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अध्याय पैंसठ: भगवान बलराम का वृन्दावन भ्रमण
10.65श्रीशुक उबाचबलभद्र: कुरुश्रेष्ठ भगवात्रथमास्थित: ।
सुहद्दिहिक्षुरुत्कण्ठ: प्रययौ नन्दगोकुलम् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; बलभद्र:--बलराम; कुरु- श्रेष्ट--हे कुरुओं में श्रेष्ठ ( राजा परीक्षित ); भगवान्--भगवान्; रथम्-- अपने रथ में; आस्थित:--सवार; सुहृत्ू--शुभचिन्तक मित्रों को; दिदृदक्षु:ः--देखने की इच्छा से; उत्कण्ठ:--उत्सुक; प्रययौ--यात्रा की; नन्द-गोकुलम्--नन्द महाराज के गोकुल-ग्राम की
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे कुरुश्रेष्ठ, एक बार अपने शुभचिन्तक मित्रों को देखने केलिए उत्सुक भगवान् बलराम अपने रथ पर सवार हुए और उन्होंने नन्द गोकुल की यात्रा की।
परिष्वक्तश्चिरोत्कण्ठैगोंपिगोपीभिरेव च ।
रामोभिवाद्य पितरावाशीभिरभिनन्दित: ॥
२॥
परिष्वक्त:--आलिंगन किया हुआ; चिर--दीर्घकाल से; उत्कण्ठै:--चिन्तित; गोपैः --ग्वालों के द्वारा; गोपीभि:--गोपियों केद्वारा; एव--निस्सन्देह; च-- भी; राम:-- बलराम; अभिवाद्य--अभिवादन करके; पितरौ--अपने माता-पिता ( नन््द तथायशोदा ) को; आशीर्भि: --प्रार्थनाओं से; अभिनन्दित:--हर्षपूर्वक सत्कार किया हुआ।
दीर्घकाल से वियोग की चिन्ता सह चुकने के कारण गोपों तथा उनकी पत्नियों ने बलरामका आलिंगन किया।
तब बलराम ने अपने माता-पिता को प्रणाम किया और उन्होंने स्तुतियोंद्वारा बलराम का हर्ष के साथ सत्कार किया।
चिरं नः पाहि दाशाई सानुजो जगदी श्वरः ।
इत्यारोप्याड्डूमालिड्ग्य नेत्रै: सिषिचतुर्जलै: ॥
३॥
चिरम्--दीर्घकाल से; न:--हमारी; पाहि--रक्षा करें; दाशाह--हे दशाई वंशज; स--सहित; अनुज: --तुम्हारे छोटे भाई के;जगत्--ब्रह्माण्ड के; ईश्वरः--स्वामी; इति--ऐसा कह कर; आरोप्य--उठाकर; अड्जम्-- अपनी गोद में; आलिड्ग्य--आलिंगनकरके; नेत्रै:--आँखों के; सिषिचतु:--सिक्त कर दिया; जलै:ः--जल से
नन्द तथा यशोदा ने प्रार्थना की : 'हे दशाई वंशज, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, तुम तथातुम्हारे छोटे भाई कृष्ण सदैव हमारी रक्षा करते रहो।
यह कह कर उन्होंने श्री बलराम कोअपनी गोद में उठा लिया, उनका आलिंगन किया और अपने नेत्रों के आँसुओं से उन्हें सिक्त करदिया।
गोपवृद्धांश्व विधिवद्यविष्ठैरभिवन्दित: ।
यथावयो यथासख्य॑ यथासम्बन्धमात्मन: ॥
४॥
समुपेत्याथ गोपालान्हास्यहस्तग्रहादिभि: ।
विश्रान्तम्सुखमासीन पप्रच्छु: पर्युपागता: ॥
५॥
पृष्टाश्चानामयं स्वेषु प्रेमगद्गदया गिरा ।
कृष्णे कमलपत्राक्षे सन्यस्ताखिलराधस: ॥
६॥
