← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय इकतीसवाँ: गोपियों के विरह के गीत
10.31गोप्य ऊचुःजयति तेधिक॑ जन्मना ब्रजःश्रयत इन्दिरा शश्वदत्र हि ।
दयितहृश्यतां दिक्षु तावका-स्त्वयि धृतासवस्त्वां विचिन्बते ॥
१॥
गोप्य: ऊचु:--गोपियों ने कहा; जयति--जय हो; ते--तुम्हारी; अधिकम्--अधिक; जन्मना--जन्म से; ब्रज: --ब्रज भूमि;श्रयते--वास करती है; इन्दिरा--लक्ष्मीदेवी; शश्वत्--निरन्तर; अत्र--यहाँ; हि--निस्सन्देह; दयित--हे प्रिय; दृश्यताम्ू--( आप ) देखे जा सकें; दिक्षु--सभी दिशाओं में; तावका:--आपके ( भक्त ); त्ववि--आपके लिए; धृत--धारण किये हुए;असव:--अपने प्राण; त्वामू--तुमको; विचिन्वते--खोज रही हैं|
गोपियों ने कहा : हे प्रियतम, ब्रजभूमि में तुम्हारा जन्म होने से ही यह भूमि अत्यधिकमहिमावान हो उठी है और इसीलिए इन्दिरा ( लक्ष्मी ) यहाँ सदैव निवास करती हैं।
केवल तुम्हारेलिए ही तुम्हारी भक्त दासियाँ हम अपना जीवन पाल रही हैं।
हम तुम्हें सर्वत्र ढूँढ़ती रही हैं अतःकृपा करके हमें अपना दर्शन दीजिये।
शरदुदाशये साधुजातसत्-सरसिजोदरश्रीमुषा दशा ।
सुरतनाथ तेडशुल्कदासिकावरद निघ्नतो नेह कि वध: ॥
२॥
शरत्--शरद ऋतु का; उद-आशये--जलाशय में; साधु--उत्तम रीति से; जात--उगा; सत्--सुन्दर; सरसि-ज--कमल केफूलों के; उदर--मध्य में; श्री--सौन्दर्य; मुषा--अद्वितीय; हशा--आपकी चितवन से; सुरत-नाथ-हे प्रेम के स्वामी; ते--तुम्हारी; अशुल्क--मुफ्त, बिना मूल्य की; दासिका:--दासियाँ; वर-द--हे वरों के दाता; निघ्नत:--बध करने वाले; न--नहीं;इह--इस जगत में; किम्--क््यों; वध: --हत्या |
हे प्रेम के स्वामी, आपकी चितवन शरदकालीन जलाशय के भीतर सुन्दरतम सुनिर्मितकमल के कोश की सुन्दरता को मात देने वाली है।
हे वर-दाता, आप उन दासियों का वध कररहे हैं जिन्होंने बिना मोल ही अपने को आपको पूर्ण रूप से समर्पित कर दिया है।
क्या यह वध नहीं है?
विषजलाप्ययाद्व्यालराक्षसाद्वर्षमारुतादवैद्युतानलात् ।
वृषमयात्मजाद्विश्वतो भया-दृषभ ते बयं रक्षिता मुहु; ॥
३॥
विष--विषैला; जल--जल ( यमुना जल जो कालिय द्वारा दूषित था ) से; अप्ययात्--विनाश से; व्याल-- भयानक;राक्षसातू--( अघ ) राक्षस से; वर्ष--वर्षा ( इन्द्र द्वारा की गई ) से; मारुतातू--तथा अंधड से ( तृणावर्त द्वारा उत्पन्न ); वैद्युत-अनलातू--वज् ( इन्द्र के ) से; वृष--बैल ( अरिष्टासुर ) से; मब-आत्मजात्--मय के पुत्र ( व्योमासुर ) से; विश्वतः--सभी;भयात्-- भय से; ऋषभ--हे पुरुषों में श्रेष्ठ; ते--तुम्हारे द्वारा; वयम्--हम; रक्षिता:--रक्षा की जाती रही हैं; मुहुः--बारम्बार।
हे पुरुषश्रेष्ठ, आपने हम सबों को विविध प्रकार के संकटों से--यथा विषैले जल से,मानवभक्षी भयंकर अघासुर से, मूसलाधार वर्षा से, तृणावर्त से, इन्द्र के अग्नि तुल्य बज्र से,वृषासुर से तथा मय दानव के पुत्र से बारम्बार बचाया है।
