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अध्याय छह: राक्षसी पूतना का वध
10.6श्रीशुक उबाचनन्दः पथ् बच: शौरेर्न मृषेति विचिन्तयन् ।
हरिं जगामशरणमुत्पातागमशड्धितः ॥
१॥
श्री-शुक: उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; नन्दः--नन्द महाराज ने; पथि--घर आते हुए, रास्ते में; वच:--शब्द;शौरे:--वसुदेव के; न--नहीं; मृषा--निरर्थक; इति--इस प्रकार; विचिन्तयन्-- अपने पुत्र के अशुभ के विषय में सोच कर;हरिम्ू-- भगवान्, नियन्ता की; जगाम--ग्रहण की; शरणम्--शरण; उत्पात--उपद्रवों की; आगम--आशा से; शद्धितः--भयभीत हुए
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्! जब नन्द महाराज घर वापस आ रहे थे तो उन्होंनेविचार किया कि वसुदेव ने जो कुछ कहा था वह असत्य या निरर्थक नहीं हो सकता।
अवश्य हीगोकुल में उत्पातों के होने का कुछ खतरा रहा होगा।
ज्योंही नन्द महाराज ने अपने सुन्दर पुत्रकृष्ण के लिए खतरे के विषय में सोचा त्योंही वे भयभीत हो उठे और उन्होंने परम नियन्ता केचरणकमलों में शरण ली।
कंसेन प्रहिता घोरा पूतना बालघातिनी ।
शिशूंश्चचार निध्नन्ती पुरग्रामत्रजादिषु ॥
२॥
कंसेन--कंस द्वारा; प्रहिता--पहले से लगाई गई; घोरा--अत्यन्त भयानक; पूतना--पूतना नामक; बाल-घातिनी --राक्षसी;शिशून्--छोटे छोटे बच्चों को; चचार--घूमती रहती थी; निध्नन्ती--मारती हुई; पुर-ग्राम-त्रज-आदिषु--नगरों, गाँवों में इधरउधर
जब नन्द महाराज गोकुल लौट रहे थे तो वही विकराल पूतना, जिसे कंस ने बच्चों को मारनेके लिए पहले से नियुक्त कर रखा था, नगरों तथा गाँवों में घूम घूम कर अपना नृशंस कृत्य कररही थी।
न यत्र भ्रवणादीनि रक्षोघ्नानि स्वकर्मसु ।
कुर्वन्ति सात्वतां भर्तुर्यातुधान्यश्व तत्र हि ॥
३॥
न--नहीं; यत्र--जहाँ; श्रवण-आदीनि-- श्रवण, कीर्तन इत्यादि भक्तियोग के कार्य; रक्ष:ः-घ्नानि--समस्त विपदाओं तथाअशुभों को मारने की ध्वनि; स्व-कर्मसु--अपने काम में लगी; कुर्वन्ति--ऐसे कार्य किये जाते हैं; सात्वताम् भर्तु:--भक्तों केरक्षक के; यातुधान्य:--बुरे लोग, उत्पाती; च--भी; तत्र हि--हो न हो |
हे राजन्! जहाँ भी लोग कीर्तन तथा श्रवण द्वारा भक्तिकार्यों की अपनी वृत्तियों में लगे रहतेहैं ( श्रवर्णं कीर्तन विष्णो: ) वहाँ बुरे लोगों से किसी प्रकार का खतरा नहीं रहता।
जब साक्षात्भगवान् वहाँ विद्यमान हों तो गोकुल के विषय में किसी प्रकार की चिन्ता की आवश्यकता नहींथी।
सा खेचर्येकदोत्पत्य पूतना नन्दगोकुलम् ।
योषित्वा माययात्मानं प्राविशत्कामचारिणी ॥
४॥
सा--वह ( पूतना ); खे-चरी--आकाश मार्ग में यात्रा करने वाली; एकदा--एक बार; उत्पत्य--उड़ते हुए; पूतना--पूतना;नन्द-गोकुलम्--नन्द महाराज के स्थान, गोकुल में; योषित्वा--सुन्दर स्त्री का वेश धारण करके; मायया--योगशक्ति से;आत्मानम्--अपने आपको; प्राविशत्-- प्रवेश किया; काम-चारिणी--इच्छानुसार विचरण करने वाली |
एक बार स्वेच्छा से विचरण करने वाली पूतना राक्षसी बाह्य आकाश ( अन्तरिक्ष ) में घूमरही थी तो वह अपनी योगशक्ति से अपने को अति सुन्दर स्त्री के रूप में बदलकर नन्द महाराजके स्थान गोकुल में प्रविष्ट हुई।
तां केशबन्धव्यतिषक्तमल्लिकांबृहन्नितम्बस्तनकृच्छुमध्यमाम् ।
सुवाससं कल्पितकर्ण भूषण-त्विषोल्लसत्कुन्तलमण्डिताननाम् ॥
५॥
वल्गुस्मितापाड्विसर्गवीक्षितै-म॑नो हरन्तीं वनितां ब्रजौकसाम् ।
अमंसताम्भोजकरेण रूपिणींगोष्य: श्रियं द्रष्टमिवागतां पतिम् ॥
६॥
ताम्--उसको; केश-बन्ध-व्यतिषक्त-मल्लिकाम्--जिसके जूड़े मल्लिका के फूलों की मालाओं से सजाये गये थे; बृहत्--बहुत बड़े; नितम्ब-स्तन--अपने कूल्हों तथा दृढ़ स्तनों से; कृच्छु-मध्यमाम्--पतली कमर के भार से नत; सु-वाससम्-- अच्छेवस्त्रों से सज्जित; कल्पित-कर्ण-भूषण--कानों में पहने कुण्डलों की; त्विषा--चमक से; उल्लसत्--अत्यन्त आकर्षक;कुन्तल-मण्डित-आननाम्--काले बालों से घिरे सुन्दर मुखमण्डल वाली; वल्गु-स्मित-अपाडु-विसर्ग-वीक्षितैः --हास्ययुक्तचितवन से; मन: हरन्तीम्--मन को हरती हुईं; बनिताम्ू--अत्यन्त आकर्षक स्त्री ने; त्रज-ओकसाम्--गोकुलवासियों को;अमंसत--सोचा; अम्भोज--कमल लिये हुए; करेण--हाथ से; रूपिणीम्-- अत्यन्त सुन्दर; गोप्य:--गोकुल की रहने वालीगोपियाँ; थ्रियम्ू-- लक्ष्मी; द्रष्टमू--देखने के लिए; इब--मानो; आगताम्--आई हो; पतिमू--पति को।
