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अध्याय बासठवाँ: शषा और अनिरुद्ध का मिलन
10.62बाणस्य तनयामूषामुपयेमे यदूत्तम: ।
तत्र युद्धमभूद्धोरं हरिशद्जरयोर्महत् ।
एतत्सर्व महायोगिन्समाख्यातुं त्वमहसि ॥
१॥
श्री-राजा उबाच--राजा ( परीक्षित महाराज ) ने कहा; बाणस्य--बाणासुर की; तनयाम्--पुत्री; ऊषाम्ू--उषा को; उपयेमे--ब्याहा; यदु-उत्तम:--यदुओं में श्रेष्ठ ( अनिरुद्ध ने ); तत्र--उसी सन्दर्भ में; युद्धम्--युद्ध।
अभूत्--हुआ; घोरम्-- भयावह; हरि-शट्जूरयो:--हरि ( कृष्ण ) तथा शंकर ( शिव ) के बीच; महत्--महान्; एतत्--यह; सर्वम्--सब; महा-योगिन्--हे महान्योगी; समाख्यातुम्ू--बतलाने के लिए; त्वम्ू-तुम; अ्हसि--योग्य हो।
राजा परीक्षित ने कहा : यदुओं में श्रेष्ठ ( अनिरुद्ध ) ने बाणासुर की पुत्री ऊषा से विवाहकिया।
फलस्वरूप हरि तथा शंकर के बीच महान् युद्ध हुआ।
हे महायोगी, कृपा करके इसघटना के विषय में विस्तार से बतलाइये।
श्रीशुक उबाचबाण: पुत्रशतज्येष्ठो बलेरासीन्महात्मन: ।
येन वामनरूपाय हरयेदायि मेदिनी ॥
तस्यौरसः सुतो बाण: शिवभक्तिरत: सदा ।
मान्यो वदान्यो धीमांश्व सत्यसन्धो हृढब्रतः ।
शोणिताख्े पुरे रम्ये स राज्यमकरोत्पुरा ॥
तस्य शम्भो: प्रसादेन किल्लूरा इव तेउमरा: ।
सहस्त्रबाहुर्वाद्योन ताण्दवेडइतोषयन्मूडम् ॥
२॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; बाण:--बाण; पुत्र--पुत्रों में; शत--एक सौ; ज्येष्ठ:--सबसे बड़ा; बले:--महाराज बलि के; आसीत्-- था; महा-आत्मन: --महात्मा; येन--जिसके ( बलि ) द्वारा; वामन-रूपाय--वामनदेव के रूप में;हरये--भगवान् हरि को; अदायि--दी गई; मेदिनी--पृथ्वी; तस्य--उसके ; औरस: --वीर्य से; सुत:--पुत्र; बाण:--बाण;शिव-भक्ति--शिवजी की भक्ति में; रतः--स्थिर; सदा--सदैव; मान्य:--सम्मानित; वदान्य:--दयालु; धी-मानू-- बुद्धिमान;च--तथा; सत्य-सन्ध:--सत्यवादी; हृढ-ब्रतः--अपने ब्रत में हढ़; शोणित-आख्ये--शोणित नामक; पुरे--नगर में; रम्ये--सुहावने; सः--वह; राज्यम् अकरोत्--अपना राज्य बनाया; पुरा--प्राचीनकाल में; तस्य--उस; शम्भो:--शम्भु ( शिव ) की;प्रसादेन--खुशी से; किड्जूरा:--दास; इब--मानो; ते--वे; अमरा: --देवतागण; सहस्त्र--एक हजार; बाहु: --बाहें; वाद्येन--बाजा बजाने से; ताण्डबे--उनके ताण्डव-नृत्य करते समय; अतोषयत्--प्रसन्न कर लिया; मृडम्ू--शिवजी को |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : बाण महान् सन्त बलि महाराज के एक सौ पुत्रों में सबसे बड़ाथा।
जब भगवान् हरि वामनदेव के रूप में प्रकट हुए थे तो बलि महाराज ने सारी पृथ्वी उन्हें दानमें दे दी थी।
बलि महाराज के वीर्य से उत्पन्न बाणासुर शिवजी का महान् भक्त हो गया।
उसकाआचरण सदैव सम्मानित था।
वह उदार, बुद्धिमान, सत्यवादी तथा अपने ब्रत का पक्का था।
शोणितपुर नामक सुन्दर नगरी उसके अधीनस्थ में थी।
चूँकि बाणासुर को शिवजी का वरदहस्तप्राप्त था इसलिए देवता तक तुच्छ दासों की तरह उसकी सेवा में लगे रहते थे।
