← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय छप्पनवाँ: स्यमंतक रत्न

10.56रीशुक उबाचसत्राजित: स्वतनयां कृष्णाय कृतकिल्बिष: ।

स्यमन्तकेन मणिनास्वयमुद्यम्थ दत्तवान्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सत्राजित:--राजा सत्राजित ने; स्व-- अपनी; तनयाम्‌--पुत्री; कृष्णाय--कृष्णको; कृत--कर चुकने पर; किल्बिष:--अपराध; स्यमन्तकेन--स्यमन्तक नामक; मणिना--मणि सहित; स्वयम्‌--स्वयं;उद्यम्य--प्रयास करके; दत्तवान्‌ू-दे दिया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : कृष्ण का अपमान करने के बाद सत्राजित ने अपनी पुत्री तथास्यमन्तक मणि उन्हें भेंट करके प्रायश्चित करने का भरसक प्रयत्न किया।

श्रीराजोबाचसत्राजितः किमकरोद्वहान्कृष्णस्य किल्बिष: ।

स्वमन्तक:ः कुतस्तस्य कस्माचइत्ता सुता हरेः ॥

२॥

श्री-राजा--राजा ( परीक्षित महाराज ) ने; उबाच--कहा; सत्राजित:--सत्राजित ने; किमू--क्या; अकरोत्‌--किया; ब्रह्मनू-हेब्राह्मण; कृष्णस्थय--कृष्ण के विरुद्ध; किल्बिष:--अपराध; स्यमन्तक:--स्यमन्तक मणि; कुत:--कहाँ से; तस्य--उसका;कस्मातू्‌-क्यों; दत्ता--दिया; सुता--अपनी पुत्री; हरेः-- भगवान्‌ हरि को ।

महाराज परीक्षित ने पूछा : 'हे ब्राह्मण, राजा सत्राजित ने भगवान्‌ कृष्ण को रुष्ट करने केलिए क्‍या कर दिया? उसे स्यमन्तक मणि कहाँ से मिला? और उसने अपनी पुत्री भगवान्‌ कोक्यों दी श्रीशुक उबाचआसीत्सत्राजित: सूर्यो भक्तस्य परम: सखा ।

प्रीतस्तस्मै मणिं प्रादात्स च तुष्ट: स्यमन्‍्तकम्‌ ॥

३॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; आसीत्‌-- था; सत्राजित: --सत्राजित का; सूर्य:--सूर्यदेव; भक्तस्य--भक्त का;'परम:ः--परम; सखा--शुभचिन्तक मित्र; प्रीतः--प्रिय; तस्मै--उसको; मणिमू्‌--मणि; प्रादात्‌--दिया; सः--उसने; च--तथा;तुष्ट:--प्रसन्न होकर; स्यमन्तकम्‌--स्यमन्तक नामक

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : सूर्यदेव अपने भक्त सत्राजित के प्रति अत्यन्त वत्सल थे।

अतःउनके श्रेष्ठ मित्र के रूप में उन्होंने अपनी तुष्टि के चिन्ह रूप में उसे स्थमन्‍्तक नामक मणि प्रदान सतं बिशभ्रन्मणिं कण्ठे भ्राजमानो यथा रवि: ।

प्रविष्टो द्वारकां राजन्तेजसा नोपलक्षित: ॥

४॥

सः--वह, राजा सत्राजित; तमू--उस; बिभ्रत्‌--पहने हुए; मणिम्‌--मणि को; कण्ठे-- अपने गले में; भ्राजमान: --खूबचमकीला; यथा--सहश; रवि: --सूर्य ; प्रविष्ट: --प्रविष्ट हुआ; द्वारकाम्‌-द्वारकापुरी में; राजन्‌ू--हे राजा ( परीक्षित );तेजसा--तेज से; न--नहीं; उपलक्षित:--पहचाना जाता थासत्राजित उस मणि को गले में पहन कर द्वारका में प्रविष्ट हुआ।

हे राजन, वह साक्षात्‌ सूर्यके समान चमक रहा था और मणि के तेज से पहचाना नहीं जा रहा था।

त॑ विलोक्य जना दूरात्तेजसा मुष्टदृष्टयः ।

दीव्यतेउक्षेर्भगवते शशंसु: सूर्यशद्धिता: ॥

५॥

तम्‌--उसे; विलोक्य--देख कर; जना:--लोग; दूरात्‌ू-दूर से ही; तेजसा--उसके तेज से; मुष्ट--चुरायी हुई; दृष्टयः--देखनेकी शक्ति; दीव्यते--खेलते हुए; अक्षैः --पाँसा से; भगवते-- भगवान्‌ कृष्ण से; शशंसु:--उन्होंने सूचना दी; सूर्य--सूर्यदेव;शद्डिताः--उसे मान कर |

जब लोगों ने सत्राजित को दूर से आते देखा तो उसकी चमक से वे चौंधिया गये।

उन्होंनेमान लिया कि वह सूर्यदेव है और भगवान्‌ कृष्ण से बताने गये जो उस समय पाँसा खेल रहे थे।

नारायण नमस्तेःस्तु शद्भुचक्रगदाधर ॥

दामोदरारविन्दाक्ष गोविन्द यदुनन्दन ॥

६॥

नारायण--हे नारायण; नम:--नमस्कार; ते--आपको; अस्तु--हो; शद्भु-- शंख; चक्र--चक्र; गदा--तथा गदा के; धर--धारण करने वाले; दामोदर--हे दामोदर; अरविन्द-अक्ष--हे कमल-नेत्र; गोविन्द--हे गोविन्द; यदु-नन्दन--हे यदुओं केलाड़ले बेटे

