← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची
अध्याय उनसठवाँ: राक्षस नरक का वध
10.59श्रीराजोवाच यथा हतो भगवता भौमो येने च ताः स्त्रिय: ।
निरुद्धा एतदाचक्ष्व विक्रमं शार्ड्धन््वनः ॥
१॥
श्री-राजा उवाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; यथा--कैसे; हतः--मारा गया; भगवता-- भगवान् द्वारा; भौम: --नरकासुर, भूमिया पृथ्वीदेवी का पुत्र; येन--जिसके द्वारा; च--तथा; ता: --वे; स्त्रिय:--स्त्रियाँ; निरुद्धा:--बन्दी; एतत्--यह; आचक्ष्व--'कहिये; विक्रमम्-शौर्य; शार्ड-धन्वन:--शार्ड्र धनुष के स्वामी कृष्ण का।
राजा परीक्षित ने कहा : अनेक स्त्रियों का अपहरण करने वाला भौमासुर किस तरहभगवान् द्वारा मारा गया ? कृपा करके भगवान् शार्ड्धन्वा के इस शौर्य का वर्णन कीजिये।
श्रीशुक उबाच इन्द्रेण हृतछत्रेण हृतकुण्डलबन्धुना ।
हतामराद्रिस्थानेन ज्ञापितो भौमचेष्टितम् ।
सभार्यो गरुडारूढ:ः प्राग्ज्योतिषपुरं ययौ ॥
२॥
गिरिदुर्गं: शस्त्रदुर्गैर्जलाग्न्यनिलदुर्गमम् ।
मुरपाशायुतै्घोरेर्डढै: सर्वत आवृतम् ॥
३॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इन्द्रेण--३इन्द्र द्वारा; हृत-छत्रेण--जिससे ( वरुण का ) छाता चुरा लिया गया;हत-कुण्डल--कुण्डलों की चोरी; बन्धुना--उसके सम्बन्धियों ( माता अदिति ) के; हत--तथा चोरी; अमर-अद्वि--देवताओंके पर्वत ( मन्दर ) पर; स्थानेन--विशेष स्थान ( पर्वत की चोटी पर बने क्रीड़ास्थल, मणिपर्वत ) पर; ज्ञापित:--सूचित किया;भौम-चेष्टितम्-- भौम के कार्यकलापों का; स--सहित; भार्य:--अपनी पत्नी ( सत्यभामा ); गरूुड-आरूढ:--गरुड़ पर सवारहोकर; प्रागू-ज्योतिष-पुरम्-- भौम की राजधानी प्राग्ज्योतिषपुर ( आसाम में स्थित-वर्तमान तेजपुर ); ययौ--गया; गिरि--पर्वत;दुर्ग:--किलेबन्दी द्वारा; शस्त्र--हथियारों से युक्त; दुर्गै:--किलेबन्दी द्वारा; जल--जल; अग्नि--आग; अनिल--तथा वायु के;दुर्गमम--किलेबन्दी से दुर्गम बनाया गया; मुर-पाश--केबलों ( तारों ) की घातक दीवाल से; अयुतैः --दसियों हजार; घोरैः --भयावना; हृढेः--तथा मजबूत; सर्वतः--सभी दिशाओं से; आवृतम्--घिरा हुआ
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भौम ने इन्द्र की माता के कुंडलों के साथ साथ वरुण काछत्र तथा मन्दर पर्वत की चोटी पर स्थित देवताओं की क्रीड़ास्थली को चुरा लिया तो इन्द्र कृष्णके पास गया और उन्हें इन दुष्कृत्यों की सूचना दी।
तब भगवान् अपनी पत्नी सत्यभामा को साथलेकर गरुड़ पर सवार होकर प्राग्ज्योतिषपुर के लिए रवाना हो गये जो चारों ओर से पर्वतों, बिनापुरुषों के चलाये जाने वाले हथियारों, जल, अग्नि तथा वायु से और मुर पाशतारों ( फन्दों ) केअवरोधों से घेरा हुआ था।
गदया निर्जिभेदाद्रीन्शस्त्रदुर्गाणि सायकै: ।
चक्रेणारिन जल वायुं मुरपाशांस्तथासिना ॥
४॥
गदया--अपनी गदा से; निर्विभेद--तोड़ डाला; अद्रीन्--पर्वतों को; शस्त्र-दुर्गाणि -- अवरोधक हथियार; सायकै:--अपनेबाणों से; चक्रेण--अपने चक्र से; अग्निमू--अग्नि को; जलम्ू--जल को; वायुम्--तथा वायु को; मुर-पाशान्--तारों केफंदों के अवरोधों को; तथा--इसी तरह; असिना--अपनी तलवार से।
भगवान् ने अपनी गदा से चट्टानी किलेबन्दी को, अपने बाणों से हथियारों की नाकेबन्दीको, अपने चक्र से अग्नि, जल तथा वायु की किलेबन्दी को और अपनी तलवार से मुर पाश कीतारों को नष्ट- भ्रष्ट कर दिया।
श्भुनादेन यन्त्राणि हृदयानि मनस्विनाम् ।
प्राकारं गदया गुर्व्या निर्विभेद गदाधर: ॥
५॥
शद्भु-- अपने शंख की; नादेन--ध्वनि से; यन्त्राणि--योग के तिलिस्मों को; हृदयानि--हृदयों को; मनस्विनाम्--बहादुरों के;प्राकारमू--परकोटे को; गदया--अपनी गदा से; गुर्व्या--भारी; निर्व$िभेद--तोड़ डाला; गदाधर:-- भगवान् कृष्ण ने |
तब गदाधर ने अपने शंख की ध्वनि से दुर्ग के जादुई तिलिस्मों को और उसी के साथ उसकेवीर रक्षकों के हृदयों को ध्वस्त कर दिया।
उन्होंने अपनी भारी गदा से किले के मिट्टी से बनेपरकोटे को ढहा दिया।
पाझ्जजन्यध्वनिं श्रुत्वा युगान््तशनिभीषणम् ।
मुरः शयान उत्तस्थौ दैत्य: पञ्ञशिरा जलात् ॥
६॥
पाञ्जजन्य--कृष्ण के शंख की; ध्वनिमू--आवाज को; श्रुत्वा--सुनकर; युग--ब्रह्माण्ड के युग के; अन्त--अन्त में; अशनि--बिजली की ( ध्वनि के समान ); भीषणम्--दिल दहलाने वाली; मुर:--मुर; शयान:--सोया हुआ; उत्तस्थौ--उठ गया;दैत्य:--असुर; पशञ्ञ-शिरा:--पाँच सिरों वाला; जलात्--( किले के चारों ओर की खाईं के ) जल में से |
