← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय चौंसठ: राजा नृग का उद्धार

10.64श्रीबादरायणिरुवाचएकदोपवनं राजन्जम्मुर्यदुकुमारका: ।

विहर्तुसाम्बप्रद्युम्म चारुभानुगदादय: ॥

१॥

श्री-बादरायणि: --बादरायण के पुत्र ( शुकदेव गोस्वामी ) ने; उबाच--कहा; एकदा--एक दिन; उपवनमू--छोटे से जंगल में;राजनू--हे राजा ( परीक्षित ); जग्मु:--गये; यदु-कुमारका:--यदुवंश के बालक; विहर्तुमू--खेलने के लिए; साम्ब-प्रद्युम्न -चारु-भानु-गद-आदयः: --साम्ब, प्रद्युम्न, चारु, भानु, गद तथा अन्य |

श्री बादरायणि ने कहा : हे राजा, एक दिन साम्ब, प्रद्यम्न, चारु, भानु, गद तथा यदुवंश केअन्य बालक खेलने के लिए एक छोटे से जंगल में गये।

क्रीडित्वा सुचिरं तत्र विचिन्वन्त:ः पिपासिता: ।

जल निरुदके कूपे दहशु: सत्त्वमद्भुतम्‌ ॥

२॥

क्रीडित्वा--खेल चुकने के बाद; सु-चिरम्‌--दीर्घकाल तक; तत्र--वहाँ; विचिन्वन्तः--ढूँढ़ते हुए; पिपासिता:--प्यासे;जलम्‌--जल; निरुदके--जलरहित; कूपे--कुएँ में; ददशु:--देखा; सत्त्वम्‌--जीव; अद्भुतम्‌-- अद्भुत |

देर तक खेलते रहने के बाद उन्हें प्यास लगी।

जब वे पानी की तलाश कर रहे थे तो उन्होंनेएक सूखे कुएँ के भीतर झाँका और उन्हें एक विचित्र सा जीव दिखा।

कृकलासं गिरिनिभं वीक्ष्य विस्मितमानसा: ।

तस्य चोद्धरणे यत्ल॑ चक्रुस्ते कृपयान्विता: ॥

३॥

कृकलासम्‌--छिपकली, गिरगिट; गिरि--पर्वत; निभम्‌ू--सहश; वीक्ष्य--देखकर; विस्मित-- चकित; मानसा:--मनों वाले;तस्य--उसके ; च--तथा; उद्धरणे--बाहर निकालने का; यत्तम्‌-- प्रयास; चक्कु:--किया; ते--उन्होंने; कृपया अन्विता: --दयाभाव अनुभव करते हुए।

लड़के इस जीव को, जो कि छिपकली थी और पर्वत जैसी दिख रही थी, देखकर विस्मितहो गए उन्हें उसके प्रति दया आ गई और वे उसे कुएँ से बाहर निकालने का प्रयास करने लगे।

चर्मजैस्तान्तवै: पाशैर्बद्ध्वा पतितमर्भका: ।

नाशबनुरन्समुद्धर्तु कृष्णायाचख्युरुत्सुका: ॥

४॥

चर्म-जैः--चमड़े की बनी; तान्तवैः--तथा काते सूत की बनी; पाशैः--रस्सियों से; बद्ध्वा--बाँधकर; पतितम्‌--गिरे हुए जीवको; अर्भका:--लड़के; न अशक्नुरन्‌ू--समर्थ नहीं हो सके; समुद्धर्तुमु--बाहर निकालने में; कृष्णाय--कृष्ण को;आचख्यु:--सूचना दी; उत्सुका: --उत्तेजित

उन्होंने वहाँ फँसी उस छिपकली को चमड़े की पट्टियों तथा सूत की रस्सियों से पकड़ा किन्तुफिर भी वे उसे बाहर नहीं निकाल सके।

अतः वे कृष्ण के पास गये और उत्तेजित होकर उनसेउस जीव के विषय में बतलाया।

तत्रागत्यारविन्दाक्षो भगवान्विश्वभावन: ।

वीक्ष्योजहार वामेन तं करेण स लीलया ॥

५॥

तत्र--वहाँ; आगत्य--जाकर; अरविन्द-अक्ष:--कमलनेत्रों वाले; भगवान्‌ू-- भगवान्‌ ने; विश्व--ब्रह्माण्ड के; भावन:--'पालनकर्ता; वीक्ष्य--देखकर; उजहार--ऊपर खींच लिया; वामेन--बाएँ; तम्‌--उसको; करेण--हाथ से; सः--वह;लीलया--आसानी से।

ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता कमलनेत्र भगवान्‌ उस कुएँ के पास गये और वहाँ वह छिपकलीदेखी।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने अपने बाएँ हाथ से उसे आसानी से बाहर निकाल लिया।

स उत्तमःशलोककराभिमृष्टोविहाय सद्य: कृकलासरूपम्‌ ।

सनन्‍्तप्तचामीकरचारुवर्ण:स्वर्ग्यद्धुतालड्डूरणाम्बरस्त्रक्‌ ॥

६॥

सः--वह; उत्तम:-शलोक--यशस्वी भगवान्‌ के; कर--हाथ द्वारा; अभिमृष्ठट: --स्पर्श की गई; विहाय--छोड़कर; सद्यः --तुरन्त; कृकलास--छिपकली का; रूपम्‌--स्वरूप; सन्तप्त--पिघले; चामीकर--सोने के; चरु--सुन्दर; वर्ण: --रंग; स्वर्गी --स्वर्ग का निवासी; अद्भुत--विचित्र; अलड्डूरण--गहने; अम्बर--वस्त्र; स्रकू-तथा मालाएँ।

यशस्वी भगवान्‌ के हाथों का स्पर्श पाते ही उस जीव ने तुरन्त अपना छिपकली का रूपत्याग दिया और स्वर्ग के वासी का रूप धारण कर लिया।

