← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय सैंतीसवाँ: राक्षसों केशी और व्योम का वध

10.37श्रीशुक उवाच केशी तु कंसप्रहितः खुरर्महींमहाहयो निर्जरयन्मनोजव:।

सटावधूताभ्रविमानसड्डु लकुर्वन्नभो हेषितभीषिताखिल: ॥

१॥

तद्धेषितैर्वालविधूर्णिताम्बुदम्‌ ।

आत्मानमाजौ मृगयन्तमग्रणी-रुपाह्ययत्स व्यनदन्मृगेन्द्रवत्‌ ॥

२॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; केशी--केशी नामक असुर; तु--और तब; कंस-प्रहित:--कंस द्वारा भेजागया; खुरैः--खुरों से; महीम्‌--पृथ्वी को; महा-हयः--विशाल घोड़ा; निर्जरयन्‌--विदीर्ण करता; मन:ः--मन की तरह;जवः--गतिवान; सटा--अपने अयालों से; अवधूत--बिखरे हुए; अभ्र--बादलों के साथ; विमान--तथा ( देवताओं के )यानों; सड्डु लम्‌--समूहित; कुर्वन्‌ू--करता हुआ; नभः--आकाश को; हेषित--अपनी हिनहिनाहट से; भीषित--डराता हुआ;अखिल:--हर एक; तम्‌--उसको; त्रासबन्तम्‌--डराता हुआ; भगवानू-- भगवान्‌; स्व-गोकुलम्‌-- अपने ग्वाल-ग्राम को; तत्‌-हेषितै:--उस हिनहिनाहट से; वाल--अपनी पूँछ के बालों से; विघूर्णित--हिलाया हुआ; अम्बुदम्‌--बादल; आत्मानम्‌--स्वयं;आजौ--युद्ध के लिए; मृगयन्तम्‌--ढूँढ़ते हुए; अग्र-नी:--आगे आकर; उपाह्ृयत्‌--पुकारा; सः--उसने, केशी ने; व्यनदन्‌--गर्जना की

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कंस द्वारा भेजा गया केशी असुर ब्रज में विशाल घोड़े के रूपमें प्रकट हुआ।

मन जैसे तेज वेग से दौड़ते हुए वह अपने खुरों से पृथ्वी को विदीर्ण करने लगा।

उसकी गर्दन के बालों से सारे आकाश के बादल तथा देवताओं के विमान तितर-बितर हो गये।

अपनी भारी हिनहिनाहट से उसने वहाँ पर उपस्थित सबों को भयभीत बना दिया।

जब भगवान्‌ ने देखा कि यह असुर किस तरह अपनी भयानक हिनहिनाहट से पूरे गोकुलगाँव को डरा रहा है और अपनी पूँछ से बादलों को हिलाये दे रहा है, तो वे केशी से सामनाकरने आगे आये।

युद्ध के लिए तो केशी कृष्ण को ढूँढ़ ही रहा था अतः जब भगवान्‌ उसकेसमक्ष खड़े हो गये और उन्होंने उसे पास आने के लिए ललकारा तो उस घोड़े ने सिंह जैसी गर्जनाद्वारा उसका उत्तर दिया।

स तं निशाम्याभिमुखो मखेन खंपिबन्निवाभ्यद्रवद॒त्यमर्षण: ।

जघान पद्भ्यामरविन्दलोचनंदुरासदश्चण्डजवो दुरत्ययः ॥

३॥

सः--वह, केशी; तम्‌--उन्हें, कृष्ण को; निशाम्य--देखकर; अभिमुख: --अपने सामने; मुखेन--अपने मुख से; खम्‌--आकाश को; पिबनू--पीता हुआ; इब--मानो; अभ्यद्रवत्‌--आगे दौड़ा; अति-अमर्षण: --अत्यन्त क्रुद्ध;/ जघान--आक्रमणकर दिया; पद्भ्यामू--अपने दो पाँवों से; अरविन्द-लोचनम्‌--कमल-नेत्र वाले प्रभु को; दुरासदः--पार पाना कठिन; चण्ड--प्रचण्ड; जब: --वेग वाला; दुरत्यय:ः--अजेय ।

भगवान्‌ को अपने सामने खड़ा देखकर केशी अत्यन्त क्रुद्ध होकर अपना मुह बाये उनकीओर दौड़ा मानो वह आकाश को निगल जायेगा।

प्रचण्ड वेग से दौड़ते हुए उस अजेय तथा दुर्धर्षघोड़ा-असुर ने अपने अगले दो पाँवों से कमलनयन भगवान्‌ पर प्रहार करने का प्रयत्न किया।