उसके नितम्ब भारी थे, उसके स्तन सुदृढ़ तथा विशाल थे जिससे उसकी पतली कमर परअधिक बोझ पड़ता प्रतीत हो रहा था।
वह अत्यन्त सुन्दर वस्त्र धारण किये थी।
उसके केशमल्लिका फूल की माला से सुसज्जित थे जो उसके सुन्दर मुख पर बिखरे हुए थे।
उसके कान केकुण्डल चमकीले थे।
वह हर व्यक्ति पर दृष्टि डालते हुए आकर्षक ढंग से मुसका रही थी।
उसकी सुन्दरता ने ब्रज के सारे निवासियों का विशेष रूप से पुरुषों का ध्यान आकृष्ट कर रखाथा।
जब गोपियों ने उसे देखा तो उन्होंने सोचा कि हाथ में कमल का फूल लिए लक्ष्मी जी अपनेपति कृष्ण को देखने आई हैं।
बालग्रहस्तत्र विचिन्वती शिशून्यहच्छया नन्दगृहेउसदन्तकम् ।
बाल प्रतिच्छन्ननिजोरुतेजसंददर्श तल्पेग्निमिवाहितं भसि ॥
७॥
बाल-ग्रह:--डाइन, जिसका काम छोटे-छोटे बच्चों को मारना है; तत्र--वहाँ खड़ी; विचिन्वती--सोचती हुईं, ढूँढती हुई;शिशून्--बालकों के; यहच्छया--स्वतंत्र रूप से; नन्द-गृहे--नन्द महाराज के घर में; असत्-अन्तकम्--सारे असुरों को मारनेमें समर्थ; बालम्--बालक को; प्रतिच्छन्न--ढकी; निज-उरु-तेजसम्--अपनी असीम शक्ति को; दरदर्श--देखा; तल्पे--बिस्तरपर ( लेटा ); अग्निमू-- अग्नि को; इब--सहृश्य; आहितम्--ढकी; भसि--राख के भीतर |
छोटे छोटे बालकों को ढूँढती हुई बच्चों का वध करने वाली पूतना बिना किसी रोकटोकके नन्द महाराज के घर में घुस गई क्योंकि वह भगवान् की परा शक्ति द्वारा भेजी गई थी।
वहकिसी से पूछे बिना नन््द महाराज के उस कमरे में घुस गई जहाँ उसने बालक को ब्िस्तरे पर सोतेदेखा जो राख में ढकी अग्नि के समान असीम शक्ति-सम्पन्न था।
वह समझ गई कि यह बालककोई साधारण बालक नहीं है, अपितु सारे असुरों का वध करने के हेतु आया है।
विबुध्य तां बालकमारिकाग्रहंचराचरात्मा स निमीलितेक्षण: ।
अनन्तमारोपयदड्जूमन्तकयथोरगं सुप्तमबुद्धधिरज्जुधी: ॥
८॥
विब॒ुध्य--समझ कर; ताम्--उसको ( पूतना को ); बालक-मारिका-ग्रहम्--बालकों को मारने में पटु डाइन को; चर-अचर-आत्मा--सर्वव्यापक परमात्मा कृष्ण; सः--उसने; निमीलित-ईक्षण: -- अपनी आँखें बन्द कर लीं; अनन्तम्ू-- असीम;आरोपयत्ू--रख लिया; अड्डम्--अपनी गोद में; अन्तकम्--अपने विनाश के लिए; यथा--जिस तरह; उरगम्--साँप को;सुप्तम्--सोये हुए; अबुद्धधि--बुद्धिहीन व्यक्ति; रज्जु-धी:--साँप को रस्सी समझने वाला |
बिस्तर पर लेटे सर्वव्यापी परमात्मा कृष्ण ने समझ लिया कि छोटे बालकों को मारने में पटुयह डाइन पूतना मुझे मारने आई है।
अतएव उन्होंने अपनी आँखें बन्द कर लीं मानो उससे डरगये हों।
तब पूतना ने अपने विनाश-रूप कृष्ण को अपनी गोद में ले लिया जिस तरह किबुद्धिहीन मनुष्य सोते साँप को रस्सी समझ कर अपनी गोद में ले लेता है।
तां तीक्ष्णचित्तामतिवामचेष्टितांवीक्ष्यान्तरा कोषपरिच्छदासिवत् ।
वरस्त्रियं तत्प्रभया च॒ धर्षितेनिरीक्ष्ममाणे जननी ह्ातिष्ठताम् ॥
९॥
ताम्--उस ( पूतना राक्षसी को ); तीक्ष्ण-चित्तामू--बच्चों का वध करने के लिए अत्यन्त पाषाण हृदय वाली; अति-वाम-चेष्टितामू--यद्यपि वह बच्चे के साथ माता से भी अधिक अच्छा बर्ताव करने का प्रयास कर रही थी; वीक्ष्य अन्तरा--कमरे केभीतर उसे देख कर; कोष-परिच्छद-असि-वत्--मुलायम म्यान के भीतर तेज तलवार की तरह; वर-स्त्रियम्--सुन्दर स्त्री के;ततू-प्रभया--उसके प्रभाव से; च-- भी; धर्षिते-- अभिभूत, विह्नल; निरीक्ष्ममाणे--देख रही थीं; जननी--दोनों माताएँ; हि--निश्चय ही; अतिष्ठताम्ू--वे मौन रह गईं।
पूतना राक्षसी का हृदय कठोर एवं क्रूर था किन्तु ऊपर से वह अत्यन्त स्नेहमयी माता सदृशलग रही थी।
वह मुलायम म्यान के भीतर तेज तलवार जैसी थी।
यद्यपि यशोदा तथा रोहिणी नेउसे कमरे के भीतर देखा किन्तु उसके सौन्दर्य से अभिभूत होने के कारण उन्होंने उसे रोका नहींअपितु वे मौन रह गईं क्योंकि वह बच्चे के साथ मातृवत् व्यवहार कर रही थी।
तस्मिन्स्तनं दुर्जरवीर्यमुल्बणंघोराड्डूमादाय शिशोर्ददावथ ।
गाढं कराभ्यां भगवान्प्रपीड्य ततू-प्राणै: सम॑ं रोषसमन्वितोपिबत् ॥
१०॥