द्वारकावासियों ने कहा : हे नारायण, हे शंख, चक्र, गदा धारण करने वाले, है कमल-नेत्र दामोदर, हे गोविन्द, हे यदुवंशी, आपको नमस्कार है।

एष आयाति सविता त्वां दिहश्लुर्जगत्पते ।

मुष्णन्गभस्तिचक्रेण नृणां चक्षूंषि तिग्मगु: ॥

७॥

एष:--यह; आयाति--आ रहा है; सविता--सूर्यदेव; त्वाम्‌--तुमको; दिदृक्षु:ः--देखने की इच्छा से; जगत्‌-पते--हे ब्रह्माण्ड केस्वामी; मुष्णन्‌ू--चुरा कर; गभस्ति--अपनी किरणों के; चक्रेण--गोले से; नृणाम्‌--लोगों की; चक्षूंषि-- आँखों को; तिग्म--प्रखर; गु:--विकिरण वाला ।

हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, सवितादेव आपको मिलने आये हैं।

वे अपनी प्रखर तेजोमय किरणोंसे सबों की आँखों को चौंधिया रहे हैं।

नन्वन्विच्छन्ति ते मार्ग त्रीलोक्यां विबुधर्षभा: ।

ज्ञात्वाद्य गूढं यदुषु द्रष्टट त्वां यात्यज: प्रभो ॥

८॥

ननु--अवश्य ही; अन्विच्छन्ति--ढूँढ़ लेते हैं; ते--तुम्हारा; मार्गम्‌--रास्ता; त्रि-लोक्याम्‌-तीनों लोकों में; विबुध--चतुरदेवताओं के; ऋषभा: --अत्यन्त पूज्य; य्ञात्वा--जान कर; अद्य--अब; गूढम्‌--वेश बदले; यदुषु--यदुओं के बीच; द्रष्टम्‌--देखने के लिए; त्वामू--तुमको; याति--आता है; अज:--अजन्मा ( सूर्यदेव ); प्रभो-हे प्रभु

हे प्रभु, अब तीनों लोकों के परम श्रेष्ठ देवता आपको खोज निकालने के लिए उत्सुक हैंक्योंकि आपने अपने को यदुवंशियों के बीच छिपा रखा है।

अत: अजन्मा सूर्यदेव आपका दर्शनकरने यहाँ आये हैं।

श्रीशुक उबाचनिशम्य बालवचनं प्रहस्याम्बुजलोचन: ।

प्राह नासौ रविर्देव: सत्राजिन्मणिना ज्वलन्‌ ॥

९॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; निशम्य--सुनकर; बाल--बचकाना; वचनम्‌--वचनों को; प्रहस्य--हँस कर;अम्बुज--कमल सहृश; लोचन:--आँखों वाले; प्राह--कहा; न--नहीं; असौ--यह व्यक्ति; रवि: देव: --सूर्यदेव; सत्राजित्‌--राजा सत्राजित; मणिना--अपनी मणि के कारण; ज्वलन्‌ू--चमकता हुआ।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे बताया : ये भोलेभाले वचन सुनकर कमलनयन भगवान्‌ जोर सेहँसे और बोले, 'यह सूर्यदेव, रवि नहीं, अपितु सत्राजित है, जो अपनी मणि के कारण चमकरहा है।

'सत्राजित्स्वगृहं श्रीमत्कृतकौतुकमड्लम्‌ ।

प्रविश्य देवसदने मण्णि विप्रैन्यवेशयत्‌ ॥

१०॥

सत्राजितू--सत्राजित; स्व--अपने; गृहम्‌-घर; श्रीमत्‌--ऐश्वर्यवान; कृत--किया; कौतुक--उत्सव के साथ; मड़लम्‌ू--शुभअनुष्ठान; प्रविश्य--प्रवेश करके; देव-सदने--मन्दिर-कक्ष में; मणिम्‌--मणि को; विप्रै:--विद्वान ब्राह्मणों द्वारा; न्‍्यवेशयत्‌--उसने स्थापित करा दिया।

राजा सत्राजित समारोह के साथ शुभ अनुष्ठान सम्पन्न करके अपने एश्वर्यशाली घर में प्रविष्ट उसने योग्य ब्राह्मणों से अपने घर के मन्दिर-कक्ष में स्थमन्‍्तक मणि की स्थापना करा दी।

दिने दिने स्वर्णभारानष्टी स सृजति प्रभो ।

दुर्भिक्षमार्यरिष्टानि सर्पाधिव्याधयोडशुभा: ।

न सन्ति मायिनस्तत्र यत्रास्ते भ्यर्चितो मणि: ॥

११॥

दिने दिने--प्रति दिन; स्वर्ण--स्वर्ण के; भारानू-- भार ( एक तौल ); अष्टौ--आठ; सः--वह; सृजति--उत्पन्न करता है;प्रभो--हे प्रभु ( परीक्षित महाराज ); दुर्भिक्ष-- अकाल; मारि--असामयिक मृत्युएँ; अरिष्टानि--आपदाएँ; सर्प--साँप; आधि--मानसिक रोग; व्याधय: --रोग; अशुभाः -- अशुभ; न सन्ति--नहीं होते हैं; मायिन:--ठग; तत्र--वहाँ; यत्र--जहाँ; आस्ते--रहती है; अभ्यर्चित:--ठीक से पूजित; मणि:--मणि |

हे प्रभु, बह मणि प्रति दिन आठ भार सोना उत्पन्न करता था और जिस स्थान में वह रखारहता था और पूजा जाता था वह स्थान आपदाओं से तथा अकाल, असामयिक मृत्यु तथासर्पदंश, मानसिक तथा भौतिक रोगों और ठगों से मुक्त रहता था।

