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अध्याय पचहत्तर: दुर्योधन अपमानित

10.75श्रीराजोबाचअजाततशत्रोस्तम्हष्टा राजसूयमहोदयम्‌ ।

सर्वे मुमुदिरे ब्रह्म्रंदेवा ये समागता: ॥

१॥

दुर्योधन वर्जयित्वा राजानः सर्षय: सुरा: ।

इति श्रुतं नो भगवंस्तत्र कारणमुच्यताम्‌ ॥

२॥

श्री-राजा उवाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; अजात-शत्रो:--युधिष्ठिर का, जिसके शत्रु जन्मे ही नहीं; तम्‌--उसको; दृष्ठा--देख कर; राजसूय--राजसूय यज्ञ का; महा--महान्‌; उदयम्‌--उत्सव; सर्वे--सभी; मुमुदिरि--प्रसन्न थे; ब्रहननू--हे ब्राह्मण( शुकदेव ); नू-देवा:--राजागण; ये--जो; समागता: --एकत्र हुए; दुर्योधनम्‌--दुर्योधन को; वर्जयित्वा--छोड़ कर, केअतिरिक्त; राजान:--राजा; स--सहित; ऋषय:--ऋषिगण; सुरा:--तथा देवतागण; इति--इस प्रकार; श्रुतम्‌--सुना हुआ;नः--हमारे द्वारा; भगवन्‌--हे प्रभु; तत्र--उस; कारणम्‌--कारण को; उच्यताम्‌--कृपया कहें या बतलायें |

महाराज परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, मैंने आपसे जो कुछ सुना उसके अनुसार, एकमात्रदुर्योधन के अतिरिक्त, वहाँ एकत्रित समस्त राजा, ऋषि तथा देवतागण अजातशत्रु राजा केराजसूय यज्ञ के अद्भुत उत्सव को देख कर परम हर्षित थे।

हे प्रभु, कृपा करके मुझसे कहें किऐसा क्‍यों हुआ ?

श्रीबादरायणिरुवाचपितामहस्य ते यज्ञे राजसूये महात्मन: ।

बान्धवा: परिचर्यायां तस्यासन्प्रेमबन्धना: ॥

३॥

श्री-बाडरायनि: उवाच-- श्री बादरायणि ( शुकदेव गोस्वामी ) ने कहा; पितामहस्य--दादा के; ते--तुम्हारे; यज्ञे--यज्ञ में;राजसूये--राजसूय; महा-आत्मन:--महात्मा के ; बान्धवा:--पारिवारिक जन; परिचर्यायाम्‌--विनीत सेवा में; तस्य--उसकी;आसनू--स्थित थे; प्रेम--प्रेम से; बन्धना:--बँधे हुए

श्री बादरायणि ने कहा : तुम्हारे सन्‍त सहृश दादा के राजसूय यज्ञ में उनके प्रेम से बँधे हुएउनके पारिवारिक सदस्य उनकी ओर से विनीत सेवा-कार्य में संलग्न थे।

