← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय साठ: भगवान कृष्ण रानी रुक्मिणी को चिढ़ाते हैं।

10.60श्रीबादरायणिरुवाचकर्हिचित्सुखमासीनं स्वतल्पस्थं जगदगुरुम्‌ ।

पतिं पर्यचरद्धैष्मी व्यजनेन सखीजनै: ॥

१॥

श्री-बादरायणि: --बादरायण व्यासदेव के पुत्र शुकदेव गोस्वामी ने; उवाच--कहा; कर्हिचितू--एक अवसर पर; सुखम्‌--सुखपूर्वक; आसीनम्‌--बैठे हुए; स्व--अपने; तल्प--बिस्तर में; स्थम्‌--स्थित; जगत्‌--ब्रह्मण्ड के; गुरुम्‌--गुरु; पतिम्‌ू--अपने पति को; पर्यचरत्‌--सेवा कर रही थी; भैष्मी--रुक्मिणी; व्यजनेन--पंखे से; सखी-जनैः--अपनी सखियों सहित |

श्री बादरायणि ने कहा : एक बार अपनी दासियों के साथ महारानी रुक्मिणी ब्रह्माण्ड केआध्यात्मिक गुरु अपने पति की सेवा कर रही थीं।

वे उनके बिस्तर पर विश्राम कर रहे थे तथा वेउन पर पंखा झल रही थीं।

यस्त्वेतल्‍लीलया विश्व सृजत्यत्त्यवतीश्वर: ।

स हि जातः स्वसेतूनां गोपीथाय यदुष्वज: ॥

२॥

यः--जो; तु--तथा; एतत्‌--यह; लीलया--खेल की तरह; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड को; सृजति--उत्पन्न करता है; अत्ति--निगलजाता है; अवति--रक्षा करता है; ईश्वरः--परम नियन्ता; सः--वह; हि--निस्सन्देह; जात:--उत्पन्न; स्व--निजी; सेतूनाम्‌--नियमों की; गोपीथाय--सुरक्षा के लिए; यदुषु--यदुओं के मध्य; अज:--अजन्मा प्रभु

इस ब्रह्माण्ड को खेल-खेल में उत्पन्न करने वाले, उसका पालन करने वाले तथा अन्त मेंउसको निगल जाने वाले अजन्मे परम नियन्ता भगवान्‌ ने अपने नियमों को सुरक्षित रखने केलिए यदुओं के मध्य जन्म लिया।

तस्मिनन्तर्गृहे भ्राजन्मुक्तादामविलम्बिना ।

विराजिते वितानेन दीपैर्मणिमयैरपि ॥

३॥

मल्लिकादामश्िि: पुष्पैद्दिफकुलनादिते ।

जालरन्श्रप्रविष्टे श्व गोभिश्वन्द्रमसो मलै: ॥

४॥

पारिजातवनामोदवायुनोद्यानशालिना ।

धूपैरगुरुजै राजन्जालरन्श्रविनिर्गति: ॥

५॥

पयःफेननिभे शुभ्रे पर्यड्डे कशिपूत्तमे ।

उपतस्थे सुखासीनं जगतामी श्वरं पतिम्‌ू ॥

६॥

तस्मिन्‌--उसमें; अन्त:-गृहे--महल के भीतरी भाग में; भ्राजत्‌--चमकीली; मुक्ता--मोतियों की; दाम--डोरियों से;विलम्बिना--लटकती हुईं; विराजिते--चमकीली; वितानेन--चँदोवे से; दीपैः--दीपकों से; मणि--मणियों के; मयै:--निर्मित; अपि-- भी; मल्लिका-- चमेली की; दामभि:ः--मालाओं से; पुष्पै:-- फूलों से; द्विफ--भौंरों के; कुल--झुंड के साथ;नादिते--शब्दायमान; जाल--झरोखों के; रन्श्र--छोटे छोटे छेदों से होकर; प्रविष्टे:--प्रविष्ट; च--तथा; गोभि:--किरणों से;चन्द्रमसः--चन्द्रमा की; अमलै:--निर्मल; पारिजात--पारिजात वृक्षों के; बन--कुंज के; आमोद--सुगंध ( वहन करते );वायुना--हवा द्वारा; उद्यान--बगीचे की; शालिना--उपस्थिति लाते हुए; धूपैः-- धूप से; अगुरु--अगुरु से; जैः--उत्पन्न;राजनू--हे राजा ( परीक्षित ); जाल-रन्ध्र--झरोखे के छेदों से; विनिर्गतः--बाहर निकलते हुए; पथः--दूध के; फेन--झाग;निभे--सहश; शुभ्रे--चमकीला; पर्यद्ले--बिस्तर पर, सेज पर; कशिपु--तकिया पर; उत्तमे--सर्वश्रेष्ठ; उपतस्थे--सेवा कर रहीथी; सुख--सुखपूर्वक; आसीनम्‌--बैठे; जगताम्‌ू--सारे लोकों के; ईश्वरम्‌--परम नियन्ता; पतिम्‌--अपने पति की |

महारानी रुक्मिणी के कमरे अत्यन्त सुन्दर थे।

उसमें एक चँदोवे से मोतियों की चमकीलीलड़ें लटक रही थीं और तेजोमय मणियाँ दीपकों का काम दे रही थीं।

उसमें यत्र-तत्र चमेलीतथा अन्य फूलों की मालाएँ लटक रही थीं जिनसे गुनगुनाते भौंरों के समूह आकृष्ट हो रहे थेऔर चन्द्रमा की निर्मल किरणें जाली की खिड़कियों के छेदों से होकर चमक रही थीं।

हे राजन्‌,जब इन खिड़कियों के छेदों में से अगुरु की सुगंध बाहर निकलती तो पारिजात कुंज की सुगंधको ले जाने वाली मन्द बयार कमरे के भीतर बगीचे का वातावरण पैदा कर देती।

इस कमरे मेंमहारानी समस्त लोकों के परमेश्वर अपने पति की सेवा कर रही थीं जो उनके मुलायम तथा दूधके फेन जैसे सफेद बिस्तर पर एक भव्य तकिये के सहारे बैठे थे।

वालव्यजनमादाय रतलदण्डं सखीकरात्‌ ॥

तेन वीजयती देवी उपासां चक्र ईश्वरम्‌ ॥

७॥

वाल--चमरी के बाल के; व्यजनम्‌ू--पंखे को; आदाय--लेकर; रल--रत्ल की; दण्डम्‌--डंडी वाले; सखी--अपनी सहेलीके; करात्‌ू--हाथ से; तेन--उससे; वीजयती--पंखा झलती; देवी -- देवी; उपासाम्‌ चक्रे --पूजा की; ईश्वरम्‌-- अपने स्वामीकी।

देवी रुक्मिणी ने अपनी दासी के हाथ से रत्नों की डंडी वाला चमरी के बाल का पंखा लेलिया और तब अपने पति पर पंखा झलकर सेवा करने लगीं।

सोपाच्युतं क्वणयती मणिनूपुराभ्यांरेजेड्डुलीयवलयव्यजनाग्रहस्ता ।

वस्त्रान्तगूढकुचकुड्डु मशोणहार-भासा नितम्बधृतया च परार्ध्यकाञ्च्या ॥

८॥

सा--वह; उप--समीप; अच्युतम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण के; क्वणयती--शब्द करती; मणि--मणिजटित; नूपुराभ्याम्‌--अपने नूपुरोंसे; रेजे--सुन्दर लग रही थी; अद्डुलीय--अँगूठी $ वलय--चूड़ियाँ; व्यजन--तथा पंखे सहित; अग्र-हस्ता--अपने हाथ में;वस्त्र--अपने वस्त्र के; अन्त--छोर से; गूढ--छिपे; कुच--स्तनों से; कुद्डू म--सिंदूर से; शोण--लाल हुए; हार--गले के हारकी; भासा-- चमक से; नितम्ब--उसके कूल्हे पर; धृतया--पहनी हुईं; च--तथा; परार्ध्य--बहुमूल्य; काउ्च्या--करधनी से।

महारानी रुक्मिणी का हाथ अँगूठियों, चूड़ियों तथा चामर पंखे से सुशोभित था और वेभगवान्‌ कृष्ण के निकट खड़ी हुई अतीव सुन्दर लग रही थीं।

उनके रत्नजटित पायल शब्द कररहे थे तथा उनके गले की माला चमचमा रही थी जो उनकी साड़ी के पल्‍ले से ढके उनके स्तनोंपर लगे कुमकुम से लाल लाल हो रही थी।

वे अपनी कमर में अमूल्य करधनी पहने थीं।

तां रूपिणीं श्रीयमनन्यगतिं निरीक्ष्यया लीलया धृततनोरनुरूपरूपा ।

प्रीत: स्मयन्नलककुण्डलनिष्ककण्ठ-वकक्‍्त्रोल्लसत्स्मितसुधां हरिराबभाषे ॥

९॥

ताम्‌ू--उस; रूपिणीम्‌--रूप धारण किये; श्रीयम्‌ू--लक्ष्मी को; अनन्य--जिसके कोई अन्य न हो, एकमात्र; गतिम्‌--लक्ष्य;निरीक्ष्य--देखकर; या--जो; लीलया--लीला के रूप में; धृत--धारण करने वाले; तनो:--शरीरों के; अनुरूप--संगत;रूपा--जिसके रूप; प्रीत:--प्रसन्न; स्मयनू--हँसते हुए; अलक--बालों के गुच्छे; कुण्डल--कान के आभूषण; निष्क--गलेका आभूषण; कण्ठ--गले में; वकत्र--मुखमंडल; उललसत्‌--चमकता हुआ एवं सुखी; स्मित--हँसी; सुधाम्‌-- अमृत; हरि: --कृष्ण ने; आबभाषे--कहा

