुष को; वनस्पतीनू--वृक्षों से
जोर जोर से कृष्ण के बारे में गाती हुई गोपियों ने पगलायी स्त्रियों के झुंड के समान उन्हें वृन्दावन के पूरे जंगल में खोजा।
यहाँ तक कि वृक्षों से भी उन कृष्ण के विषय में पूछताछ कीजो समस्त उत्पन्न वस्तुओं के भीतर तथा बाहर आकाश की भाँति परमात्मा के रूप में उपस्थितहैं।
हृष्टो व: कच्चिदश्चत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मन: ।
नन्दसूनुर्गतो हत्वा प्रेमहासावलोकनै: ॥
५॥
हृष्ट:ः--देखा गया है; वः--तुम्हारे द्वारा; कच्चित्ू-क्या; अश्वत्थ--हे अश्वत्थ ( पवित्र पीपल का वृक्ष ); प्लक्ष--हे प्लक्ष( पाकड़ ); न्यग्रोध--हे न्यग्रोध ( बरगद का पेड़ ); नः--हमारे; मनः--मन; नन्द--नन्द महाराज का; सूनुः--पुत्र; गतः--चलागया है; हत्वा--चुराकर; प्रेम--प्रेममय; हास-- अपनी मुसकान से; अवलोकनै:--तथा चितवन से |
[गोपियों ने कहा : हे अश्रत्थ वृक्ष, हे प्लक्ष, हे न्यग्रोध, क्या तुमने कृष्ण को देखा है ? वहनन्दनन्दन अपनी प्रेमभरी मुस्कान तथा चितवन से हमारे चित्तों को चुराकर चला गया है।
कच्चित्कुर॒बकाशोकनागपुन्नागचम्पका: ।
रामानुजो मानिनीनामितो दर्पहरस्मितः ॥
६॥
'कच्चित्--क्या; कुरबक-अशोक-नाग-पुन्नाग-चम्पका:ः -- हे कुरबक, अशोक, नाग, पुन्नाग तथा चम्बक वृक्षो; राम--बलरामका; अनुज:--छोटा भाई; मानिनीनाम्ू--मान करने वाली स्त्रियों का; इतः--यहाँ से गुजरते हुए; दर्प--घमंड; हर--चूर करनेवाली; स्मित:--हँसी हे कुरबक वृक्ष
हे अशोक, हे नागकेसर, पुन्नाग तथा चम्पक, क्या इस रास्ते से होकरबलराम का छोटा भाई गया है, जिसकी हँसी समस्त अभिमान करनेवाली स्त्रियों के दर्प को हरनेवाली है।
कच्चित्तुलसि कल्याणि गोविन्दचरण प्रिये ।
सह त्वालिकुलैबि भ्रदृष्टस्ते उतिप्रियोउच्युत: ॥
७॥
'कच्चित्--क्या; तुलसि--हे तुलसी वृक्ष; कल्याणि--हे दयामयी; गोविन्द--कृष्ण के; चरण--पाँव; प्रिये--जिन्हें प्रिय हैं;सह--साथ; त्वा--तुम्हारे; अलि--भौंरों के; कुलैः--झुंडों के साथ; बिभ्रत्-ले जाते हुए; दृष्ट: --देखा हुआ; ते--तुम्हारेद्वारा; अति-प्रिय:ः--अत्यन्त प्रिय; अच्युत:-- भगवान् अच्युत |
हे अत्यन्त दयालु तुलसी, तुम्हें तो गोविन्द के चरण इतने प्रिय हैं।
क्या तुमने अपने को[तुलसी पहने और भौरों के झुँड से घिरे हुए उन अच्युत को इधर से जाते हुए देखा है ?
मालत्यदर्शि वः कच्चिन्मल्लिके जातियूधिके ।
प्रीतिं वो जनयन्यात: करस्प्शेन माधव: ॥
८ ॥
मालति--हे मालती ( श्वेत चमेली की किस्म ); अदर्शि--देखा गया; व: --तुम्हारे द्वारा; कच्चित्ू--क्या; मल्लिके--हे मल्लिका( भिन्न प्रकार की चमेली ); जाति--हे जाति ( सफेद चमेली की किस्म ); यूथिके--हे यूथिका ( अन्य चमेली ); प्रीतिम्--प्रीति;वः--तुम्हारे लिए; जनयन्--उत्पन्न करते हुए; यातः--यहाँ से होकर गये हैं; कर--अपने हाथ के; स्पर्शेन--स्पर्श से;माधव:--साक्षात् वसन््त कृष्ण
हे मालती, हे मल्लिका, हे जाति तथा यूथिका, कया माधव तुम सबों को अपने हाथ कास्पर्श-सुख देते हुए इधर से गये हैं?
