← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय त्रेसठ: भगवान कृष्ण का बाणासुर से युद्ध

10.63रृशुक उबाच अपश्यतां चानिरुद्धं तद्वन्धूनां च भारत ।

चत्वारो वार्षिकामासा व्यतीयुरनुशोचताम्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अपश्यताम्‌-न देखते हुए; च--तथा; अनिरुद्धम्‌ू--अनिरुद्ध को; तत्‌--उसके;बन्धूनाम्‌ू-परिवार वालों के लिए; च--तथा; भारत--हे भरतवंशी ( परीक्षित महाराज ); चत्वार:--चार; वार्षिक:--वर्षा ऋतु के; मासा:--महीने; व्यतीयु:--बीत गये; अनुशोचताम्‌--शोक करते हुए

शुकदेव गोस्वामी ने कहा: हे भारत, अनिरुद्ध के सम्बन्धीजन उसे लौटे न देखकरशोकग्रस्त रहे और इस तरह वर्षा के चार मास बीत गये।

नारदात्तदुपाकर्णय्य वार्ता बद्धस्य कर्म च ।

प्रययु: शोणितपुरं वृष्णय: कृष्णदैवता: ॥

२॥

नारदात्‌ू--नारद से; तत्‌--उस; उपाकर्ण्य--सुनकर; वार्ताम्‌ू--समाचार को; बद्धस्य--पकड़े हुए के विषय में; कर्म--कर्म;च--तथा; प्रययु:--वे गये; शोणित-पुरम्‌--शोणितपुर; वृष्णय: --वृष्णिजन; कृष्ण-- भगवान्‌ कृष्ण; दैवता: --उनके पूज्यदेव के रूप में प्राप्त ।

नारद से अनिरुद्ध के कार्यो तथा उसके बन्दी होने के समाचार सुनकर, भगवान्‌ कृष्ण कोअपना पूज्य देव मानने वाले वृष्णिजन शोणितपुर गये।

प्रद्युम्नो युयुधानश्व गद: साम्बोथ सारण: ।

नन्दोपनन्दभद्राद्या रामकृष्णानुवर्तिन: ॥

३॥

अक्षौहिणीभिद्ठादशभि:ः समेता: सर्वतो दिशम्‌ ।

रुरुधुर्बाणनगरं समन्तात्सात्वतर्षभा: ॥

४॥

प्रद्युम्न: युयुधान: च--प्रद्युम्न तथा युयुधान ( सात्यकि ); गदः साम्ब: अथ सारण: --गद, साम्ब तथा सारण; नन्द-उपनन्द-भद्ग--नन्द, उपनन्द तथा भद्ग; आद्या: --इत्यादि; राम-कृष्ण-अनुवर्तिन: --बलराम तथा कृष्ण के पीछे पीछे; अक्षौहिणीभि:--अक्षौहिणी के साथ; द्वादशभि:--बारह; समेता:--एकत्र; सर्वतः दिशम्‌--सारी दिशाओं में; रुरुधु; --घेर लिया; बाण-नगरम्‌--बाणासुर की नगरी को; समन्तात्‌--पूर्णतया; सात्वत-ऋषभा: --सात्वतों के प्रमुखों ने।

श्री बलराम तथा कृष्ण को आगे करके सात्वत वंश के प्रमुख--प्रद्युम्म, सात्यकि, गद,साम्ब, सारण, नन्द, उपनन्द, भद्र तथा अन्य लोग बारह अक्षौहिणी सेना के साथ एकत्र हुए औरचारों ओर से बाणासुर की नगरी को पूरी तरह से घेर लिया।

भज्यमानपुरोद्यानप्राकाराट्टालगोपुरम्‌ ।

प्रेक्षमाणो रुषाविष्टस्तुल्यसैन्यो भिनिर्ययौं ॥

५॥

भज्यमान--टूट जाने से; पुर--नगरी के; उद्यान--बगीचे; प्राकार--ऊँची दीवारें, परकोटे; अट्टाल--चौकसी मीनोरें, बुर्ज;गोपुरम्‌--तथा प्रवेशद्वार, सिंहद्वार; प्रेश्षकण:--देखते हुए; रुषा--क्रोध से; आविष्ट:--पूरित; तुल्य--समान; सैन्य:--सेना केसाथ; अभिनिर्ययौ--उनकी ओर गये |

उन्हें अपनी नगरी के बाहरी बगीचे, ऊँची दीवारें, मीनारें तथा प्रवेशद्वार नष्ट-भ्रष्ट करतेदेखकर बाणासुर क्रोध से भर उठा और वह उन्हीं के बराबर सेना लेकर उनसे मुठभेड़ करने के लिए निकल आया।

बाणार्थे भगवान्रुद्र: ससुतः प्रमथेर्वृतः ।

आरुह्य नन्दिवृषभं युयुधे रामकृष्णयो: ॥

६॥

बाण-अर्थ--बाण के लिए; भगवान्‌ रुद्र:--शिवजी ने; स-सुतः--पुत्र ( कार्तिकेय, जो कि देव-सेना के सेनापति हैं ) सहित;प्रमथे:--प्रमथों ( योगीजन जो कई रूपों में शिवजी की सेवा करते हैं ) सहित; वृतः--संग में लेकर; आरुह्म--चढ़ कर;नन्दि--नन्दि पर; वृषभम्‌--अपने बैल; युयुधे--युद्ध किया; राम-कृष्णयो: --बलराम तथा कृष्ण से |

भगवान्‌ रुद्र अपने पुत्र कार्तिकेय तथा प्रमथों को साथ लेकर बाणासुर के पक्ष में बलरामतथा कृष्ण से लड़ने के लिए अपने बैल-वाहन नन्दि पर सवार होकर आये।

आसीत्सुतुमुलं युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम्‌ ।

कृष्णशड्डूरयो राजन्प्रद्यम्नगुहयोरपि ॥

७॥

आसीत्‌--हुआ; सु-तुमुलम्‌--अत्यन्त घमासान; युद्धम्‌-युद्ध; अद्भुतम्‌-- अद्भुत; रोम-हर्षणम्‌--शरीर के रोंगटे खड़ा करदेने वाला; कृष्ण-शद्भूरयो:--कृष्ण तथा शिव के मध्य; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); प्रद्युम्न-गुहयो: --प्रद्युम्न तथा कार्तिकेयके मध्य; अपि--भी

तत्पश्चात्‌ अत्यन्त अद्भुत, घमासान तथा रोंगटे खड़ा कर देने वाला युद्ध प्रारम्भ हुआ जिसमें भगवान्‌ कृष्ण शंकर से और प्रद्युम्न कार्तिकेय से भिड़ गये।

कुम्भाण्डकूपकर्णाभ्यां बलेन सह संयुग: ।

साम्बस्य बाणपुत्रेण बाणेन सह सात्यके: ॥

८॥

कुम्भाण्ड-कूपकर्णा भ्यामू--कुम्भाण्ड तथा कूृपकर्ण द्वारा; बलेन सह--बलराम के साथ; संयुग: --युद्ध; साम्बस्य--साम्बका; बाण-पुत्रेण--बाण के पुत्र के साथ; बाणेन सह--बाण के साथ; सात्यके:--सात्यकि का।

बलरामजी ने कुम्भाण्ड तथा कूृपकर्ण से, साम्ब ने बाण-पुत्र से और सात्यकि ने बाण सेयुद्ध किया।

