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अध्याय पचपन: प्रद्युम्न का इतिहास

10.55श्रीशुक उबाचकामस्तु वासुदेवांशो दग्धः प्राग्रुद्रमन्‍्युना ।

देहोपपत्तये भूयस्तमेव प्रत्यपद्मयत ॥

१॥

श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; काम:--कामदेव; तु--तथा; वासुदेव-- भगवान्‌ वासुदेव का; अंश: --अंश;दग्ध:--जला हुआ; प्राक्‌--पूर्वकाल में; रुद्र--शिव के; मन्युना--क्रोध से; देह--शरीर; उपपत्तये--प्राप्त करने के उद्देश्य से;भूय:--पुनः; तम्‌ू--उसको, वासुदेव को; एब--निस्सन्देह; प्रत्यपद्यत्‌--वापस आ गया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : वासुदेव का अंश कामदेव पहले ही रुद्र के क्रोध से जल करराख हो चुका था।

अब नवीन शरीर प्राप्त करने के लिए वह भगवान्‌ वासुदेव के शरीर में पुनःलीन हो गया।

स एव जातो वैदर्भ्या कृष्णवीर्यसमुद्धव: ।

प्रद्युम्न इति विख्यात: सर्वतोडनवम: पितु; ॥

२॥

सः--वह; एव--निस्सन्देह; जात:--उत्पन्न; वैदर्भ्याम्‌--विदर्भ की पुत्री से; कृष्ण-वीर्य--भगवान्‌ कृष्ण के वीर्य से;समुद्धव:--उत्पन्न; प्रद्युम्न: --प्रद्युम्म; इति--इस प्रकार; विख्यात:--विख्यात; सर्वतः--सभी प्रकार से; अनवम:--निकृष्ट(कम ) नहीं; पितु:-तो हिस्‌ फथेर्‌

उसका जन्म वैदर्भी की कोख से भगवान्‌ कृष्ण के वीर्य से हुआ और उसका नाम प्रद्युम्न'पड़ा।

वह अपने पिता से किसी भी तरह कम नहीं था।

तं शम्बर: कामरूपी हत्वा तोकमनिर्दशम्‌ ।

स विदित्वात्मन: शत्रु प्रास्योदन्वत्यगादगृहम्‌ ॥

३ ॥

तम्‌--उसको; शम्बर:--शम्बर नामक असुर; काम--इच्छित; रूपी--रूप धारण करके; हत्वा--चुरा कर; तोकम्‌--शिशु को;अनि:-दशम्‌--अभी दस दिन का भी नहीं था; सः--वह ( शम्बर ); विदित्वा--जान कर; आत्मन:--अपना; शत्रुम्‌-शत्रु;प्रास्य--फेंक कर; उदन्वति--समुद्र में; अगात्‌ू--चला गया; गृहम्‌-- अपने घर।

इच्छानुसार कोई भी रूप धारण कर लेने वाला शम्बर असुर उस शिशु को, जो अभी दसदिन का भी नहीं हुआ था, उठा ले गया।

प्रद्युम्म को अपना शत्रु समझ कर शम्बर ने उसे समुद्र मेंफेंक दिया और फिर अपने घर लौट आया।

त॑ निर्जगार बलवान्मीनः सोउप्यपरै: सह ।

वृतो जालेन महता गृहीतो मत्स्यजीविभि: ॥

४॥

तम्‌--उसको; निर्जगार--निगल गई; बल-वान्‌--बलशाली; मीन:--मछली; सः--वह ( मछली ); अपि--तथा; अपरै:--अन्यों के; सह--साथ; वृत:--घिर कर, फँस कर; जालेन--जाल से; महता--विशाल; गृहीत:--पकड़ ली गईं; मत्स्य-जीविभि:--मछुआरों द्वारा ॥

प्रद्यम्म को एक बलशाली मछली निगल गई और यह मछली अन्य मछलियों के साथमछुआरों द्वारा एक बड़े से जाल में फँसा कर पकड़ी गई।

तं शम्बराय कैवर्ता उपाजहुरुपायनम्‌ ।

सूदा महानसं नीत्वावद्यन्सुधितिनाद्भधुतम्‌ ॥

५॥

तम्‌--उस ( मछली ) को; शम्बराय--शम्बर को; कैवर्ता:--मछुआरों ने; उपाजह्ु:--भेंट कर दिया; उपायनम्‌--उपहार;सूदा:--रसोइयों ने; महानसम्‌--रसोई-घर में; नीत्वा--ले जाकर; अवद्यन्‌ू--खंड खंड कर दिया; सुधितिना--कसाई के चाकूसे; अद्भुतम्‌ू-- अद्भुत

मछुआरों ने वह असामान्य मछली लाकर शम्बर को भेंट कर दी, जिसके रसोइये उसे रसोई-घर में ले आये, जहाँ वे उसे कसाई के चाकू से काटने लगे।