गोप--्वालों के ; वृद्धानू--गुरुजन; च--तथा; विधि-वत्-- वैदिक आदेशों के अनुसार; यविष्ठै: --छोटों के द्वारा;अभिवन्दितः--आदर पूर्वक सत्कार किया; यथा-वय:--आयु के अनुसार; यथा-सख्यम्--मैत्री के अनुसार; यथा-सम्बन्धम्--पारिवारिक सम्बन्ध के अनुसार; आत्मन:--अपने से; समुपेत्य--पास जाकर; अथ--तब; गोपालानू--ग्वालों को; हास्य--मुसकानों से; हस्त-ग्रह--उनके हाथ लेकर; आदिभि:--इत्यादि द्वारा; विश्रान्तम्--विश्राम किया; सुखम्--सुखपूर्वक;आसीनमू--बैठकर; पप्रच्छु:--पूछा; पर्युपागता: --चारों ओर एकत्र होकर; पृष्टा:--पूछा; च--तथा; अनामयमू--स्वास्थ्य केविषय में; स्वेषु--उनके मित्रों के बारे में; प्रेम--प्रेमवश; गद्गदया--रूक रुककर; गिरा--वाणी से; कृष्णे--कृष्ण के लिए;कमल--कमल की; पत्र--पंखड़ी ( जैसी ); अक्षे--आँखों वाले; सन्न्यस्त--समर्पित करके; अखिल--समस्त; राधस:--भौतिक सम्पत्ति
तब बलराम ने अपने से बड़े ग्वालों के प्रति समुच्चित सम्मान प्रकट किया तथा जो छोटे थेउन्होंने उनका सादर-सत्कार किया।
वे आयु, मैत्री की कोटि तथा पारिवारिक सम्बन्ध केअनुसार हरएक से हँसकर, हाथ मिलाकर स्वयं मिले।
तत्पश्चात् विश्राम कर लेने के बाद उन्होंनेसुखद आसन ग्रहण किया और सारे लोग उनके चारों ओर एकत्र हो गये।
उनके प्रति प्रेम से रुद्धवाणी से उन ग्वालों ने, जिन्होंने कमल-नेत्र कृष्ण को सर्वस्व अर्पित कर दिया था, अपने( द्वारका के ) प्रियजनों के स्वास्थ्य के विषय में पूछा।
बदले में बलराम ने ग्वालों की कुशल-मंगल के विषय में पूछा।
कच्चिन्नो बान्धवा राम सर्वे कुशलमासते ।
कच्चित्स्मरथ नो राम यूयं दारसुतान्विता: ॥
७॥
कच्चित्ू--क्या; नः--हमारे; बान्धवा:--सम्बन्धी; राम--हे बलराम; सर्वे--सभी; कुशलम्--ठीक से; आसते--हैं;कच्चित्--क्या; स्मरथ--स्मरण करते हैं; नः--हमको; राम--हे राम; यूयम्--तुम सभी; दार--पत्नियों; सुत--तथा पुत्रों;अन्विता:--सहित |
ग्वालों ने कहा : हे राम, हमारे सारे सम्बन्धी ठीक से तो हैं न? और हे राम क्या तुम सभीलोग अपनी पत्नियों तथा पुत्रों सहित अब भी हमें याद करते हो ?
दिष्टय्या कंसो हतः पापो दिष्टद्या मुक्ता: सुहज्जना: ।
निहत्य निर्जित्य रिपून्दिष्टया दुर्ग समाश्रीता: ॥
८ ॥
दिष्टयया-- भाग्य से; कंस:ः--कंस; हत:ः--मारा गया; पाप:--पापी; दिछ्टएया-- भाग्य से; मुक्ता: --मुक्त हुए; सुहृत्-जना:--प्रियसम्बन्धी; निहत्य--मार कर; निर्जित्य--जीत कर; रिपूनू--शत्रुओं को; दिछ्या-- भाग्यवश; दुर्गम्-दुर्ग या किले में;समाश्रीता:--शरण ले ली है।
यह हमारा परम सौभाग्य है कि पापी कंस मारा जा चुका है और हमारे प्रिय सम्बन्धी मुक्त होचुके हैं।
हमारा यह भी सौभाग्य है कि हमारे सम्बन्धियों ने अपने शत्रुओं को मार डाला है औरपराजित कर दिया है तथा एक विशाल दुर्ग में पूर्ण सुरक्षा प्राप्त कर ली है।
गोप्यो हसन्त्यः पप्रच्छू रामसन्दर्शनाहता: ।
कच्चिदास्ते सुखं कृष्ण: पुरस्त्रीजनवललभः ॥
९॥
गोप्य:--तरुण गोपियों ने; हसन्त्य:--हँसती हुई; पप्रच्छ:--पूछा; राम--बलराम से; सन्दर्शन--साक्षात् दर्शन द्वारा; आहता:--आदरित; कच्चित्ू-- क्या; आस्ते--रह रहा है; सुखम्--सुखपूर्वक; कृष्ण:--कृष्ण; पुर--नगर के; स्त्री-जन--स्त्रियों के;वलल्लभ:--प्राणप्रिय |
शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : भगवान् बलराम के साक्षात् दर्शन से गौरवान्वित हुईगोपियों ने हँसते हुए उनसे पूछा, 'नगर की स्त्रियों के प्राणप्रिय कृष्ण सुखपूर्वक तो हैं?