तद्ठल्नयित्वा तमधोक्षजो रुषाप्रगृह्म दोर्भ्या परिविध्य पादयो: ।

सावज्ञमुत्सूज्य धनुःशतान्तरेयथोरंगं ताक्ष्यसुतो व्यवस्थित: ॥

४॥

तत्‌--वह; वज्ञयित्वा--बचाते हुए; तम्‌--उसको; अधोक्षज: --दिव्य प्रभु; रुषा--क्रोधपूर्वक; प्रगृह्य--पकड़कर; दोर्भ्याम्‌--अपनी भुजाओं से; परिविध्य--चारों ओर घुमाकर; पादयो:--पाँव से पकड़कर; स-अवज्ञम्‌-घृणापूर्वक; उत्सूज्य--फेंकतेहुए; धनु:ः-- धनुष की लम्बाई के बराबर; शत--एक सौ; अन्तरे--दूरी पर; यथा--जिस तरह; उरगम्‌--साँप को; तार््ष्य--कर्दम मुनि का; सुतः--पुत्र ( गरुड़ ); व्यवस्थित: --खड़े हो गये

किन्तु दिव्य भगवान्‌ ने केशी के प्रहार से अपने को बचा लिया और तब क्रुद्ध होकर अपनीभुजाओं से असुर के पैरों को पकड़कर उसे आकाश में चारों ओर घुमाया और एक सौ धनुष-दूरी पर घृणापूर्वक उसी तरह फेंक दिया जिस प्रकार गरुड़ किसी सर्प को फेंक दे।

तब भगवान्‌कृष्ण वहीं खड़े हो गये।

सः लब्धसंज्ञ: पुनरुत्थितो रुषाव्यादाय केशी तरसापतद्धरिम्‌ ।

सोप्यस्य बक्तहे भुजमुत्तरं स्मयन्‌प्रवेशयामास यथोरगं बिले ॥

५॥

सः--वह, केशी; लब्ध--पाकर; संज्ञ:--चेतना; पुनः--फिर से; उत्थित:--उठ खड़ा हुआ; रुषा--क्रोध में; व्यादाय--( अपना मुख ) फाड़ते हुए; केशी --केशी; तरसा--तेजी से; अपतत्‌--दौड़ा; हरिम्‌ू--कृष्ण की ओर; सः--वह, कृष्ण;अपि--तथा; अस्य--उसके; वक्ते--मुख में; भुजम्‌-- अपनी भुजा; उत्तरम्‌-बाई; स्मयन्‌--हँसने लगे; प्रवेशबाम्‌ आस--भीतर डाल दिया; यथा--जिस तरह; उरगम्‌--साँप; बिले--छेद के भीतर ( घुसता है )

पुनः चेतना लौट आने पर केशी क्रोधपूर्वक उठा।

उसने अपना मुख पूरा खोल दिया औरवह पुनः कृष्ण पर आक्रमण करने दौड़ा।

किन्तु कृष्ण हँस दिये और अपनी बाईं भुजा उस घोड़ेके मुँह में उसी सुगमता से डाल दी जिस तरह कोई साँप भूमि में बने छेद में घुसा जाता है।

दन्ता निपेतुर्भगवद्धुजस्पृश-स्ते केशिनस्तप्तमयस्पृशो यथा ।

बाहुश्च तद्देहगतो महात्मनोयथामय: संववृधे उपेक्षित: ॥

६॥

दन्ता:ः--दाँत; निपेतु:--बाहर निकल आये; भगवत्‌-- भगवान्‌ का; भुज--बाँह; स्पृश:--छूने से; ते--वे; केशिन: --केशीके; तप्त-गय--गर्म लाल ( लोहा ); स्पृशः--छूने से; यथा--जिस तरह; बाहु:--बाँह; च--तथा; तत्‌--उस केशी के; देह--शरीर में; गत:--घुसने पर; महा-आत्मन: --परमात्मा का; यथा--जिस तरह; आमय:--रुग्णावस्था ( पेट की बीमारी ),जलोदर; संववृधे--आकार में बढ़ गया; उपेक्षित:--तिरस्कृत |

भगवान्‌ के बाहु का स्पर्श होते ही केशी के सारे दाँत गिर पड़े क्योंकि उनका बाहु उस असुरको पिघले लोहे के समान गर्म लग रहा था।

तत्पश्चात्‌ केशी के शरीर में भगवान्‌ का बाहुअत्यधिक फैल गया जिस तरह उपेक्षा करने से जलोदर रोग बढ़ जाता है।

समेधमानेन स कृष्णबाहुनानिरुद्धवायुश्चरणां श्र विक्षिपन्‌ ।

प्रस्विन्नगात्र: परिवृत्तलोचनःपपात लण्डं विसृजन्क्षितौ व्यसु: ॥

७॥

समेधमानेन--बढ़ जाने से; सः--वह; कृष्ण-बाहुना--कृष्ण की भुजा से; निरुद्ध--रूक गई; वायु:-- श्वास लेना; चरणान्‌--पैर; च--तथा; विक्षिपन्‌ू--इधर-उधर पटकता; प्रस्विन्न--पसीने से लथपथ; गात्र:--शरीर; परिवृत्त--उलटाते हुए; लोचन:--आँखें; पपात--गिर पड़ा; लण्डम्‌--मल; विसृजन्‌--निकालता हुआ; क्षितौ--पृथ्वी पर; व्यसु:--प्राणरहित |

