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अध्याय बावन: रुक्मिणी का भगवान कृष्ण को संदेश
10.52श्रीशुक उबाचइत्थं सोउनग्रहीतो न्ग कृष्णेनेक्ष्वाकु नन्दनः ।
त॑ परिक्रम्य सन्नम्य निश्चक्राम गुहामुखात् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्--इस प्रकार; सः--वह; अनुग्रहीतः--दया दिखलाया गया; अड्ढड--हेप्रिय ( परीक्षित महाराज ); कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; इक्ष्बाकु-नन्दन:--इक्ष्वाकुवंशी मुचुकुन्द; तम्--उन््हें; परिक्रम्य--परिक्रमाकरके; सन्नम्य--नमस्कार करके; निश्चक्राम--बाहर चला गया; गुहा--गुफा के; मुखात्--मुँह से होकर
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा, इस प्रकार कृष्ण द्वारा दया दिखाये गये मुचुकुन्द नेउनकी प्रदक्षिणा की और उन्हें नमस्कार किया।
तब इक्ष्वाकुवंशी प्रिय मुचुकुन्द गुफा के मुँह सेहोकर बाहर आये।
संवीक्ष्य क्षुल्लकान्मर्त्यान््पशून्वीरुद्दनस्पतीन् ।
मत्वा कलियुगं प्राप्त जगाम दिशमुत्तराम् ॥
२॥
संवीक्ष्य--देखकर; श्षुल्लकान्--छोटे छोटे; मर्त्यान्ू--मनुष्यों को; पशूनू--पशुओं को; वीरुतू--लताओं; वनस्पतीन्--तथावृक्षों को; मत्वा--मान कर; कलि-युगम्--कलियुग को; प्राप्तम्--आया हुआ; जगाम--चला गया; दिशम्--दिशा में;उत्तरामू--उत्तरी
यह देखकर कि सभी मनुष्यों, पशुओं, लताओं तथा वृक्षों के आकार अत्यधिक छोटे होगये हैं और इस तरह यह अनुभव करते हुए कि कलियुग सन्निकट है, मुचुकुन्द उत्तर दिशा की ओर चल पड़े।
तपः श्रद्धायुतो धीरो निःसझ़े मुक्तसंशय: ।
समाधाय मन: कृष्णे प्राविशद्गन्धमादनम् ॥
३॥
तपः--तपस्या; श्रद्धा -- श्रद्धा से; युतः--युक्त; धीर:--गम्भीर; निःसड्र:-- भौतिक संगति से विरक्त; मुक्त--स्वतंत्र; संशय: --सन्देहों से; समाधाय--समाधि में स्थिर करके; मन:ः--अपना मन; कृष्णे--कृष्ण में; प्राविशत्-- प्रवेश किया; गन्धमादनम्--गन्धमादन नामक पर्वत पर।
भौतिक संगति से परे तथा सन्देह से मुक्त सौम्य राजा तपस्या के महत्व के प्रति विश्वस्त था।
अपने मन को कृष्ण में लीन करते हुए वह गन्धमादन पर्वत पर आया।
बदर्याश्रममासाद्य नरनारायणालयम् ।
सर्वद्वन्द्डसहः शान्तस्तपसाराधयद्धरिम् ॥
४॥
बदरी-आश्रमम्--बदरिका श्रम में; आसाद्य--पहुँच कर; नर-नारायण--नर तथा नारायण नामक भगवान् के दो अवतारों का;आलयमू--आवास; सर्व--समस्त; दन्द्र--द्वैतताओं को; सह:--सहते हुए; शान्तः--शान्त; तपसा--कठिन तपस्या से;आराधयत्-- पूजा; हरिम्ू-- भगवान् को
वहाँ वह नर-नारायण के धाम बदरिकाश्रम आया जहाँ पर समस्त द्वन्द्दों को सहते हुए उसनेकठोर तपस्या करके भगवान् हरि की शान्तिपूर्वक पूजा की।
भगवान्युनराब्रज्य पुरीं यवनवेष्टिताम् ।
हत्वा म्लेच्छबलं निन्ये तदीयं द्वारकां धनम् ॥
५॥
भगवान्-- भगवान्; पुनः--फिर से; आव्रज्य--लौटकर; पुरीम्--अपनी नगरी में; यवन--यवतों द्वारा; वेष्टितामू--घिरी;हत्वा--मारकर; म्लेच्छ--यवनों की; बलम्--सेना को; निन््ये--ले आये; तदीयम्--उनकी; द्वारकाम्--द्वारका को; धनम्--सम्पत्ति)भगवान् मथुरा नगरी लौट आये जो अब भी यवतनों से घिरी थी।
तत्पश्चात् उन्होंने बर्बर यवनोंकी सेना नष्ट की और उन यवनों की बहुमूल्य वस्तुएँ द्वारका ले गये।
नीयमाने धने गोभिरनृभिश्चाच्युतचोदितेः ।
आजगाम जरासन्धस्त्रयोविंशत्यनीकप: ॥
६॥
नीयमाने--ले जाते समय; धने--सम्पत्ति को; गोभि:--बैलों द्वारा; नृभि:--मनुष्यों द्वारा; च--तथा; अच्युत--भगवान् कृष्णद्वारा; चोदितेः--लगाये गये; आजुगाम--वहाँ आया; जरासन्ध: --जरासन्ध; त्रय:--तीन; विंशति-- बीस; अनीक--सेनाओंका; पः--नायक
जब यह सम्पदा भगवान् कृष्ण के आदेशानुसार बैलों तथा मनुष्यों द्वारा ले जाई जा रही थीतो जरासन्ध तेईस सैन्यटुकड़ियों के प्रधान के रूप में वहाँ प्रकट हुआ।
विलोक्य वेगरभसं रिपुसैन्यस्थ माधवौ ।
मनुष्यचेष्टामापन्नौ राजन्दुद्रुवतुर्द्तम् ॥
७॥
