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अध्याय चौहत्तर: राजसूय यज्ञ में शिशुपाल की मुक्ति
10.74श्रीशुक उबाचएवं युथ्चिष्ठिरो राजा जरासन्धवर्धं विभो: ।
कृष्णस्य चानुभाव॑ त॑ श्रुत्वा प्रीतस्तमब्रवीत् ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; युधिष्ठिर:--युधिष्ठटिर; राजा--राजा; जरासन्ध-वधम्--जरासन्ध का वध; विभो: --सर्वशक्तिमान का; कृष्णस्य--कृष्ण का; च--तथा; अनुभावम्--बल ( का प्रदर्शन ); तमू--उसको; श्रुत्वा--सुनकर; प्रीत:--प्रसन्न; तम्--उनसे; अब्नवीत्--बोले |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस प्रकार जरासन्ध वध तथा सर्वशक्तिमान कृष्ण की अद्भुतशक्ति के विषय में भी सुनकर राजा युशथ्रिष्ठिर ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भगवान् से इस प्रकारकहा।
श्रीयुधिष्ठटिर उवाचये स्युस्त्रैलोक्यगुरव: सर्वे लोका महेश्वरा: ।
वहन्ति दुर्लभं लब्द्दा शिरसैवानुशासनम् ॥
२॥
श्री-युथ्िष्ठिर: उबाच-- श्री युधिष्ठिर ने कहा; ये--जो; स्युः--हैं; त्रै-लोक्य--तीनों लोकों के; गुरव: --गुरु; सर्वे--सारे;लोकाः--लोकों ( के निवासी ); महा-ईश्वराः--तथा महान् नियन्ता देवता; वहन्ति--ले जाते हैं; दुर्लभम्--विरले ही प्राप्य;लब्ध्वा--प्राप्त करके; शिरसा--सिरों के बल; एब--निस्सन्देह; अनुशासनम्--( आपका ) आदेश |
श्री युधिष्ठटिर ने कहा : तीनों लोकों के प्रतिष्ठित गुरु तथा विभिन्न लोकों के निवासी एवंशासक आपके आदेश को, जो विरले ही किसी को मिलता है, सिर-आँखों पर लेते हैं।
स भवानरविन्दाक्षो दीनानामीशमानिनाम् ।
धत्तेउनुशासनं भूमंस्तदत्यन्तविडम्बनम् ॥
३॥
सः--वही; भवान्ू--आप; अरविन्द-अक्ष:--कमल-नेत्र भगवान्; दीनानाम्ू--उनके, जो कि दुखी हैं; ईश--शासक;मानिनाम्ू--मानने वालों के; धत्ते--अपने ऊपर लेते हैं; अनुशासनम्-- आदेश; भूमन्--हे सर्वव्यापी; तत्ू--वह; अत्यन्त --बहुत बड़ा; विडम्बनम्--आडम्बर, धोखा
वही कमल-नेत्र भगवान् आप उन दीन मूर्खो के आदेशों को स्वीकार करते हैं, जो अपनेआपको शासक मान बैठते हैं, जबकि हे सर्वव्यापी, यह आपके पक्ष में महान् आडम्बर है।
न होकस्याद्वितीयस्य ब्रह्मण: परमात्मन: ।
कर्मभिर्वर्धते तेजो हसते च यथा रवे: ॥
४॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; एकस्य--एक का; अद्वितीयस्य--अद्वितीय का; ब्रह्मण:--ब्रह्म; परम-आत्मन: -- परमात्मा;कर्मभि:--कर्मो से; वर्धते--बढ़ता है; तेज:--बल, तेज; हसते--घटता है; च--तथा; यथा--जिस तरह; रवेः--सूर्य का |
किन्तु वस्तुतः परम सत्य, परमात्मा, अद्वितीय आदि पुरुष का तेज उनके कर्मों से न तोकिसी प्रकार बढ़ता है, न घटता है, जिस प्रकार सूर्य का तेज उसकी गति से घटता-बढ़ता नहींहै।
न वे तेडजित भक्तानां ममाहमिति माधव ।
त्वं तवेति च नानाधी: पशूनामिव बैकृती ॥
५॥
न--नहीं; वै--निस्सन्देह; ते--तुम्हारा; अजित--हे अजेय; भक्तानाम्ू- भक्तों के; मम अहम् इति--' मेरा तथा मैं'; माधव--हे कृष्ण; त्वम् तब इति--' तुम और तुम्हारा '; च--तथा; नाना--अन्तरों की; धी:--प्रवृत्ति; पशूनाम्ू--पशुओं की; इब--मानो; वैकृती--विकृत
हे अजित माधव, आपके भक्त तक 'मैं तथा मेरा ' और 'तुम तथा तुम्हारा ' में कोई अन्तरनहीं मानते, क्योंकि यह तो पशुओं की विकृत प्रवृत्ति है।
श्रीशुक उबाचइत्युक्त्वा यज्ञिये काले वत्रे युक्तान्स ऋत्विज: ।
कृष्णानुमोदितः पार्थो ब्राह्मणान्ब्रह्यगादिन: ॥
६॥
श्री-शुक: उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कह कर; यज्ञिये--यज्ञ के अनुकूल; काले--समयपर; वद्रे--चुना; युक्तान्--उपयुक्त; सः--उसने; ऋत्विज:--यज्ञ कराने वाले पुरोहित; कृष्ण--कृष्ण द्वारा; अनुमोदित: --स्वीकृत; पार्थ:--पृथा-पुत्र ( युधिष्टिर ) ने; ब्राह्मणान्ू--ब्राह्मणों को; ब्रह्म--वेदों के ; वादिन:--कुशल विद्वान
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह कह कर राजा युधिष्ठिर ने तब तक प्रतीक्षा की जब तक यज्ञका उपयुक्त समय निकट नहीं आ गया।
तब उन्होंने भगवान् कृष्ण की अनुमति से यज्ञ कराने केलिए उन उपयुक्त पुरोहितों का चुनाव किया, जो कुशल विद्वान थे।
द्वैपायनो भरद्वाज: सुमन्तुर्गोतमोउसितः ।
वसिष्ठश्च्यवन: कण्वो मैत्रेयः कवषस्त्रितः: ॥
७॥
विश्वामित्रो वामदेव: सुमतिर्जैमिनि: क्रतुः ।