ज्योंही कृष्ण की फैलती भुजा ने केशी के श्वास को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया, वह अपनेपैर पटकने लगा, उसका शरीर पसीने से लथपथ हो गया और उसकी आँखें उलट गईं।

तब उसअसुर ने मल त्याग दिया और भूमि पर गिर कर निष्प्राण हो गया।

तद्देहतः कर्कटिकाफलोपमाद्‌व्यसोरपाकृष्य भुजं महाभुज: ।

अविस्मितोयलहतारिकः सुरैःप्रसूनवर्षर्वर्षद्धरीडित: ॥

८ ॥

ततू-देहतः--केशी के शरीर से; कर्क टिका-फल--कर्कटिका फल, ककड़ी; उपमात्‌--के सहृश; व्यसो: --जिससे प्राण-वायुनिकल चुकी थी; अपाकृष्य--निकालकर; भुजम्‌--अपनी बाँह को; महा-भुज:--बलिष्ठ भुजाओं वाले प्रभु; अविस्मित:--बिना किसी गर्व के; अयलत--बिना प्रयास के; हत--मारकर; अरिकः --अपने शत्रु; सुरैः--देवताओं द्वारा; प्रसून--फूलों की;वर्षै:--वर्षा से; वर्षद्धिः--वर्षा करते हुए; ईंडित:--पूजित ।

महाबाहु कृष्ण ने अपनी बाँह केशी के उस शरीर से निकाल ली जो अब एक लम्बी ककड़ी जैसा प्रतीत हो रहा था।

अपने शत्रु को बिना प्रयास के ही मारने के बाद किसी प्रकार का गर्वदिखलाये बिना भगवान्‌ ने ऊपर से फूलों की वर्षा के रूप में की गई देवताओं की पूजा स्वीकारकी।

देवर्षिरुपसड्रम्य भागवतप्रवरो नूप ।

कृष्णमक्लिष्टकर्माणं रहस्येतदभाषत ॥

९॥

देव-ऋषि:--देवताओं में से ऋषि ( नारदमुनि ); उपसड्डम्य--पास आकर; भागवत-- भगवद्भक्तों के; प्रवर:-- श्रेष्ठ; नृप--हेराजा ( परीक्षित ); कृष्णम्‌--कृष्ण को; अक्लिष्ट--बिना कष्ट के; कर्माणम्‌--जिसके कर्म; रहसि--एकान्त में; एतत्‌--यह;अभाषत--कहा।

हे राजन, तत्पश्चात्‌ देवर्षि नारद भगवान्‌ कृष्ण के पास एकान्त स्थान में गये।

इनमहाभागवत ने बिना किसी प्रयास के लीला करने वाले भगवान्‌ से इस प्रकार कहा।

कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मन्योगेश जगदी श्वर ।

वासुदेवाखिलावास सात्वतां प्रवर प्रभो ॥

१०॥

त्वमात्मा सर्वभूतानामेको ज्योतिरिवैधसाम्‌ ।

गूढो गुहाशयः साक्षी महापुरुष ईश्वर: ॥

११॥

कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण; अप्रमेय-आत्मन्‌--हे अगाध आत्मा; योग-ईश--हे समस्त योगशक्ति के स्त्रोत; जगत्‌-ईश्वर--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; वासुदेव--हे वसुदेव-पुत्र; अखिल-आवास--हे सबों के आश्रय; सात्वताम्‌-यदुकुल के; प्रवर--हेश्रेष्ठ; प्रभो--हे प्रभु; त्वम्‌ू--तुम; आत्मा--परमात्मा; सर्व--समस्त; भूतानाम्‌--जीवों के; एक:--एकमात्र; ज्योति:-- अग्नि;इब--सहश; एधसाम्‌--समिधा में; गूढ:--छिपी; गुहा--हृदय रूपी गुफा में; शयः--बैठे हुए, स्थित; साक्षी--गवाह; महा-पुरुष:-- भगवान्‌; ईश्वर: --परमनियन्ता ।

नारदमुनि ने कहा : हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे अनन्त प्रभु, हे समस्त योगशक्तियों के स्त्रोत, हेब्रह्माण्ड के स्वामी, हे समस्त जीवों के आश्रय तथा यदुश्रेष्ठ वासुदेव, हे प्रभु, आप समस्त जीवोंके परमात्मा हैं और हृदय की गुफा में उसी तरह अदृश्य होकर बैठे हुए हैं जिस तरह सुलगती हुईलकड़ी के भीतर अग्नि सुप्त रहती है।