तस्मिन्--उस स्थान में; स्तनम्--स्तन; दुर्जर-वीर्यम्--विष से मिश्रित अत्यन्त शक्तिशाली हथियार; उल्बणम्-- भयंकर;घोरा--अत्यन्त खूँखार पूतना; अड्भमू--अपनी गोद में; आदाय--रखकर; शिशो:--बालक के मुख में; ददौ--दिया; अथ--तत्पश्चात्; गाढम्--अत्यन्त कठोर; कराभ्याम्-दोनों हाथों से; भगवान्-- भगवान्; प्रपीड्य--पीड़ा पहुँचाते हुए; तत्-प्राणै:--उसके प्राण; समम्--के साथ; रोष-समन्वित:--उस पर क्रुद्ध होकर; अपिबत्--स्तनपान किया।
उसी जगह भयानक तथा खूँख्वार राक्षसी ने कृष्ण को अपनी गोद में ले लिया और उनकेमुँह में अपना स्तन दे दिया।
उसके स्तन के चूँचुक में घातक एवं तुरन्त प्रभाव दिखाने वाला विषचुपड़ा हुआ था किन्तु भगवान् कृष्ण उस पर अत्यन्त क्रुद्ध हुए और उसके स्तन को पकड़ करअपने हाथों से कड़ाई से निचोड़ा और विष तथा उसके प्राण दोनों चूस डाले।
सा मुख्ञ मुझ्ञालमिति प्रभाषिणीनिष्पीड्यमानाखिलजीवमर्मणि ।
विवृत्य नेत्रे चरणौ भुजौ मुहुःप्रस्विन्नगात्रा क्षिपती रुरोद ह ॥
११॥
सा--वह ( पूतना ); मुझ्न--छोड़ो; मुझ्न--छोड़ो; अलम्ू--बस! बस!; इति--इस प्रकार; प्रभाषिणी--चिल्लाती;निष्पीड्यमाना--बुरी तरह दबाई जाकर; अखिल-जीव-मर्मणि--सारे मर्मस्थलों में; विवृत्य--खोल कर; नेत्रे--दोनों आँखें;चरणौ--दोनों पाँव; भुजौ--दोनों हाथ; मुहुः--पुनः पुनः; प्रस्विन्न-गात्रा--पसीने से तर शरीर; क्षिपती--फेंकते हुए; रुरोद--जोर से चिल्लाई; ह--निस्सन्देह
प्रत्येक मर्मस्थल में असह्य दबाव से पूतना चिल्ला उठी, ‘मुझे छोड़ दो, मुझे छोड़ दो! अबमेरा स्तनपान मत करो।
पसीने से तर, फटी हुई आँखें तथा हाथ और पैर पटकती हुई वह बार-बार जोर जोर से चिललाने लगी।
तस्याः स्वनेनातिगभीररंहसासाद्रिमही द्यौश्ञ चचाल सग्रहा ।
रसा दिशश्च प्रतिनेदिरि जना:पेतु: क्षितौ वज्ञनिपातशड्डूया ॥
१२॥
तस्या:--विकट राक्षसी पूतना की; स्वनेन-- ध्वनि से; अति--अत्यन्त; गभीर--गहन; रंहसा--शक्तिशाली; स-अद्विः --पर्वतोंसमेत; मही --पृथ्वी; द्यौ: च--तथा आकाश; चचाल--हिलने लगे; स-ग्रहा--तारों समेत; रसा--पृथ्वी लोक के नीचे; दिशःच--तथा सारी दिशाएँ; प्रतिनेदिरि--गूँजने लगीं; जना:--लोग; पेतु:--गिर पड़े; क्षितौ--पृथ्वी पर; बज़ञ-निपात-शड्भूया--इसआशंका से कि वज़पात हुआ है।
पूतना की गहन तथा जोरदार चीत्कार से पर्वतों समेत पृथ्वी तथा ग्रहों समेत आकाशडगमगाने लगा।
नीचे के लोक तथा सारी दिशाएँ थरथरा उठीं और लोग इस आशंका से गिर पड़ेकि उन पर बिजली गिर रही हो।
इशाचरीत्थं व्यधितस्तना व्यसुर्व्यादाय केशांश्वरणौ भुजावषि ।
प्रसार्य गोष्ठे निजरूपमास्थिताबच्नाहतो वृत्र इवापतन्नूप ॥
१३॥
निशा-चरी--राक्षसी ने; इत्थम्--इस तरह; व्यधित-स्तना--स्तन पर दबाब पड़ने से दुखी; व्यसु:--प्राण छोड़ दिया;व्यादाय--मुँह फैला कर; केशान्ू--बालों का गुच्छा; चरणौ--दोनों पाँव; भुजौ--दोनों हाथ; अपि-- भी; प्रसार्य--पसार कर;गोष्ठे--गोचर में; निज-रूपम् आस्थिता--अपने मूल आसुरी रूप में स्थित; बज़ञ-आहतः--इन्द्र के वज्ञ से मरा हुआ; वृत्र:--वृत्रासुउ; इब--सदहृश; अपतत्--गिर पड़ी; नृप--हे राजन्
इस तरह कृष्ण द्वारा स्तन पर दबाव डालने से अत्यन्त व्यधित पूतना ने अपने प्राण त्यागदिये।
हे राजा परीक्षित, वह अपना मुँह फैलाये तथा अपने हाथ, पाँव पसारे और बाल फैलायेअपने मूल राक्षसी रूप में गोचर में गिर पड़ी मानो इन्द्र के बज़ से आहत वृत्रासुर गिरा हो।
अतमानोपि तहेहस्त्रिगव्यूत्यन्तरद्रमान् ।
चूर्णयामास राजेन्द्र महदासीत्तदद्भुतम् ॥
१४॥
पतमानः अपि--गिरते हुए भी; तत्-देह:ः --उसका विशाल शरीर; त्रि-गव्यूति-अन्तर--बारह मील की सीमा के भीतर; द्रुमान् --सारे वृक्षों को; चूर्णयाम् आस--चूर चूर कर दिये; राजेन्द्र--हे राजा परीक्षित; महत् आसीत्--बहुत विशाल था; तत्--वहशरीर; अद्भुतम्ू--तथा अत्यन्त विचित्र
हे राजा परीक्षित, जब पूतना का विशाल शरीर भूमि पर गिरा तो उससे बारह मील के दायरेके सारे वृक्ष चूर चूर हो गये।
अपने विशाल शरीर में प्रकट होने से वह सचमुच असामान्य थी।
ईषामात्रोग्रदंष्टास्यं गिरिकन्दरनासिकम् ।
गण्डशैलस्तनं रौद्रं प्रकीर्णारुणमूर्थजम् ॥
१५॥
अन्धकूपगभीराक्षं पुलिनारोहभीषणम् ।
बद्धसेतुभुजोर्वड्प्रि शून्यतोयह्दोदरम् ॥
१६॥
सन्तत्रसुः सम तद्वीक्ष्य गोपा गोप्य: कलेवरम् ।