चूतप्रियालपनसासनकोविदार-जम्ब्वर्कबिल्वबकुलाप्रकदम्बनीपा: ।
येडन्ये परार्थभवका यमुनोपकूला:शंसन्तु कृष्णपदवीं रहितात्मनां न: ॥
९॥
चूत--हे आम की लतर; प्रियाल--हे प्रियाल वृक्ष ( एक तरह का शालवृक्ष ); पनस--हे कटहल के वृक्ष; आसन--हे आसन( पीला शालवृक्ष ); कोविदार--हे कोविदार; जम्बु--हे जामुन; अर्क--हे अर्क ( आक, मदार ); बिल्व--हे बेल; बकुल--हेछुईमुई; आम्र--हे आम के वृक्ष; कदम्ब--हे कदम्ब; नीपा:--हे नीप ( छोटा कदम्ब ); ये--जो; अन्ये--अन्य; पर--दूसरों के;अर्थ--लिए; भवका:--जिनका अस्तित्व; यमुना-उपकूला: --यमुना नदी के तट के पास रहने वाले; शंसन्तु--कृपा करकेबताइये; कृष्ण-पदवीम्--कृष्ण द्वारा अपनाया गया रास्ता; रहित--विहीन; आत्मनाम्--हमारे मनों से; नः--हमको |
हे चूत, हे प्रियाल, हे पनस, हे आसन तथा कोविदार, हे जम्बु, हे अर्क, हे बिल्ब, बकुलतथा आग्र, हे कदम्ब तथा नीप एवं यमुना के तट के समीप स्थित अन्य सारे पौधो और वृश्षो,अन्यों के उपकार के लिए अपना जीवन अर्पित करने वालो, हम गोपियों के मन चुरा लिये गये हैंअतः कृपा करके हमें बतलायें कि कृष्ण गये कहाँ हैं।
कि ते कृतं क्षिति तपो बत केशवाडूप्रि-स्पर्शोत्सवोत्पुलकिताडुनहैर्विभासि ।
अप्यड्प्रिसम्भव उरुक्रमविक्रमाद्दाआहो वराहवपुष: परिरम्भणेन ॥
१०॥
किमू--क्या; ते--तुम्हारे द्वारा; कृतम्ू--की गयी; क्षिति--हे पृथ्वी; तप:ः--तपस्या; बत--निस्सन्देह; केशव-- भगवान् कृष्णके; अद्ध्नि--पैर द्वारा; स्पर्श--स्पर्श किये जाने से; उत्सब--प्रसन्नता का अनुभव होने से; उत्पुलकित--हर्ष से रोमांचित; अड्ढ-रुहैः--अपने शरीर के रोमों से ( जो तुम पर उगी घासें तथा वृक्ष हैं ) विभासि--सुन्दर लगती हो; अपि--शायद; अड्प्रि--पाँवसे ( कृष्ण के पाँव से ); सम्भव:--उत्पन्न; उरुक़़म--कृष्ण के वामन अवतार, वामनदेव के ; विक्रमात्--चलने से; वा--अथवा; आह उ--या फिर अन्य; वराह-- भगवान् कृष्ण के वराह अवतार के; वपुष: --शरीर द्वारा; परिरम्भणेन--आलिंगन केकारण।
हे माता पृथ्वी, आपने भगवान् केशव के चरणकमलों का स्पर्श पाने के लिए ऐसी कौन सीतपस्या की है, जिससे उत्पन्न परम आनन्द से आपके शरीर में रोमांच हो आया है ? इस अवस्था मेंआप अतीव सुन्दर लग रही हैं।
क्या भगवान् के इसी प्राकट्य के समय आपको ये भाव-लक्षणप्राप्त हुए हैं या फिर और पहले जब उन्होंने आप पर वामनदेव के रूप में अपने पाँव रखे थे याइससे भी पूर्व जब उन्होंने वराहदेव के रूप में आपका आलिंगन किया था?
अप्येणपत्युपगतः प्रिययेह गात्रै-स्तन्वन्दशां सख्त सुनिर्वृतिमच्युतो वः ।
कान्ताइसड्कुचकुद्डु मरखिताया:कुन्दसत्रज: कुलपतेरिह वाति गन्ध: ॥
११॥
अपि--क्या; एण--हिरण की; पत्नि--हे पत्नी; उपगतः--भेंट हुई है; प्रियया--अपनी प्रिया के साथ; इह--यहाँ; गात्रै:--अपने अंगों के द्वारा; तन्वन्--उत्पन्न करते; दहशाम्-- आँखों का; सखि--हे सखी; सु-निर्वृतिमू--परम आनन्द; अच्युत:--अच्युत कृष्ण; व: --तुम्हारा; कान्ता--अपनी सहेली का; अड्ड-सड्ड--अंग स्पर्श के कारण; कुच--स्तन पर; कुल्ढु म-सिन्दूरसे; रक्जिताया:--रँगा हुआ; कुन्द--चमेली फूल की; स्त्रज:--माला का; कुल--समूह ( गोपियों के ) के; पतेः--स्वामी का;इह--यहाँ आसपास; वाति--बह रही है; गन्ध:--सुगन्ध |
हे सखी हिरनी, कया तुम्हारी आँखों को परमानन्द प्रदान करने वाले भगवान् अच्युत अपनीप्रिया समेत इधर आये थे ? दरअसल इस ओर कुन्द फूलों से बनी उनकी उस माला की महक आरही है, जो उनके द्वारा आलिंगित उनकी प्रिया सखी के स्तनों पर लगे कुंकुम से लेपित थी।
बाहुं प्रियांस उपधाय गृहीतपद्मोरामानुजस्तुलसिकालिकुलैमदान्थ: ।
अन्वीयमान इह वस्तरवः प्रणामकि वाभिनन्दति चरन्प्रणयावलोकैः ॥
१२॥
बाहुमू--अपनी भुजा; प्रिया-- अपनी प्रिया के; अंसे--कंधे पर; उपधाय--रखकर; गृहीत--पकड़े हुए; पद्म:--कमल; राम-अनुज:--बलराम के छोटे भाई, कृष्ण; तुलसिका--तुलसी मज्जरियों के चारों ओर मँडराते; अलि-कुलैः--अनेक भौंरों से;मद--नशे से; अन्धैः--अन्धे; अन्वीयमान:--पीछा किये जाते; इह--यहाँ; व: --तुम्हारे; तरव:-हे वृक्षों; प्रणामम्--झुकना,नत होना; किम् वा--अथवा; अभिनन्दति--स्वीकार किया; चरन्--विचरण करते हुए; प्रणब--प्रेम से पूरित; अवलोकै:--अपनी चितवन से |