इृष्टा तदुदरे बालम्मायावत्यै न्‍यवेदयन्‌ ।

नारदोकथयत्सर्व तस्या: शड्धितचेतस: ।

बालस्य तत्त्वमुत्पत्ति मत्स्योदरनिवेशनम्‌ ॥

६॥

इृष्टा--देख कर; तत्‌--उसके ; उदरे--पेट में; बालम्‌ू--शिशु को; मायावत्यै--मायावती को; न्‍्यवेदयन्‌--दे दिया; नारदः--नारदमुनि ने; अकथयत्‌--कह सुनाया; सर्वम्‌--सभी; तस्या: --उससे; शद्धित--चकित; चेतस:--जिसका मन; बालस्थ--शिशु के; तत्त्वमू--विषयक बातें; उत्पत्तिमू--जन्म; मत्स्य--मछली के; उदर--पेट में; निवेशनम्‌--प्रवेश |

मछली के पेट में बालक पाकर रसोइयों ने यह बालक मायावती को दे दिया, जो चकितरह गई।

तब नारदमुनि प्रकट हुए और उन्होंने उससे बालक के जन्म तथा मछली के पेट में उसकेप्रवेश की सारी बातें कह सुनाईं।

सा च कामस्य बवै पत्नी रतिर्नाम यशस्विनी ।

पत्युर्निर्दग्धदेहस्य देहोत्पत्तिम्प्रतीक्षती ॥

७॥

निरूपिता शम्बरेण सा सूदौदनसाधने ।

कामदेवं शिशुं बुद्ध्वा चक्रे स्नेह तदार्भके ॥

८॥

सा--वह; च--तथा; कामस्थ--कामदेव की; बै--वस्तुतः; पत्ती-- पतली; रति: नम--रति नामक; यशस्विनी--सुप्रसिद्ध;पत्यु:--अपने पति के; निर्दग्ध-- भस्म हुए; देहस्य--शरीर के; देह--शरीर की; उत्पत्तिम्‌--प्राप्ति; प्रती क्षती--प्रती क्षा करती;निरूपिता--नियुक्त; शम्बरेण --शम्बर द्वारा; सा--वह; सूद-ओदन--तरकारियों तथा चावल के; साधने--तैयार करने में;काम-देवम्‌--कामदेव के रूप में; शिशुम्‌--शिशु को; बुद्ध्वा--समझ कर; चक्रे --करने लगी; स्नेहम्‌--प्रेम; तदा--तब;अर्भके-शिशु के लिएवस्तुतः

मायावती कामदेव की सुप्रसिद्ध पत्ती रति थी।

वह अपने पति द्वारा नवीन शरीरप्राप्त करने की प्रतीक्षा में थी क्योंकि उसके पति का पिछला शरीर भस्म कर दिया गया था।

मायावती को शम्बर द्वारा तरकारियाँ तथा चावल पकाने का काम सौंपा गया था।

मायावतीसमझ गई थी कि यह शिशु वास्तव में कामदेव है, अतएवं वह उससे प्रेम करने लगी थी।

नातिदीर्घेण कालेन स कार्णिण रूढयौवन: ।

जनयामास नारीणां वीक्षन्तीनां च विभ्रमम्‌ ॥

९॥

न--नहीं; अति-दीर्घेण--बहुत लम्बे; कालेन--समय के बाद; सः--वह; कार्णिण: --कृष्ण का पुत्र; रूढ--प्राप्त; यौवन:--युवावस्था; जनयाम्‌ आस--उत्पन्न किया; नारीणाम्‌--स्त्रियों के लिए; वीक्षन्तीनामू--उस पर टकटकी लगाने वाली; च--तथा;विध्रमम्‌--जादू।

कुछ काल बाद कृष्ण के इस पुत्र, प्रद्युम्न ने पूर्ण यौवन प्राप्त कर लिया।

वह उन सारीस्त्रियों को मोहने लगा जो उसे देखती थीं।

सा तम्पतिं पद्मदलायतेक्षणंप्रलम्बबाहुं नरलोकसुन्दरम्‌ ।

सक्रीडहासोत्तभितभ्रुवेक्षतीप्रीत्योपतस्थे रतिरड़ सौरतेः ॥

१०॥

सा--वह; तम्‌--उस; पतिम्‌ू-- अपने पति को; पद्म--कमल के फूल की; दल-आयत--पंखड़ियों के समान फैली; ईक्षणम्‌--आँखें; प्रलम्ब--लटकती हुईं; बाहुमू--बाँहें; नर-लोक--मानव समाज की; सुन्दरम्‌--सुन्दरता की सबसे बड़ी वस्तु; स-ब्रीड--सलज्ज; हास--हँसी से युक्त; उत्तभित--उठी हुईं; भ्रुवा--तथा भौंहों से युक्त; ईक्षती--देखती हुई; प्रीत्या--प्रेमपूर्वक;उपतस्थे--पास आई; रति:--रति; अड्ग--हे प्रिय ( राजा परीक्षित ); सौरतै:ः--दाम्पत्य आकर्षण ( सुरति ) के सूचक संकेतों से |

हे राजनू, सलज्ज हास तथा भौंहें ताने मायावती जब प्रेमपूर्वक अपने पति के पास पहुँची तोउसने दाम्पत्य आकर्षण के विविध संकेत प्रकट किये।