स याचितो मणि क्वापि यदुराजाय शौरिणा ।

नैवार्थकामुकः प्रादाद्याच्ञाभड्रमतर्कयन्‌ ॥

१२॥

सः--उसने, सत्राजित ने; याचितः--माँगे जाने पर; मणिमू--मणि को; क्व अपि--एक अवसर पर; यदु-राजाय--यदुराजउग्रसेन के लिए; शौरिणा--कृष्ण द्वारा; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; अर्थ--सम्पत्ति का; कामुक: --लालची; प्रादात्‌--दिया;याच्ञा--अनुरोध का; भडुम्‌--इनकार; अतर्कयन्‌--विचार न करता हुआ।

एक अवसर पर भगवान्‌ कृष्ण ने सत्राजित से अनुरोध किया कि वह इसे यदुराज उग्रसेनको दे दे किन्तु सत्राजित इतना लालची था कि उसने देने से इनकार कर दिया।

उसने भगवान्‌ की याचना को ठुकराने से होने वाले अपराध की गम्भीरता पर विचार नहीं किया।

तमेकदा मर्णि कण्ठे प्रतिमुच्य महाप्रभम्‌ ।

प्रसेनो हयमारुहा मृगायां व्यचरद्वने ॥

१३॥

तम्‌ू--उस; एकदा--एक बार; मणिम्‌ू--मणि को; कण्ठे--गले में; प्रतिमुच्य--पहन कर; महा--अत्यन्त; प्रभमू--तेजवान;प्रसेन:--प्रसेन ( सत्राजित का भाई ); हयम्‌--घोड़े पर; आरुह्म --सवार होकर; मृगायाम्‌--शिकार के लिए; व्यचरत्‌--चलागया; बने--वन में |

एक बार सत्राजित का भाई प्रसेन उस चमकीली मणि को गले में पहन कर घोड़े पर सवारहुआ और जंगल में शिकार खेलने चला गया।

प्रसेनं सहयं हत्वा मणिमाच्छिद्य केशरी ।

गिरिं विशन्जाम्बवता निहतो मणिमिच्छता ॥

१४॥

प्रसेनम्‌-- प्रसेन को; स--सहित; हयम्‌--उसके घोड़े; हत्वा--मार कर; मणिम्‌--मणि को; आच्छिद्य--पकड़कर; केशरी --सिंह; गिरिम्‌--पर्वत ( की गुफा ) में; विशन्‌--प्रवेश करते हुए; जाम्बवता--ऋशक्षराज जाम्बवान्‌ द्वारा; निहतः--मारा गया;मणिम्‌--मणि; इच्छता--चाहने वाला

प्रसेन तथा उसके घोड़े को एक सिंह ने मार कर वह मणि ले लिया।

किन्तु जब वह सिंहपर्वत की गुफा में घुसा तो उस मणि के इच्छुक जाम्बवान ने उसे मार डाला।

सोपि चक्रे कुमारस्य मणि क्रीडनकं बिले ।

अपश्यन्ध्रातरं भ्राता सत्राजित्पर्यतप्यत ॥

१५॥

सः--उसने, जाम्बवान्‌ ने; अपि-- भी; चक्रे --बनाया; कुमारस्य-- अपने पुत्र के लिए; मणिम्‌--मणि को; क्रीडनकम्‌--खिलौना; बिले--गुफा में; अपश्यन्‌ू--न देखते हुए; भ्रातरम्‌--अपने भाई को; भ्राता--भाई; सत्राजित्‌ू--सत्राजित;पर्यतप्यत--अत्यन्त दुखी हुआ।

गुफा के भीतर जाम्बवान ने उस मणि को अपने पुत्र को खिलौने के तौर पर खेलने के लिएदे दिया।

इस बीच सत्राजित अपने भाई को वापस आता न देख कर अत्यन्त व्याकुल हो गया।

प्रायः कृष्णेन निहतो मणिग्रीवो बनं गत: ।

भ्राता ममेति तच्छुत्वा कर्णे कर्णेडजपन्जना: ॥

१६॥

प्राय:--सम्भवतया; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; निहतः--मारा गया; मणि--मणि; ग्रीव:-- अपने गले में पहने; वनम्‌--वन में;गतः--गया हुआ; भ्राता-- भाई; मम--मेरा; इति--ऐसा कहकर; तत्‌--वह; श्रुत्वा--सुनकर; कर्ण कर्णे--एक कान से दूसरेकान में; अजपन्‌--कानाफूसी करते; जना:--लोग

उसने कहा : 'सम्भवतया कृष्ण ने मेरे भाई को मार डाला है क्योंकि वह अपने गले में मणिपहन कर जंगल गया था।

' जब लोगों ने यह दोषारोपण सुना तो वे एक-दूसरे से कानाफूसीकरने लगे।

भगवांस्तदुपश्रुत्य दुर्यशो लिप्तमात्मनि ।

मा्टू प्रसेनयदवीमन्वपद्यत नागर: ॥

१७॥

भगवान्‌-- भगवान्‌, कृष्ण; तत्‌ू--वह; उपश्रुत्य--लोगों से सुनकर; दुर्यश:--अपयश; लिप्तमू--पोता हुआ; आत्मनि-- अपनेऊपर; माईम्‌--साफ करने के लिए; प्रसेन-पदवीम्‌--प्रसेन द्वारा अपनाये गये मार्ग का; अन्वपद्यत--पीछा किया; नागरै:--नगर के निवासियों के साथ।