हे वृक्षो, हम देख रही हैं कि तुम झुक रहे हो।
क्या जब राम के छोटे भाई इधर से गये जिनके पीछे-पीछे गले में सुशोभित तुलसी मंजरी की माला के चारों ओर उन्मत्त भौरे मँडरा रहेथे तो उन्होंने अपनी स्नेहपूर्ण चितवन से तुम्हारे प्रणाम को स्वीकार किया था? वे अपनी बाँहअवश्य ही अपनी प्रिया के कंधे पर रखे रहे होंगे और अपने खाली हाथ में कमल का फूल लियेरहे होंगे।
पृच्छतेमा लता बाहूनप्याश्लिष्टा वनस्पते: ।
नूनं तत्करजस्पृष्टा बिश्रत्युत्पुलकान्यहो ॥
१३॥
पृच्छत--जरा पूछो; इमा:--इन; लता:--लताओं से; बाहूनू--बाँहें ( टहनियाँ ); अपि--यद्यपि; आश्लिष्टाः--आलिंगन करतीहुईं; बनस्पते:--वृक्ष का; नूनमू--निश्चय ही; तत्--उसका, कृष्ण के; कर-ज--हाथ के नाखूनों से; स्पृष्टा:--स्पर्श कियाहुआ; बिभ्रति-- धारण करती है; उत्पुलकानि--चमड़ी पर प्रसन्नता के फफोले; अहो--जरा देखो।
चलो इन लताओं से कृष्ण के विषय में पूछा जाय।
यद्यपि वे अपने पति रूप इस वृक्ष कीबाँहों का आलिंगन कर रही हैं किन्तु अवश्य ही कृष्ण ने अपने नाखूनों से इनका स्पर्श कियाहोगा क्योंकि प्रसन्नता के मारे इनकी त्वचा पर फफोले प्रकट हो रहे हैं।
इत्युन्मत्तवचो गोप्य: कृष्णान्वेषणकातरा: ।
लीला भगवतस्तास्ता हानुचक्रुस्तदात्मिकाः ॥
१४॥
इति--इस प्रकार; उन्मत्त--पगलाई; वचः--शब्द बोलती हुई; गोप्य:--गोपियाँ; कृष्ण-अन्वेषण--कृष्ण की खोज करते हुए;'कातराः--किंकर्तव्यविमूढ़; लीला: --दिव्य लीलाएँ; भगवतः -- भगवान् की; ता: ताः--उनमें से प्रत्येक को; हि--निस्सन्देह;अनुचक्रुः:--अनुकरण किया; तत्-आत्मिका: --उनके विचारों में लीन होकर।
ये शब्द कहने के बाद कृष्ण को खोजते खोजते किंकर्तव्यविमूढ़ हुई गोपियाँ उनके विचारोंमें पूर्णतया लीन होकर उनकी विविध लीलाओं का अनुकरण करने लगीं।
कस्याचित्पूतनायन्त्या: कृष्णायन्त्यपिबत्स्तनम् ।
तोकयित्वा रुदत्यन्या पदाहन्शकटायतीम् ॥
१५॥
कस्याचित्--गोपियों में से एक ने; पूतनायन्त्या:--जो पूतना बनी थी; कृष्णायन्ती--दूसरी जो कृष्ण बनी थी; अपिबत्--पिया;स्तनम्ू--स्तन को; तोकयित्वा--शिशु बनकर; रुदती--चिल्लाती; अन्या--दूसरी ने; पदा--अपने पाँव से; अहनू--मारा;शकटा-यतीम्--जो गाड़ी बनी थी |
एक गोपी ने पूतना की नकल उतारी जबकि दूसरी बालक कृष्ण बन गई और वह पहलेवाली का स्तनपान करने लगी।
अन्य गोपी ने शिशु कृष्ण के रोदन का अनुकरण करते हुए उसगोपी पर पाद-प्रहार किया जो शकटासुर की भूमिका निभा रही थी।
दैत्यायित्वा जहारान्यामेको कृष्णार्भभावनाम् ।
रिड्रयामास काप्यड्य्री कर्षन्ती घोषनि:स्वने: ॥
१६॥
दैत्यायित्वा--असुर ( तृणावर्त ) बनकर; जहार--उठा ले गई; अन्याम्--दूसरी गोपी को; एका--एक गोपी; कृष्ण-अर्भ--बालक कृष्ण का; भावनाम्-- भाव धारण करने वाली; रिड्रयाम् आस-रेंगने लगी; का अपि--उनमें से एक; अद््री --उसकेदो पाँव; कर्षन्ती--घसीटती हुई; घोष--पायजेब का; निःस्वनैः --शब्द करती |
एक गोपी तृणावर्त बन गई और वह दूसरी गोपी को जो बालक कृष्ण बनी थी दूर ले गईजबकि एक अन्य गोपी रेंगने लगी जिससे उसके पाँव घसीटते समय पायजेब बजने लगी।
कृष्णरामायिते द्वे तु गोपायन्त्यश्च काश्चन ।
वत्सायतीं हन्ति चान्या तत्रैका तु बकायतीम् ॥
१७॥
कृष्ण-रामायिते--कृष्ण तथा बलराम बनकर; द्वे--दो गोपियाँ; तु--तथा; गोपायन्त्य:--ग्वालबालों की तरह बनकर; च--तथा; काश्चन--किसी ने; वत्सायतीम्--वत्सासुर बनकर; हन्ति--मारा; च--तथा; अन्या--दूसरी; तत्र--वहाँ; एका--एक;तु--और भी; बकायतीम्--बकासुर का अभिनय करने वाली |
दो गोपियाँ उन तमाम गोपियों के बीच राम तथा कृष्ण बन गईं जो ग्वालबालों का अभिनयकर रही थीं।
एक गोपी ने कृष्ण द्वारा राक्षस वत्सासुर के वध का अनुकरण किया जिसमें दूसरीगोपी वत्सासुर बनी थी।
गोपियों के एक जोड़े ने बकासुर-वध का अभिनय किया।
आहूय दूरगा यद्वत्कृष्णस्तमनुवर्ततीम् ।
वेणुं क््वणन्तीं क्रीडन्तीमन्या: शंसन्ति साध्विति ॥
१८॥
आहूय--बुलाकर; दूर--दूरी पर स्थित; गा:--गौवों को; यद्वत्ू--जिस तरह; कृष्ण:--कृष्ण; तम्--उसको; अनुवर्ततीम्--अनुकरण करने वाली गोपी को; वेणुम्--वंशी; क्वणन्तीम्--शब्द करती; क्रीडन्तीम्ू--खेल खेलती; अन्या: --दूसरी गोपियोंने; शंसन्ति-- प्रशंसा की; साधु इति--' बहुत अच्छा! '!
