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अध्याय चौवन: कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह

10.54श्रीशुक उबाचइति सर्वे सुसंरब्धा वाहानारुह्म दंशिता: ।

स्वै:स्वैर्बलै: परिक्रान्ता अन्वीयुर्धृतकार्मुका: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार कहते हुए; सर्वे--सभी; सु-संरब्धा:--अत्यन्त क्रुद्ध; वाहान्‌--अपने अपने वाहनों में; आरुह्म-- चढ़ कर; दंशिता:--कवच पहने हुए; स्वै: स्वै:--अपनी अपनी; बलै:--सेना से;परिक्रान्ता:--घिरे हुए; अन्बीयु:--पीछा करने लगे; धृत--पकड़े हुए; कार्मुकाः--अपने धनुष ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह कह कर उन सरे क्रुद्ध राजाओं ने अपने कवच पहने औरअपने अपने वाहनों में सवार हो गये।

प्रत्येक राजा अपने हाथ में धनुष धारण किये भगवान्‌कृष्ण का पीछा करते समय अपनी सेना से घिरा हुआ था।

तानापतत आलोक्य यादवानीकयूथपा: ।

तस्थुस्तत्सम्मुखा राजन्विस्फूर्ज्य स्वधनूंषि ते ॥

२॥

तानू--उनको; आपततः--पीछा करते; आलोक्य--देख कर; यादब-अनीक--यादव सेना के; यूथ-पः--अधिकारी; तस्थु:--खड़े हो गये; तत्‌--उनके ; सम्मुखा:--समक्ष; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); विस्फूर्ज्य--टंकार देकर; स्व--अपने अपने;धनूंषि-- धनुष; ते--वे |

जब यादव सेना के सेनापतियों ने देखा कि शत्रुगण उन पर आक्रमण करने के लिए दौड़रहे हैं, तो हे राजनू, वे सब अपने धनुषों में टंकार देकर उनका सामना करने के लिए मुड़े औरहढ़तापूर्वक अड़ गये।

अश्रपृष्ठे गजस्कन्धे रथोपस्थेस्त्र कोविदा: ।

मुमुचु: शरवर्षाणि मेघा अद्विष्वपो यथा ॥

३॥

अश्व-पृष्ठ--घोड़े की पीठ पर; गज--हाथी के; स्कन्धे--कंधों पर; रथ--रथों के; उपस्थे--आसनों पर; अस्त्र--हथियारों के;कोविदा:--पटु; मुमुचु;--छोड़ा; शर--बाणों की; वर्षाणि--वर्षा; मेघा:--बादल; अद्विषु--पर्वतों पर; अप:--जल; यथा--जिस तरह।

घोड़ों की पीठों पर, हाथियों के कन्धों पर तथा रथों के आसनों पर सवार होकर अम््नों मेंपटु शत्रु राजाओं ने यदुओं पर बाणों की वर्षा की जिस तरह बादल पर्वतों पर वर्षा करते हैं।

पत्युर्बलं शरासारैश्छन्न॑ं वीक्ष्य सुमध्यमा ।

सक्रीडमैक्षत्तद्वक्त्रं भयविह्ललोचना ॥

४॥

पत्यु:--अपने पति की; बलम्‌--सेना; शर--बाणों की; आसारैः -- भीषण वर्षा से; छन्नममू--ढका हुआ; वीक्ष्य--देख कर; सु-मध्यमा--पतली कमर वाली ( रुक्मिणी ) ने; स-ब्रीडम्‌ू--लजाते हुए; ऐशक्षत्‌--देखा; तत्‌--उसके; वक्त्रमू--मुख को; भय--भय से; विहल--विचलित; लोचना--आँखों वाली |

पतली कमर वाली रुक्मिणी ने अपने स्वामी की सेना को बाणों की धुँआधार वर्षा सेआच्छादित देख कर भयभीत आँखों से लजाते हुए कृष्ण के मुख की ओर निहारा।

प्रहस्य भगवानाह मा स्म भे्वामलोचने ।

विनदृछ्चयत्यधुनेवैतत्तावकै: शात्रवं बलम्‌ ॥

५॥

प्रहस्थ--हँस कर; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; आह--कहा; मा सम भेः--तुम डरो नहीं; वाम-लोचने--हे सुन्दर नेत्रों वाली;विनड्छ्यति--नष्ट कर दी जायेगी; अधुना एब--अभी ही; एतत्‌--यह; तावकै :--तुम्हारी ( सेना ) द्वारा; शात्रवम्‌--शत्रुओं की;बलमू--सेना।

भगवान्‌ ने हँसते हुए उसे विश्वास दिलाया, 'हे सुन्दर नेत्रों वाली, तुम डरो मत! यह शत्रुसेना तुम्हारे सैनिकों द्वारा विनष्ट होने ही वाली है।

तेषां तद्विक्रमं वीरा गदसड्डूर्षनादय: ।

अमृष्यमाणा नाराचैज॑घ्नुईयगजात्रथान्‌ ॥

६॥

तेषाम्‌--उनके ( विरोधी राजाओं ) द्वारा; तत्‌--वह; विक्रमम्‌--पराक्रम-प्रदर्शन; वीरा:--बीरगण; गद--गद, कृष्ण के छोटेभाई; सट्डर्षण--बलराम; आदय: --इत्यादि; अमृष्यमाणा: --न सहन करते हुए; नाराचै:--लोहे के बाणों से; जघ्नु: --प्रहारकिया; हय--घोड़े; गजान्‌--हा थी; रथान्‌ू--तथा रथों पर |

भगवान्‌ की सेना में गद, संकर्षण इत्यादि बीर विरोधी राजाओं के आक्रमण को सहन नहींकर सके।

अतः वे लोहे के बाणों से शत्रुओं के घोड़ों, हाथियों तथा रथों पर प्रहार करने लगे।

पेतुः शिरांसि रथिनामश्विनां गजिनां भुवि ।

सकुण्डलकिरीटानि सोष्णीषाणि च कोटिश: ॥

७॥

पेतु:--गिरने लगे; शिरांसि--सिर; रथिनाम्‌-रथारोहियों के; अश्विनाम्‌-घुड़सवारों के; गजिनाम्‌--हाथी पर सवार होने वालोंके; भुवि--पृथ्वी पर; स--सहित; कुण्डल--कान की बालियाँ; किरीटानि--तथा मुकुट; स--सहित; उष्णीषाणि--पगड़ियाँ;च--तथा; कोटिशः--करोड़ों |

रथों, घोड़ों तथा हाथियों पर सवार होकर लड़ने वाले सैनिकों के सिर करोड़ों की संख्या मेंगिरने लगे।

इनमें से कुछ सिर कुण्डलों से युक्त थे तो कुछों पर मुकुट एवं पगड़ियाँ थी।

हस्ता: सासिगदेष्वासा: करभा ऊरवोड्घ्रयः ।

अश्वाश्वतरनागोष्ट्खरमर्त्पशिरांसि च ॥

८॥

हस्ता:--हाथ; स--सहित; असि--तलवारें; गदा--गदा; इषु-आसा:--बाण; करभा: --अंगुलियों से विहीन हाथ; ऊरव:--जाँघें; अड्घ्रय:--पाँव; अश्व--घोड़ों; अश्वतर--गधों; नाग--हाथियों; उद्द--ऊँटों; खर--जंगली गधों; मर्त्य--तथा मनुष्योंके; शिरांसि--सिर; च-- भी

चारों ओर जाँघें, पाँव तथा अंगुलियों से विहीन हाथों के साथ ही साथ तलवार, गदा तथाधनुष पकड़े हुए हाथ और घोड़ों, गधों, हाथियों, ऊँटों, जंगली गधों तथा मनुष्यों के सिर भी पड़ेहुए थे।