आप सबों के भीतर साक्षी स्वरूप, परम पुरुष तथासर्वनियन्ता देव हैं।

आत्मनात्माश्रयः पूर्व मायया ससूजे गुणान्‌ ।

तैरिदं सत्यसड्डूल्प: सृजस्यत्स्यवसी श्वर: ॥

१२॥

आत्मना--अपनी निजी शक्ति से; आत्म--आत्मा के; आश्रय: --शरण; पूर्वम्‌--पहले; मायया--अपनी सृजन-शक्ति द्वारा;ससृजे--उत्पन्न किया; गुणान्‌--प्रकृति के मूलभूत गुणों को; तैः--उनके माध्यम से; इदम्‌--यह ( ब्रह्माण्ड ); सत्य--तथ्य रूपमें अनुभवगम्य; सड्डूल्प:--जिसकी इच्छाएँ; सृुजसि--उत्पन्न करते हो; अत्सि--संहार करते हो; अवसि--पालन करते हो;ईश्वर:--नियन्ता

आप समस्त जीवों के आश्रय हैं और परमनियन्ता होने के कारण अपनी इच्छाशक्ति सेअपनी सारी इच्छाएँ पूरी करते हैं।

अपनी निजी सृजन-शक्ति से आपने प्रारम्भ में प्रकृति के आदिगुणों को प्रकट किया और आप उन्हीं के माध्यम से इस ब्रह्माण्ड का सृजन, पालन तथा विनाशकरते हैं।

स त्वं भूधरभूतानां दैत्यप्रमथरक्षसाम्‌ ।

अवतीर्णो विनाशाय साधुनां रक्षणाय च ॥

१३॥

सः--वह; त्वम्‌--साक्षात्‌ आप; भू-धर--राजाओं के रूप में; भूतानाम्‌--प्रकट होने वाले; दैत्य-प्रमथ-रक्षसाम्‌--विभिन्नप्रकार के असुरों के; अवतीर्ण:--अवतीर्ण हुए हो; विनाशाय--विनाश के लिए; साधूनाम्‌--सन्त पुरुषों की; रक्षणाय--रक्षाके लिए; च--तथा।

आप ही वह स्त्रष्टा हैं, जो अपने को राजा मानने वाले दैत्यों, प्रमथों तथा राक्षमों का विनाशकरने के लिए तथा सन्त पुरुषों की रक्षा करने के लिए अब इस धरा पर अवतीर्ण हुए हैं।

दिष्टया ते निहतो देत्यो लीलयायं हयाकृतिः ।

यस्य हेषितसन्त्रस्तास्त्यजन्त्यनिमिषा दिवम्‌ ॥

१४॥

दिछ्या--( हमारे ) सौभाग्य से; ते--तुम्हारे द्वारा; निहतः--मारा गया; दैत्य:--असुर; लीलया--खेल-खेल में; अयम्‌--यह;हय-आकृतिः--घोड़े की आकृति वाला; यस्य--जिसकी; हेषित--हिनहिनाहट से; सन्त्रस्ता:-- भयभीत; त्यजन्ति--छोड़ देतेहैं; अनिमिषा: --देवतागण; दिवम्‌--स्वर्ग को |

यह घोड़े की आकृति वाला असुर इतना आतंक मचाये हुए था कि उसकी हिनहिनाहट सेदेवताओं ने भयभीत होकर अपने स्वर्ग के राज्य को छोड़ दिया था।