जब भगवान्‌ कृष्ण ने यह अफवाह सुनी तो उन्होंने अपने यश में लगे कलंक को मिटानाचाहा।

अतः द्वारका के कुछ नागरिकों को अपने साथ लेकर वे प्रसेन के मार्ग को ढूँढ़ने के लिएरवाना हो गये।

हतं प्रसेन॑ अश्व॑ च वीक्ष्य केशरिणा बने ।

त॑ चाद्रिपृष्ठे निहतमृक्षेण दहशुर्जना: ॥

१८॥

हतम्‌--मारा गया; प्रसेनम्‌--प्रसेन को; अश्वम्‌--उसके घोड़े को; च--तथा; वीक्ष्य--देख कर; केशरिणा--सिंह द्वारा; वने--जंगल में; तम्‌--उस ( सिंह ) को; च-- भी; अद्वि--पर्वत के; पृष्ठे--बगल में; निहतम्‌--मारा गया; ऋक्षेण--ऋशक्ष( जाम्बवान ) द्वारा; ददशुः--उन्होंने देखा; जना: --लोगों ने।

जंगल में उन्होंने प्रसेन तथा उसके घोड़े दोनों को ही सिंह द्वारा मारा गया पाया।

इसके आगेउन्होंने पर्वत की बगल में सिंह को ऋशक्ष ( जाम्बवान ) द्वारा मारा गया पाया।

ऋक्षराजबिलं भीममन्धेन तमसावृतम्‌ ।

एको विवेश भगवानवस्थाप्य बहिः प्रजा: ॥

१९॥

ऋक्ष-राज--रीछों का राजा; बिलम्‌--गुफा में; भीमम्‌-- भयावह; अन्धेन तमसा--घने अंधकार से; आवृतम्‌--घिरा; एक: --अकेले; विवेश--घुसे; भगवान्‌-- भगवान्‌; अवस्थाप्य--रखकर; बहि:--बाहर; प्रजा:--नागरिकों को |

भगवान्‌ ने ऋक्षराज की भयावनी घनान्धकारमय गुफा के बाहर नागरिकों को बैठा दियाऔर अकेले ही भीतर घुसे।

तत्र दृष्ठा मणिप्रेष्ठं बालक्रीडनकं कृतम्‌ ।

हर्तु कृतमतिस्तस्मिन्नवतस्थे$र्भकान्तिके ॥

२०॥

तत्र--वहाँ; दृष्टा--देखकर; मणि-प्रेष्ठम्‌-- अत्यन्त मूल्यवान मणि; बाल--बच्चे का; क्रीडनकम्‌--खिलौना; कृतम्‌--बनाकर; हर्तुमू--ले लेने के लिए; कृत-मति:--निश्चय करके; तस्मिन्‌--वहाँ; अवतस्थे--ठहर गये; अर्भक-अन्तिके--बालक केपास

वहाँ भगवान्‌ कृष्ण ने देखा कि वह बहुमूल्य मणि बच्चे का खिलौना बना हुआ है।

उसे लेनेका संकल्प करके वे उस बालक के निकट गये।

तमपूर्व नर हृष्ठा धात्री चुक्रोश भीतवत्‌ ।

तच्छुत्वाभ्यद्रवत्क्रुद्धो जाम्बवान्बलिनां वर: ॥

२१॥

तम्‌--उस; अपूर्वम्‌--पहले कभी नहीं ( देखा ); नरम्‌--व्यक्ति को; हृष्ठा--देखकर; धात्री-- धाई; चुक्रोश--चिल्ला उठी;भीत-वत्‌--डरी हुईं; तत्‌--उसे; श्रुत्वा--सुनकर; अभ्यद्रवत्‌--दौड़ा; क्रुद्ध:--नाराज; जाम्बवान्‌--जाम्बवान; बलिनामू--बलवानों में; वर: -- श्रेष्ठ |

उस असाधारण व्यक्ति को अपने समक्ष खड़ा देखकर बालक की धाई भयवश चिल्लाउठी।

उसकी चीख सुनकर बलवानों में सर्वाधिक बलवान जाम्बवान क्रुद्ध होकर भगवान्‌ कीओर दौड़ा।

स वै भगवता तेन युयुधे स्वामिनात्मन: ।

पुरुषं प्राकृतं मत्वा कुपितो नानुभाववित्‌ ॥

२२॥

सः--वह; वै--निस्सन्देह; भगवता-- भगवान्‌ के साथ; तेन--उन; युयुधे--लड़ने लगा; स्वामिना--स्वामी से; आत्मन: --अपने ही; पुरुषम्‌--पुरुष; प्राकृतम्‌--संसारी; मत्वा--मान कर; कुपितः--क्रुद्ध; न--नहीं; अनुभाव--उनके पद से; वित्‌ू--अवगत

उनके असली पद से अनजान तथा उन्हें सामान्य व्यक्ति समझते हुए जाम्बवान अपने स्वामीभगवान्‌ से क्रुद्ध होकर लड़ने लगे।

दन्द्ययुद्धं सुतुमुलमुभयोर्विजिगीषतो: ।

आयुधाश्मद्गुमैदोर्भि: क्रव्यार्थ श्येनयोरिव ॥

२३॥

दन्द्द--जोड़ी; युद्धम्‌--युद्ध; सु-तुमुलम्‌-- अत्यन्त भयानक; उभयो:--दोनों के बीच; विजिगीषतो:--जीतने के लिएप्रयतललशील; आयुध--हथियारों; अश्म--पत्थरों; द्रुमैः--तथा वृक्षों से; दोर्भि:--अपनी बाहुओं से; क्रव्य--मांस; अर्थे--केहेतु; श्येनयो: --दो बाजों में; इब--मानो दोनों जीतने के लिए कृत