जनहन्यमानबलानीका वृष्णिभिर्जयकाड्क्षिभि: ।

राजानो विमुखा जम्मुर्जरासन्धपुरःसरा: ॥

९॥

हन्यमान--मारे जा रहे; बल-अनीका:--जिनकी सेनाएँ; वृष्णिभि:--वृष्णियों द्वारा; जय--विजय के लिए; काड्क्षिभि: --इच्छुक; राजान:--राजागण; विमुखा: --निरुत्साहित; जग्मु:--छोड़ दिया; जरासन्ध-पुर:-सरा: --जरासन्ध इत्यादि ।

विजय के लिए उत्सुक वृष्णियों द्वारा अपनी सेनाओं को मारे जाते देखकर जरासन्ध इत्यादिराजा हतोत्साहित हुए और युद्ध-भूमि छोड़ कर भाग गये।

शिशुपालं समभ्येत्य हृतदारमिवातुरम्‌ ।

नष्टत्विषं गतोत्साहं शुष्यद्वदनमब्रुवन्‌ ॥

१०॥

शिशुपालम्‌--शिशुपाल के; समभ्येत्य--पास जाकर; हत--चुरायी गई; दारम्‌--पत्नी वाला; इब--मानो; आतुरम्‌--विचलित;नष्ट--खोया हुआ; त्विषम्‌--रंग; गत--गया हुआ; उत्साहम्‌--उत्साह; शुष्यत्‌--सूख गया; वदनम्‌--मुँह; अब्ुवन्‌--उन्होंनेकहा

सारे राजा शिशुपाल के पास गये जो उस व्यक्ति के समान उद्धिग्न था जिसकी पत्नी छिनचुकी हो।

उसके शरीर का रंग उतर गया, उसका उत्साह जाता रहा और उसका मुख सूखा हुआप्रतीत होने लगा।

राजाओं ने उससे इस प्रकार कहा।

भो भोः पुरुषशार्दूल दौर्मनस्यमिदं त्यज ।

न प्रियाप्रिययो राजन्निष्ठा देहिषु हश्यते ॥

११॥

भो: भो:--ओरे महाशय; पुरुष--पुरुषों में; शार्टूल--हे बाघ; दौर्मन-स्यम्‌--मन की उदास अवस्था; इृदम्‌-यह; त्यज--छोड़ो; न--नहीं; प्रिय--वांछित; अप्रिययो: --या अवांछित का; राजन्‌--हे राजन्‌; निष्ठा--स्थायित्व; देहिषु--देहधारी जीवोंमें; दृश्यते--देखा जाता है।

जरासन्ध ने कहा हे पुरुषों में व्याप्र शिशुपाल, सुनो।

तुम अपनी उदासी छोड़ दो।

हेराजन्‌, सारे देहधारियों का सुख तथा दुख कभी भी स्थायी नहीं देखे गये हैं।

यथा दारूमयी योषिलूृत्यते कुहकेच्छया ।

एवमी श्वरतन्त्रोौयमीहते सुखदुःखयो: ॥

१२॥

यथा--जिस तरह; दारु-मयी--काठ की बनी; योषित्‌--स्त्री; नृत्यते--नाचती है; कुहक--दिखाने वाले की; इच्छया--इच्छासे; एवम्‌--उसी तरह से; ईश्वर--ई श्वर के; तन्त्र:--नियंत्रण में; अयम्‌--यह जगत; ईहते--चेष्टा करता है; सुख--सुख;दुःखयो:--तथा दुख में |

जिस तरह स्त्री के वेश में एक कठपुतली अपने नचाने वाले की इच्छानुसार नाचती है उसीतरह भगवान्‌ द्वारा नियंत्रित यह जगत सुख तथा दुख दोनों से भिड़ता रहता है।

शौरे: सप्तदशाहं वै संयुगानि पराजित: ।

त्रयोविंशतिभि: सैन्यैर्जिग्ये एकमहं परम्‌ ॥

१३॥

शौरे:--कृष्ण से; सप्त-दश--सत्रह; अहम्‌--मैं; वै--निस्सन्देह; संयुगानि--युद्ध; पराजित:--हारा हुआ; त्रयः-विंशतिभि: --तेईस; सैन्यै:--सेनाओं से; जिग्ये--जीता; एकम्‌--एक; अहम्‌--मैंने; परमू--केवल |

मैं कृष्ण के साथ युद्ध में अपनी तेईस सेनाओं सहित सत्रह बार हारा--केवल एक बार उन्हेंपराजित कर सका।

तथाप्यहं न शोचामि न प्रहृष्यामि कर्हिचित्‌ ।

कालेन दैवयुक्तेन जानन्विद्रावितं जगत्‌ ॥

१४॥

तथा अपि--तो भी; अहम्‌--मैं; न शोचामि--शोक नहीं करता; न प्रहृष्यामि--हर्ष प्रकट नहीं करता; कहिंचित्‌--क भी;कालेन--समय से; दैव-- भाग्य से; युक्तेन--जुड़ा हुआ; जानन्‌ू--जानते हुए; विद्रावितम्‌--संचालित; जगत्‌--संसार।

तो भी मैं न तो कभी शोक करता हूँ, न हर्षित होता हूँ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि यह संसारकाल तथा भाग्य द्वारा संचालित है।

अधुनापि वयं सर्वे वीरयूथपयूथपा: ।

पराजिता: फल्गुतन्त्रैयदुभिः कृष्णपालितै: ॥

१५॥

अधुना--अब; अपि-- भी; वयम्‌--हम; सर्वे--सभी; वीर--वीरों के; यूथ-प--सेनानायकों के; यूथ-पा:--नायक;'पराजिता:--हारे हुए; फल्गु-- थोड़े से; तन्त्रै:--परिचारकों द्वारा; यदुभि:--यदुओं द्वारा; कृष्ण-पालितैः--कृष्ण द्वारा रक्षित

और अब हम सभी, सेनानायकों के बड़े बड़े सेनापति, यदुओं तथा उनकी छोटी सेना केद्वारा हराये जा चुके हैं क्योंकि वे सभी कृष्ण द्वारा संरक्षित हैं।

रिपवो जिग्युरधुना काल आत्मानुसारिणि ।

तदा बयं विजेष्यामो यदा काल: प्रदक्षिण: ॥

१६॥

रिपवः--हमारे शत्रुओं ने; जिग्यु:--जीत लिया है; अधुना--अब; काले--समय; आत्म--उनको; अनुसारीणि--पक्षपात करनेवाले; तदा--तब; वयम्‌--हम; विजेष्याम: --जीत लेंगे; यदा--जब; काल:--समय; प्रदक्षिण:--हमारी ओर मुड़ेगा |

अभी हमारे शत्रुओं ने हमें जीत लिया है क्योंकि समय ने उनका साथ दिया, किन्तु भविष्यमें जब समय हमारे लिए शुभ होगा तो हम जीतेंगे।

श्रीशुक उबाचएवं प्रबोधितो मित्रैश्वद्योगात्सानुग: पुरम्‌ ।

हतशेषा: पुनस्तेडपि ययुः स्वं स्व पुरे नृपा: ॥

१७॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; प्रबोधित:--समझाया-बुझाया; मित्रै: -- अपने मित्रों के द्वारा;चैद्य:ः--शिशुपाल; अगात्‌--गया; स-अनुग: --अपने अनुयायियों सहित; पुरम्‌--अपने नगर में; हत--मारे हुओं से; शेषा: --बचे; पुनः--फिर; ते--वे; अपि-- भी; ययु: --गये; स्वम्‌ स्वम्‌-- अपने अपने; पुरमू--नगर; नृपा:--राजा

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह अपने मित्रों द्वारा समझाने-बुझाने पर शिशुपाल अपनेअनुयायियों सहित अपनी राजधानी लौट गया।