भीमो महानसाध्यक्षो धनाध्यक्ष: सुयोधन: ।

सहदेवस्तु पूजायां नकुलो द्रव्यसाधने ॥

४॥

गुरुशुश्रूषणे जिष्णु: कृष्ण: पादावनेजने ।

परिवेषणे द्रुपदजा कर्णो दाने महामना: ॥

५॥

युयुधानो विकर्णश्च हार्दिक्यो विदुरादयः ।

बाह्नीकपुत्रा भूर्याद्या ये च सन्तर्दनादयः ॥

६॥

निरूपिता महायज्ञे नानाकर्मसु ते तदा ।

प्रवर्तन्ते सम राजेन्द्र राज्ञ: प्रियचिकीर्षव: ॥

७॥

भीम:ः--भीम; महानस--रसोई का; अध्यक्ष:--निरीक्षक; धन--कोश का; अध्यक्ष:--निरीक्षक; सुयोधन:--सुयोधन( दुर्योधन ); सहदेव: --सहदेव; तु--और; पूजायाम्‌--( अतिथियों के आने पर ) पूजा करने में; नकुल:--नकुल; द्रव्य--आवश्यक सामग्री; साधने--प्राप्त करने में; गुरु--सम्माननीय गुरुजनों के; शुश्रूषणे --सेवा करने में; जिष्णु:--अर्जुन;कृष्ण:--कृष्ण; पाद--पाँव; अवनेजने-- धोने में; परिवेषणे--( भोजन ) परोसने में; द्रपद-जा--द्रुपद की पुत्री ( द्रौपदी );कर्ण:--कर्ण ; दाने--दान देने में; महामना: --उदार; युयुधान: विकर्ण: च--युयुधान तथा विकर्ण; हार्दिक्य: विदुर-आदय: --हार्दिक्य ( कृतवर्मा ), विदुर तथा अन्य; बाह्नीक-पुत्रा:--बाह्लीक राजा के पुत्र; भूनू-आद्या:-- भूरिश्रवा इत्यादि; ये--जो; च--तथा; सन्तर्दन-आदय:--सन्तर्दन तथा अन्य; निरूपिता:--संलग्न; महा--विस्तीर्ण; यज्ञे--यज्ञ में; नाना--विविध; कर्मसु--कामों में; ते--वे; तदा--उस समय; प्रवर्तन्ते स्म--पूरा किया; राज-इन्द्र--हे राजश्रेष्ठ ( परीक्षित ); राज्ञ:--राजा ( युथिष्ठिर )के; प्रिय--प्रिय; चिकीर्षव:--करने की इच्छा से |

भीम रसोई की देख-रेख कर रहे थे, दुर्योधन कोष की देखभाल कर रहा था और सहदेवअतिथियों के सादर स्वागत में लगे थे।

नकुल सारी सामग्री जुटा रहे थे, अर्जुन गुरुजनों की सेवामें रत थे जबकि कृष्ण हर एक के पाँव पखार रहे थे।

द्रौपदी भोजन परोस रही थीं और दानीकर्ण उपहार दे रहे थे।

अन्य अनेक लोग यथा युयुधान, विकर्ण, हार्दिक्य, विदुर, भूरिश्रवा तथाबाह्लीक के अन्य पुत्र एवं सन्तर्दन भी उस विशाल यज्ञ में विविध कार्यों में स्वेच्छा से लगे हुए थे।

हे राजश्रेष्ठ, उन्होंने महाराज युधिष्टिर को प्रसन्न करने की अपनी उत्सुकता से ही ऐसा किया।

ऋत्विक्सदस्यबहुवित्सु सुहृत्तमेषुस्विष्टेषु सूनूतसमरहणदक्षिणाभि: ।

चैद्ये च सात्वतपतेश्चरणं प्रविष्टेअक्रुस्ततस्त्ववभूथस्नपनं झुनद्याम्‌ ॥

८॥

ऋत्विक्‌-- पुरोहित; सदस्य--यज्ञ में सहायता करने वाले सदस्य; बहु-वित्सु--अत्यंत विद्वान; सुहृत्‌-तमेषु --तथा सर्वश्रेष्ठहितैषीजन; सु-- भलीभाँति; इष्टेषु--सम्मानित; सूनूत--मधुर शब्दों से; समहण--शुभ भेंटें; दक्षिणाभि:--तथा दक्षिणा से;चैद्ये--चेदि के राजा ( शिशुपाल ); च--तथा; सात्वत-पतेः--सात्वतों के स्वामी ( कृष्ण ); चरणम्‌--पाँवों में; प्रविष्टे--प्रविष्टहोकर; चक्करु:--पूरा किया; ततः--तब; तु--तथा; अवभूथ-स्नपनम्‌ू--अवशभृथ स्नान, जिससे यज्ञ पूर्ण हुआ; द्यु--स्वर्ग की;नद्यामू--नदी में ( यमुना में )॥