विलोक्य--देखकर; वेग--लहरों की; रभसम्--डरावनापन; रिपु--शत्रु की; सैन्यस्थ--सेनाओं का; माधवौ--दोनों माधव(कृष्ण तथा बलराम ); मनुष्य--मनुष्य जैसा; चेष्टामू--आचरण; आपतन्नौ-- धारण करते हुए; राजनू--हे राजा ( परीक्षित );दुद्गुबतु:-- भाग गये; द्रुतम्--तेजी से
हे राजन, शत्रु की सेना की भयंकर हलचल को देखकर माधव-बन्धु मनुष्य का-साव्यवहार करते हुए तेजी से भाग गये।
विहाय वित्त प्रचुरमभीतौ भीरुभीतवत् ।
पद्भ्यां पलाशाभ्यां चेलतुर्बहुयोजनम् ॥
८॥
विहाय--छोड़ कर; वित्तम्--धन; प्रचुरम्--पर्याप्त; अभीतौ--वस्तुतः बिना डरे; भीरु--डरपोकों के समान; भीत-वत्--डरेजैसे; पदभ्याम्--अपने पाँवों से; पद्य--कमलों की; पलाशाभ्याम्-पंखड़ियों जैसे; चेलतु:--चले गये; बहु-नोजनम्--कईयोजन तक ( एक योजन आठ मील से कुछ अधिक की दूरी है )
प्रचुर सम्पत्ति को छोड़ कर निर्भय किन्तु भय का स्वाँग करते हुए वे अपने कमलवत् चरणोंसे पैदल अनेक योजन चलते गये।
'पलायमानोौ तौ दृष्ठा मागध: प्रहसन्बली ।
अन्वधावद्रथानीकैरीशयोरप्रमाणवित् ॥
९॥
'पलायमानौ-- भागते हुए; तौ--उन दोनों को; दृष्टा--देखकर; मागध:--जरासन्ध; प्रहसन्--जोर से हँसते हुए; बली--बलवान;अन्वधावत्--पीछे पीछे दौड़ा; रथ--रथ; अनीकै:ः--तथा सैनिकों के साथ; ईशयो:--दोनों प्रभुओं का; अप्रमाण-वित्--कार्यक्षेत्र से अनभिज्ञ
उन दोनों को भागते देखकर शक्तिशाली जरासन्ध अट्टाहास करने लगा और सारथियों तथापैदल सैनिकों को साथ लेकर उनका पीछा करने लगा।
वह दोनों प्रभुओं के उच्च पद को समझनहीं सका।
प्रद्गुत्य दूरं संभ्रान्तौ तुड़मारुहतां गिरिम् ।
प्रवर्षणाख्यं भगवान्नित्यदा यत्र वर्षति ॥
१०॥
प्रद्वुत्य--पूरे वेग से दौड़कर; दूरम्--काफी दूरी; संश्रान्तौ--थके हुए; तुड़्म्--खूब ऊँचे; आरुहताम्--चढ़ गये; गिरिम्--पर्वतपर; प्रवर्षण-आख्यम्--प्रवर्षण नामक; भगवान्--इन्द्र; नित्यदा--सदैव; यत्र--जहाँ; वर्षति-- वर्षा करता है।
काफी दूरी तक भागने से थक कर चूर-चूर दिखते हुए दोनों प्रभु प्रवर्षण नामक ऊँचे पर्वतपर चढ़ गये जिस पर इन्द्र निरंतर वर्षा करता है।
गिरौ निलीनावाज्ञाय नाधिगम्य पदं नृप ।
ददाह गिरिमेधोभि: समन्तादग्निमुत्सूजन्ू ॥
११॥
गिरौ--पर्वत पर; निलीनौ--छिपे हुए; आज्ञाय--अवगत होकर; न अधिगम्य--न ढूँढ़कर; पदम्--उनका स्थान; नृप--हे राजा( परीक्षित ); ददाह--आग लगा दी; गिरिम्--पर्वत में; एधोभि:--ईंधन से; समन्तात्ू--चारों ओर; अग्निमू--आग; उत्सूजन्--उत्पन्न करते हुए
यद्यपि जरासन्ध जानता था कि वे दोनों ही पर्वत में छिपे हैं किन्तु उसे उनका कोई पता नहींचल सका।
अतः हे राजा, उसने सभी ओर लकड़ियाँ रखकर पर्वत में आग लगा दी।
तत उत्पत्य तरसा दह्ममानतटादुभौ ।
दशैकयोजनात्तुड्डान्रिपेततुरधो भुवि ॥
१२॥
ततः--उस ( पर्वत ) से; उत्पत्य--कूद कर; तरसा--जल्दी से; दह्ममान--जलते हुए; तटात्--छोरों से; उभौ--दोनों; दश-एक- ग्यारह; योजनात्ू--योजन; तुझत्--उच्च; निपेततु:--वे गिरे; अध:--नीचे; भुवि--जमीन पर।
तब वे दोनों सहसा उस जलते हुए ग्यारह योजन ऊँचे पर्वत से नीचे कूद कर जमीन पर आगिरे।
अलक्ष्यमाणौ रिपुणा सानुगेन यदूत्तमौ ।
स्वपुरं पुनरायातौ समुद्रपरिखां नूप ॥
१३॥
अलक्ष्यमाणौ--न दिखाई देते हुए; रिपुणा--अपने शत्रुओं द्वारा; स--सहित; अनुगेन-- अपने अनुयायियों के साथ; यदु--यदुओं के; उत्तमौ--दो अतीव उत्तम; स्व-पुरम्--अपनी पुरी ( द्वारका ) में; पुन:--फिर; आयातौ--गये; समुद्र--समुद्र;परिखाम्--रक्षा-खाई से युक्त; नृप--हे राजन् |
अपने प्रतिपक्षी या उसके अनुचरों द्वारा न दिखने पर, हे राजन, वे दोनों यदु श्रेष्ठ अपनीद्वारकापुरी लौट गये जिसकी सुरक्षा-खाई समुद्र थी।
सोपि दग्धाविति मृषा मन्वानो बलकेशवौ ।
बलमाकृष्य सुमहन्मगधान्मागधो ययौ ॥
१४॥
सः--वह; अपि-- भी; दग्धौ--अग्नि में जले हुए दोनों; इति--इस प्रकार; मृषा--झूठे ही; मन्वान:--सोचते हुए; बल-केशवौ--बलराम तथा कृष्ण; बलम्--अपनी सेना; आकृष्य--पीछे हटाकर; सु-महत्--विशाल; मगधानू--मगधों के राज्यमें; मागध:--मगधों का राजा; ययौ--चला गया ।