पूर्व तु तन्निःस्वनितभिन्नहत्कर्णमस्तका: ॥
१७॥
ईषा-मात्र--हल के फाल की तरह; उग्र-- भयानक; दंप्ट--दाँत; आस्यम्--मुँह के भीतर; गिरि-कन्दर--पर्वत की गुफा केसमान; नासिकम्--नाक के छेद; गण्ड-शैल--पत्थर की बड़ी शिला की तरह; स्तनम्--स्तन; रौद्रमू--अत्यन्त विकराल;प्रकीर्ण--बिखरे हुए; अरुण-मूर्थ-जम्--ताम्र रंग के बालों वाली; अन्ध-कूप-- भूपट्ट कुओं की तरह; गभीर--गहरे; अक्षम्--आँख के गटड्ढे; पुलिल-आरोह-भीषणम्--जिसकी जाँघें नदी के किनारों की तरह भयावनी थीं; बद्ध-सेतु-भुज-उरु-अड्ध्रि--जिसकी भुजाएँ, जाँघें तथा पैर मजबूत बने पुलों के समान थे; शून्य-तोय-हृद-उदरमू--जिसका पेट जलविहीन झील की तरहथा; सन्तत्रसु: स्म--डर गये; तत्--उस; वीक्ष्य--देखकर; गोपा:--सारे ग्वाले; गोप्य:--तथा ग्वालिनें; कलेवरम्--ऐसेविशाल शरीर को; पूर्बम् तु--इसके पहले; ततू-निःस्वनित--उसकी पुकार से; भिन्न--दहले हुए, कटे; हत्ू--जिनके हृदय;कर्ण--कान; मस्तका:--तथा सिर
राक्षसी के मुँह में दाँत हल के फाल ( कुशी ) जैसे थे; उसके नथुने पर्वत-गुफाओं की तरहगहरे थे और उसके स्तन पर्वत से गिरे हुए बड़े बड़े शिलाखण्डों के समान थे।
उसके बिखरे बालताप्र रंग के थे।
उसकी आँखों के गड्ढे गहरे अंधे ( भूषट्ट ) कुँओं जैसे थे, उसकी भयानक जाँचेंनदी के किनारों जैसी थीं; उसके बाजू, टाँगें तथा पाँव बड़े बड़े पुलों की तरह थीं तथा उसकापेट सूखी झील की तरह लग रहा था।
राक्षसी की चीख से ग्वालों तथा उनकी पत्नियों के हृदय,कान तथा सिर पहले ही दहल चुके थे और जब उन्होंने उसके अद्भुत शरीर को देखा तो वे और भी ज्यादा सहम गये।
बालं च तस्या उरसि क्रीडन्तमकुतो भयम् ।
गोप्यस्तूर्ण समभ्येत्य जगृहुर्जातसम्भ्रमा: ॥
१८॥
बालम् च--बालक भी; तस्या:--उस ( पूतना ) के; उरसि--छाती पर; क्रीडन्तम्--खेलने में व्यस्त; अकुतोभयम्--निडरहोकर; गोप्य:--सारी गोपियाँ; तूर्णम्--तुरन्त; समभ्येत्य--पास आकर; जगृहुः--उठा लिया; जात-सम्भ्रमा:--उसी स्नेह केसाथ।
बालक कृष्ण भी निडर होकर पूतना की छाती के ऊपरी भाग पर खेल रहा था और जबगोपियों ने बालक के अदभुत कार्यकलाप को देखा तो उन्होंने अत्यन्त हर्षित होकर आगे बढ़तेहुए उसे उठा लिया।
यशोदारोहिणीभ्यां ता: सम॑ बालस्य सर्वतः ।
रक्षां विदधिरे सम्यग्गोपुच्छभ्रमणादिभि: ॥
१९॥
यशोदा-रोहिणी भ्याम्ू--यशोदा तथा रोहिणी माताओं के साथ जिन्होंने मुख्यतः बालक की चिम्मेदारी ली; ताः--अन्य गोपियाँ;समम्--यशोदा तथा रोहिणी की ही तरह महत्त्वपूर्ण; बालस्थ--बालक के; सर्वतः--सारे खतरों से; रक्षाम्--रक्षा; विदधिरे--सम्पन्न किया; सम्यक्-- भलीभाँति; गो-पुच्छ-भ्रमण-आदिभि:--चँँवर डुला कर ।
तत्पश्चात् माता यशोदा तथा रोहिणी ने अन्य प्रौढ़ गोपियों समेत बालक श्रीकृष्ण की पूर्णसंरक्षण देने के लिए चँवर डुलाया।
गोमूत्रेण स्नापयित्वा पुनर्गोरजसार्भकम् ।
रक्षां चक्रुश्च शकृता द्वादशाड्रेषु नामभि: ॥
२०॥
गो-मूत्रेण--गायों के पेशाब से; स्नापयित्वा--नहला कर; पुनः --फिर से; गो-रजसा--गोधूलि से; अर्भकम्--छोटे बालकको; रक्षाम्--रक्षा; चक्रु:--सम्पन्न किया; च-- भी; शकृता--गोबर से; द्वादश-अड्लेषु--बारह जगहों में ( द्वादश तिलक );नामभी:-- भगवान् का नाम अंकित करके
बालक को गोमूत्र से अच्छी तरह नहलाया गया और फिर गोधूलि से उसको लेप कियागया।
फिर उनके शरीर में बारह अंगों पर, तिलक लगाने की भाँति माथे से शुरु करके, गोबर सेभगवान् के विभिन्न नाम अंकित किये गये।
इस तरह बालक को सुरक्षा प्रदान की गई।
गोप्य: संस्पृष्ठगलिला अड्भेषु करयो: पृथक् ।
न्यस्यात्मन्यथ बालस्य बीजन्यासमकुर्वत ॥
२१॥
गोप्य:--गोपियों ने; संस्पृष्टटसलिला:--जल के प्याले को छूकर तथा पीकर ( आचमन करके ); अड्लेषु--अपने शरीरों पर;करयो:--दोनों हाथों पर; पृथक्--अलग अलग; न्यस्य--मंत्र के अक्षरों को रख कर; आत्मनि--अपने ऊपर; अथ--तब;बालस्य--बालक के; बीज-न्यासम्--मंत्रन्यास की विधि; अकुर्वत--सम्पन्न की |
गोपियों ने सर्वप्रथम अपने दाहिने हाथ से जल का एक घूँट पी कर आचमन किया।
उन्होंनेअपने शरीरों तथा हाथों को न्यास-फमंत्र से शुद्ध बनाया और तब उन्होंने बालक के शरीर को भी उसी मंत्र से परिशुद्ध किया।
अव्यादजोड्प्रि मणिमांस्तव जान्वथोरूयज्ञोच्युतः कटितर्ट जठरं हयास्यः ।