न खलु गोपीकानन्दनो भवा-नखिलदेहिनामन्तरात्महक् ।
विखनसार्थितो विश्वगुप्तयेसख उदेयिवान्सात्वतां कुले ॥
४॥
न--नहीं; खलु--निस्सन्देह; गोपिका--गोपी, यशोदा के; नन्दन:--पुत्र; भवान्ू--आप; अखिल--समस्त; देहिनाम्--देहधारीजीवों के; अन्तः-आत्म--अन्तःकरण का; हक्--द्रष्टा विखनसा--ब्रह्मा द्वारा; अर्थित: --प्रार्थना किये जाने पर; विश्व--विश्वकी; गुप्तये--रक्षा के लिए; सखे--हे मित्र; उदेयिवान्ू--आपका उदय हुआ; सात्वताम्ू--सात्वतों के; कुले--कुल में |
हे सखा, आप वास्तव में गोपी यशोदा के पुत्र नहीं अपितु समस्त देहधारियों के हृदयों में अन्तस्थ साक्षी हैं।
चूँकि ब्रह्माजी ने आपसे अवतरित होने एवं ब्रह्माण्ड की रक्षा करने के लिएप्रार्थना की थी इसलिए अब आप सात्वत कुल में प्रकट हुए हैं।
विरचिताभयं वृष्णिधूर्य तेचरणमीयुषां संसूतेर्भयात् ।
'करसरोरुहं कान्त कामदंशिरसि थेहि नः श्रीकरग्रहम् ॥
५॥
विरचित--उत्पन्न किया; अभयम्---अभय; वृष्णि--वृष्णि कुल का; धूर्य--हे श्रेष्ठ; ते--तुम्हारे; चरणम्--चरण; ईयुषाम्--निकट पहुँचने वालों के; संसृते:-- भौतिक जगत के; भयात्-- भय से; कर--तुम्हारा हाथ; सर:-रुहमू--कमल के समान;कान्त-हे प्रेमी; काम--इच्छाएँ; दम्ू--पूरा करने वाला; शिरसि--सिरों पर; धेहि--रखो; नः--हमारे; श्री--लक्ष्मीदेवी के;कर--हाथ; ग्रहमू--पकड़ते हुए
हे वृष्णिश्रेष्ठ, लक्ष्मीजी के हाथ को थामने वाला आपका कमल सद्ृश हाथ उन लोगों कोअभय दान देता है, जो भवसागर के भय से आपके चरणों के निकट पहुँचते हैं।
हे प्रियतम, उसीकामना को पूर्ण करने वाले करकमल को हमारे सिरों के ऊपर रखें।
ब्रजजनार्तिहन्वीर योषितांनिजजनस्मयध्वंसनस्मित ।
भज सखे भवत्किड्डरीः सम नोजलरुहाननं चारु दर्शय ॥
६॥
ब्रज-जन--ब्रज के लोगों के; आर्ति--कष्ट के; हन्ू--नष्ट करने वाले; वीर--हे वीर; योषिताम्--स्त्रियों के; निज--अपने;जन--लोगों का; स्मय--गर्व; ध्वंसन--विनष्ट करते हुए; स्मित--मंद हँसी; भज--स्वीकार करें; सखे--हे मित्र; भवत्--आपकी; किड्जरी:--दासियाँ; स्म--निस्सन्देह; न:--हमको; जल-रूह--कमल; आननम्ू--मुख वाले; चारु --सुन्दर; दर्शय--कृपा करके दिखाइये।
हे ब्रज के लोगों के कष्टों को विनष्ट करने वाले, समस्त स्त्रियों के वीर, आपकी हँसी आपकेभक्तों के मिथ्या अभिमान को चूर चूर करती है।
हे मित्र, आप हमें अपनी दासियों के रूप मेंस्वीकार करें और हमें अपने सुन्दर कमल-मुख का दर्शन दें।
प्रणतदेहिनां पापकर्षणं तृणचरानुगं श्रीनिकेतनम् ।
'फणिफणार्पितं ते पदाम्बुजंकृणु कुचेषु नः कृन्धि हच्छयम् ॥
७॥
प्रणत--आपके शरणागत; देहिनाम्ू--देहधारी जीवों के; पाप--पाप; कर्षणम्--हटाने वाले; तृण--घास; चर--चरने वाली( गाय ); अनुगम्--पीछे पीछे चलते हुए; श्री--लक्ष्मीजी के; निकेतनम्ू-- धाम; फणि--सर्प ( कालिय ) के; फणा--फनों पर;अर्पितम्--रखा; ते--तुम्हारे; पद-अम्बुजमू--चरणकमल; कृणु--कृपया रखें; कुचेषु--स्तनों पर; न:--हमारे; कृन्धि--काटडालिए; हत्-शयम्--हमारे हृदय की कामवासना |