जब पाँच सिरों वाले असुर मुर ने भगवान् कृष्ण के पांचजन्य शंख की ध्वनि सुनी, जो युगके अन्त में बिजली (वज्ज ) की कड़क की भाँति भयावनी थी तो नगर की खाई की तली मेंसोया हुआ वह असुर जग गया और पानी से बाहर निकल आया।
त्रिशूलमुद्यम्य सुदुर्निरी क्षणोयुगान्तसूर्यानलरोचिरुल्बण: ।
ग्रसंस्त्रिलोकीमिव पशञ्ञभिर्मुखै-रभ्यद्रवत्ताक्ष्यसुतं यथोरग: ॥
७॥
त्रि-शूलम्--अपना त्रिशूल; उद्यम्य-- उठाकर; सु--अत्यन्त; दुर्निरीक्षण: -- जिसकी ओर देख पाना कठिन था; युग-अन्त--युगके अन्त में; सूर्य--सूर्य; अनल--अग्नि ( वत् ); रोचि: --जिसका तेज; उल्बण: -- भीषण; ग्रसन्--निगलते हुए; त्रि-लोकीम्--तीनों लोकों को; इब--मानो; पञ्ञभि:--अपने पाँच; मुखै:--मुखों से; अभ्यद्रवत्-- आक्रमण किया; तार्क्ष्य-सुतम्-तार््व्य के पुत्र, गरुड़ पर; यथा--जिस तरह; उरग: --सर्प |
युगान्त के समय की सूर्य की अग्नि सदृश अन्धा बना देने वाले भयंकर तेज से चमकताहुआ, मुर अपने पाँचों मुखों से तीनों लोकों को निगलता-सा प्रतीत हो रहा था।
उसने अपनात्रिशूल उठाया और तार्श््य-पुत्र गरुड़ पर वैसे ही टूट पड़ा जिस तरह आक्रमण करता हुआ सर्प ।
आविध्य शूलं तरसा गरुत्मतेनिरस्य वक्लैरव्यनदत्स पञ्ञभिः ।
स रोदसी सर्वदिशो म्बरं महा-नापूरयन्नण्डकटाहमावृणोत् ॥
८ ॥
आविध्य--घुमाते हुए; शूलम्--अपना त्रिशूल; तरसा--बलपूर्वक; गरुत्मते--गरुड़ पर; निरस्थ--फेंककर; वक््टै:ः--मुखों से;व्यनदत्-गर्जना की; सः--उसने; पदञ्ञभि: --पाँचो; सः--वह; रोदसी--पृथ्वी तथा आकाश; सर्व--सभी; दिश:--दिशाएँ;अम्बरम्--बाह्य आकाश; महान्--महान् ( गर्जना ); आपूरयन्--पूर्ण करते हुए; अण्द--ब्रह्माण्ड के अंडे जैसे आवरणों के;कटाहम्ू--कड़ाह को; आवृणोत्--ढक
दियामुर ने अपना त्रिशूल घुमाया और अपने पाँचों मुखों से दहाड़ते हुए उसे गरुड़ पर बड़ी उग्रतासे फेंक दिया।
यह ध्वनि पृथ्वी, आकाश, सभी दिशाओं तथा बाह्य अंतरिक्ष की सीमाओं में भरकर ब्रह्माण्ड की खोल से टकराकर प्रतिध्वनित होने लगी।
तदापतद्ठै त्रिशिखं गरुत्मतेहरिः शराभ्यामभिनत्तविधोजसा ।
मुखेषु त॑ चापि शरैरताडयत्तस्मै गदां सोपि रुषा व्यमुझ्ञत ॥
९॥
तदा--तब; आपतत्--उड़ती हुई; बै--निस्सन्देह; त्रि-शिखम्--त्रिशूल; गरुत्मते--गरुड़ की ओर; हरिः-- भगवान् कृष्ण ने;शराभ्याम्--दो बाणों से; अभिनत्--खंड कर दिया; त्रिधा--तीन भागों में; ओजसा--बलपूर्वक; मुखेषु--उसके मुखों पर;तमू--उसको, मुर को; च--तथा; अपि-- भी; शरैः--बाणों से; अताडयत्-- प्रहार किया; तस्मै--उस ( कृष्ण ) पर; गदाम्--अपनी गदा को; सः--उसने, मुर ने; अपि--तथा; रुषा--क्रोध में; व्यमुज्ञत--छोड़ा |
तब भगवान् हरि ने गरुड़ की ओर उड़ते हुए त्रिशूल पर दो बाणों से प्रहार किया और उसेतीन खण्डों में काट डाला।
इसके बाद भगवान् ने मुर के मुखों पर कई बाण मारे और असुर नेभी क्रुद्ध होकर भगवान् पर अपनी गदा फेंकी ।
तामापतन्तीं गदया गदां मृधेगदाग्रजो निर्बिभिदे सहस्त्रधा ।
उद्यम्य बाहूनभिधावतोजित:शिरांसि चक्रेण जहार लीलया ॥
१०॥
तामू--उस; आपतन्तीम्--अपनी ओर आती हुई; गदया--अपनी गदा से; गदामू--गदा को; मृधे--युद्धभूमि में; गद-अग्रज: --गद के बड़े भाई, कृष्ण ने; निर्विभिदे--तोड़ डाला; सहस्त्रधा--हजारों टुकड़ों में; उद्यम्य--उठाकर; बाहूनू-- अपनी भुजाएँ;अभिधावतः--उसकी ओर दौड़ने वाले का; अजित:--अजेय कृष्ण; शिरांसि--सिरों को; चक्रेण-- अपने चक्र से; जहार--अलग कर दिया; लीलया--आसानी से।
जब युद्धभूमि में मुर॒ की गदा कृष्ण की ओर लपकी तो गदाग्रज ने अपनी गदा से उसे बीचमें ही रोक दिया और उसे हजारों टुकड़ों में तोड़ डाला।
तब मुर ने अपनी बाहें ऊपर उठा लीं औरअजेय भगवान् की ओर दौड़ा जिन्होंने अपने चक्र से उसके सिरों को सरलता से काट गिराया।
व्यसु: पपाताम्भसि कृत्तशीर्षोनिकृत्तश्वुक्ेउद्विरिवेन्द्रतेजसा ।
तस्यात्मजा: सप्त पितुर्वधातुरा:प्रतिक्रियामर्षजुष: समुद्यता: ॥
११॥
व्यसु:--प्राणविहीन; पपात--गिर पड़ा; अम्भसि--जल के भीतर; कृत्त--कटे हुए; शीर्ष:--सिरों; निकृत्त--कटा हुआ;श्रृड्अ:--चोटी; अद्वि:--पर्वत; इब--मानो; इन्द्र--इन्द्र की; तेजसा--शक्ति से ( उसके वज्ञ से ); तस्य--उस ( मुर ) के; आत्म-जा:--पुत्रगण; सप्त--सात; पितु:--अपने पिता के; वध--मारे जाने से; आतुरा: --अत्यन्त दुखित; प्रतिक्रिया--बदले केलिए; अमर्ष--क्रोध; जुष: -- भावना; समुद्यता: --सन्नद्ध