ब्रह्मादय: सुराधीशा मुनयः सिद्धचारणा: ।

गन्धर्वाप्सरसो यक्षा विमानेद्द्रष्ठमागमन्‌ ॥

९॥

ब्रह्-आदय: --ब्रह्मा इत्यादि; सुर--देवताओं के; अधीशा:--शासक; मुनय:--मुनिगण; सिद्ध-चारणा:--सिद्ध तथा चारणदेवतागण; गन्धर्व-अप्सरस:--गन्धर्व तथा अप्सराएँ; यक्षा:--यक्षगण; विमानै: --विमानों से; द्रष्टमू--देखने के लिए;आगमन्‌--आये।

सिद्धों, चारणों, महामुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं तथा यक्षों के साथ ब्रह्म तथा अन्य शासकदेवतागण अपने अपने दिव्य विमानों में चढ़ कर ( युद्ध ) देखने आये।

शड्डूरानुचरान्शौरिभूतप्रम थगुह्मकान्‌ ।

डाकिनीर्यातुधानां श्र वेतालान्सविनायकान्‌ ॥

१०॥

प्रेतमातृपिशाचां श्र कुष्माण्डान्ब्रह्मराक्षसान्‌ ।

द्रावयामास तीक्ष्णाग्रै: शरैः शार्ड्धनुश्च्युते: ॥

११॥

शह्ढभर--शंकर के ; अनुचरान्‌--अनुयायी; शौरि:-- भगवान्‌ कृष्ण ने; भूत-प्रमथ-- भूतों तथा प्रमथगणों; गुह्कान्‌ू--गुह्मकजन( कुबेर के सेवक जो स्वर्ग के कोष की रक्षा करते हैं )) डाकिनी: --देवी काली की सेवा करने वाली असुरिनियों; यातुधानानू--मनुष्यों को खा जाने वाले असुर, जो राक्षस भी कहे जाते हैं; च--तथा; बेतालानू--वेतालों को; स-विनायकान्‌--विनायकोंसमेत; प्रेत--प्रेतगणों; मातृ--मातृपक्ष के असुरों; पिशाचान्‌--अन्तरिक्ष में रहने वाले मांस-भक्षी असुरों; च-- भी;कुष्माण्डानू--शिव के अनुयायियों को जो योगियों के ध्यान को भंग करते रहते हैं; ब्रह्म-राक्षसान्‌ू--उन ब्राह्मणों की आसुरीआत्माएँ जिनकी मृत्यु पाप-कृत्यों से हुई है; द्राववाम्‌ आस--भगा दिया; तीक्ष्ण-अग्रै:--तेज नोक वाले; शरैः--बाणों से;शार्ई-धनु:--शार्ड़् नामक धनुष से; च्युतैः--छोड़े गये।

अपने शार्ड़ धनुष से तेज नोक वाले बाणों को छोड़ते हुए भगवान्‌ कृष्ण ने शिवजी केविविध अनुचरों--भूतों, प्रमथों, गुह्मकों, डाकिनियों, यातुधानों, वेतालों, विनायकों , प्रेतों, माताओं, पिशाचों, कुष्माण्डों तथा ब्रह्म-राक्षमों--को भगा दिया।

पृथग्विधानि प्रायुड्ग पिणाक्यस्त्राणि शा्ईिणे ।

प्रत्यस्त्रे: शमयामास शार्ड्पराणिरविस्मित: ॥

१२॥

पृथक्‌-विधानि--विविध प्रकारों के; प्रायुड्र --लगे हुए; पिणाकी--ब्रिशूलधारी शिवजी ने; अस्त्राणि--हथियार; शार्इिणे--शार्ड़ धनुषधारी कृष्ण के विरुद्ध; प्रति-अस्त्रै:--विरोधी अस्त्रों द्वारा; शमयाम्‌ आस--शान्त कर दिया; शार्ड्-पाणि: -शार्डधनुषधारी; अविस्मित:--तनिक भी चकित हुए बिना।

त्रिशूलधारी शिवजी ने शार्ड्र धनुषधारी कृष्ण पर अनेक हथियार चलाये।

किन्तु कृष्णतनिक भी विचलित नहीं हुए--उन्होंने उपयुक्त प्रतिअस्त्रों द्वारा इन सारे हथियारों को निष्प्रभावितकर दिया।

ब्रह्मास्त्रस्य च ब्रह्मास्त्रं वायव्यस्य च पार्वतम्‌ ॥

आग्नेयस्य च पार्जन्यं नैजं पाशुपतस्य च ॥

१३॥

ब्रह्म-अस्त्रस्य--ब्रह्मासत्र का; च--तथा; ब्रह्म-अस्त्रम्‌ू--ब्रह्मास्त्र से; वायव्यस्थ--हवाई हथियार का; च--तथा; पार्वतम्‌--पर्वतअस्त्र से; आग्नेयस्थ--आग्नेयास्त्र का; च--तथा; पार्जन्यम्‌ू--वर्षा अस्त्र से; नैजम्‌ू--अपने निजी ( नारायणास्त्र ) से;पाशुपतस्य--शिवजी के पाशुपतास्त्र का; च--तथा |

भगवान्‌ कृष्ण ने ब्रह्मास्त्र का सामना दूसरे ब्रह्मास्त्र से, वायुअस्त्र का सामना पर्वत अस्त्र से,अग्नि अस्त्र का वर्षा अस्त्र से तथा शिवजी के निजी पाशुपतास्त्र का सामना अपने निजी अस्त्रनारायणास्त्र से किया।

मोहयित्वा तु गिरिशं जृम्भणास्त्रेण जृम्भितम्‌ ।

बाणस्य पृतनां शौरिर्जघानासिगदेषुभि: ॥

१४॥

मोहयित्वा--मोहित करके; तु--तब; गिरिशम्‌--शिवजी को; जृम्भण-अस्त्रेण-- जँभाई लाने वाले अस्त्र से; जृम्भितम्‌--जँभाईलाते हुए; बाणस्य--बाण की; पृतनाम्‌--सेना को; शौरि: --कृष्ण; जघान--मारने लगे; असि--तलवार; गदा--गदा;इषुशि:--तथा बाणों से

जृम्भणास्त्र द्वारा जम्भाई लिवाकर शिवजी को मोहित कर देने के बाद कृष्ण बाणासुर कीसेना को अपनी तलवार, गदा तथा बाणों से मारने लगे।

स्कन्दः प्रद्युम्मनबाणौघैरर्यमान: समन्ततः ।

असृग्विमुज्ञन्गात्रेभ्य: शिरखिनापक्रमद्रणात्‌ ॥

१५॥

स्कन्दः--कार्तिकेय; प्रद्यम्न-लाण--प्रद्युम्न के बाणों की; ओघै:--वर्षा से; अर्द्मान:--व्यधित हुआ; समन्तत:--चारों ओर;असृक्‌--रक्त; विमुझ्नन्‌-गिराते हुए; गात्रेभ्य:--अपने अंगों से; शिखिना--मोर वाहन पर; अपाक्रमत्‌--चला गया; रणात्‌--युद्धभूमि से।

कार्तिकेय चारों ओर से हो रही प्रद्युम्म के बाणों की वर्षा से व्यथित थे अतः वे अपने मोर-वाहन पर चढ़ कर युद्धभूमि से भाग गये क्योंकि उनके अंग-प्रत्यंग से रक्त निकलने लगा था।