पैल: पराशरो गर्गो वैशम्पायन एबच ॥
८॥
अथर्वा कश्यपो धौम्यो रामो भार्गव आसुरिः ।
वबीतिहोत्रो मधुच्छन्दा वीरसेनोकृतब्रण: ॥
९॥
द्वैपायन: भरद्वाज:--द्वैपायन ( व्यासदेव ) तथा भरद्वाज; सुमन्तु: गोतमः असितः--सुमन्तु, गोतम तथा असित; वसिष्ठ: च्यवनःकण्वः--वशिष्ठ, च्यवन तथा कण्व; मैत्रेयः कवषः त्रित:--मैत्रेय, कवष तथा त्रित; विश्वामित्र: वामदेव:--विश्वामित्र तथावामदेव; सुमतिः जैमिनि: क्रतु:--सुमति, जैमिनि तथा क्रतु; पैल: पराशर: गर्ग: --पैल, पराशर तथा गर्ग; वैशम्पायन:--वैशम्पायन; एव च-- भी; अथर्वा कश्यप: धौम्य:ः--अथर्वा, कश्यप तथा धौम्य; राम: भार्गव:ः--भूृगुवंशी परशुराम; आसुरिः--आसुरि; बीतिहोत्र: मधुच्छन्दा:--वीतिहोत्र तथा मधुच्छन्दा; बीरसेन: अकृतब्रण: --वीरसेन तथा अकृतत्रण:।
उन्होंने कृष्णद्वैघायन, भरद्वाज, सुमन््त, गोतम तथा असित के साथ ही वसिष्ठ, च्यवन, कण्व,मैत्रेय, कवष तथा त्रित को चुना।
उन्होंने विश्वामित्र, वामदेव, सुमति, जैमिनि, क्रतु, पैल तथापराशर एवं गर्ग, वैशम्पायन, अथर्वा, कश्यप, धौम्य, भूगुवंशी परशुराम, आसुरि, वीतिहोत्र,मधुच्छन्दा, वीरसेन तथा अकृतब्रण को भी चुना।
उपहूतास्तथा चान्ये द्रोणभीष्मकृपादय: ।
धृतराष्ट्र: सहसुतो विदुरश्ष महामति; ॥
१०॥
ब्राह्मणा: क्षत्रिया वैश्या: शूद्रा यज्ञदिहक्षवः ।
तत्रेयु: सर्वराजानो राज्ञां प्रकृतयो नृप ॥
११॥
उपहूता:--आमंत्रित; तथा-- भी; च--और; अन्ये--अन्य; द्रोण-भीष्म-कृप-आदय: --द्रोण, भीष्म, कृप इत्यादि; धृतराष्ट्र: --धृतराष्ट्र; सह-सुतः--पुत्रों सहित; विदुर: --विदुर; च--तथा; महा-मतिः--अत्यन्त बुद्धिमान; ब्राह्मणा: क्षत्रिया: वैश्या:शूद्राः--ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रगण; यज्ञ--यज्ञ; दिहक्षव:--देखने के लिए उत्सुक; तत्र--वहाँ; ईयु:--आये; सर्व--सारे; राजान:--राजा; राज्ञामू--राजाओं के; प्रकृतयः--दल-बल सहित; नृप--हे राजन
हे राजन्ू, जिन अन्य लोगों को आमंत्रित किया गया था उनमें द्रोण, भीष्म, कृप, पुत्रों सहितधृतराष्ट्र, महामति विदुर तथा यज्ञ देखने के लिए उत्सुक अन्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रसम्मिलित थे।
हाँ, सारे राजा दल-बल सहित वहाँ पधारे थे।
ततस्ते देवयजनं ब्राह्मणा: स्वर्णलाडुलै: ।
कृष्ठा तत्र यथाम्नायं दीक्षयां चक्रिरे नृपम् ॥
१२॥
ततः--तब; ते--उन; देव-यजनम्--देवताओं के पूजा-स्थल को; ब्राह्मणा: --ब्राह्मणों ने; स्वर्ण--सोने के; लाडुलैः--हलों से;कृष्ठा--जोत कर; तत्र--वहाँ; यथा-आम्नायमू-- प्रामाणिक अधिकारियों के अनुसार; दीक्षयाम् चक्रिरे--दीक्षा दी; नृपम्--राजाओं को
तत्पश्चात् ब्राह्मण पुरोहितों ने यज्ञस्थली की सोने के हल से जुताई की और प्रामाणिकदिद्वानों द्वारा नियत प्रथाओं के अनुसार यज्ञ के लिए राजा युधिष्टिर को दीक्षा दी।
हैमा: किलोपकरणा वरुणस्य यथा पुरा ।
इन्द्रादयो लोकपाला विरिद्धिभवसंयुता: ।
सगणाः सिद्धगन्धर्वा विद्याधरमहोरगा: ॥
१३॥
मुनयो यक्षरक्षांसि खगकिन्नरचारणा: ।
राजानश्व समाहूता राजपल्यश्च सर्वशः ॥
१४॥
राजसूयं समीयु: स्म राज्ञः पाण्डुसुतस्य वै ।
मेनिरे कृष्णभक्तस्य सूपपन्नमविस्मिता: ॥
१५॥
हैमाः--सोने के बने; किल--निस्सन्देह; उपकरणा:--बर्तन; वरुणस्य--वरुण के; यथा--जिस तरह; पुरा--प्राचीनकाल में;इन्द्र-आदय:--इन्द्र इत्यादि; लोक-पाला:--लोकों के शासनकर्ता; विरिश्ञि-भव-संयुता:--ब्रह्म तथा शिव समेत; स-गणा: --उनके सेवकों सहित; सिद्ध-गन्धर्वा:--सिद्ध तथा गन्धर्वगण; विद्याधर--विद्याधर; महा-उरगा:--तथा महान् सर्पगण; मुनय:--मुनिगण; यक्ष-रक्षांसि--यक्ष तथा राक्षसगण; खग-किन्नर-चारणा:--दैवी पक्षी, किन्नर तथा चारण; राजान:--राजा; च--तथा; समाहूता:--बुलाये गये; राज--राजाओं की; पल्य:--पत्नियाँ; च-- भी; सर्वश:--सभी स्थानों से; राजसूयम्--राजसूययज्ञ में; समीयु: स्म--आई; राज्:--राजा के; पाण्डु-सुतस्य--पाण्डु के पुत्रों के; वै--निस्सन्देह; मेनिरि--विचार किया; कृष्ण-भक्तस्य--कृष्णभक्त के लिए; सु-उपपन्नम्--नितान्त उपयुक्त; अविस्मिता:--चकित नहीं ।
यज्ञ के निमित्त पात्र सोने के बने थे जिस तरह कि प्राचीनकाल में भगवान् वरुण द्वारा सम्पन्न हुए यज्ञ में थे।
