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अध्याय अड़तीसवां: अक्रूर का वृन्दावन में आगमन
10.38श्रीशुक उबाचअक्रूरोउपि च तां रात्रि मधुपुर्या महामति: ।
उषित्वारथमास्थाय प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥
१॥
श्री-शुक: उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अक्रूर:--अक्वूर; अपि च--तथा; ताम्--उस; रात्रिमू--रात; मधु-पुर्यामू--मथुरानगरी में; महा-मतिः--उच्च विचार वाला; उषित्वा--रहकर; रथम्--अपना रथ; आस्थाय--चढ़ कर; प्रययौ--रवाना हुआ;नन्द-गोकुलम्--नन्द महाराज के ग्वाल-ग्राम के लिए
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : महामति अक्रूर ने वह रात मथुरा में बिताई और तब अपने रथपर सवार होकर नन्द महाराज के ग्वाल-ग्राम के लिए रवाना हुए।
गच्छन्पथि महाभागो भगवत्यम्बुजेक्षणे ।
भक्ति परामुपगत एवमेतदचिन्तयत् ॥
२॥
गच्छन्--यात्रा करते हुए; पथि--मार्ग में; महा-भाग:--परम भाग्यशाली; भगवति-- भगवान् के प्रति; अम्बुज-ईक्षणे --कमल-नेत्र प्रभु; भक्तिमू-- भक्ति; परामू--अद्वितीय; उपगत:--अनुभव किया; एवम्--इस प्रकार; एतत्--यह; अचिन्तयत्--सोचा
मार्ग में यात्रा करते हुए महात्मा अक्रूर को कमल-नेत्र भगवान् के प्रति अपार भक्ति काअनुभव हुआ अतः वे इस प्रकार सोचने लगे।
कि मयाचरितं भद्गं कि तप्तं परमं तपः ।
किं वाथाप्यईते दत्तं यद्द्रक्ष्याम्यद्यै केशवम् ॥
३॥
किमू--क्या; मया--मेरे द्वारा; आचरितम्--किया गया है; भद्रमू--अच्छा कार्य; किमू--क्या; तप्तम्--ताप सहा गया;परमम्--कठिन; तपः--तपस्या; किम्--क्या; वा--अथवा; अथ अपि--अन्यथा; अर्हते--की गई पूजा; दत्तमू--दिया गयादान; यत्-- जिससे; द्रक्ष्यामि--देखने जा रहा हूँ; अद्य--आज; केशवम्-- भगवान् कृष्ण को
श्री अक्रूर ने सोचा : मैंने ऐसे कौन-से शुभ कर्म किये हैं, ऐसी कौन-सी कठिन तपस्याकी है, ऐसी कौन-सी पूजा की है या ऐसा कौन-सा दान दिया है, जिससे आज मैं भगवान्केशव का दर्शन करूँगा ?
ममैतहुर्लभं मन्य उत्तम:शलोकदर्शनम् ।
विषयात्मनो यथा ब्रह्मकीर्तनं शूद्रजन्मन: ॥
४॥
मम--मेरा; एतत्--यह; दुर्लभम्--दुष्प्राप्प; मन्ये--मानता हूँ; उत्तम:-शलोक-- भगवान् का जिनकी प्रशंसा उत्तम इलोकों द्वाराकी जाती है; दर्शनम्--दर्शन; विषय-आत्मन:--विषय-भोगों में लिप्त रहने वाले के हेतु; यथा--जिस तरह; ब्रह्म--वेदों का;कीर्तनम्--कीर्तन; शूद्र--निम्न श्रेणी का व्यक्ति; जन्मन:--जन्म से, जन्मना |
चूँकि मैं विषय-भोगों में लीन रहने वाला भौतिकतावादी व्यक्ति हूँ अतः अपने लिए उत्तमएलोक में स्तुति किए जाने वाले भगवान् का दर्शन करने का यह अवसर प्राप्त कर पाना मैं उसीतरह कठिन समझता हूँ जिस तरह शूद्र के रूप में जन्मे व्यक्ति के लिए वैदिक मंत्रों के उच्चारणकरने की अनुमति प्राप्त करना होता है।
मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम् ।
हियमाण: कलनद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥
५॥
मा एवम्--मुझे ऐसा नहीं सोचना चाहिए; मम--मुझ; अधमस्य---अधम का; अपि-- भी; स्थात्--हो सकता है; एव--निश्चयही; अच्युत--अच्युत का; दर्शनम्ू--दर्शन; हियमाण: --खींचा जाकर; काल--समय की; नद्या--नदी के द्वारा; क्वचित्--कभी; तरति--पार करके किनारा पा जाता है; कश्चन--कोई |
किन्तु बहुत हुआ, छोड़ो इन विचारों को, आखिर मुझ जैसे पतितात्मा को भी अच्युतभगवान् को देखने का अवसर प्राप्त हो सकता है क्योंकि काल रूपी नदी के प्रवाह में बह रहेबद्ध-आत्माओं में से कोई एक आत्मा तो कभी कभी किनारे तक पहुँच ही सकता है।
ममाद्यामड्डलं नष्टे फलवांश्रेव मे भव: ।
यन्नमस्थे भगवतो योगिध्येयान्प्रिपड्टुजम् ॥
६॥
मम--मेरा; अद्य--आज; अमड्डलम्-- अशुभ पापकर्म; नष्टमू--उन्मूलित; फल-वान्--फलीभूत; च--तथा; एव--निस्सन्देह;मे--मेरा; भवः--जन्म; यत्-- क्योंकि; नमस्ये--नमस्कार करने जा रहा हूँ; भगवतः -- भगवान् के; योगि-ध्येय--योगियों द्वाराध्यान किये जाने वाले; अद्भघ्रि--चरणों को; पड्डजम्--कमलवत् |
आज मेरे समस्त पापकर्मों का उन्मूलन हो चुका है और मेरा जन्म सफल हो गया है क्योंकिमैं भगवान् के उन चरणकमलों को नमस्कार करूँगा जिनका ध्यान बड़े बड़े योगी करते हैं।