प्राणविहीन मुर का सिरकटा शरीर पानी में उसी तरह गिर पड़ा जैसे कोई पर्वत जिसकीचोटी इन्द्र के वज्ञ की शक्ति से छिन्न हो गई हो।
अपने पिता की मृत्यु से क्रुद्ध होकर असुर केसात पुत्र बदला लेने के लिए उद्यत हो गये।
ताम्रोउन्तरिक्ष: श्रवणो विभावसु-वसुर्नभस्वानरुणश्व सप्तम: ।
पीठं पुरस्कृत्य चमूपतिं मृथेभौमप्रयुक्ता निरगन्धृतायुधा: ॥
१२॥
ताम्र: अन्तरिक्ष: श्रवण: विभावसु:--ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण तथा विभावसु; बसु: नभस्वान्--वसु तथा नभस्वान; अरुण:--अरुण; च--तथा; सप्तम:--सातवाँ; पीठम्--पीठ को; पुरः-कृत्य--आगे करके ; चमू-पतिम्-- अपने सेनापति को; मृथे--युद्धभूमि में; भौम-- भौमासुर द्वारा; प्रयुक्ता:--नियुक्त; निरगन्--( किले से ) बाहर निकल आये; धृत-- धारण किये;आयुधा:--हथियार।
भौमासुर का आदेश पाकर ताम्र, अन्तरिक्ष, श्रवण, विभावसु, वसु, नभस्वान् तथा अरुणनामक सातों पुत्र अपने हथियार धारण किये पीठ नामक अपने सेनापति के पीछे पीछे युद्ध-ु्षेत्रमें आ गये।
प्रायुज्तासाद्य शरानसीन्गदाःशक्त्यूष्टिशूलान्यजिते रुषोल्बणा: ।
तच्छस्त्रकू्टं भगवान्स्वमार्गणै-रमोघवीर्यस्तिलशश्चवकर्त ह ॥
१३॥
प्रायुज्त--प्रयोग किया; आसाद्य--आक्रमण करके; शरान्--बाणों; असीन्--तलवारों; गदा:--गदाओं; शक्ति--भालों;ऋष्ति--ऋष्टि; शूलानि--त था त्रिशूलों से; अजिते--अजित भगवान् कृष्ण पर; रुषा--क्रो धपूर्वक; उल्बणा:-- भयानक;तत्--उनके; शस्त्र--हथियारों के; कूटम्--पर्वत को; भगवानू-- भगवान् ने; स्व--अपने; मार्गणै:--बाणों से; अमोघ--अचूक; वीर्य:--जिनका पराक्रम; तिलश:--तिल जितने छोटे छोटे कणों में; चकर्त ह--काट डाला
इन भयानक योद्धाओं ने क्रुद्ध होकर बाणों, तलवारों, गदाओं, भालों, ऋष्टियों तथात्रिशूलों से अजेय भगवान् कृष्ण पर आक्रमण कर दिया किन्तु भगवान् ने अपनी अमोघ शक्तिसे हथियारों के इस पर्वत को अपने बाणों से छोटे छोटे टुकड़ों में काट डाला।
तान्पीठमुख्याननयद्यमक्षयं निकृत्तशीर्षोरु भुजाडूप्रिवर्मण: ।
स्वानीकपानच्युतचक्रसायकै -स्तथा निरस्तान्नरको धरासुतः ।
निरीक्ष्य दुर्मषण आस्त्रवन्मदै-गज: पयोधिप्रभवैर्निराक्रमात्ू ॥
१४॥
तानू--उन; पीठ-मुख्यान्--पीठ इत्यादि को; अनयत्-- भेज दिया; यम--मृत्यु के स्वामी यम के; क्षयम्-- धाम को; निकृत्त--कटे हुए; शीर्ष--सिर; ऊरुू--जाँघें; भुज--बाँहें; अड्घ्रि-- पाँव; वर्मण:--तथा कवच; स्व--अपनी; अनीक--सेना के;पानू--नायक; अच्युत-- भगवान् कृष्ण के; चक्र --चक्र; सायकैः--तथा बाणों से; तथा--इस प्रकार; निरस्तानू--हटायागया; नरक: --भौम; धरा--पृथ्वीदेवी का; सुतः--पुत्र; निरीक्ष्य--देखकर; दुर्मर्षण:--सहन करने में अक्षम; आस्त्रवत्--चू रहेथे; मदैः --उन्मत्त हाथियों के गण्डस्थल से निकलने वाला चिपचिपा द्रव; गजैः--हाथियों के साथ; पयः-धि--क्षीर सागर से;प्रभवै:--उत्पन्न; निराक्रमातू--वह बाहर आया
भगवान् ने पीठ इत्यादि प्रतिद्वन्द्रियों के सिर, जाँघें, बाँहें, पाँव तथा कवच काट डाले औरउन सबों को यमराज के लोक भेज दिया।
जब पृथ्वी-पुत्र नरकासुर ने अपने सेना-नायकों कायह हाल देखा तो उसका क्रोध आपे में न रह सका।
अतः वह क्षीर सागर से उत्पन्न हाथियों केसाथ, जो उन्मत्तता के कारण अपने गण्डस्थल से मद चूआ रहे थे, अपने दुर्ग से बाहर आया।
इृष्ठा सभार्य गरुडोपरि स्थितंसूर्योपरिष्टात्सलडिद्धनं यथा ।
कृष्णं स तस्मै व्यसृजच्छतघ्नींयोधाश्व सर्वे युगपच्च विव्यधु: ॥
१५॥
इृष्टठा--देखकर; स-भार्यम्--अपनी पत्नी के साथ; गरुड-उपरि--गरुड़ के ऊपर; स्थितम्--आसीन; सूर्य--सूर्य से;उपरिष्टात्--ऊँचा; स-तडित्--बिजली से युक्त; घनम्--बादल को; यथा--जिस तरह; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण को; सः--उसने, भौम ने; तस्मै--उस पर; व्यसृजत्--छोड़ा; शत-घ्नीम्--शतघ्नी ( भाले का नाम ); योधा:--उसके सैनिकों ने; च--तथा; सर्वे--सभी; युगपत्ू--एक ही साथ; च--तथा; विव्यधु:-- आक्रमण कर दिया
गरुड़ पर आसीन भगवान् कृष्ण और उनकी पत्नी सूर्य को ढकने वाले बिजली से युक्तबादल जैसे प्रतीत हो रहे थे।
भगवान् को देखकर भौम ने उन पर अपना शतघ्नी हथियार छोड़ा।
तत्पश्चात् भौम के सारे सैनिकों ने एकसाथ अपने अपने हथियारों से आक्रमण कर दिया।
तद्धौमसैन्यं भगवान्गदाग्रजोविचित्रवाजैर्निशितैः शिलीमुखै: ।
निकृत्तबाहूरुशिरो क्षविग्रहंचकार तहोंव हताश्वकुझ्ऋरम् ॥
१६॥