ज्योंही भगवान्‌ कृष्ण ने उनका लक्ष्मी के रूप में चिन्तन किया, जो केवल उन्हें ही चाहतीहैं, तो उन्हें मन्द हँसी आ गई।

भगवान्‌ अपनी लीलाएँ करने के लिए नाना रूप धारण करते हैंऔर वे यह सोच कर अत्यन्त प्रसन्न थे कि लक्ष्मी ने जो रूप धारण कर रखा था वह उनकीप्रेयसी होने के अनुरूप था।

उनका मनोहर मुखमण्डल घुँघराले बालों, कुण्डलों, गले में पड़े हारतथा उनकी उज्जवल प्रसन्न मुसकान के अमृत से सुशोभित था।

तब भगवान्‌ ने उनसे इस प्रकारकहा।

श्रीभगवानुवाचराजपुत्रीप्सिता भूपलोकपालविभूतिभि: ।

महानुभावै: श्रीमद्धी रूपौदार्यबलोरजितै: ॥

१०॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; राज-पुत्रि--हे राजकुमारी; ईप्सिता--( तुम्हीं ) अभीष्ट ( थीं ); भू-पैः --राजाओं द्वारा;लोक--लोकों के; पाल--शासकों जैसे; विभूतिभि: --शक्तियों वाले; महा--महान्‌; अनुभावै:--प्रभाव वाले; श्री-मद्धि:--ऐश्वर्यशाली; रूप--सौन्दर्य से युक्त; औदार्य--उदारता; बल--तथा शारीरिक बल; ऊर्जितैः--समन्वित |

भगवान्‌ ने कहा : हे राजकुमारी, तुम्हारे साथ लोकपालों जैसे शक्तिशाली अनेक राजापाणिग्रहण करना चाहते थे।

वे सभी राजनेतिक प्रभाव, सम्पत्ति, सौन्दर्य, उदारता तथा शारीरिकशक्ति से ऊर्जित थे।

ताय्प्राप्तानर्थिनो हित्वा चैद्यादीन्स्मरदुर्मदान्‌ ।

दत्ता क्षात्रा स्वपित्रा च कस्मान्नो ववृषेडसमान्‌ ॥

११॥

तानू--उनको; प्राप्तानू--आये हुए; अर्थिन:--चाहने वालों को; हित्वा--अस्वीकार करके ; चैद्य--शिशुपाल; आदीनू्‌--इत्यादिको; स्मर--कामदेव द्वारा; दर्मदान्‌ू--उन्मत्त; दत्ता--दी गई; भ्रात्रा--तुम्हारे भाई द्वारा; स्व--अपने; पित्रा--पिता द्वारा; च--तथा; कस्मात्‌--क्यों; नः--हमको; ववृषे --तुमने चुना; असमान्‌--असमान।

जब तुम्हें तुम्हारे भाई तथा पिता ने उनको अर्पित कर दिया था, तो फिर तुमने चेदि के राजातथा उन अन्य विवाहार्थियों को क्‍यों अस्वीकार कर दिया जो कामदेव द्वारा उन्मत्त हुए तुम्हारेसमक्ष खड़े थे? तुमने हमें क्‍यों चुना जो रंच-भर भी तुम्हारे समान नहीं हैं ?

राजभ्यो बिभ्यतः सुभ्रु समुद्रं शरणं गतान्‌ ।

बलवद्धिः कृतद्वेषान्प्रायस्त्यक्तनृपासनान्‌ ॥

१२॥

राजभ्य:--राजाओं से; बिभ्यतः-- भयभीत; सु-श्रु--हे सुन्दर भौंहों वाली; समुद्रमू--समुद्र के पास; शरणम्‌--शरण के लिए;गतान्‌ू-गए हुए; बल-वद्द्धिः--बलवानों के प्रति; कृत-द्वेषानू--शत्रुता दिखला चुके हुए; प्रायः--अधिकांशत:ः; त्यक्त--छोड़ाहुआ; नृप--राजा के; आसनान्‌--आसन कोहे सुन्दर भौंहों वाली, इन राजाओं से भयभीत होकर हमने समुद्र में शरण ली।

हमशक्तिशाली व्यक्तियों के शत्रु बन गए और हमने अपने राज सिंहासन को प्राय: त्याग दिया था।

अस्पष्टवर्त्मनाम्पुंसामलोकपथमीयुषाम्‌ ।

आस्थिता: पदवीं सुश्रु प्रायः सीदन्ति योषित: ॥

१३॥

अस्पष्ट--अनिश्चित; वर्त्मनामू--आचरण वाले; पुंसामू-पुरुषों के; अलोक--सामान्य समाज द्वारा अस्वीकार्य; पथम्‌--मार्गको; ईयुषां--ग्रहण करने वाले; आस्थिता:--अनुसरण करते हुए; पदवीम्‌--मार्ग को; सु-श्रु-हे सुन्दर भौंहों वाली; प्राय:--सामान्यतया; सीदन्ति--कष्ट पाती हैं; योषित:--स्त्रियाँ |

हे सुन्दर भौंहों वाली, जब स्त्रियाँ ऐसे पुरुषों के साथ रहती हैं जिनका आचरण अनिश्चितहोता है और जो समाज-सम्मत मार्ग का अनुसरण नहीं करते तो प्राय: उन्हें कष्ट भोगना पड़ता है।

निष्किद्जना वयं शश्चन्निष्किक्ननजनप्रिया: ।

तस्मा त्प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्यमे ॥

१४॥

निष्किज्लनना:--जिनके पास कुछ भी नहीं है; वयम्‌--हम; शश्वत्‌--सदैव; निष्किज्नन-जन--उन्हें, जिनके पास कुछ भी नहीं है;प्रिया: --प्रिय; तस्मात्‌--इसलिए; प्रायेण--प्राय:; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; आढ्या: -- धनी; माम्‌--मुझको; भजन्ति--पूजतेहैं; सु-मध्यमे--हे सुन्दर कटि वाली |

हमारे पास भौतिक सम्पत्ति नहीं है और हम उन्हें ही प्रिय हैं जिनके पास हमारी ही तरह कुछभी नहीं होता।

इसलिए हे सुमध्यमे, धनी लोग शायद ही हमारी पूजा करते हों।

ययोरात्मसमं वित्त जन्मैश्वर्याकृतिर्भव: ।

तयोर्विवाहो मैत्री च नोत्तमाधमयो: क्वचित्‌ ॥

१५॥

ययो:--जिन दो का; आत्म-समम्‌--अपने समान; वित्तमू--सम्पत्ति; जन्म--जन्म; ऐश्वर्य--प्रभाव; आकृति: --तथा शारीरिकस्वरूप; भवः--भावी सनन्‍्तान; तयो:--दोनों का; विवाह: --विवाह; मैत्री--मित्रता; च--तथा; न--नहीं; उत्तम-- श्रेष्ठ का;अधमयो:--तथा निम्न; क्वचित्‌--कभी |

विवाह तथा मैत्री उन दो मनुष्यों के बीच ही उचित होती है जो समान सम्पत्ति, जन्म, प्रभाव,आकृति तथा उत्तम सन्‍्तान की क्षमता वाले हों, किन्तु उत्तम तथा अधम के बीच कभी नहीं।

बैदर्भ्येतदविज्ञाय त्वयादीर्घसमीक्षया ।

वबृता वयं गुणैहीना भिक्षुभि: एलाघिता मुधा ॥

१६॥

वैदर्भि--हे विदर्भ की राजकुमारी; एतत्‌--यह; अविज्ञाय--न जानते हुए; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अदीर्घ-समीक्षया--दूर-दृष्टि केबिना; वृता:--चुना; वयम्‌--हम; गुणैः--सदगुणों से; हीना:--रहित; भिक्षुभि:--भिखारियों द्वारा; शलाघिता:--प्रशंसित;मुधा--मोहवश |

हे वैदर्भी, दूरदर्शी न होने से तुमने इसका विचार नहीं किया और इसीलिए तुमने अपने पतिरूप में हमें चुना है यद्यपि हममें कोई सद्‌गुण नहीं हैं और मुग्ध भिखारी ही हमारी प्रशंसा करतेहैं।

अथात्मनोनुरूपं वै भजस्व क्षत्रियर्षभम्‌ ।

येन त्वमाशिष: सत्या इहामुत्र च लप्स्यसे ॥

१७॥

अथ--अब; आत्मन:--अपने; अनुरूपम्‌--उपयुक्त; बै--निस्सन्देह; भजस्व--स्वीकार करो; क्षत्रिय-ऋषभम्‌--किसी उच्चकोटि के राजवर्ग को; येन--जिससे; त्वमू--तुम; आशिष:--आशाएँ; सत्या:--पूरी हो सकने वाली; इह--इस जीवन में;अमुत्र--अगले जीवन में; च-- भी; लप्स्यसे--प्राप्त करोगी |

अब तुम्हें चाहिए कि अधिक उपयुक्त किसी उच्च कोटि के राजन्य पुरुष को स्वीकार करलो जो तुम्हें इस जीवन तथा अगले जीवन में भी ऐसी प्रत्येक वस्तु को प्राप्त करने में सहायताकर सके, जो तुम चाहती हो।