यही नहीं, जरासन्ध ने गलती से सोचा कि बलराम तथा कृष्ण अग्नि में जल कर मर गये हैं।
अतः उसने अपनी विशाल सेना पीछे हटा ली और मगध राज्य को लौट गया।
आनर्ताधिपति: श्रीमात्रैवतो रैवतीं सुताम् ।
ब्रह्मणा चोदित: प्रादाद्वलायेति पुरोदितम् ॥
१५॥
आनर्त--आनर्त प्रदेश का; अधिपति:--अधी श्वर; श्रीमान्--ऐ श्वर्यवान्; रैवत:--रैवत; रैवतीमू--रैवती नामक; सुताम्ू--उसकीपुत्री; ब्रह्मणा--ब्रह्मा द्वारा; चोदित:--आज्ञा दिया गया; प्रादात्ू--दिया; बलाय--बलराम को; इति--इस प्रकार; पुरा--प्राचीन काल में; उदितम्--उल्लिखित |
ब्रह्म के आदेश से आनर्त के वैभवशाली राजा रैवत ने अपनी पुत्री रैवती का विवाह बलरामसे कर दिया।
इसका उल्लेख पहले ही हो चुका है।
भगवानपि गोविन्द उपयेमे कुरूद्वह ।
वैदर्भी भीष्मकसुतां थ्रियो मात्रां स्वयंवरे ॥
१६॥
प्रमथ्य तरसा राज्ञः शाल्वादों श्रेद्यपक्षगान् ।
पश्यतां सर्वलोकानां तार््च्यपुत्र: सुधामिव ॥
१७॥
भगवान्-- भगवान्; अपि--निस्सन्देह; गोविन्द: --कृष्ण ने; उपयेमे--ब्याहा; कुरु-उद्दद--हे कुरुओं में वीर ( परीक्षित );वैदर्भीमू--रुक्मिणी को; भीष्मक-सुताम्--राजा भीष्मक की पुत्री; अ्रिय:--लक्ष्मी को; मात्रामू--स्वांश; स्वयमू-वरे-- अपनीरुचि से; प्रमथ्य--दमन करके; तरसा--बल से; राज्:--राजाओं को; शाल्व-आदीन्--शाल्व इत्यादि; चैद्य--शिशुपाल के;पक्ष-गान्--पक्षधरों को; पश्यताम्--देखते देखते; सर्व--सारे; लोकानामू--लोगों के; तार्क्ष्य-पुत्र:--तार्श््य का पुत्र ( गरुड़ );सुधाम्--स्वर्ग का अमृत; इब--सहश |
हे कुरुवीर, भगवान् गोविन्द ने भीष्मक की पुत्री वैदर्भी ( रुक्मिणी ) से विवाह किया जो साक्षात् लक्ष्मी की अंश थी।
भगवान् ने उसकी इच्छा से ही ऐसा किया और इस कार्य के लिएउन्होंने शाल्व तथा शिशुपाल के पक्षधर अन्य राजाओं को परास्त किया।
दरअसल सबों केदेखते देखते श्रीकृष्ण रुक्मिणी को उसी तरह उठा ले गये जिस तरह निःशंक गरुड़ देवताओं सेअमृत चुरा कर ले आया था।
श्रीराजोबाचभगवान्भीष्मकसुतां रुक्मिणीं रुचिराननाम् ।
राक्षसेन विधानेन उपयेम इति श्रुतम् ॥
१८॥
श्री-राजा उवाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; भगवान्-- भगवान्; भीष्मक-सुताम्-- भीष्मक की पुत्री; रुक्मिणीम्-- श्रीमतीरुक्मिणीदेवी को; रुचिर--मनोहर; आननाम्--मुख वाली; राक्षसेन--राक्षस नामक; विधानेन--विधि से ( अपहरण करके );उपयेमे--ब्याह लिया; इति--इस प्रकार; श्रुतम्--सुना गया है
राजा परीक्षित ने कहा : मैंने सुना है कि भगवान् ने भीष्मक की सुमुखी पुत्री रुक्मिणी से राक्षस-विधि से विवाह किया।
भगवन्श्रोतुमिच्छामि कृष्णस्यामिततेजस: ।
यथा मागधशाल्वादीन्जित्वा कन्यामुपाहरत् ॥
१९॥
भगवनू--हे प्रभु ( शुकदेव गोस्वामी ); श्रोतुम्--सुनना; इच्छामि--चाहता हूँ; कृष्णस्थ--कृष्ण के विषय में; अमित-- असीम;तेजसः--जिसका बल; यथा--किस तरह; मागध-शाल्व-आदीन्--जरासन्ध तथा शाल्व जैसे राजाओं को; जित्वा--हराकर;कन्याम्--दुलहन को; उपाहरत्ू--हर लाए
हे प्रभु, में यह सुनने का इच्छुक हूँ कि असीम बलशाली भगवान् कृष्ण किस तरह मागधतथा शाल्व जैसे राजाओं को हराकर अपनी दुलहन को हर ले गये।
ब्रह्मन्कृष्णकथा: पुण्या माध्वीलोेकमलापहा: ।
को नु तृप्येत श्रुण्वान: श्रुतज्ञो नित्यनूतना: ॥
२०॥
ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; कृष्ण-कथाः--कृष्ण की कथाएँ; पुण्या:--पवित्र; माध्वी:--मधुर; लोक--संसार के; मल--कल्मष को;अपहा:--दूर करने वाली; कः --कौन; नु--तनिक भी; तृप्येत--तृप्त होगा; श्रृण्वान:--सुनते हुए; श्रुत--सुना जाने वाला;ज्ञ:--जानने वाला; नित्य--सदा; नूतना:--नवीन |
हे ब्राह्मण, ऐसा कौन-सा अनुभवी श्रोता होगा जो श्रीकृष्ण की पवित्र, मनोहर तथा नित्यनवीन कथाओं को, जो संसार के कल्मष को धो देने वाली हैं, सुनकर कभी तृप्त हो सकेगा ?