उसका रंग पिघले सोने जैसा सुन्दर थाऔर वह अद्भुत गहनों, वस्त्रों तथा मालाओं से अलंकृत था।

पप्रच्छ विद्वानपि तन्निदानंजनेषु विख्यापयितु मुकुन्दः ।

कस्त्वं महाभाग वरेण्यरूपोदेवोत्तमं त्वां गणयामि नूनम्‌ ॥

७॥

पप्रच्छ--पूछा; विद्वानू--भलीभाँति अवगत; अपि--यद्यपि; तत्‌--इसका; निदानमू--कारण; जनेषु--सामान्य लोगों में;विख्यापयितुम्‌--जनाने के लिए; मुकुन्दः--भगवान्‌ कृष्ण ने; क:--कौन; त्वम्‌--तुम; महा-भाग--हे भाग्यशाली; वरेण्य--सर्वोत्तम; रूप:--स्वरूप; देव-उत्तमम्‌--उत्तम देवता; त्वामू--तुमको; गणयामि--मैं मानता हूँ; नूनमू--निश्चय ही |

भगवान्‌ कृष्ण परिस्थिति को समझ गये किन्तु सामान्य जनों को सूचित करने के लिएउन्होंने पूछा, 'हे महाभाग, आप कौन हैं ? आपके उत्तम स्वरूप को देखकर मैं सोच रहा हूँ किआप अवश्य ही कोई श्रेष्ठ देवता हैं।

दशामिमां वा कतमेन कर्मणासम्प्रापितोस्यतदर्ह: सुभद्र ।

आत्मानमाख्याहि विवित्सतां नोयन्मन्यसे नः क्षममत्र वक्तुम्‌ ॥

८॥

दशाम्‌--दशा; इमामू--इस; वा--तथा; कतमेन--किस; कर्मणा--कर्म से; सम्प्रापित:--तक लाये गये; असि--तुम हो;अततू-अर्ह: --उसके पात्र नहीं; सु-भद्ग--हे महात्मा; आत्मानम्‌ू--अपने आप; आख्याहि--बतलाओ; विवित्सताम्‌--जानने केइच्छुक; न:ः--हमसे; यत्‌ू--यदि; मन्यसे--सोचते हो; नः--हमसे; क्षमम्‌--उचित; अत्र--यहाँ; वक्तुमू--कहना |

'आप किस विगत कर्म से इस दशा को प्राप्त हुए? हे महात्मन, ऐसा लगता है कि आपऐसे भाग्य के योग्य नहीं थे।

हम आपके विषय में जानना चाहते हैं अतः यदि आप हमें बतानेका यह समय तथा स्थान उचित समझते हों तो कृपा करके अपने विषय में बतलाइये।

'श्रीशुक उबाचइति सम राजा सम्पृष्ट: कृष्णेनानन्तमूर्तिना ।

माधवं प्रणिपत्याह किरीटेनार्कवर्चसा ॥

९॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; स्म--निस्सन्देह; राजा--राजा; सम्पृष्ठ: --पूछे जाने पर;कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; अनन्त--अनन्त; मूर्तिना--स्वरूपों वाले; माधवम्‌--माधव को; प्रणिपत्य--प्रणाम करके; आह--वहबोला; किरीटेन--अपने मुकुट से; अर्क--सूर्य जैसी; वर्चसा--चमक से ।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार अनन्त रूप कृष्ण द्वारा पूछे जाने पर सूर्य के समानचमचमाते मुकुट वाले राजा ने माधव को प्रणाम किया और वह इस प्रकार बोला।

नृग उवाचनृगो नाम नरेन्‍्द्रोडहमिक्ष्वाकुतनयः प्रभो ।

दानिष्वाख्यायमानेषु यदि ते कर्णमस्पृशम्‌ ॥

१०॥

नृग: उवाच--राजा नृग ने कहा; नृग: नाम--नृग नामक; नर-इन्द्र: --मनुष्यों के ऊपर शासन करने वाला; अहमू--मैं; इक्ष्वाकु-तनयः--इश्ष्वाकु पुत्र; प्रभो--हे प्रभु; दानिषु--दानियों में; आख्यायमानेषु--गिनती किये जानेवाले; यदि--शायद; ते--तुम्हारे; कर्णम्‌--कानों को; अस्पृशम्‌--मैंने छुआ हो

राजा नृग ने कहा : मैं इक्ष्वाकु का पुत्र नृग नामक राजा हूँ।

हे प्रभु, शायद आपने मेरे विषयमें तब सुना होगा जब दानी पुरुषों की सूची बाँची जा रही होगी।

कि नु तेउविदितं नाथ सर्वभूतात्मसाक्षिण: ।

'कालेनाव्याहतदृशो वक्ष्येथापि तवाज्ञया ॥

११॥

किम्‌--क्या; नु--निस्सन्देह; ते--तुम्हें; अविदितम्‌-- अज्ञात; नाथ--हे स्वामी; सर्व--समस्त; भूत--जीवों के; आत्म--बुद्धधिके; साक्षिण:--साक्षी को; कालेन--समय द्वारा; अव्याहत--अविचल; दृशः--जिसकी दृष्टि; वक्ष्ये--मैं कहूँगा; अथ अपि--तो भी; तब--तुम्हारी; आज्ञया--आज्ञा से |

है स्वामी, आपसे अज्ञात है ही क्या? आपकी दृष्टि काल द्वारा अविचलित है और आप सारेजीवों के मनों के साक्षी हैं।

तो भी आपकी आज्ञा पाकर मैं कहूँगा।

यावत्य: सिकता भूमेर्यावत्यो दिवि तारका: ।

यावत्यो वर्षधाराश्व तावतीरददं सम गा: ॥

१२॥

यावत्य:--जितने; सिकता: --बालू के कण; भूमेः--पृथ्वी से सम्बन्धित; यावत्य:--जितने; दिवि-- आकाश में; तारका:--तारे; यावत्य:--जितनी; वर्ष--वर्षा की; धारा:--बूँदें; च--तथा; तावती:--उतनी ही; अददम्‌--मैंने दीं; स्म--निस्सन्देह;गाः-गौवें |