कंसो बताद्याकृत मेउत्यनुग्रहंद्रक्ष्येड्प्रिपदां प्रहितोमुना हरे: ।
कृतावतारस्य दुरत्ययं तमःपूर्वेउतरन्यन्नखमण्डलत्विषा ॥
७॥
कंसः--राजा कंस ने; बत--निस्सन्देह; अद्य--आज; अकृत--किया है; मे--मेरे साथ; अति-अनुग्रहम्ू--अत्यन्त कृपा काकार्य; द्रक्ष्ये--देखूँगा; अड्प्रि-पद्ममू--चरणकमलों को; प्रहित:-- भेजा गया; अमुना--उसके द्वारा; हरेः-- भगवान् के;कृत--लिया; अवतारस्य--इस संसार में उनका अवतरण; दुरत्ययम्ू-दुर्लघ्य; तम:ः--संसार का अंधकार; पूर्वे-- भूतकाल केमनुष्य; अतरन्ू--तर गये, पार कर गये; यत्--जिसके; नख-मण्डल--पैर के नाखूनों के मण्डल के; त्विषा--तेज से
निस्सन्देह, आज कंस ने मुझे उन भगवान् हरि के चरणकमलों का दर्शन करने के लिएभेजकर मेरे ऊपर महती कृपा की है, जिन्होंने अब इस संसार में अवतार लिया है।
भूतकाल मेंउनके चरण-नखों के तेज से ही इस भौतिक संसार के दुर्लध्य अंधकार को अनेक आत्माओं नेपार करके मुक्ति प्राप्त की है।
यदर्चितं ब्रह्मभवादिभि: सुरैःश्रिया च देव्या मुनिभिः ससात्वतैः ।
गोचारणायानुचर श्वरद्वनेयद्गोपिकानां कुचकुड्डू माड्चितम् ॥
८॥
यत्--जो ( चरणकमल ); अर्चितम्-- पूजित; ब्रह्मय-भव--ब्रह्मा तथा शिव; आदिभि: -- त्यादि द्वारा; सुरैः--देवताओं द्वारा;श्रिया-- श्री द्वारा; च-- भी; देव्या--देवी; मुनिभि: --मुनियों द्वारा; स-सात्वतैः-- भक्तों के समेत; गो--गौवें; चारणाय--चरानेके लिए; अनुचरैः-- अपने संगियों समेत; चरत्--विचरण करते; वने--जंगल में; यत्--जो; गोपिकानामू--गोपिकाओं के;कुच-स्तन से; कुल्डढु म--लाल कुंकुम चूर्ण से; अद्धितम्-चिन्हित।
उन्हीं चरणकमलों की ब्रह्मा, शिव तथा अन्य सारे देवता, लक्ष्मीजी तथा बड़े बड़े मुनि और वैष्णव पूजा करते हैं।
उन्हीं चरणकमलों से भगवान् अपने संगियों सहित गौवें चराते समय जंगलमें विचरण करते हैं और वे ही चरण गोपियों के स्तनों पर लगे कुंकुम से सने रहते हैं।
द्रक्ष्यामि नूनं सुकपोलनासिकंस्मितावलोकारुणकझ्जललोचनम् ।
मुखं मुकुन्दस्य गुडालकावृतंप्रदक्षिणं मे प्रचरन्ति वै मृगा: ॥
९॥
द्रक्ष्यामि--देखूँगा; नूनमू--निश्चय ही; सु--सुन्द;; कपोल--गाल; नासिकम्--तथा नाक; स्मित--हँसी से युक्त; अवलोक--चितवन; अरुण--लाल; कञज्ञ--कमल सहश; लोचनम्-- आँखें ; मुखम्--मुख; मुकुन्दस्य-- भगवान् कृष्ण के; गुड--घुँघराले; अलक--बाल; आवृतम्--चारों ओर से घिरा; प्रदक्षिणम्--परिक्रमा; मे--मेरा; प्रचरन्ति--सम्पन्न कर रहे हैं; बै--निस्सन्देह; मृगा:--मृगगण, हिरन।
अवश्य ही मैं भगवान् मुकुन्द के मुख को देखूँगा क्योंकि अब हिरन मेरी दाईं ओर सेनिकल रहे हैं।
वह मुख घुँघराले बालों से घिरा है और उनके आकर्षक गालों तथा नाक, उनकीमन्द हासयुक्त चितवन तथा लाल कमल जैसी आँखों से शोभायमान है।
अप्यद्य विष्णोर्मनुजत्वमीयुषोभारावताराय भुवो निजेच्छया ।
लावण्यधाम्नो भवितोपलम्भनंमहां न न स्थात्फलमझसा हृशः ॥
१०॥
अपि--और भी; अद्य--आज ; विष्णो:-- भगवान् विष्णु के; मनुजत्वम्--मनुष्य रूप को; ईयुष:-- धारण किये हुए; भार--भार; अवताराय--कम करने के लिए; भुव:ः--पृथ्वी की; निज--अपनी; इच्छया--इच्छा से; लावण्य--सौंदर्य के; धाम्न:--धाम की; भविता--होगी; उपलम्भनम्-- अनुभूति; मह्मम्--मेंरे लिए; न--ऐसा नहीं है कि; न स्थात्ू--नहीं होयेगा; फलम्--'फल; अज्जसा- प्रत्यक्ष; हश:--दर्शन का ।
मुझे समस्त सौन्दर्य के आगार उन भगवान् विष्णु के दर्शन होंगे जिन्होंने पृथ्वी का भारउतारने के लिए स्वेच्छा से मनुष्य जैसा स्वरूप धारण किया है।
इस तरह इसमें कोई सन्देह नहींकि मेरी आँखों को उनके अस्तित्व का फल प्राप्त हो जायेगा।
य ईक्षिताहंरहितोप्यसत्सतो: स्वतेजसापास्ततमोभिदा भ्रम: ।
स्वमाययात्मन्रचितैस्तदी क्षयाप्राणाक्षधीभि: सदनेष्वभीयते ॥
११॥
यः--जो; ईक्षिता--साक्षी; अहम्--मिथ्या अभिमान से; रहित:--रहित; अपि--फिर भी; असत्ू-सतो:--कारण-कार्य का;स्व-तेजसा--अपनी निजी शक्ति से; अपास्त--दूर करके; तम:--अज्ञान का अंधकार; भिदा--पृथकत्व का भाव; भ्रम:--तथाभ्रम; स्व-मायया--अपनी भौतिक सृजन-शक्ति द्वारा; आत्मन्ू--अपने भीतर; रचितैः --रचे हुए ( जीवों ) के द्वारा; तत्-ईक्षया--माया पर दृष्टि डालने से; प्राण--प्राण-वायु; अक्ष--इन्द्रियाँ; धीभि:--तथा बुद्ध्धि से; सदनेषु-- जीवों के शरीरों केभीतर; अभीयते--उनकी उपस्थिति की प्रतीति होती है|