तत्--उस; भौम-सैन्यमू-- भौमासुर की सेना को; भगवान्-- भगवान्; गदाग्रज:--कृष्ण ने; विचित्र--नाना प्रकार के;वाजै:--पंखों वाले; निशितैः--नुकीले; शिलीमुखै:ः--बाणों से; निकृत्त--काट दिया; बाहु--बाँहें; ऊरु--जाँघें; शिर:-क्ष--तथा गर्दन; विग्रहम्--शरीरों को; चकार--बनाया; तहिं एव--उसी क्षण; हत--मार डाला; अश्व--घोड़ों; कुझ्मम्--तथा
हाथियों कोउस क्षण भगवान् गदाग्रज ने अपने तीक्ष्ण बाण भौमासुर की सेना पर छोड़े।
नाना प्रकार केपंखों से युक्त इन बाणों ने उस सेना को शरीरों के ढेर में बदल दिया जिनकी बाँहें, जाँघें तथागर्दनें कटी थीं।
इसी तरह कृष्ण ने विपक्षी घोड़ों तथा हाथियों को मार डाला।
यानि योधे: प्रयुक्तानि शस्त्रास्त्राणि कुरूद्रह ।
हरिस्तान्यच्छिनत्ती कै: शररेकैकशस्त्रीभि: ॥
१७॥
उहामानः सुपर्णेन पक्षाभ्यां निघ्नता गजान् ।
गुरुत्मता हन्यमानास्तुण्डपक्षनखेर्गजा: ॥
१८॥
पुरमेवाविशतन्नार्ता नरको युध्ययुध्यत ॥
१९॥
यानि--वे जो; योधै: --योद्धाओं द्वारा; प्रयुक्तानि--प्रयुक्त; शस्त्र--काटने वाले हथियार; अस्त्राणि--तथा फेंककर चलाये जानेवाले हथियार; कुरु-उद्ठद--हे कुरुओं के वीर ( राजा परीक्षित ); हरिः-- भगवान् कृष्ण ने; तानि--उनको; अच्छिनत्ू--खण्डखण्ड कर दिया; तीक्ष्णै:--नुकीले; शरैः--बाणों से; एक-एकशः--एक एक करके; त्रिभि:--तीन; उह्ामान: -- ले जाये गये;सु-पर्णेन--बड़े बड़े पंखो वाले ( गरुड़ ) द्वारा; पक्षाभ्याम्ू--दोनों पंखों से; निघ्नता-- प्रहार करता; गजान्--हाथियों को;गुरुत्मता--गरुड़ द्वारा; हन्यमाना:--मारा जाकर; तुण्ड--चोंच; पक्ष--पंखों; नखे: --तथा पंजों से; गजा:--हाथी; पुरम्--नगर में; एब--निस्सन्देह; आविशन्--फिर से भीतर जाकर; आर्ता:--दुखी; नरकः--नरक ( भौम ); युधि--युद्ध में;अयुध्यत--लड़ता रहा।
हे कुरुवीर, तब भगवान् हरि ने उन सारे अस्त्रों तथा शस्त्रों को मार गिराया जिन्हें शत्रु-सैनिकों ने उन पर फेंका था और हर एक को तीन तेज बाणों से नष्ट कर डाला।
इस बीच,भगवान् को उठाकर ले जाते हुए गरुड़ ने अपने पंखों से शत्रु के हाथियों पर प्रहार किया।
येहाथी गरुड़ के पंखों, चोंच तथा पंजों से प्रताड़ित होने से भाग कर नगर के भीतर जा घुसेजिससे कृष्ण का सामना करने के लिए युद्धभूमि में केवल नरकासुर बच रहा।
इृष्ठा विद्रावितं सैन्यं गरुडेनार्दितं स्वकं ।
तं॑ भौमः प्राहरच्छक्त्या वज्ञः प्रतिहतो यतः ।
नाकम्पत तया विद्धो मालाहत इव द्विप: ॥
२०॥
इृष्ठा--देखकर; विद्रावितम्-- भगाई हुईं; सैन्यम्ू--सेना के; गरूडेन--गरुड़ द्वारा; अर्दितम्--तंग की गई; स्वकम्--अपनी;तम्--उस पर, गरुड़ पर; भौम: -- भौमासुर ने; प्राहरत्--प्रहार किया; शक्त्या--अपने भाले से; वज्ञः--( इन्द्र का ) वज्र;'प्रतिहत:--उलट कर प्रहार किया गया; यत:--जिससे; न अकम्पत--वह ( गरुड़ ) हिला नहीं; तया--उससे; विद्ध:--प्रहारकिया गया; माला--फूलों की माला से; आहतः --मारा गया; इब--सहश; द्विप:--हाथी |
जब भौम ने देखा कि गरुड़ द्वारा उसकी सेना खदेड़ी तथा सतायी जा रही है, तो उसने गरुड़पर अपने उस भाले से आक्रमण किया जिससे उसने एक बार इन्द्र के वज्ञ को परास्त किया था।
किन्तु उस शक्तिशाली हथियार से प्रहार किये जाने पर भी गरुड़ तिलमिलाये नहीं।
निस्सन्देहवेफूलों की माला से प्रहार किए जाने वाले हाथी के समान थे।
शूलं भौमोच्युतं हन्तुमाददे वितथोद्यम: ।
तद्विसर्गात्पूर्वमेव नरकस्य शिरो हरिः ।
अपाहरदगजस्थस्य चक्रेण क्षुरनेमिना ॥
२१॥
शूलम्--त्रिशूल को; भौम:--भौम ने; अच्युतम्-- भगवान् कृष्ण को; हन्तुमू-मारने के लिए; आददे--ग्रहण किया; वितथ--व्यग्र; उद्यम:--प्रयास; तत्--उसके ; विसर्गात्--छोड़ने से; पूर्वम्ू--पहले; एब-- भी; नरकस्य-- भौम का; शिर:--सिर;हरिः--भगवान् कृष्ण ने; अपाहरत्--काट दिया; गज--हाथी पर; स्थस्य--बैठे हुए; चक्रेण--चक्र से; क्षुर--छुरे सी;नेमिना--धार वाले
तब अपने सारे प्रयासों में विफल भौम ने भगवान् कृष्ण को मारने के लिए अपना त्रिशूलउठाया।
किन्तु इसके पहले कि वह उसे चलाये, भगवान् ने अपने तेज धार वाले चक्र से हाथी केऊपर बैठे हुए उस असुर के सिर को काट डाला।
सकुण्डलं चारुकिरीटभूषणंबभौ पृथिव्यां पतितम्समुज्चलम् ।
ह हेति साध्वित्यूषय: सुरेश्वरामाल्यैर्मुकुन्दं विकिरन्त ईदिरि ॥
२२॥
स--सहित; कुण्डलम्ू--कुण्डल; चारु--सुन्दर; किरीट--मुकुट से; भूषणम्--सुशोभित; बभौ--चमकने लगा; पृथिव्याम्--पृथ्वी पर; पतितम्--गिरा हुआ; समुज्वलम्--चमकीला; हा हा इति--हाय हाय; साधु इति--बहुत अच्छा; ऋषय:--ऋषियोंने; सुर-ईश्वरः--तथा प्रमुख देवताओं ने; माल्यैः--फूल की मालाओं से; मुकुन्दम्-- भगवान् कृष्ण की; विकिरन्त:--बिखरतेहुए; ईडिरे--पूजा की |