'कच्चित्स्मरति वा बन्धून्पितरं मातरं च सः ।
अप्यसौ मातरं द्रष्ट सकृदप्यागमिष्यति ।
अपि वा स्मरतेउस्माकमनुसेवां महाभुज: ॥
१०॥
'कच्चित्--क्या; स्मरति--स्मरण करता है; वा--अथवा; बन्धूनू-- अपने परिवार के सदस्यों को; पितरम्--पिता को;मातरम्--अपनी माता को; च--तथा; सः--वह; अपि-- भी; असौ--स्वयं; मातरम्-- अपनी माता को; द्रष्टभ्--देखने केलिए; सकृतू--एक बार; अपि-- भी; आगमिष्यति-- आयेगा; अपि--निस्सन्देह; वा--अथवा; स्मरते--स्मरण करता है;अस्माकम्--हमारी; अनुसेवाम्--स्थिर सेवा; महा--बलशाली; भुज:--भुजाओं वाला
क्या वे अपने परिवार वालों को, विशेषतया अपने माता-पिता को याद करते हैं? क्याआपके विचार में वे अपनी माता को एक बार भी देखने वापस आयेंगे ? और क्या बलशालीभुजाओं वाले कृष्ण हमारे द्वारा सदा की गई सेवा का स्मरण करते हैं ?
मातरं पितरं भ्रातृन्पतीन्पुत्रान्स्वसूनपि ।
यदर्थ जहिम दाशाई दुस्त्यजान्स्वजनान्प्रभो ॥
११॥
ता नः सद्यः परित्यज्य गतः सज्छिन्नसौहदः ।
कथ॑ नु ताहशं स्त्रीभिर्न श्रद्धीयेत भाषितम् ॥
१२॥
मातरम्--माता को; पितरम्-पिता को; भ्रातृनू-- भाइयों को; पतीन्--पतियों को; पुत्रान्--पुत्रों को; स्वसून्ू--बहनों को;अपि--भी; यत्--जिनके; अर्थ--लिए; जहिम--हमने छोड़ दिया; दाशाह--हे दशाईवंशी; दुस्त्यजानू--त्याग पाना कठिन;स्व-जनान्--अपने ही लोगों को; प्रभो--हे प्रभु; ताः--उन्हीं स्त्रियों को; नः--हम; सद्य;ः --सहसा; परित्यज्य--त्याग कर;गतः--चले गये; स्छिन्न--तोड़ कर; सौहृदः--मित्रता; कथम्--कैसे; नु--निस्सन्देह; ताहशम्--ऐसा; स्त्रीभि:--स्त्रियों द्वारा;न श्रद्धीयेत--विश्वास नहीं किया जायेगा; भाषीतम्--कहे गये शब्द
हे दाशाई, हमने कृष्ण की खातिर अपनी माताओं, पिताओं, भाइयों, पतियों, पुत्रों तथाबहनों का भी परित्याग कर दिया यद्यपि इन पारिवारिक सम्बन्धों का परित्याग कर पाना कठिनहै।
किन्तु हे प्रभु, अब उन्हीं कृष्ण ने सहसा हम सबों को त्याग कर हमारे साथ के समस्त स्नेह-बन्धनों को तोड़ दिया है और वे चले गये हैं।
और ऐसे में कोई स्त्री उनके वादों पर कैसे विश्वासकर सकती है ?