चैद्यशाल्वजरासन्ध दन्तवक्रादयो नृपा: ।

मम द्विषन्ति वामोरु रुक्मी चापि तवाग्रज: ॥

१८ ॥

चैद्य-शाल्व-जरासन्ध-दन्तवक्र-आदय:ः --चैद्य ( शिशुपाल ), शाल्व, जरासन्ध, दन्तवक्र इत्यादि; नृपा:--राजागण; मम--मुझसे; द्विषन्ति--घृणा करते हैं; वाम-ऊरु--हे सुन्दर जाँघों वाली; रुक्मी--रुक्मी; च अपि-- भी; तव--तुम्हारा; अग्र-जः --बड़ा भाई

हे सुन्दर जांघों वाली भद्गे, शिशुपाल, शाल्व, जरासन्ध तथा दन्तवक्र जैसे सभी राजा मुझसेघृणा करते हैं और उसी तरह तुम्हारा बड़ा भाई रुक्मी भी करता है।

तेषां वीर्यमदान्धानां हप्तानां स्मयनुत्तये ।

आनितासि मया भद्रे तेजोपहरतासताम्‌ ॥

१९॥

तेषाम्‌--उन सबों का; वीर्य--अपनी शक्ति के; मद--नशे से; अन्धानाम्‌--अन्धे हुए; हप्तानामू--घमंडी; स्मय--उहंडता;नुत्तये--दूर करने के लिए; आनिता असि--तुम्हें विवाह में हर लिया गया; मया--मेरे द्वारा; भद्रे--कल्याणी, भद्र महिला;तेज:--बल; उपहरता--हटाते हुए; असताम्‌--दुष्टों के |

इन्हीं राजाओं की उहंडता को दूर करने के लिए ही, हे कल्याणी, मैं तुम्हें हट ले आयाक्योंकि वे सभी शक्ति के मद से अन्धे हो चले थे।

मेरा उद्देश्य दुष्ठों की शक्ति को चूर करना था।

उदासीना वयं नून॑ न स्व्यपत्यार्थकामुका: ।

आत्मलब्ध्यास्महे पूर्णा गेहयोज्योतिरक्रिया: ॥

२०॥

उदासीना:--अन्यमनस्क; वयम्‌--हम; नूनम्‌ू--निस्सन्देह; न--नहीं; स्त्री--पत्लियों; अपत्य--सन्तानों; अर्थ--तथा धन केलिए; कामुकाः--लालसा करते हुए, लोलुप; आत्म-लब्ध्या--आत्मतुष्ट होकर; आस्महे--हम रह रहे हैं; पूर्णा:--पूर्ण;गेहयो:--शरीर तथा घर के प्रति; ज्योतिः--अग्नि की तरह; अक्रिया:--किसी कार्य में न लगे हुए

हम स्त्रियों, बच्चों तथा सम्पत्ति की तनिक भी परवाह नहीं करते।

सदैव आत्मतुष्ट रहते हुएहम शरीर तथा घर के लिए कार्य नहीं करते बल्कि प्रकाश की तरह हम केवल साक्षी रहते हैं।

श्रीशुक उबाचएतावदुक्त्वा भगवानात्मानं वल्‍लभामिव ।

मन्यमानामविएलेषात्तदर्पघ्न उपारमत्‌ ॥

२१॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एतावत्‌--इतना; उक्त्वा--कहकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; आत्मानम्‌--अपनेआप; वललभाम्‌--प्रिया को; इब--सहश; मन्यमानाम्‌--मानते हुए; अविश्लेषात्‌--( उससे ) कभी विलग न होने से; तत्‌--उस; दर्प--धमंड का; घ्नः--विनाश करने वाला; उपारमत्‌--बन्द कर दिया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : रुक्मिणी ने अपने को भगवान्‌ की विशिष्ट प्रिया समझ रखा थाक्योंकि उन्होंने कभी उनका संग नहीं छोड़ा था।

ये बातें कहकर भगवान्‌ ने उनके गर्व को दूरकर दिया और तब बोलना बन्द कर दिया।

इति त्रिलोकेशपतेस्तदात्मनःप्रियस्य देव्यश्रुतपूर्वमप्रियम्‌ ।

आश्रुत्य भीता हृदि जातवेपथु-श्विन्तां दुरन्‍्तां रूदती जगाम ह ॥

२२॥

इति--इस प्रकार; त्रि-लोक--तीनों लोकों के; ईश--स्वामियों के; पतेः--स्वामी के; तदा--तब; आत्मन:-- अपने ही;प्रियस्थ--प्रेमी का; देवी--देवी रुक्मिणी ने; अश्रुत--कभी न सुना गया; पूर्वमू--पहले; अप्रियम्‌--अप्रियता; आश्रुत्य--सुनकर; भीता-- भयभीत; हृदि--अपने हृदय में; जात--उत्पन्न; वेपथु; --कम्पन; चिन्ताम्‌--चिन्ता; दुरन्‍्ताम्‌ू-- भयानक;रुदती--सिसकती; जगाम ह--अनुभव किया।

रुक्मिणीदेवी ने इसके पूर्व कभी भी अपने प्रिय त्रिलोकेश-पति से ऐसी अप्रिय बातें नहींसुनी थीं अतः वे भयभीत हो उठीं।

उनके हृदय में कँपकपी शुरू हो गई और भीषण उद्दिग्नता मेंवे रोने लगीं।

पदा सुजातेन नखारुणश्रीयाभुव॑ लिखन्त्यश्रुभिरज्ञनासितै: ।

आसिज्जती कुड्डू मरूषितौ स्तनौ तस्थावधोमुख्यतिदुःखरुद्धवाक्‌ ॥

२३॥

'पदा--अपने पाँव से; सु-जातेन--अत्यन्त कोमल; नख--नाखूनों के; अरूण--लाल लाल; श्रीया--तेज वाले; भुवम्‌--पृथ्वीको; लिखन्ती--कुरेदती हुई; अश्रुभि:--अपने आँसुओं से; अज्ञन--काजल; असितैः--काले; आसिशञ्ञती--सींचती हुई;कुद्डू म--कुंकुम-चूर्ण से; रूषितौ--लाल; स्तनौ--दोनों स्तन; तस्थौ--शान्त खड़ी हो गईं; अध:--नीचे की ओर; मुखी--मुख किये; अति--अत्यन्त; दुःख--दुख से; रुद्ध--रुकी; वाक्‌ू--वाणी |

वे लाल-लाल चमकीले वाले नाखुनों से युक्त अपने कोमल पाँव से भूमि कुरेदने लगीं औरअपनी आँख में लगे काजल द्वारा काले हुए आँसुओं से कुंकुम के कारण लाल हुए स्तनों कोभिगो दिया।

वे मुख नीचा किये खड़ी रहीं और अत्यधिक शोक से उनकी वाणी अवरुद्ध होगई।

तस्या: सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धे-ईस्ताच्छूलथद्बलयतो व्यजनं पपात ।

देहश्व विक्लवधिय:ः सहसैव मुहान्‌रम्भेव वायुविहतो प्रविकीर्य केशान्‌ ॥

२४॥

तष्या:--उसके; सु-दुःख--अत्यधिक दुख; भय--डर; शोक--तथा शोक से; विनष्ट--नष्ट हुई; बुद्धेः --बुद्दि वाली;हस्तात्‌ू--हाथ से; एलथत्‌--खिसकते हुए; वलयतः --चूड़ियों वाली; व्यजनम्‌--पंखा; पपात--गिर गया; देह:--उसकाशरीर; च--भी; विक्लब--विकल; धिय:--जिसका मन; सहसा एब--सहसा; मुहान्‌ू--मूर्छित हुई; रम्भा--केले के वृक्ष;इब--सहश; वायु--वायु से; विहतः--उखाड़े गये; प्रविकीर्य--बिखराते हुए; केशानू--अपने बाल |

रुक्मिणी का मन दुख, भय तथा शोक से अभिभूत हो गया।

उनकी चूड़ियाँ उनके हाथ सेसरक गईं और उनका पंखा जमीन पर गिर पड़ा।

वे मोहवश सहसा मूछित हो गईं, उनके बालइधर-उधर बिखर गये और उनका शरीर भूमि पर इस तरह गिर गया जिस तरह हवा से उखड़ाहुआ केले का वृक्ष गिर पड़ता है।

तह्दृष्ठा भगवान्कृष्ण: प्रियाया: प्रेमबन्धनम्‌ ।

हास्यप्रौढिमजानन्त्या: करुण: सोन्वकम्पत ॥

२५॥

तत्‌--यह; दृष्टा--देखकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; कृष्ण: --कृष्ण; प्रियाया: --अपनी प्रिया के; प्रेम--शुद्ध ईश प्रेम के;बन्धनम्‌--बन्धन; हास्य--उनके परिहास का; प्रौढिमू--पूर्ण आशय; अजानन्त्या:--न जान सकने वाली; करुण:--दयालु;सः--उन्होंने; अन्बकम्पत--दया का अनुभव किया।

यह देखकर कि उनकी प्रिया उनके प्रेम से इस तरह बँधी हैं, वे उनके तंग करने के पूरेआशय को नहीं समझ सकीं, दयालु भगवान्‌ कृष्ण को उन पर दया आ गई।

पर्यड्भादवरुह्माशु तामुत्थाप्य चतुर्भुज:ः ।

केशान्समुद्य तद्ठक्त्रं प्रामुजत्पदापाणिना ॥

२६॥

पर्यड्ञातू--बिस्तर से; अवरुह्य--उतर कर; आशु--जल्दी से; ताम्‌--उसको; उत्थाप्य--उठाते हुए; चतुर्‌-भुज:--चार भुजाएँप्रदर्शित करते; केशान्‌ू--उसके बालों को; समुहा--ठीक करते; तत्‌--उसके ; वक्त्रमू--मुख को; प्रामृजत्‌--पोंछा; पद्मय-पाणिना--अपने कर-कमल से |