हत्केशवस्त्वदुर ईश इनस्तु कण्ठंविष्णुर्भुजं मुखमुरुक्रम ईश्वर: कम् ॥
२२॥
चकरयग्रतः सहगदो हरिरस्तु पश्चात्त्वत्पार्थयोर्धनुरसी मधुहाजनश्व ।
कोणेषु शद्भु उरुगाय उपर्युपेन्द्रस्तार्श्य: क्षितौ हलधरः पुरुष: समन्तात् ॥
२३॥
अव्यात्--रक्षा करे; अज:-- भगवान् अज; अड्प्रि-- पाँव; मणिमान्-- भगवान् मणिमान; तव--तुम्हारे; जानु--घुटने; अथ--तत्पश्चात्; उरू--जाँचें; यज्ञ:--यज्ञदेव; अच्युत:-- भगवान् अच्युत; कटि-तटम्ू--कमर का ऊपरी हिस्सा; जठरम्--उदर;हयास्य:-- भगवान् हयग्रीव; हत्ू--हृदय; केशवः-- भगवान् केशव; त्वत्--तुम्हारा; उर:ः --वक्षस्थल, सीना; ईशः--परमनियन्ता, भगवान् ईश; इन:--सूर्य देव; तु--लेकिन; कण्ठम्--गला; विष्णु: -- भगवान् विष्णु; भुजम्--बाहें; मुखम्--मुँह; उरुक्रम:-- भगवान् उरुक्रम; ईश्वरःः-- भगवान् ईश्वर; कम्--सिर; चक्री--चक्र धारण करने वाला; अग्रतः--सामने; सह-गदः--गदाधारी; हरि: -- भगवान् हरि; अस्तु--रहता रहे; पश्चात्--पीछे, पीठ पर; त्वतू-पार्श्यो: --तुम्हारी दोनों बगलों में;धनु:-असी--धनुष तथा तलवार धारण करने वाला; मधु-हा--मधु असुर का वध करने वाला; अजन:--विष्णु; च--तथा;कोणेषु--कोनों में; शद्भः --शंखधारी; उरुगाय: --पूजित; उपरि--ऊपर; उपेन्द्र: -- भगवान् उपेन्द्र; ताक्ष्य:--गरुड़; क्षितौ--पृथ्वी पर; हलधर:-- भगवान् हलधर; पुरुष:--परम पुरुष; समन्तात्--सभी दिशाओं में |
( शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित को बतलाया कि गोपियों ने कृष्ण की रक्षा उपयुक्तविधि के अनुसार निम्नलिखित मंत्र द्वारा की )--अज तुम्हारी पाँवों की, मणिमान तुम्हारे घुटनोंकी, यज्ञ तुम्हारी जाँघों की, अच्युत तुम्हारी कमर के ऊपरी भाग की तथा हयग्रीव तुम्हारे उदरकी रक्षा करें।
केशव तुम्हारे हृदय की, ईश तुम्हारे वक्षस्थल की, सूर्यदेव तुम्हारे गले की, विष्णु तुम्हारे भुजाओं की, उरुक्रम तुम्हारे मुँह की तथा ईश्वर तुम्हारे सिर की रक्षा करें।
चक्री आगे से,गदाधारी हरि पीछे से तथा धनुर्धर मधुहा एवं खड़ग् भगवान् विष्णु दोनों ओर से तुम्हारी रक्षाकरें।
शंखधारी उरुगाय समस्त कोणों से तुम्हारी रक्षा करें।
उपेन्द्र ऊपर से, गरुड़ धरती पर तथापरम पुरुष हलधर चारों ओर से तुम्हारी रक्षा करें।
इन्द्रियाणि हृषीकेश: प्राणान्नारायणोवतु ।
श्वेतद्वीपपतिश्षित्तं मनो योगेश्वरोउवतु ॥
२४॥
इन्द्रियाणि --सारी इन्द्रियों को; हषीकेश:--सभी इन्द्रियों के रक्षक भगवान् हषीकेश; प्राणान्--सारे प्राणों को; नारायण: --भगवान् नारायण; अवतु--रक्षा करें; श्वेतद्वीप-पति:-- श्रेतद्वीप के स्वामी, विष्णु; चित्तमू--हृदय को; मन:--मन को;योगेश्वर: -- भगवान् योगेश्वर; अवतु--संरक्षण प्रदान करें।
हृषीकेश तुम्हारी इन्द्रियों की तथा नारायण तुम्हारे प्राणवायु की रक्षा करें।
श्वेतद्वीप के स्वामीतुम्हारे चित्त की तथा योगे श्वर तुम्हारे मन की रक्षा करें।
पृश्निगर्भस्तु ते बुद्धिमात्मानं भगवान्पर: ।
क्रीडन्तं पातु गोविन्द: शयानं पातु माधव: ॥
२५॥
ब्रजन्तमव्याद्वैकुण्ठ आसीन॑ त्वां भ्रिय: पति: ।
भुझानं यज्ञभुक्पातु सर्वग्रहभयड्डरः ॥
२६॥
पृश्निगर्भ:--भगवान् पृश्निगर्भ; तु--निस्सन्देह; ते--तुम्हारी; बुद्धिमू--बुद्धि को; आत्मानम्--आत्मा को; भगवान्-- भगवान;'परः--दिव्य; क्रीडन्तम्--खेलते हुए; पातु--रक्षा करें; गोविन्द: --गोविन्द; शयानम्--सोते समय; पातु--रक्षा करें; माधव: --भगवान् माधव; ब्रजन्तम्--चलते हुए; अव्यात्--रक्षा करें; वैकुण्ठ:-- भगवान् वैकुण्ठ; आसीनम्--बैठे हुए; त्वाम्--तुमको;भ्रिय: पति:ः--लक्ष्मीपति, नारायण; भुझ्जानम्--जीवन का भोग करते हुए; यज्ञभुक्ू--यज्ञभुक; पातु--रक्षा करें; सर्व-ग्रह-भयम्-करः--जो सरे दुष्ट ग्रहों को भय देने वाले |
भगवान् प्रश्निगर्भ तुम्हारी बुद्धि की तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तुम्हारे आत्मा की रक्षाकरें।
तुम्हािरे खेलते समय गोविन्द तथा तुम्हारे सोते समय माधव तुम्हारी रक्षा करें।
भगवान्वैकुण्ठ तुम्हारे चलते समय तथा लक्ष्मीपति नारायण तुम्हारे बैठते समय तुम्हारी रक्षा करें।
इसी तरह भगवान् यज्ञभुक, जिनसे सारे दुष्टग्रह भयभीत रहते हैं तुम्हारे भोग के समय सदैव तुम्हारीरक्षा करें।