वे भौतिक कार्य-कारण के साक्षी हैं फिर भी वे उनकी झूठी पहचान से अपने को सदैवपृथक् रखते हैं।
वे अपनी अन्तरंगा शक्ति के द्वारा पृथकत्व तथा भ्रम के अंधकार को दूर करतेहैं।
जब वे अपनी भौतिक सृजन-शक्ति पर दृष्टि डालते हैं, तो इस जगत के जीव प्रकट होते हैंऔर ये जीव उन्हें अपनी प्राण-वायु, इन्द्रियों तथा बुद्धि कार्यो में अप्रत्यक्ष रूप से अनुभव करतेहैं।
यस्याखिलामीवहभि: सुमड्नलै:-वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभि: ।
प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगत्यास्तद्विरक्ता: शवशोभना मता; ॥
१२॥
यस्य--जिसका; अखिल--सारा; अमीव--पाप; हभि:--नष्ट करने वाला; सु-मड्नलैः --अत्यन्त शुभ; वाच:--शब्द;विमिश्रा:--जुड़े हुये; गुण--गुणों से; कर्म--कर्मों; जन्मभि: --तथा अवतारों से; प्राणन्ति--प्राण दे देते हैं; शुम्भन्ति--सुन्दरबनाते हैं; पुनन्ति--तथा शुद्ध करते हैं; वै--निस्सन्देह; जगत्--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड; या:--जो ( शब्द ); तत्--इनके; विरक्ता:--रहित; शव--मृत शरीर का; शोभना:--सजाने जैसा; मता:--माना जाता है।
भगवान् के गुणों, कर्मो तथा अवतारों से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं तथा उत्पन्न समस्त सौभाग्य एवं इन तीनों का वर्णन करने वाले शब्द संसार को जीवनदान देते हैं, उसे सुशोभितबनाते हैं और शुद्ध करते हैं।
दूसरी ओर, उनकी महिमा से विहीन शब्द शव की सजावट करनेजैसे होते हैं।
स चावतीर्ण: किल सत्वतान्वयेस्वसेतुपालामरवर्यशर्मकृत् ।
यशो वितन्वन्ब्रज आस्त ई श्वरोगायन्ति देवा यदशेषमड्रलम् ॥
१३॥
सः--वह; च--तथा; अवतीर्ण: --अवतरित होकर; किल--निस्सन्देह; सात्वत--सात्वतों के; अन्वये--कुल में; स्व-- अपना;सेतु--धर्म के संकेत; पाल--पालने वाला; अमर-वर्य--मुख्य देवताओं का; शर्म--हर्ष; कृत्--उत्पन्न करके; यश:--अपनीख्याति; वितन्वन्--फैलाते हुए; ब्रजे--ब्रज में; आस्ते--उपस्थित है; ई श्वरः--परमे श्वर; गायन्ति-- गाते हैं; देवा:--देवतागण;यत्--जिसका; अशेष-मड्जलम्--सर्व कल्याणप्रद।
वे ही भगवान् सात्वत वंश में प्रमुख देवताओं को प्रसन्न करने के लिए अवतरित हुए हैं, जोउनके द्वारा निर्मित्त धर्म के नियमों को धारण करने वाले हैं।
वे वृन्दावन में रहते हुए अपने यशका विस्तार करते हैं जिसकी महिमा देवतागण गाकर करते हैं और जो सबों को मंगल प्रदानकरने वाला है।
त॑ त्वद्य नूनं महतां गतिं गुरुत्रैलोक्यकान्तं हशिमन्महोत्सवम् ।
रूप॑ दधानं थिय ईप्सितास्पदंद्रक्ष्ये ममासन्रुषसः सुदर्शना: ॥
१४॥
तम्--उसको; तु--फिर भी; अद्य--आज; नूनम्--निश्चय ही; महताम्--महात्माओं के; गतिम्--गन्तव्य को; गुरुम्-तथा गुरुको; त्रै-लोक्य--तीनों जगतों की; कान्तमू--असली सुन्दरता; हशि-मत्--आँख वालों के लिए; महा-उत्सवम्--महान् उत्सव;रूपम्--उनका साकार रूप; दधानम्--प्रकट करते हुए; थ्रियः--लक्ष्मी का; ईप्सित--इच्छित; आस्पदम्ू--शरणस्थल;द्रक्ष्य --देखूँगा; मम--मेरा; आसन्--आ चुके हैं; उषसः--सबेरे; सु-दर्शना:--देखने में शुभ |
आज मैं उन्हें अवश्य देखूँगा, जो कि महात्माओं के गन्तव्य तथा आध्यात्मिक गुरु हैं।
सभी नेत्रवानों को उनके दर्शन से हर्ष होता है क्योंकि वे ब्रह्माण्ड के असली सौन्दर्य हैं।
निस्सन्देहउनका साकार रूप लक्ष्मीजी द्वारा अभीष्सित आश्रय है।
अब मेरे जीवन के समस्त प्रभात शुभबन चुके हैं।
अथावरूढः सपदीशयो रथात्प्रधानपुंसो श्वरणं स्वलब्धये ।
धिया धृतं योगिभिरप्यहं श्लुवंनमस्य आशभ्यां च सखीन्वनौकसः ॥
१५॥
अथ--तब; अवरूढ:--उतरकर; सपदि--तुरन्त; ईशयो: --दोनों ईश्वरों के; रथात्--रथ से; प्रधान-पुंसो:-- भगवान् के;चरणमू--चरणों को; स्व-लब्धये--आत्म-साक्षात्कार के लिए; धिया--उनकी बुद्धि से; धृतम्--पकड़े हुए; योगिभि:--योगियों द्वारा; अपि-- भी; अहम्--मैं; ध्रुवम्--निश्चित रूप से; नमस्ये--नमस्कार करूँगा; आभ्याम्--उन दोनों को; च-- भी;सखीनू--मित्रों; बन-ओकस: --वनवासियों को |