कुम्भाण्डकूपकर्णश्च पेततुर्मुषलार्दितो ।

दुद्वुवुस्तदनीकनि हतनाथानि सर्वत: ॥

१६॥

कुम्भाण्ड-कूपकर्ण: च--कुम्भाण्ड तथा कूपकर्ण; पेततु:--गिर पड़े; मुषल--( बलराम की ) गदा से; अर्दितौ--चोट खाकर;दुद्दुव:-- भाग गये; तत्‌--उनकी; अनीकानि--सेनाएँ; हत--मारे गये; नाथानि--जिनके सेना-नायक; सर्वतः--सभी दिशाओंमें

कुम्भाण्ड तथा कूपकर्ण बलराम की गदा से चोट खाकर धराशायी हो गये।

जब इन दोनोंअसुरों के सैनिकों ने देखा कि उनके सेना-नायक मारे जा चुके हैं, तो वे सभी दिशाओं मेंतितर-बितर हो गये।

विशीर्यमाणम्स्वबलं दृष्ठा बाणोउत्यमर्षित: ।

कृष्णमभ्यद्रवत्सड्ख्ये रथी हित्वैव सात्यकिम्‌ ॥

१७॥

विशीर्यमाणम्‌--छिन्न-भिन्न किये हुए; स्व--अपनी; बलम्‌--सेना को; हृष्टा--देखकर; बाण:--बाण; अति--अत्यन्त;अमर्षित:--क्रुद्ध; कृष्णम्‌--कृष्ण पर; अभ्यद्रवत्‌-- आक्रमण कर दिया; सड्ख्ये--युद्धभूमि में; रथी--रथ पर सवार;हित्वा--एक तरफ छोड़ कर; एव--निस्सन्देह; सात्यकिम्‌--सात्यकि को |

बाणासुर अपनी समूची सेना को छिन्नभिन्न होते देखकर अत्यन्त क्रुद्ध हुआ।

सात्यकि सेलड़ना छोड़ कर और अपने रथ पर सवार होकर युद्धभूमि को पार करते हुए उसने कृष्ण परआक्रमण कर दिया।

ध्नूंष्याकृष्य युगपद्‌ बाण: पञ्नशतानि वे ।

एकैकस्मिन्शरी द्वौ द्वौ सन्दधे रणदुर्मद: ॥

१८॥

धनूंषि-- धनुषों को; आकृष्य--खींचकर; युगपत्‌--एकसाथ; बाण:--बाण ने; पञ्ञ-शतानि--पाँच सौ; वै--निस्सन्देह; एक-एकस्मिनू--हर एक पर; शरौ--तीर; द्वौ द्वौ--दो दो; सन्दधे-- चढ़ाया; रण--युद्ध के कारण; दुर्मद:--घमंड से मतवाला।

युद्ध करने की सनक में बहकर बाण ने एकसाथ अपने पाँच सौ धनुषों की डोरियाँ खींचकर हर डोरी पर दो दो बाण चढ़ाये।

तानि चिच्छेद भगवान्धनूंसि युगपद्धरिः ।

सारथि रथमश्रां श्र हत्वा शद्बुमपूरयत्‌ ॥

१९॥

तानि--उन; चिच्छेद--काट दिया; भगवान्‌--भगवान्‌; धनूंसि--धनुषों को; युगपत्‌--एक ही बार में; हरि: -- श्रीकृष्ण ने;सारथिम्‌--रथ हाँकने वाले को; रथम्‌-रथ को; अश्वान्‌--घोड़ों को; च--तथा; हत्वा--मार कर; शद्भुमू--अपना शंख;अपूरयत्‌--बजाया |

भगवान्‌ श्री हरि ने बाणासुर के सारे धनुषों को एक ही साथ काट दिया और उसके सारथी,रथ तथा घोड़ों को मार गिराया।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ने अपना शंख बजाया।

तन्माता कोटरा नाम नग्ना मक्तशिरोरुहा ।

पुरोवतस्थे कृष्णस्य पुत्रप्राणरिरक्षया ॥

२०॥

तत्‌--उसकी ( बाणासुर की ); माता--माता; कोटरा नाम--कोटरा नामक; नग्ना--नंगी; मुक्त--खोले; शिर:-रूहा--अपनेबाल; पुर:--सामने; अवतस्थे--खड़ी हो गईं; कृष्णस्य--कृष्ण के; पुत्र--अपने पुत्र के; प्राण--जीवन; रिरक्षया--बचाने कीआशा से।

तभी बाणासुर की माता कोटरा अपने पुत्र के प्राण बचाने की इच्छा से भगवान्‌ कृष्ण केसमक्ष नंग-धड़ंग तथा बाल बिखेरे आ धमकी।

ततस्तिर्यड्मुखो नग्नामनिरीक्षन्गदाग्रज: ।

बाणश्च तावद्विरथश्छिन्नधन्वाविशत्पुरम्‌ ॥

२१॥

ततः--तब; तिर्यक्‌ू--पीछे की ओर किये; मुखः--अपना मुँह; नग्नामू--नग्न स्त्री को; अनिरीक्षन्‌--न देखते हुए; गदाग्रज:--कृष्ण; बाण: --बाण; च--तथा; तावत्‌--उस अवसर पर; विरथ:--रथविहीन; छिन्न--टूटा हुआ; धन्वा-- धनुष; आविशत्‌--प्रविष्ट हुआ; पुरम्‌--नगरी में

भगवान्‌ गदाग्रज ने उस नंगी स्त्री को देखे जाने से बचने के लिए अपना मुख पीछे की ओरमोड़ लिया और रथविहीन हो जाने तथा धनुष के टूट जाने से बाणासुर इस अवसर का लाभउठाकर अपने नगर को भाग गया।

विद्राविते भूतगणे ज्वरस्तु त्रीशिरास्त्रीपात्‌ ।

अभ्यधावत दाशाहई दहन्निव दिशो दश ॥

२२॥

विद्राविते-- भगा दिये जाने पर; भूत-गणे--शिवजी के सारे अनुचरों के; ज्वरः--शिवजी की सेवा करने वाला साक्षात्‌ ज्वर;तु--लेकिन; त्रि--तीन; शिरा:--सिर वाले; त्रि--तीन; पातू--पाँव वाले; अभ्यधावत--की ओर दौड़ा; दाशाईम्‌-- भगवान्‌कृष्ण को; दहन्‌--जलाते हुए; इब--सहृश; दिशः--दिशाएँ; दश--दसों |

जब शिवजी के अनुचर भगा दिये गये, तो तीन सिर तथा तीन पैर वाला शिवज्वर कृष्ण परआक्रमण करने के लिए आगे लपका।

ज्योंही शिवज्वर निकट पहुँचा तो ऐसा लगा कि वह दसोंदिशाओं की सारी वस्तुओं को जला देगा।