एक बार जब शिवजी ताण्डव-नृत्य कर रहे थे तो बाण ने अपने एक हजार हाथों से वाद्य-यंत्र बजाकर उन्हेंविशेष रूप से प्रसन्न कर लिया था।
भगवास्सर्वभूतेश: शरण्यो भक्तवत्सल: ।
वरेण छन्दयामास स तं बत्रे पुराधिपम् ॥
३॥
भगवानू-प्रभु; सर्व--समस्त; भूत--जीवगण के; ईश: --स्वामी; शरण्य:--शरण देने वाला; भक्त--अपने भक्तों के प्रति;वत्सल:ः--दयालु; वरेण--वर द्वारा; छन््दयाम् आस--तुष्ट किया; सः--उस बाण ने; तम्ू--उस ( शिव ) को; वद्रे--चुना;पुर--अपनी नगरी का; अधिपम्--प्रहरी, संरक्षक |
समस्त जीवों के स्वामी, अपने भक्तों के दयामय आश्रय ने बाणासुर को उसका मनचाहा वरदेकर खूब प्रसन्न कर दिया।
बाण ने उन्हें ( शिवजी को ) अपनी नगरी के संरक्षक के रूप मेंचुना।
स एकदाह गिरिशं पार्श्रस्थं वीर्यदुर्मदः ।
किरीटेनार्कवर्णेन संस्पृशंस्तत्पदाम्बुजम् ॥
४॥
सः--वह, बाणासुर; एकदा--एक बार; आह--बोला; गिरि-शम्--शिवजी से; पार्थव--अपनी बगल में; स्थम्--उपस्थित;वीर्य--अपने बल से; दुर्मद:--उन्मत्त; किरीटेन--अपने मुकुट से; अर्क--सूर्य जैसे; वर्णेन--रंग वाले; संस्पृशन्ू--छूते हुए;तत्--उसके, शिवजी के; पद-अम्बुजमू--चरणकमल |
बाणासुर अपने बल से उन्मत्त था।
एक दिन जब शिवजी उसकी बगल में खड़े थे, तोबाणासुर ने अपने सूर्य जैसे चमचमाते मुकुट से उनके चरणकमलों का स्पर्श किया और उनसेइस प्रकार कहा।
नमस्ये त्वां महादेव लोकानां गुरुमी श्वरम् ।
पुंसामपूर्णकामानां कामपूरामराड्प्रिपम् ॥
५॥
नमस्ये--मैं नमस्कार करता हूँ; त्वामू--तुमको; महा-देव--हे देवताओं में सबसे महान्; लोकानाम्ू--सारे लोकों के; गुरुम्--आध्यात्मिक गुरु को; ईश्वरमू--नियन्ता को; पुंसामू--मनुष्यों के लिए; अपूर्ण--अपूर्ण; कामानाम्--इच्छाओं वाले; काम-पूर--इच्छा पूरी करते हुए; अमर-अड्ूप्रिपम्--स्वर्ग के वृक्ष या कल्पवृक्ष ( सहश )।
बाणासुर ने कहा : हे महादेव, मैं समस्त लोकों के आध्यात्मिक गुरु तथा नियन्ता, आपको नमस्कार करता हूँ।
आप उस स्वर्गिक-वृक्ष की तरह हैं, जो अपूर्ण इच्छाओं वाले व्यक्तियोंकी इच्छाएँ पूरी करता है।
दोःसहस्त्रं त्वया दत्तं परं भाराय मेभवत् ।
त्रिलोक्यां प्रतियोद्धारं न लभे त्वहते समम् ॥
६॥
दोः--भुजाएँ; सहस्रमू--एक हजार; त्वया--तुम्हारे द्वारा; दत्तम--प्रदान की हुई; परम्--केवल; भाराय--बोझ; मे--मेरेलिए; अभवत्--बन गई हैं; त्रि-लोक्यम्ू--तीनों लोकों में; प्रतियोद्धारम्--विपक्षी योद्धा; न लभे--मुझे नहीं मिल रहा; त्वत्--तुम्हारे; ऋते-- सिवाय; समम्--समान |
आपके द्वारा प्रदत्त ये एक हजार भुजाएँ मेरे लिए केवल भारी बोझ बनी हुई हैं।
तीनों लोकोंमें मुझे आपके सिवाय लड़ने के योग्य कोई व्यक्ति नहीं मिल पा रहा।
कण्डूत्या निभूतर्दोर्भियुयुत्सुर्दिगगजानहम् ।
आद्यायां चूर्णयब्रद्रीन्भीतास्तेडपि प्रदुद्रुवुः ॥
७॥