भगवान्‌ तुरन्त बिस्तर से उतर आये।

चार भुजाएँ प्रकट करते हुए उन्होंने उन्हें ( रुक्मिणीको ) उठाया, उनके बाल ठीक-ठाक किए और अपने कर-कमलों से उनका मुख सहलाया।

प्रमृज्या श्रुकले नेत्रे स्‍्तनौ चोपहतौ शुचा ।

आएिलिष्य बाहुना राजननन्यविषयां सतीम्‌ ॥

२७॥

सान्त्वयामास सान्त्वज्ञ: कृपया कृपणां प्रभु: ।

हास्यप्रौढि भ्रमच्चित्तामतदर्हा सतां गति: ॥

२८॥

प्रमूज्य--पोंछकर; अश्रु-कले--आँसुओं से पूरित; नेत्रे--उसकी आँखें; स्तनौ--दो स्तनों को; च--तथा; उपहतौ--बिखरे;शुचा--शोकयुक्त आँसुओं से; अश्लिष्य--उसका आलिंगन करके; बाहुना--अपनी बाँह से; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित );अनन्य--कोई अन्य नहीं; विषयाम्‌--जिसकी इच्छित वस्तु; सतीम्‌--सती को; सान्त्वयाम्‌ आस--सान्त्वना दी; सान्त्व--सान्त्वना विधियों के; ज्ञ:--जानने वाले; कृपया--कृपापूर्वक; कृपणाम्‌--दयनीय; प्रभुः-- भगवान्‌; हास्य--अपने परिहासका; प्रौढि--चतुरता से; भ्रमत्‌ू--मोहित हुए; चित्तामू-चित्त वाले; अतत्‌-अर्हाम्‌--उसके योग्य नहीं; सताम्‌ू--शुद्ध भक्तों का;गति:--गन्तव्य

हे राजन, उनके अश्रुपूरित नेत्रों तथा संताप के आँसुओं से सने हुए उनके स्तनों को पोंछ करअपने भक्तों के लक्ष्य भगवान्‌ ने अपनी सती पत्ती का आलिंगन किया जो एकमात्र उन्हीं कोचाह रही थीं।

सान्त्वना देने की कला में पटु श्रीकृष्ण ने दयनीय रुक्मिणी को मृदुता से ढाढ़सबँधाया जिनका मन भगवान्‌ के चातुरीपूर्ण हास-परिहास से भ्रमित था और जो इस तरह कष्टभोगने के योग्य न थीं।

श्रीभगवानुवाचमा मा वैदर्भ्यसूयेथा जाने त्वां मत्परायणाम्‌ ।

त्वद्बचच: श्रोतुकामेन क्ष्वेल्याचरितमड़ने ॥

२९॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; मा--मत; मा-- मुझसे; वैदर्भि--हे वैदर्भी; असूयेथा: --रुष्ट होओ; जाने--मैं जानता हूँ;त्वामू--तुम; मत्‌--मुझमें; परायणाम्‌--पूर्णतया समर्पित; त्वत्‌--तुम्हारे; बच: --शब्द; श्रोतु--सुनने की; कामेन--इच्छाकरते हुए; क्ष्वेल्या--हँसी में; आचरितम्‌--कार्य किया; अड्डने--हे अंगना (स्त्री )

भगवान्‌ ने कहा : हे वैदर्भी, तुम मुझसे नाराज मत होओ।

मैं जानता हूँ कि तुम पूरी तरहमुझमें समर्पित हो।

हे प्रिय देवी, मैंने तो ठिठोली में ऐसा कहा था क्योंकि मैं सुनना चाहता थाकि तुम कया कहोगी।

मुखं च॒ प्रेमसंरम्भस्फुरिताधरमीक्षितुम्‌ ।

कटाक्षेपारुणापाड़ं सुन्दरभ्रुकुटीतटम्‌ ॥

३०॥

मुखम्‌--मुख; च--तथा; प्रेम--प्रेम के; संरम्भ--कोप से; स्फुरित--हिलते; अधरम्‌--होठों से; ईक्षितुमू--देखने के लिए;कटा--तिरछी चितवन के; क्षेप--फेंके जाने से; अररूण--लाल लाल; अपाडुम्‌--आँखों के कोर; सुन्दर--सुन्दर; भ्रु--भौंहोंका; कुटी--गहराना; तटम्‌--किनारों पर

मैं यह भी चाहता था कि प्रणयकोप में काँपते तुम्हारे अधर, तिरछी चितवनों वाली तुम्हारीआँखों के लाल-लाल कोर तथा क्रोध से तनी तुम्हारी सुन्दर भौंहों की रेखा से युक्त तुम्हारा मुखदेख सकूँ।

अयं हि परमो लाभो गृहेषु गृहमेधिनाम्‌ ।

यन्नमैरीयते याम: प्रियया भीरू भामिनि ॥

३१॥

अयम्‌--यह; हि--निस्सन्देह; परम:--परम; लाभ:--लाभ; गृहेषु--गृहस्थ जीवन में; गृह-मेधिनाम्‌--संसारी गृहस्थों के लिए;यतू--जो; नर्मै:--परिहास से; ईयते--बिताया जाता है; याम: --समय; प्रियया--प्रियतमा के साथ; भीरू--हे डरपोक;भामिनि--हे तुनुकमिजाज |

हे भीरु एवं चंचल, संसारी गृहस्थजन घर में जो सबसे बड़ा आनन्द लूट सकते हैं वह हैअपनी प्रियतमाओं के साथ परिहास करने में बिताया जाने वाला समय।

श्रीशुक उबाचसैवं भगवता राजन्वैदर्भी परिसान्त्विता ।

ज्ञात्वा तत्परिहासोक्ति प्रियत्यागभयं जहौ ॥

३२॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सा--वह; एवम्‌--इस प्रकार; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; राजन्‌--हे राजन;वैदर्भी--महारानी रुक्मिणी; परिसान्त्विता--पूर्णतया सान्त्वना दी गई, समझाई-बुझाई गई; ज्ञात्वा--जान कर; तत्‌--उसके;परिहास--मजाक में कहे गये; उक्तिम्‌--शब्द; प्रिय--अपने प्रेमी द्वारा; त्याग--परित्याग के; भयम्‌-- भय को; जहौ--त्यागदिया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, महारानी वैदर्भी भगवान्‌ द्वारा पूरी तरह परिशान्त करदी गईं और वे यह समझ गईं कि भगवान्‌ ने परिहास में वे शब्द कहे हैं।

इस तरह उनका यह भयजाता रहा कि उनके पति उनका परित्याग कर देंगे।

बभाष ऋषभे पुंसां वीक्षन्ती भगवन्मुखम्‌ ।

सब्रीडहासरूचिरस्निग्धापाड़ेन भारत ॥

३३॥

बभाष--बोली; ऋषभम्‌-- अत्यन्त प्रसिद्ध; पुंसामू-पुरुष से; वीक्षन्ती--देखती हुईं; भगवत्‌-- भगवान्‌ के; मुखम्‌--मुख को;स-ब्रीड--सलज्ज; हास--हँसी से युक्त; रुचिर--आकर्षक; स्निग्ध--स्नेहिल; अपाड्रेन--तथा चितवन से; भारत--हेभरतवंशी ।

हे भरतवंशी, भगवान्‌ के मुख पर अपनी आकर्षक तथा स्नेहिल चितवन डालते हुएरुक्मिणी लज्जा से हँसते हुए नर- श्रेष्ठ भगवान्‌ से इस प्रकार बोलीं।

श्रीरुक्मिण्युवाचनन्वेवमेतदरविन्दविलोचनाह यद्वै भवान्भगवतोसहृशी विभूम्न: ।

व स्वे महिम्न्यभिरतो भगवांस्त्यधीश:क्वाहं गुणप्रकृतिरज्ञगृहीतपादा ॥

३४॥

श्री-रुक्मिणी उवाच-- श्री रुक्मिणी ने कहा; ननु--ठीक है; एवम्‌--ऐसी ही हो; एतत्‌--यह; अरविन्द-विलोचन--हे कमलजैसे नेत्रों वाले; आह--कहा; यत्‌--जो; वै--निस्सन्देह; भवान्‌--आप; भगवतः -- भगवान्‌ के; असहशी--असमान;विभूम्न:--सर्वशक्तिमान से; क्व--कहाँ, तुलना में; स्वे-- अपनी; महिम्नि--महिमा में; अभिरत:-- आनन्द लेते हुए;भगवानू्‌-- भगवान्‌; त्रि--तीन ( मुख्य देवता, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ) के; अधीश:--नियन्ता; क्व--तथा कहाँ; अहम्‌--मैं;गुण--गुणों का; प्रकृति:ः--स्वभाव; अज्ञ--मूर्ख व्यक्तियों द्वारा; गृहीत--पकड़े हुए; पादा--जिनके चरण।

श्री रुक्मिणी ने कहा : हे कमल-नयन, आपने जो कहा है वस्तुतः वह सच है।

मैं सचमुचसर्वशक्तिमान भगवान्‌ के अनुपयुक्त हूँ।

कहाँ तीन प्रमुख देवों के स्वामी एवं अपनी ही महिमा मेंमग्न रहने वाले भगवान्‌ और कहाँ मैं संसारी गुणों वाली स्त्री जिसके चरण मूर्खजन ही पकड़तेहैं?