भूमि पर गिरे हुए भौमासुर का सिर तेजी से चमक रहा था क्योंकि यह कुण्डलों तथा आकर्षक मुकुट से सज्जित था।
ज्यों ही 'हाय हाय ' तथा 'बहुत अच्छा हुआ ' के क्रन्दन उठनेलगे, त्योंही ऋषियों तथा प्रमुख देवताओं ने फूल-मालाओं की वर्षा करते हुए भगवान् मुकुन्दकी पूजा की।
ततश्च भू: कृष्णमुपेत्य कुण्डलेप्रतप्तजाम्बूनदरलभास्वरे ॥
सर्वैजयन्त्या वनमालयार्पयत्प्राचेतसं छत्रमथो महामणिम् ॥
२३॥
ततः--तब; च--तथा; भू: --भूमिदेवी; कृष्णम्-- भगवान् कृष्ण के; उपेत्य--पास आकर; कुण्डले--दोनों कुण्डल ( जोअदिति के थे ); प्रतप्त--चमकीले; जाम्बूनद--सोना; रत्त--रत्नों से; भास्वरे--चमकते हुए; स--सहित; बैजयन्त्या--वैजयन्ती नामक; वन-मालया--तथा फूलों की माला से; अर्पयत्-- भेंट किया; प्राचेतसम्--वरुण का; छत्रमू--छाता; अथउ--तत्पश्चात; महा-मणिम्--मन्दर पर्वत की चोटी, मणिपर्वत।
तब भूमिदेवी भगवान् कृष्ण के पास आईं और भगवान् को अदिति के कुण्डल भेंट कियेजो चमकीले सोने के बने थे और जिसमें चमकीले रत्न जड़े थे।
उसने उन्हें एक वैजयन्ती माला,वरुण का छत्र तथा मन्दर पर्वत की चोटी भी दी।
अस्तौषीदथ विश्वेशं देवी देववराचितम् ।
प्राज्ललि: प्रणता राजन्भक्तिप्रवणया धिया ॥
२४॥
अस्तौषीत्--स्तुति की; अथ--तब; विश्व--ब्रह्माण्ड के; ईशम्--स्वामी की; देवी--देवी; देव--देवतागण का; वर-- श्रेष्ठ;अर्चितमू--पूजित; प्रा्ललि:ः--अपने हाथ जोड़ कर; प्रणता-- प्रणाम किया; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); भक्ति-- भक्ति;प्रवणया--से पूरित; धिया--प्रवृत्ति से
है राजन, उनको प्रणाम करके तथा उनके समक्ष हाथ जोड़े खड़ी वह देवी भक्ति-भाव सेपूरित होकर ब्रह्माण्ड के उन स्वामी की स्तुति करने लगी जिनकी पूजा श्रेष्ठ देवतागण करते हैं।
भूमिरुवाचनमस्ते देवदेवेश शट्डुच्क्रगदाधर ।
भक्तेच्छोपात्तरूपाय परमात्मन्नमोउस्तु ते ॥
२५॥
भूमि: उवाच-- भूमिदेवी ने कहा; नम:--नमस्कार; ते--आपको; देव-देव--देवताओं के स्वामी; ईश--हे ईश्वर; शद्बु--शंख;चक्र--चक्र; गदा--गदा; धर--हे धारण करने वाले; भक्त--अपने भक्तों की; इच्छा--इच्छा से; उपात्त-- धारण किये हुए;रूपाय--आपके रूपों को; परम-आत्मन्--हे परमात्मा; नम:ः--नमस्कार; अस्तु--होए; ते--आपको
भूमिदेवी ने कहा : हे देवदेव, हे शंख, चक्र तथा गदा के धारणकर्ता, आपको नमस्कार है।
हे परमात्मा, आप अपने भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए विविध रूप धारण करते हैं।
आपको नमस्कार है।
नमः पड्डुजनाभाय नमः पड्डूजमालिने ।
नमः पड्डूजनेत्राय नमस्तेपड्डूजाइ्म्ये ॥
२६॥
नमः--सादर नमस्कार; पड्डूज-नाभाय-- भगवान् को, जिनके उदर के बीच में कमल के फूल जैसा गट्ढा है; नम:--नमस्कार;पड्लुज-मालिने--जो सदैव कमल के फूलों की माला से सुसज्जित रहते हैं; नम:--नमस्कार; पड्डूज-नेत्राय--जिनकी चितवनकमल के फूल जैसी शीतलता प्रदान करने वाली है; नमः ते--आपको नमस्कार; पड्डूज-अद्घ्रये--आपको, जिनके पैरों केतलवों पर कमल के फूल अंकित हैं।
हे प्रभु, आपको मेरा सादर नमस्कार है।
आपके उदर में कमल के फूल जैसा गड्ढा अंकितहै, आप सदैव कमल के फूल की मालाओं से सुसज्जित रहते हैं, आपकी चितवन कमल जैसीशीतल है और आपके चरणों में कमल अंकित हैं।
नमो भगवते तुभ्यं वासुदेवाय विष्णवे ।
पुरुषायादिबीजाय पूर्णबोधाय ते नम: ॥
२७॥
नमः--नमस्कार; भगवते-- भगवान् को; तुभ्यमू-- आपको ; वासुदेवाय--वासुदेव को, जो समस्त प्राणियों के आश्रय हैं;विष्णवे--सर्वव्यापक विष्णु को; पुरुषाय--आदि-पुरुष को; आदि--मूल, आदि; बीजाय--बीज को; पूर्ण--पूर्ण; बोधाय--ज्ञान को; ते--आपको; नमः -- नमस्कार ।
हे वासुदेव, हे विष्णु, हे आदि-पुरुष, हे आदि-बीज भगवान्, आपको सादर नमस्कार है।
हेसर्वज्ञ, आपको नमस्कार है।
अजाय जनयियत्रेउस्य ब्रह्मणेनन्तशक्तये ।
परावरात्मन्भूतात्मन्परमात्मन्नमोस्तु ते ॥
२८ ॥
अजाय--अजन्मा को; जनयित्रे--जनक; अस्य--इस ( ब्रह्माण्ड ) के; ब्रह्मणे-- ब्रह्म को; अनन्त-- असीम; शक्तये-- जिनकीशक्तियाँ; पर-- श्रेष्ठ अवर--तथा निकृष्ट; आत्मन्ू--हे आत्मा; भूत-- भौतिक जगत का; आत्मन्--हे आत्मा; परम-आत्मन्--हे परमात्मा जो सर्वव्यापी हैं; नमः--नमस्कार; अस्तु--हो; ते--आपको |