जो योद्धा बच रहे थे वे भी अपने अपने नगरों कोलौट गये।

रुक्मी तु राक्षसोद्वाहं कृष्णट्विडसहन्स्वसु: ।

पृष्ठतो उन्वगमत्कृष्णमक्षौहिण्या वृतो बली ॥

१८॥

रुक्मी--रुक्‍्मी; तु--किन्तु; राक्षस--राक्षसी विधि से; उद्बाहमू--विवाह; कृष्ण-द्विटू--कृष्ण से घृणा करने वाला; असहनू --सहन कर पाने में असमर्थ; स्वसु:--अपनी बहिन का; पृष्ठतः--पीछे से; अन्वगमत्‌--पीछा किया; कृष्णम्‌--कृष्ण को;अक्षौहिण्या--एक अक्षौहिणी सेना लेकर; वृतः--घेर लिया; बली--शक्तिशाली

किन्तु बलवान रुक्‍्मी कृष्ण से विशेष रूप से द्वेष रखता था।

उससे यह बात सहन नहीं होसकी कि कृष्ण बलपूर्वक उसकी बहिन को ले जाकर उससे राक्षस-विधि से विवाह कर ले।

अतः उसने सेना की एक पूरी टुकड़ी लेकर भगवान्‌ का पीछा किया।

रुक्म्यमर्षी सुसंरब्ध: श्रुण्वतां सर्वभूभुजाम्‌ ।

प्रतिजज्ञे महाबाहुर्दशित: सशरासन: ॥

१९॥

अहत्वा समरे कृष्णमप्रत्यूह्वा च रुक्मिणीम्‌ ।

कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामि सत्यमेतद्रवीमि व: ॥

२०॥

रुक्‍्मी--रुक्‍्मी; अमर्षी --असहिष्णु; सु-संरब्ध:--अत्यन्त क्रुद्ध; श्रृण्वताम्‌--सुनते हुए; सर्व--समस्त; भू-भुजाम्‌ू--राजाओंके; प्रतिजज्ञे-- प्रतिज्ञा की; महा-बाहु:--बाहुबली; दंशित:--कवच पहने; स-शरासन:-- अपने धनुष सहित; अहत्वा--बिनामारे; समरे--युद्ध में; कृष्णम्‌--कृष्ण को; अप्रत्यूह्ा--वापस लाये बिना; च--तथा; रुक्मिणीम्‌--रुक्मिणी को; कुण्डिनम्‌ू--कुण्डिन नगर में; न प्रवेक्ष्यामि-- प्रवेश नहीं करूँगा; सत्यमू--सच; एतत्‌--यह; ब्रवीमि--मैं कहता हूँ; वः--तुम सबों से |

उद्विग्न एवं क्रुद्ध महाबाहु रुक्मी ने कवच पहने तथा धनुष धारण किये सभी राजाओं केसमक्ष यह शपथ ली थी, 'यदि मैं युद्ध में कृष्ण को मार कर रुक्मिणी को अपने साथ वापसनहीं ले आता तो मैं फिर कुण्डिन नगर में प्रवेश नहीं करूँगा।

यह मैं आप लोगों के समक्ष शपथलेता हूँ।

'!इत्युक्त्वा रथमारुहा सारथि प्राह सत्वर: ।

चोदयाश्वान्यत: कृष्ण: तस्य मे संयुगं भवेत्‌ ॥

२१॥

इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; रथम्‌--रथ पर; आरुह्म --चढ़ कर; सारथिम्‌--सारथी से; प्राह--कहा; सत्वर:--तेजी से;चोदय--हाँको; अश्वानू--घोड़ों को; यतः--जहाँ; कृष्ण: --कृष्ण; तस्य--उसका; मे--मेंरे साथ; संयुगम्‌--युद्ध; भवेत्‌--होना चाहिए।

यह कहकर वह अपने रथ पर चढ़ गया और अपने सारथी से कहा, 'तुम घोड़ों को जल्दीसे हाँक कर वहीं ले चलो जहाँ कृष्ण है।

उससे मुझे युद्ध करना है।

अद्याहं निशितैर्बाणैगोपालस्य सुदुर्मते: ।

नेष्ये वीर्यमदं येन स्वसा मे प्रसभं हता ॥

२२॥

अद्य--आज; अहमू--मैं; निशितैः--ती क्षण; बाणैः--बाणों से; गोपालस्य--ग्वाले का; सु-दुर्मतेः--दुष्टरबुद्धि; नेष्ये--नष्ट करदूँगा; वीर्य--अपने बल में; मदम्‌--घमंड; येन--जिससे; स्वसा--बहिन; मे--मेरी; प्रसभम्‌--बलपूर्वक; हता--अपहरण कीगईं।

'इस दुष्टबुद्धि ग्वालबाल ने अपने बल के घमण्ड में चूर होकर मेरी बहन का बलपूर्वकअपहरण किया है।

किन्तु आज मैं उसके घमंड को अपने तीखे बाणों से चूर कर दूँगा।

'विकत्थमान: कुमतिरीश्वरस्याप्रमाणवित्‌ ।

रथेनैकेन गोविन्द तिष्ठ तिष्ठेत्यथाह्ययत्‌ ॥

२३॥

विकत्थमान:--डींग मारते हुए; कु-मति:--मूर्ख ; ई श्वरस्थ-- भगवान्‌ का; अप्रमाण-वित्‌--परिमाप न जानते हुए; रथेनएकेन--एकाकी रथ सहित; गोविन्दम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; तिष्ठ तिष्ठ--रुको और युद्ध करो; इति--ऐसा कहकर; अथ--तब; आह्यत्‌--उसने पुकारा |

इस प्रकार डींग हाँकता, भगवान्‌ के पराक्रम के असली विस्तार से अपरिचित मूर्ख रुक्‍्मी,अपने एकाकी रथ में भगवान्‌ गोविन्द के पास पहुँचा और उन्हें ललकारा, 'जरा ठहरो औरलड़ो ।

कैधनुर्विकृष्य सुहृढं जघ्ने कृष्णं त्रिभि: शरै: ।

आह चात्र क्षणं तिष्ठ यदूनां कुलपांसन ॥

२४॥

धनु:--अपना धनुष; विकृष्य--खींचकर; सु--अत्यन्त; हढम्‌--हढ़तापूर्वक ; जघ्ने-- प्रहार किया; कृष्णम्‌--कृष्ण पर;त्रिभिः--तीन; शरैः --बाणों से; आह--कहा; च--तथा; अत्र--यहाँ; क्षणम्‌--एकक्षण; तिष्ठट--ठहरो; यदूनाम्‌--यदुओं के;कुल--वंश को; पांसन--ेरे दूषित करने वाले।

रुक्‍मी ने भारी जोर लगाकर अपना धनुष खींचा और कृष्ण पर तीन बाण चलाये।

तब उसनेकहा, रे यदुवंश को दूषित करने वाले! जरा एक क्षण ठहर तो! 'यत्र यासि स्वसारं मे मुषित्वा ध्वाइक्षवद्धवि: ।

हरिष्येडद्य मदं मन्द मायिन: कूटयोधिन: ॥

२५॥

यत्र--जहाँ भी; यासि--जाओगे; स्वसारमू--बहन को; मे--मेरी; मुधित्वा--चुराकर; ध्वाड्क्ष-वत्‌--कौवे की तरह; हवि: --यज्ञ का घृत; हरिष्ये--मैं वध करूँगा; अद्य---आज; मदम्‌-- तुम्हारे मिथ्या गर्व को; मन्द--रे मूर्ख; मायिन:-- धोखेबाज का;कूट--ठग; योधिन:--युद्ध करने वाले का