अथ नारायण: देव: तं दृष्ठा व्यसृजज्वरम्‌ ।

माहे श्वरो वैष्णवश्च युयुधाते ज्वरावुभी ॥

२३॥

अथ--तत्पश्चात; नारायण: देव:--भगवान्‌ नारायण ( कृष्ण ) ने; तम्‌--उस ( शिवज्वर ) को; दृष्टा--देखकर; व्यसृजत्‌ू--छोड़दिया; ज्वरम्‌--अपना साक्षात्‌ ज्वर ( जो अतीव शीतल था, जबकि शिवज्वर अतीव गर्म था ); माहेश्वरः--महे ध्वर का;वैष्णव: -- भगवान्‌ विष्णु के; च--तथा; युयुधाते-- लड़ने लगे; ज्वरौ--दो ज्वर; उभौ--एक-दूसरे के विरुद्ध |

तत्पश्चात्‌ इस अस्त्र को पास आते देखकर भगवान्‌ नारायण ने अपना निजी ज्वर अस्त्र,विष्णुज्वर, छोड़ा ।

इस तरह शिवज्वर तथा विष्णुज्वर एक-दूसरे से युद्ध करने लगे।

महे श्वरः समाक्रन्दन्वैष्णवेन बलार्दित: ।

अलब्ध्वाभयमन्यत्र भीतो माहे श्वरो ज्वरः ।

शरणार्थी हृषीकेशं तुष्टाव प्रयताझ्ललि: ॥

२४॥

माहेश्वः --शिव का ( ज्वर अस्त्र ); समाक्रन्दन्‌--चिल्लाता हुआ; वैष्णवेन--वैष्णवज्वर के; बल--बल से; अर्दित:--पीड़ित;अलब्ध्वा--न पाकर; अभयम्‌--निडरता; अन्यत्र--और कहीं; भीत:--डरा हुआ; माहेश्वर: ज्वरः --शिव ज्वर; शरण--शरणके लिए; अर्थी--लालायित; हषीकेशम्‌--हर एक की इन्द्रियों के स्वामी, भगवान्‌ कृष्ण की; तुष्टाव--उसने प्रशंसा की; प्रयत-अज्जलि:ः--हाथ जोड़कर

विष्णुज्वर के बल से परास्त शिवज्वर पीड़ा से चिल्ला उठा।

किन्तु कहीं आश्रय न पाकर भयभीत हुआ शिवज्वर इन्द्रियों के स्वामी कृष्ण के पास शरण पाने की आशा से आया।

इसतरह वह अपने हाथ जोड़कर उनकी प्रशंसा करने लगा।

ज्वर उवाचनमामि त्वानन्तशक्ति परेशम्‌सर्वात्मानं केवल ज्ञप्तिमात्रम्‌ ।

विश्वोत्पत्तिस्थानसंरो धहेतुयक्तद्रह्म ब्रह्मलिड्डम्प्रशान्तम्‌ ॥

२५॥

ज्वरः उबाच--( शिव ) ज्वर ने कहा; नमामि--मैं नमस्कार करता हूँ; त्वा--तुमको; अनन्त--अनन्त; शक्तिमू--शक्ति वाले;पर--परम; ईशम्‌--स्वामी; सर्व--सबों के; आत्मानम्‌ू--आत्मा; केवलम्‌-- शुद्ध; ज्ञप्ति-- चेतना की; मात्रमू--समग्रता;विश्व--ब्रह्माण्ड की; उत्पत्ति--उत्पत्ति; स्थान--पालन; संरोध--तथा संहार का; हेतुमू--कारण; यत्‌--जो; तत्‌--वह; ब्रह्म--ब्रह्म, परम सत्य; ब्रह्म--वेदों द्वारा; लिन्गमू--जिसका अप्रत्यक्ष प्रसंग ( अनुमान ); प्रशान्तम्‌--पूर्णतया शान्त ।

शिवज्वर ने कहा : हे अनन्त शक्ति वाले, समस्त जीवों के परमात्मा भगवान्‌, मैं आपकोनमस्कार करता हूँ।

आप शुद्ध तथा पूर्ण चेतना से युक्त हैं और इस विराट ब्रह्माण्ड की सृष्टि,पालन तथा संहार के कारण हैं।

आप पूर्ण शान्त हैं और आप परम सत्य ( ब्रह्म ) हैं जिनकाप्रकारान्तर से सारे वेद उल्लेख करते हैं।

कालो दैवं कर्म जीव: स्वभावोद्रव्यं क्षेत्र प्राण आत्मा विकार: ।

तत्सझ्लातो बीजरोहप्रवाह-स्त्वन्मायैषा ततन्निषेधं प्रपह्ये ॥

२६॥

'काल:--समय; दैवम्‌-- भाग्य; कर्म-- भौतिक कर्म के फल; जीव:--व्यष्टि जीव; स्वभाव:--उसकी इच्छाएँ; द्रव्यम्‌--पदार्थका सूक्ष्म रूप; क्षेत्रमू--शरीर; प्राण:--प्राण-वायु; आत्मा--मिथ्या अहंकार; विकार: --( ग्यारह इन्द्रियों के ) रूपान्तर; तत्‌--इन सबों का; सट्भाट:--संमेल ( सूक्ष्म शरीर के रूप में ); बीज--बीज; रोह--तथा अंकुर का; प्रवाह: --निरन्तर बहाव; त्वत्‌--तुम्हारा; माया-- भौतिक मोहिनी शक्ति; एघा--यह; तत्‌--इसके; निषेधम्‌--निषेध ( आप ); प्रपद्ये--शरण के लिए आया हूँ।

काल, भाग्य, कर्म, जीव तथा उसका स्वभाव, सूक्ष्म भौतिक तत्त्व, भौतिक शरीर, प्राण-वायु, मिथ्या अहंकार, विभिन्न इन्द्रियाँ तथा जीव के सूक्ष्म शरीर में प्रतिबिम्बित इन सबों कीसमग्रता--ये सभी आपकी माया हैं, जो बीज तथा पौधे के अन्तहीन चक्र जैसे हैं।

इस माया कानिषेध, मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ।

नानाभावैलीलयैवोपपन्नै -देवान्साधूनलोकसेतून्बिभर्षि ।

हंस्युन्मार्गान्हिंसया वर्तमानान्‌जन्मैतत्ते भारहाराय भूमे: ॥

२७॥

नाना--विविध; भावै: --मनो भावों से; लीलया--लीलाओं के रूप में; एब--निस्सन्देह; उपपन्नैः--कल्पित; देवानू--देवताओं;साधूनू--साधुओं; लोक--संसार के; सेतून्‌-- धर्मसंहिता को; बिभर्षि--स्थिर रखते हो; हंसि--संहार करते हो; उत्‌-मार्गानू--मार्ग से विपथ; हिंसया--हिंसा द्वारा; वर्तमानान्‌ू--जीवित; जन्म--जन्म; एतत्‌--यह; ते--तुम्हारा; भार-- भार; हाराय--उतारने के लिए; भूमेः--पृथ्वी का ।

आप देवताओं, साधुओं तथा इस जगत के लिए धर्मसंहिता को बनाये रखने के लिए अनेकभावों से लीलाएँ करते हैं।

इन लीलाओं से आप उनका भी वध करते हैं, जो सही मार्ग से हटजाते हैं और हिंसा द्वारा जीवन-यापन करते हैं।