जब एक गोपी ने पूरी तरह अनुकरण कर दिखाया कि कृष्ण किस तरह दूर विचरण करतीगौवों को बुलाते थे, वे किस तरह वंशी बजाते थे और वे किस तरह विविध खेलों में लगे रहतेथे तो अन्यों ने बहुत खूब, बहुत खूब, ( वाह वाह ) चिल्लाकर बधाई दी।
कस्याज्ित्स्वभुजं न्यस्यचलनन््त्याहापरा ननु ।
कृष्णोहं पश्यत गतिललितामिति तन्मना: ॥
१९॥
कस्याश्चित्--उनमें से एक की; स्व-भुजम्--अपनी बाँह; न्यस्य--( कंधे पर ) रखकर; चलन्ती--चलती हुई; आह--बोली;अपरा--दूसरी; ननु--निस्सन्देह; कृष्ण:--कृष्ण; अहमू--मैं हूँ; पश्यत--जरा देखो; गतिमू--मेरी चाल; ललिताम्--मनोहर;इति--इन शब्दों के साथ; तत्--उनमें; मना:--पूर्णतया लीन मन से |
एक अन्य गोपी अपने मन को कृष्ण में स्थिर किये अपनी बाँह को दूसरी सखी के कन्धे परटिकाये चलने लगी और बोली 'मैं कृष्ण हूँ।
जरा देखो तो मैं कितनी शान से चल रही हूँ।
मा भेष्ट वातवर्षाभ्यां तत्लाणं विहितं मय ।
इत्युक्व्वैकेन हस्तेन यतन्त्युन्निदधेम्बरम् ॥
२०॥
मा भैष्ट--मत डरो; वात--हवा, अंधड़; वर्षाभ्यामू--तथा वर्षा से; तत्--उससे; त्राणम्--तुम्हारा उद्धार; विहितम्ू--नियोजितकिया जा चुका है; मया--मेरे द्वारा; इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; एकेन--एक; हस्तेन--हाथ से; यतन्ती-- प्रयत्नकरती; उन्निदधे--उठा लिया; अम्बरम्--अपना वस्त्र।
,एक गोपी ने कहा : 'ऑआँधी-वर्षा से मत डरो।
' मैं तुम्हारी रक्षा करूंगी।
' यह कहकरउसने अपना दुपट्टा अपने सिर के ऊपर उठा लिया।
आरुह्नैका पदाक्रम्य शिरस्याहापरां नूप ।
दुष्टाहे गच्छ जातोहं खलानाम्ननु दण्डकृत् ॥
२१॥
आरुह्म--ऊपर उठा कर; एका--एक गोपी; पदा--अपने पाँव से; आक्रम्य--ऊपर चढ़कर; शिरसि--सिर पर; आह--बोली;अपराम्--दूसरी से; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); दुष्ट--दुष्ट; अहे--अरे साँप; गच्छ--चले जाओ; जात:ः--जन्मा; अहम्-मैं;खलानामू--ईर्ष्यालुओं का; ननु--निस्सन्देह; दण्ड--दण्ड; कृत्--लगाने वाला
शुकदेव गोस्वामी ने कहा हे राजनू, एक गोपी दूसरी के कन्धे पर चढ़ गई और अपनापाँव एक अन्य गोपी के सिर पर रखती हुई बोली रे दुष्ट सर्प, यहाँ से चले जाओ, तुम जान लोकि मैंने इस जगत में दुष्टों को दण्ड देने के लिए ही जन्म लिया है।
'तत्रैकोबाच हे गोपा दावारगिनि पश्यतोल्बणम् ।
चश्षुंष्या श्रपिद॒ध्वं वो विधास्थे क्षेममज्खसा ॥
२२॥
तत्र--वहाँ; एका--उनमें से एक; उवाच--बोली; हे गोपा:--अरे ग्वालबालो; दाव-अग्निमू--जंगल की आग को; पश्यत--देखो; उल्बणम्-- भयानक; चक्षूंषि-- अपनी आँखें; आशु--तुरन््त, जल्दी से; अपिदध्वम्--बन्द करो; वः--तुम्हारा;विधास्थे--बन्दोबस्त करूँगी; क्षेमम्--सुरक्षा का; अज्लआ--आसानी से
तब एक दूसरी गोपी बोल पड़ी, मेरे प्रिय ग्वालबालो, जंगल में लगी इस आग को तो देखो,तुरन्त अपनी आँखें मूँद लो।
मैं आसानी से तुम्हारी रक्षा करूँगी।
बद्धान्यया स्त्रजा काचित्तन्वी तत्र उलूखले ।
बध्नामि भाण्डभेत्तारं हैयड्भवमुषं त्विति ।
भीता सुहक्पिधायास्यं भेजे भीतिविडम्बनम् ॥
२३॥
बद्धा--बाँधी गई; अन्यया--दूसरी गोपी द्वारा; सत्रजा--फूल की माला से; काचित्--एक गोपी; तन्वी--छरहरी; तत्र--वहाँ;उलूखले--ओखली से; बध्नामि--बाँध रही हूँ; भाण्ड--घड़ों के; भेत्तारम्--तोड़ने वाले को; हैयम्-गब--पिछले दिन के दूधसे बचे मक्खन का; मुषम्--चोर; तु--निस्सन्देह; इति--इस प्रकार कहते हुए; भीता-- भयभीत; सु-हक्--सुन्दर आँखों वाली;पिधाय--ढककर; आस्यम्--अपना मुँह; भेजे--बना लिया; भीति--डर का; विडम्बनम्ू--बहाना |
एक गोपी ने अपनी एक छरहरी सी सखी को फूलों की माला से बाँध दिया और कहा,'अब मैं इस बालक को बाँध दूँगी जिसने मक्खन की हँडिया तोड़ दी है और मक्खन चुरालिया है।