'कण्डूत्या--खुजलाती; निभूतैः --पूरित; दोर्भि:--मेरी भुजाओं से; युयुत्सु:--लड़ने के लिए उत्सुक; दिकु--दिशाओं के;गजानू्--हाथियों से; अहम्ू--मैं; आद्य--हे आदि-देव; अयमू--गया; चूर्णयन्ू--चूर्ण करते हुए; अद्वीन्--पर्वतों को;भीता:-- भयभीत; ते--वे; अपि-- भी ; प्रदुद्रुवु:-- भाग गये।
है आदि-देव, दिशाओं पर शासन करने वाले हाथियों से लड़ने के लिए उत्सुक मैं युद्ध केलिए खुजला रही अपनी भुजाओं से पर्वतों को चूर करते हुए आगे बढ़ता गया।
किन्तु वे बड़ेबड़े हाथी भी डर के मारे भाग गये।
तच्छृत्वा भगवान्क्रुद्धः केतुस्ते भज्यते यदा ।
त्वदर्पघ्न॑ भवेन्मूढ संयुगं मत्समेन ते ॥
८॥
तत्--वह; श्रुत्व--सुनकर; भगवान्-- भगवान; क्रुद्ध:--छुद्ध; केतु:--ध्वजा; ते--तुम्हारी; भज्यते--टूट जायेगी; यदा--जब; त्वत्-तुम्हारा; दर्प--घमंड; घ्नम्-विनष्ट; भवेत्--हो जायेगा; मूढ-रे मूर्ख ; संयुगम्--युद्ध में; मत्--मेरे; समेन--समान वाले से; ते--तुम्हारा
यह सुनकर शिवजी क्रुद्ध हो उठे और बोले, 'रे मूर्ख! जब तू मेरे समान व्यक्ति से युद्ध करचुकेगा तो तेरी ध्वजा टूट जायेगी।
उस युद्ध से तेरा दर्प नष्ट हो जायेगा।
इत्युक्त: कुमतिर्ईष्ट: स्वगृहं प्राविशन्वूप ।
प्रतीक्षन्गिरिशादेशं स्ववीर्यनशनम्कुधी: ॥
९॥
इति--इस प्रकार; उक्त:--कहे जाने पर; कु-मति:--मूर्ख; हष्ट:--प्रसन्न; स्व--अपने; गृहम्--घर में; प्राविशत्--प्रवेश किया;नृप--हे राजा ( परीक्षित ); प्रतीक्षन्--प्रती क्षा करते हुए; गिरिश--शिव की; आदेशम्-- भविष्यवाणी को; स्व-वीर्य--अपनेपराक्रम से; नशनम्--विनाश; कु-धी:--अज्ञानी
इस प्रकार उपदेश दिये जाने पर अज्ञानी बाणासुर प्रसन्न हुआ।
तत्पश्चात् हे राजन्ू, गिरीश नेजो भविष्यवाणी की थी उसकी प्रतीक्षा करने--अपने पराक्रम के विनाश की प्रतीक्षा करने--वह अपने घर चला गया।
तस्योषा नाम दुहिता स्वप्ने प्राद्युम्निना रतिम् ।
कन्यालभत कान्तेन प्रागदृष्टभ्रुतेन सा ॥
१०॥
तस्य--उसकी; ऊषा नाम--उषा नामक; दुहिता--पुत्री; स्वप्ने--स्वण में; प्राद्युम्निना--प्रद्युम्न के पुत्र ( अनिरुद्ध ) के साथ;रतिम्--संभोग; कन्या--अविवाहिता कुमारी; अलभत--प्राप्त किया; कान्तेन--अपने प्रेमी के साथ; प्राक् --इसके पूर्व;अदृष्ट--कभी न देखा हुआ; श्रुतेन--या सुना हुआ; सा--उसने |
बाण की पुत्री कुमारी ऊषा ने स्वण में प्रद्मम्म के पुत्र के साथ संभोग किया यद्यपि उसनेइसके पूर्व कभी भी अपने प्रेमी को देखा या सुना नहीं था।
सा तत्र तमपश्यन्ती क्वासि कान्तेति वादिनी ।
सखीनां मध्य उत्तस्थौ विहला ब्रीडिता भूशम् ॥
११॥
सा--वह; तत्र--वहाँ ( स्वप्न में ); तम्ू--उसको; अपश्यन्ती--न देखती हुई; क्व--कहाँ; असि--हो; कान्त--मेरे प्रिय;इति--इस प्रकार; वादिनी--बोलती हुई; सखीनाम्--अपनी सखियों के; मध्ये--बीच में; उत्तस्थौ--उठी; विहला--विश्लुब्ध;ब्रीडिता--चिन्तित; भूशम्-- अत्यधिक |
स्वप्न में उसे न देखकर ऊषा अपनी सखियों के बीच में यह चिल्लाते हुए अचानक उठबैठी, 'कहाँ हो, मेरे प्रेमी ?' वह अत्यन्त विचलित एवं हड़बड़ाई हुई थी।
बाणस्य मन्त्री कुम्भाण्डश्चित्रलेखा च तत्सुता ।