तुम यज्ञ का घृत चुराने वाले कौवे की भाँति मेरी बहन को जहाँ जहाँ ले जाओगे वहाँ वहाँमैं तुम्हारा पीछा करूँगा।

रे मूर्ख, धोखेबाज, ओरे युद्ध में ठगने वाले! मैं आज ही तुम्हारे मिथ्यागर्व को चूर चूर कर दूँगा।

'यावतन्न मे हतो बाणैः शयीथा मुझ्न दारीकाम्‌ ।

स्मयन्कृष्णो धनुएश्छित्त्वा षड्भिर्विव्याध रुक्मिणम्‌ ॥

२६॥

यावत्‌--जब तक; न--नहीं; मे--मेरे; हतः--मारा गया; बाणैः--बाणों से; शयीथ:--लिटा दिया गया; मुझ्न--छोड़ दो;दारीकाम्‌--लड़की को; स्मयन्‌--हँसते हुए; कृष्ण:--कृष्ण ने; धनु:--अपना धनुष; छित्त्वा--तोड़ कर; षड़्भि: --छः( बाणों ) से; विव्याध--बेध दिया; रुक्मिणम्‌--रुक्‍्मी को |

'इसके पूर्व कि तुम मेरे बाणों के प्रहार से मरो और लोट-पोट हो जाओ तुम इस लड़कीको छोड़ दो।

' इसके उत्तर में भगवान्‌ कृष्ण मुसकरा दिये और अपने छः बाणों से रुक्मी परप्रहार करके उसके धनुष को तोड़ डाला।

अष्टभिश्चतुरो वाहान्द्वाभ्यां सूतं ध्वजं त्रिभि: ।

स चान्यद्धनुराधाय कृष्णं विव्याध पदञ्ञभिः ॥

२७॥

अष्टभि:--आठ ( बाणों ) से; चतुरः--चारों; वाहान्‌--घोड़ों को; द्वाभ्यामू--दो से; सूतम्‌--सारथी को; ध्वजम्‌ू--झंडे को;त्रिभि:ः--तीन से; सः--वह, रुक्मी; च--तथा; अन्यत्‌-- अन्य; धनु:--धनुष; आधाय--लेकर; कृष्णम्‌--कृष्ण को;विव्याध--बेध डाला; पञ्नभि:--पाँच से |

भगवान्‌ ने रुक्‍्मी के चारों घोड़ों को आठ बाणों से, उसके सारथी को दो बाणों से तथा रथकी ध्वजा को तीन बाणों से नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

रुक्मी ने दूसरा धनुष उठाया और कृष्ण परपाँच बाणों से प्रहार किया।

तैस्तादितः शरौघैस्तु चिच्छेद धनुरच्युतः ।

पुनरन्यदुपादत्त 'तदप्यच्छिनदव्यय: ॥

२८ ॥

तैः--इनके द्वारा; ताडितः--प्रहार किया गया; शर--बाणों की; ओघै:--बाढ़ से; तु--यद्यपि; चिच्छेद--तोड़ डाला; धनु:--( रुक्‍्मी का ) धनुष; अच्युत:--भगवान्‌ कृष्ण ने; पुन:--फिर; अन्यत्‌--दूसरा; उपादत्त--उसने ( रुक्‍्मी ने ) उठा लिया; तत्‌--वह; अपि-- भी; अच्छिनत्‌--तोड़ दिया; अव्यय:--अविनाशी |

यद्यपि भगवान्‌ अच्युत पर इन अनेक बाणों से प्रहार हुआ किन्तु उन्होंने पुन: रुक्मी के धनुषको तोड़ दिया।

रुक्‍्मी ने दूसरा धनुष उठाया किन्तु अविनाशी भगवान्‌ ने उसे भी खण्ड खण्डकर डाला।

परिघं पट्टिशं शूलं चर्मासी शक्तितोमरौ ।

यद्यदायुधमादत्त तत्सर्व सोच्छिनद्धरि: ॥

२९॥

परिघम्‌--परिघ; पट्टिशम्‌-त्रिशूल; शूलम्‌-- भाला; चर्म-असी--ढाल तथा तलवार; शक्ति--शक्ति; तोमरौ--तोमर; यत्‌यत्‌--जो जो; आयुधम्‌--हथियार; आदत्त--उठाया; तत्‌ सर्वम्‌--उन सबों को; सः--उस; अच्छिनत्‌--तोड़ डाला; हरि: --भगवान्‌

कृष्ण नेरुक्‍मी ने जो भी हथियार--परिघ, पट्टिश, त्रिशूल, ढाल तथा तलवार, शक्ति और तोमर--उठाया, उन्हें भगवान्‌ हरि ने छिन्न-भिन्न कर डाला।

ततो रथादवप्लुत्य खड़्गपाणिर्जिघांसया ।

कृष्णमभ्यद्रवत्क्ुचद्दधधः पतड़ इव पावकम्‌ ॥

३०॥

ततः--तब; रथात्‌--रथ से; अवपष्लुत्य--नीचे कूदकर; खड्ग--तलवार; पणि:--अपने हाथ में; जिघांसया--मारने की इच्छासे; कृष्णम्‌--कृष्ण की ओर; अभ्यद्रवत्‌-दौड़ा; क्रुद्ध:--क्रुद्ध होकर; पतड्भ:--पक्षी; इब--सहृश; पावकम्‌--हवावायुमें

तब रुक्‍मी अपने रथ से नीचे कूद पड़ा और अपने हाथ में तलवार लेकर कृष्ण को मारने केलिए उनकी ओर अत्यन्त क्रुद्ध होकर दौड़ा जिस तरह कोई पक्षी वायु में उड़े।

तस्य चापतत:ः खड्ग॑ तिलशश्चर्म चेषुभि: ।

छित्त्वासिमाददे तिम्मं रुक्मिणं हन्तुमुद्यतः ॥

३१॥

तस्य--उसके; च--तथा; आपतत:ः--आक्रमण करते हुए; खड्गम्‌--तलवार; तिलश: --छोटे छोटे खंडों में; चर्म--ढाल;च--तथा; इषुभि: --अपने बाणों से; छित्त्ता--तोड़ कर; असिमू--तलवार को; आददे--उसने ग्रहण किया; तिग्मम्‌--तेज;रुक्मिणम्‌--रुक्‍्मी को; हन्तुमू--मारने के लिए; उद्यतः--तैयार |

ज्योंही रुक्मी ने उन पर आक्रमण किया, भगवान्‌ ने तीर चलाये जिससे रुक्मी की तलवारतथा ढाल के खंड खंड हो गये।

तब कृष्ण ने अपनी तेज तलवार धारण की और रुक्‍मी कोमारने की तैयारी की।

इष्ठा भ्रातृवधोद्योगं रुक्मिणी भयविहला ।

पतित्वा पादयोर्भतुरुवाच करुणं सती ॥

३२॥

इृष्टा--देख कर; भ्रातृ--अपने भाई को; वध--मारने के लिए; उद्योगम्‌--प्रयास; रुक्मिणी-- श्रीमती रुक्मिणी ने; भय-- भयसे; विहला--घबड़ाई; पतित्वा--गिर कर; पादयो: --पैरों पर; भर्तु:--अपने पति के; उवाच--कहा; करुणम्‌--करुण स्वरमें; सती--साध्वी |

अपने भाई को मार डालने के लिए उद्यत भगवान्‌ कृष्ण को देख कर साध्वी सदृशरुक्मिणी अत्यन्त भयभीत हो उठीं।

