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अध्याय इक्यावन: मुकुकुंद का उद्धार
10.51श्रीशुक उबाचत॑ विलोक्य विनिष्क्रान्तमुज्जिहानमिवोडुपम् ।
दर्शनीयतमंश्याम॑ं पीतकौशेयवाससम् ॥
१॥
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभामुक्तकन्धरम् ।
पृथुदीर्घचतुर्बाहुं नबकझ्जारुणेक्षणम् ॥
२॥
नित्यप्रमुदितं श्रीमत्सुकपोलं शुचिस्मितम् ।
मुखारविन्दं बिभ्राणं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥
३॥
वबासुदेवो ह्ायमिति पुमान्श्रीवत्सलाज्छन: ।
चतुर्भुजोरविन्दाक्षो वनमाल्यतिसुन्दर: ॥
४॥
लक्षणैर्नारदप्रोक्तेर्नान्यों भवितुमहति ।
निरायुधश्चलन्पद्भ्यां योत्स्येडनेन निरायुध: ॥
५॥
इति निश्चित्य यवनः प्राद्रवन्तं पराड्मुखम् ।
अन्वधावजिषुक्षुस्तं दुरापमपि योगिनाम् ॥
६॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तम्--उसको; विलोक्य विनिष्क्रान्तम्--बाहर आते; उज्जिहानम्--उठते हुए;इब--मानो; उडुपम्--चन्द्रमा को; दर्शनीय-तमम्--देखने में सर्वाधिक सुन्दर; श्यामम्--गहरे नीले; पीत--पीला; कौशेय--रेशम; वाससम्--वस्त्र; श्रीवत्स--लक्ष्मी का चिह्न, जो भगवान् के बालों के गुच्छे का होता है; वक्षसम्--वक्षस्थल पर;भ्राजतू--चमकीला; कौस्तुभ--कौस्तुभ मणि से युक्त; आमुक्त--अलंकृत; कन्धरम्--कन्धा; पृथु--विशाल; दीर्घ--तथालम्बा; चतुः--चार; बाहुमू-- भुजाओं वाला; नव--नये खिले; कजञ्ञ--कमलों की तरह; अरुण--गुलाबी; ईक्षणम्-- आँखें;नित्य--सदैव; प्रमुदितम्--प्रसन्न; श्रीमत्--ऐश्वर्यवान; सु--सुन्दर; कपोलम्--गालों वाला; शुचि--स्वच्छ; स्मितम्--मन्द-हास युक्त; मुख--उनका मुँह ( मुखमण्डल ); अरविन्दम्ू--कमल सहृश; बिभ्राणम्-- प्रदर्शित करते; स्फुरनू--चमकते हुए;मकर--मछली की आकृति के; कुण्डलमू--कान की बालियाँ; वासुदेव:--वासुदेव; हि--निस्सन्देह; अयम्--यह; इति--इसप्रकार सोचते हुए; पुमान्--पुरुष; श्रीवत्स-लाउ्छन: -- श्रीवत्स से अंकित; चतु:-भुज:--चार भुजाओं वाले; अरविन्द-अक्ष:--कमल जैसे नेत्रों वाले; वन--जंगल के फूलों की; माली--माला पहने; अति--अत्यधिक; सुन्दर:--सुन्दर; लक्षणै:ः--लक्षणोंसे; नारद-प्रोक्तै:--नारदमुनि द्वारा बतलाये गये; न--नहीं; अन्य: --दूसरा; भवितुम् अर्हति--हो सकता है; निरायुध:--बिनाहथियार के; चलनू्--जाते हुए; पद्भ्यामू-पैदल; योत्स्ये--लड़ँगा; अनेन--इससे; निरायुध:--बिना हथियार के; इति--इसप्रकार; निश्चित्य--निश्चय करके; यवन:--म्लेच्छ कालयवन; प्राद्रवन्तम-- भागता हुआ; पराक्-- मुड़ा; मुखम्-- मुँह;अन्वधावत्--पीछा करने लगा; जिधृश्षुः--पकड़ने की इच्छा से; तम्--उसको; दुरापम्--दुष्प्राप्प; अपि-- भी; योगिनाम्--योगियों द्वारा
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कालयवन ने भगवान् को मथुरा से उदित होते चन्द्रमा की भाँतिआते देखा।
देखने में भगवान् अतीव सुन्दर थे, उनका वर्ण श्याम था और वे रेशमी पीताम्बरधारण किये थे।
उनके वशक्षस्थल पर श्रीवत्स का चिन्ह था और उनके गले में कौस्तुभमणिसुशोभित थी।
उनकी चारों भुजाएँ बलिष्ठ तथा लम्बी थीं।
उनका मुख कमल सद्दश सदैव प्रसन्नरहने वाला था, आँखें गुलाबी कमलों जैसी थीं, उनके गाल सुन्दर तेजवान थे, हँसी स्वच्छ थीतथा उनके कान की चमकीली बालियाँ मछली की आकृति की थीं।
उस म्लेच्छ ने सोचा, 'यहव्यक्ति अवश्य ही वासुदेव होगा क्योंकि इसमें वे ही लक्षण दिख रहे हैं, जिनका उल्लेख नारद नेकिया था--उसके श्रीवत्स का चिन्ह है, चार भुजाएँ हैं, आँखें कमल जैसी हैं और वह वनफूलोंकी माला पहने है और अत्यधिक सुन्दर है।
वह और कोई नहीं हो सकता।
चूँकि वह पैदल चलरहा है और कोई हथियार नहीं लिए है, अतएव मैं भी बिना हथियार के उससे युद्ध करूँगा।
यह मन में ठान कर वह भगवान् के पीछे पीछे दौड़ने लगा और भगवान् उसकी ओर पीठ करकेभागते गये।
कालयवन को आशा थी कि वह कृष्ण को पकड़ लेगा यद्यपि बड़े बड़े योगी भीउन्हें प्राप्त नहीं कर पाते।
हस्तप्राप्तमिवात्मानं हरीणा स पदे पदे ।
नीतो दर्शयता दूरं यवनेशोउद्विकन्दरम् ॥
७॥
हस्त--अपने हाथ में; प्राप्तम्--प्राप्त हुआ; इब--मानो; आत्मानम्--अपने को; हरिणा-- भगवान् कृष्ण द्वारा; सः--वह; पदेपदे--हर डग पर; नीत:--लाया गया; दर्शयता--दिखाये जाने वाले के द्वारा; दूरमू--दूर; यवन-ईश:--यवनों का राजा;अद्वि--पर्वत की; कन्दरम्-गुफा में
प्रति क्षण कालयवन के हाथों की पहुँच में प्रतीत होते हुए भगवान् हरि उस यवनराज को दूरएक पर्वत--कन्दरा तक ले गये।
पलायन यदुकुले जातस्य तव नोचितम् ।
इति क्षिपन्ननुगतो नैनं प्रापाहताशुभ: ॥
८॥
पलायनमू्-- भागना; यदु-कुले--यदुवंश में; जातस्य--जन्म लेने वाले; तब--तुम्हारा; न--नहीं है; उचितम्--ठीक; इति--इनशब्दों में; क्षिपनू-- अपमान करता हुआ; अनुगतः --पीछा करता; न--नहीं; एनम्--उसको; प्राप--पहुँच पाया; अहत--दूरहुआ; अशुभः--जिसके पापमय कर्म-फल।
भगवान् का पीछा करते हुए वह यवन उन पर यह कह कर अपमान कर रहा था, 'तुमनेयदुवंश में जन्म ले रखा है, तुम्हारे लिए इस तरह भागना उचित नहीं है!' तो भी कालयवनभगवान् कृष्ण के पास तक नहीं पहुँच पाया क्योंकि उसके पाप कर्म-फल अभी थधुले नहीं थे।
एवं क्षिप्तोडपि भगवान्प्राविशद्गिरिकन्दरम् ।
सोपि प्रविष्टस्तत्रान्यं शयानं ददशे नरम् ॥
९॥
एवम्--इस प्रकार; क्षिप्त:--अपमानित; अपि-- भी; भगवानू्-- भगवान्; प्राविशत्--घुस गये; गिरि-कन्दरम्-पर्वत की गुफामें; सः--वह, कालयवन; अपि--भी; प्रविष्ट:--घुसते हुए; तत्र--वहाँ; अन्यम्--दूसरे; शयानम्ू--लेटे हुए; ददृशे--देखा;नरम्--मनुष्य कोयद्यपि भगवान् इस तरह से अपमानित हो रहे थे किन्तु वे पर्वत की गुफा में घुस गये।