सख्यपृच्छत्सखीमूषां कौतूहलसमन्विता ॥
१२॥
बाणस्य--बाण का; मन्त्री--सचिव; कुम्भाण्ड:--कुम्भाण्ड; चित्रलेखा--चित्रलेखा; च--तथा; तत्--उसकी; सुता--पुत्री;सखी--सहेली; अपृच्छत्--पूछा; सखीम्-- अपनी सहेली; ऊषाम्--उषा से; कौतूहल--उत्सुकता से; समन्विता--पूर्ण
बाणासुर का मंत्री कुम्भाण्ड था जिसकी पुत्री चित्रलेखा थी।
वह ऊषा की सखी थी, अतःउसने उत्सुकतापूर्वक अपनी सखी से पूछा।
क॑ त्वं मृगयसे सुभ्रु कीदशस्ते मनोरथ: ।
हस्तग्राहं न तेउ्द्यापि राजपुत्र्युपलक्षये ॥
१३॥
कम्--किसको; त्वम्-तुम; मृगयसे--ढूँढ़ रही हो; सु-भ्रु--हे सुन्दर भौंहों वाली; कीहृष: --किस तरह की; ते--तुम्हारी;मनः-रथ:--लालसा; हस्त--हाथ का; ग्राहमू-ग्रहण करने वाला; न--नहीं; ते--तुम्हारा; अद्य अपि--आज तक; राज-पुत्रि--हे राजकुमारी; उपलक्षये--मैं देख रही हूँ
चित्रलेखा ने कहा : हे सुन्दर भौंहों वाली, तुम किसे ढूँढ़ रही हो? तुम यह कौन-सीइच्छा अनुभव कर रही हो ? हे राजकुमारी, अभी तक मैंने किसी को तुमसे पाणिग्रहण करते नहींदेखा।
इृष्ट: कश्चिन्नरः स्वप्ने श्याम: कमललोचन: ।
पीतवासा बृहद्वाहुर्योषितां हृदयंगम: ॥
१४॥
इृष्ट:--देखा हुआ; कश्चित्--कोई; नर: --मनुष्य; स्वप्ने--सपने में; श्याम: --गहरा नीला, साँवला; कमल--कमल सहश;लोचन:--आँखों वाला; पीत--पीला; वासा:--वस्त्र धारण किये; बृहत्--बलिष्ठ; बाहु:--बाहों वाला; योषिताम्--स्त्रियों के;हृदयम्ू--हृदयों को; गम: --स्पर्श करता हुआ |
ऊषा ने कहा : मैंने सपने में एक पुरुष देखा जिसका रंग साँवला था, जिसकी आँखेंकमल जैसी थीं, जिसके वस्त्र पीले थे और भुजाएँ बलिष्ठ थीं।
वह ऐसा था, जो स्त्रियों के हृदयोंको स्पर्श कर जाता है।
तमहं मृगये कान्तं पाययित्वाधरं मधु ।
क्वापि यातः स्पृहयतीं क्षिप्त्वा मां वृजिनार्णवे ॥
१५॥
तम्--उस; अहम्--मैं; मृगये--ढूँढ़ रही हूँ; कान्तम्--प्रेमी को; पाययित्वा--पिलाकर; आधरम्--अपने होंठों की; मधु--शहद; क्व अपि--कहीं; यातः--चला गया है; स्पृहयतीम्--उसके लिए लालायित, तरसती; क्षिप्तता--फेंक कर; माम्--मुझको; वृजिन--दुख के; अर्णवे --समुद्र में |
मैं उसी प्रेमी को ढूँढ़ रही हूँ।
मुझे अपने अधरों की मधु पिलाकर वह कहीं और चला गया हैऔर इस तरह उसने मुझे दुख के सागर में फेंक दिया है।
मैं उसके लिए अत्यधिक लालायित हूँ।
चित्रलेखोबाचव्यसन तेपकर्षामि त्रिलोक्यां यदि भाव्यते ।
तमानेष्ये वरं यस्ते मनोहर्ता तमादिश ॥
१६॥
चित्रलेखा उवाच--चित्रलेखा ने कहा; व्यसनम्--दुख; ते--तुम्हारा; अपकर्षामि--दूर कर लूँगी; त्रि-लोक्याम्ू--तीनों लोकोंमें; यदि--यदि; भाव्यते--मिल पायेगा; तमू--उसको; आनेष्ये--लाऊँगी; वरम्--होने वाले पति को; यः--जो; ते--तुम्हारा;मनः--हृदय का; हर्ता--चोर; तम्--उसको; आदिश--जरा संकेत तो करो |
चित्रलेखा ने कहा : मैं तुम्हारी व्याकुलता दूर कर दूँगी।
यदि वह तीनों लोकों के भीतर कहींभी मिलेगा तो मैं तुम्हारे चित्त को चुराने वाले इस भावी पति को ले आऊँगी।
तुम मुझे बतला दोकि आखिर वह है कौन।