वे अपने पति के पैरों पर गिर पड़ीं और बड़े ही करुण-स्वरमें बोलीं।

श्रीरुक्मिण्युवाचयोगेश्वराप्रमेयात्मन्देबदेव जगत्पते ।

हन्तुं नाहँसि कल्याण भ्रातरं मे महाभुज ॥

३३॥

श्री-रुक्मिणी उवाच-- श्री रुक्मिणी ने कहा; योग-ई श्वर--समस्त योगशक्ति के नियन्ता; अप्रमेय-आत्मन्‌ू--न मापे जा सकनेवाले; देव-देव--हे देवताओं के स्वामी; जगत्‌-पते--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; हन्तुम्‌ू न अहंसि--आप वध न करें; कल्याण--हेमंगलमय; भ्रातरम्‌-- भाई को; मे--मेरे; महा-भुज--हे बाहुबली |

श्री रुक्मिणी ने कहा : हे योगेश्वर, हे अप्रमेय, हे देवताओं के देव, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी! हेमंगलमय एवं बाहुबली! कृपया मेरे भाई का वध न करें।

श्रीशुक उबाचतया परित्रासविकम्पिताड़ुयाशुच्चावशुष्यन्मुखरुद्धकण्ठया ।

कातर्यविसत्रंसितहेममालयागृहीतपाद:ः करुणो न्यवर्तत ॥

३४॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तया--उसके द्वारा; परित्रास--पूर्णतया भयभीत; विकम्पित--काँपती हुई;अड्डया--जिसके अंग; शुचा--शोक से; अवशुष्यत्‌--सूखता हुआ; मुख--जिसका मुख; रुद्ध--तथा भरे हुए; कण्ठया--गलेसे; कातर्य--आतुरतावश; विस्त्रंसित--बिखर गई; हेम--सोने की; मालया--गले की माला; गृहीत--पकड़ लिया; पाद: --उसके पाँव; करुण:--दयालु ने; न्यवर्तत--छोड़ दिया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : रुक्मिणी के अत्यधिक भयभीत होने से उसके अंग-अंग काँपनेलगे, मुँह सूखने लगा तथा त्रास के मारे उसका गला रुँध गया।

उद्देलित होने से उसका सोने काहार माला बिखर गया।

उसने कृष्ण के पैर पकड़ लिये।

तब भगवान्‌ ने दया दिखलाकर उसेछोड़ दिया।

चैलेन बद्ध्वा तमसाधुकारीणंसप्मश्रुकेशं प्रवपन्व्यरूपयत्‌ ।

तावन्ममर्दु: परसैन्यमद्भुतंयदुप्रवीरा नलिनीं यथा गजा: ॥

३५॥

चैलेन--कपड़े की पट्टी से; बद्ध्वा--बाँध कर; तम्‌--उसको; असाधु-कारिणम्‌--दुष्कर्म करने वाले; स-श्म श्रु-केशम्‌--कुछमूछें तथा बाल छोड़ कर; प्रवपन्‌ू--मूँड॒ करके; व्यरूपयत्‌--विरूप बना दिया; तावत्‌--तब तक; ममर्दु:--कुचल दिया था;'पर--विपक्षी; सैन्यम्‌--सेना को; अद्भुतम्‌ू-- अद्भुत; यदु-प्रवीरा:--यदुकुल के वीरों ने; नलिनीमू--कमल के फूलों को;यथा--जिस तरह; गजा: --हाथी |

भगवान्‌ कृष्ण ने उस दुकृत्य करने वाले को कपड़े की पट्टी ( दुपट्टे ) से बाँध दिया।

इसके बाद उन्होंने उसकी कुछ कुछ मूँछें तथा बाल छोड़ कर शेष सारे बाल हास्यजनक रूप से मूँड़कर उसको विरूप बना दिया।

तब तक यदु-वीरों ने अपने विपक्षियों की अद्भुत सेना कोकुचल दिया था जिस तरह हाथी कमल के फूल को कुचल देता है।

कृष्णान्तिकमुपत्रज्य दहशुस्तत्र रुक्मिणम्‌ ।

तथाभूत॑ हतप्रायं इृष्ठा सड्डर्षणो विभु: ।

विमुच्य बद्धं करुणो भगवान्कृष्णमत्रवीत्‌ ॥

३६॥

कृष्ण--कृष्ण के; अन्तिकम्‌--निकट; उपब्रज्य--जाकर; दहशु:--उन्होंने ( यदु-वीरों ने ) देखा; तत्र--वहाँ; रुक्मिणम्‌--रुक्‍्मी; तथा-भूतम्‌--ऐसी अवस्था में; हत--मृत; प्रायमू--लगभग; दृष्ठटा--देख कर; सद्डूर्षण: --बलराम ने; विभुः--सर्वशक्तिमान; विमुच्य--छोड़ कर; बद्धम्‌--बँधा हुआ ( रुक्मी )) करूण:--दयालु; भगवानू्‌-- भगवान्‌; कृष्णम्‌-- कृष्ण से;अब्रवीत्‌ू--कहा |

जब यदुगण भगवान्‌ कृष्ण के पास पहुँचे तो उन्होंने रुक्मी को इस शोचनीय अवस्था मेंप्रायः शर्म से मरते देखा।

जब सर्वशक्तिमान बलराम ने रुक्मी को देखा तो दयावश उन्होंने उसेछुड़ा दिया और वे भगवान्‌ कृष्ण से इस तरह बोले।

असाध्वदं त्वया कृष्ण कृतमस्मज्जुगुप्सितम्‌ ।

वपन॑ एमश्रुकेशानां वैरूप्यं सुहदो वध: ॥

३७॥

असाधु--अनुचित; इृदम्‌--यह; त्वया--तुम्हारे द्वारा; कृष्ण--हे कृष्ण; कृतम्‌--किया गया; अस्मत्‌--हमारे लिए;जुगुप्सितम्‌-- भयावह; वपनम्‌--मूँड़ना; श्म श्रु-केशानाम्‌-- उसके मूँछ तथा बालों को; वैरूप्यम्‌ू--विरूप करना; सुहृद:ः--पारिवारिक सदस्य का; वध:--मृत्यु |

बलराम ने कहा : हे कृष्ण, तुमने अनुचित कार्य किया है।

इस कार्य से हमको लज्जितहोना पड़ेगा, क्योंकि किसी निकट सम्बन्धी के मूँछ तथा बाल मूँड़ कर उसे विरूपित करनाउसका वध करने के ही समान है।

मैवास्मान्साध्व्यसूयेथा भ्रातुर्वैरूप्यचिन्तया ।

सुखदुःखदो न चान्योस्ति यतः स्वकृतभुक्पुमान्‌ ॥

३८ ॥

मा--मत; एव--निस्सन्देह; अस्मान्‌--हमारे प्रति; साध्वि--हे साध्वी; असूयेथा:--शत्रुता अनुभव करो; भ्रातु:-- अपने भाईके; वैरूप्य--विरूप होने की; चिन्तया--चिन्ता से; सुख--सुख; दुःख--तथा दुख का; दः--देने वाला; न--नहीं; च--तथा;अन्य:--अन्य कोई; अस्ति-- है; यत:ः--क्योंकि; स्व-- अपना; कृत--कर्म; भुक्‌ू--फल भोगने वाला; पुमान्‌ू--मनुष्य |

हे साध्वी, तुम अपने भाई के विरूप होने की चिन्ता से हम पर रुष्ट न होओ।

किसी के सुखतथा दुख का उत्तरदायी उसके अपने सिवा कोई दूसरा नहीं होता है, क्योंकि मनुष्य अपने हीकर्मों का फल पाता है।

बन्धुर्वधाईदोषोपि न बन्धोर्वधमर्हति ।

त्याज्य: स्वेनेव दोषेण हतः किं हन्यते पुनः ॥

३९॥

बन्धु:--सम्बन्धी; वध--मारे जाने के; अ्--योग्य होता है; दोष:--जिसकी बुराइयाँ; अपि--यद्यपि; न--नहीं; बन्धो:--सम्बन्धी से; वधम्‌--मारे जाने के; अ्हति--योग्य होता है; त्याज्य:--त्याग करने योग्य; स्वेन एब--अपने ही; दोषेण--दोष से;हतः--मारा गया; किम्‌--क्यों; हन्यते-- मारा जाये; पुनः--फिर |

अब कृष्ण को सम्बोधित करते हुए बलराम ने कहा : यदि सम्बन्धी के दोष मृत्यु-दण्डदेने योग्य हों तब भी उसका वध नहीं किया जाना चाहिए।

प्रत्युत उसे परिवार से निकाल देनाचाहिए।

चूँकि वह अपने पाप से पहले ही मारा जा चुका है, तो उसे फिर से क्‍यों मारा जाये ?