इन्द्र, ब्रह्मा, शिव और अनेक लोकपाल, सिद्ध तथा गन्धर्व एवं उनकेपार्षद, विद्याधर, महान् सर्प, मुनि, यक्ष, राक्षस, दैवी पक्षी, किन्नर, चारण तथा पार्थिव राजा--सभी को आमंत्रित किया गया था और वे पाण्डु-पुत्र राजा युथ्चिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में सभीदिशाओं से आये भी थे।
वे यज्ञ के ऐश्वर्य को देख कर रंचमात्र भी चकित नहीं हुए, क्योंकिकृष्णभक्त के लिए यही सर्वथा उपयुक्त था।
अयाजयन्महाराज॑ याजका देववर्चस: ।
राजसूयेन विधिवत्प्रचेतसमिवामरा: ॥
१६॥
अयाजयनू--यज्ञ सम्पन्न किया; महा-राजम्ू--महान् राजा के लिए; याजका:ः--यज्ञ-पुरोहितों ने; देव--देवताओं के; वर्चस:--बलशाली; राजसूयेन--राजसूय द्वारा; विधि-वत्--वेदों के आदेशानुसार; प्रचेतसम्--वरूुण को; इब--जिस तरह; अमरा:--देवताओं ने।
देवताओं के सहृश शक्तिसम्पन्न पुरोहितों ने वैदिक आदेशों के अनुसार राजा युधथिष्ठिर केलिए उसी तरह राजसूय यज्ञ सम्पादित किया जिस तरह पूर्वकाल में देवताओं ने वरुण के लिएकिया था।
सूत्येहन्यवनीपालो याजकान्सदसस्पतीन् ।
अपूजयन्महाभागान्यथावत्सुसमाहितः ॥
१७॥
सूत्ये--सोमरस निकालने के लिए; अहनि--दिन में; अवनी-पाल:--राजा ने; याजकान्--यज्ञ कराने वालों की; सदस:ः--सभाके; पतीन्--प्रमुखों की; अपूजयत्--पूजा; महा-भागान्ू--महान्; यथावत्--उचित रीति से; सु-समाहितः --मनोयोग से |
सोमरस निकालने के दिन राजा युधथ्रिष्टिर ने अच्छी तरह तथा बड़े ही ध्यानपूर्वक पुरोहितोंकी एवं सभा के श्रेष्ठ पुरुषों की पूजा की।
सदस्याछयाईणाई वै विमृशन्त: सभासद: ।
नाध्यगच्छन्ननैकान्त्यात्सहदेवस्तदाब्रवीत् ॥
१८ ॥
सदस्य--सभा का सदस्य; अछब--प्रथम; अर्हण--पूजा; अर्हम्--पात्र; वै--निस्सन्देह; विमृशन्त:ः--विचार-विर्मश करते हुए;सभा--सभा में; सदः--आसीन; न अध्यगच्छन्--किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाये; अनैक-अन्त्यात्ू-बड़ी संख्या होने से( योग्य पात्रों के ); सहदेव: --महाराज युथिष्ठिर का छोटा भाई सहदेव; तदा--तब; अब्रवीत्--बोला
तब सभासदों ने विचार-विमर्श किया कि उनमें से किसकी सबसे पहले पूजा की जाय।
किन्तु क्योंकि अनेक व्यक्ति इस सम्मान के योग्य थे अतः वे निश्चय कर पाने में असमर्थ थे।
अन्त में सहदेव बोल पड़े।
अ्हति ह्वच्युत: श्रेष्ठ भगवान्सात्वतां पति: ।
एष वै देवता: सर्वा देशकालधनादय: ॥
१९॥
अर्हति--योग्य है; हि--निस्सन्देह; अच्युत:--अच्युत कृष्ण; श्रेष्ठाम्-- श्रेष्ठ पद; भगवान्-- भगवान्; सात्वताम्ू--यादवों के;'पतिः--प्रधान; एष:--वह; वै--निश्चय ही; देवता:--देवतागण; सर्वा:--सभी; देश--स्थान ( यज्ञ के लिए ); काल--समय;धन-- भौतिक साज-सामान; आदय:--इत्यादि
सहदेव ने कहा : निश्चय ही भगवान् अच्युत तथा याददवों के प्रमुख ही इस सर्वोच्च पद केयोग्य हैं।
सच तो यह है कि वे यज्ञ में पूजे जाने वाले समस्त देवताओं से तथा साथ ही पूजा केपवित्र स्थान, समय तथा साज-सामान जैसे पक्षों से समन्वित हैं।
यदात्मकमिदं विश्व क्रतवश्च यदात्मकाः ।
अग्निराहुतयो मन्त्रा साड्ख्यं योगश्व यत्पर: ॥
२०॥
एक एवाद्वितीयोसावैतदात्म्यमिदं जगत् ।
आत्मनात्माश्रय: सभ्या: सृजत्यवति हन्त्यज: ॥
२१॥
यत्ू-आत्मकम्--जिस पर टिका; इृदम्--यह; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; क्रतवः--बड़े बड़े यज्ञों का सम्पन्न किया जाना; च--तथा;यत्-आत्मका: --जिस पर टिका; अग्नि: --पवित्र अग्नि; आहुतय:ः--आहुतियाँ; मन्त्रा:--मंत्र; साड्ख्यम्--दार्शनिक खोज कासिद्धान्त; योग:-- ध्यान की कला; च--तथा; यत्--जिस पर; पर:--लक्षित; एक:--एक; एव--अकेला; अद्वितीय:--अद्वितीय; असौ--वह; ऐतत्-आत्म्यम्-- अपने माध्यम से ( अर्थात् अपनी शक्तियों से ); इदम्--यह; जगत्--संसार;आत्मना--अपने द्वारा ( अर्थात् शक्तियों से )।
आत्म--स्वयं ही; आश्रयः--उनका आश्रय पाकर; सभ्या:--हे सभा के सदस्यो;सृजति--उत्पन्न करता है; अवति--पालता है; हन्ति--तथा संहार करता है; अज:--अजन्मा |
यह समस्त ब्रह्माण्ड उन्हीं पर टिका है और वैसे ही महान् यज्ञों का सम्पन्न किया जाना, उनकी पवित्र अग्नियाँ, आहुतियाँ तथा मंत्र भी उन्हीं पर टिकी हैं।
सांख्य तथा योग दोनों ही उनअद्वितीय को अपना लक्ष्य बनाते हैं।
हे सभासदो, वह अजन्मा भगवान् एकमात्र अपने पर निर्भररहते हुए इस जगत को अपनी निजी शक्तियों से उत्पन्न करता है, पालता और विनष्ट करता है।
इस तरह इस ब्रह्माण्ड का अस्तित्व एकमात्र उन्हीं पर निर्भर करता है।