उनकेपीछे पीछे कालयवन भी घुसा और उसने वहाँ एक अन्य पुरुष को सोये हुए देखा।
ननन््वसौ दूरमानीय शेते मामिह साधुवत् ।
इति मत्वाच्युतं मूढस्तं पदा समताडयत् ॥
१०॥
ननु--ऐसा लगता है; असौ--वह; दूरमू--काफी दूरी तक; आनीय--लाकर; शेते--लेटा हुआ है; माम्--मुझको; इह--यहाँ;साधु-वत्--सन्त-पुरुष की तरह; इति--ऐसा; मत्वा--( मुझको ) सोचकर; अच्युतम्-- भगवान् कृष्ण होने का; मूढ:--ठगागया; तमू--उसको; पदा--अपने पाँव से; समताडयत्-- पूरे बल से प्रहार किया |
'यह तो मुझे इतनी दूर लाकर अब किसी साधु-पुरुष की तरह यहाँ लेट गया है।
' इस तरहसोते हुए उस व्यक्ति को भगवान् कृष्ण समझ कर, उस ठगे हुए मूर्ख ने पूरे बल से उस पर पाद-प्रहार किया।
स उत्थाय चिरं सुप्त: शनैरुन्मील्य लोचने ।
दिशो विलोकयन्पाश्वें तमद्राक्षीदवस्थितम् ॥
११॥
सः--वह; उत्थाय--जग कर; चिरम्--दीर्घकाल से; सुप्त:--सोया हुआ; शनै:--धीरे से; उन््मील्य--खोलते हुए; लोचने--अपनी आँखें; दिशः--सारी दिशाओं में; विलोकयन्ू--देखते हुए; पाश्व-- अपनी बगल में; तम्--उसको, कालयवन को;अद्राक्षीत्--देखा; अवस्थितम्--खड़ा |
वह पुरुष दीर्घकाल तक सोने के बाद जागा था और धीरे धीरे उसने अपनी आँखें खोलीं।
चारों ओर देखने पर उसे अपने पास ही कालयवन खड़ा हुआ दिखाई दिया।
स तावत्तस्य रुष्टस्य दृष्टिपातेन भारत ।
देहजेनाग्निना दग्धो भस्मसादभवर्क्षणात् ॥
१२॥
सः--वह, कालयवन; तावत्--तब तक; तस्य--उस जगे हुए पुरुष का; रुष्टस्थ--क्रुद्ध; दृष्टि--दृष्टि को; पातेन--डालने से;भारत--हे भरतवंशी ( परीक्षित महाराज ); देह-जेन-- अपने शरीर से ही उत्पन्न; अग्निना-- अग्नि से; दग्ध:--जल कर; भस्म-सातू--राख; अभवत्--हो गया; क्षणात्--क्षण-भर मेंवह जगाया हुआ पुरुष अत्यन्त क्रुद्ध था।
उसने अपनी दृष्टि कालयवन पर डाली तो उसकेशरीर से लपटें निकलने लगीं।
हे राजा परीक्षित, कालयवन क्षण-भर में जल कर राख हो गया।
श्रीराजोबवाचको नाम स पुमान्ब्रह्मन्कस्य किंवीर्य एवच ।
कस्मादगुहां गतः शिष्ये किंतेजो यवनार्दन: ॥
१३॥
श्री-राजा उबाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; कः--कौन; नाम--विशेष रूप से; सः--वह; पुमान्--पुरुष; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण( शुकदेव ); कस्य--किस ( वंश ) का; किम्--क्या; वीर्य:--शक्ति; एव च--और भी; कस्मात्--क्यों; गुहाम्--गुफा में;गतः--जाकर के; शिष्ये--सोने के लिए लेट गया; किमू--किसका; तेज: --वीर्य ( सन््तान ); यवन--यवन का; अर्दन:--संहार करने वाला
राजा परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, वह पुरुष कौन था? वह किस वंश का था और उसकीशक्तियाँ कया थीं? म्लेच्छ का संहार करने वाला वह व्यक्ति गुफा में क्यों सोया हुआ था और वहकिसका पुत्र था?श्रीशुक उबाच स इक्ष्वाकुकुले जातो मान्धातृतनयो महान् ।
मुचुकुन्द इति ख्यातो ब्रह्मण्य: सत्यसड्रर: ॥
१४॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह; इक्ष्वाकु-कुले--इश्ष्वाकु वंश में ( सूर्य देवता विवस्वान का नाती );जातः--उत्पन्न; मान्धातृ-तनय: --राजा मान्धाता का पुत्र; महानू--महापुरुष; मुचुकुन्दः इति ख्यात:--मुचुकुन्द नाम से विख्यात;ब्रह्मण्य:--ब्राह्मणों का भक्त; सत्य--अपने ब्रत का सच्चा; सड्डरः--युद्ध में |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : उस महापुरुष का नाम मुचुकुन्द था और वह इक्ष्वाकु वंश मेंमान्धाता के पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ था।
वह ब्राह्मण संस्कृति का उपासक था और युद्ध में अपनेब्रत का पक्का था।
स याचितः सुरगणैरिन्द्राद्यरात्मरक्षणे ।
असुरेभ्य: परित्रस्तैस्तद्रक्षां सोउइकरोच्चिरम् ॥
१५॥
सः--वह; याचित:ः--याचना करने पर; सुर-गणै:--देवताओं द्वारा; इन्द्र-आद्यै: --इन्द्र इत्यादि द्वारा; आत्म--अपनी; रक्षणे--रक्षा के लिए; असुरेभ्य:--असुरों से; परित्रस्तै:-- भयभीत; तत्--उनकी; रक्षाम्--रक्षा; सः--उसने; अकरोत्--की; चिरम्--दीर्घकाल तक।
जब इन्द्र तथा अन्य देवताओं को असुरों द्वारा त्रास दिये जा रहे थे तो उनके द्वारा अपनी रक्षाके लिए सहायता की याचना किये जाने पर मुचुकुन्द ने दीर्घकाल तक उनकी रक्षा की।
लब्ध्वा गुहं ते स्वःपालं मुचुकुन्दमथाब्रुवन् ।
राजन्विरमतां कृच्छाद्धवान्न: परिपालनात् ॥
१६॥
लब्ध्वा-प्राप्त करके; गुहम्--कार्तिकेय को; ते--वे; स्व:ः--स्वर्ग का; पालमू--रक्षक के रूप में; मुचुकुन्दम्--मुचुकुन्द को;अथ--तब; अन्लुवन्ू--कहा; राजन्--हे राजन; विरमताम्--कृपया दूर रहें; कृच्छातू--कष्टकर; भवानू--आप; न:--हमारे;परिपालनात्--रक्षा करने से।
जब देवताओं को अपने सेनापति के रूप में कार्तिकेय प्राप्त हो गये तो उन्होंने मुचुकुन्द सेकहा, 'हे राजनू, अब आप हमारी रक्षा का कष्टप्रद कार्य छोड़ सकते हैं।
'नरलोकं परित्यज्य राज्यं निहतकण्टकम् ।
अस्मान्पालयतो वीर कामास्ते सर्व उज्लिता: ॥
१७॥
नर-लोकम्--मनुष्यों के लोक में; परित्यज्य--छोड़कर; राज्यमू--राज्य; निहत--दूर हुए; कण्टकम्--काँटे; अस्मान्--हमको;पालयतः--पालने वाले; वीर--हे वीर; काम:--इच्छाएँ; ते--तुम्हारी; सर्वे-- सभी; उज्झिता:--उखाड़कर फेंक दी गईं |
'हे वीर पुरुष, नर-लोक में अपने निष्कण्टक राज्य को छोड़कर आपने हमारी रक्षा करते हुए अपनी निजी आकांक्षाओं की परवाह नहीं की।
'सुता महिष्यो भवतो ज्ञातयोमात्यमन्त्रिन: ।
प्रजाश्न॒ तुल्यकालीना नाधुना सन्ति कालिता: ॥
१८॥