संकल्प होकर घमासान द्वन्द्र युद्ध करने लगे।

पहले विविधहथियारों से और तब पत्थरों, वृक्षों के तनों और अन्त में निःशस्त्र बाहुओं से एक-दूसरे से भिड़कर, वे मांस के टुकड़े के लिए झपट रहे दो बाजों की तरह लड़ रहे थे।

आसीत्तदष्टाविम्शाहमितरेतरमुप्टिभि: ।

वज़निष्पेषपरुषैरविश्रममहर्निशम्‌ ॥

२४॥

आसीतू-- था; तत्‌--वह; अष्टा-विंश--अट्टाईस; अहम्‌--दिन; इतर-इतर--एक-दूसरे से; मुपष्टिभि:--मुक्कों से; वज़--बिजलीके; निष्पेष-- प्रहारों की तरह; परुषै:--कठोर; अविश्रमम्‌--बिना रुके; अहः-निशम्‌--अहर्निश, दिन-रात |

यह युद्ध बिना विश्राम के अट्टाईस दिनों तक चलता रहा।

दोनों एक-दूसरे पर मुक्कों से प्रहारकर रहे थे, जो टूक-टूक करने वाले बिजली के प्रहारों जैसे गिरते थे।

कृष्णमुष्टिविनिष्पात निष्पिष्टाज्ञेर बन्धनः ।

क्षीणसत्त्व: स्विन्नगात्रस्तमाहातीव विस्मित: ॥

२५॥

कृष्ण-मुष्टि--कृष्ण के मुक्के के; विनिष्पात--प्रहारों से; निष्पिष्ट--चटनी होकर; अड़--शरीर के; उरू--विशाल; बन्धन:--पुद्ठे, पेशियाँ; क्षीण--निर्बल; सत्त्व:--शक्ति; स्विन्न--पसीना छोड़ता; गात्र:--अंग; तम्‌--उससे; आह--बोला; अतीव--अत्यन्त; विस्मित:--चकित |

भगवान्‌ कृष्ण के मुक्कों से जाम्बवान की उभरी मांस-पेशियाँ कुचलती गईं, उसका बलघटने लगा और अंग पसीने से तर हो गये, तो वह अत्यन्त चकित होकर भगवान्‌ से बोला।

जाने त्वां सऋवभूतानां प्राण ओज: सहो बलम्‌ ।

विष्णुं पुराणपुरुषं प्रभविष्णुमधी श्वररम्‌ ॥

२६॥

जाने--जानता हूँ; त्वाम्‌ू-तुमको ( कि हो ); सर्व--समस्त; भूतानामू--जीवों का; प्राण: --प्राण; ओज:--ऐन्द्रिय शक्ति;सहः--मानसिक बल; बलमू्‌--शरीरिक शक्ति; विष्णुम्‌-- भगवान्‌ विष्णु को; पुराण--आदि; पुरुषम्‌--पुरुष; प्रभविष्णुम्‌--सर्वशक्तिमान; अधी श्वरम्‌--परम नियन्ता |

जाम्बवान ने कहा : मैं जानता हूँ कि आप समस्त जीवों के प्राण हैं और ऐन्द्रिय,मानसिक तथा शारीरिक बल हैं।

आप आदि-पुरुष, परम पुरुष, सर्व शक्तिमान नियन्ता भगवान्‌विष्णु हैं।

त्वं हि विश्वसृजाम्स्त्रष्टा सृष्टानामपि यच्च सत्‌ ।

कालः 'कलयतामीशः पर आत्मा तथात्मनाम्‌ ॥

२७॥

त्वमू--तुम; हि--निस्सन्देह; विश्व--त्रह्माण्ड के; सृजामू--सृजनकर्ताओं के ; स्त्रष्टा--सृजनकर्ता ; सृष्टानामू--उत्पन्न जीवों के;अपि--भी; यत्‌--जो; च--तथा; सत्‌--निहित वस्तु; काल:--दमनकारी; कलयताम्‌--दमनकर्ताओं के; ईशः--पर मे श्वर;परः आत्मा--परम आत्मा; तथा--भी; आत्मनाम्‌--समस्त आत्माओं के |

आप ब्रह्माण्ड के समस्त स्त्रष्टाओं के परम स्त्रष्टा तथा समस्त सृजित वस्तुओं में निहित वस्तु(सत्‌ ) हैं।

आप समस्त दमनकरियों के दमनकर्ता, परमेश्वर तथा समस्त आत्माओं के परमात्माहैं।

यस्येषदुत्कलितरोषकटाक्षमोक्षे-वर्ममादिशक्क्षुभितनक्रतिमिड्नलोउब्धि: ।

सेतु: कृत: स्वयवश उज्वलिता च लट्ढारक्ष:शिरांसि भुवि पेतुरिषुक्षतानि ॥

२८॥

यस्य--जिसके; ईषत्‌--किंचित; उत्कलित-- प्रकट; रोष--क्रोध से; कटा-अक्ष--चितवन से; मोक्षैः--मुक्त होने से; वर्त्म--मार्ग; आदिशत्‌--दिखलाया; क्षुभित--श्षुब्ध; नक्र--( जिसमें ) घड़ियाल; तिमिड्ल:--बड़ी मछली; अब्धि: --समुद्र; सेतु:ः--पुल; कृत:--बनाया; स्व--अपने; यश:--यश; उज्वलिता--जला दिया; च--तथा; लड्जा--लंका नगरी; रक्ष:--( रावण )असुर के; शिरांसि--सिर; भुवि--पृथ्वी पर; पेतु:--गिरे; इषु--जिसके बाणों से; क्षतानि--कट कर।