तब मैं तुरन्त अपने रथ से नीचे उतर आऊँगा और भगवान् कृष्ण तथा भगवान् बलराम दोनोंके चरणकमलों को नमस्कार करूँगा।
उनके पैर वही हैं, जिन्हें आत्मसाक्षात्कार के लिएप्रयलशील बड़े बड़े योगी अपने मन के भीतर धारण करते हैं।
मैं दोनों के बालमित्रों तथावृन्दावन के अन्य समस्त वासियों को भी अपना नमस्कार निवेदित करूँगा।
अप्यड्प्रिमूले पतितस्य मे विभुःशिरस्यधास्यन्निजहस्तपड्छजम् ।
दत्ताभयं कालभुजाडुरंहसाप्रोद्ठेजितानां शरणैषिणां णूनाम् ॥
१६॥
अपि--और भी; अड्प्रि--उनके चरणों के; मूले--के निकट; पतितस्थ--गिरे हुए का; मे--मेरे; विभुः--शक्तिशाली प्रभु;शिरसि--सिर पर; अधास्यत्--रखेंगे; निज--अपना; हस्त--हाथ; पड्डूजम्--कमल सहश; दत्त--देने वाला; अभयम्--अभय; काल--समय; भुज-अड्ग--सर्प का; रंहसा--वेग से; प्रोद्ठेजितानामू--जो अत्यधिक व्यग्र हैं; शरण--शरण;एपिणाम्--ढूँढ़ने वाले; नृणाम्--मनुष्यों के लिए।
और जब मैं उनके चरणों पर गिर पड़ूँगा तो सर्वशक्तिमान प्रभु मेरे सिर पर अपना करकमलरख देंगे।
जो लोग काल रूपी शक्तिशाली सर्प से अत्यन्त विचलित होकर उनकी शरण में जातेहैं, यह हाथ उनके सारे भय को दूर कर देता है।
समर्हणं यत्र निधाय कौशिक-स्तथा बलिश्वाप जगत्नयेन्द्रताम् ।
यद्वा विहारे ब्रजयोषितां श्रमंस्पर्शेन सौगन्धिकगन्ध्यपानुदत् ॥
१७॥
समरहणम्--सादर भेंट; यत्र--जिसमें; निधाय--रखकर; कौशिक:--पुरन्दर; तथा--और; बलि:ः-- बलि महाराज ने; च--भी;आप-- प्राप्त किया; जगत्--लोकों का; त्रय--तीन; इन्द्रतामू--शासन ( इन्द्र रूप में ); यत्--जो ( कर-कमल ); वा--तथा;विहारे--लीला ( रासनृत्य ) के समय; ब्रज-योषिताम्--ब्रज की स्त्रियों की; श्रमम्-- थकान को; स्पर्शेन--उनके स्पर्श से;सौगन्धिक--सुगन्धवान फूल की तरह; गन्धि--सुगन्धित; अपानुदत्-पोंछा |
उस कमल सहश हाथ में दान देकर पुरन्दर तथा बलि ने स्वर्ग के राजा इन्द्र के पद को प्राप्तकिया और रासनृत्य की आनन्द लीलाओं के समय जब भगवान् ने गोपियों के पसीने कोपोंछकर उनकी थकान दूर की तो उनके मुखस्पर्श ने उस हाथ को मधुर फूल की तरह सुगन्धितबना दिया।
न मय्युपैष्यत्यरिबुद्ध्धिमच्युतःकंसस्य दूतः प्रहितोपि विश्वदक् ।
योडन्तर्बहिश्लेतस एतदीहितंक्षेत्रज्ञ ईक्षत्यमलेन चक्षुषा ॥
१८॥
न--नहीं; मयि--मेरी ओर; उपैष्यति--उत्पन्न करेगा; अरि--शत्रु होने की; बुद्धिम्--प्रवत्ति; अच्युतः--अच्युत भगवान्;कंसस्य--कंस का; दूत:ः--दूत; प्रहित:-- भेजा गया; अपि--यद्यपि; विश्व--हर वस्तु का; हक्--साक्षी; यः--जो; अन्त:ः--भीतर; बहिः--तथा बाहर; चेतस:--हृदय का; एतत्--यह; ईहितम्--जो भी किया जाता है; क्षेत्र--खेत का ( भौतिक शरीरका ); ज्ञः--ज्ञाता; ईक्षति--देखता है; अमलेन--पूर्ण; चक्षुषा--दृष्टि से |
यद्यपि कंस ने मुझे यहाँ अपना दूत बनाकर भेजा है किन्तु अच्युत भगवान् मुझे अपना शत्रुनहीं मानेंगे।
आखिर, सर्वज्ञ प्रभु इस भौतिक शरीर रूपी क्षेत्र के वास्तविक ज्ञाता हैं ( क्षेत्रज्ञ )और वे अपनी पूर्ण दृष्टि से बद्धजीवों के हृदय के सारे प्रयासों को अन्दर और बाहर से देखते हैं।
अप्यडूप्रिमूलेवहितं कृताझ्जलिंमामीक्षिता सस्मितमार्द्रया दशा ।
सपद्यपध्वस्तसमस्तकिल्बिषोवबोढा मुदं वीतविशड्डू ऊर्जिताम्ू ॥
१९॥
अपि--तथा; अड्प्नि-पैरों के; मूले--तल पर; अवहितम्ू--स्थिर; कृत-अद्जञलिम्--हाथ जोड़े; माम्-- मुझको; ईक्षिता--देखेंगे; सस्मितम्--हँसी से युक्त; आर्द्रया--स्नेहपूर्ण; हशा--चितवन से; सपदि--तुरन्त; अपध्वस्त--समूल नष्ट; समस्त--सारे;किल्बिष:--कल्मष; वोढा--प्राप्त करूँगा; मुदम्ू--सुख; बीत--मुक्त होकर; विशड्भ:--शंका से; ऊर्जिताम्-तीब्र |
इस तरह जब मैं हाथ जोड़कर उनके पैरों पर प्रणाम करने के लिए गिरकर पड़ा रहूँगा वेअपनी हँसीयुक्त स्नेहमयी चितवन मुझ पर डालेंगे।
तब मेरा सारा कल्मष छू-मन्तर हो जायेगा।
तब मेरे सारे संशय दूर हो जायेंगे और मैं गहन आनन्द का अनुभव करूँगा।
सुहृत्तमं ज्ञातिमनन्यदैवतंदोर्भ्या बृहद्भ्यां परिरप्स्यतेथ माम् ।
आत्मा हि तीर्थीक्रियते तदैव मेबन्धश्च कर्मात्मक उच्छुसित्यत: ॥