जब सारे पुरोहित, प्रमुख प्रतिनिधि, विद्वान सन्त तथा राजा के घनिष्ठ हितैषी मधुर शब्दों, शुभ उपहारों तथा विविध भेंटों रूपी दक्षिणा से भलीभाँति सम्मानित किये जा चुके और जबचेदिराज सात्वतों के प्रभु के चरणकमलों में प्रविष्ट हो चुका, तो दैवी नदी यमुना में अवभृथस्नान सम्पन्न किया गया।

मृदड्रशट्डभुपणवशधुन्धुर्यानकगोमुखा: ।

वादित्राणि विचित्राणि नेदुरावभूथोत्सवे ॥

९॥

मृदड़--मृदंग; शब्बु--शंख; पणव--छोटे ढोल; धुन्धुरि--बृहद्‌ सैनिक ढोल; आनक--नगाड़ा; गो-मुखा:--एक वाद्य;वादित्राणि--संगीत; विचित्राणि--विविध; नेदु:--बज उठे; आवभूथ--अवभूथ स्नान के; उत्सवे--उत्सव में |

अवश्वथ स्नानोत्सव के समय अनेक प्रकार के बाजे बजने लगे, जिनमें मृदंग, शंख, पणव,धुन्धुरि, आनक तथा गोमुख थे।

नार्तक्यो ननृतुईष्ठटा गायका यूथशो जगु: ।

वीणावेणुतलोन्नादस्तेषां स दिवमस्पृशत्‌ ॥

१०॥

नार्तक्य:--नर्तकियाँ; ननृतुः--नाचीं; हष्टा:--प्रसन्नचित्त; गायका:--गाने वालों ने; यूथश: --टोलियों में; जगुः--गाया;वीणा--वीणा; वेणु--वंशी; तल--तथा मंजीरे की; उन्नाद: --तेज आवाज; तेषाम्‌--उनकी; सः--वह; दिवम्‌--स्वर्ग को;अस्पृशत्‌--छूने लगी।

नर्तकियों ने अत्याधिक मुदित होकर नृत्य किया, गायकों ने सामूहिक रूप में गाया औरवीणा, वंशी तथा मंजीरे की तेज आवाज बहुत दूर स्वर्गलोक तक पहुँच गई।

चित्रध्वजपताकाग्रैरिभेन्द्रस्यन्दनार्वभि: ।

स्वलड्ड तैरभटै्भूपा निर्ययू रुकक्‍्ममालिन: ॥

११॥

चित्र--रंगबिरंगी; ध्वज--झंडियाँ; पताक--तथा झंडे; अग्रै:--उत्तम; इभ--हाथियों से; इन्द्र--राजसी; स्यन्दन--रथ;अर्वभि:--तथा घोड़ों से; सु-अलड्डू तै:--खूब सजे; भटैः--पैदल सिपाहियों सहित; भू-पा:--राजागण; निर्ययु:--चल पड़े;रुक्‍्म--सोने के; मालिन:--हार पहने

तब सोने के हार पहने हुए सारे राजा यमुना नदी की ओर चल पड़े।

उनके साथ रंग-बिरंगेझंडे तथा पताकाएँ थीं और उनके साथ साथ पैदल सेना एवं शाही हाथियों, रथों तथा घोड़ों परसवार सुसज्जित सिपाही थे।

यदुसृज्यकाम्बोजकुरुककयकोशला: ।

कम्पयन्तो भुव॑ सैन्यैर्ययमानपुरःसरा: ॥

१२॥

यदु-सृज्ञय-काम्बोज--यदुगण, सृझ़्यगण तथा काम्बोजगण; कुरु-केकय-कोशला:--कुरुवासी, केकयवासी तथा'कोशलवासी; कम्पयन्त:--हिलाते हुए; भुवम्‌--पृथ्वी को; सैन्यैः--अपनी सेनाओं से; यजमान--यज्ञ करने वाला ( महाराजयुधिष्टिर ); पुरः-सरा:--आगे आगे करके ।