सुता:ः--सन्तानें; महिष्य:--पटरानियाँ; भवत:--आपके ; ज्ञातवः--अन्य सम्बन्धी; अमात्य--मंत्री; मन्त्रिण:--तथा सलाहकार;प्रजा: -- प्रजा; च--तथा; तुल्य-कालीना:--समकालीन; न--नहीं; अधुना-- अब; सन्ति--जीवित हैं; कालिता:ः--काल सेप्रेरित बच्चे, रानियाँ, सम्बन्धी, मंत्री, सलाहकार तथा आपकी समकालीन प्रजा--इनमें से कोईअब जीवित नहीं रहे।
वे सभी काल के द्वारा बहा ले जाये गये हैं।
'कालो बलीयान्बलिनां भगवानीश्वरोव्यय: ।
प्रजा: कालयते क्रीडन्पशुपालो यथा पशून् ॥
१९॥
काल:--काल, समय; बलीयान्--अत्यन्त बलवान; बलिनाम्--बलवानों की अपेक्षा; भगवान् ईश्वर: --परमेश्वर; अव्यय: --अव्यय, अविनाशी; प्रजा:--मर्त्य प्राणी; कालयते--हाँकता है; क्रीडन्ू--खेल खेल में; पशु-पाल:--पशु-पालक; यथा--जिस तरह; पशून्ू--पालतू जानवरों को |
अनंत काल समस्त बलवानों से भी बलवान है और वही साक्षात् परमेश्वर है।
जिस तरहपशु-पालक ( ग्वाला ) अपने पशुओं को हॉकता रहता है उसी तरह परमेश्वर मर्त्य प्राणियों कोअपनी लीला के रूप में हाँकते रहते हैं।
वरं वृणीष्व भद्रं ते ऋते कैवल्यमद्य न: ।
एक एवेश्वरस्तस्य भगवान्विष्णुरव्यय: ॥
२०॥
वरम्ू--वर; वृणीष्व--चुनो; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; ऋते--सिवाय; कैवल्यम्--मोक्ष के; अद्य--आज; न:--हमसे; एक:--एक; एव--एकमात्र; ईश्वरः--सक्षम; तस्थय--उसका; भगवान्-- भगवान्; विष्णु: -- श्री विष्णु; अव्यय: --अविनाशी।
आपका कल्याण हो, अब आप मोक्ष के सिवाय कोई भी वर चुन सकते हैं क्योंकि मोक्षको तो एकमात्र अविनाशी भगवान् विष्णु ही प्रदान कर सकते हैं।
'एवमुक्तः स वै देवानभिवन्द्य महायशा: ।
अशयिष्ट गुहाविष्टो निद्रया देवदत्तया ॥
२१॥
एवम्--इस प्रकार; उक्त:--कहकर; सः--वह; वै--निस्सन्देह; देवानू--देवताओं को; अभिवन्द्य--नमस्कार करके; महा--महान्; यशा:--जिसकी ख्याति; अशयिष्ट--लेट गया; गुहा-विष्ट:--गुफा में घुसकर; निद्रया--नींद में; देव--देवताओं द्वारा;दत्तया--दी गई
ऐसा कहे जाने पर राजा मुचुकुन्द ने देवताओं से ससम्मान विदा ली और एक गुफा में गयाजहाँ वे देवताओं द्वारा दी गई नींद का आनन्द लेने के लिए लेट गया।
यवने भस्मसान्नीते भगवान्सात्वतर्षभः ।
आत्मानं दर्शयामास मुचुकुन्दाय धीमते ॥
२२॥
यवने--जब यवन; भस्म-सात्--राख में; नीते--बदल गया; भगवान्-- भगवान्; सात्वत--सात्वत वंशजाति का; ऋषभ: --सबसे बड़ा वीर; आत्मानम्--स्वयं; दर्शयाम् आस--प्रकट किया; मुचुकुन्दाय--मुचुकुन्द के पास; धी-मते--बुद्धिमान |
जब यवन जल कर राख हो गया तो सात्वतों के प्रमुख भगवान् ने उस बुद्धिमान मुचुकुन्दके समक्ष अपने को प्रकट किया।
तमालोक्य घनश्यामं पीतकौशेयवाससम् ।
श्रीवत्सवक्षसं भ्राजत्कौस्तुभेन विराजितम् ॥
२३॥
चतुर्भुजं रोचमानं वैजयन्त्या च मालया ।
चारुप्रसन्नवदनं स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥
२४॥
प्रेक्षणीयं नूलोकस्य सानुरागस्मितेक्षणम् ।
अपीव्यवयसं मत्तमृगेन्द्रोदारविक्रमम् ॥
२५॥
पर्यपृच्छन्महाबुद्धिस्तेजसा तस्य धर्षित: ।
शद्डितः शनकै राजा दुर्धर्षमिव तेजसा ॥
२६॥
तम्--उसको; आलोक्य--देखकर; घन--बादल की तरह; श्यामम्--गहरे नीले रंग के; पीत--पीला; कौशेय--रेशमी ;वाससम्--वस्त्र; श्रीवत्स-- श्रीवत्स चिह्न; वक्षसम्-वक्षस्थल पर; भ्राजत्ू--चमकीला; कौस्तुभेन--कौस्तुभ मणि से;विराजितम्--चमकता हुआ; चतु:-भुजम्--चार भुजाओं वाला; रोचमानम्--सुन्दर लगने वाला; बैजयन्त्या--वैजयन्ती नामक;च--तथा; मालया--फूल की माला से; चारु--आकर्षक; प्रसन्न--तथा शान्त; वदनम्--मुख; स्फुरत्--चमचमाती; मकर--मछली के आकार की; कुण्डलमू--कान की बालियाँ; प्रेक्षणीयम्--आँखों को आकृष्ट करने वाली; नृू-लोकस्थ--मनुष्यों की;स--सहित; अनुराग--स्नेह; स्मित--मन्द हँसते हुए; ईक्षणम्--नेत्र या चितवन; अपीव्य--सुन्दर; वबसम्ू--जिसका तरुणस्वरूप; मत्त--क्रुद्ध; मृग-इन्द्र--सिंह की तरह; उदार--भद्ग; विक्रममू--चाल; पर्य-पृच्छत्--प्रश्न किया; महा-बुद्धि: --बुद्धिमान; तेजसा--तेज से; तस्य--उसका; धर्षित:ः--अभिभूत; शद्धित:ः--शंकालु; शनकै: --धीरे धीरे; राजा--राजा ने;दुर्धषम्-- अजेय; इब--निस्सन्देह; तेजसा--तेज से
जब राजा मुचुकुन्द ने भगवान् की ओर निहारा तो देखा कि वे बादल के समान गहरे नीलेरंग के थे, उनकी चार भुजाएँ थीं और वे रेशमी पीताम्बर पहने थे।
उनके वक्षस्थल पर श्रीवत्सका चिन्ह था और गले में चमचमाती कौस्तुभ मणि थी।
वैजयन्ती माला से सज्जित भगवान् नेउसे अपना मनोहर शान्त मुख दिखलाया जो मछली की आकृति के कुण्डलों तथा स्नेहपूर्णमन्द-हास से युक्त चितवन से सारे मनुष्यों की आँखों को आकृष्ट कर लेता है।
उनके तरुणस्वरूप का सौन्दर्य अद्वितीय था और वे क्रुद्ध सिंह की भव्य चाल से चल रहे थे।
अत्यन्तबुद्धिमान राजा भगवान् के तेज से अभिभूत हो गया।
यह तेज उसे दुर्धर्ष जान पड़ा।
अपनी अनिश्चयता व्यक्त करते हुए मुचुकुन्द ने झिझकते हुए भगवान् कृष्ण से इस प्रकार पूछा।
श्रीमुचुकुन्द उबाचको भवानिह सप्प्राप्तो विपिने गिरिगह्रे ।
पदभ्यां पद्यपलाशाभ्यां विचरस्युरुकण्टके ॥
२७॥
श्री-मुचुकुन्दः उबाच-- श्री मुचुकुन्द ने कहा; कः--कौन हैं; भवानू--आप; इह--यहाँ; सम्प्राप्त:--( मेरे साथ ) पधारे हुए;विपिने--जंगल में; गिरि-गह्वे--पर्वत की गुफा में; पद्भ्याम्--अपने पाँव से; पद्य--कमल के; पलाशाभ्याम्--पंखड़ियों( की तरह ); विचरसि--घूम रहे हो; उरू-कण्टके--काँटों से भरे हुए
श्री मुचुकुन्द ने कहा, 'आप कौन हैं, जो जंगल में इस पर्वत-गुफा में अपने कमल कीपंखड़ियों जैसे कोमल पाँवों से कँटीली भूमि पर चलकर आये हैं ?