२०॥
सुहत्-तमम्--सर्वश्रेष्ठ मित्र; ज्ञातिमू--परिवार का सदस्य; अनन्य--एकान्तिक; दैवतम्-पूजा के लक्ष्य के रूप में ( आराध्यदेव ); दोर्भ्यामू--अपने दोनों बाहुओं में; बृहद्भ्यामू--विशाल; परिरप्स्यते--आलिंगन; अथ-त्पश्चात्; माम्--मुझको;आत्मा--शरीर; हि--निस्सन्देह; तीर्थी--पवित्र; क्रियते--करेगा; तदा एव--तभी; मे--मेरा; बन्ध:--बन्धन; च--तथा; कर्म-आत्मक:ः--सकाम कर्म के कारण; उच्छुसिति--शिथिल हो जायेगा; अत:--इसके फलस्वरूप |
मुझे अपने घनिष्ठ मित्र तथा सम्बन्धी के रूप में पहचान कर कृष्ण अपनी विशाल भुजाओंसे मुझे अपने गले लगा लेंगे जिससे उसी क्षण मेरा शरीर पवित्र हो जायेगा और सकाम कर्मों सेजनित मेरे भौतिक बन्धन शून्य हो जायेंगे।
लब्ध्वाड्सड्डरम्प्रणतम्कृताझलिंमां वक्ष्यतेक्रूर ततेत्युरु भ्रवा: ।
तदा बयं जन्मभूतो महीयसानैवाहतो यो धिगमुष्य जन्म तत् ॥
२१॥
लब्ध्वा--प्राप्त करके; अड्-सड़म्-- भौतिक सम्पर्क; प्रणतम्--सिर नीचा किये खड़ा हुआ; कृत-अज्जलिम्ू--हाथ जोड़े;माम्--मुझसे; वक्ष्यते--बोलेंगे; अक्रूर--हे अक्रूर; तत--मेरे परिजन; इति--इन शब्दों में; उरु श्रवा:--कृष्ण, जिनकी ख्यातिअपार है; तदा--तब; वयम्--हम; जन्म-भूत:-- जन्म सफल हो जायेगा; महीयसा--पुरुष- श्रेष्ठ द्वारा; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; आहत:ः--आदरित; यः--जो; धिक्-धिक्कार है; अमुष्य--उसका; जन्म--जन्म; तत्--वह सर्व-सुविख्यात
कृष्ण द्वारा गले लगाये जाने के बाद मैं उनके समक्ष विनम्र भाव से सिरझुकाकर तथा हाथ जोड़कर खड़ा रहूँगा और वे मुझसे कहेंगे, 'मेंरे प्रिय अक्रूर, ' उसी क्षण मेरेजीवन का उद्देश्य सफल हो जायेगा।
दरअसल जिस व्यक्ति को भगवान् मान्यता नहीं देते उसकाजीवन दयनीय है।
न तस्य कश्चिदयितः सुहृत्तमोनचाप्रियो द्वेष्य उपेक्ष्य एव वा ।
तथापि भक्तान्भजते यथा तथासुरद्रुमो यद्वदुपाञ्रितोर्थद: ॥
२२॥
न तस्य--उसका नहीं है; कश्चित्--कोई; दबित:--प्रिय; सुहृत्तम:--सर्व श्रेष्ठ मित्र; न च--न तो; अप्रिय: --अप्रिय; द्वेष्य:--जिससे द्वेष किया जा सके; उपेक्ष्य:--उपेक्षित; एब--निस्सन्देह; वा--अथवा; तथा अपि--फिर भी; भक्तान्ू--अपने भक्तोंको; भजते-- भजता है; यथा--वे जैसे हैं; तथा--उसी के अनुसार; सुर-द्रुः--कल्पवृक्ष; यद्वत्ू--जिस प्रकार; उपाश्रित:--शरणागत; अर्थ--इच्छित फल; दः--देने वाला।
भगवान् का न तो कोई अप्रिय है, न सर्वश्रेष्ठ मित्र है, न ही वे किसी को अवांछनीय, घृणितया उपेक्षणीय मानते हैं।
साथ ही साथ अपने भक्तों से, जीस भाव से पूजा करते हैं उसी तरह प्रेमका आदान-प्रदान करते हैं जिस तरह कल्प-वृक्ष अपने पास आने वालों की इच्छाएँ पूरी करतेहैं।
कि चाग्रजो मावनतं यदूत्तम: स्मयन्परिष्वज्य गृहीतमझ्जलौ ।
गहं प्रवेष्याप्तससमस्तसत्कृतंसम्प्रक्ष्यते कंसकृतं स्वबन्धुषु ॥
२३॥
किम् च--और तो और; अग्र-ज:--उनके बड़े भाई ( बलराम ); मा--मुझको; अवनतम्--सिर झुकाये मुझको; यदु-उत्तम:--यदुओं में सर्वश्रेष्ठ; स्मथन्--हँसते हुए; परिष्वज्य--आलिंगन करके; गृहीतम्--पकड़े हुए; अज्ललौ--मेरी हथेलियों से; गृहम्--घर में; प्रवेष्य-- ले जाकर; आप्त--प्राप्त किया हुआ; समस्त--सारा; सत्-कृतम्--सत्कार; सम्प्रक्ष्यते--पूछेंगे; कंस--कंसद्वारा; कृतम्--किया गया; स्व-बन्धुषु-- अपने परिवार वालों के प्रति।
और जब मैं अपना सिर झुकाये खड़ा होऊँगा तब कृष्ण के बड़े भाई, यदुश्रेष्ठ बलराम मेरेजुड़े हुए हाथों को थाम लेंगे और फिर मेरा आलिंगन करके वे मुझे अपने घर ले जायेंगे।
वहाँ वेसभी प्रकार की अनुष्ठान-सामग्री से मेरा सत्कार करेंगे और मुझसे पूछेंगे कि कंस उनके परिवारवालों के साथ कैसा व्यवहार कर रहा है।
श्रीशुक उबाचइति सझ्ञिन्तयन्कृष्णं श्रफल्कतनयोध्वनि ।
रथेन गोकुल प्राप्त: सूर्य श्रास्तगिरिं नूप ॥
२४॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; सद्धिन्तयन्--गम्भीरतापूर्वक सोचते हुए; कृष्णम्--कृष्ण केविषय में; श्रफल्क-तनयः-- श्रफल्कपुत्र, अक्रूर; अध्वनि--मार्ग में; रथेन--अपने रथ द्वारा; गोकुलम्ू--गोकुल गाँव; प्राप्त:--पहुँच गया; सूर्य:--सूर्य; च--तथा; अस्त-गिरिम्--अस्ताचल; नृप--हे राजा ( परीक्षित )