आप वही हैं जिनके क्रोध को तनिक प्रकट करने वाली चितवन ने अथाह जल के भीतर केघड़ियालों तथा तिमिंगिल मछलियों को क्षुब्ध बना दिया था, जिससे सागर मार्ग देने के लिएबाध्य हुआ था।

आप वही हैं जिन्होंने अपना यश स्थापित करने के लिए एक महान्‌ पुल बनाया,लंका नगरी को जला दिया और जिनके बाणों ने रावण के सिरों को छिन्न कर दिया, जो पृथ्वीपर जा गिरे।

इति विज्ञातविइज्ञानमृक्षराजानमच्युत: ।

व्याजहार महाराज भगवान्देवकीसुत: ॥

२९॥

अभिमृश्यारविन्दाक्ष: पाणिना शंकरेण तम्‌ ।

कृपया परया भक्त मेघगम्भीरया गिरा ॥

३०॥

इति--इस प्रकार; विज्ञात-विज्ञानम्‌--जिसने सत्य को समझ लिया था; ऋक्ष--रीछों के; राजानम्‌--राजा से; अच्युत:--कृष्ण;व्याजहार--बोले; महा-राज--हे राजा ( परीक्षित ); भगवान्‌-- भगवान्‌; देवकी-सुर:--देवकी-पुत्र; अभिमृश्य--स्पर्श करके;अरविन्द-अक्ष:--कमल-नेत्र; पाणिना--अपने हाथ से; शम्‌--मंगल; करेण--प्रदान करने वाला; तम्‌--उसको; कृपया--कृपा से; परया--महान्‌; भक्तम्‌-भक्त को; मेघ--बादल के समान; गम्भीरया--गम्भीर; गिरा--वाणी में |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : हे राजनू, तब भगवान्‌ कृष्ण ने ऋक्षराज को सम्बोधितकिया जो सच्चाई जान गया था।

देवकी-पुत्र कमल-नेत्र भगवान्‌ ने समस्त, आशीर्वादों केदाता, अपने हाथ से जाम्बवान का स्पर्श किया और अपने भक्त से अत्यन्त कृपापूर्वक मेघ कीगर्जना जैसी गम्भीर वाणी में बोले।

मणिहेतोरिह प्राप्ता वयमृक्षपते बिलम्‌ ।

मिथ्याभिशापं प्रमृजन्नात्मनो मणिनामुना ॥

३१॥

मणि--मणि; हेतो: --के कारण; इह--यहाँ; प्राप्ताः--आये हैं; वयम्‌--हम; ऋशक्ष-पते--हे रीछों के स्वामी; बिलमू--गुफातक; मिथ्या--झूठा; अभिशापम्‌--दोषारोपण; प्रमूजन्‌--दूर करने के लिए; आत्मन:--अपने विरुद्ध; मणिना--मणि केसाथ; अमुना--इस

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा : हे ऋक्षराज, हम इसी मणि के लिए आपकी गुफा में आये हैं।

मैंइस मणि का उपयोग अपने विरुद्ध लगाये गये आरोपों को झूठा सिद्ध करने के लिए करना चाहता हूँ।

इत्युक्त: स्वां दुहितरं कन्यां जाम्बवतीं मुदा ।

अर्हणार्थम्स मणिना कृष्णायोपजहार ह ॥

३२॥

इति--इस प्रकार; उक्त:--कहा गया; स्वाम्‌-- अपनी; दुहितरम्‌--पुत्री; कन्याम्‌ू--कुमारी; जाम्बवतीम्‌--जाम्बवती को;मुदा--खुशी खुशी; अर्हण-अर्थम्‌--सादर भेंट के रूप में; सः--उसने; मणिना--मणि समेत; कृष्णाय--कृष्ण को; उपजहारह-भेंट कर दिया।

इस प्रकार कहे जाने पर जाम्बवान ने प्रसन्नतापूर्वक अपनी कुमारी पुत्री जाम्बवती के साथसाथ मणि को भेंट अर्पित करते हुए भगवान्‌ कृष्ण का सम्मान किया।

अद्दष्टा निर्गमं शौरे: प्रविष्टस्थ बिल जना: ।

प्रतीक्ष्य द्वादशाहानि दु:खिता: स्वपुरं ययु: ॥

३३॥

अह्ृध्वा--न देख कर; निर्गमम्‌ू--बाहर आना; शौरे: --कृष्ण का; प्रविष्टस्थ-- भीतर गये हुए; बिलम्‌--गुफा में; जन:ः--लोग;प्रतीक्ष्य--प्रतीक्षा करने के बाद; द्वादश--बारह; अहानि--दिन; दुःखिता: --दुखी; स्व--अपने; पुरमू--नगर को; ययु:--चलेगये

भगवान्‌ शौरि के गुफा में प्रविष्ट होने के बाद उनके साथ आये द्वारका के लोग बारह दिनोंतक उनकी प्रतीक्षा करते रहे किन्तु वे बाहर नहीं आये।

अन्त में वे सब निराश होकर अत्यन्तदुखी मन से अपने नगर लौट गये थे।

निशम्य देवकी देवी रक्मिण्यानकदुन्दुभि: ।

सुहृदो ज्ञातयोइशोचन्बिलात्कृष्णमनिर्गतम्‌ ॥

३४॥

निशम्य--सुनकर; देवकी--देवकी; देवी रुक्मिणी--देवी रुक्मिणी; आनकदुन्दुभि:--वसुदेव; सुहृदः --मित्रगण; ज्ञातय:ः --सम्बन्धी लोग; अशोचन्‌--पछतावा करने लगे; बिलात्‌-गुफा से; कृष्णम्‌--कृष्ण को; अनिर्गतमू--बाहर न आते हुए।