इत्युक्त्वा देवगन्धर्व सिद्धचारणपन्नगान् ।
दैत्यविद्याधरान्यक्षान्मनुजांश्चव यथालिखत् ॥
१७॥
इति--इस प्रकार; उक््त्वा--कह कर; देव-गन्धर्व--देवताओं तथा गन्धर्वों; सिद्ध-चारण-पन्नगान्--सिद्धों, चारणों तथा पन्नगोंको; दैत्य-विद्याधरानू--असुरों तथा विद्याधरों को; यक्षान्ू--यक्षों को; मनु-जानू--मनुष्यों को; च-- भी; यथा--सही सही;अलिखत्--उसने चित्रित किया।
यह कह कर चित्रलेखा विविध देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों, चारणों, पन्नगों, दैत्यों, विद्याधरों,यक्षों तथा मनुष्यों के सही सही चित्र बनाती गयी।
मनुजेषु च सा वृष्नीन्शूरमानकदुन्दुभिम् ।
व्यलिखद्रामकृष्णौ च प्रद्युम्न॑ बीक्ष्य लज्जिता ॥
१८॥
अनिरुद्धं विलिखितं वीक्ष्योषावाड्मुखी हिया ।
सोसावसाविति प्राह स्मयमाना महीपते ॥
१९॥
मनुजेषु--मनुष्यों में से; च--तथा; सा--वह ( चित्रलेखा ); वृष्णीन्--वृष्णियों को; शूरम्-शूरसेन को; आनकदुन्दुभिम्ू--वसुदेव को; व्यलिखत्-- अंकित किया; राम-कृष्णौ--बलराम तथा कृष्ण; च--और; प्रद्यम्नम्--प्रद्युम्न को; वीक्ष्य--देखकर;लज्जिता--लज्जित होकर; अनिरुद्धम्-- अनिरुद्ध को; विलिखितमू--अंकित किया हुआ; वीक्ष्य--देखकर; ऊषा--उषा;अवाक्--झुकाकर; मुखी--अपना सिर; हिया--उलझन से; सः असौ असौ इति--' वही है, वही है '; प्राह--उसने कहा;स्मयमाना--हँसती हुई; मही-पते--हे राजन् |
हे राजन, चित्रलेखा ने मनुष्यों में से वृष्णियों के चित्र खींचे जिनमें शूरसेन, आनकदुन्दुभि,बलराम तथा कृष्ण सम्मिलित थे।
जब ऊषा ने प्रद्युम्म का चित्र देखा तो वह लजा गई और जबउसने अनिरुद्ध का चित्र देखा तो उलझन के मारे उसने अपना सिर नीचे झुका लिया।
उसने हँसतेहुए कहा, 'यही है, यही है, वह।
'चित्रलेखा तमाज्ञाय पौत्रं कृष्णस्य योगिनी ।
ययौ विहायसा राजन्द्वारकां कृष्णपालिताम् ॥
२०॥
चित्रलेखा--चित्रलेखा; तमू--उसको; आज्ञाय--पहचान कर; पौत्रम्--पौत्र के रूप में; कृष्णस्य--कृष्ण के; योगिनी--योगिन; ययौ--गई; विहायसा--आकाश--मर्ग द्वारा; राजन्--हे राजन्; द्वारकाम्-द्वारका; कृष्ण-पालिताम्--कृष्ण द्वारारक्षित।
योगशक्ति से चित्रलेखा ने उसे कृष्ण के पौत्र ( अनिरुद्ध ) रूप में पहचान लिया।
हे राजन्,तब वह आकाश--मार्ग से द्वारका नगरी गई जो कृष्ण के संरक्षण में थी।
तत्र सुप्तं सुपर्यड्े प्राद्युम्नि योगमास्थिता ।
गृहीत्वा शोणितपुरं सख्यै प्रियमदर्शयत् ॥
२१॥
तत्र--वहाँ; सुप्तम्--सोया हुआ; सु--सुन्दर; पर्यड्ले--बिस्तर पर; प्रद्युम्निम्--प्रद्युम्न के पुत्र को; योगम्--योगशक्ति;आस्थिता--प्रयोग करते हुए; गृहीत्वा--लेकर; शोणित-पुरम्--बाणासुर की राजधानी, शोणितपुर में; सल्शयै-- अपनी सखीके पास; प्रियम्--उसके प्रेमी को; अदर्शयत्--दिखलाया।
वहाँ पर उसने प्रद्यम्न-पुत्र अनिरुद्ध को एक सुन्दर बिस्तर पर सोते पाया।
उसे वह अपनीयोगशक्ति से शोणितपुर ले गई जहाँ उसने अपनी सखी ऊषा को उसका प्रेमी लाकर भेंट करदिया।