विविधानीह कर्माणि जनयन्यदवेक्षया ।
ईहते यदयं सर्व: श्रेयो धर्मादिलक्षणम् ॥
२२॥
विविधानि--विविध; इह--इस संसार में; कर्माणि-- भौतिक कर्म; जनयन्--उत्पन्न करते हुए; यत्--जिसके द्वारा; अवेक्षया--कृपा; ईहते--प्रयत्तन करते हैं; यत्ू--जो; अयम्ू--यह संसार; सर्व:--सारा; श्रेयः--आद्शों के लिए; धर्म-आदि--धार्मिकताइत्यादि; लक्षणमू--लक्षण ।
वे इस जगत में विविध कर्मों को उत्पन्न करते हैं और इस तरह उनकी ही कृपा से सारा संसारधर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के आदर्शों के लिए प्रयत्नशील रहता है।
तस्मात्कृष्णाय महते दीयतां परमाहणम् ।
एवं चेत्सर्वभूतानामात्मनश्चाहणं भवेत् ॥
२३॥
तस्मात्--इसलिए; कृष्णाय--कृष्ण को; महते--परम; दीयताम्--दिया जाना चाहिए; परम--सर्वोच्च; अर्हणम्--सम्मान;एवम्--इस प्रकार; चेत्ू--यदि; सर्व--समस्त; भूतानाम्--जीवों का; आत्मन:--अपने; च--तथा; अर्हणम्--आदर करना;भवेत्--होगा।
इसलिए हमें चाहिए कि भगवान् कृष्ण को सर्वोच्च सम्मान दें।
यदि हम ऐसा करते हैं, तोहम सारे जीवों का सम्मान तो करेंगे ही, साथ ही अपने आपको भी सम्मान देंगे।
सर्वभूतात्मभूताय कृष्णायानन्यदर्शिने ।
देयं शान्ताय पूर्णाय दत्तस्यानन्त्यमिच्छता ॥
२४॥
सर्व--सारे; भूत--जीवों का; आत्म--आत्मा; भूताय--से युक्त; कृष्णाय--कृष्ण को; अनन्य--कभी भी पृथक् के रूप मेंनहीं; दर्शिने--द्रष्टा; देयम्ू--( मान ) दिया जाय; शान्ताय--शान्त रहने वाले को; पूर्णाय--पूर्ण को; दत्तस्थ--दिये हुए का;आननन््त्यमू--असीम वृद्धि; इच्छता--चाहने वाले के द्वारा।
जो भी व्यक्ति यह चाहता हो कि दिये गये सम्मान का असीम प्रतिदान मिले उसे कृष्ण कासम्मान करना चाहिए जो पूर्णतया शान्त हैं, समस्त जीवों की पूर्ण आत्मा भगवान् हैं और जोकिसी भी वस्तु को अपने से पृथक् नहीं मानते।
इत्युक्त्वा सहदेवो भूत्तृष्णीं कृष्णानुभाववित् ।
तच्छुत्वा तुष्ठवुः सर्वे साधु साध्विति सत्तमा: ॥
२५॥
इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कह कर; सहदेव: --सहदेव; अभूत्--हो गये; तूष्णीम्--मौन; कृष्ण--कृष्ण का; अनुभाव--प्रभाव; वित्ू--अच्छी तरह जानने वाला; तत्--यह; श्रुत्वा--सुन कर; तुष्ठुवु:--प्रशंसा की; सर्वे--समस्त; साधु साधु इति--'बहुत अच्छा ' बहुत अच्छा '; सत्--सन्त-पुरुषों में; तमा: --सर्व श्रेष्ठ |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह कह कर, भगवान् कृष्ण की शक्तियों को समझने वालेसहदेव मौन हो गये।
और उनके शब्द सुनकर वहाँ पर उपस्थित सभी सज्जनों ने 'बहुत अच्छा,बहुत अच्छा ' कह कर उन्हें बधाई दी।
श्र॒त्वा द्विजेरितं राजा ज्ञात्वा हार्द सभासदाम् ।
समर्हयद्धृषीकेशं प्रीत: प्रणयविह्नल: ॥
२६॥
श्रुत्वा--सुन कर; द्विज--ब्राह्मणों द्वारा; ईरितम्ू--कहा गया; राजा--राजा युधिष्ठिर; ज्ञात्वा--जान कर; हार्दम्ू--मनोभाव;सभा-सदाम्--सभा के सदस्यों के; समर्हयत्--अच्छी तरह पूजा की; हषीकेशम्--भगवान् कृष्ण की; प्रीत:--प्रसन्न; प्रणय--प्रेम से; विहल:ः--विभोर।
राजा ब्राह्मणों की इस घोषणा से अत्यन्त प्रसन्न हुए क्योंकि वे इससे सम्पूर्ण सभा कीमनोदशा को समझ गये।
उन्होंने प्रेम से विभोर होकर इन्द्रियों के स्वामी भगवान् कृष्ण की पूजा की।
तत्पादाववनिज्याप: शिरसा लोकपावनीः ।
सभार्य: सानुजामात्य: सकुट॒म्बो वहन्मुदा ॥
२७॥
वासोभिः पीतकौषेयैर्भूषणैश्व महाधनै: ।
अर्हयित्वाश्रुपूर्णा क्षो नाशकत्समवेक्षितुम् ॥
२८॥
तत्--उसको; पादौ--चरणों को; अवनिज्य--धोकर; आप:ः--जल; शिरसा--अपने सिर पर; लोक--संसार को; पावनी:--पवित्र करने वाली; स--सहित; भार्य:--अपनी पतली; स--सहित; अनुज--अपने भाइयों; अमात्य:--तथा अपने मंत्रियों; स--सहित; कुटुम्बः--अपने परिवार; वहन्--ले जाते हुए; मुदा--हर्षपूर्वक; वासोभि: --वस्त्रों सहित; पीत--पीले; कौषेयै: --रेशमी; भूषणैः --गहनों सहित; च--तथा; महा-धनै:ः--मूल्यवान; अर्हयित्वा--सम्मान करके; अश्रु--आँसुओं से; पूर्ण-- भरे;अक्ष:--नेत्रों से; न अशकत्--वह असमर्थ था; समवेक्षितुमू--उनकी ओर ताककने में ॥
भगवान् कृष्ण के चरण पखारने के बाद महाराज युधिष्ट्रर ने प्रसन्नतापूर्वक उस जल कोअपने सिर पर छिड़का और उसके बाद अपनी पत्नी, भाइयों, अन्य पारिवारिक जनों तथा मंत्रियोंके सिरों पर छिड़का।