जब देवकी, रुक्मिणी देवी, वसुदेव तथा भगवान्‌ के अन्य सम्बन्धियों ने सुना कि वे गुफासे बाहर नहीं निकले तो वे सभी दुःखी होने लगे।

सत्राजितं शपन्तस्ते दुःखिता द्वारमौकसः ।

उपतस्थुश्रन्द्रभागां दुर्गा कृष्णोपलब्धये ॥

३५॥

सत्राजितम्‌ू--सत्राजित को; शपन्तः--कोसते हुए; ते--वे; दुःखिता: --दुखित; द्वारका-ओकसः:-द्वारकावासियों ने;उपतस्थु:--पूजा की; चन्द्रभागाम्‌-- चन्द्रभागा; दुर्गामू--दुर्गा की; कृष्ण-उपलब्धये--कृष्ण को प्राप्त करने के लिए।

सत्राजित को कोसते हुए व्याकुल द्वारकावासी चन्द्रभागा नामक दुर्गा अर्चाविग्रह के समीपगये और कृष्ण की वापसी के लिए उनसे प्रार्थना करने लगे।

तेषां तु देव्युपस्थानात्प्रत्यादिष्टाशिषा स च ।

प्रादुर्बभूव सिद्धार्थ: सदारो हर्षयन्हरि: ॥

३६॥

तेषाम्‌-- उनसे; तु--लेकिन; देवी --देवी की; उपस्थानात्‌--पूजा के बाद; प्रत्यादिष्ट--बदले में प्रदान किया; आशिषा:--वर;सः--वह; च--तथा; प्रादुर्बभूब--प्रकट हुआ; सिद्ध--प्राप्त करके; अर्थ: --अपना लक्ष्य; स-दार:--अपनी पत्नी के सहित;हर्षयन्‌--हर्षित करते हुए; हरिः-- भगवान्‌ कृष्ण |

जब नगरनिवासी देवी की पूजा कर चुके तो वे उनसे बोलीं कि तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कीजाती है।

तभी अपने लक्ष्य की पूर्ति करके भगवान्‌ कृष्ण अपनी नई पत्नी के साथ उनके समक्षप्रकट हुए और उन्हें हर्ष से सरबोर कर दिया।

उपलभ्य हषीकेशं मृतं पुनरिवागतम्‌ ।

सह पत्या मणिग्रीवं सर्वे जातमहोत्सवा: ॥

३७॥

उपलभ्य--पहचान कर; हषीकेशम्‌--इन्द्रियों के स्वामी को; मृतम्‌--मृत व्यक्ति; पुन: --फिर; इब--मानो; आगतम्‌--आयाहुआ; सह--साथ; पत्या--पत्नी के; मणि--मणि; ग्रीवम्‌--गर्दन में; सर्वे--सारे; जात--उत्पन्न किया; महा--अत्यधिक;उत्सवा:--हँसी-खुशी

भगवान्‌ हषीकेश को उनकी नवीन पत्नी के साथ तथा उनके गले में स्थमंतक मणि पड़ीदेखकर सारे लोगों में अत्यधिक प्रसन्नता छा गई, मानों कृष्ण मृत्यु से वापस लौटे हों।

सत्राजितं समाहूय सभायां राजसत्निधौ ।

प्राप्ति चाख्याय भगवान्मणिं तस्मै न्‍्यवेदयत्‌ ॥

३८ ॥

सत्राजितमू--सत्राजित को; समाहूय--बुलवाकर; सभायाम्‌--राजसभा में; राज--राज ( उग्रसेन ) की; सन्निधौ--उपस्थिति में;प्राप्तिमू-- प्राप्ति: च--तथा; आख्याय--घोषित करके; भगवानू-- भगवान्‌ ने; मणिम्‌--मणि; तस्मै--उसको; न्यवेदयत्‌-- भेंटकर दियाभगवान्‌ कृष्ण ने सत्राजित को राजसभा में बुलवाया।

वहाँ राजा उग्रसेन की उपस्थिति में कृष्ण ने मणि पाये जाने की घोषणा की और तब उसे औपचारिक रीति से सत्राजित को भेंट करदिया।

स चातिक्रीडितो रत्न॑ गृहीत्वावाइमुखस्ततः ।

अनुतप्यमानो भवनमगमत्स्वेन पाप्मना ॥

३९॥

सः--वह, सत्राजित; च--तथा; अति--अत्यधिक; ब्रीडित:--लज्जित; रत्मम्‌ू--मणि को; गृहीत्वा--ले करके; अवाक्‌--नीचेकी ओर; मुख:--अपना मुँह; तत:ः--वहाँ से; अनुतप्यमान:--पश्चाताप अनुभव करते हुए; भवनम्‌--घर; अगमत्‌--गया;स्वेन--अपने; पाप्मना--पापपूर्ण आचरण के साथ

अत्यधिक लज्जा से मुँह लटकाये सत्राजित ने वह मणि ले लिया और घर लौट गया किन्तुसारे समय वह अपने पापपूर्ण आचरण पर पश्चाताप का अनुभव करता रहा।