किन्तु हमारे सौभाग्य सेआपने खेल खेल में ही उसे मार डाला है।

चाणूरं मुष्टिकं चेव मल्लानन्यां श्र हस्तिनम्‌ ।

कंसं च निहतं द्रक्ष्ये परश्रो हनि ते विभो ॥

१५॥

\तस्यानु शट्डुयवनमुराणां नरकस्य च ।

पारिजातापहरणमिन्द्रस्य च पराजयम्‌ ॥

१६॥

उद्बाहं वीरकन्यानां वीर्यशुल्कादिलक्षणम्‌ ।

नृगस्य मोक्षणं शापाददवारकायां जगत्पते ॥

१७॥

स्यमन्तकस्य च मणेरादानं सह भार्यया ।

मृतपुत्रप्रदानं च ब्राह्मणस्य स्वधामतः ॥

१८॥

पौण्ड्कस्य वध पश्चात्काशिपुर्याश्च दीपनम्‌ ।

दन्तवक्रस्यथ निधन चेद्यस्थ च महाक्रतो ॥

१९॥

यानि चान्यानि वीर्याणि द्वारकामावसन्भवान्‌ ।

कर्ता द्रक्ष्याम्यहं तानि गेयानि कविभिर्भुवि ॥

२०॥

चाणूरम्‌ू--चाणूर को; मुष्टिकम्‌--मुष्टिक को; च--तथा; एव-- भी; मल्लान्‌--कुश्ती लड़ने वाले, पहलवानों को; अन्यान्‌--अन्य; च--तथा; हस्तिनम्‌--हाथी ( कुवलयापीड ) को; कंसम्‌--कंस को; च--तथा; निहतम्‌--मारा गया; द्रक्ष्ये--देखूँगा;पर-श्रः--परसों; अहनि--उस दिन; ते--तुम्हारे द्वारा; विभो--हे सर्वशक्तिमान; तस्य अनु--उसके बाद; शद्भु-यवन-मुराणाम्‌--शंख ( पञ्ञजन ), कालयवन तथा मुर नामक असुरों का; नरकस्य--नरकासुर का; च--भी; पारिजात--स्वर्ग केपारिजात पुष्प का; अपहरणम्‌--चुराया जाना; इन्द्रस्य--इन्द्र की; च--तथा; पराजयम्‌--हार; उद्बाहम्‌--विवाह; वीर--वीरराजाओं का; कन्यानाम्‌--कन्याओं के; वीर्य--आपके पराक्रम से; शुल्क--दहेज; आदि--इत्यादि; लक्षणम्‌ू--लक्षणों सेयुक्त; नृगस्थ--राजा नृग का; मोक्षणम्‌--मोक्ष; शापात्‌-- अपने शाप से; द्वारकायाम्‌ू--द्वारका नगरी में; जगत्‌-पते--हेब्रह्माण्ड के स्वामी; स्यमन्तकस्य--स्यमन्तक नामक; च--तथा; मणे: --मणि का; आदानम्‌--ग्रहण किया जाना; सह--केसाथ; भार्यया--पत्नी ( जाम्बवती ) के साथ; मृत--मरे हुए; पुत्र--बेटे का; प्रदानम्‌--लाकर देना; च--तथा; ब्राह्मणस्य--ब्राह्मण के; स्व-धामत:--अपने धाम ( मृत्युधाम ) से; पौण्ड्रकस्य--पौण्ड्रक का; वधम्‌--मारा जाना; पश्चात्‌--उसके बाद;काशि-पुर्या:--काशी नगरी ( बनारस ) के; च--तथा; दीपनम्‌--दहन; दन्तवक्रस्थ--दन्तवक्र का; निधनम्‌--मरण;चैद्यस्थ--चैद्य ( शिशुपाल ) का; च--तथा; महा-क्रतौ--महायज्ञ ( महाराज युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ ) के समय; यानि--जो;च--तथा; अन्यानि--अन्य; वीर्याणि--बड़े बड़े कौशल; द्वारकाम्‌-द्वारका में; आवसन्‌--रहते हुए; भवान्‌ू--आप; कर्ता--सम्पन्न करने जा रहे हैं; द्रक््यामि--देखूँगा; अहम्‌--मैं; तानि--उनको; गेयानि--गाये जाने के लिए; कविभि:--कवियों द्वारा;भुवि--इस पृथ्वी पर।

हे सर्वशक्तिमान विभो, दो ही दिनों में मैं आपके हाथों चाणूर, मुष्टिक तथा अन्य पहलवानोंके साथ साथ कुवलयापीड तथा राजा कंस की भी मृत्यु होते देखूँगा।

इसके बाद मैं कालयवन,मुर, नरक तथा शंख असुर को आपके द्वारा मारा जाते देखूँगा।

मैं आपको पारिजात पुष्प चुरातेऔर इन्द्र को पराजित करते देखूँगा।

तत्पश्चात्‌ अपने पराक्रम से मूल्य चुकाते हुए वीर राजाओंकी अनेक कन्याओं के साथ आपको विवाह करते देखूँगा।

तब हे ब्रह्माण्डपति, आप द्वारका मेंराजा नृग का शाप से उद्धार करेंगे और एक अन्य पत्नी के साथ साथ आप अपने लिए स्यमन्तकमणि भी लेंगे।

आप ब्राह्मण के मृत पुत्र को अपने दास यमराज के धाम से वापस लायेंगे औरउसके बाद आप पौण्ड्रक का वध करेंगे तथा काशी नगरी को जला देंगे और राजसूय यज्ञ केसमय दन्तवक्त्र तथा चेदिराज का संहार करेंगे।

मैं इन सब वीरतापूर्ण लीलाओं को तो देखूँगा ही, साथ ही द्वारका में अपने वास-काल में आप जो अन्य अनेक लीलाएँ करेंगे उन्हें भी देखूँगा।