निस्सन्देह आपका वर्तमान अवतार पृथ्वी का भारउतारने के लिए है।

तप्तोहम्ते तेजसा दुःसहेनशान्तोग्रेणात्युल्बणेन ज्वरेण ।

तावत्तापो देहिनां तेडन्ध्रिमूलंनो सेवेरन्यावदाशानुबद्धा: ॥

२८॥

तप्त:--जलाया हुआ; अहम्‌--मैं; ते--तुम्हारी; तेजसा--शक्ति द्वारा; दुःसहेन--दुस्सह; शान्त--ठण्डा, शीतल; उग्रेण--फिरभी तप्त; अति--अत्यधिक; उल्बणेन-- भयानक; ज्वरेण--ज्वर से; तावत्‌--तब तक; ताप:-- जलन; देहिनामू--देहधारियोंकी; ते--तुम्हारे; अड्प्रि--चरणों के; मूलम्‌ू--तलवा; न--नहीं; उ--निस्सन्देह; सेवेरन्‌ू--सेवा करते हैं; यावत्‌--जब तक;आशा--भौतिक इच्छाओं से; अनुबद्धा:--सतत बँधे हुए।

मैं आपके भयानक ज्वर अस्त्र के भयानक तेज से त्रस्त हूँ जो शीतल होकर भी ज्वल्यमानहै।

सारे देहधारी जीव तब तक कष्ट भोगते हैं जब तक वे भौतिक महत्वाकांक्षाओं से बँधे रहते हैंऔर आपके चरणकमलों की सेवा करने से दूर भागते हैं।

श्रीभगवानुवाचत्रिशिरस्ते प्रसन्नोउस्मि व्येतु ते मज्चराद्धयम्‌ ।

यो नौ स्मरति संवादं तस्य त्वन्न भवेद्धयम्‌ ॥

२९॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; त्रि-शिरः--हे तीन सिरों वाले; ते--तुमसे; प्रसन्न: --प्रसन्न; अस्मि--हूँ; व्येतु--चलाजाये; ते--तुम्हारा; मत्‌-- मेरे; ज्वरात्‌--ज्वर अस्त्र से; भयम्‌-- भय; यः--जो भी; नौ--हमारा; स्मरति--स्मरण करता है;संवादम्‌--वार्तालाप; तस्य--उसका; त्वत्‌--तुम्हारा; न भवेत्‌--नहीं हो; भयम्‌-- भय |

भगवान्‌ ने कहा : हे तीन सिरों वाले, मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।

मेरे ज्वर अस्त्र से तुम्हारा भय दूर होऔर जो कोई भी हमारी इस वार्ता को सुने वह तुमसे भयभीत न हो।

इत्युक्तोच्युतमानम्य गतो माहे श्वरो ज्वरः ।

बाणस्तु रथमारूढः प्रागाद्योत्स्यन्जनार्दनम्‌ ॥

३०॥

इति--इस प्रकार; उक्त: --कहे जाने पर अच्युतम्‌ --- अच्युत भगवान्‌ कृष्ण द्वारा; आनम्य---झुक कर; गत:--चला गया;माहेश्वरः:--शिव का; ज्वर:--ज्वर अस्त्र; बाण:--बाण; तु--लेकिन; रथम्‌ू--अपने रथ पर; आरूढ:--चढ़ कर; प्रागात्‌--आगे आया; योत्स्यन्‌--युद्ध करने के उद्देश्य से; जनार्दनम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण से।

ऐसा कहे जाने पर माहे श्वर-ज्वर ने अच्युत भगवान्‌ को प्रणाम किया और चला गया।

किन्तुतभी बाणासुर अपने रथ पर सवार होकर भगवान्‌ कृष्ण से लड़ने के लिए प्रकट हुआ।

ततो बाहुसहस्त्रेण नानायुधधरोउसुर: ।

मुमोच परमक्रुद्धो बाणांश्रक्रायुधे नूप ॥

३१॥

ततः--तत्पश्चात; बाहु--अपनी भुजाओं से; सहस्त्रेण--एक हजार; नाना--अनेक; आयुध--हथियार; धर: -- धारण किये;असुरः--असुर ने; मुमोच--छोड़ा; परम--अत्यधिक; क्ुद्ध:--क्रुद्ध: बाणान्‌ू--बाणों को; चक्र-आयुधे --चक्रधारी पर;नृप--हे राजा ( परीक्षित )

हे राजन, अपने एक हजार हाथों में असंख्य हथियार लिए उस अतीव क्रुद्ध असुर नेचक्रधारी भगवान्‌ कृष्ण पर अनेक बाण छोड़े।

तस्यास्यतोउस्त्राण्यसकृच्चक्रेण क्षुरनेमिना ।

चिच्छेद भगवान्बाहून्शाखा इव वनस्पते: ॥

३२॥

तस्य--उसके ; अस्यतः--फेंके गये; अस्त्राणि--हथियारों को; असकृत्‌--बारम्बार; चक्रेण -- अपने चक्र से; क्षुर--तेज;नेमिना--परिधि वाले; चिच्छेद--काट डाला; भगवानू-- भगवान्‌ ने; बाहूनू-- भुजाएँ; शाखा:--टहनियों; इब--की तरह;वनस्पते:--वृक्ष की |

जब बाण भगवान्‌ पर लगातार हथियार बरसाता रहा तो उन्होंने अपने तेज चक्र से बाणासुरकी भुजाओं को काट डाला मानो वे वृक्ष की टहनियाँ हों।

बाहुषु छिद्यमानेषु बाणस्य भगवान्भव: ।

भक्तानकमप्प्युपब्रज्य चक्रायुधमभाषत ॥

३३॥

बाहुषु--बाहों पर; छिद्यमानेषु--काटी जाती हुईं; बाणस्य--बाणासुर की; भगवान्‌ भव:--शिवजी; भक्त--अपने भक्त केप्रति; अनुकम्पी--दयालु; उपब्रज्य--पास जाकर; चक्र-आयुधम्‌--चक्र धारी कृष्ण से; अभाषत--बोले।

बाणासुर की भुजाएँ कटते देखकर शिवजी को अपने भक्त के प्रति दया आ गयी अतः वेभगवान्‌ चक्रायुध ( कृष्ण ) के पास पहुँचे और उनसे इस प्रकार बोले।

श्रीरुद्र उबाचत्वं हि ब्रह्म परं ज्योतिर्गूढ ब्रह्मणि वाड्मये ।

यं पश्यन्त्यमलात्मान आकाशमिव केवलम्‌ ॥

३४॥

श्री-रुद्रः उबाच--शिव ने कहा; त्वम्‌--तुम; हि-- अकेले; ब्रह्म--परम सत्य; परमू--परम; ज्योति:-- प्रकाश; गूढम्‌--छिपाहुआ; ब्रह्मणि--ब्रह्म में; वाक्‌ू-मये-- भाषा के रूप में ( वेदों में )।

यम्‌--जिसको; पश्यन्ति--देखते हैं; अमल--निष्कलंक;आत्मान:--जिनके हृदय; आकाशम्‌--आकाश के; इब--सहृश; केवलम्‌--शुद्धश्री रुद्र ने कहा: आप ही एकमात्र परम सत्य, परम ज्योति तथा ब्रह्म की शाब्दिकअभिव्यक्ति के भीतर के गुह्य रहस्य हैं।

जिनके हृदय निर्मल हैं, वे आपका दर्शन कर सकते हैंक्योंकि आप आकाश की भाँति निर्मल हैं।