सोबनुध्यायंस्तदेवाघं बलवद्ठिग्रहाकुल: ।

कथं मृजाम्यात्मरज: प्रसीदेद्वाच्युत: कथम्‌ ॥

४०॥

किम्कृत्वा साधु मह्ां स्यान्न शपेद्वा जनो यथा ।

अदीर्घदर्शन क्षुद्रं मूढ॑ द्रविणलोलुपम्‌ ॥

४१॥

दास्ये दुहितरं तस्मै स्त्रीर॒त्नं रत्तमेव च ।

उपायोयं समीचीनस्तस्य शान्तिर्न चान्यथा ॥

४२॥

सः--वह; अनुध्यायन्‌ू--सोच-विचार करता; तत्‌ू--वह; एव--निस्सन्देह; अधम्‌-- अपराध; बल-वत्‌--बलवानों से; विग्रह--झगड़े के बारे में; आकुल:--चिन्तित; कथम्‌--कैसे; मृजामि-- धो सकूँगा; आत्म--अपने; रज:--कल्मष; प्रसीदेत्‌--प्रसन्नहों; वा--अथवा; अच्युत:--कृष्ण; कथम्‌--कैसे; किम्‌ू--क्या; कृत्वा--करके; साधु-- अच्छा; महाम्‌--मेंरे लिए; स्थात्‌--हो सकता है; न शपेत्‌--शाप न दें; वा--अथवा; जन:ः--लोग; यथा--जिस तरह; अदीर्घ--कम अवधि का; दर्शनम्‌ू--जिनका दर्शन; क्षुद्रम्‌-- क्षुद्र; मूढम्‌--मूढ़; द्रविण--सम्पत्ति के; लोलुपम्‌--लोभी; दास्ये--मैं दूँगा; दुहितरम्‌--अपनी पुत्री;तस्मै--उनको; स्त्री--स्त्रियों का; रत्मम्‌-- भूषण; रत्तमू--रत्त; एव च--तथा; उपाय:--साधन; अयम्‌--यह; समीचीन: --प्रभावशाली; तस्य--उसका; शान्ति:--शमन; न--नहीं; च--तथा; अन्यथा--नहीं तो |

अपने घोर अपराध के बारे में सोच-विचार करते और भगवान्‌ के शक्तिशाली भक्तों सेसंघर्ष की सम्भावना के बारे में चिन्तित राजा सत्राजित ने सोचा, 'मैं किस तरह अपने कल्मषको स्वयं धो सकता हूँ और किस तरह भगवान्‌ अच्युत मुझ पर प्रसन्न हों? मैं अपने सौभाग्य कीपुनप्राप्ति के लिए क्या कर सकता हूँ? दूरद्ृष्टि न होने, कंजूस, मूर्ख तथा लालची होने से मैंजनता से शापित होने से कैसे बचूँ? मैं अपनी पुत्री, जो कि सभी स्त्रियों में रत्न है, स्यमन्तकमणि के साथ ही भगवान्‌ को भेंट कर दूँगा।

निस्सन्देह उन्हें शान्‍्त करने का यही एकमात्र उचित उपाय है।

'एवं व्यवसितो बुद्धद्या सत्राजित्स्वसुतां शुभाम्‌ ।

मणि स्वयमुद्यम्य कृष्णायोपजहार हु ॥

४३॥

एवम्‌--इस प्रकार; व्यवसित:--हढ़ संकल्प करके; बुद्धय्या--बुद्धि के उपयोग से; सत्राजित्‌--सत्राजित; स्व-- अपनी;सुताम्‌--पुत्री; शुभामू--गौर वर्ण की; मणिमू--मणि; च--तथा; स्वयम्‌--स्वयं; उद्यम्य--प्रयास करके; कृष्णाय--कृष्णको; उपजहार ह-- भेंट कर दिया |

इस तरह बुद्धिमानी के साथ मन को हृढ़ करके राजा सत्राजित ने स्वयं अपनी गौर-वर्णवाली पुत्री के साथ साथ स्यमन्तक मणि भी भगवान्‌ कृष्ण को भेंट करने की व्यवस्था की।

तां सत्यभामां भगवानुपयेमे यथाविधि ।

बहुभिर्याचितां शीलरूपौदार्यगुणान्विताम्‌ ॥

४४॥

तामू--उस; सत्यभामाम्‌--सत्यभामा से; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; उपयेमे--विवाह कर लिया; यथा-विधि--उचित अनुष्ठान द्वारा;बहुभि:--अनेक लोगों द्वारा; याचिताम्‌--माँगी गई; शील--उत्तम चरित्र वाली; रूप--सौन्दर्य; औदार्य--तथा उदारता; गुण--गुणों से; अन्विताम्‌--युक्त, सम्पन्न |

भगवान्‌ ने उचित धार्मिक रीति से सत्यभामा के साथ विवाह कर लिया।

उत्तम आचरण,सौन्दर्य, उदारता तथा अन्य सदगुणों से सम्पन्न होने के कारण अनेक लोगों ने उसे लेना चाहाथा।

भगवानाह न मणि प्रतीच्छामो बय॑ नृप ।

तवास्तां देवभक्तस्यथ वयं च फलभागिन: ॥

४५॥

भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; आह--कहा; न--नहीं; मणिम्‌--मणि; प्रतीच्छाम:--वापस चाहते हैं; वयम्‌--हम; नूप--हे राजन;तब--तुम्हारा; आस्ताम्‌ू--रहने दो; देव--देवता ( सूर्यदेव ) के; भक्तस्य-- भक्त का; वयम्‌--हम; च-- भी; फल--इसके फलके; भागिन:-- भोक्ता ।

भगवान्‌ ने सत्राजित से कहा : हे राजन, हमें इस मणि को वापस लेने की इच्छा नहीं है।

तुमसूर्यदेव के भक्त हो अतः इसे अपने ही पास रखो।

इस प्रकार हम भी इससे लाभ उठा सकेंगे।

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