वह जल सारे संसार को पवित्र करने वाला है।
जब उन्होंने पीले रेशमीबस्त्रों तथा बहुमूल्य रललजटित आशभूषणों की भेंटों से भगवान् को सम्मानित किया, तो राजा केअश्रुपूरित नेत्र भगवान् को सीधे देख पाने में बाधक बन रहे थे।
इत्थं सभाजितं वीक्ष्य सर्वे प्राज्ललयो जना: ।
नमो जयेति नेमुस्तं निपेतुः पुष्पवृष्ठय: ॥
२९॥
इत्थम्--इस प्रकार; सभाजितम्--सम्मानित हुआ; वीक्ष्य--देख कर; सर्वे--सभी; प्राज्ललय: --हाथ जोड़े; जना:--लोग;नमः--' आपको नमस्कार '; जय--' जय हो '; इति--इस प्रकार कहते हुए; नेमु:ः--शीश नवाया; तम्ू--उसको; निपेतु:--गिरने लगी; पुष्प--फूलों की; वृष्टय:--वर्षा |
कृष्ण को इस तरह सम्मानित होते देखकर वहाँ पर उपस्थित प्रायः सभी लोग सम्मान मेंअपने हाथ जोड़कर बोल उठे, 'आपको नमस्कार, आपकी जय हो।
' और तब उन्हें शीशनवाया।
ऊपर से फूलों की वर्षा होने लगी।
इत्थं निशम्य दमघोषसुतः स्वपीठा-दुत्थाय कृष्णगुणवर्णनजातमन्यु: ।
उत्क्षिप्प बाहुमिदमाह सदस्यमर्षीसंश्राववन्भगवते परुषाण्यभीत: ॥
३०॥
इत्थम्--इस प्रकार; निशम्य--सुन कर; दमघोष-सुत:--दमघोष का पुत्र ( शिशुपाल ); स्व--अपने; पीठात्--आसन से;उत्थाय--उठ कर; कृष्ण-गुण--भगवान् कृष्ण के गुणों का; वर्णन--वर्णन; जात--उत्पन्न; मन्यु:--क्रोध; उत्क्षिप्प--हिलातेहुए; बाहुमू--अपनी भुजाएँ; इदम्--यह; आह--कहा; सदसि--सभा के मध्य; अमर्षी--असहिष्णु; संश्रावयन्--सम्बोधितकरते हुए; भगवते-- भगवान् पर; परुषाणि-- कटु वचन; अभीत:--बिना किसी भय के
दमघोष का असहिष्णु पुत्र कृष्ण के दिव्यगुणों की प्रशंसा होते सुन कर क्रुद्ध हो उठा।
वहअपने आसन से उठ कर खड़ा हो गया और क्रोध से अपने हाथ हिलाते हुए निर्भय होकर सारीसभा के समक्ष भगवान् के विरुद्ध निम्नानुसार कटु शब्द कहने लगा।
ईशो दुरत्ययः काल इति सत्यवती श्रुति: ।
वृद्धानामपि यह्दुद्धिर्बालवाक्यैर्विभिद्यते ॥
३१॥
ईशः--ई श्वर; दुरत्ययः--जिससे बचा न जा सके; काल:--समय; इति--इस प्रकार; सत्य-वती--सच; श्रुतिः--वेद-वाक्य;वृद्धानामू-गुरुजनों की; अपि-- भी; यत्--चूँकि; बुद्धधिः:--बुद्धि; बाल--बालक के; वाक्यै:--शब्दों से; विभिद्यत--चकराजाती है।
शिशुपाल ने कहा : वेदों का यह कथन कि समय ही सबका अनिवार्य ईश्वर है निस्सन्देहसत्य सिद्ध हुआ है, क्योंकि बुद्धिमान गुरुजनों की बुद्धि निरे बालक के शब्दों से अब चकरागई है।
यूयं॑ पात्रविदां श्रेष्ठा मा मन्ध्वं बालभाषीतम् ।
सदसस्पतय: सर्वे कृष्णो यत्सम्मतोर्हणे ॥
३२॥
यूयम्ू--तुम सभी; पात्र--योग्यजनों के; विदाम्--जानने वालों के; श्रेष्ठा:--सर्वोत्तम; मा मन्ध्वम्--परवाह न करें; बाल--बालक के; भाषितम्--कथनों को; सदस:-पतय: --हे सभा के नायको; सर्वे--सभी; कृष्ण:--कृष्ण; यत्--क्योंकि;सम्मतः--चुना हुआ; अर्हणे--सम्मान किये जाने हेतु
हे सभा-नायको, आप लोग अच्छी तरह जानते हैं कि सम्मान किये जाने के लिए उपयुक्तपात्र कौन है।
अतः आप लोग इस बालक के वचनों की परवाह न करें कि वह यह दावा कररहा है कि कृष्ण पूजा के योग्य हैं।
तपोविद्याव्रतधरान्ज्ञानविध्वस्तकल्मषान् ।
परमऋषीन्ब्रह्मनिष्ठॉल्लोकपालैश्व पूजितान् ॥
३३॥
सदस्पतीनतिक्रम्य गोपाल: कुलपांसन: ।
यथा काकः पुरोडाशं सपर्या कथमहति ॥
३४॥
तपः--तपस्या; विद्या--वैदिक ज्ञान; ब्रत--कठिन व्रत; धरानू-- धारण करने वाले; ज्ञान--आध्यात्मिक ज्ञान से; विध्वस्त--उन्मूलित; कल्मषान्ू--जिनके विकार; परम--सर्वोच्च; ऋषीन्--ऋषियों को; ब्रहय--परम सत्य के प्रति; निष्ठान्ू--समर्पित;लोक-पालैः--लोकों के शासकों द्वारा; च--तथा; पूजितान्--पूजित; सदः-पतीन्--सभापतियों को; अतिक्रम्य--लाँघ कर;गोपाल:-ग्वाला; कुल-- अपने कुल का; पांसन:--कलंक; यथा--जिस तरह; काक: --कौवा; पुरोडाशम्--पवित्र खीर( देवताओं को अर्पित की गई ); सपर्याम्--पूजा के; कथम्--कैसे; अहति--योग्य हो सकता है।
आप लोग इस सभा के सर्वाधिक उन्नत सदस्यों को--ब्रह्म के प्रति समर्पित तपस्या कीशक्ति, दैवी अन्तर्दष्टि तथा कठोर ब्रत में लगे रहने वाले, ज्ञान से पवित्र हुए तथा ब्रह्माण्ड केशासकों द्वारा भी पूजित सर्वोच्च ऋषियों को--कैसे छोड़ सकते हैं? यह ग्वालबाल, जो किअपने कुल के लिए कलंक है, आप लोगों की पूजा के योग्य कैसे हो सकता है? क्या कौवापवित्र प्रसाद की खीर खाने का पात्र बन सकता है?