अनन्त शक्तियों वाले, इस ब्रह्माण्ड के अजन्मा जनक ब्रह्म, आपको नमस्कार है।
हे वर तथाअबर के आत्मा, हे सृजित तत्त्वों के आत्मा, हे सर्वव्यापक परमात्मा, आपको नमस्कार है।
त्वं वै सिसृक्षुरज उत्कटं प्रभोतमो निरोधाय बिभर्ष्यसंवृतः ।
स्थानाय सत्त्वं जगतो जगत्पतेकाल: प्रधानं पुरुषो भवान्पर: ॥
२९॥
त्वमू--तुम; वै--निस्सन्देह; सिसृक्षुः--सृजन करने की इच्छा वाले; अजः--अजन्मा; उत्कटम्-- प्रमुख; प्रभो--हे प्रभु; तम:--तमो गुण; निरोधाय--संहार के लिए; बिभर्षि-- धारण करते हो; असंवृतः--अनावृत; स्थानाय--पालन के लिए; सत्त्वमू--सतो गुण; जगत: --ब्रह्माण्ड के; जगत् -पते--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; काल:--काल, समय; प्रधानम्-- भौतिक प्रकृति ( अपनेआदि-रूप में ); पुरुष: --स्त्रष्टा ( भौतिक प्रकृति के साथ अंतः क्रिया करने वाला ); भवान्ू--आप; पर:--पृथक्, परे
हे अजन्मा प्रभु, सृजन की इच्छा करके आप वृद्धि करते हैं और तब रजो गुण धारण करतेहैं।
इसी तरह जब आप ब्रह्माण्ड का संहार करना चाहते हैं, तो तमो गुण और जब इसका पालनकरना चाहते हैं, तो सतो गुण धारण करते हैं।
तो भी आप इन गुणों से अनाच्छादित रहते हैं।
हेजगत्पति, आप काल, प्रधान तथा पुरुष हैं फिर भी आप पृथक् एवं भिन्न रहते हैं।
अहं पयो ज्योतिरथानिलो नभोमात्राणि देवा मन इन्द्रियाणि ।
कर्ता महानित्यखिलं चराचरंत्वय्यद्वितीये भगवनयं भ्रम: ॥
३०॥
अहमू-मैं ( पृथ्वी ); पथः--जल; ज्योति:--अग्नि; अथ--तथा; अनिल: --वायु; नभः--आकाश; मात्राणि--विभिन्न इन्द्रिय-विषय ( पाँच स्थूल तत्त्वों के संगत ); देवा:--देवतागण; मन:ः--मन; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; कर्ता--करने वाले, मिथ्या अहंकार; महान्ू--समग्र भौतिक शक्ति ( महत् तत्त्व ); इति--इस प्रकार; अखिलम्--सम्पूर्ण;, चर--चलायमान; अचरमू्--जड़; त्वयि--तुम्हारे भीतर; अद्वितीये--अद्वितीय; भगवनू--हे प्रभु; अयम्--यह; भ्रम:--मोह |
यह भ्रम है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, इन्द्रिय-विषय, देवता, मन, इन्द्रियाँ,मिथ्या अहंकार तथा महत् तत्त्व आपसे स्वतंत्र होकर विद्यमान हैं।
वास्तव में वे सब आपकेभीतर हैं क्योंकि हे प्रभु, आप अद्वितीय हैं।
तस्यात्मजोयं तव पादपड्डजंभीतः प्रपन्नार्तिहरोपसादितः ।
तत्पालयैनं कुरु हस्तपड्डजंशिरस्यमुष्याखिलकल्मषापहम् ॥
३१॥
तस्य--उसका ( भौमासुर का ); आत्म-ज:--पुत्र; अयम्--यह; तब--तुम्हारे; पाद--पाँव; पड्डूजम्ू--कमल सहश; भीत:--डरा हुआ; प्रपन्न--शरणागत; आर्ति--दुख, शोक; हर--हे हरने वाले; उपसादित:--पास आया है; तत्ू--इसलिए; पालय--रक्षा करें; एनमू--उसकी; कुरु--रखिये; हस्त-पड्डूजम्--अपना कर-कमल; शिरसि--सिर पर; अमुष्य--उसके; अखिल--सारे; कल्मष--पाप; अपहम्--समूल नष्ट करने वालेयह भौमासुर का पुत्र है।
यह भयभीत है और आपके चरणकमलों के समी आ रहा हैक्योंकि आप उन सबों के कष्टों को हर लेते हैं, जो आपकी शरण में आते हैं।
कृपया इसकी रक्षाकीजिये।
आप इसके सिर पर अपना कर-कमल रखें जो समस्त पापों को दूर करने वाला है।
श्रीशुक उबाचइति भूम्यर्थितो वाग्भिर्भगवान्भक्तिनप्रया ।
दत्त्वाभयं भौमगृहम्प्राविशत्सकलर्द्द्रमत् ॥
३२॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; भूमि-- भूमिदेवी द्वारा; अर्थित: -- प्रार्थना किये जाने पर;वाग्भि:--उन शब्दों से; भगवान्-- भगवान्; भक्ति--भक्तिपूर्वक; नप्रया--विनीत; दत्त्वा--देकर; अभयम्-- अभय; भौम-गृहम्--भौमासुर के घर में; प्राविशत्-प्रविष्ट हुए; सकल--समस्त; ऋद्धि--ऐश्वर्य से; मत्-युक्त |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह विनीत भक्ति के शब्दों से भूमिदेवी द्वारा प्रार्थना कियेजाने पर परमेश्वर ने उसके पोते को अभय प्रदान किया और तब भौमासुर के महल में प्रवेशकिया जो सभी प्रकार के ऐश्वर्य से पूर्ण था।
तत्र राजन्यकन्यानां षट्सहस्त्राधिकायुतम् ।
भौमाहतानां विक्रम्य राजभ्यो ददशे हरि: ॥
३३॥
तत्र--वहाँ; राजन्य--राजवर्ग की; कन्यानाम्--कन्याओं का; षट््-सहस्त्र--छह हजार; अधिक--से अधिक; अयुतम्--दसहजार; भौम--भौम द्वारा; आहतानाम्ू--छीन ली गईं; विक्रम्य--बल से; राजभ्य:--राजाओं से; दहशे--देखा; हरि: -- भगवान्कृष्ण ने।
वहाँ भगवान् कृष्ण ने सोलह हजार से अधिक राजकुमारियाँ देखीं, जिन्हें भौम ने विभिन्नराजाओं से बलपूर्वक छीन लिया था।
तम्प्रविष्ट॑ स्त्रियो वीक्ष्य नरवर्य विमोहिता: ।