मैंने दान में उतनी ही गौवें दीं जितने कि पृथ्वी पर बालू के कण हैं, आकाश में तारे हैं यावर्षा की बूंदें होती हैं।

'पयस्विनीस्तरुणी: शीलरूप-गुणोपपन्ना: कपिला हेमसूड्री: ।

न्यायार्जिता रूप्यखुरा: सवत्सादुकूलमालाभरणा ददावहम्‌ ॥

१३॥

'पयः-विनी: --दूधवाली; तरुणी:-- जवान; शील--- अच्छा आचरण; रूप--सौन्दर्य; गुण--तथा अन्य गुण; उपपन्ना:--सेयुक्त; कपिला:--भूरे रंग की; हेम--सोने के; श्रूड़ी:--सींगों वाली; न्‍्याय--न्यायपूर्वक; अर्जिता:--अर्जित की गईं; रूप्प--चाँदी के; खुरा:--खुरों वाली; स-वत्सा:--अपने बछड़ों सहित; दुकूल--सुन्दर वस्त्र; माला--मालाओं से; आभरणा:--विभूषित; ददौ--दिया; अहम्‌--मैंने |

मैंने दान में जो बछड़ों सहित गौवें दीं वे जवान, भूरी, दूध देनेवाली थीं और अच्छे आचरणऔर सुन्दर तथा अच्छे गुणों से सम्पन्न थीं, जिन्हें ईमानदारी से अर्जित किया गया था तथा जिनकेसींग सोने से, खुर चाँदी से मढ़े थे और जो सुन्दर सजावटी बस्त्रों एवं मालाओं से अलंकृत थीं।

स्वलड्डू ते भ्यो गुणशीलवद्भ्य:सीदत्कुटुम्बेभ्य ऋतव्रतेभ्य: ।

तप: श्रुतब्रह्म वदान्यसद्‌ भ्य:प्रादां युवभ्यो द्विजपुड़वेभ्य: ॥

१४॥

गोभूहिरण्यायतना श्रहस्तिनःकन्या; सदासीस्तिलरूप्यशय्या: ॥

वासांसि रत्नानि परिच्छदान्रथा-निष्ठं च यज्जै श्वरितं च पूर्तम्‌ ॥

१५॥

सु--अच्छी तरह; अलड्डू तेभ्य:--आभूषणों से सजाई गई; गुण--अच्छे गुण; शील--तथा चरित्र; बद्भ्य:--से युक्त; सीदत्‌--पीड़ित; कुट॒म्बेभ्य:--कुटुम्बियों को; ऋत--सत्य; ब्रतेभ्य:--समर्पित; तपः--तपस्या के लिए; श्रुत-- भलीभाँति परिचित;ब्रह्म--वेदों से; वदान्य--अत्यन्त विद्वान; सद्भ्य:--सन्‍्त स्वभाव वालों को; प्रादाम्‌--मैंने दिया; युवभ्य:--युवकों को;द्विज--ब्राह्मणों को; पुमू-गवेभ्य:--अतीव विशिष्ट; गो--गौवें; भू-- भूमि; हिरण्य--सोना; आयतन--घर; अश्व--घोड़े;हस्तिन:--तथा हाथी; कन्या: --विवाह योग्य पुत्रियाँ; स--सहित; दासी:--दासियाँ; तिल--तिल; रूप्य--चाँदी; शय्या: --तथा पलंग; वासांसि-- वस्त्र; रलानि--रत; परिच्छदानू-- गृह सामग्री; रथान्‌--रथ; इष्टम्‌--की गई पूजा; च--तथा; यज्जैः --अग्नि यज्ञों द्वारा; चरितम्‌--किया गया; च--तथा; पूर्तम्‌--पतवित्र कार्य |

सर्वप्रथम मैंने दान प्राप्त करने वाले ब्राह्मणों को उत्तम आभूषणों से अलंकृत करकेसम्मानित किया।

वे अतीव सम्मानित ब्राह्मण जिनके परिवार कष्ट में थे, युवक थे तथा उत्तमचरित्र और गुणों से युक्त थे।

वे सत्यनिष्ठ, तपस्या के लिए विख्यात, वैदिक शास्त्रों में पारंगत तथा आचरण में साधुवत थे।

मैंने उन्हें गौवें, भूमि, सोना, मकान, घोड़े, हाथी तथा दासी समेतविवाह के योग्य कुमारियाँ, तिल, चाँदी, सुन्दर शय्या, वस्त्र, रत्न, गृहसज्ञा-सामग्री तथा रथदान में दिये।

इसके अतिरिक्त मैंने वैदिक यज्ञ किये और अनेक पवित्र कल्याण कार्य सम्पन्नकिये।

कस्यचिद्दवजमुख्यस्य भ्रष्टा गौर्मम गोधने ।

सम्पृक्ताविदुषा सा च मया दत्ता द्विजातये ॥

१६॥

'कस्यचित्‌--किसी; द्विज--ब्राह्मण की; मुख्यस्य--प्रमुख; भ्रष्टा--खोई हुई; गौः:--गाय; मम--मेरे; गो-धने --झुंड में;सम्पृक्ता--मिल जाने से; अविदुषा-- अनजान; सा--वह; च--तथा; मया--मेरे द्वारा; दत्ता--दी गई; द्वि-जातये--( दूसरे )ब्राह्मण को |