' तब दूसरी गोपी अपना मुँह तथा सुन्दर आँखें अपने हाथ से ढक कर भयभीत होनेकी नकल करने लगी।
एवं कृष्णं पृच्छमाना गण्दावनलतास्तरून् ।
व्यचक्षत वनोद्देशे पदानि परमात्मन: ॥
२४॥
एवम्--इस प्रकार से; कृष्णम्--कृष्ण के विषय में; पृच्छमाना: --पूछती हुईं; वृन्दावन--वृन्दावन जंगल की; लता:--लताओंसे; तरून्ू--तथा वृक्षों से; व्यचक्षत--उन्होंने देखा; वन--जंगल के; उद्देशे--एक स्थान पर; पदानि--पाँवों के चिह्न; परम-आत्मन:--परमात्मा के
जब गोपियाँ इस तरह कृष्ण की लीलाओं की नकल कर उतार रही थीं और वृन्दावन कीलताओं तथा वृक्षों से पूछ रही थीं कि भगवान् कृष्ण कहाँ हो सकते हैं, तो उन्हें जंगल के एककोने में उनके पदचिन्ह दिख गये।
पदानि व्यक्तमेतानि नन्दसूनोर्महात्मनः ।
लक्ष्यन्ते हि ध्वजाम्भोजवज़ाडु शयवादिभि: ॥
२५॥
पदानि--पदचिदह्न; व्यक्तम्-स्पष्टत:; एतानि--ये; नन्द-सूनो:--ननन््द महाराज के पुत्र के; महा-आत्मन: --महात्मा; लक्ष्यन्ते--निश्चित रूप से हैं; हि--निस्सन्देह; ध्वज--पताका; अम्भोज--कमल; वज्ञ--वज्; अह्ढु श--हाथी हाँकने का अंकुश; यव-आदिभि:--जौ की बाली इत्यादि।
गोपियों ने कहा : इन पदचिन््हों में ध्वजा, कमल, वज्, अंकुश, जौ की बाली इत्यादि केचिन्ह स्पष्ट बतलाते हैं कि ये नन्द महाराज के पुत्र उसी महान आत्मा ( कृष्ण ) के हैं।
तैस्तेः पदैस्तत्पदवीमन्विच्छन्त्योग्रतो 'बला: ।
वध्वा: पद: सुपृक्तानि विलोक्यार्ता: समब्रुवन् ॥
२६॥
तैः तैः--उन उन; पदैः--चरणचित्ों के द्वारा; तत्--उसके; पदवीम्--मार्ग को; अन्विच्छन्त्य:--ढूँढ़ती हुई; अग्रतः--आगे कीओर; अबला:--बालाएँ; वध्वा:--उनकी विशेष प्रिया को; पदैः--चरणचिद्नों के साथ; सुपृक्तानि--पूरी तरह से मिले हुए;विलोक्य--देखकर; आर्ता:--दुखी; समब्रुवन्--बोलीं |
गोपियाँ श्रीकृष्ण के अनेक पदचिन्हों से प्रदर्शित उनके मार्ग का अनुमान करने लगीं, किन्तुजब उन्होंने देखा कि ये चिन्ह उनकी प्रियतमा के चरणचिन्हों से मिल-जुल गये हैं, तो वेव्याकुल हो उठीं और इस प्रकार कहने लगीं।
'कस्या: पदानि चैतानि याताया नन्दसूनुना ।
अंसन्यस्तप्रकोष्ठाया: करेणो: करिणा यथा ॥
२७॥
कस्या:--किसी एक गोपी के; पदानि--चरणचिह्न; च-- भी; एतानि--ये; याताया: --जो जा रही थी; नन्द-सूनुना--नन्दमहाराज के पुत्र के साथ साथ; अंस--जिसके कंधे पर; न्यस्त--रखा हुआ; प्रकोष्ठाया:--उनका हाथ; करेणो:--हथिनी के;करिणा--हाथी द्वारा; यथा--जिस तरह
गोपियों ने कहा : यहाँ पर हमें किसी गोपी के चरणचिन्ह दिख रहे हैं, जो अवश्य हीनन्द महाराज के पुत्र के साथ साथ चल रही होगी।
उन्होंने उसके कंधे पर अपना हाथ उसी तरहरखा होगा जिस तरह एक हाथी अपनी सूँड़ अपनी सहगामिनी हथिनी के कंधे पर रख देता है।
अनयाराधितो नूनं भगवान्हरिरी श्वर: ।
यन्नो विहाय गोविन्द: प्रीतो यामनयद्रह: ॥
२८ ॥
अनया--उसके द्वारा; आराधित:--भलीभाँति पूजित; नूनम्--निश्चय ही; भगवान्-- भगवान्; हरिः--कृष्ण; ईश्वर:--परमनियन्ता; यत्--इतना कि; न:--हमको; विहाय--त्यागकर; गोविन्द:-- भगवान् गोविन्द; प्रीत:--प्रसन्न; यामू--जिसको;अनयतू--ले गये; रह:--एकान्त स्थान में |
इस विशिष्ट गोपी ने निश्चित ही सर्वशक्तिमान भगवान् गोविन्द की पूरी तरह पूजा की होगीक्योंकि वे उससे इतने प्रसन्न हो गये कि उन्होंने हम सबों को छोड़ दिया और उसे एकान्त स्थान मेंले आये।
धन्या अहो अमी आल्यो गोविन्दाड्प्र्यब्जरेणव: ।
यान्ब्रहोशौ रमा देवी दधुर्मूथ्न्यघनुत्तये ॥
२९॥
धन्या:--पवित्र हो गईं; अहो--ओह; अमी --ये; आल्य: --हे गोपियो; गोविन्द--गोविन्द के; अड्धप्रि-अब्ज--चरणकमलों के;रेणवः--धूल कण; यान्--जो; ब्रह्म --ब्रह्मा; ईशौ--तथा शिवजी; रमा देवी-- भगवान् विष्णु की पत्नी, रमा देवी; दधु:--धारण करते हैं; मूर्थिनि--अपने शिरों पर; अध--उनके पापों का; नुत्तये--दूर करने के लिए।