क्षत्रियाणामयं धर्म: प्रजापतिविनिर्मित: ।

भ्रातापि भ्रातरं हन्याद्येन घोरतमस्तत: ॥

४०॥

क्षत्रियाणाम्‌--क्षत्रियों का; अयम्‌ू--यह; धर्म:--पतवित्र कर्तव्य की संहिता; प्रजापति--आदि सन्तान उत्पन्न करने वाले ब्रह्मा केद्वारा; विनिर्मित:--स्थापित; भ्राता-- भाई; अपि-- भी; भ्रातरम्‌--अपने भाई को; हन्यात्‌--मारना पड़ता है; येन--जिस( संहिता ) से; घोर-तम:--अत्यन्त भयावह; तत:ः--अतः |

क्षत्रियाणाम्‌--क्षत्रियों का; अयम्‌ू--यह; धर्म:--पतवित्र कर्तव्य की संहिता; प्रजापति--आदि सन्तान उत्पन्न करने वाले ब्रह्मा केद्वारा; विनिर्मित:--स्थापित; भ्राता-- भाई; अपि-- भी; भ्रातरम्‌--अपने भाई को; हन्यात्‌--मारना पड़ता है; येन--जिस( संहिता ) से; घोर-तम:--अत्यन्त भयावह; ततः--अतः।

रुक्मिणी की ओर मुड़कर बलराम ने कहा : ब्रह्मा द्वारा स्थापित योद्धाओं के लिए पवित्रकर्तव्य की संहिता का आदेश है कि उसे अपने सगे भाई तक का वध करना पड़ सकता है।

निस्सन्देह यह सबसे अथावह नियम है।

राज्यस्य भूमेर्वित्तस्य स्त्रियो मानस्य तेजस: ।

मानिनो<न्यस्य वा हेतो: श्रीमदान्धा: क्षिपन्ति हि ॥

४१॥

राज्यस्य--राज्य का; भूमे: -- भूमि का; वित्तस्य--सम्पत्ति का; स्त्रिय:ः--स्त्री का; मानस्य--सम्मान का; तेजस:--बल का;मानिन:--गर्व करने वाले; अन्यस्य--अन्यों का; वा--अथवा; हेतो: --कारण से; श्री--उनके ऐश्वर्य में; मद--उनकी उन्मत्ततासे; अन्धा: -- अंधे; क्षिपन्ति-- अनादर ( तिरस्कार ) करते हैं; हि--निस्सन्देह |

पुनः बलराम ने कृष्ण से कहा : अपने ऐश्वर्य के मद से अन्धे हुए दम्भी लोग राज्य, भूमि,सम्पत्ति, स्त्री, सम्मान तथा अधिकार जैसी वस्तुओं के लिए अन्यों का तिरस्कार कर सकते हैं।

तवेयं विषमा बुद्ध्धि: सर्वभूतेषु दुईददाम्‌ ।

यन्मन्यसे सदाभद्रं सुहृदां भद्रमज्ञवत्‌ ॥

४२॥

तब--तुम्हारे; इयमू--यह; विषमा--पक्षपातपूर्ण ; बुर्दधिः--मनोवृत्ति; सर्व-भूतेषु--सारे जीवों के प्रति; दुईदाम्‌--विचारों वाले;यत्‌--जो; मन्यसे--तुम चाहते हो; सदा--सदैव; अभद्रम्‌--बुराई; सुहृदाम्‌--तुम्हारे शुभचिन्तकों को; भद्रम्‌ू--मंगल; अज्ञ-वत्‌--अज्ञानी पुरुष की भाँति)

बलराम ने रुक्मिणी से कहा : तुम्हारी मनोवृत्ति सही नहीं है क्योंकि तुम अज्ञानी व्यक्तिकी भाँति उनका मंगल चाहती हो जो सारे जीवों के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और जिन्होंने तुम्हारेअसली शुभचिन्तकों के साथ दुष्कृत्य किया है।

आत्ममोहो नृणामेव कल्पते देवमायया ।

सुहहुदुदासीन इति देहात्ममानिनाम्‌ ॥

४३॥

आत्म--अपने विषय में; मोह:--मोह; नृणाम्‌ू--मनुष्यों का; एव--एकमात्र; कल्पते--पूरा होता है; देव-- भगवान्‌ की;मायया--माया द्वारा; सुहत्‌--मित्र; दुईत्‌--शत्रु; उदासीन:--उदासीन; इति--ऐसा सोचकर; देह--शरीर; आत्म--आत्मा केरूप में; मानिनाम्‌ू--मानने वालों के लिए

भगवान्‌ की माया लोगों को उनके असली स्वरूपों को भुलवा देती है और इस तरह शरीरको आत्मा मान कर वे अन्यों को मित्र, शत्रु या तटस्थ मानते हैं।

एक एव परो ह्ात्मा सर्वेषामपि देहिनाम्‌ ।

नानेव गृह्मते मूढेर्यथा ज्योतिर्यथा नभः ॥

४४॥

एकः--एक; एव--अकेला; पर:--परम; हि--निस्सन्देह; आत्मा--आत्मा; सर्वेषामू--सभी; अपि--तथा; देहिनाम्‌ू--देहधारियों में; नाना-- अनेक; इब--मानो; गृह्मते-- अनुभव की जाती है; मूढैः--मोहग्रस्तों द्वारा; यथा--जैसे; ज्योति: --नैसर्गिक पिण्ड; यथा--जिस तरह; नभः--आकाश में |

जो लोग मोहग्रस्त हैं, वे समस्त जीवधारियों के भीतर निवास करने वाले एक परमात्मा कोअनेक करके मानते हैं जिस तरह से कोई आकाश में प्रकाश को, या आकाश को ही, अनेकरूपों में अनुभव करता हो।

देह आद्यन्तवानेष द्रव्यप्राणगुणात्मक: ।

आत्मन्यविद्यया क्रिप्त: संसारयति देहिनम्‌ ॥

४५॥

देह:-- भौतिक शरीर; आदि--प्रारम्भ; अन्त--तथा अन्त; वान्‌--से युक्त; एष:--यह; द्रव्य--भौतिक तत्त्वों का; प्राण--इन्द्रियाँ; गुण--तथा प्रकृति के मूल गुण ( सात्विक, रजो तथा तमो ); आत्मक:--रचित; आत्मनि--आत्मा में; अविद्यया--भौतिक अज्ञान का; क्रिप्त:--थोपा हुआ; संसारयति--जन्म तथा मृत्यु के चक्र का बोध कराता है; देहिनम्‌--देहधारी को

यह भौतिक शरीर, जिसका आदि तथा अन्त है, भौतिक तत्त्वों, इन्द्रियों तथा प्रकृति केगुणों से बना हुआ होता है।

यह शरीर भौतिक अज्ञान द्वारा आत्मा पर लादे जाने से मनुष्य कोजन्म तथा मृत्यु के चक्र का अनुभव कराता है।