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजन्, मार्ग पर जाते हुए श्रफल्कपुत्र ( अक्वूर ) कृष्णके विषय में इस तरह गम्भीरतापूर्वक ध्यान करते करते जब गोकुल पहुँचे तो सूर्यअस्त होने कोथा।
पदानि तस्याखिललोकपाल-किरीटजुष्टामलपादरेणो: ।
ददर्श गोष्ठे क्षतिकौतुकानिविलक्षितान्यब्जयवाडरु शाद्यै: ॥
२५॥
पदानि--पदचिह्न; तस्य--उसके; अखिल--समस्त; लोक--लोकों के; पाल--पालकों द्वारा; किरीट--अपने मुकुटों पर;जुष्ट--रखा; अमल--शुद्ध; पाद--पैरों की; रेणो:ः--धूलि का; ददर्श--( अक्रूर ने ) देखा; गोष्ठे--चरागाह में ; क्षिति--पृथ्वी पर; कौतुकानि--अद्भुत ढंग से अलंकृत; विलक्षितानि--स्पष्ट दिख रहे; अब्न--कमल; यव--जौ की बाल; अद्डु श--हाथीका अंकुश; आद्यै:--इत्यादि से
चरागाह में अक्रूर ने उन पैरों के चिन्ह देखे जिनकी शुद्ध धूल को समस्त ब्रह्माण्डों केलोकपाल अपने मुकुटों में धारण करते हैं।
भगवान् के वे चरणचिन्ह जो कमल, वांकुर तथाअंकुश जैसे चिन्हों से पहचाने जा सकते थे, पृथ्वी की शोभा को बढ़ा रहे थे।
तदर्शनाह्ादविवृद्धसम्भ्रम:प्रेम्णोर्ध्वरोमा श्रुकलाकुलेक्षण: ।
रथादवस्कन्द्य स तेष्वचेष्टतप्रभोरमून्यड्प्रिरजांस्यहो इति ॥
२६॥
ततू्--कृष्ण के चरणचिह्नों के; दर्शन--दर्शन से; आहाद--आनन्द से; विवृद्ध--अत्यधिक वर्थित; सम्भ्रम: -- क्षोभ; प्रेमणा--शुद्ध-प्रेमवश; ऊर्ध्व--सीधे खड़े; रोम--शरीर के रोएँ; अश्रु-कला--आँसुओं से; आकुल--पूरित; ईक्षण:--आँखें; रथात्--रथ से; अवस्कन्द्य--उतरकर; सः--वह, अक्रूर; तेषु--उन ( चरणचिह्नों ) के बीच; अचेष्टत--लोटने लगा; प्रभो:--प्रभु के;अमूनि--ये; अड्प्रि--पाँवों के; रजांसि--धूलकण; अहो--ओह; इति--इन शब्दों के साथ
भगवान् के चरणचिन्हों को देखने से उत्पन्न आनन्द से अधिकाधिक विह्नल होने से शुद्ध-प्रेम के कारण अक्रूर के शरीर के रोंगटे खड़े हो गये और आँखें आँसुओं से भर आईं।
वे अपनेरथ से नीचे कूद पड़े और उन चरणचिन्हों पर यह चीखकर लोटने लगे, ओह, यह तो मेरे प्रभुके चरणों की धूल है।
'देहंभूतामियानर्थो हित्वा दम्भं भियं शुच्म् ।
सन्देशाद्यो हरेलिड्डदर्शनश्रवणादिभि: ॥
२७॥
देहम्-भूताम्--देहधारी जीवों के; इयान्ू--इतना; अर्थ:--जीवन-लक्ष्य; हित्वा--त्यागकर; दम्भम्ू-गर्व; भियम्-- भय;शुचम्ू--तथा शोक; सन्देशात्--( कंस द्वारा ) आज्ञा दिये जाने से; यः--जो; हरेः--भगवान् कृष्ण के; लिड्र--चिह्न; दर्शन--देखने; श्रवण--सुनना; आदिभि:--इत्यादि के साथ।
समस्त जीवधारियों का जीवन-लक्ष्य यही आनन्द है, जिसे अक्रूर ने कंस का आदेश पाकरअपना सारा गर्व, भय तथा शोक त्यागकर अनुभव किया तथा अपने आपको भगवान् कृष्ण कास्मरण दिलाने वाली वस्तुओं को देखने, सुनने एवं वर्णन करने में लीन कर दिया।
ददर्श कृष्णं राम॑ च ब्रजे गोदोहनं गतौ ।
'पीतनीलाम्बरधरौ शरदम्बुरहेक्षणौ ॥
२८॥
किशोरौ श्यामलश्वेतौ श्रीनिकेतौ बृहद्भुजौ ।
सुमुखौ सुन्दरवरौ बलद्विरदविक्रमौ ॥
२९॥
ध्वजवज़ाड्लु शाम्भोजैश्विह्नितिरड्प्रिभिर्रेजम् ।
शोभयन्तौ महात्मानौ सानुक्रोशस्मितेक्षणौ ॥
३०॥
उदाररुचिरक्रीडौ स्त्रग्विणौ वनमालिनौ ।
पुण्यगन्धानुलिप्ताड़ौ स््नातौ विरजवाससौ ॥
३१॥
प्रधानपुरुषावाद्यौ जगद्धेतू जगत्पती ।
अवतीर्णों जगत्यर्थे स्वांशेन बलकेशवौ ॥
३२॥
दिशो वितिमिरा राजन्कुर्वाणौ प्रभया स्वया ।
यथा मारकतः शैलो रौप्यश्व कनकाचितौ ॥
३३॥
दर्दर्श--देखा; कृष्णम् रामम् च--कृष्ण तथा बलराम को; ब्रजे--ब्रज के ग्राम में; गो--गौवें; दोहनम्--गोशालाओं में;गतौ--गई हुईं; पीत-नील--पीले तथा नीले; अम्बर--वस्त्र; धरौ--धारण किये; शरत्--शरदकालीन; अम्बुरुह--कमलों कीतरह; ईक्षणौ--आँखें; किशोरौ--दोनों युवक; श्यामल- श्रेतौ--गहरा नीला तथा सफेद; श्री-निकेतौ--लक्ष्मी के आश्रयों;बृहत्--बलशाली; भुजौ--भुजाएँ; सु-मुखौ--दोनों के आकर्षक मुखों; सुन्दर-वरौ--अत्यन्त सुन्दर; बल--युवक; द्विरद--हाथी की तरह; विक्रमौ--चाल; ध्वज--पताका; वज्ञ--वज्; अड्डु श--अंकुश; अम्भोजै: --तथा कमल से; चिह्नितैः--चिन्हित; अड्प्रिभि: --पैरों से; ब्रजम्--चरागाह; शोभयन्तौ--सुशोभित