हे बालाओ, गोविन्द के चरणों की धूल इतनी पवित्र है कि ब्रह्म, शिव तथा रमादेवी भीअपने पापों को दूर करने के लिए उस धूल को अपने सिरों पर धारण करते हैं।
तस्या अमूनि नः क्षोभ॑ कुर्वनत्युच्चै: पदानि यत्यैकापहत्य गोपीनाग्रहो भुन्कतेडच्युताधरम् ।
न लक्ष्यन्ते पदान्यत्र तस्या नून॑ तृणाडु रे:खिलद्यत्सुजाताड्प्रितलामुन्निन्ये प्रेयससीं प्रियः ॥
३० ॥
तस्या:--उसके; अमूनि--ये; नः--हमारे लिए; क्षोभम्--खेद; कुर्वन्ति-- उत्पन्न करते हैं; उच्चै:-- अत्यधिक; पदानि--चरणचिह्न; यत्-- क्योंकि; या--जो; एका-- अकेले; अपहृत्य--एक तरफ ले जाकर; गोपीनाम्--समस्त गोपियों का; रह:--एकान्त में; भुड़े --भोग करती है; अच्युत--कृष्ण के; अधरम्--होंठों का; न लक्ष्यन्ते--नहीं दिखते; पदानि--पाँव; अत्र--यहाँ; तस्याः--उसके ; नूनम्--निश्चय ही; तृण--घास; अह्ुरैः --तथा उगते हुए कललों द्वारा; खिद्यत्--पीड़ा होने से; सुजात--कोमल; अड्प्रि--पाँव; तलाम्--तलुवे; उन्निन्ये--ऊपर उठा लिया; प्रेयसीम्--अपनी प्रिया को; प्रियः--उसके प्रियतम कृष्णने
उस विशिष्ट गोपी के ये चरणचिन्ह हमें अत्यधिक विचलित कर रहे हैं।
समस्त गोपियों में सेकेवल वही एकान्त स्थान में ले जाई गई जहाँ वह कृष्ण के अधरों का पान कर रही है।
देखो न,हमें यहाँ पर उसके पदचिन्ह नहीं दिख रहे।
स्पष्ट है कि घास तथा कुश उसके पाँवों के कोमलतलुबों को कष्ट पहुँचा रहे होंगे अतः प्रेमी ने अपनी प्रेयसी को उठा लिया होगा।
इमान्यधिकमग्नानि पदानि वहतो वधूम् ।
गोप्यः पश्यत कृष्णस्थ भाराक्रान्तस्थ कामिन: ।
अत्रावरोपिता कान्ता पुष्पहेतोर्महात्मना ॥
३१॥
इमानि--ये; अधिक--अधिक; मग्नानि--मिले-जुले; पदानि--पदचिह्नों को; वहतः--ले जाने वाले के; वधूम्-- अपनी प्रेयसीको; गोप्य:--हे गोपियो; पश्यत--जरा देखो; कृष्णस्य--कृष्ण के; भार--बोझ से; आक्रान्तस्थ--पीड़ित; कामिन:--कामी;अत्र--इस स्थान में; अवरोपिता--नीचे रखी गई; कान्ता--प्रेमिका; पुष्प--फूलों ( के चुनने ) के; हेतो:--लिए; महा-आत्मना--अत्यन्त चतुर द्वारा
मेरी प्यारी गोपियो, जरा देखो न, किस तरह इस स्थान पर कामी कृष्ण के पदचिन्ह पृथ्वी मेंगहरे धँसे हुए हैं।
अपनी प्रियतमा के भार को वहन करना अवश्य ही उनके लिए कठिन हो रहाहोगा।
और यहाँ पर तो उस चतुर छोरे ने कुछ फूल चुनने के लिए उसे नीचे रख दिया होगा।
अत्न प्रसूनावचय: प्रियार्थे प्रेयसा कृत: ।
प्रपदाक्रमण एते पश्यतासकले पदे ॥
३२॥
अतन्र--यहाँ; प्रसून--फूलों का; अवचय:--चुना जाना; प्रिया-अर्थे--अपनी प्रिया के लिए; प्रेयसा--प्रेमी कृष्ण द्वारा; कृत: --किया गया; प्रपद--पैर का अगला हिस्सा ( पंजा ); आक्रमणे-- धँसने से; एते--ये; पश्यत--जरा देखो; असकले--अपूर्ण ;पदे--पदचिह्नों की जोड़ी ।
जरा देखो न, किस तरह प्रिय कृष्ण ने यहाँ पर अपनी प्रिया के लिए फूल चुने हैं।
यहाँउनके पाँव के अगले हिस्से ( पंजे ) का ही निशान पड़ा हुआ है क्योंकि फूलों तक पहुँचने केलिए वे अपने पंजों के बल खड़े हुये थे।
केशप्रसाधन त्वत्र कामिन्या: कामिना कृतम् ।
तानि चूडयता कान्तामुपविष्टमिह श्रुवम् ॥
३३॥
केश--अपने बालों के; प्रसाधनम्--गूँथने या सँवारने के लिए; तु--यही नहीं; अत्र--यहाँ; कामिन्या:--कामुक लड़की का;कामिना--कामी लड़के द्वारा; कृतम्--किया गया; तानि--उन ( फूलों ) से; चूडयता--जूड़ा बनाने वाले के द्वारा; कान्ताम्--अपनी प्रिया को; उपविष्टम्--बैठाया; इह--यहाँ; ध्रुवम्--निश्चित रूप से
कृष्ण यहाँ पर निश्चित रूप से अपनी प्रेयसी के साथ उसके केश सँवारने के लिए बैठे थे।