ये सारी लीलाएँ दिव्य कवियों के गीतों में इस धरा पर गाई जाती हैं।

अथ ते कालरूपस्य क्षपयिष्णोरमुष्य वै ।

अक्षौहिणीनां निधन द्रक्ष्याम्यर्जुनसारथे: ॥

२१॥

अथ--तब; ते-- आपके द्वारा; काल-रूपस्थ--काल का रूप धारण करने वाले; क्षपयिष्णो:--संहार करने की इच्छा करनेवाला; अमुष्य--इस जगत ( के भार ) का; वै--निस्सन्देह; अक्षौहिणीनाम्‌--सम्पूर्ण सेनाओं का; निधनम्‌ू--विनाश;द्रक्ष्यामि--देखूँगा; अर्जुन सारथे:--अर्जुन के सारथी द्वारा

तत्पश्चात्‌ मैं आपको साक्षात्‌ काल के रूप में प्रकट होते, अर्जुन के सारथी के रूप में सेवाकरते तथा धरती का भार उतारने के लिए सैनिकों की समस्त सेनाओं का विनाश करते देखूँगा।

विशुद्धविज्ञानघनं स्वसंस्थयासमाप्तसर्वार्थममोघवाज्छितम्‌ ।

स्वतेजसा नित्यनिवृत्तमाया-गुणप्रवाहं भगवन्तमीमहि ॥

२२॥

विशुद्ध--पूर्णरूपेण शुद्ध; विज्ञान--आध्यात्मिक भिज्ञता; घनम्‌--से पूर्ण; स्व-संस्थया--अपने मूल रूप में; समाप्त--पहलेही पूर्ण; सर्व--समस्त; अर्थम्‌--उद्देश्यों में; अमोघ--कभी उद्विग्न न होने वाले; वाज्छितम्‌--जिनकी इच्छाएँ; स्व-तेजसा--अपनी ही शक्ति से; नित्य--शाश्वत; निवृत्त--विरक्त; माया-- भौतिक शक्ति या माया का; गुण--प्रकट गुणों के; प्रवाहम्‌--प्रवाह से; भगवन्तम्‌--भगवान्‌; ईमहि--शरण आने दें |

हे भगवान्‌ हमें अपनी शरण में आने दें।

आप शुद्ध आध्यात्मिक भिज्ञता से परिपूर्ण हैं औरअपने मूल स्वरूप में सदैव स्थित रहते हैं।

चूँकि आपकी इच्छा को कभी नकारा नहीं जासकता, आपने पहले ही यथासम्भव इच्छित वस्तुएँ प्राप्त कर ली हैं और अपनी आध्यात्मिकशक्ति के द्वारा आप माया के गुण प्रवाह से सतत पृथक्‌ रहते हैं।

त्वामीश्वरं सवा श्रयमात्ममाययाविनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम्‌ ।

क्रीडार्थमद्यात्तमनुष्यविग्रहंनतोउस्मि धुर्य यदुवृष्णिसात्वताम्‌ ॥

२३॥

त्वामू--तुमको; ईश्वरम्‌--परमनियन्ता को; स्व-आश्रयम्‌--आत्म-निर्भर; आत्म--निजी; मायया--सृजन-शक्ति द्वारा;विनिर्मित--बनाया हुआ; अशेष--असीम; विशेष--विशिष्ट; कल्पनम्‌--व्यवस्था; क्रीड--खेल के; अर्थम्‌-हेतु; अद्य--अब; आत्त--लिया हुआ; मनुष्य--मनुष्यों के बीच; विग्रहम्‌--लड़ाई; नतः--नत; अस्मि--हूँ; धुर्यमू--महानतम, शिरोमणि;यदु-वृष्णि-सात्वताम्‌-यदु, वृष्टि तथा सात्वत कुलों के ।

हे आत्म-निर्भर परमनियन्ता, मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

आपने अपनी शक्ति से इसब्रह्माण्ड की असीम विशिष्ट व्यवस्था की रचना की है।

अब आप यदुओं, वृष्णियों तथा सात्वतोंके बीच महानतम वीर के रूप में प्रकट हुए हैं और आपने मानवीय युद्ध में भाग लेने का निर्णयकिया है।

श्रीशुक उबाचएवं यदुपतिं कृष्णं भागवतप्रवरो मुनि: ।

प्रणिपत्याभ्यनुज्ञातो ययौ तदरर्शनोत्सवः ॥

२४॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; यदु-पतिम्‌--यदुओं में प्रमुख; कृष्णम्‌--कृष्ण को; भागवत--भक्तों के; प्रवर:--परम विख्यात; मुनि:--नारदमुनि ने; प्रणिपत्य--सादर नमस्कार करके; अभ्यनुज्ञात:--विदा किये गये;ययौ--चला गया; तत्‌--उन कृष्ण के; दर्शन--दर्शन करके; उत्सव: --परम हर्ष का अनुभव करते हुए।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार यदुवंश के प्रधान भगवान्‌ कृष्ण को सम्बोधित करनेके बाद नारद ने झुककर सादर प्रणाम किया।