उसके पति की आँखें कमल कीपंखड़ियों की तरह फैली हुई थीं, उसकी भुजाएँ काफी लम्बी थीं और मनुष्यों में वह सर्वाधिक मनोहर था।

तामह भगवान्कार्णिर्मातस्ते मतिरन्यथा ।

मातृभावमतिक्रम्य वर्तसे कामिनी यथा ॥

११॥

तामू--उससे; आह--कहा; भगवान्‌-- भगवान्‌; कार्णिण: -- प्रद्युम्न ने; मात:ः--हे माता; ते--तुम्हारा; मति:--झुकाव;अन्यथा--अन्यथा; मातृ-भावम्‌--माता का भाव या मुद्रा; अतिक्रम्य--अतिक्रमण करके ; वर्तसे--आचरण कर रही हो;कामिनी--प्रेयसी; यथा--सहश |

भगवान्‌ प्रद्युम्न ने उससे कहा, 'हे माता, तुम्हारे मनोभाव बदल गये हैं।

तुम मातोचित भावोंका अतिक्रमण कर रही हो और एक प्रेयसी की भाँति आचरण कर रही हो।

'रतिरुवाचभवान्नारायणसुतः शम्बरेण हतो गृहात्‌ ।

अहं तेडधिकृता पत्नी रति: कामो भवान्प्रभो ॥

१२॥

रतिः उबाच--रति ने कहा; भवान्‌--आप; नारायण-सुत ह-- भगवान्‌ नारायण के पुत्र; शम्बरेण--शम्बर द्वारा; हृत:--चुरायेजाकर; गृहात्‌--अपने घर से; अहम्‌--मैं; ते--तुम्हारी; अधिकृता--वैध; पत्ती-- पत्नी; रतिः--रति; काम: -- कामदेव;भवान्‌ू--आप; प्रभो-हे प्रभु |

रति ने कहा : आप भगवान्‌ नारायण के पुत्र हैं और शम्बर द्वारा अपने माता-पिता के घर सेहर लिए गये थे।

हे प्रभु, मैं आपकी वैध पत्नी रति हूँ, क्योंकि आप कामदेव हैं।

एष त्वानिर्दशं सिन्धावक्षिपच्छम्बरो सुर: ।

मल्सयोग्रसीत्तदुदरादितः प्राप्तो भवान्प्रभो ॥

१३॥

एषः--वह; त्वा--तुम; अनि:-दशम्‌--दस दिन के भी नहीं; सिन्धौ--समुद्र में; अक्षिपत्‌--फेंक दिया; शम्बर:--शम्बर ने;असुरः--असुर; मत्स्य:--मछली; अग्रसीत्‌ू--निगल गई; तत्‌--उसके ; उदरात्‌ू--पेट से; इतः--यहाँ; प्राप्त:--प्राप्त किया;भवान्‌--आप; प्रभो-हे प्रभु

उस शम्बर असुर ने जबकि आप अभी दस दिन के भी नहीं थे आपको समुद्र में फेंक दियाऔर एक मछली आपको निगल गई।

तत्पश्चात्‌ हे प्रभु, हमने इसी स्थान पर आपको मछली के पेट से प्राप्त किया।

तमिमं जहि दुर्धर्ष दुर्जयं शत्रुमात्मनः ।

मायाशतविदं तं च मायाभिमोहनादिभि: ॥

१४॥

तम्‌ इमम्‌--उसको; जहि--कृपया मार डालें; दुर्धर्षमू--जिसके पास तक पहुँचना कठिन है; दुर्जयम्‌--तथा जीत पाना कठिनहै; शत्रुम्‌--शत्रु को; आत्मन:--अपनी; माया--जादूगरी से; शत--सैकड़ों; विदम्‌--जानने वाले; तम्‌--उसको; च--तथा;मायाभि:--अपने जादू से; मोहन-आदिभि:--मोहने के तथा अन्य

आप अपने इस अत्यन्त दुर्धर्ष तथा भयानक शत्रु का वध कर दें।

यद्यपि यह सैकड़ों प्रकारके जादू जानता है किन्तु आप उसे जादू तथा अन्य विधियों से मोहित करके हरा सकते हैं।

'परीशोचति ते माता कुररीव गतप्रजा ।

पुत्रस्नेहाकुला दीना विवत्सा गौरिवातुरा ॥

१५॥

'परिशोचति--विलाप कर रही है; ते--तुम्हारी; माता--माता ( रुक्मिणी ); कुररी इब--कुररी पक्षी की तरह; गत--गई हुई,विनष्ट; प्रजा--सन्तान; पुत्र--अपने पुत्र के लिए; स्नेह--स्नेह से; आकुला--विहल; दीना--दयनीय; विवत्सा--बछड़े सेविहीन; गौ:--गाय; इब--सदृश; आतुरा--अत्यन्त दुखी ।

अपना पुत्र खो जाने से बेचारी तुम्हारी माता तुम्हारे लिए कुररी पक्षी की भाँति विलख है।