कि स्वित्तेजस्विनां तेजो भगवान्वा विभावसु: ।
सूर्य: सोमो महेन्द्रो वा लोकपालो परोपि वा ॥
२८॥
किम् स्वित्ू--शायद; तेजस्विनाम्--सारे शक्तिशाली जीवों में; तेज:--आदि रूप; भगवान्--शक्तिशाली प्रभु; बा--अथवा;विभावसु: -- अग्नि देवता; सूर्य: --सूर्यदेव; सोम: --चन्द्रदेव; महा-इन्द्र:--स्वर्ग का राजा इन्द्र; ब--अथवा; लोक--लोक का;पाल:--शासक; अपर:--दूसरा; अपि बा--या फिर।
शायद आप समस्त शक्तिशाली जीवों की शक्ति हैं।
या फिर आप शक्तिशाली अग्नि देव यासूर्यदेव, चन्द्रदेव, स्वर्ग के राजा इन्द्र या अन्य किसी लोक के शासन करने वाले देवता तो नहींहैं?
मन्ये त्वां देवदेवानां त्रयाणां पुरुषर्षभम् ।
यद्वाधसे गुहाध्वान्तं प्रदीप: प्रभया यथा ॥
२९॥
मन्ये--मानता हूँ; त्वामू-तुमको; देव-देवानाम्-देवताओं के प्रमुख के ; त्रयाणाम्--तीनों ( ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव );पुरुष--पुरुषों के; ऋषभम्--सबसे बड़ा; यत्--क्योंकि ; बाधसे -- भगा देते हो; गुह--गुफा का; ध्वान्तम्--अँधेरा; प्रदीप: --दीपक; प्रभवया--अपने प्रकाश से; यथा--जिस तरह।
मेरे विचार से आप तीन प्रमुख देवताओं में भगवान् हैं क्योंकि आप इस गुफा के अँधेरे कोउसी तरह भगा रहे हैं जिस तरह दीपक अपने प्रकाश से अँधकार को दूर कर देता है।
शुश्रूषतामव्यलीकमस्माक॑ नरपुड़्व ।
स्वजन्म कर्म गोत्र वा कथ्यतां यदि रोचते ॥
३०॥
शुश्रूषताम्ू--सुनने के इच्छुक लोगों को; अव्यलीकम्--सही सही; अस्माकम्--हमको; नर--मनुष्यों में; पुमू-गव--हे अत्यन्तप्रसिद्ध; स्व--अपना; जन्म--जन्म; कर्म--कार्य; गोत्रमू--वंश परम्परा; वा--अथवा; कथ्यताम्--कहने की कृपा करें;यदि--यदि; रोचते-- अच्छा लगे।
हे पुरुषोत्तम यदि आपको ठीक लगे तो आप अपने जन्म, कर्म तथा गोत्र के विषय में हमसेसही सही ( स्पष्ट ) बतलायें क्योंकि हम सुनने के इच्छुक हैं।
वबयं तु पुरुषव्याप्र ऐश्ष्वाका: क्षत्रबन्धव: ।
मुचुकुन्द इति प्रोक्तो यौवनाश्वात्मज: प्रभो ॥
३१॥
वयम्--हम; तु--दूसरी ओर; पुरुष--पुरुषों में; व्याप्र--हे बाघ; ऐशक्ष्वाका:--इ क्ष्वाकु वंशी; क्षत्र--क्षत्रियों के; बन्धव:--परिवार के सदस्य; मुचुकुन्दः--मुचुकुन्द; इति--इस प्रकार; प्रोक्त:--कहागया; यौवनाश्व--यौवनाश्व ( युवना श्व का पुत्र ) का;आत्म-जः-पुत्र; प्रभो-हे प्रभु
हे पुरुष-व्याप्र, जहाँ तक हमारी बात है, हम तो पतित क्षत्रियों के वंश से सम्बन्धित हैं औरराजा इक्ष्वाकु के वंशज हैं।
हे प्रभु, मेरा नाम मुचुकुन्द है और मैं युवनाश्व का पुत्र हूँ।
चिरप्रजागरश्रान्तो निद्रयापहतेन्द्रिय: ।
शयेउस्मिन्विजने काम केनाप्युत्थापितोधुना ॥
३२॥
चिर--दीर्घकाल से; प्रजागर--जगे रहने से; श्रान्तः--थका हुआ; निद्रया--नींद से; अपहत-- आच्छादित; इन्द्रियः --मेरीइन्द्रियाँ; शये--मैं लेटा रहा हूँ; अस्मिनू--इस; विजने--निर्जन स्थान में; कामम्--इच्छानुसार; केन अपि--किसी के द्वारा;उत्थापित:--जगाया गया; अधुना--अब
दीर्घकाल तक जागे रहने के कारण मैं थक गया था और नींद से मेरी इन्द्रियाँ वशीभूत थीं।
इस तरह मैं तब से इस निर्जन स्थान में सुखपूर्वक सोता रहा हूँ किन्तु अब जाकर किसी ने मुझेजगा दिया है।
सोपि भस्मीकृतो नूनमात्मीयेनैव पाप्मना ।
अनन्तरं भवान्श्रीमॉल्लक्षितोमित्रशासन: ॥
३३॥
सः अपि--यही व्यक्ति; भस्मी-कृत:ः--राख हुआ; नूनम्ू--निस्सन्देह; आत्मीयेन-- अपने ही; एब--एकमात्र; पाप्मना--पापपूर्णकर्म से; अनन्तरम्-तुरन्त बाद; भवान्ू-- आप; श्रीमान्--यशस्वी; लक्षित: --देखा गया; अमित्र--शत्रुओं का; शासन:--दण्ड देने वाला।
जिस व्यक्ति ने मुझे जगाया था वह अपने पापों के फल से जल कर राख हो गया।
तभी मैंनेयशस्वी स्वरूप वाले एवं अपने शत्रुओं को दण्ड देने की शक्ति से सामर्थ्यवान आपको देखा।
तेजसा तेविषह्योण भूरि द्रष्ट न शक्नुमः ।
हतौजसा महाभाग माननीयोसि देहिनाम् ॥
३४॥
तेजसा--तेज के कारण; ते--तुम्हारे; अविषद्ेण -- असहा; भूरि-- अधिक; द्रष्टम
ू--देख पाना; न शक्नुम:--हम समर्थ नहीं हैं;हत--घटा हुआ; ओजसा--अपने ओज से; महा-भग--हे परम ऐश्वर्यवान; माननीय: --सम्मान पाने के योग्य; असि--हो;देहिनम्-देहधारी जीवों द्वारा
आपके असह्य तेज से हमारी शक्ति दबी जाती है और हम आप पर अपनी दृष्टि स्थिर नहींकर पाते।
हे माननीय, आप समस्त देहधारियों द्वारा आदर किये जाने के योग्य हैं।
एवं सम्भाषितो राज्ञा भगवान्भूतभावन: ।
प्रत्याह प्रहसन्वाण्या मेघनादगभीरया ॥
३५॥
एवम्--इस प्रकार; सम्भाषित:--कहा गया; राज्ञा--राजा द्वारा; भगवान्-- भगवान् ने; भूत--समस्त सृष्टि के; भावन: --उद्गम; प्रत्याह--उत्तर दिया; प्रहसन्--हँसते हुए; वाण्या--शब्दों से; मेघ--बादलों की; नाद--गड़गड़ाहट की तरह;गभीरया--गम्भीर |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : राजा द्वारा इस तरह कहे जाने पर समस्त सृष्टि के उद्गमभगवान् मुसकराने लगे और तब उन्होंने बादलों की गर्जना के सहश गम्भीर वाणी में उसे उत्तरदिया।
श्रीभगवानुवाचजन्मकर्माभिधानानि सन्ति मेड़ सहस््रशः ।
न शक्यन्तेडनुसड्ख्यातुमनन्तत्वान्मयापि हि ॥