श्रीबादरायणिरुवाचराजासीद्धीष्मको नाम विदर्भाधिपतिर्महान् ।
तस्य पन्चाभवन्पुत्रा: कन्यैका च वरानना ॥
२१॥
श्री-बादरायणि:-- श्री बादरायणि ( बादरायण वेदव्यास के पुत्र शुकदेव ) ने; उबाच--कहा; राजा--राजा; आसीत्-- था;भीष्पकः नाम--भीष्मक नामक; विदर्भ-अधिपति:--विदर्भ राज्य का शासक; महानू--महान्; तस्थ--उसके; पशञ्ञ--पाँच;अभवनू--थे; पुत्रा:--पुत्र; कन्या--पुत्री; एका--एक; च--तथा; वर--अतीव सुन्दर; आनना--मुख वाली |
श्री बादरायणि ने कहा : भीष्मक नामक एक राजा था, जो विदर्भ का शक्तिशाली शासकथा।
उसके पाँच पुत्र तथा एक सुमुखी पुत्री थी।
रुक्म्यग्रजो रुक्मरथो रुक्मबाहुरनन्तरः ।
रुक््मकेशो रुक््ममाली रुक्मिण्येषा स्वसा सती ॥
२२॥
रुक्मी--रुक््मी; अग्र-ज: --सबसे बड़ा; रुक्म-रथः रुक््मबाहु:--रुक्मरथ तथा रुकक््मबाहु; अनन्तर:--इनके बाद; रुक्म-केशःरुक््म-माली--रुक्मकेश तथा रुक््ममाली; रुक्मिणी--रुक्मिणी; एघा--वह; स्वसा--बहिन; सती--साधु चरित्र वाली |
रुक्मी सबसे बड़ा पुत्र था, उसके बाद रुक््मरथ, रुकक््मबाहु, रुक्मकेश तथा रुक््ममाली थे।
उनकी बहिन सती रुक्मिणी थी।
सोपश्रुत्य मुकुन्दस्य रूपवीर्यगुणअ्रियः ।
गृहागतैर्गीयमानास्तं मेने सहर्श पतिम् ॥
२३॥
सा--उसने; उपश्रुत्य--सुनकर; मुकुन्दस्थ--कृष्ण के; रूप--सौन्दर्य; वीर्य--पराक्रम; गुण--चरित्र; भ्रियः--तथा ऐश्वर्य केविषय में; गृह--उसके पारिवारिक घर में; आगतै:ः--आने वालों द्वारा; गीयमाना:--गाया जाकर; तम्--उसको; मेने--सोचा;सहशम्--उपयुक्त; पतिम्--पति।
महल में आने वालों के मुख से जो प्रायः मुकुन्द के बारे में गुणगान करते थे, मुकुन्द केसौन्दर्य, पराक्रम, दिव्य चरित्र तथा ऐश्वर्य के बारे में सुनकर, रुक्मिणी ने निश्चय किया कि वे हीउसके उपयुक्त पति होंगे।
तां बुद्धिलक्षणौदार्यरूपशीलगुणा श्रयाम् ।
कृष्णश्व सही भार्या समुद्गोढुं मनो दधे ॥
२४॥
ताम्ू--उसकी; बुद्धि--बुद्धि के; लक्षण--शुभ शारीरिक चिह्न; औदार्य --उदारता; रूप--सौन्दर्य; शील--उचित व्यवहार;गुण--तथा अन्य व्यक्तिगत गुण के; आश्रयाम्--आगार; कृष्ण:-- भगवान् कृष्ण; च--तथा; सहशीम्--उपयुक्त; भार्याम्--पत्नी; समुद्देदम--विवाह करने के लिए; मनः--अपना मन; दधे--बनाया।
भगवान् कृष्ण जानते थे कि रुक्मिणी बुद्धि, शुभ शारीरिक चिह्न, सौन्दर्य, उचित व्यवहारतथा अन्य उत्तम गुणों से युक्त है।
यह निष्कर्ष निकाल करके कि वह उनके योग्य एक आदर्शपत्नी होगी, कृष्ण ने उससे विवाह करने का निश्चय किया।
बन्धूनामिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृूप ।
ततो निवार्य कृष्णद्विड्क्मी चेद्मममन्यत ॥
२५॥
बन्धूनाम्--अपने परिवार के लोगों के; इच्छताम्--चाहने से; दातुम्-देने के लिए; कृष्णाय--कृष्ण को; भगिनीम्--अपनीबहन; नृप--हे राजा; ततः--इससे; निवार्य--उन्हें रोककर; कृष्ण-द्विट्--कृष्ण से द्वेष रखने से; रुक्मी--रुक्मी; चैद्यमू--चैद्य( शिशुपाल ) को; अमन्यत--मानता था।
हे राजनू, चूँकि रुक्मी भगवान् से द्वेष रखता था अतएव उसने अपने परिवार वालों को,उनकी इच्छा के विपरीत, अपनी बहन कृष्ण को दिये जाने से रोका।