वह अपने पुत्र के प्रेम से उसी तरह अभिभूत है, जिस तरह अपने बछड़े से विलग हुई गाय।

प्रभाष्यैवं ददौ विद्यां प्रद्युम्गाय महात्मने ।

मायावती महामायां सर्वमायाविनाशिनीम्‌ ॥

१६॥

प्रभाष्य--कह कर; एवम्‌--इस प्रकार; ददौ--दे दिया; विद्यामू--योग-विद्या; प्रद्युम्नाय--प्रद्युम्मन को; महा-आत्मने--महान्‌आत्मा; मायावती--मायावती; महा-मायाम्‌--महामाया नामक; सर्व--समस्त; माया--मोहनी शक्ति; विनाशिनीम्‌--विनाशकरने वाली |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे बताया : इस प्रकार कहते हुए मायावती ने महात्मा प्रद्युम्म कोमहामाया नामक योग-विद्या प्रदान की, जो अन्य समस्त मोहिनी शक्तियों को विनष्ट कर देती है।

सच शम्बरमभ्येत्य संयुगाय समाहयत्‌ ।

अविषह्लोस्तमाक्षेपै: क्षिपन्‍्सझनयन्कलिम्‌ ॥

१७॥

सः--वह; च--तथा; शम्बरम्‌--शम्बर को; अभ्येत्य--के पास जाकर; संयुगाय--युद्ध करने के लिए; समाहयत्‌--ललकारा;अविषह्नैः--असहा; तम्‌--उसको; आक्षेपै:--अपमान द्वारा; क्षिपन्‌ सझ्ञनयन्‌--उकसाते हुए; कलिम्‌--लड़ने के लिए।

प्रद्युम्म शम्बर के पास गया और विवाद बढ़ाने के लिए उसे असह्ा अपमानजनक बातें कहकर युद्ध करने के लिए ललकारा।

सोडधिक्षिप्तो दुर्वाचोभि: पदाहत इवोरग: ।

निश्चक्राम गदापाणिरमर्षात्ताप्रलोचन: ॥

१८॥

सः--वह, शम्बर; अधिक्षिप्त:--अपमानित; दुर्वाचोभि: --कटु वचनों द्वारा; पदा--पाँव से; आहत:ः-- प्रहार किया गया; इब--सहश; उरग: --सर्प; निश्चक्राम--बाहर निकल आया; गदा--गदा; पाणि: --अपने हाथ में लिये; अमर्षात्‌ू-- असह्य क्रोध से;ताम्र--ताँबे जैसी लाल; लोचन:--आँखें किये

इन कटु बचनों से अपमानित होकर शम्बर पाँव से कुचले गये सर्प की भाँति विश्षुब्ध होउठा।

वह हाथ में गदा लेकर बाहर निकल आया।

उसकी आँखें क्रोध से लाल थीं।

गदामाविध्य तरसा प्रद्यम्नाय महात्मने ॥

प्रक्षिप्य व्यनदन्नादं वज्जनिष्पेषनिष्ठरम्‌ ॥

१९॥

गदाम्‌--अपनी गदा को; आविध्य--घुमाकर; तरसा--तेजी से; प्रद्युम्नाय--प्रद्युम्न पर; महा-आत्मने--चतुर; प्रक्षिप्प--फेंककर; व्यनदन्‌ नादम्‌--शोर उत्पन्न करता; वज़--बिजली का; निष्पेष--प्रहार; निष्ठरम्‌--तीब्र |

शम्बर ने तेजी से अपनी गदा घुमाई और इसे चतुर प्रद्युम्म पर फेंक दिया जिससे बिजलीकड़कने जैसी तीव्र आवाज उत्पन्न हुई।

तामापतन्तीं भगवान्प्रद्युम्गो गदया गदाम्‌ ।

अपास्य शत्रवे क्रुद्धः प्राहिणोत्स्वगदां नूप ॥

२०॥

ताम्‌ू--उस; आपतन्तीम्‌ू--अपनी ओर आती; भगवानू-- भगवान प्रद्युम्न:--प्रद्युम्न ने; गदया--अपनी गदा से; गदामू--गदाको; अपास्थ--दूर भगाते; शत्रवे -- अपने शत्रु पर; क्रुद्ध: --क्रुद्ध; प्राहिणोत्‌--फेंका; स्त-गदाम्‌--अपनी गदा; नृप--हे राजा( परीक्षित )

जैसे ही शम्बर की गदा उड़ती हुई भगवान्‌ प्रद्यम्म की ओर आई, उन्होंने अपनी गदा से उसेदूर छिटका दिया।

तब हे राजन्‌, प्रद्युम्न ने क्रुद्ध होकर शत्रु पर अपनी गदा फेंकी ।

सच मायां समाश्रित्य दैतेयीं मयदर्शितम्‌ ।

मुमुचेउस्त्रमयं वर्ष काष्णों वैहायसोसुर: ॥

२१॥

सः--वह, शम्बर; च--तथा; मायाम्‌--जादू का; समाश्रित्य--आश्रय लेकर; दैतेयीम्‌-- आसुरी; मय--मय दानव द्वारा;दर्शितमू--दिखलाई गई; मुमुचे--छोड़ा; अस्त्र-मयम्‌--हथियारों की; वर्षम्‌--वर्षा; काष्णौं--कृष्ण के पुत्र पर; वैहायस:--आकाश में खड़े; असुरः--असुर ने।