कथ्थ॑ नु गृहन्त्यनवस्थितात्मनोबच: कृतघ्नस्य बुधाः पुरस्त्रियः ।
गृहन्ति वै चित्रकथस्य सुन्दर-स्मितावलोकोच्छुसितस्मरातुरा: ॥
१३॥
कथम्-कैसे; नु--निस्सन्देह; गृह्न्ति--स्वीकार करती हैं; अनवस्थित--अस्थिर; आत्मन:--हृदय वाले के; वच:--शब्द;कृत-ध्नस्य--कृतघ्न का; बुधा:--बुद्धिमान; पुर--नगर की; स्त्रियः--स्त्रियाँ; गृहन्ति--स्वीकार करती हैं; बै--निस्सन्देह;चित्र--आश्चर्यजनक; कथस्य--कथाओं के; सुन्दर--सुन्दर; स्मित--हँसती हुई; अवलोक--तिरछी नजरों से; उच्छुसित--पुनःजीवन प्रदान की गई; स्मर--काम-वासना द्वारा; आतुरा:--विश्लुब्ध, चंचल।
'नगर की बुद्धिमान स्त्रियाँ ऐसे व्यक्ति के वचनों पर कैसे विश्वास कर सकती हैं जिसकाहृदय इतना अस्थिर है और जो इतना कृतघ्न है? वे उन पर इसलिए विश्वास कर लेती थीं क्योंकिवे इतने अद्भुत ढंग से बोलते हैं और उनकी सुन्दर हँसी से युक्त चितवनें काम-वासना जगा देतीहैं।
कि नस्तत्कथया गोप्य: कथा: कथयतापरा: ।
यात्यस्माभिरविना कालो यदि तस्य तथेव नः ॥
१४॥
किम्--क्या ( लाभ ); न:--हमारे लिए; तत्--उसके विषय में; कथया--विचार-विमर्श से; गोप्य:--हे गोपियो; कथा: --कथाएँ; कथयत--कृपा करके कहो; अपरा:--अन्य; याति--बीतता है; अस्माभि:--हमारे; विना--बिना; काल:--समय;यदि--यदि; तस्य--उसका; तथा एव--उसी विधि से; न:--हमारा |
हे गोपियो, उनके विषय में बातें करने में क्यों पड़ी हो? कृपा करके किसी अन्य विषय परबात चलाओ।
यदि वे हमारे बिना अपना समय बिता लेते हैं, तो हम भी उसी तरह से ( उनकेबिना ) अपना समय बिता लेंगी।
इति प्रहसितं शौरेर्जल्पितं चारुवीक्षितम् ।
गतिं प्रेमपरिष्वड़ं स्मरन्त्यो रुरुदु: स्त्रिय: ॥
१५॥
इति--इस प्रकार कह कर; प्रहसितम्-- अट्टहास; शौरे: -- भगवान् कृष्ण का; जल्पितम्ू--मोहक बातचीत; चारु--आकर्षक;वीक्षितम्-चितवनें; गतिम्--चाल; प्रेम--प्रेममय; परिष्वड्रमू-- आलिंगन; स्मरन्त्य:--स्मरण करती हुईं; रुरुदु;--चिल्लाञ्ठीं $ स्त्रियः--स्त्रियाँ |
ये शब्द कहती हुईं तरूण गोपियों को भगवान् शौरि की हँसी, अपने साथ उनकी मोहकबातें, उनकी आकर्षक चितवनें, उनके चलने का ढंग तथा उनके प्रेमपूर्ण आलिंगनों का स्मरणहो आया।
इस तरह वे सिसकने लगीं।
सड्डूर्षणस्ता: कृष्णस्य सन्देशैईदयंगमैः: ।
सान्त्वयामास भगवाजन्नानानुनयकोविद: ॥
१६॥
सड्डूर्षण: --परम आकर्षण वाले, बलराम ने; ता:--उनको; कृष्णस्य--कृष्ण के; सन्देशै:--गुप्त सन्देश से; हृदयम्ू--हृदयको; गमै: --स्पर्श करते; सान्त्वयाम् आस--ढाढ़स बँधाया; भगवान्-- भगवान्; नाना--अनेक प्रकार के; अनुनय--बीच-बचाव में; कोविद: --पटु |
सबों को आकृष्ट करने वाले भगवान् बलराम ने नाना प्रकार से समझाने-बुझाने में पटु होनेके कारण, गोपियों को भगवान् कृष्ण द्वारा उनके साथ भेजे हुए गुप्त सन्देश सुनाकर उन्हें धीरजबँधाया।