तत्पश्चात्‌ उस मुनियों में महान्‌ तथा भक्तों मेंविख्यात नारद ने भगवान्‌ से विदा ली और उनका साक्षात्‌ दर्शन करने से उत्पन्न परम हर्ष काअनुभव करते हुए चले गये।

भगवानपि गोविन्दो हत्वा केशिनमाहवे ।

पशूनपालयत्पालै: प्रीतैत्रेजसुखावह: ॥

२५॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; अपि--तथा; गोविन्द: --गोविन्द; हत्वा--मारकर; केशिनम्‌--केशी असुर को; आहवे--युद्ध में; पशून्‌ू--पशुओं का; अपालयत्‌--चराने लगे; पालैः--ग्वालबालों के साथ; प्रीतैः--अत्यन्त प्रसन्न; ब्रज--वृन्दावन के वासियों को;सुख--सुख; आवहः--लाने वाले।

युद्ध में असुर केशी को मार डालने के बाद भगवान्‌ कृष्ण अपने प्रमुदित ग्वालमित्रों केसाथ गौवों तथा अन्य पशुओं को चराते रहे।

इस तरह उन्होंने वृन्दावन के समस्त वासियों कोहर्ष-उल्लास पहुँचाया।

एकदा ते पशून्पालाश्‌ चारयन्तोउद्विसानुषु ।

अक्रुर्निलायनक्रीडाश्लोरपालापदेशत: ॥

२६॥

एकदा--एक बार; ते--उन; पशून्‌--पशुओं को; पाला:--ग्वालबालों ने; चारयन्त:--चराते हुए; अद्वि--पर्वत के; सानुषु--ढलानों पर; चक्कु:--खेला; निलायन--लुकाछिपी; क्रीडा:--खेल; चोर--चोरों के; पाल--तथा रक्षकों के; अपदेशत: --अभिनय करते हुए।

एक दिन पर्वत की ढलानों पर अपने पशु चराते हुए ग्वालबालों ने आपस में प्रतिद्वन्द्दी चोरोंतथा मवेशि-पालकों ( गड़ेरियों ) का अभिनय करते हुए लुकाछिपी का खेल खेला।

तत्रासन्कतिचिच्चोरा: पालाश्चव कतिचिन्नूप ।

मेषायिताश्व तत्रेके विजहरकुतोभया: ॥

२७॥

तत्र--उसमें; आसन्‌--थे; कतिचित्‌--कुछ; चोरा:-- चोर; पाला:--चराने वाले, पालक; च--तथा; कतिचित्‌--कुछ; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); मेषायिता:-- भेड़ का वेश बनाकर; च--तथा; तत्र--वहाँ; एके--कुछ ने; विजह्ु:--खेल खेला;अकुतः-भया:--बिना किसी भय के ।

हे राजनू, उस खेल में कुछ ग्वाले चोर बने, कुछ गडरिये तथा अन्य भेड़ बने।

वे किसीसंकट के भय के बिना सुखचैन से अपना खेल खेल रहे थे।

मयपुत्रो महामायो व्योमो गोपालवेषधृक्‌ ।

मेषायितानपोवाह प्रायश्लोरायितो बहूनू ॥

२८ ॥

मय-पुत्र:--मय असुर का पुत्र; महा माय:--बलशाली जादूगर; व्योम: --व्योम नामक; गोपाल--ग्वालबाल का; वेष--पहनावा, वेष; धृूक्‌ू--धारण करके ; मेषायितान्‌-- भेड़ बनने वालों को; अपोवाह-- भगा ले गया; प्रायः --लगभग सारे;चोरायित:--चोर बनकर खेलने के बहाने; बहूनू--अनेक

तब व्योम नामक एक शक्तिशाली जादूगर, जो असुर मय का पुत्र था, एक ग्वालबाल केवेश में वहाँ प्रकट हुआ।

वह चोर के रूप में खेल में सम्मिलित होने का बहाना करते हुए, भेड़बनने वाले अधिकांश ग्वालबालों को चुराने के लिए आगे बढ़ा।

गिरिदर्या विनिश्षिप्य नीत॑ नीत॑ महासुरः ।

शिलया पिदथे द्वारं चतुःपञ्ञावशेषिता: ॥

२९॥

गिरि--पर्वत की; दर्याम्‌ू-गुफा में; विनिक्षिप्प--फेंक कर; नीतम्‌ नीतम्‌--क्रमश: ला लाकर; महा-असुरः --महान्‌ असुर;शिलया--पत्थर से; पिदधे--बन्द कर दिया; द्वारम्‌-द्वार को; चतु:-पञ्ञ--चार या पाँच; अवशेषिता: --बचे रहे |