३६॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; जन्म--जन्म; कर्म--कार्य; अभिधानानि--तथा नाम; सन्ति--हैं; मे--मेरे; अड़--हेप्रिय; सहस्रश:ः--हजारों; न शक्यन्ते--वे नहीं हो सकते; अनुसड्ख्यातुम्--गिने जाना; अनन्तत्वात्--अन्त न होने से; मया--मेरे द्वारा; अपि हि-- भी |
भगवान् ने कहा : हे मित्र, मैं हजारों जन्म ले चुका हूँ; हजारों जीवन जी चुका हूँ; औरहजारों नाम धारण कर चुका हूँ।
वस्तुतः मेरे जन्म, कर्म तथा नाम अनन्त हैं, यहाँ तक कि मैं भीउनकी गणना नहीं कर सकता।
क्वचिद्रजांसि विममे पार्थिवान्युरुजन्मभि: ।
गुणकर्माभिधानानि न मे जन्मानि कह्िचित् ॥
३७॥
क्वचित्--कभी; रजांसि-- धूल के कण; विममे--गिन सकता है; पार्थिवानि--पृथ्वी पर; उरू-जन्मभि: --अनेक जन्मों में;गुण--गुण; कर्म--कार्यकलाप; अभिधानानि--तथा नाम; न--नहीं; मे--मेरे; जन्मानि-- अनेक जन्म; कर्हिचित्ू--कभी
यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति पृथ्वी पर धूल-कणों की गणना कई जन्मों में कर ले किन्तुमेरे गुणों, कर्मों, नामों तथा जन्मों की गणना कोई भी कभी पूरी नहीं कर सकता।
कालत्रयोपपन्नानि जन्मकर्माणि मे नृप ।
अनुक्रमन्तो नैवान्तं गच्छन्ति परमर्षय: ॥
३८ ॥
काल--समय का; त्रय--तीन अवस्थाओं ( भूत, वर्तमान तथा भविष्य ) में; उपपन्नानि--घटित होना; जन्म--जन्म; कर्माणि--तथा कर्म; मे--मेरे; नृप--हे राजा ( मुचुकुन्द ); अनुक्रमन्त:--गिनती करते हुए; न--नहीं; एब--तनिक भी; अन्तम्ू--अन्त;गच्छन्ति--पहुँचते हैं; परम--महानतम; ऋषय:--ऋषिगण |
हे राजन, बड़े से बड़े ऋषि मेरे उन जन्मों तथा कर्मों की गणना करते रहते हैं, जो काल कीतीनों अवस्थाओं में घटित होते हैं किन्तु वे कभी उसका अन्त नहीं पाते।
तथाप्यद्यतनान्यडु श्रुनुष्व गदतो मम ।
विज्ञापितो विरि्ञेन पुराहं धर्मगुप्तये ।
भूमेर्भारायमाणानामसुराणां क्षयाय च ॥
३९॥
अवतीर्णो यदुकुले गृह आनकदुन्दुभे: ।
वदन्ति वासुदेवेति वसुदेवसुतं हि मामू ॥
४०॥
तथा अपि--फिर भी; अद्यतनानि--वर्तमान; अड्र--हे मित्र; श्रृणुष्व--सुनो; गदत:--मेरे द्वारा कहा गया; मम--मुझसे;विज्ञापित:--प्रार्थना किया जाकर; विरिज्ञेन--ब्रह्म द्वारा; पुरा-- भूतकाल में; अहम्--मैं; धर्म--धर्म की; गुप्तये--रक्षा करनेके लिए; भूमेः--पृथ्वी के लिए; भारायमाणानाम्-- भार स्वरूप; असुराणाम्--असुरों के; क्षयाय--विनाश के लिए; च--तथा; अवतीर्ण: --अवतरित; यदु--यदु के; कुले--वंश में; गृहे--घर में; आनकदुन्दुभेः--वसुदेव के; वदन्ति--लोग कहकरपुकारते हैं; वासुदेवः इति--वासुदेव नाम से; वसुदेव-सुतम्--वसुदेव के पुत्र को; हि--निस्सन्देह; माम्--मुझे |
तो भी हे मित्र, मैं अपने इस ( वर्तमान ) जन्म, नाम तथा कर्म के विषय में तुम्हें बतलाऊँगा।
कृपया सुनो।
कुछ काल पूर्व ब्रह्मा ने मुझसे धर्म की रक्षा करने तथा पृथ्वी के भारस्वरूप असुरोंका संहार करने की प्रार्थना की थी।
इस तरह मैंने यदुवंश में आनकदुन्दुभि के घर अवतारलिया।
चूँकि मैं वसुदेव का पुत्र हूँ इसलिए लोग मुझे वासुदेव कहते हैं।
कालनेमिईतः कंस: प्रलम्बाद्याश्न सदिद्वष: ।
अयं च यवनो दग्धो राजंस्ते तिग्मचक्षुषा ॥
४१॥
कालनेमि: --कालनेमि असुर; हत:--मारा गया; कंस:ः--कंस; प्रलम्ब--प्रलम्ब; आद्या:--इत्यादि; च-- भी; सत्--पुण्यात्मालोगों का; द्विष:--ईर्ष्यालु; अयम्--यह; च--तथा; यवन:--यवन; दग्ध: -- जला हुआ; राजन्--हे राजा; ते--तुम्हारी;तिग्म--तेज, तीक्ष्ण; चक्षुषा--चितवन से मैंने कालनेमि का वध किया है, जो कंस रूप में फिर से जन्मा था।
साथ ही मैंने प्रलम्बतथा पुण्यात्मा लोगों के अन्य शत्रुओं का भी संहार किया है।
और अब हे राजन, यह बर्बरतुम्हारी तीक्षण चितवन से जल कर भस्म हो गया है।
सोऊहं तवानुग्रहार्थ गुहामेतामुपागत: ।
प्रार्थित: प्रचुरं पूर्व त्वयाहं भक्तवत्सल: ॥
४२॥
सः--वही पुरुष; अहम्--मैं; तब--तुम्हारे; अनुग्रह--अनुग्रह; अर्थम्--के लिए; गुहाम्-गुफा में; एताम्--इस; उपागत: --आया हुआ; प्रार्थित:--के लिए प्रार्थना किया गया; प्रचुरम्--अत्यधिक; पूर्वम्--पहले; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अहम्ू--मैं;भक्त--अपने भक्तों का; वत्सल:--स्नेही |
चूँकि भूतकाल में तुमने मुझसे बारम्बार प्रार्थना की थी इसलिए मैं स्वयं तुम पर अनुग्रहदर्शाने के लिए इस गुफा में आया हूँ, क्योंकि मैं अपने भक्तों के प्रति वत्सल रहता हूँ।
वरान्वृणीष्व राजर्षे सर्वान्कामान्ददामि ते ।
मां प्रसन्नो जन: कश्िन्न भूयोहति शोचितुम् ॥
४३॥
वरान्ू--वर; वृणीष्व--चुन लो; राज-ऋषे--हे राजर्षि; सर्वान्ू--समस्त; कामान्--इच्छित वस्तुएँ; ददामि--देता हूँ; ते--तुमको; माम्ू--मुझको; प्रसन्न:--प्रसन्न करके; जन:--व्यक्ति; कश्चित्ू--कोई; न भूयः--फिर नहीं; अहति-- आवश्यकताहोती है; शोचितुमू--शोक करने की
हे राजर्षि, अब मुझसे कुछ वर ले लो।
मैं तुम्हारी समस्त इच्छाएँ पूरी कर दूँगा।
जो मुझेप्रसन्न कर लेता है, उसे फिर कभी शोक नहीं करना पड़ता।
श्रीशुक उबाचइत्युक्तस्तं प्रणम्याह मुचुकुन्दो मुदान्वित: ।
ज्ञात्वा नारायण देवं गर्गवाक्यमनुस्मरन् ॥