सत्यं भयादिव गुणेभ्य उरुक्रमान्तःशेते समुद्र उपलम्भनमात्र आत्मा ।

नित्यं कदिन्द्रियगणै: कृतविग्रहस्त्वं त्वत्सेवकैर्नूपपदं विधुतं तमो उन्धम्‌ ॥

३५॥

सत्यमू--सच; भयात्‌-- भय से; इब--मानो; गुणेभ्यः--भौतिक गुणों के; उरुक्रम--हे दिव्य कौशल करने वाले; अन्त: --भीतर; शेते--शयन करते हो; समुद्रे--समुद्र में; उपलम्भन-मात्र:--पूर्ण भिज्ञता; आत्मा--परमात्मा; नित्यमू--सदैव; कत्‌--बुरा; इन्द्रिय-गणै: --समस्त इन्द्रियों के विरुद्ध; कृत-विग्रह: --युद्ध करते हुए; त्वम्‌ू--तुम; त्वत्‌--तुम्हारे; सेवकै :--सेवकोंद्वारा; नृूप--राजा का; पदम्‌--पद; विधुतम्‌--अस्वीकृत, दुत्कारा गया; तम:ः--अंधकार; अन्धम्‌-घना |

हाँ, भगवान्‌ उरुक्रम, आप समुद्र के भीतर शयन करते हैं मानो भौतिक गुणों से भयभीत होंऔर इस तरह आप शुद्ध चेतना में हृदय के भीतर परमात्मा रूप में प्रकट होते हैं।

आप निरन्तरमूर्ख इन्द्रियों के विरुद्ध संघर्ष करते रहते हैं, यहाँ तक कि आपके दास भी अज्ञान के अंधकार मेंले जाने वाले साम्राज्य के अवसर को दुत्कार देते हैं।

त्वत्पादपदामकरन्दजुषां मुनीनांवर्त्मास्फुट्टं खपशुभिर्ननु दुर्विभाव्यम्‌ ।

यस्मादलौकिकमिवेहितमी श्वरस्यभूमंस्तवेहितमथो अनु ये भवन्तम्‌ ॥

३६॥

त्वत्‌-तुम्हारे; पाद--पैरों की; पद्य--कमल जैसे; मकरन्द--मधु, शहद; जुषाम्‌--आस्वादन करने वाले; मुनीनाम्‌--मुनियोंका; वर्त्त--( आपका ) मार्ग; अस्फुटम्--अप्रकट; नृ--मनुष्य रूप में; पशुभि:--पशुओं द्वारा; ननु--निश्चय ही, तब;दुर्विभाव्यमू--समझ पाना असम्भव; यस्मात्‌--क्योंकि; अलौकिकम्‌-- अलौकिक; इब--मानो; ईहितमू--कार्यकलाप;ईश्वरस्थ-- भगवान्‌ के; भूमन्‌--हे सर्वशक्तिमान; तव--तुम्हारे; ईहितम्‌--कार्यकलाप; अथ उ--अतः; अनु--अनुसरण करतेहुए; ये--जो; भवन्तम्‌--आपको

जब आपकी गतिविधियाँ, उन मुनियों के लिए भी अस्पष्ट हैं, जो आपके चरणकमलों केमधु का आस्वादन करते हैं, तो फिर वे निश्चय ही मनुष्यों की समझ में न आने वाली हैं, जोपशुओं जैसा आचरण करते हैं।

और हे सर्वशक्तिमान प्रभु, जिस तरह आपके कार्यकलाप दिव्यहैं उसी तरह आपके अनुयायियों के भी हैं।

निष्किज्ञनो ननु भवान्न यतोस्ति किल्ञिद्‌यस्मै बलिं बलिभुजोपि हरन्त्यजाद्या: ।

न त्वा विदन्त्यसुतृपो उन्‍्तकमाढ्यतान्धा:प्रेष्ठो भवान्बलिभुजामपि तेडपि तुभ्यम्‌ ॥

३७॥

निष्किलज्लन:--सम्पत्तिविहीन; ननु--निस्सन्देह; भवान्‌ू--आप; न--नहीं; यत:--जिसके परे; अस्ति--है; किल्ञित्‌ू--कुछ भी;यस्मै--जिसको; बलिमू-- भेंट; बलि-- भेंट का; भुज: -- भोक्ता; अपि-- भी; हरन्ति--वहन करते हैं; अज-आद्या:--ब्रह्माइत्यादि; न--नहीं; त्वा--तुमको; विदन्ति--जानते हैं; असु-तृप:--शरीर से तुष्ट रहने वाले व्यक्ति; अन्तकम्‌-- मृत्यु के रूप में;आद्यता--सम्पत्ति के अपने पद द्वारा; अन्धा:--अच्धे हुए; प्रेष्ठ;--परम प्रिय; भवान्‌ू--आप; बलि-भुजाम्‌--उपहार के परमभोक्ता के लिए; अपि--भी; ते--वे; अपि-- भी ; तुभ्यम्‌--तुमको ( प्रिय हैं )॥

आपके पास कुछ भी नहीं है क्योंकि आपसे परे कुछ भी नहीं है।

बलि के परम भोक्ता,ब्रह्म तथा अन्य देवता तक आपको नमस्कार करते हैं।

जो लोग अपनी सम्पत्ति से अन्धे हुए रहतेहैं और अपनी इन्द्रियों को तृप्त करने में लीन रहते हैं, वे काल रूप आपको नहीं पहचान पाते।

बलि के भोक्ता देवताओं को आप उसी तरह परम प्रिय हैं जिस तरह कि वे आपको हैं।

त्वं वै समस्तपुरुषार्थभयः फलात्मायद्वा्॒छया सुमतयो विसृजन्ति कृत्स्नम्‌ ।

तेषां विभो समुचितो भवतः समाज:पुंसः स्त्रियाश्न रतयो: सुखदुःखिनोर्न ॥

३८ ॥

त्वमू--तुम; बै--निस्सन्देह; समस्त--सारे; पुरुष--मानव जीवन के; अर्थ--लक्ष्यों से; मयः--युक्त; फल--चरम लक्ष्य के;आत्मा--आत्मा; यत्‌--जिसके लिए; वाउ्छया--इच्छा से; सु-मतयः--बुद्ध्धिमान व्यक्ति; विसृजन्ति--त्याग देते हैं; कृत्समम्‌--हर वस्तु को; तेषामू--उनके लिए; विभो--हे सर्वशक्तिमान; समुचित:--समुचित; भवतः--आपका; समाज:--सान्निध्य;पुंस:--मनुष्य; स्त्रिया:--तथा स्त्री के लिए; च--तथा; रतयो:--विषय-भोग में अनुरक्त; सुख-दुःखिनो:--सुख तथा दुख काअनुभव करने वाले; न--नहीं

आप समस्त मानवीय लक्ष्यों के साकार रूप हैं और आप ही जीवन के अन्तिम लक्ष्य हैं।

हेसर्वशक्तिमान विभु, आपको प्राप्त करने के इच्छुक बुद्धिमान व्यक्ति अन्य सारी वस्तुओं कापरित्याग कर देते हैं।

वे ही आपके सान्निध्य के पात्र हैं, न कि वे स्त्री तथा पुरुष जो पारस्परिकविषय-वासना से उत्पन्न सुख तथा दुख में लीन रहते हैं।

त्वं न्‍्यस्तदण्डमुनिभिर्गदितानुभावआत्मात्मदश्च जगतामिति मे वृतोडसि ।

हित्वा भवदभ्वुव उदीरितकालवेगध्वस्ताशिषोब्जभवनाकपतीन्कुतोन्ये ॥

३९॥

त्वमू--तुम; न्‍्यस्त-- जिन्होंने त्याग दिया है; दण्ड--संन्यासी का दंड; मुनिभि:--मुनियों द्वारा; गदित--कहा गया; अनुभाव:--जिसका पराक्रम; आत्मा--परमात्मा; आत्मा--स्वयं आप; दः--देने वाला; च-- भी; जगताम्‌--सारे जगतों के; इति--इसप्रकार; मे--मेरे द्वारा; वृत:--चुना हुआ; असि--हो; हित्वा--त्याग कर; भवत्‌--आपकी; भ्रुव:--भौंहों से; उदीरित--उत्पन्न;काल--समय के; वेग--वेग से; ध्वस्त--नष्ट- भ्रष्ट आशिष:--जिनकी आशाएँ; अब्ज--कमल से उत्पन्न ( ब्रह्मा )) भव--शिवजी; नाक--स्वर्ग के; पतीन्‌--स्वामियों को; कुतः--तो फिर क्या; अन्ये-ओशथेर्स

यह जानते हुए कि सन्यासियों का दंड त्यागे हुए महामुनि आपके यश का बखान करते हैं,कि आप तीनों जगतों के परमात्मा हैं और आप इतने दानी हैं कि अपने आपको भी दे डालते हैं,मैंने ब्रह्म, शिव तथा स्वर्ग के शासकों को, जिनकी महत्वाकांक्षाएँ आपकी भ्रकुटी से उत्पन्नकाल के वेग से नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं, त्याग कर आपको अपने पति रूप में चुना है।

तो फिरअन्य किसी विवाहार्थी में मेरी क्या रूचि हो सकती थी ?