उल्टे रुक््मी ने रुक्मिणी कोशिशुपाल को देने का निश्चय किया।
तदवेत्यासितापाड़ी वैदर्भी दुर्मना भूशम् ।
विच्न्त्यापंतं द्विजं कश्ञित्कृष्णाय प्राहिणोद्द्रुतम् ॥
२६॥
तत्--वह; अवेत्य--जानकर; असित--श्याम; अपाड़ी--जिसकी आँखों के कोर; बैदर्भी--विदर्भ की राजकुमारी; दुर्मना--दुखी; भूशम्-- अत्यधिक; विचिन्त्य--सोचकर; आप्तम्--विश्वस्त; द्विजम्--ब्राह्मण को; कञ्जित्--किसी; कृष्णाय--कृष्णके पास; प्राहिणोत्-- भेजा; द्रतम्ू--जल्दी से |
शयाम-नेत्रों वाली वैदर्भी इस योजना से अवगत थी अतः वह इससे अत्यधिक उदास थी।
उसने सारी परिस्थिति पर विचार करते हुए तुरन्त ही कृष्ण के पास एक विश्वासपात्र ब्राह्मण को भेजा।
द्वारकां स समभ्येत्य प्रतीहारैः प्रवेशित: ।
अपशयदाद्यं पुरुषमासीनं काझ्ननासने ॥
२७॥
द्वारकाम्-दद्वारका में; सः--वह ( ब्राह्मण ); समभ्येत्य--पहुँच कर; प्रतीहारैः--द्वारपालों के द्वारा; प्रवेशितः-- भीतर लायागया; अपश्यत्ू--देखा; आद्यम्ू--आदि; पुरुषम्--परम पुरुष को; आसीनम्--आसीन, बैठा; काज्नन--सुनहरे; आसने--सिंहासन पर।
द्वारका पहुँचने पर उस ब्राह्मण को द्वारपाल भीतर ले गये जहाँ उसने आदि-भगवान् को सोनेके सिंहासन पर आसीन देखा।
इृष्टा ब्रह्मण्यदेवस्तमवरुह्म निजासनात् ।
उपवेश्याईयां चक्रे यथात्मानं दिवौकस: ॥
२८ ॥
इृष्ठा--देखकर; ब्रह्मण्य--ब्राह्मणों का ध्यान रखने वाला; देव: --प्रभु; तम्ू--उसको; अवरुह्मय --उतर कर; निज--अपने;आसनातू--सिंहासन से; उपवेश्य--बैठाकर; अर्हयाम् चक्रे --पूजा की; यथा--जिस तरह; आत्मानम्--स्वयं को; दिव-ओकसः--स्वर्ग के वासी।
ब्राह्मण को देखकर, ब्राह्मणों के प्रभु श्रीकृष्ण अपने सिंहासन से नीचे उतर आये और उसेबैठाया।
तत्पश्चात् भगवान् ने उसकी उसी तरह पूजा की जिस तरह वे स्वयं देवताओं द्वारा पूजितहोते हैं।
त॑ं भुक्तवन्तं विश्रान्तमुपगम्य सतां गति: ।
पाणिनाभिमृशन्पादावव्यग्रस्तमपृच्छत ॥
२९॥
तम्--उसको; भुक्तवन्तम्--खा चुकने पर; विश्रान्तम्--आराम किया; उपगम्य--पास जाकर; सताम्--साधु-भक्तों का;गतिः--लक्ष्य; पाणिना--अपने हाथों से; अभिमृशन्--दबाते हुए; पादौ--उसके पाँव; अव्यग्र:--बिना क्षुब्ध हुए; तम्--उससे;अपृच्छत--पूछा
जब वह ब्राह्मण खा-पीकर आराम कर चुका तो साधु-भक्तों के ध्येय श्रीकृष्ण उसके पासआये और अपने हाथों से उस ब्राह्मण के पाँवों को दबाते हुए बड़े ही थैर्य के साथ इस प्रकारपूछा।
'कच्चिद्दिवजवर श्रेष्ठ धर्मस्ते वृद्धसम्मतः ।
वर्तते नातिकृच्छेण सन्तुष्टमनस: सदा ॥
३०॥
कच्चित्--क्या; द्विज--ब्राह्मणों में; वर-- श्रेष्ठ; श्रेष्ट-हे श्रेष्ठ; धर्म: --धर्म; ते--तुम्हारा; वृद्ध--गुरुजनों के द्वारा; सम्मतः--अनुमोदित; वर्तते--चल रहा है; न--नहीं; अति--अत्यधिक; कृच्छेण -- कठिनाई से; सन्तुष्ट--पूर्णतया संतुष्ट; मनस:--मनवाले; सदा--सदैव |
भगवान् ने कहा : हे ब्राह्मण-श्रेष्ठ, आपके गुरुजनों द्वारा अनुमोदित धार्मिक अनुष्ठानबिना किसी बड़ी कठिनाई के चल तो रहे हैं न? आपका मन सदैव संतुष्ट तो रहता है न?