४४॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त:--कहे जाने पर; तम्ू--उनसे; प्रणम्य--प्रणाम करके;आह--कहा; मुचुकुन्दः--मुचुकुन्द ने; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; अन्वित:--पूरित; ज्ञात्वा--जानकर; नारायणम् देवम्-- भगवान्नारायण के रूप में; गर्ग-वाक्यम्-गर्ग मुनि के वचन; अनुस्मरन्--स्मरण करते हुए।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह सुनकर मुचुकुन्द ने भगवान् को प्रणाम किया।
गर्ग मुनि केबचनों का स्मरण करते हुए उसने कृष्ण को भगवान् नारायण रूप में हर्षपूर्वक पहचान लिया।
फिर राजा ने उनसे इस प्रकार कहा।
श्रीमुचुकुन्द उबाचविमोहितोयं जन ईश माययात्वदीयया त्वां न भजत्यनर्थहक् ।
सुखाय दुःखप्रभवेषु सज्जतेगृहेषु योषित्पुरुषश्च वच्चितः ॥
४५॥
श्री-मुचुकुन्दः उबाच-- श्री मुचुकुन्द ने कहा; विमोहितः--मोहग्रस्त; अयम्--यह; जन:--व्यक्ति; ईश-हे प्रभु; मायया--माया द्वारा; त्॒वदीयया--आपकी ; त्वामू--आपको; न भजति--नहीं पूजता; अनर्थ-हक्--असली लाभ न देखते हुए; सुखाय--सुख के लिए; दुःख--दुख; प्रभवेषु--उत्पन्न करने वाली वस्तुओं में; सजजते--फँस जाता है; गृहेषु--पारिवारिक मामलों में;योषित्--स्त्री; पुरुष:-- पुरुष; च--तथा; वज्धित:--ठगे गये।
श्री मुचुकुन्द ने कहा : हे प्रभु, इस जगत के सभी स्त्री-पुरुष आपकी मायाशक्ति के द्वारामोहग्रस्त हैं।
वे अपने असली लाभ से अनजान रहते हुए आपको न पूजकर अपने को कष्टों केमूल स्त्रोत अर्थात् पारिवारिक मामलों में फँसाकर सुख की तलाश करते हैं।
लब्ध्वा जनो दुर्लभमत्र मानुषंकथश्ञिदव्यड्रमयलतोनघ ।
पादारविन्दं न भजत्यसन्मति-गृहान्धकूपे पतितो यथा पशु: ॥
४६॥
लब्ध्वा--प्राप्त करके; जन:--व्यक्ति; दुर्लभम्-दुर्लभ; अत्र--इस संसार में; मानुषम्--मनुष्य जीवन; कथज््ित्--किसी नकिसी तरह से; अव्यड्रमू--बिना प्रयास के; अयलतः --स्वतः प्राप्त; अनघ--हे निष्पाप; पाद--आपके पाँव; अरविन्दम्--कमल सहश; न भजति--नहीं पूजा करता; असत्--अशुद्ध; मतिः--मानसिकता; गृह--घर के; अन्ध--अन्धा; कूपे--कुएं में;'पतित:ः--गिरा हुआ; यथा--जिस तरह; पशु: --कोई पशु।
उस मनुष्य का मन अशुद्ध होता है, जो अत्यन्त दुर्लभ एवं अत्यन्त विकसित मनुष्य-जीवनके येन-केन-प्रकारेण स्वतः प्राप्त होने पर भी आपके चरणकमलों की पूजा नहीं करता।
ऐसाव्यक्ति अंधे क॒एँ में गिरे हुए पशु के समान, भौतिक घरबार रूपी अंधकार में गिर जाता है।
ममैष कालोजित निष्फलो गतोराज्यश्रियोत्रद्धमदस्य भूपते: ।
मर्त्यात्मबुद्धेः सुतदारकोश भू-ष्वासजमानस्य दुरन्तचिन्तया ॥
४७॥
मम--मेरा; एब: --यह; काल: --समय; अजित--हे अजेय; निष्फल:--व्यर्थ; गत:--अब व्यतीत हुआ; राज्य--राज्य;भ्िया--तथा ऐश्वर्य से; उन्नद्ध--बनाया गया; मदस्य--नशा; भूपते:--पृथ्वी के राजा का; मर्त्य--मर्त्य शरीर; आत्म--आत्माके रूप में; बुद्धेः --बुद्धि का; सुत--सन्तान; दार--पत्नियाँ; कोश-- खजाना; भूषु--तथा भूमि में; आसज्ञमानस्थ--आसक्तहोकर; दुरन््त--अन्तहीन; चिन्तया--चिन्ता से |
हे अजित, मैंने पृथ्वी के राजा के रूप में अपने राज्य तथा वैभव के मद में अधिकाधिकउन्मक्त होकर सारा समय गँवा दिया है।
मर्त्प शरीर को आत्मा मानते हुए तथा संतानों, पत्नियों,खजाना तथा भूमि में आसक्त होकर मैंने अनन्त क्लेश भोगा है।
कलेवरेस्मिन्धटकुड्यसन्निभेनिरूढमानो नरदेव इत्यहम् ।
बृतो रथेभाश्रपदात्यनीकपै-गाँ पर्यटंस्त्वागणयन्सुदुर्मद: ॥
४८ ॥
कलेबरे--शरीर में; अस्मिन्ू--इस; घट--घड़ा; कुड्य--या दीवाल; सन्निभे--के सहृश; निरूढ--बढ़ा-चढ़ाकर वर्णित;मान:--जिसकी झूठी पहचान; नर-देव:--मनुष्यों में देवता ( राजा ); इति--इस प्रकार ( अपने बारे में समझकर ); अहम्--मैं;वृतः--घिरा हुआ; रथ--रथों; इभ--हाथियों; अश्व--घोड़ों; पदाति--पैदल सैनिकों; अनीकपैः --तथा सेनापतियों से; गाम्--पृथ्वी की; पर्यटन्ू--यात्रा करते हुए; त्वा--तुम; अगणयनू--ठीक से न मानते हुए; सु-दुर्मदः--गर्व से प्रवंचित ।
अत्यन्त गर्वित होकर मैंने अपने को शरीर मान लिया था, जो घड़े या दीवाल जैसी एकभौतिक वस्तु है।
अपने को मनुष्यों में देवता समझ कर मैंने अपने सारथियों, हाथियों,अश्वारोहियों, पैदल सैनिकों तथा सेनापतियों से घिरकर और अपने प्रवंचित गर्व के कारणआपकी अवमानना करते हुए पृथ्वी भर में विचरण किया।
प्रमत्तमुच्चैरितिकृत्यचिन्तयाप्रवृद्धलोभं विषयेषु लालसम् ।
त्वमप्रमत्त: सहसाभिपद्यसेक्षुल्लेलिहानोउहिरिवाखुमन्तकः ॥
४९॥
प्रमत्तम्--पूर्णतया ठगा हुआ; उच्चै:--विस्तृत; इति-कृत्य--करणीय; चिन्तबा--विचार से; प्रवृद्ध--बढ़ा हुआ; लोभम्--लालच; विषयेषु--इन्द्रिय विषयों के लिए; लालसम्--लालसा; त्वमू--आप; अप्रमत्त:--जो मोहग्रस्त नहीं है; सहसा--एकाएक; अभिपद्यसे-- मुठभेड़ होती है; क्षुतू--प्यास से; लेलिहान: --अपने विषैले दाँतों को चाटता हुआ; अहि:--सर्प;इब--सहश; आखुम्--चूहे को; अन्तक:--मृत्यु |
करणीय के विचारों में लीन, अत्यन्त लोभी तथा इन्द्रिय-भोग से प्रसन्न रहने वाले मनुष्य कासदा सतर्क रहने वाले आपसे अचानक सामना होता है।
जैसे भूखा साँप चूहे के आगे अपनेविषैले दाँतों को चाटता है उसी तरह आप उसके समक्ष मृत्यु के रूप में प्रकट होते हैं।
पुरा रथैहेमपरिष्कृतै श्वरन्मतंगजैर्वा नरदेवसंज्ञितः ।
स एव कालेन दुरत्ययेन तेकलेवरो विट्कृमिभस्मसंज्ञित: ॥
५०॥