उस कामी लड़के ने उस कामुक लड़की के लिए उन फूलों से जूड़ा बनाया होगा, जिसे उसनेएकत्र किया था।
रैमे तया चात्मरत आत्मारामोप्यखण्डित: ।
कामिनां दर्शयन्दैन्यं सत्रीणां चैव दुरात्मताम् ॥
३४॥
रेमे--आनन्द लूटा; तया--उसके साथ; च--तथा; आत्म-रत:-- अपने में ही आनन्द लेने वाले; आत्म-आराम:ः--आत्मतुष्ट;अपि--यद्यपि; अखण्डित:--कभी अपूर्ण न रहने वाले; कामिनाम्--सामान्य विलासी पुरुषों का; दर्शयन्--दिखलाते हुए;दैन्यमू--दीनावस्था; स्त्रीणाम्ू--सामान्य स्त्रियों की; च एव--भी; दुरात्मताम्ू--निष्ठरता |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा भगवान् कृष्ण ने उस गोपी के साथ भोग-विलास कियायद्यपि वे अपने आप में तुष्ट रहने तथा पूर्ण होने के कारण केवल भीतर ही भीतर आनन्दमग्नहोते हैं।
इस तरह विराधोभास के द्वारा उन्होंने सामान्य कामी पुरुषों एवं निष्ठर स्त्रियों की दुष्टता का प्रदर्शन किया।
इत्येवं दर्शयन्त्यस्ताश्वेरुगोप्यो विचेतस: ।
यां गोपीमनयत्कृष्णो विहायान्या: स्त्रियो वने ॥
३५॥
सा च मेने तदात्मानं वरिष्ठ सर्वयोषिताम् ।
हित्वा गोपी: कामयाना मामसौ भजते प्रिय: ॥
३६॥
इति--इस प्रकार; एवम्--इस विधि से; दर्शयन्त्यः--दिखलाती हुई; ताः--वे; चेरु:--घूमती रहीं; गोप्य:--गोपियाँ;विचेतसः--पूर्णतया भ्रमित; यामू--जिस; गोपीम्--गोपी को; अनयत्--ले गये; कृष्ण: -- भगवान् कृष्ण; विहाय--छोड़कर;अन्या:--दूसरी; स्त्रिय: --स्त्रियों को; बने--जंगल में; सा--उसने; च-- भी; मेने--सोचा; तदा--तब; आत्मानम्-- अपनेआपको; वरिष्ठम्-- श्रेष्ठ; सर्व--सभी; योषिताम्--स्त्रियों में; हित्वा--त्यागकर; गोपी: --गोपियों को; काम-याना: --कामेच्छासे वशीभूत; माम्--मुझको; असौ--वह; भजते--मानता है; प्रिय: --प्रिया, प्रेमिका ।
जब गोपियाँ पूर्णतया भ्रमित मनों से घूम रही थीं तो उन्होंने कृष्ण लीलाओं के विविध चिन्हों की ओर संकेत किया।
वह विशिष्ट गोपी जिसे कृष्ण अन्य युवतियों को त्यागकर एकान्त जंगलमें ले गये थे, अपने को सर्वश्रेष्ठ स्त्री समझने लगी।
उसने सोचा, ' मेरे प्रियतम ने उन अन्य समस्तगोपियों का तिरस्कार कर दिया है यद्यपि वे साक्षात् कामदेव के वशीभूत हैं।
उन्होंने केवल मेरेही साथ प्रेम करने का चुनाव किया है।
'ततो गत्वा वनोद्देशं हप्ता केशवमब्रवीत् ।
न पारयेहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ॥
३७॥
ततः--तब; गत्वा--जाकर; वन--जंगल के; उद्देशम्--एक कोने में; हप्ता--गर्वित होकर; केशवम्--कृष्ण से; अब्रवीत्--बोली; न पारये--समर्थ नहीं हूँ; अहम्--मैं; चलितुमू--चल पाने के लिए; नय--ले चलो; माम्--मुझको ; यत्र--जहाँ; ते--तुम्हारा; मनः--मन
जब दोनों प्रेमी वृन्दावन जंगल के एक भाग से जा रहे थे तो विशिष्ट गोपी को अपने ऊपरगर्व हो आया।
उसने भगवान् केशव से कहा, अब मुझसे और नहीं चला जाता।
आप जहाँ भीजाना चाहें मुझे उठाकर ले चलें।
एवमुक्त: प्रियामाह स्कन्ध आरुह्मतामिति ।
ततश्चान्तर्दधे कृष्ण: सा वधूरन्व॒तप्यत ॥
३८॥
एवम्--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; प्रियाम्--अपनी प्रिया को; आह--कहा; स्कन्धे--मेरे कन्धे पर; आरुह्मताम्--चढ़ लो;इति--ये शब्द; ततः--तब; च--तथा; अन्तर्दधे--वे अन्तर्धान हो गये; कृष्ण: -- श्रीकृष्ण; सा--वह; वधू:--उनकी प्रिया;अन्वतप्यत--व्याकुल हो गई
ऐसा कहे जाने पर भगवान् कृष्ण ने उत्तर दिया 'मेरे कन्धे पर चढ़ जाओ।
किन्तु यहकहते ही वे विलुप्त हो गये।
उनकी प्रिया को तब अत्यधिक क्लेश हुआ।
हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज ।
दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥
३९॥