वर्णाश्रमकुलापेत: सर्वधर्मबहिष्कृत: ।
स्वैरवर्ती गुणैहीन: सपर्या कथमहति ॥
३५॥
वर्ण--जाति; आश्रम--चार आध्यात्मिक आश्रम; कुल--तथा परिवार से; अपेत:--विहीन; सर्व--सभी; धर्म--धार्मिककर्तव्य के नियम; बहिः-कृतः--बाहर किया गया; स्वैर--स्वतंत्र रूप से; वर्ती--आचरण करता हुआ; गुणै:--गुणों से;हीनः--रहित; सपर्याम्--पूजा; कथम्--कैसे; अर्हति--योग्य है।
जो वर्ण तथा आश्रम के या पारिवारिक शिष्टाचार के किसी भी सिद्धान्त का पालन नहींकरता, जो सारे धार्मिक कर्तव्यों से बहिष्कृत कर दिया गया है, जो मममाना आचरण करता हैतथा जिसमें कोई सदगुण नहीं है, भला ऐसा व्यक्ति किस तरह पूजा किये जाने योग्य हो सकताहै?
ययातिनैषां हि कुलं शप्तं सद्धिर्बहिष्कृतम् ।
वृथापानरतं शश्वत्सपर्या कथमईति ॥
३६॥
ययातिना--ययाति द्वारा; एघामू--उनका; हि--निस्सन्देह; कुलम्--कुल; शप्तम्--शापित; सद्धिः--शिष्ट लोगों द्वारा; बहिः-कृतम्--निकाला हुआ; वृथा--व्यर्थ; पान--सुरापान; रतमू--लत लगी हुई; शश्वत्--सदैव; सपर्याम्ू-पूजा के लिए;कथम्--कैसे; अर्हति--वह योग्य है।
ययाति ने इन यादवों के कुल को शाप दिया था, तभी से ये लोग ईमानदार व्यक्तियों द्वाराबहिष्कृत कर दिये गये और इन्हें सुगापान की लत पड़ गई।
तब भला कृष्ण पूजा के योग्य कैसेहै?
ब्रह्मर्षिसेवितान्देशान्हित्वैतेडब्रह्मवर्चसम् ।
समुद्र दुर्गमाश्रित्य बाधन्ते दस्यव: प्रजा: ॥
३७॥
ब्रह्म-ऋषि--महान् ब्राह्मण-ऋषियों द्वारा; सेवितान्--सेवित; देशान्ू--देशों को ( यथा मथुरा ); हित्वा--त्याग कर; एते--ये( यादवजन ); अब्रह्म-वर्चसम्--जहाँ ब्राह्मण नियमों का पालन नहीं किया जाता; समुद्रम्--समुद्र में; दुर्गम--किले में;आश्रित्य--शरण लेकर; बाधन्ते--बाधा पहुँचाते हैं; दस्यवः--चोर; प्रजा:--जनता को
इन यादवों ने ब्रह्मर्षियों द्वारा बसाई गई पवित्र भूमि को छोड़ दिया है और समुद्र में एककिले में जाकर शरण ली है, जहाँ ब्राह्मण-नियमों का पालन नहीं होता।
वहाँ ये चोरों की तरहअपनी प्रजा को तंग करते हैं।
एवमादीन्यभद्राणि बभाषे नष्टमड्रल: ।
नोवाच किश्ञिद्धगवान्यथा सिंह: शिवारुतम् ॥
३८ ॥
एवम्--इस प्रकार; आदीनि--और अधिक; अभद्राणि--कटु वचन; बभाषे --बोलता रहा; नष्ट--विनष्ट; मड्ल:ः--सौभाग्य; नउबाच--नहीं कहा; किश्ञित्ू--कुछ भी; भगवान्-- भगवान् ने; यथा--जिस तरह; सिंह: --सिंह; शिवा--सियार के; रुतम्--रोदन पर।
शुकदेव गोस्वामी कहते हैं : समस्त सौभाग्य से वंचित शिशुपाल ऐसे ही तथा अन्यअपमानसूचक शब्द बोलता रहा, किन्तु भगवान् ने कुछ भी नहीं कहा, जिस तरह सिंह सियारके रोदन की परवाह नहीं करता।
भगवत्निन्दनं श्रुत्वा दु:सहं तत्सभासदः ।
कर्णों पिधाय निर्जग्मु: शपन्तश्रेदिपं रुषा ॥
३९॥
भगवत्-- भगवान् की; निन्दनम्--निनन््दा, आलोचना; श्रुत्वा--सुन कर; दुःसहम्--असहा; तत्ू--वह; सभा-सदः--सभा केसदस्य; कर्णौं--अपने कानों को; पिधाय--मूँद कर; निर्जग्मु:--बाहर चले गये; शपन्त:ः--कोसते हुए; चेदि-पम्--चेदि केराजा ( शिशुपाल ) को; रुषा--क्रुद्ध होकर
भगवान् की ऐसी असह्य निनन्दा सुनकर सभा के कई सदस्यों ने अपने कान बंद लिये औरगुस्से में चेदि-नरेश को कोसते हुए बाहर चले गये।
निन््दां भगवतः श्रुण्वंस्तत्परस्थ जनस्य वा ।
ततो नापैति यः सोपि यात्यध: सुकृताच्च्युत: ॥
४०॥
निन्दाम्--निन्दा, आलोचना; भगवतः-- भगवान् की; श्रृण्वन्--सुनते हुए; तत्--उससे; परस्य-- श्रद्धावान; जनस्थ--पुरुषकी; वा--अथवा; ततः--वहाँ से; न अपैति--नहीं चला जाता; य:ः--जो; स:ः--वह; अपि--निस्सन्देह; याति--जाता है;अधः--नीचे; सु-कृतात्--अपने पुण्यकर्मों के उत्तम फलों से; च्युत:--गिरा हुआ।
जिस स्थान पर भगवान् या उनके श्रद्धावान् भक्त की निन््दा होती हो, यदि मनुष्य उस स्थानको तुरन्त छोड़ कर चला नहीं जाता, तो निश्चय ही वह अपने पुण्यकर्मों के फल से वंचित होकरनीचे आ गिरेगा।
ततः पाण्डुसुताः क्रुद्धा मत्स्यकैकयसूझ्जया: ।
उदायुधा: समुत्तस्थु: शिशुपालजिघांसव: ॥
४१॥
ततः--तब; पाण्डु-सुता:--पाण्डु के पुत्र; क्रुद्धा:--क्रुद्ध; मत्स्य-कैकय-सृझ्ञया:--मत्स्य, कैकय तथा सृज्भयगण; उत्ू-आयुधा:--अपने हथियार उठाये; समुत्तस्थु;--खड़े हो गये; शिशुपाल-जिघांसव: --शिशुपाल को मारने की इच्छा से |