पुरा--इससे पहले; रथैः --रथों पर; हेम--सोने से; परिष्कृते:--सजाये; चरन्--आरूढ़ होकर; मतम्-- भयानक; गजै:--हाथियों पर; वा--अथवा; नर-देव--राजा; संज्ञित:--नामक; सः--वह; एबव--वही; कालेन--काल के द्वारा; दुरत्ययेन--नबच पाने वाले; ते--तुम्हारा; कलेवर:--शरीर; विट्ू--मल; कृमि--कीड़े-मकोड़े; भस्म--राख ; संज्ञित:--नामक |
जो शरीर पहले भयानक हाथियों या सोने से सजाये हुए रथों पर सवार होता है और 'राजा'के नाम से जाना जाता है, वही बाद में आपकी अजेय काल-शक्ति से मल, कृमि या भस्मकहलाता है।
निर्जित्य दिक्लक्रमभूतविग्रहोवरासनस्थ: समराजवन्दितः ।
गृहेषु मैथुन्यसुखेषु योषितांक्रीडामृग: पूरुष ईश नीयते ॥
५१॥
निर्जित्य--जीत कर; दिक्ू--दिशाओं के ; चक्रम्--पूरे चक्कर के; अभूत--न रहने पर; विग्रह:--लड़ाई, संघर्ष; वर-आसन--उत्तम सिंहासन पर; स्थ:--आसीन; सम--समान; राज--राजाओं से; वन्दित:--पप्रशंसित; गृहेषु--घरों में; मैथुन्य--संभोग;सुखेषु--सुख में; योषिताम्--स्त्रियों के; क्रीडा-मृग:--पालतू पशु; पुरुष:--पुरुष; ईश--हे प्रभु; नीयते--ले जाया जाता है
समस्त दिग-दिगान्तरों को जीत कर और इस तरह लड़ाई से मुक्त होकर मनुष्य भव्य राजसिंहासन पर आसीन होता है और अपने उन नायको से प्रशंसित होता है, जो किसी समय उसकेबराबर थे।
किन्तु जब वह स्त्रियों के कक्ष में प्रवेश करता है जहाँ संभोग-सुख पाया जाता है, तोहे प्रभु, वह पालतू पशु की तरह हाँका जाता है।
करोति कर्माणि तपःसुनिष्ठितोनिवृत्तभोगस्तदपेक्षयाददत् ।
पुनश्च भूयासमहं स्वराडितिप्रवृद्धतर्षो न सुखाय कल्पते ॥
५२॥
करोति--करता है; कर्माणि--कर्तव्य; तपः--तपस्या; सु-निष्ठित:ः--अत्यन्त स्थिर; निवृत्त--बचाते हुए; भोग:--इन्द्रिय भोग;तत्--उस ( पद ) से; अपेक्षया--तुलना में; अददत्--मानते हुए; पुनः--आगे; च--तथा; भूयासम्--अधिक बड़ा; अहम्--मैं;स्व-राट्--सम्राट, एकछत्र शासक; इति--इस प्रकार सोचते हुए; प्रवृद्ध--बढ़ी हुईं; तर्ष:--वेग, तृष्णा; न--नहीं; सुखाय--सुख; कल्पते--प्राप्त कर सकता है
जो राजा पहले से प्राप्त शक्ति से भी और अधिक शक्ति ( अधिकार ) की कामना करता है,वह तपस्या करके तथा इन्द्रिय-भोग का परित्याग करके कठोरता से अपने कर्तव्य पूरा करता है।
किन्तु जिसके वेग ( तृष्णाएँ ) यह सोचते हुए कि 'मैं स्वतंत्र तथा सर्वोच्च हूँ, ' इतने प्रबल हैं,वह कभी सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
भवापवर्गो भ्रमतो यदा भवे-ज्नस्य तहा॑च्युत सत्समागम:ः ।
सत्सड्रमो यहिं तदेव सदगतौपरावरेशे त्वयि जायते मतिः ॥
५३॥
भव--अस्तित्व का; अपवर्ग:--समाप्ति; भ्रमतः--घूमने वाला; यदा--जब; भवेत्--होता है; जनस्य--मनुष्य के लिए; तहिं--उस समय; अच्युत--हे अच्युत; सत्--साधु-भक्तों की; समागम: --संगति; सत्-सण्गम:--साधु-संगति; यहिं--- जब; तदा--तब; एव--केवल; सत्--सन््तों का; गतौ--लक्ष्य है, जो; पर-- श्रेष्ठ का ( जगत के कारण ); अवर--तथा निकृष्ट ( कार्य );ईशे-- भगवान् में; त्वयि--तुम; जायते--उत्पन्न होती है; मतिः--भक्ति
हे अच्युत, जब भ्रमणशील आत्मा ( जीव ) का भौतिक जीवन समाप्त हो जाता है, तो वहआपके भक्तों की संगति प्राप्त कर सकता है।
और जब वह उनकी संगति करता है, तो भक्तों केलक्ष्य और समस्त कारणों तथा उनके प्रभावों के स्वामी आपके प्रति उसमें भक्ति उत्पन्न होती है।
मन्ये ममानुग्रह ईश ते कृतोराज्यानुबन्धापगमो यहच्छया ।
यः प्रार्थ्यते साधुभिरिकचर्ययावन विविश्वद्धिरखण्डभूमिपै: ॥
५४॥
मन्ये--मैं सोचता हूँ; मम--मुझ पर; अनुग्रहः--दया; ईश--हे प्रभु; ते--आपके द्वारा; कृत:--की गई; राज्य--साप्राज्य;अनुबन्ध--आसक्ति का; अपगम:--विलगाव; यदृच्छया--जहाँ की तहाँ; य:--जो; प्रार्थ्यते--के लिए प्रार्थना की जाती है;साधुभि:--सन्तों द्वारा; एक-चर्यया--एकान्त में; वनमू--जंगल; विविश्वद्धिः--प्रवेश करने के इच्छुक; अखण्ड---असीम;भूमि-- भूमि के; पैः--शासकों द्वारा
हे प्रभु, मैं सोचता हूँ कि आपने मुझ पर कृपा की है क्योंकि आपने साम्राज्य के प्रति मेरीआसक्ति अपने आप समाप्त हो गई है।
ऐसी मुक्ति (स्वतंत्रता ) के लिए विशाल साम्राज्य केसाधु शासकों द्वारा प्रार्थना की जाती है, जो एकान्त जीवन बिताने के लिए जंगल में जाना चाहतेहैं।
न कामयेउन्यं तव पादसेवना-दकिख्ञनप्रार्थ्यतमाद्वरं विभो ।
आरशाध्य कर्त्वां ह्पवर्गदं हरेवृणीत आर्यो वरमात्मबन्धनम् ॥
५५॥
न कामये--मैं इच्छा नहीं करता; अन्यम्--दूसरी; तव--तुम्हारे; पाद--चरणों के; सेवनात्ू--सेवा के अतिरिक्त; अकिलज्लन--कुछ न चाहने वालों के द्वारा; प्रार्थ्य-तमात्--जो प्रार्थनीय हो; वरम्--वर; विभो--हे सर्वशक्तिमान; आराध्य-- पूज्य; कः--कौन; त्वामू--तुमको; हि--निस्सन्देह; अपवर्ग--मोक्ष का; दम्--प्रदाता; हरे--हे हरि; वृणीत--चुनेगा; आर्य:-- श्रेष्ठ पुरुष;वरम्ू--वर; आत्म--अपना; बन्धनम्--बन्धन ( का कारण )
हे सर्वशक्तिमान, मैं आपके चरणकमलों की सेवा के अतिरिक्त और किसी वर की कामनानहीं करता क्योंकि यह वर उन लोगों के द्वारा उत्सुकतापूर्वक चाहा जाता है, जो भौतिककामनाओं से मुक्त हैं।
हे हरि! ऐसा कौन प्रबुद्ध व्यक्ति होगा जो मुक्तिदाता अर्थात् आपकी पूजाकरते हुए ऐसा वर चुनेगा जो उसका ही बन्धन बने ?