हा--हे; नाथ-- स्वामी; रमण- प्रेमी; प्रेष्ठ--प्रियतम; क्व असि क्व असि--तुम कहाँ हो, तुम कहाँ हो; महा-भुज--हे बलिष्ठभुजाओं वाले; दास्या:--दासी के प्रति; ते--तुम्हारी; कृपणाया: --दीन; मे--मुझको; सखे--हे मित्र; दर्शय--दिखलाइये;सन्निधिम्--उपस्थिति।
वह चिल्ला उठी: हे स्वामी, हे प्रेमी, हे प्रियतम, तुम कहाँ हो? तुम कहाँ हो? हे बलिष्ठभुजाओं वाले, हे मित्र, अपनी दासी बेचारी को अपना दर्शन दो।
श्रीशुक उबाचअन्विच्छन्त्यो भगवतो मार्ग गोप्योविदूरितः ।
दहशुः प्रियविश्लेषान्मोहितां दु:खितां सखीम् ॥
४०॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अन्विच्छन्त्यः 'ड़ूँढ़ती हुईं; भगवतः-- भगवान् का; मार्गम्-रास्ता;गोपष्य:--गोपियों ने; अविदूरित:--दूर नहीं, पास ही; दहशु:--देखा; प्रिय--अपने प्रेमी से; विश्लेषात्--बिछुड़ने के कारण;मोहिताम्--मोह ग्रस्त; दु:खिताम्--दुखी; सखीम्--अपनी सखी को |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कृष्ण के रास्ते को खोजती हुई गोपियों ने अपनी दुखी सखीको पास में ही ढूँढ़ निकाला।
वह अपने प्रेमी के विछोह से मोहग्रस्त थी।
तया कथितमाकर्णय्य मानप्राप्ति च माधवात् ।
अवमानं च दौरात्म्याद्विस्मयं परमं ययु: ॥
४१॥
तया--उसके द्वारा; कथितम्--जो कुछ कहा गया; आकर्णर्य --सुनकर; मान--आदर की; प्राप्तिम्ू--प्राप्ति; च--तथा;माधवात्--कृष्ण से; अवमानम्--अनादर; च--भी; दौरात्म्यात्-- अपने दुर्व्यवहार से; विस्मयम्--विस्मय; परमम्--अत्यधिक; ययु:--अनुभव किया।
उसने उन्हें बताया कि माधव ने उसको कितना आदर ( मान ) प्रदान किया था किन्तु अबउसे अपने दुर्व्यवहार के कारण अनादर झेलना पड़ा।
गोपियाँ यह सुनकर अत्यन्त विस्मित थीं।
ततोविशन्वनं चन्द्र ज्योत्स्ना यावद्विभाव्यते ।
तम:प्रविष्टमालक्ष्य ततो निववृतु: स्त्रियः ॥
४२॥
ततः--तब; अविशनू-प्रविष्ट हुईं; वनम्--जंगल में; चन्द्र--चन्द्रमा की; ज्योत्स्ना--चाँदनी; यावत्--जहाँ तक; विभाव्यते--इृष्टिगोचर थी; तम:--अँधेरा; प्रविष्टमू-- प्रवेश किया हुआ; आलक्ष्य--देखकर; ततः--तत्पश्चात्; निववृतु:--विरत हो गईं;स्त्रियः--स्त्रियाँ
तत्पश्चात् गोपियाँ कृष्ण की खोज में जंगल के भीतर उतनी दूर तक गईं जहाँ तक चन्द्रमाकी चाँदनी थी।
किन्तु जब उन्होंने अपने को अंधकार से घिरता देखा तो उन्होंने लौट आने कानिश्चय किया।
तन्मनस्कास्तदलापास्तद्विचेष्टास्तदात्मिका: ।
तदगुणानेव गायन्त्यो नात्मगाराणि सस्मरू: ॥
४३॥
ततू-मनस्काः --उनके विचारों से भरे हुए मन; तत्ू-आलापा:--उनके विषय में बातें करती; तत्-विचेष्टा:--उनके कार्यकलापोंकी नकल करतीं; तत्-आत्मिका:-- उनकी उपस्थिति से पूरित; तत्-गुणान्ू--उनके गुणों के विषय में; एब--केवल;गायन्त्य: --गाती हुईं; न--नहीं; आत्म--अपने; आगाराणि--घरों को; सस्मरु:--याद किया
उन सब के मन उनके ( कृष्ण के ) विचारों में लीन होने से वे उन्हीं के विषय में बातें करनेलगीं, उन्हीं की लीलाओं का अनुकरण करने लगीं और अपने को उनकी उपस्थिति से पूरितअनुभव करने लगीं।
वे अपने घरों के विषय में पूरी तरह भूल गईं और कृष्ण के दिव्य गुणों काजोर जोर से गुणगान करने लगीं।
पुनः पुलिनमागत्य कालिन्द्या: कृष्णभावना: ।
समवेता जगु: कृष्णं तदागमनकाड्क्षिता: ॥
४४॥
पुनः--फिर से; पुलिनम्--किनारे पर; आगत्य--आकर; कालिन्द्या:--यमुना नदी के; कृष्ण-भावना: --कृष्ण का ध्यानकरती; समवेता: --एकत्र हो गईं; जगु:ः--गाने लगीं; कृष्णम्-कृष्ण के विषय में; तत्ू-आगमन--उनके आगमन की;काड्क्षिता:--आकांक्षा करती हुई |
गोपियाँ फिर से कालिन्दी के किनारे आ गईं।
कृष्ण का ध्यान करते तथा उत्सुकतापूर्वकयह आशा लगाये कि वे आयेंगे ही, वे उनके विषय में गीत गाने के लिए एकसाथ बैठ गई।