नाभिर्नभो उग्निर्मुखमम्बु रेतोहो: शीर्षमाशा: श्रुतिरड्प्रिरुर्वी ।

चन्द्रो मनो यस्य हगर्क आत्माअहं समुद्रो जठरं भुजेन्द्र: ॥

३५॥

रोमाणि यस्यौषधयोम्बुवाहा:केशा विरिश्ञो धिषणा विसर्ग: ।

प्रजापतिहदयं यस्य धर्म:स वे भवान्पुरुषो लोककल्प: ॥

३६॥

नाभि:--नाभि; नभ:ः--आकाश; अग्नि:--अग्नि; मुखम्‌--मुख; अम्बु--जल; रेत:--वीर्य; द्यौ:--स्वर्ग; शीर्षम्‌--सिर;आशा:-दिशाएँ; श्रुति:-- श्रवणेन्द्रिय; अड्धध्रि:--पाँव; उर्वी--पृथ्वी; चन्द्र:--चन्द्रमा; मन:--मन; यस्य--जिसकी; हक्‌--दृष्टि; अर्क:--सूर्य; आत्मा--आत्मचेतना; अहम्‌--मैं ( शिव ); समुद्र:--समुद्र; जठरम्‌--उदर; भुज--बाहु; इन्द्र:--इन्द्र;रोमाणि--शरीर के रोएँ; यस्य--जिसके; ओषधय: -- औषधीय पौधे; अम्बु-वाहा:--जलवाहक बादल; केशा:--सिर केबाल; विरिज्ञ:--ब्रह्मा; धिषणा--विवेक, बुद्धि; विसर्ग:--जननेन्द्रियाँ; प्रजा-पति:--मनुष्य को उत्पन्न करने वाला; हृदयम्‌--हृदय; यस्य--जिसका; धर्म:--धर्म; सः--वह; बै--निस्सन्देह; भवान्‌ू--आप; पुरुष:--आदि-स्त्रष्टा।

लोक--सारे लोक;कल्पः--जिससे उत्पन्नआकाश आपकी नाभि है, अग्नि आपका मुख है, जल आपका वीर्य है और स्वर्ग आपकासिर है।

दिशाएँ आपकी श्रवणेन्द्रिय ( कान ) हैं, औषधि-पौधे आपके शरीर के रोएँ हैं तथाजलधारक बादल आपके सिर के बाल हैं।

पृथ्वी आपका पाँव है, चन्द्रमा आपका मन है तथासूर्य आपकी दृष्टि ( नेत्र ) है, जबकि मैं आपका अहंकार हूँ।

समुद्र आपका उदर है, इन्द्र आपकीभुजा है, ब्रह्मा आपकी बुद्धि है, प्रजापति आपकी जननेन्द्रिय ( लिंग ) है और धर्म आपका हृदयहै।

असल में आप आदि-पुरुष हैं, लोकों के स्रष्टा हैं।

तवावतारोयमकुण्ठधामन्‌धर्मस्य गुप्त्य जगतो हिताय ।

बयं च सर्वे भवतानुभाविताविभावयामो भुवनानि सप्त ॥

३७॥

तवब--तुम्हारा; अवतार: -- अवतार; अयम्‌--यह; अकुण्ठ--असीम; धामन्‌--हे शक्ति वाले; धर्मस्य--न्याय की; गुप्त्यै--रक्षाके लिए; जगत:--ब्रह्माण्ड के; हिताय--लाभ के लिए; वयम्‌--हम; च--भी; सर्वे--सभी; भवता--आपके द्वारा;अनुभाविता:-प्रबुद्ध तथा अधिकारप्राप्त; विभावयाम:--हम प्रकट करते तथा उत्पन्न करते हैं; भुवनानि--जगतों को; सप्त--सात

है असीम शक्ति के स्वामी, इस भौतिक जगत में आपका वर्तमान अवतार न्याय केसिद्धान्तों की रक्षा करने तथा समग्र ब्रह्माण्ड को लाभ दिलाने के निमित्त है।

हममें से प्रत्येकदेवता आपकी कृपा तथा सत्ता पर आश्रित है और हम सभी देवता सात लोक मण्डलों को उत्पन्न करते हैं।

त्वमेक आद्यः पुरुषोद्वितीय-स्तुर्यः स्वच्ग्धेतुरहेतुरीश: ।

प्रतीयसेथापि यथाविकारंस्वमायया सर्वगुणप्रसिद्धय॑ ॥

३८ ॥

त्वमू--तुम; एक:--एक; आद्य:--आदि; पुरुष: --परम पुरुष; अद्वितीय: --अद्वितीय; तुर्य: --दिव्य; स्व-हक्‌--स्वयं प्रकाश;हेतु:--कारण; अहेतु:--कारणरहित; ईशः --परम नियन्ता; प्रतीयसे-- अनुभव किये जाते हो; अथ अपि--इतने पर भी;यथा--के अनुसार; विकारम्‌--विविध रूपान्तरों; स्व--अपनी; मायया--माया से; सर्व--समस्त; गुण--गुणों की;प्रसिद्धबै--पूर्ण अभिव्यक्ति के लिए

आप अद्वितीय, दिव्य तथा स्वयं-प्रकाश आदि-पुरुष हैं।

अहैतुक होकर भी आप सबों केकारण हैं और परम नियन्ता हैं।

तिस पर भी आप पदार्थ के उन विकारों के रूप में अनुभव कियेजाते हैं, जो आपकी माया द्वारा उत्पन्न हैं।

आप इन विकारों की स्वीकृति इसलिए देते हैं जिससेविविध भौतिक गुण पूरी तरह प्रकट हो सकें।

यथैव सूर्य: पिहितश्छायया स्वयाछायां च रूपाणि च सज्ञकास्ति ।

एवं गुणेनापिहितो गुणांस्त्व-मात्मप्रदीपो गुणिनश्च भूमन्‌ ॥

३९॥

यथा एब--जिस तरह; सूर्य:--सूर्य; पिहित: --ढका; छायया--छाया से; स्वया--अपनी; छायाम्‌--छाया को; च--तथा;रूपाणि--हृश्य रूप; च-- भी; सज्ञकास्ति-- प्रकाशित करता है; एवम्‌--उसी तरह से; गुणेन--भौतिक गुण ( मिथ्या अहंकारका ) द्वारा; अपिहित:--ढका हुआ; गुणान्‌ू--पदार्थ के गुणों के; त्वमू--तुम; आत्म-प्रदीप:--स्वयं प्रकाशित; गुणिन:--इनगुणों का स्वामी ( जीव ); च--तथा; भूमन्‌--हे सर्वशक्तिमान |

हे सर्वशक्तिमान, जिस प्रकार सूर्य बादल से ढका होने पर भी बादल को तथा अन्य सारेहृश्य रूपों को भी प्रकाशित करता है उसी तरह आप भौतिक गुणों से ढके रहने पर भी स्वयंप्रकाशित बने रहते हैं और उन सारे गुणों को, उन गुणों से युक्त जीवों समेत, प्रकट करते हैं।

यन्मायामोहितधिय: पुत्रदारगृहादिषु ।

उन्मज्जन्ति निमज्नन्ति प्रसक्ता वृजिनार्णवे ॥

४०॥

यत्‌--जिसकी; माया--माया से; मोहित--मोहित; धिय:--उनकी बुद्धि; पुत्र--पुत्र; दार--पती; गृह--घर; आदिषु--इत्यादिमें; उनन्‍्मज्जन्ति--वे ऊपर उठ आते हैं; निमज्जन्ति--डूब जाते हैं; प्रसक्ता:--पूरी तरह फँसे हुए; वृजिन--दुख के; अर्गवे--समुद्रमें