साच तं सुन्दरवरं विलोक्य मुदितानना ।
दुष्प्रेक्ष्य स्वगृहे पुम्भी रेमे प्राद्यम्निना समम् ॥
२२॥
सा--वह; च--तथा; तम्ू--उसको; सुन्दर-वरम्--अतीव सुन्दर पुरुष; विलोक्य--देखकर; मुदित--प्रसन्न; आनना--मुखवाली; दुष्प्रेन््ये--जो देखा नहीं जा सकता था; स्व--अपने; गृहे--धर में; पुम्भि:--पुरुषों द्वारा; रेमे--उसने रमण किया;प्रद्युम्निना समम्-प्रद्युम्न के पुत्र के साथ।
जब ऊषा ने पुरुषों में सर्वाधिक सुन्दर उस पुरुष को देखा तो प्रसन्नता के मारे उसका चेहराखिल उठा।
वह प्रद्युम्न के पुत्र को अपने निजी कक्ष में ले गयी जिसे मनुष्यों को देखने तक कीमनाही थी और वहाँ उसने उसके साथ रमण किया।
परार्ध्यवास:स्त्रग्गन्धधूपदीपासनादिभि: ।
'पानभोजनभक्ष्यैश्व वाक्यै: शुश्रूषणार्चित: ॥
२३॥
गूढः कन्यापुरे शश्वत्प्रवृद्धस्नेहया तया ।
नाहर्गणान्स बुबुधे ऊषयापहतेन्द्रियः ॥
२४॥
परार्ध्य-- अमूल्य; वास:--वस्त्रों; स्रकु--मालाओं; गन्ध--सुगन्धियों; धूप-- धूप; दीप--दीपकों; आसन--बैठने के स्थान;आदिभि: --इत्यादि के द्वारा; पान--पेयों; भोजन--चबाकर खाया जाने वाला भोजन; भक्ष्य:--बिना चबाये खाया जाने वालाभोजन; च--भी; वाक्यै:--शब्दों से; शुश्रूषण-- श्रद्धापूर्ण सेवा से; अर्चित:--पूजा किया गया; गूढ:--छिपाकर रखा; कन्या-पुरे--कुमारियों के कक्ष में; शश्वत्ू--निरन्तर; प्रवृद्ध--अत्यधिक बढ़ा हुआ; स्नेहया--स्नेह से; तया--उसके द्वारा; न--नहीं;अहः-गणानू--दिन; सः--वह; बुबुधे --देखा; ऊषया--उषा द्वारा; अपहत--मोड़ी हुई, वशीभूत; इन्द्रियः--उसकी इन्द्रियाँ।
ऊषा ने अमूल्य वस्त्रों के साथ साथ मालाएँ, सुगन्धियाँ, धूप, दीपक, आसन इत्यादि देकरश्रद्धापूर्ण सेवा द्वारा अनिरुद्ध की पूजा की।
उसने उसे पेय, सभी प्रकार के भोजन तथा मधुरशब्द भी प्रदान किये।
इस तरह तरुणियों के कक्ष में छिप कर रहते हुए अनिरुद्ध को समयबीतने का कोई ध्यान न रहा क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ ऊषा द्वारा मोहित कर ली गई थीं।
उसकेप्रति ऊषा का स्नेह निरन्तर बढ़ता जा रहा था।
तां तथा यदुवीरेण भुज्यमानां हतब्रताम् ।
हेतुभिल॑क्षयां चक्कुरापुईतां दुरवच्छदै: ॥
२५॥
भटा आवेदयां चक्रू राजंस्ते दुहितुर्वयम् ।
विचेष्टितं लक्षयाम कन्याया: कुलदूषणम् ॥
२६॥
ताम्ू--उसको; तथा--इस प्रकार; यदु-बीरेण --यदुओं के वीर द्वारा; भुज्यमानाम्ू-- भोग किया जाता; हत--टूटा; ब्रताम्ू--( कौमार्य ) व्रत; हेतुभिः:--लक्षणों से; लक्षयाम् चक्कु:--उन्होंने निश्चित किया; आ-प्रीताम्ू--जो अत्यधिक सुखी था;दुरवच्छदैः--वेश बदलना असम्भव; भटा:--रक्षिकाएँ; आवेदयाम् चक्रुः--घोषित किया; राजनू्--हे राजन; ते--तुम्हारी;दुहितुः--पुत्री का; वयम्--हमने; विचेष्टितम्ू--अनुचित आचरण; लक्षयाम:--देखा है; कन्याया:--कुमारी का; कुल--परिवार; दूषणम्--बट्ठा लगाने वाला
अंत में रक्षिकाओं ने ऊषा में संभोग ( सहवास ) के अचूक लक्षण देखे जिसने अपनाकौमार्य-ब्रत भंग कर दिया था और यदुवीर द्वारा भोगी जा रही थी तथा जिसमें माधुर्य-सुख केलक्षण प्रकट हो रहे थे।