करते; महा-आत्मानौ--दोनों महान् आत्माएँ; स-अनुक्रोश--दयालु; स्मित--तथा हँसती हुई; ईक्षणौ--चितवनें; उदार--उदार; रुचिर--तथा आकर्षक; क्रीडौ--लीलाएँ;सत्रकु-विनौ--मणिजटित माला पहने; बन-मालिनौ--तथा फूलों की माला पहने; पुण्य--शु भ; गन्ध--सुगन्धित पदार्थों से;अनुलिप्त--लेप किये; अड्जौ--शरीर के अंग; स्नातौ--तुरन्त नहाए; विरज--निर्मल; वाससौ--वस्त्र; प्रधान--महान; पुरुषौ--दोनों पुरुष; आद्यौ--आदि; जगत््-धेतू--ब्रह्माण्ड के कारण; जगत्-पती--ब्रह्माण्ड के स्वामी; अवतीर्णों--अवतरित होकर;जगति-अर्थ--ब्रह्माण्ड के लाभ हेतु; स्व-अंशेन--अपने अपने रूपों में; बल-केशवौ--बलराम तथा केशव; दिश:--सारीदिशाएँ; वितिमिरा:--अंधकार रहित; राजन्--हे राजन; कुर्वाणौ--करते हुए; प्रभवा--तेज से; स्वया--अपने; यथा--जिसतरह; मारकतः--मरकत मणि से बना; शैल:--पर्वत; रौप्प:--चाँदी का बना; च--तथा; कनक--सोने से; अचितौ--दोनोंसज्जि
ततत्पश्चात् अक्रूर ने ब्रज-ग्राम में कृष्ण तथा बलराम को गौवें दुहने के लिए जाते देखा।
कृष्ण पीले वस्त्र पहने थे और बलराम नीले वस्त्र पहने थे।
उनकी आँखें शरदकालीन कमलों केसमान थीं।
इन दोनों बलशाली भुजाओं वाले, लक्ष्मी के आश्रयों में से एक का रंग गहरा नीला था और दूसरे का श्वेत था।
ये दोनों ही समस्त व्यक्तियों में सर्वाधिक सुन्दर थे।
जब वे युवकहाथियों की-सी चाल से अपनी दयामय मुस्कानों से निहारते चलते तो ये दोनों महापुरुष अपनेपदचिन्हों से चरागाह को सुशोभित बनाते जाते।
ये पदचिन्ह पताका, वज्र, अंकुश तथा कमलचिन्हों से युक्त थे।
ये अत्यन्त उदार तथा आकर्षक लीलाओं वाले दोनों प्रभु मणिजटित हार तथा'फूल-मालाएँ पहने थे, इनके अंग शुभ सुगन्धित द्रव्यों से लेपित थे।
ये अभी अभी स्नान करकेआये थे और निर्मल वस्त्र पहने हुए थे।
इन आदि महापुरुषों तथा ब्रह्माण्डों के आदि कारणों नेपृथ्वी के कल्याण हेतु अब केशव तथा बलराम के रूप में अवतार लिया था।
हे राजा परीक्षित,वे दोनों दो स्वर्ण-आभूषित पर्वतों के समान लग रहे थे जिनमें से एक पर्वत मरकत मणि का थाऔर दूसरा चाँदी का था क्योंकि वे अपने तेज से सारी दिशाओं में आकाश के अंधकार को दूरकर रहे थे।
रथात्तूर्णमवप्लुत्य सोक्रूर: स्नेहविहलः ।
'पपात चरणोपान्ते दण्डवद्रामकृष्णयो; ॥
३४॥
रथात्--रथ से; तूर्णम्-शीकघ्रतापूर्वक; अवप्लुत्य--उतरकर; सः--वह; अक्रूर:ः --अक्रूर; स्नेह--स्नेह से; विहल:--अभिभूत;पपात--गिर पड़ा; चरण-उपान्ते--चरणों के निकट; दण्ड-वत्--डंडे की तरह; राम-कृष्णयो:--बलराम तथा कृष्ण के |
स्नेह से अभिभूत अक्रूर तुरन्त अपने रथ से नीचे कूदकर बलराम तथा कृष्ण के चरणों परडंडे के समान गिर पड़े।
भगवद्र्शनाह्नादबाष्पपर्याकुलेक्षण: ।
पुलकचिताडु औत्कण्ठ्यात्स्वाख्याने नाशकन्नूप ॥
३५॥
भगवत्-- भगवान् के; दर्शन--दर्शन से; आह्ाद-- प्रसन्नता से; बाष्प-- आँसुओं से; पर्याकुल--विह्ल; ईक्षण:--नेत्र;पुलक--उभाड़; आचित--अंकित; अड्ड:-- अंग; औत्कण्ठ्यात्--उत्कण्ठा से; स्व-आख्याने--अपने आपको व्यक्त करने केलिए; न अशकत्--सक्षम नहीं था; नृप--हे राजन् |
भगवान् के दर्शन की प्रसन्नता से अक्रूर की आँखों में आँसू आ गये और अंगों में आनन्द काउभाड़ हो आया।
उन्हें ऐसी उत्कण्ठा हुई कि हे राजनू, वे अपने आपको वाणी द्वारा व्यक्त नहींकर सके।
भगवांस्तमभिप्रेत्य रथाझड्लितपाणिना ।
परिरेभे भ्युपाकृष्य प्रीतः प्रणतवत्सलः ॥
३६॥
भगवान्-- भगवान्; तम्--उसको, अक्रूर को; अभिप्रेत्य--पहचान कर; रथ-अड्ड--रथ के पहिए से; अद्भित--अंकित;पाणिना--अपने हाथ से; परिरिभे--आलिंगन किया; अभ्युपाकृष्य--पास खींचकर; प्रीत:--प्रसन्न; प्रणत--शरणागतों केप्रति; वत्सलः--स्नेहवान |
अक्रूर को पहचान कर भगवान् कृष्ण ने उन्हें रथ के चक्र से अंकित अपने हाथ से अपनेनिकट खींचा और तब उनका आलिंगन किया।
कृष्ण को प्रसन्नता हुई क्योंकि वे अपनेशरणागत भक्तों के प्रति सदैव स्नेहिल रहते हैं।
सड्डर्षणश्न प्रणतमुपगुहा महामना: गृहीत्वा पाणिना पाणी अनयत्सानुजो गृहम् ॥
३७॥
पृष्ठाथ स्वागतं तस्मै निवेद्या च वरासनम् ।
प्रक्षाल्य विधिवत्पादौ मधुपर्काईणमाहरत् ॥
३८ ॥