ये सन्देश गोपियों के हृदयों को भीतर तक छू गये।
द्वौ मासौ तत्र चावात्सीन्मधुं माधवं एव च ।
रामः क्षपासु भगवान्गोपीनां रतिमावहन् ॥
१७॥
द्वौ--दो; मासौ--माह; तत्र--वहाँ ( गोकुल में ); च--तथा; अवात्सीत्--निवास किया; मधुम्--मधु ( चैत्र ); माधवम्--माधव ( वैशाख ); एव--निस्सन्देह; च-- भी; राम:--बलराम; क्षपासु--रातों में; भगवान्-- भगवान्; गोपीनाम्--गोपियों को;रतिम्--माधुर्य सुख; आवहनू्--लाते हुए
भगवान् बलराम वहाँ मधु चैत्र तथा माधव वैशाख दो मास तक रहे और रात में अपनीगोपिका-मित्रों को माधुर्य आनन्द प्रदान करते रहे।
पूर्णचन्द्रकलामृष्टे कौमुदीगन्धवायुना ।
यमुनोपवतने रेमे सेविते स्त्रीगणैर्वृत: ॥
१८ ॥
पूर्ण--पूर्ण; चन्द्र--चन्द्रमा की; कला--किरणों से; मृष्ट--नहलाई, स्नात; कौमुदी--कुमुदिनी की, जो चाँदनी पाकर खिलतीहै; गन्ध--सुगन्ध ( ले जाने वाली ); वायुना--हवा से; यमुना--यमुना नदी के; उपवने--उद्यान में; रेमे--रमण किया;सेविते--सेवित; स्त्री--स्त्रियों से; गणैः--अनेक; वृतः--घिरे हुए।
अनेक स्त्रियों के संग भगवान् बलराम ने यमुना नदी के तट पर एक उद्यान में रमण किया।
यह उद्यान पूर्ण चन्द्रमा की किरणों से नहलाया हुआ था और रात में खिली कुमुदिनियों कीसुगन्ध ले जाने वाली मन्द वायु के द्वारा स्पर्शित था।
वरुणप्रेषिता देवी वारुणी वृक्षकोटरात् ।
पतन््ती तद्वनं सर्व स्वगन्धेनाध्यवासयत् ॥
१९॥
वरुण--समुद्र के देवता वरुण द्वारा; प्रेषिता-- भेजी गई; देवी--दैवी; वारुणी--वारुणी शराब; वृक्ष--पेड़ के; कोटरातू--खोखले छिद्र से; पतन्ती--बह निकली; तत्--उस; वनम्--जंगल को; सर्वम्--सारे; स्व--अपनी; गन्धेन--सुगन्ध से;अध्यवासयत्--- अधिक सुगन्धित बना दिया।
वरुण देव द्वारा भेजी गयी दैवी वारुणी मदिरा एक वृक्ष के खोखले छिद्र से बह निकलीऔर अपनी मधुर गन्ध से सारे जंगल को और अधिक सुगन्धित बना दिया।
त॑ गन्ध॑ मधुधाराया वायुनोपहतं बल: ।
आप्रायोपगतस्तत्र ललनाभि: समं॑ पपौ ॥
२०॥
तम्--उस; गन्धम्--सुगन्ध को मधु--शहद की » धाराया:-- धारा का; वायुना--वायु द्वारा; उपहतम्--पास लाई गई » बल:--बलराम; आप्राय--सूँघ कर; उपगत:--पास जाकर; तत्र--वहाँ; ललनाभि: --तरुण स्त्रियों के; समम्--साथ; पपौ--पिया |
वायु उस मधुर पेय की धारा की सुगन्ध को बलराम के पास ले गई और जब उन्होंने उसेसूँघा तो वे ( वृक्ष के पास ) गये।
वहाँ उन्होंने तथा उनकी संगिनियों ने उसका पान किया।
उपगीयमानो गन्धर्वेरवनिताशोभिमण्डले ।
रेमे करेणुयूथेशो माहेन्द्र इब वारण: ॥
२१॥
उपगीयमान:ः--गीतों के द्वारा प्रशंसित; गन्धर्वैं:--गन्धर्वो द्वारा; वनिता--युवतियों द्वारा; शोभि--सुशोभित; मण्डले--गोले में;रैमे--रमण किया; करेणु--हथनियों के; यूथ--झुंड के; ईशः --स्वामी; माहा-इन्द्र: --इन्ध के; इब--सहृश; वारण: --हाथी( ऐरावत )