एकबार किसी उत्तम ब्राह्मण की गाय भटक गई और मेरे झुंड में आ मिली।

इससे अनजानहोने के कारण मैंने वह गाय किसी दूसरे ब्राह्मण को दान में दे दी।

तां नीयमानां तत्स्वामी हृष्टोवाच ममेति तम्‌ ।

ममेति परिग्राह्माह नृगो मे दत्तवानिति ॥

१७॥

ताम्‌ू--उस ( गाय ) को; नीयमानाम्‌--ले जाते हुए; तत्‌--उसका; स्वामी --मालिक; हृष्ठा --देखकर; उवाच--कहा; मम--मेरा; इति--इस प्रकार; तम्‌--उसको; मम--मेरी; इति--इस प्रकार; परिग्राही --दान लेने वाला; आह--कहा; नृग:--राजानृग ने; मे--मुझको; दत्तवानू--दिया; इति--इस प्रकार।

जब गाय के पहले मालिक ने उसे ले जाते हुए देखा तो उसने कहा, 'यह मेरी है।

' दूसरेब्राह्मण ने जिसने उसे दान के रूप में स्वीकार किया था उत्तर दिया 'नहीं, यह तो मेरी है।

इसेनृग ने मुझे दिया था।

'विप्रौ विवदमानौ मामूचतु: स्वार्थसाधकौ ।

भवान्दातापहर्तेति तच्छुत्वा मेभवद्भ्रम: ॥

१८॥

विप्रौ--दोनों ब्राह्मण; विवदमानौ--झगड़ते हुए; माम्‌--मुझसे; ऊचतु:--कहा; स्व--अपना; अर्थ--स्वार्थ; साधकौ--पूराकरते हुए; भवान्‌--आप; दाता--देने वाले; अपहर्ता--ले लेने वाले; इति--इस प्रकार; तत्‌--यह; श्रुत्वा--सुनकर; मे--मेरा;अभवत्‌--हो गया; भ्रम:--मोह ग्रस्त |

दोनों ब्राह्मण झगड़ते हुए और उनमें से हरएक अपने प्रयोजन की पुरजोर कोशिश करताहुआ, मेरे पास आये।

उनमें से एक ने कहा, 'आपने यह गाय मुझे दी' तथा दूसरे ने कहा,'किन्तु तुमने उसे मुझसे चुराया था।

' यह सुनकर मैं भ्रमीत हो गया।

अनुनीताबुभौ विप्रौ धर्मकृच्छुगतेन वै ।

गवां लक्ष॑ प्रकृष्टानां दास्याम्येषा प्रदीयताम्‌ ॥

१९॥

भवन्तावनुगृह्गीतां किल्लडरस्थाविजानतः ।

समुद्धरतं मां कृच्छात्पतन्तं निरयेडशुचौ ॥

२०॥

अनुनीतौ--विनीत भाव से प्रार्थित; उभौ--दोनों; विप्रौ--ब्राह्मणों से; धर्म--धार्मिक कर्तव्य का; कृच्छुू--कठिन स्थिति;गतेन--( मेरे ) द्वारा, जो अन्दर था; बै--निस्सन्देह; गवामू--गौवों का; लक्षम्‌--एक लाख; प्रकृष्टानामू--उत्तम गुणों वाली;दास्यामि--मैं दूँगा; एघा--इस एक; प्रदीयताम्‌--दे दें; भवन्तौ--आप दोनों; अनुगृह्वीतामू--कृपा दिखलाते हुए; किड्डूरस्थ--अपने सेवक का; अविजानत:--अनजान; समुद्धरतम्‌--बचा लीजिये; माम्‌--मुझको; कृच्छात्‌--संकट से; पतन्तम्‌--गिरतेहुए; निरये--नरक में; अशुचौ--मलिन।

इस स्थिति में अपने को कर्तव्य के घोर संकट में पाकर मैंने दोनों ब्राह्मणों से अनुनय-विनयकी 'मैं इस गाय के बदले एक लाख उत्तम गौवें दूँगा।

कृपा करके उसे मुझे वापस कर दीजिये।

आप अपने इस दास मुझपर कृपालु हों।

मैं जो कर रहा था उससे अनजान था।

मुझे इस कठिनस्थिति से बचा लें अन्यथा मैं निश्चित रूप से मलिन नरक में गिरूँगा।

'नाहं प्रतीच्छे वै राजन्नित्युक्त्वा स्वाम्यपाक्रमत्‌ ।

नान्यद्गवामप्ययुतमिच्छामीत्यपरो ययौ ॥

२१॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; प्रतीच्छे--चाहता हूँ; वै--निस्सन्देह; राजन्‌ू--हे राजन; इति--इस प्रकार; उक्‍्त्वा--कहकर; स्वामी --मालिक; अपाक्रमत्‌--चला गया; न--नहीं; अन्यत्‌--अतिरिक्त; गवाम्‌--गौवों के; अपि-- भी; अयुतम्‌--दस हजार;इच्छामि--चाहता हूँ; इति--ऐसा कहकर; अपर: --दूसरा ( ब्राह्मण ); ययौ--चला गया।

गाय के इस मालिक ने कहा, 'हे राजन, मैं इस गाय के बदले में कुछ भी नहीं चाहता।

'और वह चला गया।

दूसरे ब्राह्मण ने घोषित किया, 'मैं दस हजार अधिक गौवें भी ( जितना तुमदे रहे हो उससे अधिक ) नहीं चाहता।

' और वह भी चला गया।

एतस्मिन्नन्तरे यामैर्दूतिनीतो यमक्षयम्‌ ।

यमेन पृष्टस्तत्राहं देवदेव जगत्पते ॥

२२॥

एतस्मिनू--इस; अन्तरे--अवसर में; यामैः--यमराज के; दूतैः--दूतों द्वारा; नीत:--ले जाया गया; यम-क्षयमू--यमराज केधाम तक; यमेन--यमराज द्वारा; पृष्ट:--पूछा गया; तत्र--वहाँ; अहम्‌--मैं; देव-देव--हे देवताओं के स्वामी; जगत्‌--ब्रह्माण्डके; पते--हे स्वामी |

हे देवों के देव, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, इस तरह उत्पन्न परिस्थिति से लाभ उठाकर यमराज केदूत बाद में मुझे यमराज के धाम ले गये।

वहाँ स्वयं यमराज ने मुझसे पूछा।

पूर्व त्वमशुभं भुड्क्ष उताहो नूपते शुभम्‌ ।

नान्तं दानस्य धर्मस्य पश्ये लोकस्य भास्वतः ॥

२३॥

पूर्वमू--पहले; त्वम्‌ू--तुम; अशुभमू--अशुभ फल; भुड्क्षे--अनुभव करना चाहते हो; उत आह उ--या अन्य कुछ; नू-पते--हेराजा; शुभम्‌ू--शुभफल; न--नहीं; अन्तम्‌-- अन्त; दानस्य--दान का; धर्मस्थ--धार्मिक; पश्ये--मैं देखता हूँ; लोकस्य--जगत का; भास्वतः--चमकते हुए

यमराज ने कहा हे राजा, सर्वप्रथम आप अपने पापों के फलों का अनुभव करना चाहतेहैं या अपने पुण्य का।

निस्सन्देह मुझे न तो आपके द्वारा सम्पन्न कर्तव्यपूर्ण दान का अन्त दीखताहै, न ही उस दान के परिणामस्वरूप तेजपूर्ण स्वर्गलोक में आपके भोगों का।

पूर्व देवाशुभं भुद्ज इति प्राह पतेति सः ।

तावदद्वाक्षमात्मानं कृकलासं पतन्प्रभो ॥

२४॥

पूर्वमू--पहले; देव--हे प्रभु; अशुभम्‌--पापपूर्ण फल; भुञ्जे--अनुभव करूँगा; इति--ऐसा कहकर; प्राह--कहा; पत--नीचेगिरो; इति--इस प्रकार; सः--वह; तावत्‌--तभी; अद्वाक्षम्‌--मैंने देखा; आत्मानम्‌ू--अपने आपको; कृकलासम्‌--छिपकली;पतनू्‌-गिरते हुए; प्रभो--हे स्वामी |

मैंने कहा : हे प्रभु, पहले मुझे अपने पापों का फल भोगने दें और यमराज बोले, तो नीचे गिरो।

मैं तुरन्त नीचे गिरा और हे स्वामी, गिरते समय मैंने देखा कि मैं छिपकली बन गया हूँ।

ब्रह्मण्यस्य वदान्यस्य तव दासस्य केशव ।

स्मृतिर्नाद्यापि विध्वस्ता भवत्सन्दर्शनार्थिन: ॥

२५॥

ब्रह्मण्यस्य--ब्राह्मण भक्त; वदान्यस्य--उदार; तब--तुम्हारे; दासस्य--दास की; केशव--हे कृष्ण; स्मृतिः--स्मरणशक्ति;न--नहीं; अद्य--आज; अपि--तक; विध्वस्ता--विनष्ट; भवत्‌--आपके; सन्दर्शन--दर्शन का; अर्थिन:--इच्छुक |

है केशव, मैं आपके दास रूप में ब्राह्मणों का भक्त था और उनके प्रति उदार था और मैंसदैव आपके दर्शन के लिए लालायित रहता था।

इसीलिए आजतक मैं ( अपने विगत जीवनको ) नहीं भल पाया।

स त्वं कथ्थ मम विभोड$क्षिपथ: परात्मायोगेश्वर: श्रुतिहशामलहद्विभाव्य: ।

साक्षादधोक्षज उरुव्यसनान्थबुद्धेःस्यान्मेडनुदश्य इह यस्य भवापवर्ग: ॥

२६॥

सः--वह; त्वमू--तुम; कथम्‌--कैसे; मम--मेरा; विभो--हे सर्वशक्तिमान; अक्षि-पथ:--दृष्टिगोचर; पर-आत्मा--परमात्मा;योग--योग के; ईश्वरः--स्वामियों द्वारा; श्रुति-- श्रुतियों की; हशा--आँखों के द्वारा; अमल--निर्मल; हत्‌ू--उनके हृदयों केभीतर; विभाव्य:--ध्यान किये जाने योग्य; साक्षात्‌-- प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर; अधोक्षज--हे दिव्य प्रभु, जो इन्द्रियों से नहीं देखे जासकते; उरु--कठिन; व्यसन--कष्टों द्वारा; अन्ध--अन्धा; बुद्धेः--बुद्धिवाला; स्थात्‌ू--शायद हो; मे--मेंरे लिए; अनुदृश्य: --देखे जाने योग्य; इह--इस जगत में; यस्य--जिसका; भव-- भौतिक जीवन का; अपवर्ग:--अन्त |

हे विभु! मैं आपको अपने समक्ष कैसे देख पा रहा हूँ ? आप तो परमात्मा हैं जिस पर बड़े सेबड़े योगेश्वर केवल वेद रूपी दिव्य आँख के द्वारा अपने शुद्ध हृदयों के भीतर ध्यान लगा सकतेहैं।

तो हे दिव्य प्रभु, आप किस तरह मुझे प्रत्यक्ष दिख रहे हैं क्योंकि मेरी बुन्धि भौतिक जीवनके कठिन कष्टों से अन्धी हो चुकी है? जिसने इस जगत के भव-बन्धनों को समाप्त कर दियाहै, वही आपको देख सकता है।

देवदेव जगन्नाथ गोविन्द पुरुषोत्तम ।

नारायण हषीकेश पुण्यश्लोकाच्युताव्यय ॥

२७॥

अनुजानीहि मां कृष्ण यान्तं देवगतिं प्रभो ।

यत्र क्वापि सतश्चेतो भूयान्मे त्वत्पदास्पदम्‌ ॥

२८ ॥

देव-देव--स्वामियों के स्वामी; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; नाथ--हे स्वामी; गो-विन्द--हे गौवों के स्वामी; पुरुष-उत्तम--हेपुरुषोत्तम; नारायण--हे समस्त जीवों के आधार; हृषीकेश--हे इन्द्रियों के स्वामी; पुण्य-शइलोक--हे दिव्य एलोकों द्वारा स्तुतिकिये जाने वाले; अच्युत--हे अच्युत; अव्यय--हे न बदलने वाले; अनुजानीहि--कृपया जाने दें; माम्‌ू--मुझको; कृष्ण--हेकृष्ण; यान्तम्‌--जाने वाले को; देव-गतिम्‌--देवताओं के लोक में; प्रभो--हे प्रभु; यत्र क्व अपि--जहाँ कहीं भी; सत:ः--रहतेहुए; चेत:--मन; भूयात्‌--हो; मे--मेरा; त्वत्‌--तुम्हारे; पद--पैरों की; आस्पदम्‌--शरण।

हे देवदेव, जगन्नाथ, गोविन्द, पुरुषोत्तम, नारायण, हषीकेश, पुण्यश्लोक, अच्युत, अव्यय,है कृष्ण, कृपा करके मुझे अब देवलोक के लिए प्रस्थान करने की अनुमति दें।

हे प्रभु, मैं जहाँभी रहूँ, मेरा मन सदैव आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करे।

नमस्ते सर्वभावाय ब्रह्मणे उनन्तशक्तये ।

कृष्णाय वासुदेवाय योगानां पतये नमः ॥

२९॥

नमः--नमस्कार; ते-- आपको; सर्व-भावाय--समस्त प्राणियों के स्त्रोत; ब्रह्मणे --परम सत्य को; अनन्त-- असीम; शक्तये--शक्ति वाले; कृष्णाय--कृष्ण को; वासुदेवाय--वसुदेव के पुत्र; योगानामू--योग की समस्त विधियों के; पतये--स्वामी को;नमः--नमस्कार

हे वसुदेवपुत्र कृष्ण, मैं आपको बारम्बार नमस्कार करता हूँ आप समस्तजीवों के उद्गम हैं,परम सत्य हैं, अनन्त शक्तियों के स्वामी हैं और समस्त आध्यात्मिक प्रवर्गों के स्वामी हैं।

इत्युक्त्वा तं परिक्रम्य पादौ स्पृष्ठा स्वमौलिना ।

अनुज्ञातो विमानाछयमारुहत्पश्यतां नृणाम्‌ ॥

३०॥

इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; तम्‌ू--उनको; परिक्रम्य--परिक्रमा करके; पादौ--पाँवों को; स्पृष्टा--छूकर; स्व-- अपने;मौलिना--मुकुट से; अनुज्ञात:--विदा पाकर; विमान--दैवीयान पर; अछयम्‌--अत्युत्तम; आरुहतू--चढ़ गया; पश्यताम्‌--देखते देखते; नृणाम्‌-मनुष्यों के

इस तरह कह कर महाराज नृग ने भगवान्‌ कृष्ण की परिक्रमा की और उनके चरणों परअपना मुकुट छुवाया तब विदाई की अनुमति पाकर वहाँ पर उपस्थित लोगों के देखते देखतेराजा नृग एक अदभुत स्वर्गिक विमान पर चढ़ गया कृष्ण: परिजन प्राह भगवान्देवकीसुतः ।

ब्रह्मण्यदेवो धर्मात्मा राजन्याननुशिक्षयन्‌ ॥

३१॥

कृष्ण:--कृष्ण ने; परिजनम्‌--निजी संगियों से; प्राह--बोले; भगवान्‌-- भगवान्‌; देवकी-सुत:--देवकी का पुत्र; ब्रहण्य--ब्राह्मण भक्त; देव:--ई श्वर; धर्म--धर्म का; आत्मा--आत्मा; राजन्यान्‌--राजसी वर्ग को; अनुशिक्षयन्‌ू--शिक्षा देने के लिए

तब देवकी पुत्र, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ कृष्ण जो ब्राह्मणों के प्रति विशेष रूप से अनुरक्तहैं और जो साक्षात्‌ धर्म के सार हैं अपने निजी संगियों से बोले और इस प्रकार राजसी वर्ग कोशिक्षा दी।

दुर्जरं बत ब्रह्मस्वं भुक्तमग्नेमनागपि ।

तेजीयसोपि किमुत राज्ञां ईश्वररमानिनाम्‌ ॥

३२॥

दुर्जम्‌--अपाच्य; बत--निस्सन्देह; ब्रह्य--ब्राह्मण की; स्वम्‌--सम्पत्ति; भुक्तम्‌-- भोगी गई; अग्ने:--अग्नि की अपेक्षा;मनाक्‌ू--रंच भर; अपि-- भी; तेजीयस:--तेजस्वी के लिए; अपि-- भी; किम्‌ उत--तो क्‍या कहा जाय; राज्ञामू--राजाओं के;ईश्वर--नियंत्रक; मानिनामू--मानने वाले

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा : एक ब्राह्मण की सम्पत्ति कितनी अपाच्य होती है, भले हीउसका रंचभर हो और अग्नि से भी अधिक तेजस्वी द्वारा उपभोग क्‍यों न किया जाय! तो फिरउन राजाओं के विषय में क्या कहा जाय जो अपने को स्वामी मानकर उसका भोग करना चाहतेहैं।

नाह हालाहलं मन्ये विषं यस्य प्रतिक्रिया ।

ब्रह्मस्वं हि विषं प्रोक्त नास्य प्रतिविधिर्भुवि ॥

३३॥

न--नहीं; अहम्‌--मैं; हालाहलम्‌ू--हालाहल नामक विष जिसका पान शिवजी ने बिना नशे के प्रभाव से किया; मन्ये--मैंमानता हूँ; विषम्‌ू--विष; यस्थ--जिसका; प्रतिक्रिया--प्रभाव; ब्रह्म-स्वम्‌--ब्राह्मण की सम्पत्ति; हि--निस्सन्देह; विषम्‌--विष; प्रोक्तमू--कहा गया; न--नहीं; अस्य--इसका; प्रतिविधि: --उपचार, निराकरण; भुवि--संसार में