आपके चरणकमल आपके शरणागत समस्त देहधारियों के विगत पापों को नष्ट करने वालेहैं।
वे ही चरण गौवों के पीछे पीछे चरागाहों में चलते हैं और लक्ष्मीजी के दिव्य धाम हैं।
चूँकिआपने एक बार उन चरणों को महासर्प कालिय के फनों पर रखा था अत: अब आप उन्हें हमारेस्तनों पर रखें और हमारे हृदय की कामवासना को छिल्नभिन्न कर दें।
मधुरया गिरा वल्गुवाक्ययाबुधमनोज्ञया पुष्करेक्षण ।
विधिकरीरिमा वीर मुहाती-रधरसीधुनाप्याययस्व नः ॥
८॥
मधुरया--मधुर; गिरा--अपनी वाणी से; वल्गु--मोहक; वाक्यया-- अपने शब्दों से; बुध--बुद्धिमान को; मनो-ज्ञया--आकर्षक; पुष्कर--कमल; ईक्षण--आँखों वाले; विधि-करी:--दासियाँ; इमा:--ये; वीर--हे वीर; मुहाती:--मोहित हो रही;अधर--तुम्हारे होंठों के; सीधुना--अमृत से; आप्याययस्व--जीवन-दान दीजिये; न:--हमको |
हे कमलनेत्र, आपकी मधुर वाणी तथा मोहक शब्द, जो कि बुद्धिमान के मन को आकृष्टकरने वाले हैं, हम सबों को अधिकाधिक मोह रहे हैं।
हमारे प्रिय वीर, आप अपने होंठों के अमृतसे अपनी दासियों को पुनरुज्जीवित कर दीजिये।
तव कथामृतं तप्तजीवनंकविभिरीडितं कल्मषापहम् ।
श्रवणमड्डलं श्रीमदाततंभुवि गृणन्ति ये भूरिदा जना: ॥
९॥
तब--तुम्हारे; कथा-अमृतम्--शब्दों का अमृत; तप्त-जीवनम्-- भौतिक जगत में दुखियारों का जीवन; कविभि:--बड़े बड़ेचिन्तकों द्वारा; ईडितम्--वर्णित; कल्मष-अपहम्--पापों को भगाने वाला; श्रवण-मड्नलम्--सुनने पर आध्यात्मिक लाभ देनेवाला; श्रूईमत्--आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण; आततम्--संसार-भर में विस्तीर्ण; भुवि-- भौतिक जगत में; गृणन्ति--कीर्तन तथाप्रसार करते हैं; ये--जो लोग; भूरि-दाः--अत्यन्त उपकारी; जना:--व्यक्ति |
आपके शब्दों का अमृत तथा आपकी लीलाओं का वर्णन इस भौतिक जगत में कष्ट भोगनेवालों के जीवन और प्राण हैं।
विद्वान मुनियों द्वारा प्रसारित ये कथाएँ मनुष्य के पापों को समूलनष्ट करती हैं और सुनने वालों को सौभाग्य प्रदान करती हैं।
ये कथाएँ जगत-भर में विस्तीर्ण हैंऔर आध्यात्मिक शक्ति से ओतप्रोत हैं।
निश्चय ही जो लोग भगवान् के सन्देश का प्रसार करतेहैं, वे सबसे बड़े दाता हैं।
प्रहसितं प्रियप्रेमवी क्षणविहरणं च ते ध्यानमड्गलम् ।
रहसि संविदो या हृदि स्पृशःकुहक नो मनः क्षोभयन्ति हि ॥
१०॥
प्रहसितम्--हँसना; प्रिय--स्नेहपूर्ण; प्रेम--प्रेमपूर्ण; वीक्षणम्--चितवन; विहरणम्--घनिष्ठ लीलाएँ; च--तथा; ते--तुम्हारी;ध्यान-ध्यान द्वारा; मड्रलम्--शु भ; रहसि--एकान्त स्थान में; संविदः --वार्तालाप; या: --जो; हृदि--हृदय में; स्पृश: --स्पर्श ;कुहक--हे छलिया; न:ः--हमारे; मनः--मनों को; क्षोभयन्ति--क्षुब्ध करती हैं; हि--निस्सन्देह