सन्तुष्टो यहिं वर्तेत ब्राह्मणो येन केनचित् ।
अहीयमान: स्वद्धर्मात्स हास्याखिलकामधुक् ॥
३१॥
सन्तुष्ट:--सन्तुष्ट; यहिं--- जब; वर्तेत--पालन करता है; ब्राह्मण: --ब्राह्मण; येन केनचित्--जिस किसी से; अहीयमान:--न्यूननहीं; स्वात्ू--अपने; धर्मातू--धार्मिक कर्तव्य से; सः--वे धार्मिक सिद्धान्त ( धर्म ); हि--निस्सन्देह; अस्य--उसके लिए;अखिल-हर वस्तु का; काम-धुक्ू--कामधेनु गाय, किसी भी कामना-पूर्ति के लिए दुही जाने वाली
जो कुछ भी मिल जाय उससे सनन््तुष्ट हो जाना और अपने धार्मिक कर्तव्य से च्युत नहीं होनाये धार्मिक सिद्धान्त ब्राह्मण की सारी इच्छाओं को पूरी करने वाली कामधेनु बन जाते हैं।
असन्तुष्टोडइसकूल्लोकानाणोत्यपि सुरे श्वरः ।
अकिद्ञनोपि सन्तुष्टः शेते सर्वाड्रविज्वर: ॥
३२॥
असन्तुष्ट:--असन्तुष्ट; असकृत्--बारम्बार; लोकानू--विविध लोकों को; आप्नोति--प्राप्त करता है; अपि--यद्यपि; सुर--देवताओं का; ईश्वरः--स्वामी; अकिज्ञन: --निर्धन; अपि--हो ते हुए भी; सन्तुष्ट:--सन्तुष्ट; शेते--सोता है; सर्व--सारे; अड्ड--शरीर के अंग; विज्वर: --दुख से रहित
असन्तुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग का राजा बन जाने पर भी एक लोक से दूसरे लोक में बेचैन होकर भटकता रहता है।
किन्तु संतुष्ट ब्राह्मण, अपने पास कुछ न होने पर भी शान्तिपूर्वक विश्रामकरता है और उसके सारे अंग कष्ट से मुक्त रहते हैं।
विप्रान्स्वलाभसन्तुष्टान्साधून्भूतसुहृत्तमान् ।
निरहड्ढारिण: शान्तान्नमस्ये शिरसासकृत् ॥
३३॥
विप्रान्ू--विद्वान ब्राह्मणों को; स्व--अपना; लाभ--लाभ से; सनन््तुष्टान्ू--संतुष्ट; साधून्ू--साधु; भूत--सारे जीवों का; सुहृत्-तमान्--सर्वश्रेष्ठ शुभचिन्तक मित्र; निरहड्डारिण:--मिथ्या अहंकार से रहित; शान्तान्ू--शान्त; नमस्ये -- नमस्कार करता हूँ;शिरसा--सिर के बल; असकृत्-पुनः पुनः
मैं उन ब्राह्मणों को बारम्बार अपना शीश नवाता हूँ जो अपने भाग्य से संतुष्ट हैं।
साधु,अहंकारशून्य तथा शान्त होने से वे समस्त जीवों के सर्वोत्तम शुभचिन्तक हैं।
कच्चिद्वः कुशल ब्रह्मत्राजतो यस्य हि प्रजा: ।
सुखं वसन्ति विषये पाल्यमाना: स मे प्रिय: ॥
३४॥
कच्चित्ू--क्या, कहीं; व:--तुम्हारा; कुशलम्--कुशलमंगल; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; राजत:ः--राजा से; यस्थ--जिसका; हि--निस्सन्देह; प्रजा:--जनता; सुखम्--सुखपूर्वक; वसन्ति--रहती हैं; विषये--देश में; पाल्यमाना: --रक्षित होकर; सः--वह;मे--मुझको; प्रियः--प्रिय |
हे ब्राह्मण, आपका राजा आप लोगों के कुशल-मंगल का ध्यान तो रखता है? निस्सन्देह,जिस राजा के देश में प्रजा सुखी तथा सुरक्षित है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
यतस्त्वमागतो दुर्ग निस्तीर्येह यदिच्छया ।
सर्व नो ब्रूह्मगुह्मं चेत्कि कार्य करवाम ते ॥
३५॥
यतः--जहाँ से; त्वम्ू--तुम; आगतः --आये हो; दुर्गम्-दुर्गम समुद्र; निस्तीर्य--पार करके; इह--यहाँ; यत्--किस;इच्छया--इच्छा से; सर्वम्--सारी वस्तुएँ; नः--हमारे प्रति; ब्रूहि--कहो; अगुह्मम्--गुप्त नहीं; चेत्ू--यदि; किमू--क्या;कार्यम्-कार्य; करवाम--हम करें; ते--तुम्हारे लिए
दुल्ल॑ध्य समुद्र पार करके आप कहाँ से और किस कार्य से यहाँ आये हैं ? यदि यह गुप्त न होतो हमें बतलाइये और यह कहिये कि आपके लिए हम क्या कर सकते हैं ?
एवं सम्पृष्टसम्प्रश्नो ब्राह्मण: परमेष्ठिना ।
लीलागृहीतदेहेन तस्मै सर्वमवर्णयत् ॥
३६॥
एवम्--इस प्रकार; सम्पृष्ट--पूछा गया; सम्प्रश्न:--प्रश्न; ब्राह्मण: --ब्राह्मण; परमेष्ठिना-- भगवान् द्वारा; लील--अपनी लीलाके रूप में; गृहीत--ग्रहण किये गये; देहेन--अपने शरीरों से; तस्मै--उसको; सर्वम्--हर वस्तु; अवर्णयत्--कह सुनाया।
अपनी लीला सम्पन्न करने के लिए अवतार लेने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् द्वारा इस तरहपूछे जाने पर ब्राह्मण ने उन्हें सारी बात बता दी।
श्रीरुक्मिण्युवाचश्रुत्वा गुणान्भुवनसुन्दर श्रण्वतां तेनिर्विश्य कर्णविवरहरतोड्डरतापम् ।