जुलूस में यजमान युथ्चिष्ठिर महाराज के पीछे पीछे चल रहीं यदुओं, सूंजयों, काम्बोजों,कुरुओं, केकयों तथा कोशलवासियों की समुझ्नित सेनाओं ने धरती को हिला दिया।

सदस्यर्तिग्द्विजश्रेष्ठा ब्रह्मघोषेण भूयसा ।

देवर्षिपितृगन्धर्बास्तुष्ठ॒वुः पुष्पर्षिण: ॥

१३॥

सदस्य--सदस्य; ऋत्विक्‌-- पुरोहित; द्विज--तथा ब्राह्मण; श्रेष्ठा: -- श्रेष्ठ; ब्रह्म--वेदों के; घोषेण--धध्वनि से; भूयसा--प्रचुर;देव--देवता; ऋषि--ऋषिगण; पितृ--पुरखे; गन्धर्वा:--तथा स्वर्ग के गवैयों ने; तुष्ठवु:ः--यशोगान किया; पुष्प--फूलों की;वर्षिण:--वर्षा करते हुए।

सभासदों, पुरोहितों तथा अन्य उत्तम ब्राह्मणों ने जोर-जोर से बैदिक मंत्रों का उच्चारणकिया, जबकि देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा गन्धर्वों ने यशोगान किया और फूलों की वर्षाकी।

स्वलण्कृता नरा नार्यों गन्धस््रग्भूषणाम्बरै: ।

विलिम्पन्त्योउभिसिशञ्जन्त्यो विजह्॒र्विविधे रसै: ॥

१४॥

सु-अलहड्डू ताः--अच्छी तरह सजे-धजे; नरा:--पुरुष; नार्य:--तथा स्त्रियाँ; गन्ध--चन्दन-लेप; स्रकू--फूल की मालाओं;भूषण--आभूषणों; अम्बरैः--तथा वस्त्रों से; विलिम्पन्त्य:--चुपड़ कर; अभिषिज्ञन्त्य:--तथा छिड़क कर; विजह्ुः--खेलनेलगे; विविधे:--विविध; रसै:--तरल पदार्थों से |

चन्दन-लेप, पुष्प-मालाओं, आभूषण तथा उत्तम वस्त्र से सज्जित सारे पुरुषों तथा स्त्रियों नेविविध द्रवों को एक-दूसरे पर मल कर तथा छिड़क कर खूब खिलवाड़ किया।

तैलगोरसगन्धोदहरिद्रासान्द्रकुद्डु मै: ।

पुम्भिलिप्ता: प्रलिम्पन्त्यो विजह्र्वारयोषित: ॥

१५॥

तैल--वानस्पतिक तेल; गो-रस--दही; गन्ध-उद--सुगन्धित जल; हरिद्रा--हल्‍्दी; सान्द्र- प्रचुर; कुट्डु मैः--तथा सिंदूर से;पुम्भिः--पुरुषों द्वारा; लिप्ता:--लपेटे हुए; प्रलिम्पन्त्य:;--उलट कर पोतते हुए; विजहु: --खिलवाड़ किया; वार-योषित:--बारांगनाओं ने

पुरुषों ने वारांगनाओं के शरीरों को बहुत सारा तेल, दही, सुगन्धित जल, हल्दी तथा कुंकुमचूर्ण से पोत दिया और पलटकर उन स्त्रियों ने पुरुषों के शरीरों में वैसी ही वस्तुएँ दे पोतीं।