मय दानव द्वारा सिखलाए गये दैत्यों के काले जादू का प्रयोग करते हुए शम्बर सहसाआकाश में प्रकट हुआ और उसने कृष्ण के पुत्र पर हथियारों की झड़ी लगा दी।

बाध्यमानोस्त्रवर्षण रौक्मिणेयो महारथ: ।

सत्त्वात्मिकां महाविद्यां सर्वमायोपमर्दिनीम्‌ू ॥

२२॥

बाध्यमान:--सताया गया; अस्त्र--हथियारों की; वर्षेण--वर्षा से; रौक्मिणेय: --रूक्मिणी-पुत्र, प्रद्मम्म; महा-रथ:--शक्तिशाली योद्धा; सत्तत-आत्मिकाम्‌--सतोगुण से उत्पन्न; महा-विद्यामू--महामाया नामक योग-विद्या ( का प्रयोग किया );सर्व--समस्त; मया--जादू को; उपमर्दिनीम्‌--परास्त करने वाली

हथियारों की इस झड़ी से तंग आकर महाबलशाली योद्धा रौक्मिणेय ने महामाया नामकयोग-विद्या का प्रयोग किया जो सतोगुण से उत्पन्न थी और अन्य समस्त योगशक्तियों को परास्तकरने वाली थी।

ततो गौह्मकगान्धर्वपैशाचोरगराक्षसी: ।

प्रायुड्र शतशो दैत्य: कार्णिणव्यधमयत्स ता; ॥

२३॥

ततः--तब; गौह्मक-गान्धर्व-पैशाच-उरग-राक्षसी:--गुह्यकों, गन्धर्वों, पिशाचों, उरगों तथा राक्षसों के ( हथियार ); प्रायुड्ड --प्रयोग किया; शतश:--सैकड़ों; दैत्यः--असुर ने; कार्णिण: --प्रद्युम्न ने; व्यधमयत्‌--मार गिराया; सः--उस; ताः--इनको ।

तब उस असुर ने गुह्मकों, गन्धर्वों, पिशाचों, उरगों तथा राक्षसों से सम्बन्धित सैकड़ों मायावीहथियार छोड़े किन्तु भगवान्‌ कार्णिण अर्थात्‌ प्रद्यम्ग ने उन सबों को विनष्ट कर दिया।

निशातमसिमुद्यम्य सकिरीटं सकुण्डलम्‌ ।

शम्बरस्य शिरः कायात्ताग्रश्मवोजसाहरत्‌ ॥

२४॥

निशातम्‌--तेज धार वाली; असिम्‌ू--तलवार; उद्यम्य--उठाकर; स--सहित; किरीटम्‌ू--मुकुट; स--सहित; कुण्डलम्‌--कानके कुंडल; शम्बरस्य--शम्बर का; शिर:--सिर; कायात्‌--उसके शरीर से; ताम्र--ताम्र ( लाल ) रंग की; एम श्रु--मूछें;ओजसा--बल से; अहरत्‌--अलग कर दिया

अपनी तेज धार वाली तलवार खींच कर प्रद्युम्न ने बड़े ही वेग से शम्बर के सिर को लालमूछों, मुकुट तथा कुंडलों समेत काट कर अलग कर दिया।

आकीर्यमाणो दिविजै: स्तुवद्धिः कुसुमोत्करै: ।

भार्ययाम्बरचारिण्या पुरं नीतो विहायसा ॥

२५॥

आकीर्यमाण:--वर्षा किया गया; दिवि-जै:--स्वर्ग के वासियों द्वारा; स्तुवर्द्धि:-- प्रशंसा करते हुए; कुसुम--फूलों के;उत्करैः--बिखेरने से; भार्यया--अपनी पतली द्वारा; अम्बर--आकाश में; चारिण्या--विचरण करने वाले; पुरम्‌--पुरी( द्वारका ) में; नीत:--लाया गया; विहायसा-- आकाश के मार्ग से |

जब उच्च लोकों के वासी प्रद्युम्म पर फूलों की वर्षा करके उनकी प्रशंसा के गीत गा रहे थेतो उनकी पत्नी आकाश में प्रकट हुईं और उन्हें आकाश के मार्ग से होते हुए द्वारकापुरी वापस लेगईं।

अन्तःपुरवर राजनललनाशतसलझ्डु लम्‌ ।

विवेश पल्या गगनाद्विद्यतेव बलाहक: ॥

२६॥

अन्तः-पुर-- भीतरी महल; वरमू--सर्वोत्तम; राजन्‌ू--हे राजन्‌ ( परीक्षित ); ललना--स्नेहमयी स्त्रियाँ; शत--सैकड़ों;सह्ढु लम्‌--एकत्रित; विवेश--प्रवेश किया; पत्या--अपनी पत्नी सहित; गगनात्‌ू--आकाश से; विद्युता--बिजली समेत;इब--सहृश; बलाहक:--बादल