रूप॑ं ह॒शां हशिमतामखिलार्थलाभंत्वय्यच्युताविशति चित्तमपत्रपं मे ॥
३७॥
श्री-रुक्मिणी उबाच-- श्री रुक्मिणी ने कहा; श्रुत्वा--सुनकर; गुणान्--गुणों को; भुवन--सारे लोकों के; सुन्दर--हे सौन्दर्य;श्रृण्वताम्--सुनने वालों के लिए; ते--तुम्हारा; निर्विश्य--प्रवेश करके; कर्ण--कानों के; विवरै:--छेदों से; हरतः--हटातेहुए; अड्ड-- उनके शरीरों की; तापमू--पीड़ा; रूपम्--सौन्दर्य; दहशाम्--देखने की इन्द्रिय का; हशि-मताम्--आँख वालों का;अखिल--समग्र; अर्थ--इच्छापूर्ति का; लाभम्--प्राप्ति; त्वयि--तुममें; अच्युत--हे अच्युत कृष्ण; आविशति--प्रवेश करतीहै; चित्तम्-चित्त में; अपत्रपम्--निर्लज्ज; मे--मेरे |
ब्राह्मण द्वारा पढ़े जा रहे अपने पत्र में श्री रुक्मिणी ने कहा : हे जगतों के सौन्दर्य,आपके गुणों के विषय में सुनकर जो कि सुनने वालों के कानों में प्रवेश करके उनके शारीरिकताप को दूर कर देते हैं और आपके सौन्दर्य के बारे में सुनकर कि वह देखने वाले की सारी दृष्टिसम्बन्धी इच्छाओं को पूरा करता है, हे कृष्ण, मैंने अपना निर्लज् मन आप पर स्थिर कर दियाहै।
का त्वा मुकुन्द महती कुलशीलरूप-विद्यावयोद्रविणधामभिरात्मतुल्यम् ।
धीरा पतिं कुलवती न वृणीत कन्याकाले नृसिंह नरलोकमनोभिरामम् ॥
३८ ॥
का--कौन; त्वा--तुम; मुकुन्द--हे कृष्ण; महती--राजसी; कुल--पारिवारिक पृष्ठभूमि के रूप में; शील--चरित्र; रूप--सौन्दर्य; विद्या--ज्ञान; वय: --युवावस्था; द्रविण-- धन; धामभि:--तथा प्रभाव से; आत्म-- अपने ही; तुल्यम्--समान;धीरा--जो धीर है; पतिम्--अपने पति रूप में; कुल-वती--अच्छे परिवार वाली; न वृणीत--वरण नहीं करेगी; कन्या--विवाहयोग्य तरुणी; काले--ऐसे समय में; नृ--लोगों में; सिंह--हे सिंह; नर-लोक--मानव समाज का; मनः--मनों को;अभिरामम्-- आनन्द देने वाले।
हे मुकुन्द, आप वंश, चरित्र, सौन्दर्य, ज्ञान, युवावस्था, सम्पदा तथा प्रभाव में केवल अपनेसमान हैं।
हे पुरुषों में सिंह, आप सारी मानवता के मन को आनन्दित करते हैं।
उपयुक्त समय आजाने पर ऐसी कौन-सी राजकुल की धीर तथा विवाहयोग्य कन्या होगी जो आपको पति रूप मेंनहीं चुनेगी ?
तन्मे भवान्खलु वृतः पतिरड़ जाया-मात्मार्पितश्व भवतोत्र विभो विधेहि ।
मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्य आराद्गोमायुवन्मृगपते्बलिमम्बुजाक्ष ॥
३९॥
तत्--अतः; मे--मेरे द्वारा; भवान्ू--आप; खलु--निस्सन्देह; वृत:ः--चुने गये; पति:--पति रूप में; अड्भ--प्रिय स्वामी;जायाम्--पत्नी रूप में; आत्मा--अपने को; अर्पित:--अर्पित; च--और; भवतः--आपको; अत्र--यहाँ; विभो--हेसर्वशक्तिमान; विधेहि-- स्वीकार करें; मा--कभी नहीं; वीर--वीर का; भागम्-- अंश; अभिमर्शतु--छूना चाहिए; चैद्य:-- चेदिराज का पुत्र, शिशुपाल; आरात्--तेजी से; गोमायु-वत्--सियार की तरह; मृग-पते: --पशुओं के राजा सिंह से सम्बन्धित;बलिम्--बलि; अम्बुज-अक्ष--हे कमल-नेत्र |
अतएव हे प्रभु, मैंने आपको अपने पति-रूप में चुना है और मैं आपकी शरण में आई हूँ।
हेसर्वशक्तिमान, तुरन्त आइये और मुझे अपनी पत्नी बना लीजिये।
हे मेरे कमल-नेत्र स्वामी, किसीसिंह की सम्पत्ति को चुराने वाले सियार जैसे शिशुपाल को एक वीर के अंश को कभी छूने नदीजिये।
पूर्तेष्टदत्तनियमत्रतदेवविप्र-गुर्वर्चनादिभिरलं भगवान्परेश: ।
आराधितो यदि गदाग्रज एत्य पाणिंगृह्नातु मे न दमघोषसुतादयोउन्ये ॥
४०॥
पूर्त--पुण्य कार्यो ( ब्राह्मणों को भोजन कराना, कुंआ खुदवाना आदि ) के द्वारा; इष्ट--यज्ञादि करना; दत्त--दान; नियम--अनुष्ठान पालन ( यथा तीर्थस्थान जाना ); ब्रत--तपस्या का ब्रत; देव--देवताओं; विप्र--ब्राह्मणों; गुरु--तथा गुरुओं की;अर्चन--पूजा; आदिभि: --इत्यादि से; अलमू--पर्याप्त; भगवान्-- भगवान्; पर--परम; ईशः--नियंत्रक; आराधित: -- भक्तिकिया हुआ; यदि--यदि; गद-अग्रज:--गद के बड़े भाई, कृष्ण; एत्य--आकर; पाणिम्--हा थ; गृह्नातु-- ग्रहण करें; मे--मेरा; न--नहीं; दमघोष-सुत--दमघोष-पुत्र, शिशुपाल; आदय: --इत्यादि; अन्ये-- अन्य |