तब पाण्डु-पुत्र क्रुद्ध हो उठे और मत्स्य, कैकय तथा सृझ्ञय वंशों के योद्धाओं के साथ वेअपने अपने स्थानों पर शिशुपाल को मारने के लिए तत्पर हथियार उठाते हुए खड़े हो गये।
ततश्रैद्यस्त्वसम्भ्रान्तो जगृहे खड्गचर्मणी ।
भर्सयन्कृष्णपश्षीयात्राज्न: सदसि भारत ॥
४२॥
ततः--तब; चैद्य:ः--शिशुपाल ने; तु--लेकिन; असम्भ्रान्त:--अडिग; जगूहे--ले लिया; खड्ग--तलवार; चर्मणी--तथाढाल; भर्त्सयन्--निन्दा करते हुए; कृष्ण--कृष्ण के; पक्षीयान्ू--पक्ष वाले; राज्ञ:--राजा; सदसि--सभा में; भारत--हेभरतवंशी |
हे भारत, तब शिशुपाल ने किसी की परवाह न करते हुए वहाँ पर जुटे सारे राजाओं के बीचअपनी तलवार तथा ढाल ले ली और वह भगवान् कृष्ण के पक्षघरों का अपमान करने लगा।
तावदुत्थाय भगवास्स्वान्निवार्य स्वयं रुषा ।
शिरः क्षुरान््तचक्रेण जहार पततो रिपो: ॥
४३॥
तावत्--उस समय; उत्थाय--उठ कर; भगवान्-- भगवान् ने; स्वान्ू--अपने ( भक्तों ) को; निवार्य--रोक कर; स्वयम्--खुद;रुषा--क्रोध से; शिर:--सिर; क्षुर--तेज; अन्त--धार वाले; चक्रेण --अपने चक्र से; जहार--काट लिया; पततः--आक्रमणकरते हुए; रिपोः--अपने शत्रु का।
उस समय भगवान् उठ खड़े हुए और उन्होंने अपने भक्तों को रोका।
फिर उन्होंने क्रुद्ध होकरअपने तेज धार वाले चक्र को चलाया और आक्रमण कर रहे अपने शत्रु का सिर काट दिया।
शब्द: कोलाहलोथासीच्छिशुपाले हते महान् ।
तस्यानुयायिनो भूपा दुद्गुवुर्जीवितिषिण: ॥
४४॥
शब्द: --ध्वनि; कोलाहल:--हो-हल्ला; अथ--तत्पश्चात्; आसीत्ू-- था; शिशुपाले--शिशुपाल के; हते--मारे जाने पर;महान्--विशाल; तस्यथ--उसके; अनुयायिन: --अनुगामी; भूपा:--राजागण; दुद्गुवु:-- भाग गये; जीवित--अपना जीवन;एपिण:--बचाने की आशा से
जब इस तरह शिशुपाल मार डाला गया तो भीड़ में से भारी शोर उठने लगा।
इस उपद्रव कालाभ उठाकर शिशुपाल के समर्थक कुछ राजा तुरन्त ही अपने प्राणों के भय से सभा छोड़करभाग गये।
चैद्यदेहोत्थितं ज्योतिर्वासुदेवमुपाविशत् ।
पश्यतां सर्वभूतानामुल्केव भुवि खाच्च्युता ॥
४५॥
चैद्य--शिशुपाल; देह--शरीर से; उत्थितम्--उठी हुईं; ज्योति: --ज्योति, प्रकाश; वासुदेवम्-- भगवान् श्रीकृष्ण में;उपाविशत्-प्रविष्ट हुई; पश्यताम्--देखते देखते; सर्व--सभी; भूतानाम्--जीवों के; उल्का--पुच्छतारा; इब--सहृश; भुवि--पृथ्वी में; खात्ू--आकाश से; च्युता--गिरा हुआ।
शिशुपाल के शरीर से एक तेजोमय प्रकाशपुञ्ज उठा और सबों के देखते देखते वहभगवान् कृष्ण में उसी तरह प्रविष्ट हो गया, जिस तरह आकाश से गिरता हुआ पुच्छल तारा पृथ्वीमें समा जाता है।
जन्मत्रयानुगुणितवैरसंरब्धया धिया ।
ध्यायंस्तन्मयतां यातो भावो हि भवकारणम् ॥
४६॥
जन्म--जन्मों; त्रय--तीन; अनुगुणित--तक चलने वाली; वैर--शत्रुता; संरब्धधा--अभिवृद्ध्धि होने से; धिया--मनोवृत्ति से;ध्यायन्--ध्यान करते हुए; तत् -मयताम्--उनसे तादात्म्य; यात:ः--प्राप्त किया; भाव: --मनोभाव; हि--निस्सन्देह; भव--पुनर्जन्म का; कारणम्--कारण |
तीन जन्मों से भगवान् कृष्ण के प्रति द्वेष में अभिवृद्धि से शिशुपाल को भगवान् कादिव्यरूप प्राप्त हुआ।
दरअसल मनुष्य की चेतना से उसका भावी जन्म निश्चित होता है।
ऋत्विग्भ्य: ससदस्ये भ्यो दक्षिनां विपुलामदात् ।
सर्वान्सम्पूज्य विधिवच्चक्रे वभूथमेकराट् ॥
४७॥
ऋत्विग्भ्य:--पुरोहितों को; स-सदस्येभ्य:--सभा के सदस्यों सहित; दक्षिणाम्--दक्षिणा; विपुलाम्--प्रचुर; अदात्--दिया;सर्वानू--सबों को; सम्पूज्य-- भलीभाँति पूज कर; विधि-वत्--शास्त्रीय आदेशों के अनुसार; चक्रे --सम्पन्न किया;अवभृथम्--यज्ञ के यजमान की
शुद्धि के लिए स्नान तथा यज्ञ पात्रों का प्रक्षालन ( यज्ञान्त-स्नान ); एक-राट्--सप्राटयुधिष्टिर।
सम्राट युथ्चिष्ठिर ने यज्ञ के पुरोहितों को तथा सभासदों को उदार भाव से उपहार दिये औरवेदों में संस्तुत विधि से उन सबका समुचित सम्मान किया।
तत्पश्चात् उन्होंने अवभ्रथ स्नानकिया।
साथधयित्वा क्रतुः राज्ञः कृष्णो योगेश्वरेश्वर: ।
उवास कतिचिन्मासान्सुहद्धिरभियाचित: ॥
४८॥
साधयित्वा--सम्पन्न करके; क्रतु:--सोम यज्ञ; राज्ञ:--राजा का; कृष्ण:--कृष्ण ने; योग-ईश्वर--योगशक्ति के स्वामियों के;ईश्वर: --परम स्वामी; उबास--निवास किया; कतिचित्--कुछ; मासान्--महीनों; सु-हद्धि: --उनके शुभचिन्तकों द्वारा;अभियाचित:ः--याचना किये गये।