डाकिन्यो यातुधान्यश्च कुष्माण्डा येर्भकग्रहा: ।
भूतप्रेतपिशाचाश्व यक्षरक्षोेविनायका: ॥
२७॥
कोटरा रेवती ज्येष्ठा पूतना मातृकादयः ।
उन्मादा ये ह्ापस्मारा देहप्राणेन्द्रियद्रह: ॥
२८ ॥
स्वणदृष्टा महोत्पाता वृद्धा बालग्रहाश्न ये ।
सर्वे नश्यन्तु ते विष्णोर्नामग्रहणभीरव: ॥
२९॥
डाकिन्य: यातुधान्य: च कुष्माण्डा:--डाइनें, चुडैलें, बच्चों की दुश्मनें; ये--जो हैं; अर्भक-ग्रहा: --बच्चों के लिए अशुभनक्षत्रों तुल्य; भूत--दुष्टात्माएँ; प्रेत--प्रेत; पिशाचा:-- भूतों के ही तुल्य दुष्टात्माएँ; च-- भी; यक्ष--यक्षगण; रक्ष:--राक्षसगण;विनायका:--विनायक नाम के; कोटरा--कोटरा नामक; रेवती--रेवती नामक; ज्येष्टा--ज्येष्ठा नामक; पूतना--पूतना नामक;मातृका-आदय: --मातृका इत्यादि दुष्टिनें; उन्मादा:--उन्माद उत्पन्न करने वाली; ये--जो अन्य; हि--निस्सन्देह; अपस्मारा:--स्मृति हानि करने वाली; देह-प्राण-इन्द्रिय--शरीर, प्राण तथा इन्द्रियों को; द्रुह:ः --कष्ट देने वाली; स्वप्न-दृष्टा:--बुरे सपने लानेवाले, दुष्टात्मा; महा-उत्पाता:--महानू् उत्पात मचाने वाले; वृद्धा:--अनुभवी; बाल-ग्रहा: च--तथा बालकों पर आक्रमण करनेवाले; ये--जो; सर्वे--सभी; नश्यन्तु--विनष्ट हों; ते--वे; विष्णो: -- भगवान् विष्णु के; नाम-ग्रहण--नाम लेने से; भीरव: --डर जाते हैं।
डाकिनी, यातुधानी तथा कुष्माण्ड नामक दुष्ट डाइनें बच्चों की सबसे बड़ी शत्रु हैं तथा भूत,प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस तथा विनायक जैसे दुष्टात्माओं के साथ कोटरा, रेवती, ज्येष्ठा, पूतनातथा मातृका जैसी डाइनें भी सदैव शरीर, प्राण तथा इन्द्रियों को कष्ट पहुँचाने के लिए तैयाररहती हैं जिससे स्मृति की हानि, उन्माद तथा बुरे स्वप्न उत्पन्न होते हैं।
वे दुष्ट अनुभवी वृद्धों कीतरह बच्चों के लिए विशेष रूप से भारी उत्पात खड़ा करते हैं।
किन्तु भगवान् विष्णु केनामोच्चार से ही उन्हें नष्ट किया जा सकता है क्योंकि जब भगवान् विष्णु का नाम प्रतिध्वनितहोता है, तो वे सब डर जाते हैं और दूर भाग जाते हैं।
श्रीशुक उबाचइति प्रणयबद्धाभिगोंपीभि: कृतरक्षणम् ।
पाययित्वा स्तनं माता सन्न्यवेशयदात्मजम् ॥
३०॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस तरह; प्रणय-बद्धाभि: --मातृस्नेह से बँधे हुए; गोपीभि:--यशोदाआदि प्रौढ़ गोपियों के द्वारा; कृत-रक्षणम्--बालक की रक्षा करने के लिए सभी उपाय किये गये; पाययित्वा--इसके बादबालक को पिला कर; स्तनम्--स्तन; माता--माता यशोदा ने; सन््यवेशयत्--बिस्तर पर लिटा दिया; आत्मजम्--अपने बेटेको
श्रील शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : माता यशोदा समेत सारी गोपियाँ मातृस्नेह से बँधीहुई थीं।
इस तरह बालक की रक्षा के लिए मंत्रोच्यारण के बाद माता यशोदा ने बच्चे को अपनादूध पिलाया और उसे बिस्तर पर लिटा दिया।
तावन्नन्दादयो गोपा मथुराया ब्र॒जं गता: ।
विलोक्य पूतनादेहं बभूवुरतिविस्मिता: ॥
३१॥
तावत्--तब तक, इस बीच; नन्द-आदय: --नन्द महाराज इत्यादि; गोपा:--सारे ग्वाले; मथुराया: --मथुरा से; ब्रजम्--वृन्दावन; गता:--वापस आ गये; विलोक्य--देखकर; पूतना-देहम्--पूतना के मृत विशाल शरीर को; बभूबुः--हो गये;अति--अत्यन्त; विस्मिता:-- आश्चर्यचकित
तब तक नन्द महाराज समेत सारे ग्वाले मथुरा से लौट आये और जब उन्होंने रास्ते में पूतनाके विशाल काम शरीर को मृत पड़ा देखा तो वे अत्यन्त आश्चर्यच्कित हुए।
नूनं बतर्षि: सज्जञातो योगेशो वा समास सः ।
स एव दृष्टो ह्युत्पातो यदाहानकदुन्दुभि: ॥
३२॥
नूनमू--निश्चय ही; बत--मेरे दोस्तो; ऋषि:--सन््त पुरुष; सज्ञात:--बन गया है; योग-ईशः--योग शक्ति का स्वामी; वा--अथवा; समास--बन गया है; सः--उसने ( वसुदेव ने ); सः--वही; एव--निस्सन्देह; दृष्टः--देखा गया; हि--क्योंकि;उत्पात:--उत्पात; यत्--जो; आह-- भविष्यवाणी की गई; आनकदुन्दुभि:--वसुदेव द्वारा |
नन््द महाराज तथा अन्य ग्वाले चिल्ला पड़े: मित्रो, जान लो कि आनकदुन्दुभि अर्थात्वसुदेव बहुत बड़ा सन्त या योगेश्वर बन चुका है।
अन्यथा वह इस उत्पात को पहले से कैसे देखसकता था और हमसे इसकी भविष्य वाणी कैसे कर सकता था ?