यदि मैंने पुण्य कर्म, यज्ञ, दान, अनुष्ठान-ब्रत के साथ साथ देवताओं, ब्राह्मणों तथा गुरुओंकी पूजा द्वारा भगवान् की पर्याप्त रूप से उपासना की हो तो हे गदाग्रज, आप आकर मेरा हाथग्रहण करें और दमघोष का पुत्र या कोई अन्य ग्रहण न करने पाये।
श्रो भाविनि त्वमजितोद्वहने विदर्भान्गुप्त: समेत्य पृतनापतिभि: परीतः ।
निर्मथ्य चैद्यमगधेन्द्रबलं प्रसह्यमां राक्षसेन विधिनोद्वह वीर्यशुल्काम् ॥
४१॥
श्र: भाविनि--कल; त्वम्--तुम; अजित--हे अजेय; उद्दहने--विवाहोत्सव के समय; विदर्भानू-विदर्भ में; गुप्त:-- अहृश्य;समेत्य--आकर; पृतना--अपनी सेना के; पतिभि:--नायकों द्वारा; परीत:--घिरा हुआ; निर्मथ्य--दलन करके; चैद्य--शिशुपाल; मगध-इन्द्र--तथा मगध का राजा, जरासन्ध की; बलम्--सैन्य-शक्ति; प्रसह्या--बलपूर्वक; माम्--मुझको; राक्षसेनविधिना--राक्षस विधि से; उद्दद--विवाह करके ले जाओ; वीर्य--अपने पराक्रम के; शुल्काम्--मूल्य रूप में
है अजित, कल जब मेरा विवाहोत्सव प्रारम्भ हो तो आप विदर्भ में अपनी सेना के नायकोंसे घिर कर गुप्त रूप से आयें।
तत्पश्चात् चैद्य तथा मगथेन्द्र की सेनाओं को कुचल कर अपनेपराक्रम से मुझे जीत कर राक्षस विधि से मेरे साथ विवाह कर लें।
अन्तःपुरान्तरचरीमनिहत्य बन्धूनू-त्वामुद्ठेद कथमिति प्रवदाम्युपायम् ।
पूर्वेद्यरस्ति महती कुलदेबयात्रायस्यां बहिर्नववरधूर्गिरिजामुपेयात् ॥
४२॥
अन्तः-पुर--महल में स्त्रियों के कक्ष, रनिवास के; अन्तर-- भीतर; चरीम्--घूमने वाले; अनिहत्य--बिना मारे; बन्धून्--तुम्हारेसम्बन्धियों को; त्वामू--तुमको; उद्दद--मैं ले जाऊँगा; कथम्--कैसे; इति--ऐसे शब्द कहते हुए; प्रवदामि--मैं बतलाऊँगी;उपायम्--उपाय; पूर्वे-द्य;--एक दिन पहले; अस्ति-- है; महती--विशाल; कुल--राजपरिवार के; देव--कुलदेवता के लिए;यात्रा--जुलूस; यस्याम्--जिसमें; बहि:--बाहर; नव--नवीन; वधू: --दुलहन; गिरिजाम्--देवी गिरिजा ( अम्बिका ) के पास;उपेयात्--जाती है|
चूँकि मैं रनिवास के भीतर रहूँगी अतः आप आश्चर्य करेंगे और सोचेंगे कि 'मैं तुम्हारे कुछसम्बन्धियों को मारे बिना तुम्हें कैसे ले जा सकता हूँ ?' किन्तु मैं आपको एक विधि बतलाऊँगी:ःविवाह के एक दिन पूर्व राजकुल के देवता के सम्मान में एक विशाल जुलूस निकलेगा जिसमेंदुलहन नगर के बाहर देवी गिरिजा का दर्शन करने जाती है।
यस्याड्प्रिपड्टूजरज:स्नपनं महान्तोवाउछन्त्युमापतिरिवात्मतमोपहत्ये ।
यहाम्बुजाक्ष न लभेय भवत्प्रसादंजह्मामसून्त्रतकृशान्शतजन्मभि: स्यात् ॥
४३॥
यस्य--जिसके; अद्धूघ्रि--चरणों की; पड्डूज--कमल; रज:-- धूलि से; स्नपनम्--स्नान करते हुए; महान्तः--महात्मागण;वाज्छन्ति--लालायित रहते हैं; उमा-पति:--उमादेवी के पति, शिवजी; इब--जिस तरह; आत्म--अपने; तम:--अज्ञान के;अपहत्यै--नष्ट करने के लिए; यहिं---जब; अम्बुज-अक्ष--हे कमल-नयन; न लभेय--मैं नहीं पा सकती; भवत्--आपकी;प्रसादम्ू--दया; जह्याम्--मुझे त्याग देना चाहिए; असून्--अपने प्राण; ब्रत--तपस्या द्वारा; कृशान्--दुर्बल हुए; शत--सौ;जन्मभि:--जन्मों के बाद; स्यात्--हो सके
हे कमल-नयन, शिवजी जैसे महात्मा आपके चरणकमलों की धूलि में स्नान करके अपनेअज्ञान को नष्ट करना चाहते हैं।
यदि मुझे आपकी कृपा प्राप्त नहीं होती तो मैं अपने उस प्राणको त्याग दूँगी जो मेरे द्वारा की जाने वाली कठिन तपस्या के कारण क्षीण हो चुका होगा।
तबकहीं सैकड़ों जन्मों तक परिश्रम करने के बाद शायद आपकी कृपा प्राप्त हो सके।
'ब्राह्मण उवाचइत्येते गुह्मसन्देशा यदुदेव मयाहता: ।
विमृश्य कर्तु यच्चात्र क्रियतां तदनन्तरम् ॥
४४॥
ब्राह्मण: उवाच--ब्राह्मण ने कहा; इति--इस प्रकार; एते--ये; गुह्म--गुप्त; सन्देशा: --सन्देश; यदु-देव--हे यदुओं के स्वामी;मया--मेरे द्वारा; आहता: --लाये गये; विमृश्य--विचार करके; कर्तुमू--करणीय; यत्--जो; च--तथा; अत्र--इस बारे में;क्रियताम्-करें; तत्--वह; अनन्तरम्--इसके तुरन्त बाद
ब्राह्मण ने कहा, हे यदु-देवमैं यह गोपनीय संदेश अपने साथ लाया हूँ।
कृपया सोचें-विचारें कि इन परिस्थितियों में क्या किया जाना चाहिये और उसे तुरन्त ही कीजिये।