सट्डूर्षण:--बलराम; च--तथा; प्रणतम्--सिर झुकाये खड़ा; उपगुह्ा--आलिंगन करके; महा-मना:--उदार; गृहीत्वा--पकड़कर; पाणिना--अपने हाथ से; पाणी--उसके दोनों हाथ; अनयत्--ले गया; स-अनुज:--अपने छोटे भाई ( कृष्ण )समेत; गृहम्--घर को; पृष्ठा--पूछ कर; अथ-- तब; सु-आगतम्--उसकी यात्रा की सुख-सुविधा के विषय में; तस्मै--उसको;निवेद्य--अर्पित करके; च--तथा; वर-- श्रेष्ठ; आसनम्-- आसन; प्रक्षाल्य--धोकर; विधि-वत्--शास्त्रों के आदेशानुसार;पादौ--उसके पाँव; मधु-पर्क--दूध मिश्रित शहद; अ्हणम्--सादर भेंट के रूप में; आहरत्ू--ले आया।
जब अक्रूर अपना सिर झुकाये खड़े थे तो भगवान् संकर्षण ( बलराम ) ने उनके जुड़े हुएहाथ पकड़ लिये और तब वे कृष्ण सहित उन्हें अपने घर ले गये।
अक्रूर से यह पूछने के बाद किउनकी यात्रा सुखद तो रही, बलराम ने उन्हें बैठने के लिए श्रेष्ठ आसन दिया, शास्त्रोचित विधि सेउनके पाँव पखारे और आदरपूर्वक मधुमिश्रित दूध दिया।
निवेद्य गां चातिथये संवाह्म श्रान्तमाड़त: ।
अन्न बहुगुणं मेध्यं श्रद्धयोपाहरद्विभु; ॥
३९॥
निवेद्य--दान में देते हुए; गामू--गाय; च--तथा; अतिथये--मेहमान को; संवाह्म--पाँव दबाकर; श्रान्तम्ू--थके हुए;अहतः--आदरपूर्वक; अन्नम्-- भोजन; बहु-गुणम्--विविध स्वादों वाला; मेध्यम्--अर्पण योग्य; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक;उपाहरत्--अर्पित किया; विभु:--सर्वशक्तिमान प्रभु ने।
सर्वशक्तिमान भगवान् बलराम ने अक्रूर को एक गाय भेंट की, उनकी थकान दूर करने केलिए उनके पाँव दबाये और तब परम आदर तथा श्रद्धा के साथ भाँति-भाँति के उत्तम स्वादों सेयुक्त और उचित विधि से पकाया भोजन खिलाया।
तस्मै भुक्तवते प्रीत्या राम: परमधर्मवित् ।
मखवासैर्गन्धमाल्यै: परां प्रीतिं व्यधात्पुन: ॥
४०॥
तस्मै--उसे; भुक्तवते--खा चुकने के बाद; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक; राम:ः--बलराम; परम--परम; धर्म-वित्-- धर्म के ज्ञाता;मुख-वासै:--मुख को सुगंधित करने वाले द्रव्यों से; गन्ध--सुगंध से; माल्यै:--फूल की मालाओं से; पराम्--सर्वोच्च;प्रीतिमू--सन्तोष; व्यधात्--व्यवस्था की; पुनः--आगे भी |
जब अक्रूर भरपेट खा चुके तो धार्मिक कर्तव्यों के परम ज्ञाता भगवान् बलराम ने उन्हें मुखको मीठा करने वाले सुगंधित द्रव्य दिये और साथ ही सुगन्धियाँ तथा फूल-मालाएँ भेंट कीं।
इसप्रकार अक्रूर ने एक बार फिर परम आनन्द प्राप्त किया।
पप्रच्छ सत्कृतं नन््दः कथं स्थ निरनुग्रहे ।
कंसे जीवति दाशाह सौनपाला इवावय: ॥
४१॥
पप्रच्छ--पूछा; सत्-कृतम्--सत्कार किया गया; नन्द:--ननन््द महाराज; कथम्--कैसे; स्थ--तुम रहे हो; निरनुग्रहे --निर्दय;कंसे--कंस के; जीवति--जीते हुए; दाशाई--हे दशाह वंशज; सौन--पशु की हत्या करने वाला, कसाई; पाला:--पालनेवाला; इव--जिस तरह; अवय:--भेड़ की ।
नन्द महाराज ने अक्रूर से पूछा: हे दशाई वंशज, उस निर्दयी कंस के जीवित होते हुए आपसभी किस तरह अपना पालन करते हैं? आप तो कसाई के संरक्षण में भेड़ जैसे हैं।
योवधीत्स्वस्वसुस्तोकान्क्रोशन्त्या असुतृप्खलः ।
कि नु स्वित्तत्प्रजानां व: कुशलं विमृशामहे ॥
४२॥
यः--जिसने; अवधीतू--मारा; स्व--अपने; स्वसु:--बहन के; तोकान्--बच्चों को; क्रोशन्त्या:--चिल्लाती हुई; असु-तृप्--स्वार्थी; खल:--क्रूर; किम् नु--तो क्या; स्वित्--निस्सन्देह; तत्--उसको; प्रजानाम्--प्रजा का; वः--तुमसे; कुशलम्--कुशलता; विमृशामहे -- हमें अनुमान लगा लेना चाहिए।
उस क्रूर स्वार्थी कंस ने अपनी बिलखती हुई दुखित बहन की उपस्थिति में ही उसके बच्चोंको मार डाला।
तो फिर हम तुमसे, जो कि उनकी प्रजा हो, कुशलता के विषय में पूछ ही क्यासकते हैं ?
इत्थं सूनृतया वाचा नन्देन सुसभाजित: ।
अक्रूरः परिपृष्टेन जहावध्वपरिश्रमम् ॥
४३॥
इत्थम््--इस प्रकार; सू-नृतया--अत्यन्त सत्य तथा अच्छे; वाचा--शब्दों से; नन्देन--नन्द महाराज द्वारा; सु--अच्छी तरह;सभाजित:--सम्मानित; अक्रूरः--अक्रूर ने; परिपृष्टेन--पूछे जाने पर; जहौ--दूर कर दी; अध्व--मार्ग की; परिश्रमम्--थकावट
पूछताछ के इन सत्य तथा मधुर वचनों से नन््द महाराज द्वारा सम्मानित होकर अक्रूर अपनीयात्रा की थकान भूल गये।