आपकी हँसी, आपकी मधुर प्रेम-भरी चितवन, आपके साथ हमारे द्वारा भोगी गई घनिष्ठलीलाएँ तथा गुप्त वार्ताएँ--इन सबका ध्यान करना मंगलकारी है और ये हमारे हृदयों को स्पर्शकरती हैं।
किन्तु उस के साथ ही, हे छलिया, वे हमारे मन को अतीव श्लुब्ध भी करती हैं।
चलसि यद्ब्रजाच्चारयन्पशून्नलिनसुन्दरं नाथ ते पदम् ।
शिलतृणाडुरैः सीदतीति नः'कलिलतां मनः कान्त गच्छति ॥
११॥
चलसि--जाते हो; यत्--जब; ब्रजातू-गोपों के गाँव से; चारयन्ू--चराने के लिए; पशूनू--पशुओं को; नलिन--कमल सेभी बढ़कर; सुन्दरम्--सुन्दर; नाथ--हे स्वामी; ते--तुम्हारे; पदम्--चरण; शिल--अन्न के नुकीले सिरों से; तृण--घास;अह्डुरैः --तथा अंकुरित पौधों से; सीदति--पीड़ा अनुभव करते हैं; इति--ऐसा सोचकर; न:ः--हमारे; कलिलताम्--बेचैनी;मनः--मन; कान्त--हे प्रियतम; गच्छति-- अनुभव करते हैं|
हे स्वामी, हे प्रियतम, जब आप गाँव छोड़कर गौवें चराने के लिए जाते हैं, तो हमारे मन इसविचार से विचलित हो उठते हैं कि कमल से भी अधिक सुन्दर आपके पाँवों में अनाज केनोकदार छिलके तथा घास-फूस एवं पौधे चुभ जायेंगे।
दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै-वनरुहाननं बिभ्रदावृतम् ।
घनरजस्वलं दर्शयन्मुहु-मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि ॥
१२॥
दिन--दिन के; परिक्षये--अन्त होने पर; नील--नीले; कुन्तलै:ः--केश गुच्छों से; वन-रूह--कमल; आननमू--मुख; बिश्रत्--प्रदर्शित करता; आवृतम्--ढका हुआ; घन--मोटा; रज:-वलम्-- धूल से सना; दर्शयन्--दिखलाते हुए; मुहुः--बारम्बार;मनसि--मनों में; न: --हमारे; स्मरमू--कामदेव को; वीर--हे वीर; यच्छसि--रख रहे हो |
दिन ढलने पर आप हमें बारम्बार गहरे नीले केश की लटों से ढके तथा धूल से पूरी तरहधूसरित अपना कमल-मुख दिखलाते हैं।
इस तरह, हे वीर, आप हमारे मन में कामवासना जागृतकर देते हैं।
प्रणतकामदं पदाजार्चितंधरणिमण्डनं ध्येयमापदि ।
चरणपड्डुजं शन्तमं च तेरमण नः स्तनेष्वर्पयाधिहन् ॥
१३॥
प्रणत--झुकने वालों की; काम--इच्छाएँ; दम्--पूरी करते हुए; पद्य-ज--ब्रह्मा द्वारा; अर्चितम्--पूजित; धरणि--पृथ्वी के;मण्डनम्--आभूषण; ध्येयम्-ध्यान के पात्र; आपदि--विपत्ति के समय; चरण-पड्डजम्ू--चरणकमल; शम्-तमम्--सर्वोच्चतुष्टि प्रदान करने वाले; च--तथा; ते--तुम्हारा; रमण--हे प्रियतम; नः--हमारे; स्तनेषु--स्तनों पर; अर्पय--रखें; अधि-हन्--मानसिक क्लेश को विनाश करने वाले।
ब्रह्माजी द्वारा पूजित आपके चरणकमल उन सबों की इच्छाओं को पूरा करते हैं, जो उनमेंनतमस्तक होते हैं।
वे पृथ्वी के आभूषण हैं, वे सर्वोच्च सन््तोष के देने वाले हैं और संकट केसमय चिन्तन के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं।
हे प्रियतम, हे चिन्ता के विनाशक, आप उन चरणों कोहमारे स्तनों पर रखें।