ये रक्षिकाएँ बाणासुर के पास गईं और उससे कहा, 'हे राजन, हमनेआपकी पुत्री में अनुचित आचरण देखा है, जो किसी तरुणी के परिवार की ख्याति को नष्ट- भ्रष्टकरने वाला है।
अनपायिभिरस्माभिर्गुप्तायाश्न गृहे प्रभो ।
कन्याया दूषणं पुम्भिर्दुष्प्रेश्याया न विद्दाह ॥
२७॥
अनपायिभि:--जो कभी बाहर नहीं गये; अस्माभि:--हमरे द्वारा; गुप्ताया:--जिसकी रखवाली की जा रही हो, उसका; च--तथा; गृहे--महल के भीतर; प्रभो--हे स्वामी; कन्याया:--कुमारी का; दूषणम्--दूषित होना; पुम्भि: --मनुष्यों द्वारा;दुष्प्रेकष्याया:--जिसको देख पाना असम्भव हो; न विद्देह -- हमारी समझ में नहीं आता
हे स्वामी, हम अपने स्थानों से कहीं नहीं हटीं और सतर्कतापूर्वक उसकी निगरानी करतीरही हैं अतः यह हमारी समझ में नहीं आता कि यह कुमारी जिसे कोई पुरुष देख भी नहीं पासकता महल के भीतर कैसे दूषित हो गई है।
'ततः प्रव्यधितो बाणो दुहितु: श्रुतदूषण: ।
त्वरितः कन्यकागार प्राप्तोउद्राक्षीद्यदूद्वहम् ॥
२८ ॥
ततः:--तब; प्रव्यधित:--अत्यन्त क्षुब्ध; बाण:--बाणासुर; दुहितु:--अपनी पुत्री का; श्रुत--सुना हुआ; दूषण:--कलंक,व्यभिचार; त्वरित:--तुरन्त; कन््यका--अविवाहित लड़कियों के; आगारम्--आवासों में; प्राप्त: --पहुँचकर; अद्राक्षीत्--देखा;यदु-उद्दहम्--यदुओं में सर्वाधिक प्रसिद्ध ॥
अपनी पुत्री के व्यभिचार को सुनकर अत्यन्त क्षुब्ध बाणासुर तुरन्त ही कुमारियों के आवासोंकी ओर लपका।
वहाँ उसने यदुओं में विख्यात अनिरुद्ध को देखा।
कामात्मजं तं भुवनैकसुन्दरंश्याम पिशड्भाम्बरमम्बुजेक्षणम् ।
बृहद्भुजं कुण्डलकुन्तलत्विषास्मितावलोकेन च मण्डिताननम् ॥
२९॥
दीव्यन्तमक्षै: प्रिययाभिनृम्णया तदड़सड्गस्तनकुड्डू मसत्रजम् ।
बह्लोर्दधानं मधुमल्लिका श्रितांतस्याग्र आसीनमवेक्ष्य विस्मित: ॥
३०॥
काम--कामदेव ( प्रद्युम्न ) के; आत्मजम्--पुत्र को; तम्ू--उस; भुवन--सारे लोकों का; एक--एकमात्र; सुन्दरम्--सौन्दर्य;श्यामम्--साँवले रंग का; पिशड्ु--पीला; अम्बरम्ू--वस्त्र को; अम्बुज--कमलों जैसी; ईक्षणम्-- आँखों को; बृहत्--बलवान; भुजम्-भुजाओं को; कुण्डल--कुण्डलों के; कुन्तल--तथा बालों के गुच्छों की; त्विषा--चमक से; स्मित--हँसतेहुए; अवलोकेन--चितवनों से; च-- भी; मण्डित--सुशोभित; आननमू्--मुखमण्डल को; दीव्यन्तम्ू--खेलते हुए; अक्षैः--पाँसों से; प्रियया--अपनी प्रिया के साथ; अभिनृम्णया--सर्व मंगलमय; तत्--उसके साथ; अड्ग--शारीरिक; सड़--स्पर्श केकारण; स्तन--उसके स्तनों से; कुब्ढु म-कुंकुम से युक्त; स्नजम्--फूलमाला को; बाह्नोः:--उसकी बाहुओं के बीच में;दधानम्--पहने; मधु--वसन्त ऋतु; मल्लिका--चमेली का; आश्रिताम्--बना हुआ; तस्या:--उसके ; अग्रे--सामने;आसीनमू--बैठा हुआ; अवेक्ष्य--देखकर; विस्मित:--चकित |
बाणासुर ने अपने समक्ष अद्वितीय सौन्दर्य से युक्त, साँवले रंग का, पीतवस्त्र पहने कमल-जैसे नेत्रों वाले एवं विशाल बाहुओं वाले कामदेव के आत्मज को देखा।