उस महा असुर ने धीरे धीरे अधिकाधिक ग्वालों का अपहरण कर लिया और उन्हें एकपर्वत-गुफा में ले जाकर फेंक दिया तथा उसके द्वार को एक बड़े पत्थर से बन्द कर दिया।

अन्त में केवल चार-पाँच बालक बचे जो खेल में भेड़ बने थे।

तस्य तत्कर्म विज्ञाय कृष्ण: शरणदः सताम्‌ ।

गोपान्नयन्तं जग्राह वृक॑ हरिरिवौजसा ॥

३०॥

तस्य--उसका, व्योमासुर का; तत्‌--वह; कर्म--काम; विज्ञाय--पूरी तरह जानकर; कृष्ण:--कृष्ण ने; शरण--शरण के;दः--दाता; सताम्‌ू--साधु भक्तों को; गोपान्‌ू-ग्वालबालों को; नयन्तम्‌--ले जाने वाले को; जग्राह--पकड़ लिया; वृकम्‌--भेड़िये को; हरिः--सिंह; इब--सद्ृश; ओजसा--बलपूर्वक |

समस्त सन्त भक्तों को शरण देने वाले भगवान्‌ कृष्ण अच्छी तरह जान गये कि व्योमासुरकर क्या रहा है।

जिस तरह कोई सिंह भेड़िये को दबोच लेता है उसी तरह कृष्ण ने उस असुर कोजब वह अन्य ग्वालबालों को लिये जा रहा था बलपूर्वक धर दबोचा।

स निजं रूपमास्थाय गिरीन्द्रसहशं बली ।

इच्छन्विमोक्तुमात्मानं नाशक्नोदग्रहणातुर: ॥

३१॥

सः--वह असुर; निजम्‌--अपने मूल; रूपम्‌--रूप को; आस्थाय-- धारण करके ; गिरि-इन्द्र--राजसी पर्वत; सहशम्‌--केसहश; बली--शक्तिशाली; इच्छन्‌--चाहते हुए; विमोक्तुमू--मुक्त करने के लिए; आत्मानम्‌--स्वयं को; न अशक्नोत्‌--वहसमर्थ नहीं था; ग्रहण--बलपूर्वक पकड़े जाने से; आतुर:--अशक्त हुआ

वह असुर अपने मूल रूप में परिणत होकर विशाल पर्वत के समान बड़ा तथा बली बनगया।

किन्तु वह कठोर प्रयास के बावजूद अपने को छुड़ा न पाया क्योंकि भगवान्‌ की मजबूतपकड़ में होने से वह अपनी शक्ति खो चुका था।

त॑ निगृह्याच्युतो दोर्भ्या पातयित्वा महीतले ।

पश्यतां दिवि देवानां पशुमारममारयत्‌ ॥

३२॥

तम्‌--उसको; निगृह्म--मजबूती से पकड़कर; अच्युत:--भगवान्‌ कृष्ण ने; दोर्भ्याम्‌ू--अपनी भुजाओं से; पातयित्वा--गिराकर; मही-तले--पृथ्वी पर; पश्यताम्‌--देखते देखते; दिवि--स्वर्गलोक में; देवानामू--देवताओं के; पशु-मारम्‌--जिस तरहबलि-पशु का वध किया जाता है; अमारयत्‌--उसे मार डाला

भगवान्‌ अच्युत ने व्योमासुर को अपनी बाँहों के बीच में जकड़ कर पृथ्वी पर पदक दिया।

तब स्वर्ग से देवताओं के देखते देखते कृष्ण ने उसे उसी तरह मार डाला जिस तरह कोई बलि-पशु का वध करता है।

गुहापिधानं निर्भिद्य गोपान्निःसार्य कृच्छुत: ।

स्तूयमान: सुरैगोपि: प्रविवेश स्वगोकुलम्‌ ॥

३३॥

गुहा--गुफा के; पिधानम्‌--अवरोध को; निर्भिद्य--तोड़कर; गोपान्‌ू--ग्वालबालों को; नि:सार्य--बाहर निकालकर;कृच्छुतः:--भयानक जगह से; स्तूयमान:--प्रशंसित होकर; सुरैः--देवताओं द्वारा; गोपैः --तथा ग्वालबालों द्वारा; प्रविवेश--प्रवेश किया; स्व--अपने; गोकुलम्‌-ग्वाल- ग्राम में |

तत्पश्चात्‌ कृष्ण ने गुफा के दरवाजे को अवरुद्ध करने वाले शिलाखण्ड को चूर चूर करदिया और बनन्‍्दी बनाये गये ग्वालबालों को वे सुरक्षित स्थान पर ले आये।

इसके बाद देवताओंतथा ग्वालों द्वारा उनका यशोगान होने लगा और वे अपने ग्वाल-ग्राम, गोकुल, लौट गए।

TO

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची