← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय सात: राक्षस तृणावर्त का वध

10.7श्रीराजोबाचयेन येनावतारेण भगवान्हरिरीश्वरः ।

करोति कर्णरम्याणि मनोज्ञानि च नः प्रभो ॥

१॥

यच्छुण्वतोपैत्यरतिर्वितृष्णासत्त्वं च शुद्धब॒त्यचिरेण पुंसः ।

भक्तिईरौ तत्पुरुषे च सख्यंतदेव हारं बद मन्यसे चेत्‌ ॥

२॥

श्री-राजा उवाच--राजा ने ( शुकदेव गोस्वामी से ) पूछा; येन येन अवतारेण--जिन जिन अवतारों के द्वारा प्रदर्शित लीलाएँ;भगवानू्‌-- भगवान्‌; हरिः-- हरि; ईश्वर: --नियन्ता; करोति-- प्रस्तुत करता है; कर्ण-रम्याणि--कानों को सुनने में सुखद; मनः-ज्ञानि--मन के लिए आकर्षक; च--भी; न:--हम सबों के; प्रभो--हे प्रभु, शुकदेव गोस्वामी; यत्‌-श्रुण्वतः--इन कथाओं कोसुनने वाले का; अपैति--दूर हो जाता है; अरतिः--अनाकर्षण; वितृष्णा--मन के भीतर का मैल जो हमें कृष्णभावनामृत मेंअरूचि उत्पन्न कराता है; सत्त्वम्‌ च--हृदय के भीतर अस्तित्व; शुद्धयति--शुद्ध बनाता है; अचिरिण--तुरन्त; पुंस:--किसी भीव्यक्ति का; भक्ति: हरौ-- भगवान्‌ के प्रति भक्ति; ततू-पुरुषे--वैष्णवों के साथ; च-- भी; सख्यम्‌--संगति के लिए आकर्षण;तत्‌ एब--केवल वह; हारम्‌-- भगवान्‌ के कार्यकलाप जिन्हें सुनना चाहिये और गले में माला के समान रखना चाहिए; वद--कृपा करके कहें; मन्यसे--आप उचित समझते हैं; चेत्‌--यदि।

राजा परीक्षित ने कहा : हे प्रभु शुकदेव गोस्वामी, भगवान्‌ के अवतारों द्वारा प्रदर्शित विविधलीलाएँ निश्चित रूप से कानों को तथा मन को सुहावनी लगने वाली हैं।

इन लीलाओं केश्रवणमात्र से मनुष्य के मन का मैल तत्क्षण धुल जाता है।

सामान्यतया हम भगवान्‌ कीलीलाओं को सुनने में आनाकानी करते हैं किन्तु कृष्ण की बाल-लीलाएँ इतनी आकर्षक हैं किवे स्वतःही मन तथा कानों को सुहावनी लगती हैं।

इस तरह भौतिक वस्तुओं के विषय में सुननेकी अनुरक्ति, जो भवबन्धन का मूल कारण है, समाप्त हो जाती है।

मनुष्य में धीरे धीरे भगवान्‌के प्रति भक्ति एवं अनुरक्ति उत्पन्न होती है और भक्तों के साथ जो हमें कृष्णभावनामृत कायोगदान देते हैं, मैत्री बढ़ती है।

यदि आप उचित समझते हैं, तो कृपा करके भगवान्‌ की इनलीलाओं के विषय में कहें।

अथान्यदपि कृष्णस्य तोकाचरितमद्भुतम्‌ ।

मानुषं लोकमासाद्य तज्जातिमनुरुन्धतः ॥

३॥

अथ--भी; अन्यत्‌ अपि--अन्य लीलाएँ भी; कृष्णस्य--बालक कृष्ण की; तोक-आचरितम्‌ अद्भुतम्‌ू--वे भी अद्भुत बाल-लीलाएँ; मानुषम्‌--मानो मानवी बालक हों; लोकम्‌ आसाद्य--इस पृथ्वीलोक में मानव समाज में प्रकट होकर; तत्‌-जातिम्‌--मानवी बालक की ही तरह; अनुरुन्धतः--अनुकरण किया कृपया

भगवान्‌ कृष्ण की अन्य लीलाओं का वर्णन करें जो मानवी बालक का अनुकरणकरके और पूतना वध जैसे अद्भुत कार्यकलाप करते हुए इस पृथ्वी-लोक में प्रकट हुए।

श्रीशुक उबाचकदाचिदौत्थानिककौतुकाप्लवेजन्मर्क्षयोगे समवेतयोषिताम्‌ ।

वादित्रगीतद्विजमन्त्रवाचकै -श्वकार सूनोरभिषेचनं सती ॥

४॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी आगे बोलते गये; कदाचित्‌--उस समय ( जब कृष्ण तीन मास के थे ); औत्थानिक-कौतुक-आप्लवे--जब कृष्ण ३-४ मास के थे तो उनका शरीर बढ़ रहा था और वे इधर-उधर पलटने का प्रयास कर रहे थे तोइस अवसर पर स्नानोत्सव मनाया गया; जन्म-ऋक्ष-योगे--उस समय चन्द्रमा तथा शुभ नक्षत्र रोहिणी का संयोग था; समवेत-योषिताम्‌--एकत्र स्त्रियों के बीच ( यह उत्सव मनाया गया ); वादित्र-गीत--नाना प्रकार का संगीत तथा गायन; द्विज-मन्त्र-वाचकै:--योग्य ब्राह्मणों द्वारा वैदिक स्तोत्रों के उच्चारण के साथ; चकार--सम्पन्न किया; सूनो:--अपने पुत्र का;अभिषेचनम्‌--स्नान उत्सव; सती--माता यशोदा ने |

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : जब यशोदा का नन्‍्हा शिशु उठने तथा करवट बदलने काप्रयत्त करने लगा तो वैदिक उत्सव मनाया गया।

ऐसे उत्सव में, जिसे उत्थान कहा जाता है औरजो बालक द्वारा घर से पहली बार बाहर निकलने के अवसर पर मनाया जाता है, बालक कोठीक से नहलाया जाता है।