जाडयं वचस्तव गदाग्रज यस्तु भूपान्‌विद्राव्य शार्ड्निनदेन जहर्थ मां त्वम्‌ ।

सिंहो यथा स्वबलिमीश पशून्स्वभागंतेभ्यो भयाद्यदुदधि शरणं प्रपन्न: ॥

४०॥

जाडबग्रम्‌--मूर्खता; वच:--शब्द; तब--तुम्हारे; गदाग्रज--हे गदाग्रज; य:--जो; तु--भी; भू-पान्‌ू--राजाओं को; विद्राव्य--भगाकर; शार्ड--शार्ड् की, तुम्हारे धनुष की; निनदेन--टंकार से; जहर्थ--ले गये; मामू--मुझको; त्वमू--तुम; सिंह: --सिंह;यथा--जिस तरह; स्व--आपकी; बलिम्‌--बलि, भेंट; ईश-हे प्रभु; पशून्‌ू--पशुओं को; स्व-भागम्‌--अपना भाग;तेभ्य:--उनके; भयात्‌-- भय से; यत्‌--जिसने; उदधिम्‌--समुद्र की; शरणं-प्रपन्न:--शरण ग्रहण की ।

हे प्रभु, जिस तरह सिंह भेंट का अपना उचित भाग लेने के लिए छोटे पशुओं को भगा देताहै उसी तरह आपने अपने शार्ड़् धनुष की टंकार से एकत्रित राजाओं को भगा दिया और फिरमुझे अपने उचित भाग के रूप में अपना बना लिया।

अतः हे गदाग्रज, आपके द्वारा यह कहनानिरी मूर्खता है कि आपने उन राजाओं के भय से समुद्र में शरण ग्रहण की।

यद्वाज्छया नृूपशिखामणयोउनगवैन्य-जायन्तनाहुषगयादय ऐक्यपत्यम्‌ ।

राज्यं विसृज्य विविशुर्वनमम्बुजाक्ष सीदन्ति तेडनुपदवीं त इहास्थिता: किम्‌ ॥

४१॥

यत्‌--जिसके लिए; वाउ्छया--इच्छा से; नृप--राजाओं के; शिखामणय:--मुकुट के मणि; अड्ड-वैन्य-जायन्त-नाहुष-गय-आदयः--अंग ( वेन का पिता ), वैन्य ( वेन का पुत्र, पृथु ), जायन्त ( भरत ), नाहुष ( ययाति ), गय आदि; ऐक्य--एकमात्र;पत्थम्‌-प्रभुसत्ता युक्त, एकछत्र; राज्यमू--उनके राज्य; विसृज्य--त्याग कर; विविशु:--प्रवेश किया; वनम्‌--जंगल में;अम्बुज-अक्ष--हे कमल-नेत्र; सीदन्ति--कष्ट उठाते हैं, हताश होते हैं; ते--तुम्हारे; अनुपदवीम्‌--पथ पर; ते--वे; इह--इसजगत में; आस्थिता:--स्थिर; किमू--क्या।

आपका सात्रिध्य प्राप्त करने की अभिलाषा से अंग, वैन्य, जायन्त, नाहुष, गय तथा अन्यश्रेष्ठ राजाओं ने अपने मरा पूरा साम्राज्य त्याग कर आपकी खोज करने के लिए जंगल में प्रवेशकिया।

हे कमल-नेत्र, भला वे राजा क्योंकर इस जगत में हताश होंगे ?

कान्य॑ श्रयेत तव पादसरोजगन्ध-माप्राय सन्मुखरितं जनतापवर्गम्‌ ।

लक्ष्म्यालयं त्वविगणय्य गुणालयस्यमर्त्या सदोरुभयमर्थविविक्तदृष्टि: ॥

४२॥

का--कौन स्त्री; अन्यम्‌ू--दूसरे पुरुष की; श्रयेत--शरण ग्रहण करेगी; तब--तुम्हारे; पाद--चरण की; सरोज--कमल रूपी;गन्धम्‌ू--सुगन्ध; आधप्राय--सूँघ कर; सत्‌--महान्‌ सन्तों द्वारा; मुखरितम्‌--वर्णित; जनता--सारे लोगों के लिए; अपवर्गम्‌--मोक्ष प्रदान करते हुए; लक्ष्मी--लक्ष्मी का; आलयम्‌--निवासस्थान; तु--लेकिन; अविगणय्य--गम्भीरतापूर्वक न लेकर;गुण--दिव्य गुणों के; आलयस्य-- धाम का; मर्त्या--मर्त्य; सदा--सदैव; उरुू--महान्‌; भयम्‌ू-- भय; अर्थ--स्वार्थ;विविक्त--निश्चित करते हुए; दृष्टि:--दृष्टि

आपके चरणकमलों की सुगन्ध, जिसकी महिमा बड़े बड़े सन्त गाते हैं, लोगों को मोक्षप्रदान करती है और यही लक्ष्मीजी का धाम है।

इस सुगन्ध को सूँघ कर कौन स्त्री होगी जोकिसी अन्य पुरुष की शरण में जायेगी? चूँकि आप दिव्य गुणों के धाम हैं अत: ऐसी कौन-सीमर्त्य स्त्री होगी जो अपने सच्चे स्वार्थ को पहचानने की अन्तर्दष्टि से युक्त होकर उस सुगन्ध काअनादर करेगी और किसी ऐसे पर आश्रित होगी जो सदैव महान्‌ भय से आतंकित रहता हो ?

त॑ त्वानुरूपमभजं जगतामधीश-मात्मानमत्र च परत्र च कामपूरम्‌ ।

स्यान्मे तवाड्प्रिरएणं सृतिभिभ्र॑मन्त्यायो वै भजन्तमुपयात्यनृतापवर्ग: ॥

४३॥

तम्‌--उस; त्वा--आपको ; अनुरूपम्‌--उपयुक्त; अभजमू--मैंने चुना है; जगताम्‌--सारे संसारों के; अधीशम्‌--अनन्तिमस्वामी को; आत्मानम्‌--परमात्मा को; अत्र--इस जीवन में; च--तथा; परत्र--अगले जीवन में; च-- भी; काम--इच्छाओंका; पूरम्‌--पूरा करने वाला; स्यात्‌--वे होयें; मे--मेरे लिए; तव--तुम्हारे; अड्घ्रि:--चरण; अरणम्‌--शरण; सृतिभि:--विविध चक्करों द्वारा ( एक योनि से दूसरी योनि में ); भ्रमन्त्या:-- भ्रमण कर रहे; यः--जो ( चरण ); बै--निस्सन्देह; भजन्तम्‌ू--उनका पूजक, भजन करने वाला; उपयाति--पहुँचते हैं; अनृत--असत्य से; अपवर्ग:--मोक्ष |

चूँकि आप मेरे अनुरूप हैं इसलिए मैंने तीनों जगत के स्वामी तथा परमात्मा आपको ही चुनाहै, जो इस जीवन में तथा अगले जीवन में हमारी इच्छाओं को पूरा करते हैं।

आपके चरण जोअपने उन पूजकों के पास पहुँच कर मोह से मुक्ति दिलाते हैं, जो एक योनि से दूसरी योनि मेंभ्रमण करते रहे हैं, मुझे शरण प्रदान करें।

तस्या: स्युरच्युत नृपा भवतोपदिष्टा:स्त्रीणां गृहेषु खरगोश्वविडालभृत्या: ।

यत्कर्णमूलमन्कर्षण नोपयायाद्‌युष्पत्कथा मृडविरिज्ञसभासु गीता ॥

४४॥

तस्या:--उसके; स्युः--( पतियों को ) होने दो; अच्युत--हे अच्युत कृष्ण; नृपा:--राजा; भवता--आपके द्वारा; उपदिष्टा: --कथित; स्त्रीणाम्‌--स्त्रियों के; गृहेषु--घरों में; खर--गधा; गो--बैल; श्व--कुत्ते; विडाल--बिल्ली; भृत्या:--तथा नौकर;यत्‌--जिसके; कर्ण--कान के; मूलम्‌--आन्तरिक भाग; अरि--आपके शत्रु; कर्षण--हे तंग करने वाले; न--कभी नहीं;उपयायात्‌--पास आते हैं; युष्मत्‌--आपके विषय में; कथा--विचार-विमर्श; मृड--शिव; विरिज्न--तथा ब्रह्म की; सभासु--विद्वानों की मण्डली; गीता--गाया हुआ |

हे अच्युत कृष्ण, आपने जिन-जिन राजाओं के नाम लिये हैं उनमें से हर एक राजा ऐसी स्त्रीका पति बन जाये जिसके कानों ने कभी भी आपकी उस महिमा का श्रवण नहीं किया जो शिवतथा ब्रह्मा की सभाओं में गाई जाती है।

कुछ भी हो ऐसी स्त्रियों के घरों में ये राजा गधों, बैलों,कुत्तों, बिल्लियों तथा नौकरों की तरह रहते हैं।

त्वकश्मश्रुरोमनखकेशपिनद्धमन्त-मांसास्थिरक्तकृमिविट्कफपित्तवातम्‌ ।

जीवच्छवं भजति कान्तमतिर्विमूढाया ते पदाब्जमकरन्दमजिप्रती स्त्री ॥

४५॥

त्वक्‌्--चमड़ी; श्म श्रु-- मूँछें; रोम--रोएँ; नख--नाखुन; केश--तथा सिर के बाल से; पिनद्धम्‌ू--ढके हुए; अन्तः-- भीतर;मांस--मांस; अस्थि--हड्डी; रक्त--खून; कृमि--कीड़े; विटू--मल; कफ--बलगम; पित्त--पित्त; वातमू--तथा वायु;जीवत्‌--जीवित; शवम्‌--मृत शरीर; भजति--पूजा करता है; कान्त--पति या प्रेमी; मतिः--विचार; विमूढा--पूर्णतयामोहग्रस्त; या--जो; ते--तुम्हारे; पद-अब्ज--चरणकमलों का; मकरन्दम्‌--मधु; अजिप्रती--न सूँघते हुए; स्त्री--स्त्री |