आपकी माया से मोहित बुद्धि वाले अपने बच्चों, पत्नी, घर इत्यादि में पूरी तरह से लिप्तऔर भौतिक दुख के सागर में निमग्न लोग कभी ऊपर उठते हैं, तो कभी नीचे डुब जाते हैं।

देवदत्तमिमं लब्ध्वा नूलोकमजितेन्द्रिय: ।

यो नाद्रियेत त्वत्पादौ स शोच्यो ह्यात्मवज्ञकः: ॥

४१॥

देव--भगवान्‌ द्वारा; दत्तमू--दिया हुआ; इमम्‌--इसको; लब्ध्वा--प्राप्त करके; नू--मनुष्यों का; लोकम्‌--संसार; अजित--अवश्य; इन्द्रियः--उसकी इन्द्रियाँ; यः--जो; न आद्रियेत--आदर नहीं करेगा; त्वत्‌ू--तुम्हारे; पादौ--पाँव; सः--वह;शोच्य:--दयनीय; हि--निस्सन्देह; आत्म-- अपना; वज्ञक:--ठग, धोखा देने वाली |

जिसने ईश्वर से यह मनुष्य जीवन उपहार के रूप में प्राप्त किया है किन्तु फिर भी जो अपनीइन्द्रियों को वश में करने तथा आपके चरणों का आदर करने में विफल रहता है, वह सचमुचशोचनीय है क्योंकि वह अपने को ही धोखा देता है।

यस्त्वां विसृजते मर्त्य आत्मानं प्रियमी ध्वरम्‌ ।

विपर्ययेन्द्रियार्थार्थ विषमत्त्यमृतं त्यजन्‌ ॥

४२॥

यः--जो; त्वाम्‌--तुमको; विसृजते--छोड़ देता है; मर्त्य:--मरणशील मनुष्य; आत्मानमू--उसकी सही आत्मा; प्रियम्‌--सर्वप्रिय; ईश्वरम्‌-- भगवान्‌ को; विपर्यय--जो सर्वथा विपरीत हैं; इन्द्रिय-अर्थ--इन्द्रियविषयों के; अर्थम्‌--हेतु; विषम्‌ू--विषको; अत्ति--खाता है; अमृतम्‌--अमृत को; त्यजन्‌--त्यागते हुए।

जो मर्त्य प्राणी अपने इन्द्रियविषयों के लिए, जिनका की स्वभाव सर्वथा विपरीत है,आपको, अर्थात्‌ उसकी असली आत्मा, सर्वप्रिय मित्र तथा स्वामी हैं, छोड़ देता है, वह अमृतछोड़ कर उसके बदले में विष-पान करता है।

अहं ब्रह्माथ विबुधा मुनयश्चामलाशया: ।

सर्वात्मना प्रपन्नास्त्वामात्मानं प्रेष्ठमी श्वरम्‌ ॥

४३ ॥

अहम्‌--ैं; ब्रह्मा --ब्रह्मा; अथ--तथा; विबुधा:--देवतागण; मुनयः--मुनिगण; च--और; अमल--शुद्ध; आशया: --चेतनावाले; सर्व-आत्मना--हार्दिक रूप से; प्रपन्ना:--शरणागत; त्वाम्‌--तुमको; आत्मानम्‌--आत्मा; प्रेष्ठम--प्रियतम; ईश्वरम्‌-प्रभुको

मैंने, ब्रह्मा ने, अन्य देवता तथा शुद्ध मन वाले मुनिगण--सभी लोगों ने पूर्ण मनोयोग सेआपकी शरण ग्रहण की है।

आप हमारे प्रियतम आत्मा तथा प्रभु हैं।

त॑ त्वा जगत्स्थित्युदयान्तहेतुसम॑ प्रसान्तं सुहृदात्मदैवम्‌ ।

अनन्यमेकं॑ जगदात्मकेतंभवापवर्गाय भजाम देवम्‌ ॥

४४॥

तम्‌--उसको; त्वा--तुम; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; स्थिति--पालन; उदय--उत्थान; अन्त--तथा मृत्यु; हेतुमू--कारण; समम्‌--समभाव; प्रशान्तम्‌--परम शान्त; सुहत्‌--मित्र; आत्म--आत्मा; दैवम्‌--तथा पूज्य स्वामी; अनन्यम्‌ू--अद्वितीय; एकम्‌--अनोखा; जगत्‌--जगतों के; आत्म--तथा सारे जीवों के; केतम्‌ू--आश्रय; भव--भौतिक जीवन के; अपवर्गाय--समाप्ति( मुक्ति ) के लिए; भजाम--हम पूजा करें; देवमू-- भगवान्‌ की |

हे भगवन्‌, भौतिक जीवन से मुक्त होने के लिए हम आपकी पूजा करते हैं।

आप ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता और इसके सृजन तथा मृत्यु के कारण हैं।

आप समभाव तथा पूर्ण शान्त, असलीमित्र, आत्मा तथा पूज्य स्वामी हैं।

आप अद्वितीय हैं और समस्त जगतों तथा जीवों के आश्रय हैं।

अयं ममेष्टो दयितोनुवर्तीमयाभयं दत्तममुष्य देव ।

सम्पाद्यतां तद्धवतः प्रसादोयथा हि ते दैत्यपतौ प्रसाद: ॥

४५॥

अयम्‌--यह; मम--मेरा; इष्ट:ः--कृपा किया हुआ; दयित:--अत्यन्त प्रिय; अनुवर्ती--अनुचर; मया--मेरे द्वारा; अभयम्‌--अभय; दत्तम्‌-दिया गया; अमुष्य--उसका; देव-हे प्रभु; सम्पाद्यताम्‌-- आप इसे प्रदान करें; तत्‌ू--इसलिए; भवतः --अपनी; प्रसाद:--कृपा; यथा--जिस तरह; हि--निस्सन्देह; ते--तुम्हारा; दैत्य--असुरों का; पतौ--प्रमुख ( प्रह्मद ) के लिए;प्रसाद:--कृपा |

यह बाणासुर मेरा अति प्रिय तथा आज्ञाकारी अनुचर है और इसे मैंने अभयदान दिया है।

अतएव हे प्रभु, इसे आप उसी तरह अपनी कृपा प्रदान करें जिस तरह आपने असुर-राज प्रह्लादपर कृपा दर्शाई थी।

श्रीभगवानुवाच यदात्थ भगवंस्त्वं न: करवाम प्रियं तव ।

भवतो यद्व्यवसितं तन्मे साध्वनुमोदितम्‌ ॥

४६॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; यत्‌--जो; आत्थ--कहा है; भगवनू--हे प्रभु; त्वम्‌--तुमने; नः--हम पर; करवाम--हमें करना चाहिए; प्रियम्‌--सन्तोषप्रद, सुखकर; तब--तुम्हारा; भवत:ः--आपके द्वारा; यतू--जो; व्यवसितम्‌--निश्चित;तत्‌--वह; मे--मेरे द्वारा; साधु--उत्तम; अनुमोदितम्‌--सहमति व्यक्त की गईं।