मनसा वद्षिरेअभीष्टे पतिं दैवोपसादितम् ॥
३४॥
तमू--उसको; प्रविष्टमू-प्रवेश करते हुए; स्त्रियः--स्त्रियाँ; वीक्ष्य--देखकर; नर--मनुष्यों में; वर्यम्-- श्रेष्ठ; विमोहिता:--मुग्ध; मनसा--अपने मनों में; वक्रिरि--चुना; अभीष्टम्-- अभीष्ट; पतिम्--पति के रूप में; दैव-- भाग्य से; उपसादितम्--लाईगईं।
जब स्त्रियों ने पुरुषों में सर्वोत्तम पुरुष को प्रवेश करते देखा तो वे मोहित हो गईं।
उन्होंने मनही मन उन्हें, जो कि वहाँ भाग्यवश लाये गये थे, अपने अभीष्ट पति के रूप में स्वीकार करलिया।
भूयात्पतिरयं मह्यं धाता तदनुमोदताम् ।
इति सर्वा: पृथक्रृष्णे भावेन हृदयं दधु; ॥
३५॥
भूयात्ू--बन सके; पति:--पति; अयम्--वह; महाम्--मेरा; धाता--विधाता; तत्--वह; अनुमोदताम्--स्वीकृति प्रदान करें;इति--इस प्रकार; सर्वा:--वे सभी; पृथक्ू--अलग-अलग; कृष्णे--कृष्ण में; भावेन-- भाव से; हृदयम्--अपने हृदयों में;दधु:--रख लिया |
हर राजकुमारी ने इस विचार से कि 'विधाता इस पुरुष को मेरा पति बनने का वर दें'!अपने हृदय को कृष्ण के विचार में लीन कर दिया।
ताः प्राहिणोद्द्वारवर्ती सुमृष्ठविरजोम्बरा: ।
नरयानैर्महाकोशात्रथाश्रान्द्रविणं महात् ॥
३६॥
ताः--उनको; प्राहिणोत्-- भेजा; द्वारवतीम्--द्वारका तक; सु-मृष्ट--स्वच्छ; विरज:--निष्कलंक; अम्बरा: --वस्त्रों से; नर-यानैः--मनुष्यों के वाहनों ( पालकियों ) द्वारा; महा--विशाल; कोशान्--खजाने; रथ--रथ; अश्वानू--तथा घोड़े; द्रविणम्--धन-सम्पदा; महत्--विस्तृत |
भगवान् ने राजकुमारियों को स्वच्छ, निर्मल वस्त्रों से सजवाया और फिर उन्हें रथ, घोड़े तथाअन्य मूल्यवान वस्तुओं के विशाल कोषों समेत पालकियों में द्वारका भिजवा दिया।
ऐरावतकुलेभांश्व चतुर्दन्तांस्तरस्विन: ।
पाण्डुरां श्र चतुःषष्टिं प्रेरयामास केशव: ॥
३७॥
ऐरावत--इन्द्र के वाहन ऐरावत के; कुल--कुल से; इभान्ू--हाथियों को; च-- भी; चतु:--चार; दन्तान्ू--दाँत वाले;तरस्विन:--तेज; पाण्डुरानू-- श्वेत; च--तथा; चतु:-षष्टिमू--चौंसठ; प्रेरयाम् आस--भेज दिया; केशव: -- भगवान् कृष्ण ने |
भगवान् कृष्ण ने ऐरावत प्रजाति के कुल के चौंसठ तेज, सफेद एवं चार दाँतों वाले हाथीभी भिजवा दिये।
गत्वा सुरेन्द्रभवनं दत्त्वादित्ये च कुण्डले ।
पूजितस्त्रिदशेन्द्रेण महेन्द्रयाण्या च सप्रिय: ॥
३८ ॥
चोदितो भार्ययोत्पाट्य पारीजातं गरुत्मति ।
आरगोप्य सेन्द्रान्विबुधान्निर्जित्योपानयत्पुरम् ॥
३९॥
गत्वा--जाकर; सुर--देवताओं के; इन्द्र--राजा के; भवनम्-- धाम में; दत्त्वा--देकर; अदित्यै--इन्द्र की माता अदिति को;च--तथा; कुण्डले--उसके कुंडल; पूजित:--पूजा किया गया; त्रिदश--तीस ( मुख्य देवताओं ); इन्द्रेण -- प्रधान द्वारा; महा-इन्द्रयाण्या--इन्द्राणी द्वारा; च--तथा; स--सहित; प्रियः--प्रियतमा ( सत्यभामा ); चोदितः--प्रेरित; भार्यया--अपनी पत्नीद्वारा; उत्पाट्य--उखाड़ कर; पारिजातम्--पारिजात वृक्ष को; गरुत्मति--गरुड़ पर; आरोप्य--रख कर; स-इन्द्रानू--इन्द्रसहित; विबुधान्--देवताओं को; निर्जित्य--हरा कर; उपानयत्--ले गया; पुरम्--अपनी नगरी में |
भगवान् तब इन्द्र के घर गये और माता अदिति को उनके कुंडल प्रदान किये।
वहाँ इन्द्र तथाउसकी पत्नी ने कृष्ण तथा उनकी प्रिया सत्यभामा की पूजा की।
फिर सत्यभामा के अनुरोध परभगवान् ने स्वर्गिक पारिजात वृक्ष उखाड़ लिया और उसे गरुड़ की पीठ पर रख दिया।
इन्द्र तथाअन्य सारे देवताओं को परास्त करने के बाद कृष्ण उस पारिजात को अपनी राजधानी ले आये।
स्थापितः सत्यभामाया गृहोद्यानोपशोभन: ।
अन्वगुभ्र॑मराः स्वर्गात्तद्गन्न्धासवलम्पटा: ॥
४०॥
स्थापित:--स्थापित किया; सत्यभामाया:--सत्यभामा के; गृह--घर के; उद्यान--बाग को; उपशोभन: --सुन्दर बनाते हुए;अन्वगु:--पीछे लग गये; भ्रमरा: -- भौरे; स्वर्गात्--स्वर्ग से; तत्--उसकी; गन्ध--सुगन्ध; आसवब--तथा मीठे रस के;लम्पटा:--लालची |
एक बार रोप दिये जाने पर पारिजात वृक्ष ने रानी सत्यभामा के महल के बाग को मनोहरबना दिया।
इस वृक्ष की सुगन्ध तथा मधुर रस के लालची भौरे स्वर्ग से ही इसका पीछा करनेलगे थे।
ययाच आनम्य किरीटकोटिभि:पादौ स्पृशन्नच्युतमर्थसाधनम् ।
सिद्धार्थ एतेन विगृह्मयते महा-नहो सुराणां च तमो धिगाढ्यताम् ॥
४१॥