हे राजन, जब प्रद्युम्म अपनी पत्नी समेत कृष्ण के सर्वोत्कृष्ट महल के भीतरी कक्षों मेंआकाश से उतरे, जो सुन्दर स्त्रियों से भरे थे तो वे बिजली से युक्त बादल जैसे प्रतीत हो रहे थे।

त॑ इृष्ठा जलदश्यामं पीतकौशेयवाससम्‌ ।

प्रलम्बबाहुं ताप्राक्षं सुस्मितं रुचिराननम्‌ ॥

२७॥

स्वलड्डू तमुखाम्भोज॑ नीलवक्रालकालिभि: ।

कृष्णं मत्वा स्त्रियो ढीता निलिल्युस्तत्र तत्र ह ॥

२८॥

तम्‌--उसको; हदृष्टा--देख कर; जल-द--बादल के समान; श्यामम्‌--साँवले रंग के; पीत--पीले; कौशेय--रेशमी;वाससम्‌-- वस्त्र; प्रलम्ब--लम्बी; बाहुमू- भुजाएँ; ताम्र--लाल लाल; अक्षम्‌--आँखें; सु-स्मितम्‌--मनोहर मुस्कान से युक्त;रुचिर--लुभावना; आननम्‌--मुखमण्डल; सु-अलड्डू त--सुन्दर रंग से सजाया; मुख--मुँह; अम्भोजम्‌ू--कमल सहश;नील--नीला; वक्र-- कुंचित; आलक-आलिभि: --केशों की लटों से; कृष्णम्‌--कृष्ण; मत्वा--सोचते हुए; स्त्रिय:--स्त्रियाँ;ह्ीताः--सकुचाईं; निलिल्यु;--छिप गई; तत्र तत्र--इधर-उधर; ह--निस्सन्देह

जब उस महल की स्त्रियों ने उनके वर्षा के बादल जैसे साँवले रंग, उनके पीले रेशमी वस्त्रों,उनकी लम्बी भुजाओं, मनोहर हँसी से युक्त उनके आकर्षक कमल मुख, उनके सुन्दर आभूषणतथा उनके घुँघराले श्यामल बालों को देखा तो उन्होंने सोचा कि वे कृष्ण हैं।

इस तरह सारीरियाँ सकुचाकर इधर-उधर छिप गईं।

अवधार्य शनेरीषद्वै लक्षण्येन योषितः ।

उपजम्मुः प्रमुदिता: सस्त्री रत्न॑ सुविस्मिता: ॥

२९॥

अवधार्य--अनुभव करके; शनै:-- धीरे-धीरे; ईषघत्‌--कुछ कुछ; बैलक्षण्येन--दिखावे में अन्तर होने से; योषित:--स्त्रियाँ;उपजग्मु:--पास आई; प्रमुदिता:--प्रफुल्लित; स--सहित; स्त्री--स्त्रियों के; रलम्‌--रत्न के; सु-विस्मित: --अत्यन्त चकित |

धीरे-धीरे उनके तथा कृष्ण के वेश में कुछ कुछ अन्तरों से स्त्रियों को लगा कि वे भगवान्‌कृष्ण नहीं हैं।

वे अत्यन्त प्रफुल्लित एवं चकित होकर प्रद्युम्म तथा उनकी प्रेयसी स्त्री-रत्न केपास आईं।

अथ तत्रासितापाड़ी बैदर्भी वल्गुभाषिणी ।

अस्मरत्स्वसुतं नष्टं स्नेहस्नुतपयोधरा ॥

३०॥

अथ--तब; तत्र--वहाँ; असित--श्याम; अपाड्री--जिनकी आँखों की कोरें; वैदर्भी--रुक्मिणी ने; वल्गु--मधुर; भाषिनी --वाणी वाली; अस्मरत्‌--स्मरण किया; स्व-सुतम्‌--अपने पुत्र को; नष्टम्‌--खोये हुए; स्नेह--प्रेमवश; स्नुत--गीली; पय:-धरा--स्तनों वाली |

प्रद्यम्म को देखकर मधुर वाणी एवं शएयाम नेत्रों वाली रुक्मिणी ने अपने खोये हुए पुत्र कास्मरण किया, तो स्नेह से उनके स्तन भीग गये।

को न्वयम्नरवैदूर्य: कस्य वा कमलेक्षण: ।

धृतः कया वा जठरे केयं लब्धा त्वनेन वा ॥

३१॥

कः--कौन; नु--निस्सन्देह; अयम्‌--यह; नर-बैदूर्य:--पुरुषों में मणि; कस्य--किसका ( पुत्र ); वा--तथा; कमल-ईक्षण: --कमल नेत्रों वाला; धृत:-- धारण किया हुआ; कया--किस स्त्री द्वारा; वा--तथा; जठरे--अपने गर्भ में; का--कौन; इयम्‌--यह स्त्री; लब्धा--प्राप्त; तु--और भी; अनेन--उसके द्वारा; वा--तथा |

श्रीमती रुक्मिणीदेवी ने कहा : पुरुषों में रल यह कमल नेत्रों वाला कौन है? यह किसपुरुष का पुत्र है और किस स्त्री ने इसे अपने गर्भ में धारण किया? और यह स्त्री कौन है, जिसेउसने अपनी पत्नी बनाया है?