सुरतवर्धन॑ शोकनाशनंस्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम् ।
इतररागविस्मारणं नृणांवितर वीर नस्तेधरामृतम् ॥
१४॥
सुरत--माधुर्य सुख; वर्धनम्--बढ़ाने वाले; शोक--शोक; नाशनम्--विनष्ट करने वाले; स्वर्ति-- ध्वनि की गईं; वेणुना--आपकी व॑शी द्वारा; सुष्ठ-- अत्यधिक ; चुम्बितम्--चुम्बन किया हुआ; इतर--अन्य; राग--आसक्ति; विस्मारणम्--विस्मरणकराने वाले; नृणाम्--मनुष्यों के; वितर--कृपया वितरण कीजिये; बीर--हे वीर; नः--हम पर; ते--तुम्हारे; अधर--अधरोंके; अमृतम्--अमृत को
हे वीर, आप अपने होंठों के उस अमृत को हममें वितरित कीजिये जो युगल आनन्द कोबढ़ाने वाला और शोक को मिटाने वाला है।
उसी अमृत का आस्वाद आपकी ध्वनि करती हुईवंशी लेती है और लोगों को अन्य सारी आसक्तियाँ विसरा देती है।
अटति यद्धवानह्नि काननंत्रुटि युगायते त्वामपश्यताम् ।
कुटिलकुन्तलं श्रीमुखं च तेजड उदीक्षतां पक्ष्मकृदूशाम् ॥
१५॥
अटति--घूमते हो; यत्ू--जब; भवान्ू--आप; अहि--दिन में; काननम्ू--जंगल में; त्रुटि--लगभग १/१७०० सेकंड;युगायते--एक युग के बराबर हो जाता है; त्वामू--तुम; अपश्यताम्ू--न देखने वालों के लिए; कुटिल--घुँघराले; कुन्तलम्--बालों का गुच्छा; श्री--सुन्दर; मुखम्--मुँह; च--तथा; ते--तुम्हारा; जड: --मूर्ख; उदीक्षताम्--उत्सुकता से देखने वालों को;पक्ष्म--पलकों का; कृतू--बनाने वाला; दहशाम्--आँखों का |
जब आप दिन के समय जंगल चले जाते हैं, तो क्षण का एक अल्पांश भी हमें युग सरीखालगता है क्योंकि हम आपको देख नहीं पातीं।
और जब हम आपके सुन्दर मुख को जो घुँघरालेबालों से सुशोभित होने के कारण इतना सुन्दर लगता है, देखती भी हैं, तो ये हमारी पलकें हमारेआनन्द में बाधक बनती हैं, जिल्हें मूर्ख स्त्रष्टा ने बनाया है।
पतिसुतान्वय भ्रातृबान्धवा-नतिविलड्घ्य तेडन्त्यच्युतागता: ।
गतिविदस्तवोद्गीतमोहिता:ःकितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥
१६॥
पति--पति; सुत--बालक; अन्वय--पूर्वज; भ्रातृ- भाई; बान्धवान्--तथा अन्य सम्बन्धियों को; अतिविलड्घ्य--पूर्णतयाउपेक्षा करके; ते--तुम्हारी; अन्ति--उपस्थिति में; अच्युत--हे अच्युत; आगता:--आई हुई; गति--हमारी चालढाल का;विदः--प्रयोजन को जानने वाले; तब--तुम्हारा; उद्गीत--( वंशी के ) तेज गीत से; मोहिता:--मोहित; कितव--हे छलिया;योषितः--स्त्रियों को; क:ः--कौन; त्यजेत्--त्याग करेगा; निशि--रात में |
हे अच्युत, आप भलीभाँति जानते हैं कि हम क्यों आई हैं।
आप जैसे छलिये के अतिरिक्तभला और कौन होगा, जो अर्धरात्रि में उसकी बाँसुरी के तेज संगीत से मोहित होकर उसे देखनेके लिए आई तरुणी स्त्रियों का परित्याग करेगा ? आपके दर्शनों के लिए ही हमने अपने पतियों, बच्चों, बड़े-बूढ़ों, भाइयों तथा अन्य रिश्तेदारों को पूरी तरह ठुकरा दिया है।