नात्मनोन्येन संयोगो वियोगश्रसतः सति ।

तद्धेतुत्वात्तव्प्रसिद्धेग्रूपा भ्यां यथा रवे: ॥

४६॥

न--नहीं; आत्मन:--आत्मा के लिए; अन्येन--अन्य किसी से; संयोग:--सम्पर्क; वियोग:--विछोह; च--तथा; असतः--जोसारभूत नहीं है; सति--हे अच्छे-बुरे का ज्ञान रखने वाले; तत्‌ू--उस ( आत्मा ) से; हेतुत्वात्‌--उत्पन्न होने से; तत्‌--उस( आत्मा ) से; प्रसिद्धेः--प्रकट होने से; हक्‌ू--हृश्य-इन्द्रिय; रूपाभ्यामू--तथा हृश्य-रूप से; यथा--जिस तरह; रबे:--सूर्य केलिए

हे बुद्धिमान देवी, आत्मा न तो कभी असत्‌ भौतिक पदार्थों के सम्पर्क में आता है न उससेवियुक्त होता है क्योंकि आत्मा ही उनका उद्गम एवं प्रकाशक है।

इस तरह आत्मा सूर्य के समानहै, जो न तो कभी दृश्य-इन्द्रिय ( नेत्र ) तथा दहृश्य-रूप के सम्पर्क में आता है, न ही उससे विलगहोता है।

जन्मादयस्तु देहस्य विक्रिया नात्मन: क्वचित्‌ ।

कलानामिव नैवेन्दोर्मृतिह्ास्थ कुहूरिव ॥

४७॥

जन्म-आदय: --जन्म इत्यादि; तु--लेकिन; देहस्य--शरीर के ; विक्रिया:--विकार; न--नहीं; आत्मन:-- आत्मा के;क्वचित्‌--सदैव; कलानाम्‌--कलाओं का; इव--सहृश; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; इन्दो:--चन्द्रमा की; मृतिः--मृत्यु; हि--निस्सन्देह; अस्य--इसका; कुहू: --नवीन चान्द्र-दिवस; इब--सहृश |

जन्म तथा अन्य विकार शरीर में ही होते हैं, आत्मा में नहीं।

जिस प्रकार चन्द्रमा की कलाएँबदलती हैं, चन्द्रमा नहीं यद्यपि नव-चान्द्र दिवस को चन्द्रमा की 'मृत्यु' कहा जा सकता है।

यथा शयान आत्मानं विषयानन्‍्फलमेव च ।

अनुभुड़े प्यसत्यर्थे तथाप्नोत्यबुधो भवम्‌ ॥

४८॥

यथा--जिस तरह; शयान:--सोया हुआ व्यक्ति; आत्मानम्‌--अपने को; विषयान्‌--इन्द्रिय-विषयों को; फलम्‌--फल को;एव--निस्सन्देह; च--भी; अनुभुड्ढे --अनुभव करता है; अपि-- भी; असति अर्थे--जो सत्य नहीं है उसमें; तथा--उसी प्रकार;आप्नोति--प्राप्त होता है; अबुध:--अज्ञानी; भवम्‌--संसार को |

जिस प्रकार सोया हुआ व्यक्ति स्वण के भ्रम के अन्तर्गत अपना, इन्द्रिय भोग के विषयों कातथा अपने कर्म-फलों का अनुभव करता है, उसी तरह अज्ञानी व्यक्ति इस संसार को प्राप्त होताहै।

तस्मादज्ञानजं शोकमात्मशोषविमोहनम्‌ ।

तत्त्वज्ञानेन निईत्य स्वस्था भव शुचिस्मिते ॥

४९॥

तस्मात्‌ू--इसलिए; अज्ञान--अज्ञान से; जम्‌--उत्पन्न; शोकम्‌--शोक; आत्म--स्वयं; शोष--सुखाते हुए; विमोहनम्‌--तथामोहपग्रस्त होना; तत्त्त--सत्य के; ज्ञानेन--ज्ञान से; निईत्य--दूर करके; स्व-स्था--अपने सहज भाव में स्थित; भव--होओ;शुचि-स्मिते--शुद्ध हँसी वाली।

अतः दिव्य ज्ञान से उस शोक को दूर करो जो तुम्हारे मन को दुर्बल तथा भ्रमित कर रहा है।

हे आदि हँसी वाली राजकुमारी, तुम अपने सहज भाव को फिर से प्राप्त करो।

श्रीशुक उबाचएवं भगवता तन्‍्वी रामेण प्रतिबोधिता ।

वैमनस्यं परित्यज्य मनो बुद्धया समादधे ॥

५०॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; तन्‍न्वी --पतली कमर वालीरुक्मिणी; रामेण--बलराम द्वारा; प्रतिबोधिता--समझाई गई; वैमनस्थम्‌-- अपनी उदासी को; परित्यज्य--त्याग कर; मन:--अपना मन; बुद्धया--बुद्धि से; समादधे--स्थिर किया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार बलराम द्वारा समझाये जाने पर क्षीण-कटि वालीरुक्मिणी अपनी उदासी भूल गईं और आध्यात्मिक बुद्धि से उन्होंने अपना मन स्थिर किया।

प्राणावशेष उत्सूष्टो द्विडभिहंतबलप्रभः ।

स्मरन्विरूपकरणं वितथात्ममनोरथः ।

चक्रे भोजकरट्ट नाम निवासाय महत्पुरम्‌ ॥

५१॥

प्राण--उसकी प्राण-वायु; अवशेष: --बची हुई; उत्बृष्ट: --निकाला गया; द्विड्भि: --शत्रुओं द्वारा; हत--विनष्ट; बल--उसकाबल; प्रभ:--तथा शारीरिक तेज; स्मरन्‌--स्मरण करके ; विरूप-करणम्‌--अपना विरूपित होना; वितथ--हताश; आत्म--अपनी; मनः-रथ:--इच्छाएँ; चक्रे --बनाया; भोज-कटम्‌ नाम-- भोजकट नामक; निवासाय--अपने रहने के लिए; महत्‌--बड़ी; पुरमू--नगरी

अपने शत्रुओं द्वारा निष्कासित तथा बल और शारीरिक कान्ति से विहीन अपने प्राण बचायाहुआ रुक्‍मी यह नहीं भूल पाया कि उसको किस तरह विरूपित किया गया था।

हताश हो जाने के कारण उसने अपने रहने के लिए एक विशाल नगरी बनवाई जिसका नाम उसने भोजकटरखा।

अहत्वा दुर्मतिं कृष्णमप्रत्यूह्या यवीयसीम्‌ ।

कुण्डिनं न प्रवेक्ष्यामीत्युक्त्वा तत्रावसद्रुषा ॥

५२॥

अहत्वा--बिना वध किये; दुर्मतिम्‌--दुष्टबुद्धि; कृष्णम्‌--कृष्ण को; अप्रत्यूह्--वापस लाये बिना; यवीयसीम्‌--अपनी छोटीबहन; कुण्डिनमू--कुण्डिन में; न प्रवेक्ष्यामि--नहीं प्रवेश करूँगा; इति--ऐसा; उक्त्वा--कहकर; तत्र--वहाँ ( जहाँ उसेविरूपित किया गया था ); अवसत्‌--रहने लगा; रुषा--क्रोध में

चूँकि उसने प्रतिज्ञा की थी कि 'मैं तब तक कुण्डिन में प्रवेश नहीं करूँगा जब तक दुष्टकृष्ण को मार कर अपनी छोटी बहन को वापस नहीं ले आता' अतः रुक्‍्मी हताश होकर उसीस्थान पर रहने लगा।