मम चाप्यात्मजो नष्टो नीतो यः सूतिकागृहात्‌ ।

एतत्तुल्यवयोरूपो यदि जीवति कुत्रचित्‌ ॥

३२॥

मम--मेरा; च--तथा; अपि-- भी; आत्मज: --पुत्र; नष्ट: --खोया; नीत:--ले जाया गया; य:--कौन; सूतिका-गृहात्‌ --प्रसूतिगृह से; एतत्‌--इसके ; तुल्य--समान; वयः--उम्र; रूप: --तथा स्वरूप में; यदि--यदि; जीवति--जिन्दा है; कुत्रचित्‌ --कहीं।

यदि मेरा खोया हुआ पुत्र, जो प्रसूतिगृह से हर लिया गया था, अब भी कहीं जिन्दा होता तोवह इसी नवयुवक की ही आयु तथा रूप का होता।

कथं त्वनेन सम्प्राप्तं सारूप्यं शार्डधन्वन: ।

आकृत्यावयवैर्गत्या स्वरहासावलोकनै: ॥

३३॥

कथम्‌--कैसे; तु--लेकिन; अनेन--उसके द्वारा; सम्प्राप्तम्‌-प्राप्त; सारूप्यमू--एक जैसा रूप; शार्ड्-धन्वन:--शार्ड़र धनुषको धारण करने वाले कृष्ण के रूप में; आकृत्या--आकृति में; अवयवबै:--अंगों से; गत्या--चाल से; स्वर--वाणी से; हास--हँसी; अवलोकनैः --तथा चितवन से |

किन्तु यह कैसे है कि यह नवयुवक अपने शारीरिक रूप तथा अपने अंगों, अपनी चालतथा अपने स्वर और अपनी हँसी युक्त दृष्टि में मेरे स्वामी, शार्ड्धर कृष्ण से इतनी समानता रखताहै?

स एव वा भवेब्रूनं यो मे गर्भ धृतोर्भकः ।

अमुष्मिन्प्रीतिरधिका वाम: स्फुरति मे भुज: ॥

३४॥

सः--वह; एव--निस्सन्देह; वा--अथवा; भवेत्‌--होये; नूनम्‌ू--निश्चय ही; यः--जो; मे--मेरे; गर्भ --गर्भ में; धृत:--धारणकिया हुआ; अर्भक:--शिशु; अमुष्मिनू--उसके लिए; प्रीति:--स्नेह; अधिका--अधिक; वाम:--बाईं; स्फुरति--फड़कती है;मे--मेरी; भुज:--बाँहहाँ

यह वही बालक हो सकता है, जिसे मैंने अपने गर्भ में धारण किया था क्योंकि इसकेप्रति मुझे अतीव स्नेह का अनुभव हो रहा है और मेरी बाईं भुजा भी फड़क रही है।

एवं मीमांसमणायां बैदर्भ्या देवकीसुतः ।

देवक्यानकदुन्दुभ्यामुत्तम:ःश्लोक आगमत्‌ ॥

३५॥

एवम्‌--इस प्रकार; मीमांसमानायाम्‌ू--सोच-विचार करती हुई; वैदर्भ्यामू--रानी रुक्मिणी द्वारा; देवकी-सुतः--देवकी-पुत्र;देवकी-आनकदुन्दुभ्यामू-देवकी तथा वसुदेव सहित; उत्तम:-एलोक:-- भगवान्‌ कृष्ण; आगमत्‌--वहाँ आ गये |

जब रानी रुक्मिणी इस तरह सोच-विचार में पड़ी थीं तब देवकी-पुत्र कृष्ण, वसुदेव तथादेवकी सहित, घटनास्थल पर आ गये।

विज्ञातार्थोपि भगवांस्तृष्णीमास जनार्दनः ।

नारदोकथयत्सर्व शम्बराहरणादिकम्‌ ॥

३६॥

विज्ञात--पूरी तरह जानते हुए; अर्थ:--बात; अपि--यद्यपि; भगवान्‌-- भगवान्‌; तृष्णीम्‌ू--मौन; आस--रहे; जनार्दन:--कृष्ण; नारद: --नारदमुनि ने; अकथयत्‌--कह सुनाया; सर्वम्‌--सारी बातें; शम्बर--शम्बर द्वारा; आहरण --- अपहरण;आदिकम्‌--इत्यादि |

यद्यपि भगवान्‌ जनार्दन यह भलीभाँति जानते थे कि क्या हुआ है किन्तु वे मौन रहे।

तथापिनारदमुनि ने शम्बर द्वारा बालक के अपहरण से लेकर अब तक की सारी बातें कह सुनाईं।