तस्माद्विसृज्याशिष ईश सर्वतोरजस्तमःसत्त्वगुणानुबन्धना: ।
निरज्जनं निर्गुणमद्दय॑ परंत्वां ज्ञाप्तिमात्रं पुरुषं ब्रजाम्यहम् ॥
५६॥
तस्मात्--इसलिए; विसृज्य--त्यागकर; आशिष: --इच्छित वस्तुएँ; ईश-हे प्रभु; सर्वतः--नितान्त; रज: --रजो; तम:--तमो;सत्तत--तथा सतो; गुण-- भौतिक गुण; अनु-बन्धना:--फँसा हुआ; निरज्ञनम्-- भौतिक उपाधियों से मुक्त; निर्गुणम्-गुणों सेपरे; अद्दयम्--अद्वय; परम्--परम; त्वाम्--तुम्हारे पास; ज्ञाप्ति-मात्रमू-शुद्ध ज्ञान; पुरुषम्-- आदि-पुरुष को; ब्रजामि--पासआ रहा हूँ; अहम्-इइसलिए
हे प्रभु, उन समस्त भौतिक इच्छाओं को त्यागकर जो रजो, तमो तथा सतो गुणों से बद्ध हैं, मैं शरण लेने के लिए आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से प्रार्थना कर रहा हूँ।
आप संसारीउपाधियों से प्रच्छन्न नहीं हैं, प्रत्युत आप शुद्ध ज्ञान से पूर्ण तथा भौतिक गुणों से परे परम सत्यहैं।
चिरमिह वृजिनार्तस्तप्यमानोनुतापै-रवितृषषडमित्रो इलब्धशान्ति: कथझ्ञित् ।
शरणद समुपेतस्त्वत्पदाब्ज॑ परात्म-नभयमृतमशोकं पाहि मापन्नमीश ॥
५७॥
चिरम्--दीर्घकाल से; इह--इस संसार में; वृजिन--उत्पातों द्वारा; आर्त:--दुखी; तप्यमान:--सताये; अनुतापैः --पश्चाताप से;अवितृष--अतृप्त; षघटू--छ:; अमित्र: --शत्रु ( पाँच इन्द्रियाँ तथा मन ); अलब्ध--न प्राप्त करते हुए; शान्ति:--शान्ति;कथश्ञित्--किसी तरह से; शरण--शरण का; द--हे देने वाले; समुपेत:--आने वाले; त्वत्--तुम्हारे; पद-अब्जम्--चरणकमल; पर-आत्मनू--हे परमात्मा; अभयम्--निर्भीक; ऋतम्ू--सत्य; अशोकम्--शोकरहित; पाहि-- रक्षा करो; मा--मेरी; आपन्नम्--संकट से घिरा; ईश-हे प्रभु |
इतने दीर्घकाल से मैं इस जगत में कष्टों से पीड़ित होता रहा हूँ और शोक से जलता रहा हूँ।
मेरे छह शत्रु कभी भी तृप्त नहीं होते और मुझे शान्ति नहीं मिल पाती।
अतः हे शरणदाता, हेपरमात्मा! मेरी रक्षा करें।
हे प्रभु, सौभाग्य से इतने संकट के बीच मैं आपके चरणकमलों तकपहुँचा हूँ, जो सत्य रूप हैं और जो निर्भय तथा शोक-रहित बनाने वाले हैं।
श्रीभगवानुवाचसार्वभौम महाराज मतिस्ते विमलोर्जिता ।
बरैः प्रलोभितस्यापि न कामैर्विहता यतः ॥
५८॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; सार्वभौम--हे सम्राट; महा-राज--महान् राजा; मति:--मन; ते--तुम्हारा; विमल--निष्कलंक; ऊर्जिता--शक्तिशाली; वरैः--वरों से; प्रलोभितस्य--प्रलोभन में फँसे, तुम्हारा; अपि--यद्यपि; न--नहीं; कामै:--भौतिक इच्छाओं द्वारा; विहता--विनष्ट; यतः--चूँकि ।
भगवान् ने कहा : हे सप्राट, महान् राजा, तुम्हारा मन शुद्ध तथा सामर्थ्यवान है।
यद्यपि मैंने वरों के द्वारा तुम्हें प्रलोभित करना चाहा किन्तु तुम्हारा मन भौतिक इच्छाओं के वशीभूत नहींहुआ।
प्रलोभितो वरैर्यत्त्वमप्रमादाय विद्द्धि तत् ।
न धीरेकान्तभक्तानामाशीर्भिर्भिद्यते क्वचित् ॥
५९॥
प्रलोभित:ः--प्रलो भन में आये; बरै:--वरों से; यत्--जो तथ्य; त्वमू--तुम; अप्रमादाय--मोह से मुक्त होने के लिए; विद्द्धि--जानो; तत्--वह; न--नहीं; धी:--बुद्धि; एकान्त--एकमात्र; भक्तानामू-भक्तों के; आशीर्भि:--आशीर्वादों से; भिद्यते--विपथ होती है, भटकती है; क्वचित्ू--कभी |
यह जान लो कि मैं यह सिद्ध करने के लिए तुम्हें वरों से प्रलोभन दे रहा था कि तुम धोखानहीं खा सकते।
मेरे शुद्ध भक्त की बुद्धि कभी भी भौतिक आशीर्वादों से विषथ नहीं होती।
युज्ञानानामभक्तानां प्राणायामादिभिर्मन: ।
अक्षीणवासन राजन्हश्यते पुनरुत्थितम् ॥
६०॥
युज्ञानानाम्--लगे रहने वाले का; अभक्तानाम्--अभ क्तों का; प्राणायाम--प्राणायाम से; आदिभि:--इत्यादि से; मन: --मन;अक्षीण--निर्मूल नहीं हुई; वासनम्--वासना के अन्तिम अवशेष; राजनू्--हे राजन् ( मुचुकुन्द ); दृश्यते--देखी जाती हैं;पुनः--फिर; उत्थितम्--जगती हुई ( इन्द्रिय तृप्ति के विचारों के प्रति )
ऐसे अभक्तगण जो प्राणायाम जैसे अभ्यासों में लगते हैं उनके मन भौतिक इच्छाओं से कभीविमल नहीं होते।
इस तरह हे राजन, उनके मन में भौतिक इच्छाएँ पुनः उठती हुई देखी गई हैं।
विचरस्व महीं काम मय्यावेशितमानस: ।
अस्त्वेवं नित्यदा तुभ्यं भक्तिमय्यनपायिनी ॥
६१॥
विचरस्व-- भ्रमण करो; महीम्--इस पृथ्वी पर; कामम्--इच्छानुसार; मयि--मुझमें; आवेशित--स्थिर; मानस: --तुम्हारा मन;अस्तु--होए; एवम्--इस प्रकार; नित्यदा--सदैव; तुभ्यम्--तुम्हारे लिए; भक्ति:-- भक्ति; मयि--मुझमें; अनपायिनी--अविचल।
अपना मन मुझमें स्थिर करके तुम इच्छानुसार इस पृथ्वी पर विचरण करो।
मुझमें तुम्हारीऐसी अविचल भक्ति सदैव बनी रहे।
क्षात्रधर्मस्थितो जन्तूज््यवधीमृगयादिभि: ।
समाहितस्तत्तपसा जहाघं मदुपाभ्रित: ॥
६२॥
क्षात्र--क्षत्रियों के; धर्म--धर्म में; स्थित:--स्थित; जन्तून्ू--जीवों को; न््यवधी: --तुमने मारा; मृगया--शिकार के समय;आदिभि:--तथा अन्य कार्यों से; समाहित: --पूर्णतया केन्द्रित; तत्ू--उस; तपसा--तपस्या से; जहि--समूल उखाड़ फेंको;अधघम्ू--पापपूर्ण फल को; मत्--मुझमें; उपाभ्रित:--शरण लिये हुए।
चूँकि तुमने क्षत्रिय के सिद्धान्तों का पालन किया है, अतः शिकार करते तथा अन्य कार्यसम्पन्न करते समय तुमने जीवों का वध किया है।
तुम्हें चाहिए कि सावधानी के साथ तपस्याकरते हुए तथा मेरे शरणागत रहते हुए इस तरह से किए हुए पापों को मिटा डालो।
जन्मन्यनन्तरे राजन्सर्वभूतसुहत्तम: ।
भूत्वा द्विजवरस्त्वं वै मामुपैष्यसि केवलम् ॥
६३॥
जन्मनि--जन्म में; अनन्तरे--इसके तुरन्त बाद; राजन्ू--हे राजन; सर्ब--सभी; भूत--जीवों का; सुहत्-तमः --सर्व श्रेष्ठशुभचिन्तक; भूत्वा--बनकर; द्विज-वरः-- श्रेष्ठ ब्राह्मण; त्वमू--तुम; बै--निस्सन्देह; मम्--मेंरे पास; उपैष्यसि-- आओगे;केवलम्--एकमात्र |
हे राजन, तुम अगले जीवन में श्रेष्ठ ब्राह्मण, समस्त जीवों के सर्वोत्तम शुभचिन्तक बनोगेऔर अवश्य ही मेरे पास आओगे।