कलेवरं परशुभिश्िछत्त्वा तत्ते ब्रजौकसः ।
दूरे क्षिप्वावयवशो न्यदहन्काष्ठवेष्टितम् ॥
३३॥
कलेवरम्--पूतना के विशाल शरीर को; परशुभि:--कुल्हाड़ियों या फरसों से; छित्तता--खण्ड खण्ड करके; तत्--उस ( शरीरको ); ते--वे सभी; ब्रज-ओकस: --ब्रजवासी; दूरे--बहुत दूर; क्षिप्वा--फेंक कर; अवयवश:--शरीर के विभिन्न खंड;न्यदहन्--जला दिया; काष्ठ-वेष्टितमू--लकड़ी से ढका हुआ।
ब्रजवासियों ने पूतना के शरीर को फरसों से खण्ड खण्ड कर डाला।
फिर उन खण्डों कोदूर फेंक दिया और उन्हें लकड़ी से ढक कर भस्मीभूत कर डाला।
दह्मयमानस्य देहस्य धूमश्चागुरुसौरभ: ।
उत्थितः कृष्णनिर्भुक्तसपद्याहतपाप्मन: ॥
३४॥
दह्ममानस्य--जलाकर क्षार करते समय; देहस्य--पूतना के शरीर का; धूम:--धुँआ; च--तथा; अगुरु-सौरभ:--अगुरु जैसासुगन्धित धुँआ; उत्थित:--शरीर से उठा हुआ; कृष्ण-निर्भुक्त--कृष्ण द्वारा स्तन चूसे जाने से; सपदि--तुरन्त; आहत-पाप्मन: --उसका भौतिक शरीर आध्यात्मिक बन गया अथवा वह भवबन्धन से छूट गया।
चूँकि कृष्ण ने उस राक्षसी पूतना का स्तनपान किया था, इसतरह जब कृष्ण ने उसे मारा तोवह तुरन्त समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो गईं।
उसके सारे पाप स्वतः ही दूर हो गये अतएव जब उसके विशाल शरीर को जलाया जा रहा था, तो उसके शरीर से निकलने वाला धुँआ अगुरुकी सुगन्ध सा महक रहा था।
'पूतना लोकबालघ्नी राक्षसी रुधिराशना ।
जिघांसयापि हरये स्तनं दत्त्वाप सद्गतिम् ॥
३५॥
कि पुनः श्रव्धया भकक््त्या कृष्णाय परमात्मने ।
यच्छन्प्रियतमं किं नु रक्तास्तन्मातरो यथा ॥
३६॥
पूतना--पेशेवर राक्षसी पूतना; लोक-बाल-घ्नी--जो मनुष्यों के बालकों को मार डालती थी; राक्षसी--राक्षसी; रुधिर-अशना--खून की प्यासी; जिघांसया--कृष्ण को मार डालने की इच्छा से ( कृष्ण से ईर्ष्या करने तथा कंस द्वारा आदेश दियेजाने से ); अपि-- भी; हरये -- भगवान् को; स्तनम्ू--अपने स्तन; दत्त्वा-- प्रदान करके; आप--प्राप्त किया; सत्-गतिम्--वैकुण्ठ का सर्वोच्च पद; किमू--क्या कहा जाय; पुन:ः--फिर; अ्रद्धया-- श्रद्धायुत; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; कृष्णाय--कृष्णको; परमात्मने--परम पुरुष; यच्छन्-- भेंट करते हुए; प्रिय-तमम्--अत्यन्त प्रिय; किम्ू--कुछ; नु--निस्सन्देह; रक्ता: --सम्बन्धी; तत्ू-मातर:--कृष्ण की स्नेहमयी माताएँ; यथा--जिस तरह।
पूतना सदा ही मानव शिशुओं के खून की प्यासी रहती थी और इसी अभिलाषा से वहकृष्ण को मारने आई थी।
किन्तु कृष्ण को स्तनपान कराने से उसे सर्वोच्च पद प्राप्त हो गया।
तोभला उनके विषय में क्या कहा जाय जिनमें माताओं के रूप में कृष्ण के लिए सहज भक्ति तथास्नेह था और जिन्होंने अपना स्तनपान कराया या कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु भेंट की थी जैसा किमाताएँ करती रहती हैं।
पदभ्यां भक्तहदिस्थाभ्यां वन्द्याभ्यां लोकवन्दितैः ।
अड् यस्या: समाक्रम्य भगवानपि तत्स्तनम् ॥
३७॥
यातुधान्यपि सा स्वर्गमवाप जननीगतिम् ।
कृष्णभुक्तस्तनक्षीरा: किमु गावोनुमातर: ॥
३८ ॥
पद्भ्यामू--दोनों चरणकमलों से; भक्त-हदि-स्थाभ्याम्ू--जिनके हृदय में भगवान् निरन्तर स्थित रहते हैं; वन्द्याभ्यामू--जिनकीसदैव वन्दना की जानी चाहिए; लोक-वन्दितैः--ब्रह्मा तथा शिव द्वारा, जो तीनों लोकों के वासियों द्वारा प्रशंसित हैं; अड्रम्--शरीर को; यस्या:--जिस ( पूतना ) का; समाक्रम्य--आलिंगन करके; भगवान्-- भगवान्; अपि-- भी; तत्ू-स्तनम्--उस स्तनको; यातुधानी अपि--यद्यपि वह भूतनी थी; सा--उसने; स्वर्गम्--दिव्य धाम को; अवाप--प्राप्त किया; जननी-गतिम्--माताके पद को; कृष्ण- भुक्त-स्तन-क्षीरा:-- चूँकि उनके स्तनों का पान कृष्ण ने किया था; किम् उ--क्या कहा जाय; गाव: --गौवें;अनुमातरः:--माताओं की ही तरह जिन्होंने कृष्ण को अपना स्तन-पान कराया।
भगवान् कृष्ण शुद्ध भक्तों के हृदय में सदैव स्थित रहते हैं और ब्रह्माजी तथा भगवान्शिवजी जैसे पूज्य पुरूषों द्वारा सदैव वन्दनीय हैं।
चूँकि कृष्ण ने पूतना के शरीर का आलिंगनअत्यन्त प्रेमपूर्वकक किया था और भूतनी होते हुए भी उन्होंने उसका स्तनपान किया था इसलिएउसे दिव्य लोक में माता की गति और सर्वोच्च सिद्धि मिली।
तो भला उन गौवों के विषय में क्याकहा जाय जिनका स्तनपान कृष्ण बड़े ही आनन्द से करते थे और जो बड़े ही प्यार से माता केही समान कृष्ण को अपना दूध देती थीं ?
पयांसि यासामपिब्त्पुत्रस्नेहस्नुतान्यलम् ।
भगवान्देवकी पुत्र: कैवल्याद्यखिलप्रद: ॥
३९॥
तासामविरतं कृष्णे कुर्वतीनां सुतेक्षणम् ।
न पुनः कल्पते राजन्संसारोउज्ञानसम्भव: ॥
४०॥
पयांसि--दूध ( शरीर से निकला ); यासाम्ू--उन सबों का; अपिबत्--कृष्ण ने पिया; पुत्र-स्नेह-स्नुतानि--मातृ स्नेह केकारण, न कि बनावटी ढंग से, गोपियों के शरीर से निकला दूध; अलम्--पर्याप्त; भगवान्-- भगवान्; देवकी-पुत्र:--देवकीके पुत्र रूप में प्रकट हुए; कैवल्य-आदि--यथा मुक्ति या ब्रह्म तेज में लीन होना; अखिल-प्रदः--ऐसे समस्त वरों के प्रदाता;तासाम्ू--उन सारी गोपियों का; अविरतम्--निरन्तर; कृष्णे--कृष्ण में; कुर्बतीनाम्--करते हुए; सुत-ईक्षणम्--माता द्वाराअपने शिशु को निहारना; न--कभी नहीं; पुनः:--फिर; कल्पते--कल्पना की जा सकती है; राजन्--हे राजा परीक्षित;संसार: --जन्म-मृत्यु का भौतिक बन्धन; अज्ञान-सम्भव:--सुखी बनने की कामना करने वाले मूर्ख व्यक्तियों द्वारा अनजाने मेंस्वीकृत किया गया।
भगवान् कृष्ण अनेक वरों के प्रदाता हैं जिनमें कैवल्य अर्थात् ब्रह्म तेज में तादात्म्य भीसम्मिलित है।
उन भगवान् के लिए गोपियों ने सदैव मातृ-प्रेम का अनुभव किया और कृष्ण नेपूर्ण संतोष के साथ उनका स्तन-पान किया।
अतएव अपने माता-पुत्र के सम्बन्ध के कारणविविध पारिवारिक कार्यो में संलग्न रहने पर भी किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि अपनाशरीर त्यागने पर वे इस भौतिक जगत में लौट आईं।
कटधूमस्य सौरभ्यमवप्राय ब्रजौकसः ।
किमिदं कुत एवेति वदन्तो त्रजमाययु: ॥
४१॥
कट-धूमस्य--पूतना के शरीर के विभिन्न अंगों के जलने से उत्पन्न धुँए की; सौरभ्यम्--सुगन्धि; अवध्राय--सूँघ कर; ब्रज-ओकसः--दूर दूर के ब्रजवासी; किम् इृदम्ू--यह सुगन्धि कैसी है; कुतः--कहाँ से आ रही है; एब--निस्सन्देह; इति--इसतरह; बदन्तः--बातें करते; ब्रजम्--ब्रज भूमि में; आययु: --पहुँचे ।
पूतना के जलते शरीर से निकले धुँए की सुगन्ध को सूँघ कर दूर दूर के अनेक ब्रजवासी आश्चर्यच्कित थे और पूछ रहे थे, '‘यह सुगन्धि कहाँ से आ रही है?' इस तरह वे उस स्थान तकगये जहाँ पर पूतना का शरीर जलाया जा रहा था।
ते तत्र वर्णितं गोपै: पूतनागमनादिकम् ।
श्रुत्वा तन्निधनं स्वस्ति शिशोश्वासन्सुविस्मिता: ॥
४२॥
ते--आये हुए सारे लोग; तत्र--वहाँ ( नन््द महाराज के राज्य के पड़ोस में ); वर्णितम्--वर्णित; गोपै:--ग्वालों द्वारा; पूतना-आगमन-आदिकम्ू--किस तरह पूतना आई तथा उसने उत्पात मचाया इन सबके विषय में; श्रुत्वा--सुनकर; तत्-निधनम्--तथाउसके मरने के विषय में; स्वस्ति--मंगल हो; शिशो:--बालक का; च--तथा; आसन्--अर्पित किया; सु-विस्मिता:--जो कुछघटा था उससे आश्चर्यच्कित होकर।
जब दूर दूर से आये ब्रजवासियों ने पूरी कथा सुनी कि किस तरह पूतना आई और फिरकृष्ण द्वारा मारी गई तो वे हत्ृप्रभ रह गये और उन्होंने पूतना के मारने के अद्भुत कार्य के लिएउस बालक को आशीर्वाद दिया।
निस्सन्देह नन्द महाराज वसुदेव के अत्यन्त कृतज्ञ थे जिन्होंनेइस घटना को पहले ही देख लिया था।
उन्होंने यह सोचकर वसुदेव को धन्यवाद दिया कि वेकितने अद्भुत हैं।
नन्दः स्वपुत्रमादाय प्रेत्यागतमुदारधी: ।
मूर्ध्युपाप्राय परमां मुदं लेभे कुरूद्वह ॥
४३॥
नन्दः--महाराज नन्द; स्व-पुत्रम् आदाय--अपने पुत्र कृष्ण को अपनी गोद में लेकर; प्रेत्य-आगतम्--मानो कृष्ण मृत्यु के मुखसे लौट आये हों ( कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि बालक ऐसे संकट से बच जाएगा ); उदार-धी:--उदार तथा सरलहोने से; मूर्थिनि--कृष्ण के सिर पर; उपाप्राय--सूँघ कर; परमाम्--सर्वोच्च; मुदम्--शान्ति; लेभे-- प्राप्त किया; कुरु-उद्दद-हेमहाराज परीक्षित।
हे कुरुश्रेष्ठ महाराज परीक्षित, नन््द महाराज अत्यन्त उदार एवं सरल स्वभाव के थे।
उन्होंनेतुरन्त अपने पुत्र कृष्ण को अपनी गोद में उठा लिया मानो कृष्ण मृत्यु के मुख से लौटे हों औरअपने पुत्र के सिर को सूँघ कर निस्सन्देह दिव्य आनन्द का अनुभव किया।
य एतत्पूतनामोक्षं कृष्णस्यार्भकमद्भुतम् ।
श्रृणुयाच्छुद्धया मर्त्यों गोविन्दे लभते रतिम् ॥
४४॥
यः--जो कोई; एतत्--यह; पूतना-मोक्षम्--पूतना का मोक्ष; कृष्णस्य--कृष्ण का; आर्भकम्--बाल-लीला; अद्भुतम्--अद्भुत; श्रूणुयात्--सुने; श्रद्धया-- श्रद्धा तथा भक्ति पूर्वक; मर्त्य:--इस लोक का कोई भी व्यक्ति; गोविन्दे--आदि पुरुषगोविन्द के प्रति; लभते--पाता है; रतिम्--अनुरक्ति
जो कोई भी भगवान् कृष्ण द्वारा पूतना के मारे जाने के विषय में श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वकश्रवण करता है और कृष्ण की ऐसी बाल लीलाओं के सुनने में अपने को लगाता है उसे निश्चयही आदि पुरुष रूप गोविन्द के प्रति अनुरक्ति प्राप्त होती है।