तच्छुत्वा महदाश्चर्य कृष्णान्तःपुरयोषित: ।

अभ्यनन्दन्बहूनब्दान्रष्ट मृतमिवागतम्‌ ॥

३७॥

तत्‌--उसे; श्रुत्वा--सुनकर; महत्‌--महान्‌; आश्वर्यम्‌-- आश्चर्य; कृष्ण-अन्त:-पुर--कृष्ण के निजी आवास की; योषित:--स्त्रियों ने; अभ्यनन्दन्‌ू--अभिनन्दन किया; बहूनू--अनेक; अब्दानू--वर्षो के ; नष्टम्‌--खोये; मृतम्‌--मरे हुए; इब--सहश;आगतम्‌--वापस आया हुआ।

जब भगवान्‌ कृष्ण के महल की स्त्रियों ने इस अत्यन्त आश्चर्यमय विवरण को सुना तोउन्होंने बड़े ही हर्ष के साथ प्रद्युम्म का अभिनन्दन किया जो वर्षों से खोये हुए थे किन्तु अब इसतरह लौटे थे मानो मृत्यु से लौट आये हों।

देवकी वसुदेवश्च कृष्णरामौ तथा स्त्रिय: ।

दम्पती तौ परिष्वज्य रुक्मिणी च ययुर्मुदम्‌ ॥

३८ ॥

देवकी--देवकी; वसुदेव:--वसुदेव; च--तथा; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम; तथा-- भी; स्त्रिय:--स्त्रियाँ; दम्‌-पती--पति-पत्नी; तौ--ये दोनों; परिष्वज्य--आलिंगन करके ; रुक्मिणी--रुक्मिणी; च--तथा; ययु: मुदम्‌--प्रसन्नता को प्राप्त हुए

देवकी, वसुदेव, कृष्ण, बलराम तथा महल की सारी स्त्रियों, विशेषतया रानी रुक्मिणी ने,तरुण दम्पति को गले लगाया किया और आनन्द मनाया।

नष्ट प्रद्युम्ममायातमाकर्णय्य द्वारमौकसः ।

अहो मृत इवायातो बालो दिष्टग्रेति हाब्रुवन्‌ ॥

३९॥

नष्टम्‌ू--खोया हुआ; प्रद्यम्नम्‌-प्रद्यम्न को; आयातम्‌--आया हुआ; आकर्णर्य --सुनकर; द्वारका-ओकस:--द्वारकावासी;अहो--ओह; मृत:--मरा हुआ; इब--मानो; आयात: --वापस आया; बाल: --बच्चा; दिष्ठदय्या-- भाग्यवश; इति--इस प्रकार;ह--निस्सन्देह; अन्लुवन्‌ू--वे बोले

यह सुनकर कि खोया हुआ प्रद्युम्म घर आ गया है, द्वारकावासी चिल्ला उठे, 'ओह!विधाता ने इस बालक को मानो मृत्यु से वापस आने दिया है।

'यं वै मुहु: पितृसरूपनिजेशभावा-स्तन्मातरो यदभजन्रहरूढभावा: ।

चित्र॑ न तत्खलु रमास्पदबिम्बबिम्बेकामे स्मरेक्षविषये किमुतान्यनार्य: ॥

४०॥

यम्‌--जिसको; बै--निस्सन्देह; मुहुः--बारम्बार; पितृ--पिता; स-रूप--समान; निज--अपने; ईश--स्वामी; भावा:--सोचनेबाले; तत्‌--उसकी; मातरः --माताएँ; यत्‌--जितना कि; अभजनू--पूजा की; रह--एकान्त में; रूढ--पूर्ण विकसित;भावा:-- भाव; चित्रम्‌ू--अद्भुत; न--नहीं; तत्‌--वह; खलु--निस्सन्देह; रमा--लक्ष्मी; आस्पद--शरण ( कृष्ण ); बिम्ब--स्वरूप का; बिम्बे--प्रतिबिम्ब रूप; कामे--साक्षात्‌ कामवासना; स्मरे--कामदेव; अक्ष-विषये-- अपनी आँखों के समक्ष;किम्‌ उत--तो फिर क्या कहा जाय; अन्य--दूसरी; नार्य:--स्त्रियाँ |

यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि महल की स्त्रियाँ, जो प्रद्युम्न के प्रति मातृ-स्नेह रखतीं,एकान्त में उनके प्रति प्रेमाकर्षण का अनुभव करने लगीं मानो वे उनके स्वामी हों।

दरअसलप्रद्युम्न लक्ष्मी के आश्रय भगवान्‌ कृष्ण के सौन्दर्य के पूर्ण प्रतिबिम्ब थे और उनकी आँखों केसामने साक्षात्‌ कामदेव के रूप में प्रकट हुए थे।

चूँकि उनकी माता जैसे पद को प्राप्त स्त्रियों कोभी उनके प्रति दाम्पत्य आकर्षण का अनुभव हुआ तो फिर इस विषय में क्या कहा जा सकता हैकि उन्हें देखकर अन्य स्त्रियों ने क्या अनुभव किया होगा ?

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