जो स्त्री आपके चरणकमलों के मधु की सुगन्धि का आस्वादन करने से वंचित रह जाती है,वह पूरी तरह मूर्ख ( मूढ ) बन कर रह जाती है और चमड़ी, मूँछ, नाखून, बाल तथा रोओं सेढके और माँस, अस्थियों, रक्त, कीट, मल, कफ, पित्त तथा वायु से भरे जीवित शव को पतिया प्रेमी रूप में स्वीकार करती है।

अस्त्वम्बुजाक्ष मम ते चरणानुरागआत्मन्रतस्य मयि चानतिरिक्तदष्टे: ।

हास्य वृद्धय उपात्तरजोतिमात्रोमामीक्षसे तदु ह न: परमानुकम्पा ॥

४६॥

अस्तु--हो; अम्बुज-अक्ष--हे कमल-नयन; मम--मेरा; ते--तुम्हारे; चरण--चरणों के प्रति; अनुराग:--स्थायी आकर्षण;आत्मन्‌--आपमें; रतस्य--आनन्द लेने वाले का; मयि--मेरे प्रति; च--तथा; अनतिरिक्त--अपर्याप्त; दृष्टे:--जिसकी दृष्टि;यहि--जब; अस्य--इस ब्रह्माण्ड की; वृद्धये--वृद्धि के लिए; उपात्त--कल्पना करते हुए; रज:--रजोगुण का; अति-मात्र:--आधिक्य; मामू--मुझ पर; ईक्षसे--आप देखते हैं; तत्‌ू--वह; उ ह--निस्सन्देह; नः--हमारे लिए; परम--सर्वाधिक;अनुकम्पा--कृपा का प्रदर्शन

हे कमल-नयन, यद्यपि आप अपने में तुष्ट रहते हैं जिससे शायद ही कभी मेरी ओर ध्यान देतेहैं, तो भी कृपा करके मुझे अपने चरणकमलों के प्रति स्थायी प्रेम का आशीर्वाद दें।

जब आपब्रह्माण्ड की सृष्टि करने के लिए रजोगुण की प्रधानता धारण करते हैं तभी आप मुझ पर दृष्टिडालते हैं, जो निस्सन्देह मेरे ऊपर आपकी महती कृपा होती है।

नैवालीकमहं मन्ये वचस्ते मधुसूदन ।

अम्बाया एव हि प्रायः कन्याया: स्याद्रति: क्वचित्‌ ॥

४७॥

न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अलीकम्‌--असत्य; अहम्‌--मैं; मन्ये--सोचती हूँ; वचः--शब्दों को; ते--तुम्हारे; मधु-सूदन--हेमधु-हन्ता; अम्बाया:--अम्बा का; एव हि--निश्चय ही; प्रायः--सामान्यतया; कन्याया:--कन्या का; स्यात्‌ू--उत्पन्न हुआ;रतिः--आकर्षण ( शाल्व के प्रति ); क्वचित्‌--एक बार।

हे मधु-सूदन, मैं आपके बचनों को वास्तव में असत्य नहीं मानती।

प्रायः अविवाहितालड़की पुरुष के प्रति आकृष्ट हो जाती है जैसा अम्बा के साथ हुआ।

व्यूढायाश्चापि पुंश्चल्या मनोभ्येति नव॑ नवम्‌ ।

बुधोउसतीं न बिभूयात्तां बिभ्रदुभयच्युत: ॥

४८॥

व्यूढाया:--विवाहित स्त्री का; च--तथा; अपि-- भी; पुंश्चल्या:--पुंश्चली, कुलटा; मनः--मन; अभ्येति--आकृष्ट होता है;नवम्‌ नवम्‌--नये से नये ( प्रेमी ) के प्रति; बुध:--बुद्धिमान; असतीम्‌--कुलटा स्त्री को; न बिप्यात्‌ू--पालन नहीं करनाचाहिए; ताम्‌--उसका; बिभ्रत्‌ू--पालन; उभय--दोनों ( इस लोक में तथा परलोक में ) से; च्युत:--गिरी हुई ॥

कुलटा स्त्री का मन सदैव नवीन प्रेमियों के लिए लालायित रहता है, चाहे वह विवाहिताक्यों न हो।

बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह ऐसी कुलटा स्त्री को अपने साथ न रखे क्योंकियदि वह ऐसा करेगा तो वह इस जीवन में तथा अगले जीवन में सौभाग्य से वंचित रहेगा।

श्रीभगवानुवाचसाध्व्येतच्छोतुकामैस्त्वं राजपुत्री प्रलम्भिता ।

मयोदितं यदन्वात्थ सर्व तत्सत्यमेव हि ॥

४९॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; साध्वि--हे साधु नारी; एतत्‌--यह; श्रोतु--सुनने के लिए; कामै:--( हमारे द्वारा )अभीष्ट; त्वमू-तुम; राज-पुत्रि--हे राजकुमारी; प्रलम्भिता--बेवकूफ बनाई गई; मया--मेरे द्वारा; उदितम्‌--कहे गये; यत्‌--जो; अन्वात्थ--तुमने जिनके उत्तर दिये; सर्वम्‌ू--सभी; तत्‌--वह; सत्यम्‌ू--सही; एव हि--निस्सन्देह

भगवान्‌ ने कहा : हे साध्वी, हे राजकुमारी, हमने तुम्हें इसीलिए झुठलाया क्योंकि हम तुम्हेंइस प्रकार बोलते सुनना चाहते थे।

निस्सन्देह तुमने हमारे बचनों के उत्तर में जो बातें कही हैं, वेएकदम सही हैं।

यान्यान्कामयसे कामान्मय्यकामाय भामिनि ।

सन्ति होकान्तभक्तायास्तव कल्याणि नित्यद्‌ ॥

५०॥

यान्‌ यान्‌--जो जो; कामयसे--कामना करती हो; कामान्‌ू--वरों को; मयि--मुझसे; अकामाय--इच्छा से रहित होने के लिए;भामिनि-हे सुन्दरी; सन्ति--हैं; हि--निस्सन्देह; एक-अन्त--नितान्त; भक्ताया:--भक्तों के लिए; तब--तुम्हारे; कल्याणि--हे'कल्याणी; नित्यदा--सदैव |

हे सुन्दर तथा सुशील स्त्री, तुम भौतिक इच्छाओं से मुक्त होने के लिए जिस भी वर कीआशा रखती हो वे तुम्हारे हैं क्योंकि तुम मेरी अनन्य भक्त हो।

उपलब्ध पतिप्रेम पातिव्रत्यं च तेडनघे ।

यद्वाक्यैश्वाल्यमानाया न धीर्मय्यपकर्षिता ॥

५१॥

उपलब्धम्‌--अनुभूत; पति--पति के लिए; प्रेम--शुद्ध-प्रेम; पाति--पति के प्रति; ब्रत्यमू--सती व्रत का हृढ़ता से पालन; च--तथा; ते--तुम्हारा; अनघे--हे निष्पाप; यत्‌--जो; वाक्यैः --शब्दों से; चाल्यमानाया:--विचलित हुए; न--नहीं; धीः --तुम्हारामन; मयि--मुझमें अनुरक्त; अपकर्षिता--दूर खींचा गया।

हे निष्पाप, अब मैंने तुम्हारा शुद्ध पति-प्रेम तथा पातिब्रत्य देख लिया है।

यद्यपि तुम मेरेबचनों से विचलित थीं किन्तु तुम्हारा मन मुझसे दूर नहीं ले जाया जा सका।

ये मां भजन्ति दाम्पत्ये तपसा ब्रतचर्यया ।

कामात्मानोपवर्गेशं मोहिता मम मायया ॥

५२॥

ये--जो; मामू-- मुझको; भजन्ति--पूजता है; दाम्पत्ये--गृहस्थ जीवन में रहने के लिए; तपसा--तपस्या द्वारा; ब्रत--ब्रतों को;चर्यया--सम्पन्न करके; काम-आत्मान: -- प्रकृति से कामुक विषयी; अपवर्ग--मो क्ष का; ईशम्‌--नियन्ता; मोहिता:-- मोहित;मम--मेरी; मायया-- भ्रामक भौतिक-शक्ति द्वारा

यद्यपि मुझमें आध्यात्मिक मोक्ष प्रदान करने की शक्ति है किन्तु विषयी लोग अपने संसारीगृहस्थ जीवन के लिए मेरा आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तपस्या तथा ब्रतों द्वारा मेरी पूजा करतेहैं।

ऐसे लोग मेरी माया-शक्ति द्वारा मोहग्रस्त रहते हैं।

मां प्राप्य मानिन्यपवर्गसम्पदंवाउ्छन्ति ये सम्पद एव तत्पतिम्‌ ।

ते मन्दभागा निरयेउपि ये नृणांमात्रात्मकत्वात्निरय: सुसड्रम: ॥

५३॥

माम्‌--मुझको; प्राप्प--पाकर; मानिनि--हे प्रेम की आगार; अपवर्ग--मोक्ष का; सम्पदम्‌--कोष; वाउछन्ति--चाहते हैं; ये--जो; सम्पद:ः--( भौतिक ) कोष; एव--केवल; तत्‌--ऐसे; पतिम्‌--पति को; ते--वे; मन्द-भागा: --कम भाग्यशाली;निरये--नरक में; अपि-- भी; ये--जो; नृणाम्‌--मनुष्यों के लिए; मात्रा-आत्मकत्वात्‌--इन्द्रिय-तृप्ति में लीन रहने के कारण;निरय:--नरक; सु-सड़मः --उपयुक्त |