रहसि संविदं हच्छयोदयंप्रहसितानन प्रेमवी क्षणम् ।
बृहदुरः भ्रियो वीक्ष्य धाम तेमुहुरतिस्पृहा मुहाते मन: ॥
१७॥
रहसि--एकान्त में; संविदम्ू-गुप्त वार्ताएँ; हत्ू-शय--हृदय में कामेच्छा का; उदयम्--उठना; प्रहसित--हँसता हुआ;आननमू--मुख; प्रेम--प्रेमपूर्ण; वीक्षणम्--चितवन; बृहत्--चौड़ी; उर:--छाती; ख्रिय:--लक्ष्मी; वीक्ष्--देखकर; धाम--धाम; ते--तुम्हारा; मुहुः--बारम्बार; अति--अत्यधिक; स्पृहा--लालसा; मुहाते--मोह लेती है; मनः--मन को |
जब हम आपके साथ एकान्त में हुईं घनिष्ठ वार्ताओं का चिन्तन करती हैं, तो अपने हृदयों मेंकामोदय अनुभव करती हैं और आपकी हँसमुख आकृति, आपकी प्रेममयी चितवन तथाआपके चोौड़े सीने का, जो कि लक्ष्मी का वासस्थान है, स्मरण करती हैं तब हमारे मन बारम्बारमोहित हो जाते हैं।
इस तरह हमें आपके लिए अत्यन्त गहन लालसा की अनुभूति होती है।
ब्रजवनौकसां व्यक्तिरड्र तेवृजिनहन्त्यलं विश्वमड्रलम् ।
त्यज मनाक्ननस्त्वत्स्पृहात्मनांस्वजनहद्गुजां यत्रिषूदनम् ॥
१८॥
ब्रज-वन--ब्रज के जंगलों में; ओकसाम्--निवासियों के लिए; व्यक्ति: --प्राकट्य; अड़--हे प्रिय; ते--तुम्हारा; वृजिन--दुखका; हन्त्री--विनाश करने वाला; अलमू--बहुत हो गया, बस; विश्व-मड्गडलम्--मंगलमय; त्यज--छोड़ दीजिये; मनाक्--थोड़ा; च--तथा; न:--हमको; त्वत्--तुम्हारे लिए; स्पृहा--लालसा; आत्मनाम्--पूरित मनों वाले; स्व--अपने; जन--भक्तगण; हत्--हृदयों में; रुजामू--रोग का; यत्--जो; निषूदनम्--शमन करने वाला
हे प्रियतम, आपका सर्व मंगलमय प्राकट्य ब्रज के बनों में रहने वालों के कष्ट को दूर करताहै।
हमारे मन आपके सान्निध्य के लिए लालायित हैं।
आप हमें थोड़ी-सी वह औषधि दे दें, जोआपके भक्तों के हृदयों के रोग का शमन करती है।
यत्ते सुजातचरणाम्बुरुहं स्तनेषुभीताः शनै: प्रिय दधीमहि कर्कशेषु ।
तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित्कूर्पादिभिश्र॑मति धीर्भवदायुषां नः ॥
१९॥
यत्--जो; ते--तुम्हारे; सु-जात--अतीव सुन्दर; चरण-अम्बु-रुहम्--चरणकमल को; स्तनेषु--स्तनों पर; भीता:-- भयभीतहोने से; शनैः--धीरे धीरे; प्रिय--हे प्रिय; दधीमहि--हम रखती हैं; कर्कशेषु--कर्कश; तेन--उनसे; अटवीम्--जंगल में;अटसि--आप घूमते हैं; तत्--वे; व्यथते--दुखते हैं; न--नहीं; किम् स्वितू--हम आश्चर्य करती हैं; कूर्प-आदिभि:--छोटेकंकड़ों आदि से; भ्रमति--घूम जाता है; धीः--मन; भवत्-आयुषाम्--उन लोगों के लिए जिनके प्राण भगवान् हैं; न:--हमारा
हे प्रियतम, आपके चरणकमल इतने कोमल हैं कि हम उन्हें धीरे से अपने स्तनों पर डरते हुएहल्के से ऐसे रखती हैं कि आपके पैरों को चोट पहुँचेगी।
हमारा जीवन केवल आप पर टिकाहुआ है।
अतः हमारे मन इस चिन्ता से भरे हैं कि कहीं जंगल के मार्ग में घूमते समय आपकेकोमल चरणों में कंकड़ों से चोट न लग जाए।