जब गन्धर्वगण उनका यशोगान कर रहे थे तो भगवान् बलराम तरुण स्त्रियों के तेजोमयवृत्त के मध्य रमण कर रहे थे।
वे इन्द्र के शानदार हाथी ऐरावत, जो हथनियों के झुंड में रमणकर रहा हो की तरह लग रहे थे।
नेदुर्दुन्दुभयो व्योम्नि ववृषु: कुसुमैर्मुदा ।
गन्धर्वा मुनयो राम॑ तद्वीयैरीडिर तदा ॥
२२॥
नेदु:--ध्वनि करने लगीं; दुन्दुभय: --दुन्दुभियाँ; व्योग्नि--आकाश् में; ववृषु:--वर्षा की; कुसुमैः --फूलों से; मुदा--हर्षपूर्वक;गन्धर्वा:--गश्धर्वों ने; मुन॒बः--मुनियों ने; राममू--बलराम की; तत्ू-वीर्यं: --उनके बीरतापूर्ण कार्यों समेत; ईडिरे-- प्रशंसा की;तदा--तब
उस समय आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं, गन्धर्वों ने प्रसन्नतापूर्वक फूलों की वर्षा कीऔर मुनियों ने भगवान् बलराम के वीरतापूर्ण कार्यो की प्रशंसा की।
उपगीयमानचरितो वनिताभिहलायुध ।
वनेषु व्यचरत्क्षीवो मदविहललोचन: ॥
२३॥
उपगीयमान--गायी जाकर; चरितः--उनकी लीलाएँ; वनिताभि:--स्त्रियों सहित; हलायुध:--बलराम; वनेषु--वनों के बीच;व्यचरत्--घूमने लगे; क्षीव:--चूर; मद--नशे में; विहल--पराजित; लोचन:--आँखें |
जब उनके कार्यों का गान हो रहा था, तो हलायुध मदोन्मत्त जैसे होकर अपनी संगिनियों केसंग विविध जंगलों में घूम रहे थे।
उनकी आँखें नशे में चूर थीं।
स्रग्व्येककुण्डलो मत्तो वैजयन्त्या च मालया ।
बिश्रत्स्मितमुखाम्भोजं स्वेदप्रालेयभूषितम् ।
स आजुहाव यमुनां जलक्रीडार्थमी श्वर: ॥
२४॥
निजं वाक्यमनाहत्य मत्त इत्यापगां बल: ।
अनागतां हलाग्रेण कुपितो विचकर्ष ह ॥
२५॥
सत्रकू-वी--माला धारण किये; एक--एक; कुण्डल:--कुण्डल; मत्त:--हर्ष से उन्मत्त; वैजयन्त्या--वैजयन्ती नामक; च--तथा; मालया--माला से; बिभ्रतू--प्रदर्शित करते हुए; स्मित--हँसता हुआ; मुख--उसका मुख; अम्भोजमू--कमल सहश;स्वेद--पसीने का; प्रालेय--बर्फ के साथ; भूषितम्ू--अलंकृत; सः--उसने; आजुहाव--बुलाया; यमुनाम्--यमुना नदी को;जल--जल में; कृईंडा--खेलने के; अर्थम्--हेतु; ई श्वः-- भगवान्; निजम्--अपने; वाक्यम्--शब्द; अनाहत्य-- अनादरकरके; मत्त:--उन्मत्त; इति--इस प्रकार ( सोचते हुए ); आप-गाम्ू--नदी को; बल:--बलराम ने; अनागताम्--न आती हुई;हल--अपने हल के; अग्रेण--अगले भाग या नोक से; कुपित:--क्रुद्ध; विचकर्ष ह--खींचा |
हर्ष से उन्मत्त बलराम फूल-मालाओं से खेल रहे थे।
इनमें सुप्रसिद्ध वैजयन्ती मालासम्मिलित थी।
वे कान में एक कुण्डल पहने थे और उनके मुसकान-भरे कमल-मुख पर पसीनेकी बूँदें इस तरह सुशोभित थीं मानो बर्फ के कण हों।
तब उन्होंने यमुना को बुलाया जिससे वेउसके जल में क्रीडा कर सकें किन्तु उसने उनके आदेश की उपेक्षा इसलिए कर दी क्योंकि वेमदोन्मत्त थे।