जब कृष्ण तीन मास के पूरे हुए तो माता यशोदा ने पड़ोस की अन्यऔरतों के साथ इस उत्सव को मनाया।

उस दिन चन्द्रमा तथा रोहिणी नक्षत्र का योग था।

इसमहोत्सव को माता यशोदा ने ब्राह्मणों द्वारा वैदिक मन्त्र के उच्चारण तथा पेशेवर गायकों केसहयोग से सम्पन्न किया।

नन्दस्य पत्नी कृतमजनादिकंविप्रैः कृतस्वस्त्ययनं सुपूजितै: ।

अन्नाद्यवासःस्त्रगभीष्ट धेनुभिःसम्जातनिद्राक्षमशीशयच्छने: ॥

५॥

नन्दस्य--नन्द महाराज की; पत्नी--पत्नी ( यशोदा ); कृत-मज्न-आदिकम्‌--जब वे तथा घर के अन्य लोग नहा चुके औरबालक को भी नहला दिया गया उसके बाद; विप्रैः--ब्राह्मणों के द्वारा; कृत-स्वस्त्ययनम्‌--शुभ वैदिक मंत्रों के पाठ करने मेंलगाकर; सु-पूजितैः--जिनका ठीक से स्वागत तथा पूजन किया गया; अन्न-आद्य--न्‍्हें पर्याप्त अनाज तथा अन्य भोज्य वस्तुएँदेकर; वास:--वस्त्र; स्रकू-अभीष्ट-धेनुभि:-- फूलों की मालाएँ तथा उपयुक्त गौवें भेंट करके; सज्ञात-निद्रा--उनींदी; अक्षम्‌--आँखें; अशीशयत्‌--बच्चे को लिटा दिया; शनैः --उस समय ।

बच्चे का स्नान उत्सव पूरा हो जाने के बाद माता यशोदा ने ब्राह्मणों का स्वागत किया औरउनको प्रचुर अन्न तथा अन्य भोज्य पदार्थ, वस्त्र, वांछित गौवें तथा मालाएँ भेंट करके उनकीउचित सम्मान के साथ पूजा की।

ब्राह्मणों ने इस शुभ उत्सव पर उचित रीति से वैदिक मंत्र पढ़े।

जब मंत्रोच्चार समाप्त हुआ और माता यशोदा ने देखा कि बालक उनींदा हो रहा है, तो वे उसेलेकर बिस्तर पर तब तक लेटी रहीं जब तक वह शान्त होकर सो नहीं गया।

औत्थानिकौत्सुक्यमना मनस्विनीसमागतान्पूजयती व्रजौकसः ।

नैवाश्रुणोद्वै रुदितं सुतस्य सारुदन्स्तनार्थी चरणावुदक्षिपत्‌ ॥

६॥

औत्थानिक-औत्सुक्य-मना:--माता यशोदा बच्चे का उत्थान उत्सव मनाने में अत्यधिक व्यस्त थीं; मनस्विनी-- भोजन, वस्त्र,आभूषण तथा गौवें बाँटने में अत्यन्त उदार; समागतानू--एकत्र मेहमानों को; पूजयती--उन्हें तुष्ट करने के लिए; ब्रज-ओकसः--्रजवासियों को; न--नहीं; एव--निश्चय ही; अश्रुणोत्‌--सुना; वै--निस्सन्देह; रुदितम्‌--रोना; सुतस्य--बच्चे का;सा--यशोदा; रुदन्‌ू--रोना; स्तन-अर्थी --कृष्ण जो माता के स्तन का दूध पीना चाह रहे थे; चरणौ उदक्षिपत्‌--क्रो ध के मारेअपने दोनों पाँव इधर-उधर उछाल रहे थे।

उत्थान उत्सव मनाने में मग्न उदार माता यशोदा मेहमानों का स्वागत करने, आदर-सहितउनकी पूजा करने तथा उन्हें वस्त्र, गौवें, मालाएँ और अन्न भेंट करने में अत्यधिक व्यस्त थीं।

अतः वे बालक के रोने को नहीं सुन पाईं।

उस समय बालक कृष्ण अपनी माता का दूध पीनाचाहता था अतः क्रोध में आकर वह अपने पाँव ऊपर की ओर उछालने लगा।

अधःशयानस्य शिशोरनोउल्पक-प्रवालमृद्वडप्रिहतं व्यवर्तत ।

विध्वस्तनानारसकुप्यभाजनंव्यत्यस्तचक्राक्षविभिन्नकूबरम्‌ ॥

७॥

अधः:-शयानस्य- गाड़ी ( छकड़े ) के नीचे सोये; शिशो:--बालक का; अन:-गाड़ी; अल्पक-- अधिक बड़ा नहीं; प्रवाल--नई पत्ती की तरह; मृदु-अद्धप्रि-हतम्‌--उनके सुन्दर मुलायम पाँवों से मारी गई; व्यवर्तत--उलट कर गिर गई; विध्वस्त--बिखरगई; नाना-रस-कुप्य-भाजनम्‌--धातुओं के बने बर्तन-भांडे; व्यत्यस्त--इधर-उधर हटे हुए; चक्र-अक्ष--दोनों पहिये तथा धुरी;विभिन्न--टूटे हुए; कूबरम्‌--शकट का कूबर ( लट्ठा ), जिसमें जुआ लगा रहता है।

श्रीकृष्ण आँगन के एक कोने में छकड़े के नीचे लेटे हुए थे और यद्यपि उनके पाँव कोंपलोंकी तरह कोमल थे किन्तु जब उन्होंने अपने पाँवों से छकड़े पर लात मारी तो वह भड़भड़ा करउलटने से टूट-फूट गया।

पहिए धुरे से विलग हो गये और बिखर गये और गाड़ी का लट्ठा टूटगया।

इस गाड़ी पर रखे सब छोटे-छोटे धातु के बर्तन-भांडे इधर-उधर छितरा गये।

इृष्टा यशोदाप्रमुखा व्रजस्त्रियऔत्थानिके कर्मणि या: समागता: ।

नन्दादयश्चाद्धुतदर्शनाकुला:कथं स्वयं वै श॒कटं विपर्यगात्‌ ॥

८॥

इृष्ठा-- देखकर; यशोदा-प्रमुखा: --माता यशोदा इत्यादि; ब्रज-स्त्रिय:--व्रज की सारी स्त्रियाँ; औत्थानिके कर्मीण--उत्थानउत्सव मनाते समय; या:--जो; समागता: --वहाँ एकत्र हुए; नन्द-आदय: च--तथा नन्द महाराज इत्यादि सारे पुरुष; अद्भुत-दर्शन--अद्भुत विपत्ति देखकर ( कि लदी हुईं गाड़ी बच्चे के ऊपर टूट कर गिर गई थी फिर भी बालक के चोट नहीं आईंथी ); आकुला:--अत्यन्त विचलित थे कि यह सब कैसे घटित हो गया; कथम्‌--कैसे; स्वयम्‌--अपने से; बै--निस्सन्देह;शकटम्‌--छकड़ा; विपर्यगात्‌--बुरी तरह क्षत-विक्षत हो गया।

जब यशोदा तथा उत्थान उत्सव के अवसर पर जुटी स्त्रियों तथा नन्‍्द महाराज इत्यादि सभीपुरुषों ने यह अद्भुत दृश्य देखा तो वे आश्चर्य करने लगे कि यह छकड़ा किस तरह अपने आपचूर चूर हो गया है।

वे इसका कारण ढूँढने के लिए इधर-उधर घूमने लगे किन्तु कुछ भी तय नकर पाये।

ऊचुरव्यवसितमतीन्गोपान्गोपीश्ष बालका: ।

रुदतानेन पादेन क्षिप्तमेतन्न संशय: ॥

९॥

ऊचु:--कहा; अव्यवसित-मतीन्‌--वर्तमान स्थिति में जिनकी बुद्धि काम नहीं कर रही थी; गोपान्‌-ग्वालों को; गोपी: च--तथा गोपियों को; बालकाः--बच्चे; रुदता अनेन--ज्योंही बच्चा रोया; पादेन--एक पाँव से; क्षिप्तम्‌ एतत्‌--यह गाड़ी दूर जागिरी और छितर-बितर हो गई; न संशयः--इसमें कोई सन्देह नहीं है।

वहाँ पर जुटे ग्वाले तथा गोपियाँ सोचने लगे कि यह घटना कैसे घटी ? वे पूछने लगे,’कहीं यह किसी असुर या अशुभ ग्रह का काम तो नहीं है?' उस समय वहाँ पर उपस्थितबालकों ने स्पष्ट कहा कि बालक कृष्ण ने ही इस छकड़े को लात से मार कर दूर फेंका है।

रोतेबालक ने ज्योंही छकड़े के पहिये पर अपने पाँव मारे त्योंही पहिये सहित छकड़ा ध्वस्त हो गया।

इसमें कोई सन्देह नहीं है।

न ते भ्रददधिरि गोपा बालभाषितमित्युत ।

अप्रमेयं बल॑ तस्य बालकस्य न ते विदुः ॥

१०॥

न--नहीं; ते--उन; श्रद्धधिरि--विश्वास किया; गोपा:--ग्वाले तथा गोपियों ने; बाल-भाषितम्‌--एकत्र बालकों की बचकानाबात पर; इति उत--इस तरह कहा गया; अप्रमेयम्‌--असीम, अचिन्त्य; बलम्‌ू--शक्ति; तस्थ बालकस्य--उस छोटे-से बालककृष्ण की; न--नहीं; ते--वे, गोप तथा गोपियाँ; विदु:--अवगत थे।

वहाँ एकत्र गोपियों तथा गोपों को यह विश्वास नहीं हुआ कि बालक कृष्ण में इतनीअचिन्त्य शक्ति हो सकती है क्योंकि वे इस तथ्य से अवगत नहीं थे कि कृष्ण सदैव असीम हैं।

उन्हें बालकों की बातों पर विश्वास नहीं हुआ अतएव उन्हें बच्चों की भोली-भाली बातें जानकर,उन्होंने उनकी उपेक्षा की।

रुदन्तं सुतमादाय यशोदा ग्रहशद्धिता ।

कृतस्वस्त्ययनं विप्रै: सूक्ते: स्‍्तनमपाययत्‌ ॥

११॥

रुदन्तम्‌--रोता हुआ; सुतम्‌--पुत्र को; आदाय--उठाकर; यशोदा--माता यशोदा ने; ग्रह-शद्लिता--बुरे ग्रह से भयभीत; कृत-स्वस्त्ययनम्‌-तुरन्त ही सौभाग्य के लिए अनुष्ठान किया; विप्रैः--ब्राह्मणों को बुलाकर; सूक्तै:--बैदिक स्तुतियों द्वारा;स्तनम्‌--अपना स्तन; अपाययत्‌--बच्चे को पिलाया।

यह सोच कर कि कृष्ण पर किसी अशुभ ग्रह का आक्रमण हुआ है, माता यशोदा ने रोतेबालक को उठा लिया और उसे अपना स्तन-पान कराया।

तब उन्होंने वैदिक स्तुतियों काउच्चारण करने के लिए तथा शुभ अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिए अनुभवी ब्राह्मणों को बुलाभेजा।

पूर्ववत्स्थापितं गोपैबलिभि: सपरिच्छदम्‌ ।

विप्रा ह॒त्वार्चयां चक्रुर्दध्यक्षतकुशाम्बुभि: ॥

१२॥

पूर्व -बत्‌--जिस तरह छकड़ा पहले रखा था; स्थापितम्‌--फिर से बर्तन-भांडे सजा कर; गोपै:--ग्वालों द्वारा; बलिभि:--बली,बलवान; स-परिच्छदम्‌--सारे साज-सामान सहित; विप्रा:--ब्राह्मणों ने; हुत्वा--अग्नि उत्सव करके ; अर्चयाम्‌ चक्र: --अनुष्ठानसम्पन्न किया; दधि--दही; अक्षत--चावल; कुश--कुश घास; अम्बुभि:--जल से |

जब बलिष्ठ गठीले ग्वालों ने बर्तन-भांडे तथा अन्य सामग्री को छकड़े के ऊपर पहले कीभाँति व्यवस्थित कर दिया, तो ब्राह्मणों ने बुरे ग्रह को शान्त करने के लिए अग्नि-यज्ञ काअनुष्ठान किया और तब चावल, कुश, जल तथा दही से भगवान्‌ की पूजा की।

येउसूयानृतदम्भेर्षाहिंसामानविवर्जिता: ।

न तेषां सत्यशीलानामाशिषो विफला: कृता: ॥

१३॥

इति बालकमादाय सामर्ग्यजुरुपाकृतैः ।

जले: पवित्रौषधिभिरभिषिच्य द्विजोत्तमै: ॥

१४॥

वाचयित्वा स्वस्त्ययनं नन्दगोप: समाहित: ।

हुत्वा चारिन द्विजातिभ्य: प्रादादन्न॑ महागुणम्‌ ॥

१५॥

ये--जो ब्राह्मण; असूय--असूया; अनृत--झूठ; दम्भ--मिथ्या अहंकार; ईर्षा--ईर्ष्या; हिंसा--अन्यों के वैभव को देखकरविचलित होना; मान--मिथ्या प्रतिष्ठा; विवर्जिता:--से पूर्णतया रहित; न--नहीं; तेषाम्‌--ऐसे ब्राह्मणों का; सत्य-शीलानाम्‌--ब्राह्मण योग्यताओं ( सत्य, शम, दम इत्यादि ) से युक्त; आशिष:--आशीर्वाद; विफला:--व्यर्थ; कृता:--किये गये; इति--इनबातों पर विचार करते हुए; बालकम्‌ू--बालक को; आदाय--लाकर; साम--सामवेद के अनुसार; ऋक्‌ु--ऋग्वेद के अनुसार;यजुः--तथा यजुर्वेद के अनुसार; उपाकृतैः--ऐसे उपायों से शुद्ध किया हुआ; जलै:--जल से; पवित्र-औषधिभि:--शुद्धजड़ी-बूटियाँ मिलाकर; अभिषिच्य--( बालक को ) नहलाने के बाद; द्विज-उत्तमै:--उच्च कोटि के योग्य ब्राह्मणों द्वारा;वाचयित्वा--उच्चारण करने के लिए प्रार्थना किये गये; स्वस्ति-अयनम्‌--शुभ स्तुतियाँ; नन्द-गोप:--गोपों के मुखिया नन्दमहाराज ने; समाहितः--उदार तथा उत्तम; हुत्वा--आहुति करके; च-- भी; अग्निमू-- अमन में ; द्विजातिभ्य: --उन उच्च कोटिके ब्राह्मणों को; प्रादातू-दान में दिया; अन्नम्‌--अन्न; महा-गुणम्‌--सर्वोत्तम |

जब ब्राह्मणजन ईर्ष्या, झूठ, मिथ्या अहंकार, द्वेष, अन्यों के वैभव को देखकर मचलने तथामिथ्या प्रतिष्ठा से मुक्त होते हैं, तो उनके आशीर्वाद व्यर्थ नहीं जाते।

यह सोचकर नन्द महाराज नेगम्भीर होकर कृष्ण को अपनी गोद में ले लिया और इन सत्यनिष्ठ ब्राह्मणों को साम, ऋग्‌ तथायजुर्वेद के पवित्र स्तोत्रों के अनुसार अनुष्ठान सम्पन्न करने के लिए आमंत्रित किया।

जबमंत्रोच्चार हो रहा था, तो नन्द ने बच्चे को शुद्ध जड़ी-बूटियों से मिश्रित जल से स्नान करायाऔर अग्नि-यज्ञ करने के बाद सभी ब्राह्मणों को उत्तम अन्न तथा अन्य प्रकार के पदार्थों कास्वादिष्ट भोजन कराया।

गाव: सर्वगुणोपेता वास:स्त्रगुक्ममालिनी: ।

आत्मजाभ्युदयार्थाय प्रादात्ते चान्वयुज्ञत ॥

१६॥

गाव:--गौवें; सर्व-गुण-उपेता:--पर्याप्त दूध देने से अत्यन्त गुणी होने; बास:--अच्छे वस्त्र पहने; स्रकू--माला से युक्त;रुक्‍्म-मालिनी:--तथा सोने के हार पहने; आत्मज-अभ्युदय-अर्थाय--अपने पुत्र के अभ्युदय हेतु; प्रादात्‌ू--दान में दिया; ते--उन ब्राह्मणों ने; च-- भी; अन्वयुद्भधत--उन्हें स्वीकार किया।

नन्द महाराज ने अपने पुत्र के धन-वैभव हेतु ब्राह्मणों को गौवें दान में दीं जो वस्त्रों, फूल-मालाओं तथा सुनहरे हारों से सजाईं गई थीं।

ये गौवें जो प्रचुर दूध देने वाली थीं ब्राह्मणों कोदान में दी गई थीं और ब्राह्मणों ने उन्हें स्वीकार किया।

बदले में उन्होंने समूचे परिवार को तथाविशेष रूप से कृष्ण को आशीर्वाद दिया।

विप्रा मन्त्रविदो युक्तास्तैर्या: प्रोक्तास्तथाशिष: ।

ता निष्फला भविष्यन्ति न कदाचिदपि स्फुटम्‌ ॥

१७॥

विप्रा:--ब्राह्मणगण; मन्त्र-विदः--वैदिक मंत्रोच्चारण में पटु; युक्ता:--पूर्ण योगी; तैः--उनके द्वारा; या: --जो; प्रोक्ता:--कहागया; तथा--वैसा ही हो जाता है; आशिषः --सारे आशीर्वाद; ताः--ऐसे शब्द; निष्फला:--व्यर्थ, विफल; भविष्यन्ति न--कभी नहीं होंगे; कदाचित्‌--किसी समय; अपि--निस्सन्देह; स्फुटमू--यथार्थ |

वैदिक मंत्रों के उच्चारण में पूरी तरह से पटु ब्राह्मण योगशक्तियों से सम्पन्न योगी थे।

वे जोभी आशीर्वाद देते वह कभी निष्फल नहीं जाता था।

एकदारोहमारूढं लालयन्ती सुतं सती ।

गरिमाणं शिशोर्वोढुं न सेहे गिरिकूटवत्‌ ॥

१८॥

एकदा--एक बार ( सम्भवतः जब कृष्ण एक साल के थे ); आरोहम्‌--अपनी माता की गोद में; आरूढम्‌--बैठे हुए;लालयन्ती--लाड़-प्यार करती हुई, दुलारती हुई; सुतम्‌--अपने पुत्र को; सती--माता यशोदा; गरिमाणम्‌-- भार बढ़ने से;शिशो:--बालक के; वोढुम्‌--सहन कर पाने; न--नहीं; सेहे--समर्थ थी; गिरि-कूट-वत्‌--पर्वत की चोटी के भार जैसा लगनेवाला

एक दिन, कृष्ण के आविर्भाव के एक वर्ष बाद, माता यशोदा अपने पुत्र को अपनी गोद मेंदुलार रही थीं।

तभी सहसा उन्हें वह बालक पर्वत की चोटी से भी भारी लगने लगा, जिससे वेउसका भार सहन नहीं कर पाईं।

भूमौ निधाय तं गोपी विस्मिता भारपीडिता ।

महापुरुषमादध्यौ जगतामास कर्मसु ॥

१९॥

भूमौ--जमीन पर; निधाय--रख कर; तम्‌ू--उस बालक को; गोपी--माता यशोदा; विस्मिता--चकित; भार-पीडिता--बच्चेके भार से दुखित; महा-पुरुषम्‌-विष्णु या नारायण को; आदध्यौ--शरण ली; जगताम्‌--मानो सारे जगत का भार हो;आस--अपने को व्यस्त किया; कर्मसु--घर के अन्य कामों में |

बालक को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के बराबर भारी अनुभव करते हुए अतएवं यह सोचते हुए किबालक को कोई दूसरा भूत-प्रेत या असुर सता रहा है, चकित माता यशोदा ने बालक कोजमीन पर रख दिया और नारायण का चिंतन करने लगीं।

उत्पात की आशंका से उन्होंने इसभारीपन के शमन हेतु ब्राह्मणों को बुला भेजा और फिर घर के कामकाज में लग गईं।

उनकेपास नारायण के चरणकमलों को स्मरण करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प न था क्योंकिवे यह नहीं समझ पाईं कि कृष्ण ही हर वस्तु के मूल स्त्रोत हैं।

दैत्यो नाम्ना तृणावर्त: कंसभृत्यः प्रणोदितः ।

चक्रवातस्वरूपेण जहारासीनमर्भकम्‌ ॥

२०॥

दैत्य:--दूसरा असुर; नाम्ना--नाम वाला; तृणावर्त:--तृणावर्त; कंस-भृत्य:ः--कंस का दास; प्रणोदित:--उसके द्वारा प्रेरित;चक्रवात-स्वरूपेण--बवंडर के रूप में; जहार--उड़ा ले गया; आसीनम्‌--बैठे हुए; अर्भकम्‌--बालक को

जब बालक जमीन पर बैठा हुआ थातो तृणावर्त नामक असुर, जो कंस का दास था, वहाँपर कंस के बहकाने पर बवंडर के रूप में आया और बड़ी आसानी से बालक को अपने साथउड़ाकर आकाश में ले गया।

गोकुलं सर्वमावृण्वन्मुष्णं श्रक्कूंषि रेणुभि: ।

ईरयन्सुमहाघोरशब्देन प्रदिशो दिश: ॥

२१॥

गोकुलम्‌-गोकुल मंडल को; सर्वम्‌--समूचे; आवृण्वन्‌--प्रच्छन्न करते हुए; मुष्णन्‌--हरते हुए; चक्षूंषि--देखने की शक्ति;रेणुभि:--धूल के कणों से; ईरयन्‌--कँपाते हुए; सु-महा-घोर-- अत्यन्त भयानक तथा भारी; शब्देन--आवाज से; प्रदिशःदिशः--सारी दिशाओं में घुस गया।

उस असुर ने प्रबल बवंडर के रूप में सारे गोकुल प्रदेश को धूल के कणों से ढकते हुएसभी लोगों की दृष्टि ढक ही ली और भयावनी आवाज करता हुआ सारी दिशाओं को कंँपानेलगा।

मुहूर्तमभवद्‌गोष्ठ॑ रजसा तमसावृतम्‌ ।

सुतं यशोदा नापश्यत्तस्मिन््यस्तवती यतः ॥

२२॥

मुहूर्तम्‌-- क्षण-भर के लिए; अभवत्‌--हो गया; गोष्ठम्‌--समूचे चरागाह में; रजसा-- धूल-कणों से; तमसा आवृतम्‌-- अंधकारसे प्रच्छन्न; सुतम्‌ू--अपने पुत्र को; यशोदा--माता यशोदा ने; न अपश्यत्‌--नहीं देखा; तस्मिन्‌--उसी स्थान में; न्यस्तवती--रखा था; यतः--जहाँ।

क्षण-भर के लिए समूचा चरागाह धूल भरी अंधड़ के घने अंधकार से ढक गया और मातायशोदा अपने पुत्र को उस स्थान में न पा सकीं जहाँ उसे बिठाया था।

नापश्यत्कश्चनात्मानं परं चापि विमोहितः ।

तृणावर्तनिसूष्ठाभि: शर्कराभिरुपद्ुत: ॥

२३॥

न--नहीं; अपश्यत्‌--देखा; कश्चन--किसी को; आत्मानम्‌--अपने को; परम्‌ च अपि--या दूसरे को; विमोहितः--मोहितहोकर; तृणावर्त-निसूष्टाभि:--तृणावर्त द्वारा फेंके गये; शर्कराभि:ः--बालू के कणों से; उपद्रुत:--और विचलित किया जाकर।

तृणावर्त द्वारा फेंके गये बालू के कणों के कारण लोग न तो स्वयं को देख सकते थे न अन्य किसी और को।

इस तरह वे मोहित तथा विचलित थे।

इति खरपवनचक्रपांशुवर्षेसुतपदवीमबलाविलक्ष्य माता ।

अतिकरुणमनुस्मरन्त्यशोचद्‌भुवि पतिता मृतवत्सका यथा गौ: ॥

२४॥

इति--इस प्रकार; खर--अत्यन्त प्रचंड; पबन-चक्र --बवंडर से; पांशु-वर्ष-- धूल-कणों की वर्षा होने पर; सुत-पदवीम्‌--अपने पुत्र के स्थान को; अबला--बेचारी स्त्री; अविलक्ष्य--न देखकर; माता--उसकी माता होने से; अति-करुणम्‌--अत्यन्तकारुणिक; अनुस्मरन्ती--अपने पुत्र का चिन्तन करती हुईं; अशोचत्‌--अत्यधिक विलाप किया; भुवि-- भूमि पर; पतिता--गिर गई; मृत-वत्सका--अपने बछड़े को खोकर; यथा--जिस तरह; गौ:--गाय

प्रबल बवंडर से उठे अंधड़ के कारण माता यशोदा न तो अपने पुत्र का कोई पता लगासकीं, न ही कोई कारण समझ पाईं।

वे जमीन पर इस तरह गिर पड़ीं मानों किसी गाय ने अपनाबछड़ा खो दिया हो।

वे अत्यन्त करूण-भाव से विलाप करने लगीं।

रुदितमनुनिशम्य तत्र गोप्योभूशमनुतप्तधियो श्रुपूर्णमुख्य: ।

रुरुदुरनुपलभ्य नन्दसूनुं'पवन उपारतपांशुवर्षवेगे ॥

२५॥

रुदितम्‌--करुणापूर्वक रोती हुई माता यशोदा; अनुनिशम्य--सुनकर; तत्र--वहाँ; गोप्य:--अन्य गोपियाँ; भूशम्‌--अत्यधिक;अनुतप्त--माता यशोदा के साथ विलाप करती; धिय:ः--ऐसी भावनाओं से; अश्रु-पूर्ण-मुख्यः--तथा आँसुओं से पूरित मुखोंवाली अन्य गोपियाँ; रुरुदु:--रो रही थीं; अनुपलभ्य--न पाकर; नन्द-सूनुम्‌--ननन्‍्द महाराज के पुत्र, कृष्ण को; पवने--बवंडरके; उपारत--बन्द हो जाने पर; पांशु-वर्ष-वेगे-- धूल की वर्षा के वेग से जब अंधड़ तथा बवंडर का वेग घट गया, तो यशोदा का करुण क्रन्दन सुनकर उनकीसखियाँ--गोपियाँ--उनके पास आईं।

किन्तु वे भी कृष्ण को वहाँ न देखकर अत्यन्त उद्िग्न हुईंऔर आँखों में आँसू भर कर माता यशोदा के साथ वे भी रोने लगीं।

तृणावर्त: शान्तरयो वात्यारूपधरो हरन्‌ ।

कृष्णं नभोगतो गन्तुं नाशक्नोद्धूरिभारभूत्‌ ॥

२६॥

तृणावर्त:--तृणावर्त असुर; शान्त-रयः--झोंके का वेग घट गया; वात्या-रूप-धर: --जिसने प्रबल बवंडर का रूप धारण करलिया था; हरनू--तथा ले गया था; कृष्णम्‌--कृष्ण को; नभ:ः-गतः--आकाश में ऊँचे चला गया; गन्तुम्‌--आगे जाने केलिए; न अशक्नोत्‌--समर्थ न था; भूरि-भार-भूत्‌-- क्योंकि कृष्ण असुर से भी अधिक शक्तिशाली तथा भारी थे।

तृणावर्त असुर वेगवान बवंडर का रूप धारण करके कृष्ण को आकाश में बहुत ऊँचाईतक ले गया किन्तु जब कृष्ण असुर से भारी हो गये तो असुर का वेग रुक गया जिससे वह औरआगे नहीं जा सका।

'तमएमानं मन्‍यमान आत्मनो गुरुमत्तया ।

गले गृहीत उत्स्त्रष्ठ नाशक्नोदद्भुतार्भकम्‌ ॥

२७॥

तम्‌--कृष्ण को; अश्मानम्‌ू--लोहे की तरह के भारी पत्थर; मन्यमान:--इस तरह सोचते हुए; आत्मन: गुरु-मत्तया-- अनुमान सेभी अधिक भारी होने के कारण; गले--उसकी गर्दन में; गृहीते--अपनी बाँहों से बँधा या आलिंगन किया जाकर; उत्स्रष्टमू--छोड़ने के लिए; न अशक्नोत्‌--समर्थ नहीं था; अद्भुत-अर्भकम्‌--अद्भुत बालक को जो सामान्य बालक से भिन्न था।

कृष्ण के भार के कारण तृणावर्त उन्हें विशाल पर्वत या लोह का पिंड मान रहा था।

किन्तुकृष्ण ने असुर की गर्दन पकड़ रखी थी इसलिए वह उन्हें फेंक नहीं पा रहा था।

इसलिए उसनेसोचा कि यह बालक अद्भुत है, जिसके कारण मैं न तो उसे ले जा सकता हूँ न ही इस भार कोदूर फेंक सकता हूँ।

गलग्रहणनिश्रेष्टो दैत्यो निर्गतलोचन: ।

अव्यक्तरावो न्यपतत्सहबालो व्यसुरत्रेजे ॥

२८ ॥

गल-ग्रहण-निश्रैष्ट: --कृष्ण द्वारा गला पकड़े रहने से तृणावर्त का गला घुट रहा था और वह कुछ भी नहीं कर सका; दैत्य:--असुर; निर्गत-लोचन:--दबाव से आँखें बाहर निकल आईं; अव्यक्त-राव: --गला घुटने से उसकी कराह भी नहीं निकल पायी;न्यपतत्‌--गिर पड़ा; सह-बाल:--बालक सहित; व्यसु: ब्रजे--त्रज की भूमि पर निर्जीव |

कृष्ण ने तृणावर्त को गले से पकड़ रखा था इसलिए उसका दम घुट रहा था जिससे वह नतो कराह सकता था, न ही अपने हाथ-पैर हिला-डुला सकता था।

उसकी आँखें बाहर निकलआईं थी, उसके प्राण निकल गये और वह उस छोटे बालक सहित ब्रज की भूमि पर नीचे आगिरा।

'तमन्तरिक्षात्पतितं शिलायांविशीर्णसर्वावयवं करालम्‌ ।

पुरं यथा रुद्रशरेण विद्धंस्त्रियो रूदत्यो दहशुः समेता: ॥

२९॥

तम्‌--उस असुर को; अन्तरिक्षात्‌--आकाश से; पतितम्‌--गिरा हुआ; शिलायाम्‌--चट्टान पर; विशीर्ण--बिखरा, छिन्न-भिन्न;सर्व-अवयवम्‌--शरीर के सारे अंग; करालम्‌--अत्यन्त विकराल हाथ-पाँव; पुरम्‌्-त्रिपुरासुर का स्थान; यथा--जिस तरह;रुद्र-शरेण--शिवजी के बाण से; विद्धम्‌--बेधा गया; स्त्रियः--सारी स्त्रियाँ, गोपियाँ; रुद॒त्यः--कृष्ण वियोग के कारण रोतीहुईं; ददशु:--अपने सामने ही देखा; समेता:--एकसाथ।

जब वहाँ एकत्र गोपियाँ कृष्ण के लिए रो रही थीं तो वह असुर आकाश से पत्थर की एकबड़ी चट्टान पर आ गिरा, जिससे उसके सारे अंग छिन्न-भिन्न हो गये मानो भगवान्‌ शिवजी केबाण से बेधा गया त्रिपुरासुर हो।

प्रादाय मात्रे प्रतिहत्य विस्मिता:कृष्णं च तस्योरसि लम्बमानम्‌ ।

त॑ स्वस्तिमन्तं पुरुषादनीतंविहायसा मृत्युमुखात्प्रमुक्तम्‌ ।

गोप्यश्च गोपा: किल नन्दमुख्यालब्ध्वा पुनः प्रापुरतीव मोदम्‌ ॥

३०॥

प्रादाय--उठाकर; मात्रे--उनकी माता को; प्रतिहत्य--हाथों में सौंप दिया; विस्मिता:--सारे लोग अचंभित थे; कृष्णम्‌ च--तथा कृष्ण को; तस्य--असुर की; उरसि--छाती पर; लम्बमानम्‌--स्थित; तमू--कृष्ण को; स्वस्तिमन्तम्‌--समस्त कल्याण सेयुक्त; पुरुषाद-नीतम्‌--मानवभक्षी असुर द्वारा ले जाया गया; विहायसा--आकश् में; मृत्यु-मुखात्‌--मृत्यु के मुँह से;प्रमुक्तम्‌ू--अब मुक्त हुए; गोप्य:--गोपियाँ; च--तथा; गोपा:--ग्वाले; किल--निस्सन्देह; नन्द-मुख्या:--ननन्‍्द महाराजइत्यादि; लब्ध्वा--पाकर; पुनः--फिर ( उनका पुत्र ); प्रापु;--प्राप्त किया; अतीव--अत्यधिक ; मोदम्‌--आनन्द |

गोपियों ने तुरन्त ही कृष्ण को असुर की छाती से उठाकर माता यशोदा को लाकर सौंपदिया।

वे समस्त अशुभों से मुक्त थे।

चूँकि बालक को असुर द्वारा आकाश में ले जाये जाने परभी किसी प्रकार की चोट नहीं आई थी और वह अब सारे खतरों तथा दुर्भाग्य से मुक्त थाइसलिए नन्द महाराज समेत सारे ग्वाले तथा गोपियाँ अत्यन्त प्रसन्न थे।

अहो बतात्यद्भुतमेष रक्षसाबालो निवृत्ति गमितो भ्यगात्पुन: ।

हिंस्त्र: स्वपापेन विहिंसित: खलःसाधु: समत्वेन भयाद्विमुच्यते ॥

३१॥

अहो--ओह; बत--निस्सन्देह; अति--अत्यन्त; अद्भुतमू--यह घटना बड़ी अद्भुत है; एषघ:--यह ( बालक ); रक्षसा--मानवभक्षी असुर के द्वारा; बाल:--अबोध बालक कृष्ण; निवृत्तिमू--मार कर खाये जाने के लिए ले जाया गया; गमित:--दूरचला गया; अभ्यगात्‌ पुनः--किन्तु वह बिना चोट लगे वापस आ गया; हिंस्त्र:--ईर्ष्यालु; स्व-पापेन--अपने ही पापपूर्ण कार्योसे; विहिंसित:--अब ( वही असुर ) मारा जा चुका है; खलः--दुष्ट होने के कारण; साधु:--पाप से रहित तथा निर्दोष व्यक्ति;समत्वेन--समान होने से; भयात्‌--सभी प्रकार के भय से; विमुच्यते--छूट जाता है।

यह सबसे अधिक आश्चर्य की बात है कि यह अबोध बालक इस राक्षस द्वारा खाये जाने केलिए दूर ले जाया जाकर भी बिना मारे या चोट खाये वापस लौट आया।

चूँकि राक्षस ईर्ष्यालु,क्रूर तथा पापी था, इसलिए वह अपने पापपूर्ण कृत्यों के लिए मारा गया।

यही प्रकृति का नियम है।

निर्दोष भक्त की रक्षा सदैव भगवान्‌ द्वारा की जाती है और पापी व्यक्ति को अपने पापमयजीवन के लिए दण्ड दिया जाता है।

कि नस्तपश्चीर्णमधो क्षजार्चनपूर्तेप्ठदत्तमुत भूतसौहदम्‌ ।

यत्सम्परेत: पुनरेव बालकोदिष्ठद्या स्वबन्धून्प्रणयत्रुपस्थित: ॥

३२॥

किम्‌--किस तरह की; न: --हमारे द्वारा; तप:ः--तपस्या; चीर्णम्‌--दीर्घकाल तक की गई; अधोक्षज-- भगवान्‌ की;अर्चनम्‌-पूजा; पूर्त--सड़कें बनवाना इत्यादि; इष्ट--जनकल्याण कार्य; दत्तम्‌ू--दान देना; उत--अथवा और कुछ; भूत-सौहदम्‌--जनता के प्रति प्रेम होने से; यत्‌--जिसके कारण; सम्परेत:--मृत्यु को प्राप्त होने पर भी; पुनः एब--फिर से, अपनेपुण्यों के कारण; बालक:--बालक; दिष्टय्या-- भाग्य द्वारा; स्व-बन्धून्‌ू--निजी सम्बन्धियों को; प्रणयन्‌--प्रसन्न करने के लिए;उपस्थित:--यहाँ उपस्थित है

नन्द महाराज तथा अन्य लोगों ने कहा : हमने अवश्य ही पूर्वजन्म में दीर्घकाल तक तपस्याकी होगी, भगवान्‌ की पूजा की होगी, जनता के लिए सड़कें तथा कुएँ बनवाकर पुण्य कर्मकिये होंगे और दान भी दिया होगा जिसके फलस्वरूप मृत्यु के मुख में गया हुआ यह बालकअपने सम्बन्धियों को आनन्द प्रदान करने के लिए लौट आया है।

इष्टाद्धुतानि बहुशो ननन्‍्दगोपो बृहद्वने ।

वसुदेववचो भूयो मानयामास विस्मित: ॥

३३॥

इृष्टा--देखकर; अद्भुतानि--अतीव अद्भुत घटनाओं को; बहुश:--अनेक बार; नन्द-गोप:--गोपों के मुखिया नन्‍्द महाराज;बृहद्वने--बृहद्वन में; वसुदेव-वचः --वसुदेव के वचन, जो उन्होंने मथुरा में नन्द से कहे थे; भूयः--बारम्बार; मानयाम्‌ आस--मान लिया कि कितने सच थे; विस्मित:--अतीव विस्मय में |

बृहद्न में इन सारी घटनाओं को देखकर नन्द महाराज अधिकाधिक आश्चर्यचकित हुए औरउन्हें वसुदेव के वे शब्द स्मरण हो आये जो उन्होंने मथुरा में कहे थे।

एकदार्भकमादाय स्वाड्डूमारोप्य भामिनी ।

प्रस्नुतं पाययामास स्तन स्नेहपरिप्लुता ॥

३४॥

एकदा--एक बार; अर्भकम्‌--बालक को; आदाय--लेकर; स्व-अड्डूमू--अपनी गोद में; आरोप्य--तथा बैठाकर; भामिनी--माता यशोदा ने; प्रस्नुतम्‌-स्तनों से दूध बहता हुआ; पाययाम्‌ आस--बच्चे को पिलाया; स्तनम्‌--अपने स्तन; स्नेह-परिप्लुता--अतीव स्नेह तथा प्रेम से युक्त |

एक दिन माता यशोदा कृष्ण को अपनी गोद में बैठाकर उन्हें मातृ-स्नेह के कारण अपनेस्तन से दूध पिला रही थीं।

दूध उनके स्तन से चू रहा था और बालक उसे पी रहा था।

पीतप्रायस्थ जननी सुतस्य रूचिरस्मितम्‌ ।

मुखं लालयती राजञ्जम्भतो ददशे इदम्‌ ॥

३५॥

खं रोदसी ज्योतिरनीकमाशा:सूर्येन्दुवह्निश्वसनाम्बुधी श्र ।

द्वीपान्नगांस्तहुहितूर्वनानिभूतानि यानि स्थिरजड्र्मानि ॥

३६॥

पीत-प्रायस्य--स्तन-पान करते तथा संतुष्ट बालक कृष्ण की; जननी--माता यशोदा; सुतस्य--अपने पुत्र की; रुचिर-स्मितम्‌ू--तुष्ट मुसकान को देखती; मुखम्‌--मुँह को; लालयती--दुलारती हुई; राजन्‌ू--हे राजा; जुम्भत:ः--बच्चे को अँगड़ाईलेते; ददशे--उसने देखा; इदम्‌--यह; खम्‌--आकाश; रोदसी--स्वर्ग तथा पृथ्वी दोनों; ज्योति:-अनीकम्‌--ज्योतिपुंज;आशा:-दिशाएँ; सूर्य --सूर्य ; इन्दु--चंद्रमा; वह्वि-- अग्नि; श्रसन--वायु; अम्बुधीन्‌--समुद्र; च--तथा; द्वीपानू--द्वीप;नगान्‌--पर्वत; तत्‌-दुहितृ:--पर्वतों की पुत्रियाँ ( नदियाँ ); वनानि--जंगल; भूतानि--सारे जीव; यानि--जो हैं; स्थिर-जड़मानि--अचर तथा चर।

हे राजा परीक्षित, जब बालक कृष्ण अपनी माता का दूध पीना लगभग बन्द कर चुके थेऔर माता यशोदा उनके सुन्दर कान्तिमान हँसते मुख को छू रही थीं और निहार रही थीं तोबालक ने जम्हाई ली और माता यशोदा ने देखा कि उनके मुँह में पूण आकाश, उच्च लोक तथापृथ्वी, सभी दिशाओं के तारे, सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि, वायु, समुद्र, द्वीप, पर्वत, नदी, जंगल तथाचर-अचर सभी प्रकार के जीव समाये हुए हैं।

सा वीक्ष्य विश्व सहसा राजन्सज्जातवेपथु: ।

सम्मील्य मृगशावाशक्षी नेत्रे आसीत्सुविस्मिता ॥

३७॥

सा--माता यशोदा; वीक्ष्य--देखकर; विश्वम्‌--सम्पूर्ण विश्व को; सहसा--अचानक अपने पुत्र के मुँह के भीतर; राजनू--हेराजा ( महाराज परीक्षित ); सज्ञात-वेपथु:--उनका हृदय धक्‌ धक्‌ करने लगा; सम्मील्य--खोल कर; मृगशाव-अक्षी--मृगनैनी; नेत्रे--उसकी दोनों आँखें; आसीत्‌ू--हो गईं; सु-विस्मिता--आश्चर्यचकित |

जब यशोदा माता ने अपने पुत्र के मुखारविन्द में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड देखा तो उनका हृदय धक्‌धक्‌ करने लगा तथा आश्चर्यच्कित होकर वे अपने अधीर नेत्र बन्द करना चाह रहती थीं।

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