ययाच--उसने ( इन्द्र ने) विनती की; आनम्य--झुक कर; किरीट--मुकुट की; कोटिभि:ः--नोकों से; पादौ--उनके चरणों;स्पृशन्--स्पर्श करते हुए; अच्युतम्-- भगवान् कृष्ण को; अर्थ--उसके ( इन्द्र के ) कार्य; साधनम्-पूरा करने के लिए;सिद्ध--पूरा हुआ; अर्थ:--जिसका प्रयोजन; एतेन--उनके साथ; विगृह्यते--झगड़ता है; महान्--महात्मा; अहो--निस्सन्देह;सुराणाम्-देवताओं के; च--तथा; तमः--अंधकार; धिक्ू--धिक्कार है; आढ्यताम्--उनकी सम्पत्ति को
भगवान् अच्युत को नमस्कार करने, उनके पैरों को अपने मुकुट की नोकों से स्पर्श करनेतथा अपनी इच्छा पूरी करने के लिए भगवान् से याचना करने के बाद भी, उस महान् देवता नेअपना काम सधवाने के बाद भगवान् से झगड़ना चाहा।
देवताओं में कैसा अज्ञान समाया है!थधिक्कार है उनके ऐश्वर्य को।
अथो मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु ता: स्त्रियः ।
यथोपयेमे भगवान्तावद्रूपधरोव्यय: ॥
४२॥
अथ उ--और तब; मुहूर्ते--शुभ समय पर; एकस्मिनू--उसी; नाना--अनेक; अगारेषु-- भवनों में; ता:--वे; स्त्रियः--स्त्रियाँ;यथा--उचित रीति से; उपयेमे--विवाह किया; भगवान्-- भगवान्; तावत्--उतने; रूप--रूप; धर: -- धारण करते हुए;अव्यय:--अव्यय |
तब उन अव्यय महापुरूष ने प्रत्येक दुलहन ( वधू ) के लिए पृथक् रूप धारण करते हुएएकसाथ सारी राजकुमारियों से उनके अपने अपने भवनों में विवाह कर लिया।
गृहेषु तासामनपाय्यतर्ककृ-न्रिरस्तसाम्यातिशयेष्ववस्थितः ।
रैमे रमाभिर्निजकामसम्प्लुतोयथेतरो गाईकमेधिकां श्वरन् ॥
४३ ॥
गृहेषु--घरों में; तासामू--उनके ; अनपायी--कभी न छोड़ते हुए; अतर्क--अचिन्त्य; कृत्--किये गये कार्य; निरस्त--निराकरण किये गये; साम्य--समानता; अतिशयेषु --तथा श्रेष्ठता; अवस्थित: --रहते हुए; रेमे--रमण किया; रमाभि: --मनोहरस्त्रियों के साथ; निज--अपने; काम--आननद में; सम्प्लुत:--लीन; यथा--जिस प्रकार; इतर:--कोई अन्य व्यक्ति; गाहक-मेधिकान्--गृहस्थ जीवन के कार्य; चरन्--सम्पन्न करता हुआ।
अचिन्त्य कृत्य करने वाले भगवान् निरन्तर अपनी प्रत्येक रानी के महल में रहने लगे जोअन्य किसी आवास की तुलना में अद्वितीय थे।
वहाँ पर उन्होंने अपनी मनोहर पत्नियों के साथरमण किया यद्यपि वे अपने आपमें पूर्ण तुष्ट रहते हैं और सामान्य पति की तरह अपने गृहस्थकार्य सम्पन्न किये।
इत्थं रमापतिमवाप्य पतिं स्त्रियस्ताब्रह्मादयोपि न विदु: पदवीं यदीयाम् ।
भेजुर्मुदाविरतमेधितयानुराग-हासावलोकनवसड्भमजल्पलज्ञा: ॥
४४॥
इत्थमू--इस प्रकार से; रमा-पतिम्ू--लक्ष्मी-पति को; अवाप्य--प्राप्त करके; पतिम्--अपने पति रूप में; स्त्रिय:--स्त्रियाँ;ताः--वे; ब्रह्मा-आदय:--ब्रह्मा तथा अन्य देवता; अपि--भी; न विदु:--नहीं जानते; पदवीम्--प्राप्त करने की विधियों को;यदीयाम्--जिसको; भेजु:--भाग लिया; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; अविरतमू--निरन्तर; एधितया--वर्धित; अनुराग --प्रेम काआकर्षण; हास--हँसी; अवलोक--चितवन; नव--नवीन; सड्रम--साथ; जल्प--हास-परिहास; लज्जा:--तथा शर्म |
इस तरह उन स्त्रियों ने लक्ष्मी-पति को अपने पति के रूप में प्राप्त किया यद्यपि ब्रह्मा जैसेबड़े से बड़े देवता भी उन तक पहुँचने की विधि नहीं जानते।
वे उनके प्रति निरन्तर वृद्धिमानअनुराग का अनुभव करतीं, उनसे हँसीयुक्त चितवन का आदान-प्रदान करतीं और हास-परिहासतथा स्त्रियोन्वित लज्जा से पूर्ण नित नवीन घनिष्ठता का आदान-प्रदान करतीं ।
प्रत्युदूगमासनवराहणपदशौच-ताम्बूलविश्रमणवीजनगन्धमाल्यै: ।
केशप्रसारशयनस्नपनोपहार्य :दासीशता अपि विभोर्विदधु: सम दास्यम् ॥
४५॥
प्रत्युदूगप--पास जाकर; आसन--बैठने का स्थान; वर--उच्च कोटि का; अहण--पूजा; पाद--उनके पाँव; शौच-- प्रक्षालन;ताम्बूलन--पान; विश्रमण--( उनके पाँव दबाकर ) विश्राम करने में सहायता करतीं; वीजन--पंखा झलतीं; गन्ध--सुगन्धितवस्तुएँ ( भेंट करतीं ); माल्यै:--तथा फूल-मालाओं से; केश--बाल; प्रसार--सँवारती; शयन--बिस्तर पर लेटती; स्नपन--नहलातीं; उपहायैं:--तथा भेंटें देकर; दासी--सेविकाएँ; शता:--सैकड़ों; अपि--यद्यपि; विभो:--शक्तिशाली भगवान् केलिए; विदधु: स्म--सम्पन्न किया; दास्यम्--सेवा |
यद्यपि भगवान् की प्रत्येक रानी के पास सैकड़ों दासियाँ थीं तो भी वे भगवान् के पासविनयपूर्वक जाकर, उन्हें आसन प्रदान करके, उत्तम सामग्री से उनकी पूजा करके, उनके पाँवोंका प्रक्षालल करके तथा मालिश करके, उन्हें खाने के लिए पान देकर, उन्हें पंखा झलकर, उन्हेंसुगन्धित चन्दन-लेप से लेपित करके, फूलों की माला से सजाकर, उनके बाल सँवारकर,उनका बिस्तर ठीक करके, उन्हें नहलाकर तथा उन्हें विविध उपहार देकर स्वयं उनकी सेवाकरना पसन्द करतीं।