भगवान्‌ ने कहा : हे प्रभु, आपकी प्रसन्नता के लिए हमें अवश्य ही वह करना चाहिएजिसके लिए आपने हमसे प्रार्थना की है।

मैं आपके निर्णय से पूरी तरह सहमत हूँ।

अवध्योयं ममाप्येष वैरोचनिसुतोसुरः ।

प्रह्मदाय वरो द॒त्तो न वध्यो मे तवान्वय: ॥

४७॥

अवध्य:--जिसका वध नहीं किया जाये; अयम्‌--वह; मम--मेरे द्वारा; अपि--निस्संदेह; एष:--यह; वैरोचनि-सुत:--वैरोचनि( बलि ) का पुत्र; असुरः--असुर; प्रह्दाय--प्रहाद को; वर:--वर; दत्त:--दिया हुआ; न वध्य: --अवध्य; मे-- मेरे द्वारा;तव--तुम्हारा; अन्वयः--वंशज ।

मैं वैरोचनि के इस असुर-पुत्र को नहीं मारूँगा क्योंकि मैंने प्रहाद महाराज को वर दिया हैकि मैं उसके किसी भी वंशज का वध नहीं करूँगा।

दर्पोपशमनायास्य प्रवृकणा बाहवो मया ।

सूदितं च बल॑ भूरि यच्च भारायितं भुवः ॥

४८ ॥

दर्प--मिथ्या गर्व; उपशमनाय--दमन करने के लिए; अस्य--उसका; प्रवृक्णा:--काटे हुए; बाहवः-- भुजाएँ; मया-- मेरे द्वारा;सूदितम्‌--मारी गयी; च--तथा; बलम्‌--सेना; भूरि--विशाल; यत्‌--जो; च--तथा; भारायितमू्‌-- भार बन जाने से; भुवः--पृथ्वी के लिए

मैंने बाणासुर के मिथ्या गर्व का दमन करने के लिए ही इसकी भुजाएँ काट दी हैं।

और मैंनेइसकी विशाल सेना का वध किया है क्योंकि वह पृथ्वी पर भार बन चुकी थी।

चत्वारोस्य भुजा: शिष्टा भविष्यत्यजरामरः ।

पार्षदमुख्यो भवतो न कुतश्चिद्धयोउसुर: ॥

४९॥

चत्वार:--चार; अस्य--इसकी; भुजा:--बाँहें; शिष्टा:--बची हुई; भविष्यति--होंगी; अजर--बूढ़ी न होने वाली; अमर: --तथा अमर; पार्षद--संगी; मुख्य:--प्रधान; भवत:--आपका; न कुतश्चित्‌ू-भयः--किसी भी तरह का इसे भय नहीं रहेगा;असुरः--असुर।

यह असुर, जिसकी अभी भी चार बाँहें हैं अजर तथा अमर होगा और आपके प्रधान सेवकके रूप में सेवा करेगा।

इस तरह उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहेगा।

इति लब्ध्वाभयं कृष्णं प्रणम्य शिरसासुरः ।

प्राद्युम्नि रथमारोप्य सवध्वो समुपानयत्‌ ॥

५०॥

इति--इस प्रकार; लब्ध्वा--पाकर; अभयम्‌--भय से मुक्ति; कृष्णम्‌--कृष्ण को; प्रणम्य--प्रणाम करके; शिरसा--सिर केबल; असुरः --असुर; प्रद्युम्निम्‌--प्रद्युम्न-पुत्र, अनिरुद्ध को; रथम्‌--अपने रथ पर; आरोप्य--बैठाकर; स-वध्व: --उसकीपत्नी सहित; समुपानयत्‌--उन्हें ले आया।

इस तरह भयमुक्त होकर बाणासुर ने अपना माथा जमीन पर टेककर भगवान्‌ कृष्ण कोनमस्कार किया।

तब बाण ने अनिरुद्ध तथा उसकी पत्नी को उनके रथ पर बैठाया और उन्हेंकृष्ण के सामने ले आया।

अक्षौहिण्या परिवृतं सुवास:समलड्डू तम्‌ ।

सपलीकं पुरस्कृत्य ययौ रुद्रानुमोदितः ॥

५१॥

अक्षौहिण्या--पूरी अक्षौहिणी के द्वारा; परिवृतम्‌--घिरा; सु--सुन्दर; वास:--वस्त्र; समलड्डू तम्‌--तथा गहनों से सजा; स-पतलीकम्‌--पत्नी सहित अनिरुद्ध को; पुरः-कृत्य--सामने करके ; ययौ--वह ( कृष्ण ) गया; रुद्र--शिवजी से; अनुमोदित: --विदा लेकर

तब भगवान्‌ कृष्ण ने अपनी टोली के आगे अनिरुद्ध तथा उसकी पत्नी को कर लिया।

दोनों सुन्दर वस्त्रों तथा आभूषणों से खूब सजाये गये थे और उन्होंने उन दोनों को पूरी अक्षौहिणीसे घेर लिया।

इस तरह भगवान्‌ कृष्ण ने शिव से विदा ली और प्रस्थान कर दिया।

स्वराजधानीं समलड्डू तां ध्वजै:सतोरणैरुक्षितमार्गचत्वराम्‌ ।

विवेश शद्भानकदुन्दुभिस्वनै-रभ्युद्यतः पौरसुहद्दूवजातिभि: ॥

५२॥

स्व--अपनी; राजधानीम्‌--राजधानी को; समलड्डू तामू--पूरी तरह सजायी गयी; ध्वजै: --झंडियों से; स--तथा सहित;तोरणै:--विजय तोरणों; उक्षित--पानी से छिड़काव किये गये; मार्ग--जिसके रास्ते; चत्वराम्‌ू--तथा चौराहे; विवेश--प्रवेशकिया; शद्भ--शंख; आनक--ढोल; दुन्दुभि--तथा नगाड़ों की; स्वनै:--गूँज से; अभ्युद्यतः--सत्कार किया गया; पौर--नगरवासियों द्वारा; सुहत्‌-- अपने सम्बन्धियों द्वारा; द्विजातिभि:--तथा ब्राह्मणों द्वारा |

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ अपनी राजधानी में प्रविष्ट हुए।

नगर को झंडियों तथा विजय तोरणों सेखूब सजाया गया था और इसकी गलियों तथा चौराहों पर पानी छिड़कवाया गया था।

ज्योंहीशंख, आनक तथा दुन्दुभियाँ गूँजने लगीं त्योंही भगवान्‌ के सम्बन्धी, ब्राह्मण तथा जनता केलोग उनका स्वागत करने के लिए आगे आये।

य एवं कृष्णविजयं शट्डरेण च संयुगम्‌ ।

संस्मरेत्प्रातरुत्थाय न तस्य स्यात्पराजय: ॥

५३॥

यः--जो भी; एवम्‌--इस प्रकार; कृष्ण-विजयम्‌--कृष्ण की विजय को; शट्डरेण--शंकर के साथ; च--तथा; संयुगम्‌--युद्ध को; संस्मरेत्‌ू--स्मरण करता है; प्रातः--सुबह; उत्थाय--जाग कर; न--नहीं; तस्थ--उसकी; स्यात्‌--होगी; पराजय: --हार।

जो भी व्यक्ति प्रातःकाल उठकर शिव के साथ युद्ध में कृष्ण की विजय का स्मरण करता हैउसे कभी भी पराजय का अनुभव नहीं करना होगा।

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