भगवान्भीष्मकसुतामेवं निर्जित्य भूमिपान्‌ ।

पुरमानीय विधिवदुपयेमे कुरूद्गह ॥

५३॥

भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; भीष्मक-सुताम्‌-- भीष्मक-पुत्री को; एवम्‌--इस प्रकार; निर्जित्य--पराजित करके; भूमि-पान्‌--राजाओं को; पुरम्‌ू--अपनी राजधानी में; आनीय--लाकर; विधि-वत्‌--वैदिक आदेशों के अनुसार; उपयेमे--विवाह किया;कुरु-उद्दद--हे कुरुओं के रक्षक |

हे कुरुओं के रक्षक, इस तरह भगवान्‌ सारे विरोधी राजाओं को हरा कर भीष्मक की पुत्रीको अपनी राजधानी ले आये और जहाँ वैदिक आदेशों के अनुसार उससे विवाह कर लिया।

तदा महोत्सवो नृणां यदुपुर्या गृहे गृहे ।

अभूदनन्यभावानां कृष्णे यदुपतौ नूप ॥

५४॥

तदा--तब; महा-उत्सव:--महान्‌ उत्साह; नृणाम्‌--लोगों द्वारा; यदु-पुर्यामू--यदुओं की राजधानी द्वारका में; गृहे गृहे--घर घरमें; अभूत्‌--उठा; अनन्य-भावानाम्‌--अनन्य प्रेम; कृष्णे--कृष्ण के लिए; यदु-पतौ--यदुओं के प्रमुख; नूप--हे राजा( परीक्षित )

हे राजन, उस समय यदुपुरी के सारे घरों में महान्‌ उत्साह था क्योंकि उसके नागरिक यदुओं के एकमात्र प्रधान कृष्ण से प्रेम करते थे।

नरा नार्यश्व मुदिताः प्रमृष्टभणिकुण्डला: ।

पारिबईमुपाजहुर्वरयोश्चित्रवाससो: ॥

५५॥

नराः--पुरुष; नार्य:--स्त्रियाँ; च-- और; मुदिता: -- प्रसन्न; प्रमष्ट--चमकीली; मणि--मणियाँ; कुण्डला:--तथा कुण्डल;पारिबरहम्‌--विवाह के उपहार; उपाजहुः--आदरपूर्वक भेंट किया; वरयो:--दूल्हा-दुलहिन को; चित्र--अद्भुत; वाससो:--उस्त्रों वाले

प्रसन्नता से पूरित होकर एवं चमकीली मणियों तथा कुण्डलों से अलंकृत सारे स्त्री-पुरुषविवाह के उपहार ले आये जिन्हें उन्होंने अति सुन्दर वस्त्र पहने दूल्हा-दुलहिन को आदरपूर्वकभेंट किया।

सा वृष्णिपुर्युत्तम्भितेन्द्रकेतुभि-विचित्रमाल्याम्बररत्नतोरणै: ।

बभौ प्रतिद्वार्युपक्रिप्तमड्रलै-रापूर्णकुम्भागुरुधूपदीपकै: ॥

५६॥

सा--वह; वृष्णि-पुरी--वृष्णियों की नगरी; उत्तम्भित--ऊपर उठी; इन्द्र-केतुभि:--मांगलिक ख भों से; विचित्र--नाना प्रकारके; माल्य--फूलों की माला से युक्त; अम्बर--कपड़े के झंडे; रत्त--तथा मणियाँ; तोरणै: --बन्दनवारों से; बभौ--सुन्दर लगरहा था; प्रति--प्रत्येक; द्वारि--दरवाजे पर; उपक्रिप्त--सजा; मड़लै:--मांगलिक वस्तुओं से; आपूर्ण--भरे; कुम्भ--जलपात्र;अगुरु--अगुरु से सुगन्धित; धूप--धूप से; दीपकै:--तथा दीपकों से

वृष्णियों की नगरी अत्यन्त सुन्दर लग रही थीः ऊँचे ऊँचे मांगलिक ख भे तथा फूल-मालाओं, कपड़े के झंडों और बहुमूल्य रत्नों से अलंकृत तोरण भी थे।

प्रत्येक दरवाजे पर भरेहुए मंगल घट, अगुरु से सुगन्धित धूप तथा दीपक सजे थे।

सिक्तमार्गा मदच्युद्धिराहूतप्रेष्ठभूभुजाम्‌ ।

गजैद्दा:सु परामृष्टरम्भापूगोपशोभिता ॥

५७॥

सिक्त--छिड़काव की गई; मार्गा--सड़कें; मद--हाथियों के गण्डस्थल से निकला रस; च्युद्धिः--रसता हुआ; आहूत--बुलाया; प्रेष्ट--प्रिय; भू-भुजाम्‌ू--राजाओं के ; गजैः--हाथियों से; द्वाःसु--द्वारों पर; परामृष्ट--रख कर; रम्भा--केला; पूण--तथा सुपारी से; उपशोभिता--सजाया गया।

नगरी की सड़कों का छिड़काव उन उन्मुक्त हाथियों द्वारा हुआ था, जो विवाह के अवसर परअतिथि बनकर आये प्रिय राजाओं के थे।

इन हाथियों ने सारे द्वारों पर केले के तने तथा सुपारी के वृक्ष रख कर नगरी की शोभा और भी बढ़ा दी थी।

कुरुसृञ़्यकैकेयविदर्भयदुकुन्तयः ।

मिथो मुमुदिरे तस्मिन्सम्भ्रमात्परिधावताम्‌ ॥

५८॥

कुरु-सूझ्ञय-कैकेय-विदर्भ-यदु-कुन्तवः--कुरु, सृज्ञय, कैकेय, विदर्भ, यदु तथा कुन्ति वंश के सदस्यों के; मिथ: --परस्पर;मुमुदिरि--आनन्द लूटा; तस्मिन्‌ू--उस ( उत्सव ) में; सम्भ्रमातू--उत्तेजनावश; परिधावताम्‌--जो दौड़ने वाले थे उनमें से

कुरु, सृक्षय, कैकेय, विदर्भ, यदु तथा कुन्ति वंश वाले लोग, उत्तेजना में इधर-उधर दौड़तेलोगों की भीड़ में, एक-दूसरे से उल्लासपूर्वक मिल रहे थे।

रुक्मिण्या हरणं श्रुत्वा गीयमानं ततस्ततः ।

राजानो राजकन्याश्व बभूवुर्भूशविस्मिता: ॥

५९॥

रुक्मिण्या:--रुक्मिणी के; हरणम्‌--हरण के विषय में; श्रुत्वा--सुनकर; गीयमानम्‌--गाया जाता; ततः ततः --सर्वत्र;राजान:--राजागण; राज-कन्या:--राजाओं की पुत्रियाँ; च--तथा; बभूवु:--हो गईं; भूश--अत्यन्त; विस्मिता:--चकित |

सारे राजा तथा उनकी पुत्रियाँ रक्मिणी-हरण की उस वृतान्त को सुनकर अत्यन्त चकित थे,जो सर्वत्र गीत के रूप में गायी जा रही थी।

द्वारकायामभूद्राजन्महामोद: पुरौकसाम्‌ ।

रुक्मिण्या रमयोपेतं हृष्ठा कृष्णं अ्रियः पतिम्‌ ॥

६०॥

द्वारकायाम्‌-द्वारका में; अभूत्‌-- था; राजन्‌ू--हे राजन्‌; महा-मोद:--परम उत्साह; पुर-ओकसाम्‌--नगरवासियों के लिए;रुक्मिण्या--रुक्मिणी से; रमया--लक्ष्मी स्वरूप; उपेतम्‌--संयुक्त; दृघ्लटा--देख कर; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; थिय:--समस्त ऐश्वर्य के; पतिमू--स्वामी को |

द्वारका के निवासी समस्त ऐश्वर्य के स्वामी कृष्ण को लक्ष्मी स्वरूप रुक्मिणी से संयुक्तदेखकर अत्यधिक प्रमुद्ति थे।

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