मैं हालाहल को असली विष नहीं मानता क्योंकि इसका भी निराकरण हो जाता है, किन्तुब्राह्मण की सम्पत्ति चुराये जानो को असली विष कहा जा सकता है, क्योंकि इस संसार मेंइसका कोई उपचार नहीं है।

हिनस्ति विषमत्तारं वह्विरद्धिः प्रशाम्यति ।

कुलं समूलं दहति ब्रह्मस्वारणिपावक: ॥

३४॥

हिनस्ति--नष्ट करता है; विषम्‌--विष को; अत्तारम्‌ू--निगलने वाले को; वह्िः--अग्नि; अद्धिः--जल से; प्रशाम्धति--बुझाईजाती है; कुलमू-- परिवार को; स-मूलम्‌ू--जड़ समेत; दहति--जलाती है; ब्रह्म-स्व-- ब्राह्मण की सम्पत्ति; अरणि---आगजलाने वाला काष्ठ; पावकः--अग्नि

विष केवल उसी को मारता हैजो उसे निगलता है और सामान्य अग्नि को पानी से बुझायाजा सकता है किन्तु ब्राह्मण की सम्पत्ति रूपी अरणि से उत्पन्न अग्नि चोर के समस्त परिवार कोसमूल नष्ट कर देती है।

ब्रह्मस्वं दुरनुज्ञातं भुक्त हन्ति त्रिपूरुषम्‌ ।

प्रसह्य तु बलाद्भुक्तं दश पूर्वान्द्शापरान्‌ ॥

३५॥

ब्रह्म-स्वम्‌--ब्राह्मण की सम्पत्ति; दुरनुज्ञातम्‌--समुचित अनुमति न दिये जाने पर; भुक्तम्‌-- भोगी गई; हन्ति--विनष्ट करती है;त्रि--तीन; पूरुषम्‌--व्यक्तियों को; प्रसहा--बलपूर्वक; तु--लेकिन; बलात्‌--बाह्य शक्ति ( सरकारी इत्यादि ) का प्रयोग करनेसे; भुक्तमू-- भोगी गई; दश--दस; पूर्वान्‌--पहले के; दश--दस; अपरान्‌--बाद के

यदि कोई व्यक्ति बिना उचित अनुमति के ब्राह्मण की सम्पत्ति का भोग करता है, तो वहसम्पत्ति उस व्यक्ति की तीन पीढ़ियों तक को नष्ट कर देती है।

किन्तु यदि वह इसे बलपूर्वक याराजकीय अथवा किसी बाहरी सहायता से छीन लेता है, तो उसके पूर्वजों की दस पीढ़ियाँ तथाउसके उत्तराधिकारियों की दस पीढ़ियाँ विनष्ट हो जाती हैं।

राजानो राजलक्ष्म्यान्धा नात्मपातं विचक्षते ।

निरयं येउभिमन्यन्ते ब्रह्मस्व॑ं साधु बालिशा: ॥

३६॥

राजान:--राजपरिवार के सदस्य; राज--राजसी; लक्ष्म्या--ऐश्वर्य से; अन्धा: --अन्धे हुए; न--नहीं; आत्म--अपना; पातमू--पतन; विचक्षते--पहले से देख पाते हैं; निरयम्‌ू--नरक; ये--जो; अभिमन्यन्ते--लालायित रहते हैं; ब्रह्म-स्वम्‌ू--ब्राह्मण कीसम्पत्ति; साधु--उपयुक्त; बालिश:--बचकाना मूर्ख

राजसी ऐश्वर्य से मदान्ध राजा अपना पतन पहले से देख पाने में असमर्थ रहते हैं।

वे ब्राह्मणकी सम्पत्ति के लिए मूर्खतापूर्वक लालायित रहकर वास्तव में नरक जाने के लिए लालायितरहते हैं।

गृह्न्ति यावतः पांशून्क्रन्दतामश्रुबिन्दव: ।

विप्राणां हतवृत्तीनाम्वदान्यानां कुटुम्बिनामू ॥

३७॥

राजानो राजकुल्याश्व तावतोब्दान्निर्डु शा: ।

कुम्भीपाकेषु पच्यन्ते ब्रह्ददायापहारिण: ॥

३८॥

गृहन्ति--स्पर्श करते हैं; यावत:--जितने; पांशून्‌ू--धूल के कण; क्रन्दताम्‌-क्रन्दन करते हुए; अश्रु-बिन्दवः --आँसू की बूँदें;विप्राणाम्‌--ब्राह्मणों के; हत--हरण की गई; वृत्तीनामू--जीविका के साधनों का; वदान्यानाम्‌--उदार; कुटुम्बिनाम्‌--परिवारके लोगों के; राजान:--राजालोग; राज-कुल्या: --राज परिवार के अन्य सदस्य; च--भी; तावत: --उतने; अब्दान्‌ू--वर्षों तक;निरद्भु शा:--अनियंत्रित; कुम्भी-पाकेषु--कुम्भीपाक नामक नरक में; पच्यन्ते--पकाये जाते हैं; ब्रह्म-दाय--ब्राह्मण के हिस्सेका; अपहारिण: --अपहरण करने वाले

जिनके ऊपर आश्रित परिवार हो तथा जिनकी सम्पत्ति हड़प ली गई हो, ऐसे उदारचेताब्राह्मणों के आँसुओं से धूल के जितने कणों का स्पर्श होता है, उतने वर्षों तक वे अनियंत्रितराजा, जो ब्राह्मण की सम्पत्ति को हड़प लेते हैं, अपने राज परिवारों के साथ कुम्भीपाक नामकनर्क में भुने जाते हैं।