इससे बलराम क्रुद्ध हो उठे और वे अपने हल की नोक से नदी को खींचने लगे।
पापे त्वं मामवज्ञाय यन्नायासि मयाहुता ।
नेष्ये त्वां लाडुलाग्रेण शतधा कामचारिणीम् ॥
२६॥
पापे--रे पापिनी; त्वमू--तुम; मामू--मेरा; अवज्ञाय--अनादर करके; यत्--क्योंकि; न आयासि--नहीं आती हो; मया--मेरेद्वारा; आहुता--बुलाई गई; नेष्ये--मैं लाऊँगा; त्वामू-तुमको; लाडुल--अपने हल की; अग्रेण--नोक से; शतधा--सौ भागोंमें; काम--स्वेच्छा से; चारिणीम्--चलने वाली |
बलराम ने कहा : मेरा अनादर करने वाली पापिनी! तुम मेरे बुलाने पर न आकर केवलमनमाने चलने वाली हो।
अतः मैं अपने हल की नोक से सौ धाराओं के रूप में तुम्हें यहाँ लेआऊँगा।
एवं निर्भ््सिता भीता यमुना यदुनन्दनम् ।
उवाच चकिता वाचं पतिता पादयो्नुप ॥
२७॥
एवम्--इस प्रकार; निर्भ््सिता--फटकारी गई; भीता--डरी हुईं; यमुना--यमुना नदी की अधिष्ठात्री देवी; यदु-नन्दनम्--यदुके प्रिय वंशज बलराम से; उवाच--बोली; चकिता--काँपती हुई; वाचम्--शब्द; पतिता--गिरी हुई; पादयो:--पाँवों पर;नृप--हे राजा ( परीक्षित )
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, बलराम द्वारा इस प्रकार फटकारी जाकर डरी हुईंयमुनादेवी आईं और यदुनन्दन बलराम के चरणों पर गिर पड़ीं।
काँपते हुए उसने उनसेनिम्नलिखित शब्द कहे।
राम राम महाबाहो न जाने तब विक्रमम् ।
यस्यैकांशेन विधृता जगती जगतः पते ॥
२८॥
राम राम--हे राम, राम; महा-बाहो--हे विशाल भुजाओं वाले; न जाने--मैं नहीं जानती; तव--तुम्हारा; विक्रमम्--पराक्रम;यस्य--जिसका; एक--एक; अंशेन-- अंश से; विधृता-- धारण की गई; जगती--पृथ्वी; जगत:--ब्रह्माण्ड के; पते--हेस्वामी
यमुनादेवी ने कहा : हे विशाल भुजाओं वाले राम, हे राम, मैं आपके पराक्रम के बारे मेंकुछ भी नहीं जानती।
हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, आप अपने एक अंशमात्र से पृथ्वी को धारण किएहुए हैं।
परं भावं भगवतो भगवन्मामजानतीम् ।
मोक्तुमहसि विश्वात्मन्प्रपन्नां भक्तवत्सल ॥
२९॥
'परमू--परम; भावम्--पद को; भगवतः -- भगवान् का; भगवन्--हे भगवान्; माम्--मुझको; अजानतीम्--न जानती हुई;मोक्तुम् अहंसि--कृपया छोड़ दें; विश्व--ब्रह्माण्ड के; आत्मन्ू--हे आत्मा; प्रपन्नामू--शरणागत; भक्त--अपने भक्तों पर;बत्सल--हे दयालु |
हे प्रभु, आप मुझे छोड़ दें।
हे ब्रह्माण्ड के आत्मा, मैं भगवान् के रूप में आपके पद को नहींजानती थी किन्तु अब मैं आपकी शरण में हूँ और आप अपने भक्तों पर सदैव दयालु रहते हैं।
ततो व्यमुझ्द्यमुनां याचितो भगवान्बल: ।
विजगाह जल स्त्रीभि: करेणुभिरिवेभराट् ॥
३०॥