उसका मुखमंडलतेजोमय कुण्डलों तथा केश से तथा हँसीली चितवनों से सुशोभित था।
जब वह अपनी अत्यन्तमंगलमयी प्रेमिका के सम्मुख बैठा हुआ उसके साथ चौसर खेल रहा था, तो उसकी भुजाओं केबीच में वासन्ती चमेली की माला लटक रही थी जिस पर कुंकुम पुता था, जो उसके द्वाराआलिंगन करने पर उसके स्तनों पर से माला में चुपड़ गया था।
यह सब देखकर बाणासुरचकित था।
सतं प्रविष्ट वृतमाततायिभि-भंटैरनीकेरवलोक्य माधव: ।
उद्यम्य मौर्व परिघं व्यवस्थितोयथान्तको दण्डधरो जिघांसया ॥
३१॥
सः--वह, अनिरुद्ध; तम्--उसको, बाणासुर को; प्रविष्टम्--प्रविष्ट हुआ; वृतम्--घिरा हुआ; आततायिभि:--हथियार लियेहुए; भटैः--रक्षकों द्वारा; अनीकैः--अनेक; अवलोक्य--देखकर; माधव: --अनिरुद्ध; उद्यम्य--उठ कर; मौर्वम्--मुरु लोहेकी बनी; परिघम्--गदा को; व्यवस्थित:--हढ़तापूर्वक खड़े होकर; यथा--सहृश; अन्टक:--साक्षात् काल; दण्ड--डंडा;धर:--लिए हुए; जिघांसबा--मारने के लिए उद्यत |
बाणासुर को अनेक सशस्त्र रक्षकों सहित घुसते हुए देखकर अनिरुद्ध ने अपनी लोहे की गदा उठाई और अपने ऊपर आक्रमण करने वाले पर प्रहार करने के लिए सन्नद्ध होकर तनकरखड़ा हो गया।
वह दण्डधारी साक्षात् काल की तरह लग रहा था।
जिधघृक्षया तान्परितः प्रसर्पत:ःशुनो यथा शूकरयूथपोहनत् ।
ते हन्यमाना भवनाद्विनिर्गतानिर्भिन्नमूर्धोरु भुजाः प्रदुद्वुवुः ॥
३२॥
जिघृक्षया--दबोच लेने के लिए; तान्ू--उनको; परितः--चारों ओर से; प्रसर्पत:--पास आकर; शुन:--कुत्ते; यथा--जिसप्रकार; शूकर--सुअरों के; यूथ--झुंड का; प:--नायक, अगुआ; अहनत्-- उसने प्रहार किया; ते--वे; हन्यमाना: -- प्रहारकिये गये; भवनात्--महल से; विनिर्गता:--बाहर चले गये; निर्भिन्न--टूटे हुए; मूर्ध--सिर; ऊरु--जाँघें; भुजा:--तथाभुजाएँ; प्रदुद्वुवु:--वे भाग गये |
जब रक्षकगण उसे पकड़ने के प्रयास में चारों ओर से उसकी ओर टूट पड़े तो अनिरुद्ध नेउन पर उसी तरह वार किया जिस तरह कुत्तों पर सूअरों का झुंड मुड़ कर प्रहार करता है।
उसकेवारों से आहत रक्षकगण महल से अपनी जान बचाकर भाग गये।
उनके सिर, जाँघें तथा बाहुएँटूट गई थीं।
तं॑ नागपाशैर्बलिनन्दनो बलीघ्नन्तं स्वसैन्यं कुपितो बबन्ध ह ।
ऊषा भृशं शोकविषादविहलाबद्धं निशम्याश्रुकलाक्ष्यरौत्सीतू ॥
३३॥
तम्--उसको; नाग-पाशै:--नाग-पाश से; बलि-नन्दन:--बलि-पुत्र ( बाणासुर ) ने; बली--बलशाली; घ्लन्तम्--प्रहार करतेहुए; स्व--अपनी; सैन्यम्--सेना पर; कुपित:--क्रुद्ध होकर; बबन्ध ह--बाँध लिया; ऊषा--उषा; भृशम्-- अत्यन्त; शोक --शोक; विषाद--तथा हताशा से; विहला--अभिभूत; बद्धम्--बँधा हुआ; निशम्य--सुनकर; अश्रु-कला--आँसुओं की बूँदोंसे; अक्षी--आँखों में; अरौत्सीत्ू--चिल्लाई।
किन्तु जब अनिरुद्ध बाण की सेना पर प्रहार कर रहा था, तो शक्तिशाली बलि-पुत्र नेक्रोधपूर्वक उसे नागपाश से बाँध लिया।
जब ऊषा ने अनिरुद्ध का बाँधा जाना सुना तो वहशोक तथा विषाद से अभिभूत हो गई।
उसकी आँखें आँसू से भर आईं और वह रोने लगी।