स्वदत्तां परदत्तां वा ब्रह्मवृत्ति हरेच्च यः ।

षष्टिवर्षसहस्त्राणि विष्ठायां जायते कृमि: ॥

३९॥

स्व--अपने द्वारा; दत्तामू--दिया गया; पर--दूसरे के द्वारा; दत्तामू--दिया गया; वा--अथवा; ब्रह्म-वृत्तिमू-- ब्राह्मण कीसम्पत्ति; हरेत्‌ू--चुराता है; च--तथा; य:ः--जो; षष्टि--साठ; वर्ष--वर्षों तक; सहस्त्राणि--हजारों; विष्ठायाम्‌--मल में;जायते--उत्पन्न होता है; कृमिः--कीट

चाहे अपना दिया दान हो या किसी अन्य का, जो व्यक्ति किसी ब्राह्मण की सम्पत्ति कोचुराता है, वह साठ हजार वर्षों तक मल में कीट के रूप में जन्म लेगा न मे ब्रह्मधनं भूयाद्यद्‌्गृध्वाल्पायुषो नरा: ।

पराजिताश्च्युता राज्याद्धवन्त्युद्वेजिनोउहहय: ॥

४०॥

न--नहीं; मे--मुझको; ब्रह्म--ब्राह्मणों की; धनम्‌--सम्पत्ति; भूयात्‌ू--चाहे जो हो; यत्‌--जो; गृध्वा--इच्छा करके; अल्प-आयुष:--अल्पायु; नराः--मनुष्यगण;; पराजिता: -- पराजित; च्युता:--विहीन; राज्यातू--राज्य से; भवन्ति--हो जाते हैं;उद्देजिन:--कष्ट पहुँचाने वाले; अहयः --सर्प

मैं ब्राह्मणों की सम्पत्ति की कामना नहीं करता जो इसका लोभ करते हैं उनकी आयु क्षीणहोती है और वे पराजित होते हैं, वे अपने राज्य खो देते हैं और दुसरों को कष्ट पहुँचाने वाले सर्पबनते हैं।

विप्र॑ं कृतागसमपि नैव द्रह्मत मामकाः ।

घ्नन्तं बहु शपन्तं वा नमस्कुरुत नित्यशः ॥

४१॥

विप्रमू--विद्वान ब्राह्मण के प्रति; कृत--किया गया; आगसम्‌--पाप; अपि-- भी; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; द्रह्मत--शत्रु कीतरह व्यवहार करते हैं; मामका: --हे मेरे अनुयायियो; घ्नन्तम्‌--शारीरिक प्रहार करते हुए; बहु--बारम्बार; शपन्तम्‌--शाप देतेहुए; वा--अथवा; नम:ः-कुरुत--तुम्हें नमस्कार करना चाहिए; नित्यश:--सदैव

हे मेरे अनुयायियो, तुम कभी भी विद्वान ब्राह्मण के साथ कठोर व्यवहार न करो, भले हीउसने पाप क्‍यों न किये हों।

यदि वह तुम्हारे शरीर पर वार भी करे या बारम्बार तुम्हें शाप दे तोभी उसे नमस्कार करते रहो यथाहं प्रणमे विप्राननुकालं समाहित: ।

तथा नमत यूयं च योउन्यथा मे स दण्डभाक्‌ ॥

४२॥

यथा--जिस तरह; अहम्‌--मैं; प्रणमे--प्रणाम करता हूँ; विप्रान्‌--ब्राह्मणों को; अनु-कालम्‌--सर्वदा; समाहित: --सावधानीके साथ; तथा--उसी तरह; नमत--नमस्कार करना चाहिए; यूयम्‌--तुम सबों को; च-- भी; यः--जो; अन्यथा-- अन्यथा;मे--मेरे द्वारा; स:ः--वह; दण्ड--दण्ड का; भाक्‌-- भागी

जिस तरह मैं सदैव ध्यान रखते हुए ब्राह्मणों को नमस्कार करता हूँ उसी तरह तुम सबों कोचाहिए कि उन्हें नमस्कार करो।

जो कोई भी अन्यथा कर्म करता है, उसे मैं दण्ड देता हूँ ब्राह्मणार्थों ह्पहतो हर्तारें पातयत्यधः ।

अजानन्तमपि होन॑ नृगं ब्राह्मणगौरिव ॥

४३॥

ब्राह्मण--ब्राह्मण की; अर्थ: --सम्पदा; हि--निस्सन्देह; अपहत:ः--हरण की गई; हर्तारम्‌--लेने वाले को; पातयति--गिरादिया जाता है; अध:--नीचे; अजानन्तमू--अनजाने में; अपि-- भी; हि--निस्सन्देह; एनम्‌--इस; नृगम्‌--राजा नृग को;ब्राह्षण--ब्राह्मण की; गौ:--गाय; इब--सहृश

जब किसी ब्राह्मण की सम्पत्ति अनजाने में भी चुराई जाती है, तो उस व्यक्ति को निश्चितरूप से पतित होना पड़ता है, जिस तरह ब्राह्मण की गाय से नृग को पतित होना पड़ा एवं विश्राव्य भगवान्मुकुन्दो द्वारकौकसः ।

पावन: सर्वलोकानां विवेश निजमन्दिरम्‌ ॥

४४॥

एवम्‌--इस प्रकार; विश्राव्य--सुनाकर; भगवान्‌-- भगवान्‌; मुकुन्द:--कृष्ण; द्वारका-ओकसः--द्वारकावासियों को;'पावन:--शुद्ध करने वाले; सर्ब--सभी; लोकानाम्‌--लोकों के; विवेश--प्रविष्ट हुए; निज--अपने; मन्दिरम्‌ू--महल में

इस तरह से द्वारका निवासियों को उपदेश देने के बाद, समस्त लोकों को पवित्र करने वालेभगवान्‌ मुकुन्द अपने महल में प्रविष्ट हुए।

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