ततः--तब; व्यमुझ्नत्ू--छोड़ दिया; यमुनाम्--यमुना को; याचितः--याचना करती हुई; भगवान्-- भगवान्; बल:--बलराम;विजगाह--घुस गये; जलम्--जल में; स्त्रीभि:--स्त्रियों के साथ; करेणुभि:--अपनी हथनियों के साथ; इब--सहृश; इभ--हाथियों के; राटू--राजा |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : तब बलराम ने यमुना को छोड़ दिया और जिस तरह हाथियोंका राजा अपनी हथनियों के झुण्ड के साथ जल में प्रवेश करता है उसी तरह वे अपनी संगिनियोंके साथ नदी के जल में प्रविष्ट हुए।
काम विहृत्य सलिलादुत्तीर्णायासीताम्बरे ।
भूषणानि महाहाणि ददौ कान्तिः शुभां सत्रजम् ॥
३१॥
कामम्--इच्छानुसार; विहत्य--क्रीड़ा कर चुकने के बाद; सलिलात्ू--जल से; उत्तीर्णाय--बाहर निकले हुए को; असित--नीला; अम्बरे--कपड़ों की जोड़ी ( ऊपर तथा नीचे के ); भूषणानि--गहने; महा--अत्यधिक; अर्हाणि--मूल्यवान; ददौ--दिया; कान्ति:--देवी कान्ति; शुभाम्--अतीव सुन्दर; स्त्रजमू--गले का हार।
बलराम ने जी भरकर जल-क्रीड़ा की और जब वे बाहर निकले तो देवी कान्ति ने उन्हें नीलेवस्त्र, मूल्यवान आभूषण तथा चमकीला गले का हार भेंट किया।
वसित्वा वाससी नीले मालां आमुच्य काझ्ननीम् ।
रेये स्वलड्डू तो लिप्तो माहेन्द्र इब वारण: ॥
३२॥
वसित्वा--पहन कर; वाससी--वस्त्रों की जोड़ी; नीले--नीले रंग की; मालामू--गले का हार; आमुच्य--पहन कर;काझ्ननीम्--सुनहली; रेजे--शोभायमान हो रहे थे; सु--सुन्दर; अलड्डू तः--आभूषित; लिप्त:--लेप किया; माहा-इन्द्र: --महेन्द्र का; इब--सहृश; वारण: --हाथी |
भगवान् बलराम ने नीले वस्त्र पहने और गले में सुनहरा हार डाल लिया।
सुगन्धियों सेलेपित और सुन्दर ढंग से अलंकृत होकर वे इन्द्र के हाथी जैसे सुशोभित हो रहे थे।
अद्यापि हृश्यते राजन्यमुनाकृष्टवर्त्मना ।
बलस्यानन्तवीर्यस्य वीर्य सूचयतीव हि ॥
३३॥
अद्य--आज; अपि-- भी; दृश्यते--देखी जाती है; राजन्ू--हे राजा ( परीक्षित ); यमुना--यमुना नदी; आकृष्ट--खींची हुई;वर्त्मना--धाराओं से; बलस्य--बलराम के; अनन्त-- असीम; वीर्यस्य--बल के; वीर्यम्--पराक्रम; सूचयती--सूचित करतीहुई; इब--मानो; हि--निस्सन्देह |
हे राजनू, आज भी यह देखा जा सकता है कि किस तरह यमुना अनेक धाराओं में होकरबहती है, जो असीम बलशाली बलराम द्वारा खींचे जाने पर बन गई थीं।
इस प्रकार यमुना उनकेपराक्रम को प्रदर्शित करती है।
एवं सर्वा निशा याता एकेव रमतो ब्रजे ।
रामस्याक्षिप्तचित्तस्य माधुर्यत्रजयोषिताम् ॥
३४॥
एवम्--इस प्रकार; सर्वा--सभी; निशा: --रातें; याता:--बीत गईं; एका--एक; इब--मानो; रमत:--रमण करते हुए; ब्रजे--ब्रज में; रामस्थ--बलराम के; आक्षिप्त--मोहित; चित्तस्य--चित्त का; माधुरयैं: -- अद्वितीय सौन्दर्य से; ब्रज-योषितामू--व्रजकी स्त्रियों के
इस तरह बलराम के लिए सारी रातें ब्रज में रमण करते करते एक रात की तरह बीत गईं।
उनका मन ब्रज की तरुण स्त्रियों की अद्वितीय माधुरी से मोहित था।