इस प्रकार योग के समस्त ईश्वरों के स्वामी श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर की ओर से इस महान्यज्ञ का सफल समापन करवाया।
तत्पश्चात् अपने घनिष्ठ मित्रों के हार्दिक अनुरोध पर वे कुछमहीनों तक वहाँ रुके रहे।
ततोनुज्ञाप्य राजानमनिच्छन्तमपी श्वरः ।
ययौ सभार्य: सामात्य: स्वपुरं देवकीसुतः ॥
४९॥
ततः--तब; अनुज्ञाप्प--प्रस्थान के लिए अनुरोध करके; राजानम्--राजा के; अनिच्छन्तमू--न चाहते हुए; अपि--यद्यपि;ईश्वरः -- भगवान्; ययौ-- चले गये; स-भार्य:--अपनी पत्नियों सहित; स-अमात्य:--अपने मंत्रियों सहित; स्व--अपने; पुरम्--नगर; देवकी-सुत:ः--देवकी -पुत्र तब देवकी-पुत्र
भगवान् ने, न चाहते हुए भी, राजा से अनुमति ली और वे अपनी पत्नियोंतथा मंत्रियों सहित अपनी राजधानी लौट आये।
वर्णितं तदुपाख्यानं मया ते बहुविस्तरम् ।
बैकुण्ठवासिनोर्जन्म विप्रशापात्पुन: पुन: ॥
५०॥
वर्णितम्--बतलाये; तत्--उस; उपाख्यानम्--विवरण को; मया--मेरे द्वारा; ते--तुम्हें; बहु-- अधिक; विस्तरम्ू--विस्तार से;बैकुण्ठ-वासिनो:--ई श्वर के नित्य धाम के दो निवासियों ( जय तथा विजय नामक द्वारपालों ) के; जन्म--जन्म; विप्र--ब्राह्मणों( चारों कुमारों ) के; शापात्-- श्राप से; पुनः पुन:--फिर फिर।
मैं पहले ही तुमसे वैकुण्ठ के उन दो वासियों का विस्तार से वर्णन कर चुका हूँ, जिन्हेंब्राह्मणों द्वारा शापित होने से भौतिक जगत में बारम्बार जन्म लेना पड़ा।
राजसूयावभृशथ्येन स्नातो राजा युधिष्ठिर: ।
ब्रह्मक्षत्रसभामध्ये शुशुभे सुरराडिव ॥
५१॥
राजसूय--राजसूय यज्ञ के; अवभृथ्येन--अन्तिम अवभृध्य अनुष्ठान द्वारा; स्नात:ः--नहाया; राजा युधिष्ठिर:--राजा युधिष्टिर;ब्रह्म-क्षत्र--ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों की; सभा--सभा के; मध्ये--मध्य में; शुशुभे--तेजोमय लगा; सुर--देवताओं का; राट्--राजा ( इन्द्र ); इब--सहृश |
अन्तिम अवश्वथ्य अनुष्ठान में, जो कि राजसूय यज्ञ के सफल समापन का सूचक था, पवित्रहोकर राजा युथिष्ठिर एकत्र ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों के बीच इस तरह चमक रहे थे, मानो साक्षात्देवराज इन्द्र हों।
राज्ञा सभाजिता: सर्वे सुरमानवखेचरा: ।
कृष्णं क्रतुं च शंसन्तः स्वधामानि ययुर्मुदा ॥
५२॥
राज्ञा-राजा द्वारा; सभाजिता: --सम्मानित; सर्वे--सभी; सुर--देवता; मानव--मनुष्य; खे-चरा: --तथा आकाश में विचरणकरने वाले ( उपदेवता तथा असुर ); कृष्णम्--कृष्ण को; क्रतुम्--यज्ञ को; च--तथा; शंसन्त:-- प्रशंसा करते हुए; स्व--अपने अपने; धामानि--धामों को; ययु:--चले गये; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक ।
राजा द्वारा समुचित सम्मान दिये जाकर देवता, मनुष्य तथा मध्यलोक के निवासीप्रसन्नतापूर्वक कृष्ण तथा महान् यज्ञ की प्रशंसा करते हुए अपने अपने लोकों के लिए रवाना हो गये।
दुर्योधनमृते पापं कलिं कुरुकुलामयम् ।
यो न सेहे श्रीयं स्फीतां इृष्ठा पाण्डुसुतस्य ताम् ॥
५३॥
दुर्वोधनम्-दुर्योधन को; ऋते--छोड़ कर; पापम्--पापी; कलिम्--कलियुग का शक्त्याविष्ट अंश; कुरू-कुल--कुरुवंश का;आमयम्ू--रोग; य:--जो; न सेहे-- नहीं सहन कर सका; श्रीयम्--ऐश्वर्य को; स्फीताम्--पुष्पित-पललवित होते; दृष्टा--देखकर; पाण्डु-सुतस्य--पाण्डु-पुत्र का; तामू--उस।
पापी दुर्योधन को छोड़ कर ( सारे लोग संतुष्ट थे ), क्योंकि वह तो साक्षात् कलिकाल थाऔर कुरुवंश का रोग था।
वह पाण्डु-पुत्र के वृद्धिमान ऐश्वर्य का देखना सहन नहीं कर सका।
य इदं कीर्तयेद्विष्णो: कर्म चेद्यवधादिकम् ।
राजमोक्षं वितानं च सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥
५४॥
यः--जो; इृदम्--ये; कीर्तयेत्-- कीर्तन करता है; विष्णो:-- भगवान् विष्णु के; कर्म--कार्यकलाप; चैद्य-वध--शिशुपाल कावध; आदिकम्---इत्यादि; राज--राजाओं का ( जो जरासन्ध द्वारा बन्दी बनाये गये थे ); मोक्षम्--मोक्ष; वितानमू--यज्ञ; च--तथा; सर्व--सभी; पापैः--पाप के फलों से; प्रमुच्यते--मुक्त कर दिया जाता है।
जो व्यक्ति भगवान् विष्णु के इन कार्यकलापों को, जिनमें शिशुपाल वध, राजाओं का मुक्तकिया जाना तथा राजसूय यज्ञ का निष्पादन सम्मिलित हैं, सुनाता है, वह समस्त पापों से छूटजाता है।