हे मानिनी, अभागे वे हैं, जो मोक्ष तथा भौतिक सम्पदा दोनों ही के स्वामी मुझको पाकर केभी, केवल भौतिक सम्पदा के लिए ही लालायित रहते हैं।

ये सांसारिक लाभ तो नरक में भीपाये जा सकते हैं।

चूँकि ऐसे व्यक्ति इन्द्रिय-तृप्ति में लीन रहते हैं इसलिए नरक ही उनके लिएउपयुक्त स्थान है।

दिष्टद्या गृहे ध्र्यसकृन्मयि त्वयाकृतानुवृत्तिर्भवमोचनी खलै: ।

सुदुष्करासौ सुतरां दुराशिषोछासुंभराया निकृतिं जुषः स्त्रिया: ॥

५४॥

दिछ्या-- भाग्यवश; गृह--घर की; ईश्वरी --स्वामिनी; असकृत्‌--निरन्तर; मयि--मुझमें; त्वया--तुम्हारे द्वारा; कृता--की हुई;अनुवृत्ति:-- श्रद्धापूर्ण सेवा; भव--संसार से; मोचनी--मुक्ति दिलाने वाली; खलै:--ईर्ष्यालुओं के लिए; सु-दुष्कर--करनाअत्यन्त कठिन; असौ--यह; सुतराम्‌--विशेष रूप से; दुराशिष:--दुष्ट मनो भावों वाले; हि--निस्सन्देह; असुम्‌--उसका प्राण;भरायाः--जो ( एकमात्र ) पालन करती है; निकृतिमू--छलावा; जुष:--लिप्त; स्त्रिया:--स्त्री के लिए।

हे गृहस्वामिनी, सौभाग्यवश तुमने मेरी श्रद्धापूर्वक भक्ति की है, जो मनुष्य को संसार सेमुक्त कराती है।

ईर्ष्षालु के लिए यह सेवा अत्यन्त कठिन है, विशेषतया उस स्त्री के लिए जिसकेमनोभाव दूषित हैं और जो शारीरिक शक्षुधा शान्त करने के लिए ही जीवित है और जो छलछठ्म मेंलिप्त रहती है।

न त्वाहशीम्प्रणयिनीं गृहिणीं गृहेषु'पश्यामि मानिनि यया स्वविवाहकाले ।

प्राप्तान्नपान्न विगणय्य रहोहरो मेप्रस्थापितो द्विज उपश्रुतसत्क थस्य ॥

५५॥

न--नहीं; त्वाहशीम्‌--तुम जैसी; प्रणयिनीम्‌--प्रेम करने वाली; गृहिणीम्‌--पत्नी को; गृहेषु--मेंरे आवासों में; पश्यामि--देखता हूँ; मानिनि--हे आदरणीय; यया--जिससे; स्व--अपने; विवाह--विवाह के; काले--समय में; प्राप्तान्‌-- आये हुए;नृपानू--राजाओं को; न विगणय्य--परवाह न करते हुए; रह:ः--गुप्त सन्देश का; हर:--ले जाने वाला; मे--मेरे पास;प्रस्थापित:-- भेजा गया; द्विज:--ब्राह्मण; उपश्रुत--सुनी हुई; सत्‌--सच्ची; कथस्य--जिसके विषय में कथाएँ ।

हे सर्वाधिक आदरणीया, मुझे अपने सारे आवासों में तुम जैसी प्रेम करने वाली अन्य पत्नीढूँढ़े नहीं मिलती।

जब तुम्हारा ब्याह होने वाला था, तो तुमसे विवाह करने के इच्छुक जितनेराजा एकत्र हुए थे उनकी परवाह तुमने नहीं की और क्योंकि तुमने मेरे विषय में प्रामाणिक बातेंही सुन रखी थीं तुमने अपना गुप्त सन्देश एक ब्राह्मण के हाथ मेरे पास भेजा।

भ्रातुर्विरूपकरणं युधि निर्जितस्यप्रोद्नाहपर्वणि च तद्बधमक्षगोष्ठयाम्‌ ।

दुःखं समुत्थमसहो स्मदयोगभीत्यानैवाब्रवी: किमपि तेन वयं जितास्ते ॥

५६॥

भ्रातु:--तुम्हारे भाई का; विरूप-करणम्‌--विरूप किया जाना; युधि--युद्ध में; निर्जितस्थ--पराजित; प्रोद्गाह--विवाहोत्सवका (रुक्मिणी के पौत्र अनिरुद्ध का ); पर्वणि--नियत दिन पर; च--तथा; तत्‌--उसका; वधम्‌--मारा जाना; अक्ष-गोष्ठयाम्‌--द्यूत-क्रीड़ा ( चौसर ) के समय; दुःखम्‌--दुख; समुट्थम्‌--पूर्णरूप से अनुभवी; असहः--असह्ा; अस्मत्‌--हमसे;अयोग--वियोग के; भीत्या-- भय से; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; अब्नवी: --तुमने कहा; किम्‌ अपि--कुछ भी; तेन--उससे;वयम्‌--हम; जिता:--जीते गये; ते--तुम्हारे द्वारा |

जब तुम्हारा भाई युद्ध में पराजित होकर विरूप कर दिया गया और अनिरुद्ध के विवाह केदिन चौसर खेलते समय मार डाला गया तो तुम्हें असहा दुख हुआ।

फिर भी तुमने मुझसे विलगहोने के भय से एक शब्द भी नहीं कहा।

अपनी इस चुप्पी से तुमने मुझे जीत लिया है।

दूतस्त्वयात्मलभने सुविविक्तमन्त्र:प्रस्थापितो मयि चिरायति शून्यमेतत्‌ ।

मत्वा जिहास इदं अड्भमनन्ययोग्यंतिष्ठेत तत्त्वयि वयं प्रतिनन्दयाम: ॥

५७॥

दूतः--दूत; त्वया--तुम्हारे द्वारा; आत्म--मुझको; लभने--प्राप्त करने के लिए; सु-विविक्त--अत्यन्त गोपनीय; मन्त्र:--सलाह; प्रस्थापित: -- भेजा; मयि--जब मैंने; चिरायति--विलम्ब हुआ; शून्यमू--रिक्त; एतत्‌--यह ( संसार ); मत्वा--सोचकर; जिहासे-- तुमने त्यागना चाहा; इृदम्‌--यह; अड्रम्‌--शरीर; अनन्य--किसी दूसरे के लिए नहीं; योग्यम्‌--उपयुक्त;तिष्ठेत--रुक सकता है; तत्‌--वह; त्वयि--तुममें; वयम्‌--हम; प्रतिनन्द-याम:--प्रसन्न होकर उत्तर देते हैं।

जब तुमने अपनी अत्यन्त गुप्त योजना के साथ अपना दूत भेजा था और तब मुझे तुम्हारेपास जाने में विलम्ब हुआ था, तो तुम्हें सारा संसार शून्य जैसा दिखने लगा था और तुम अपनावह शरीर त्यागना चाह रही थी जिसे तुम मेरे अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं दे सकती थी।

तुम्हारी यह महानता सदैव तुममें बनी रहे।

में इसके बदले में तुम्हें तुम्हारी भक्ति के लिए हर्षपूर्वकधन्यवाद देने के अतिरिक्त कर ही क्या सकता हूँ! श्रीशुक उबाचएवं सौरतसंलापैर्भगवान्जगदी श्वरः ।

स्वरतो रमया रेमे नरलोक॑ विडम्बयन्‌ ॥

५८ ॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; सौरत--सुरति सम्बन्धी; संलापैः--बातचीत से; भगवान्‌ --भगवान्‌; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; ईश्वर: -- स्वामी; स्व--अपने में; रत:--आनन्दमग्न; रमया--रमा या लक्ष्मी के साथ ( अर्थात्‌रुक्मिणी के साथ ); रेमे--रमण किया; नर-लोकम्‌--मनुष्यों के संसार का; विडम्बयन्‌-- अनुकरण करते हुए।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह ब्रह्माण्ड के स्वामी आत्माराम भगवान्‌ ने उन्हें प्रेमियोंकी वार्ता में लगाकर और इस तरह मानव समाज की रीतियों का अनुकरण करते हुए लक्ष्मी केसाथ रमण किया।

तथान्यासामपि विभुर्गृहेसु गृहवानिव ।

आस्थितो गृहमेधीयान्धर्मानलोकगुरुहरि: ॥

५९॥

तथा--इसी तरह से; अन्यासाम्‌--अन्यों ( रानियों ) के; अपि-- भी; विभुः--सर्वशक्तिमान भगवान्‌; गृहेषु--घरों में; गृह-वान्‌--गृहस्थ; इब--मानो; आस्थित: --पूरी की गई; गृह-मेधीयान्‌--पवित्र गृहस्थों के; धर्मानू--धार्मिक कर्तव्य; लोक--सारेजगतों के; गुरु:--गुरु; हरिः--कृष्ण ने।

समस्त लोकों के गुरु सर्वशक्तिमान भगवान्‌ हरि ने इसी तरह से अपनी अन्य रानियों केमहलों में गृहस्थ के धार्मिक कृत्य सम्पन्न करते हुए पारम्परिक गृहस्थ की तरह आचरण किया।

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