गुप्ता नृभिर्निरगमन्नुपलब्धुमेतद्‌देव्यो यथा दिवि विमानवरर्न॑देव्यो ।

ता मातुलेयसखिभि: परिषिच्यमाना:सब्रीडहासविकसद्ददना विरेजु: ॥

१६॥

गुप्ता:--सुरक्षित; नृभिः--सैनिकों द्वारा; निरगमन्‌--बाहर गये; उपलब्धुम्‌--स्वयं देखने के लिए; एतत्‌--यह; देव्य:--देवताओं की स्त्रियाँ; यथा--जिस तरह; दिवि--आकाश में; विमान-- अपने अपने विमानों में; वर: -- श्रेष्ठ; नृ-देव्य:--रानियाँ( युधिष्ठिर की ); ताः--वे; मातुलेय--अपने ममेरे भाइयों ( कृष्ण तथा उनके भाई यथा गद तथा सारण ) द्वारा; सखिभि:--अपने मित्रों (यथा भीम तथा अर्जुन ) द्वारा; परिषिच्यमाना:--छिड़के जाकर; स-ब्रीड--लज्जित; हास--हँसी से युक्त;विकसत्‌ू-प्रफुल्लित; बदना: --मुख वाली; विरेजु:--भव्य लग रहे थे

इस तमाशे को देखने के लिए अपने अपने रथों में सवार होकर तथा अंगरक्षकों से घिर करराजा युधिष्ठिर की रानियाँ बाहर आ गईं, मानों आकाश में दैवी विमानों में देवताओं की पत्नियाँप्रकट हुई हों।

जब ममेरे भाइयों तथा उनके घनिष्ठ मित्रों ने रानियों पर द्रव पदार्थ छिड़के, तोउनके मुख लजीली मुसकान से खिल उठे, जिससे उनके भव्य सौन्दर्य में वृद्धि हो गई।

ता देवरानुत सखीन्सिषिचुर्ट तीभिःक्ललन्नाम्बरा विवृतगात्रकुचोरुमध्या: ।

औत्सुक्यमुक्तकवराच्च्यवमानमाल्या:क्षोभं दधुर्मलधियां रुचिरैविहारै: ॥

१७॥

ताः--वे रानियाँ; देवरान्‌ू--अपने पति के भाइयों को; उत--तथा भी; सखीन्‌ू--उनके मित्रों को; सिषिचु:--भिगो दिया;हतीभि:--पिचकारियों से; क्लिन्न-- भीगे, सराबोर; अम्बरा:--वस्त्र; विवृत--दृश्य; गात्र--जिनकी भुजाएँ; कुच--स्तन;ऊरु--जाँचें; मध्या:--तथा कमर; औत्सुक्य--उत्सुकता के कारण; मुक्त--शिधिल; कवरात्‌--बालों की चोटी से;च्यवमान--फिसलते हुए; माल्या:--फूल की छोटी मालाएँ; क्षोभम्‌--हिलना-डुलना; दधुः--उत्पन्न किया; मल--गंदी;धियाम्‌--चेतना वालों के लिए; रुचिरैः--आकर्षक; विहारैः--अपने खेलवाड़ से |

जब रानियों ने अपने देवरों तथा अन्य पुरुष संगियों पर पिचकारियों से पानी दे मारा, तोउनके वस्त्र भीग गये, जिससे उनकी बाँहें, स्तन, जाँघें तथा कमर झलकने लगे।

उल्लास में उनकेजूड़े ढीले होने से उनमें बँधे फूल गिर गये।

इन मनोहारी लीलाओं से उन्होंने उन लोगों कोउत्तेजित कर दिया, जिनकी चेतना दूषित थी।

स सप्राड्थमारुढ: सदश्च॑ रुक्ममालिनम्‌ ।

व्यरोचत स्वपतलीभि: क्रियाभि: क्रतुराडिव ॥

१८॥

सः--वह; सप्राट्‌ू--राजा युधिष्ठटिर; रथम्‌--अपने रथ पर; आरुढ:--चढ़ा हुआ; सत्‌--उत्तम; अश्वम्‌--घोड़े वाला; रुक्म--सुनहले; मालिनमू--लटकनों से; व्ययोचत--चमक रहा था; स्व-पत्नीभि: --अपनी पत्नियों के साथ; क्रियाभि: --अपने कृत्योंसे; क्रतु--यज्ञ का; राट्‌ू--राजा ( राजसूय ); इब--मानो

गले की सुनहरी झालरों से युक्त उत्तम घोड़ों से खींचे जाने वाले अपने रथ पर आरूढ़ सप्राटअपनी पत्नियों के संग इतने भव्य लग रहे थे, मानों तेजस्वी राजसूय यज्ञ अपने विविध कृत्यों सेघिरा हुआ हो।

'पतीसम्याजावभूृथ्यै श्वरित्वा ते तमृत्विज: ।

आचार्तं स्नापयां चक्रुर्गड्रायां सह कृष्णया ॥

१९॥

पली-संयाज--यज्ञकर्ता तथा उसकी पतली द्वारा सम्पन्न अनुष्ठान, जिसमें सोम, त्वष्टा, कुछ देवियों तथा अग्नि का तर्पणसम्मिलित हैं; अवभृथ्यै:--यज्ञ-पूर्ति के लिए किये गये अनुष्ठान; चरित्वा--सम्पन्न करके; ते--वे; तम्‌--उसको; ऋत्विज: --पुरोहितगण; आचान्तम्‌-शुद्धि के लिए जल सुड़क कर आचमन करके; स्नापयाम्‌ चक्रु:--उन्हें नहलाया; गड्जायाम्‌--गंगानदी में; सह--साथ साथ; कृष्णया--द्रौपदी के |

पुरोहितों ने राजा से पत्ती-संयाज तथा अवश्ृथ्य के अन्तिम अनुष्ठान पूर्ण कराये।

तब उन्होंनेराजा तथा रानी द्रौपदी से शुद्धि के लिए जल आचमन करने एवं गंगा नदी में स्नान करने केलिए कहा।

देवदुन्दुभयो नेदुर्नरदुन्दुभिभि: समम्‌ ।

मुमुचु: पुष्पवर्षाणि देवर्षिपितृमानवा: ॥

२०॥

देव--देवताओं की; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ, नगाड़े; नेदु:--बज उठीं; नर--मनुष्यों की; दुन्दुभिभि:--दुन्दुभियों से; समम्‌--साथ साथ; मुमुचु:--बरसाया; पुष्प--फूलों की; वर्षाणि--वर्षा; देव--देवतागण; ऋषि--ऋषिगण; पितृ--पितरगण;मानवा:--तथा मनुष्यों ने |

देवताओं की दुन्दुभियाँ मनुष्यों की दुन्दुभियों के साथ साथ बज उठीं।

देवताओं, ऋषियों,पितरों तथा मनुष्यों ने फूलों की वर्षा की।

सस्नुस्तत्र ततः सर्वे वर्णा भ्रमयुता नरा: ।

महापातक्यपि यतः सद्यो मुच्येत किल्बिषात्‌ ॥

२१॥

ससस्‍्नुः--स्नान किया; तत्र--वहाँ; तत:--इसके बाद; सर्वे--सभी; वर्ण-आश्रम--सारे वृत्तिपरक सामाजिक तंत्र तथाआध्यात्मिक आश्रम; युता: --के; नरा: --मनुष्य; महा--अत्यन्त; पातकी--पापी; अपि-- भी; यत:--जिससे; सद्यः --तुरन्त;मुच्येत--मुक्त किया जा सके; किल्बिषात्‌--कल्मष से |

तत्पश्चात्‌ विभिन्न वर्णों तथा आश्रमों से सम्बद्ध नागरिकों ने उस स्थान पर स्नान किया, जहाँपर स्नान करने से बड़ा से बड़ा पापी भी पापों के फल से तुरन्त मुक्त हो जाता है।

अथ राजाहते क्षौमे परिधाय स्वलड्डू तः ।

ऋत्विक्सदस्यविप्रादीनानर्चाभरणाम्बरै: ॥

२२॥

अथ--त्पश्चात्‌; राजा--राजा; अहते--कोरा, बिना पहना; क्षौमे--रेशमी वस्त्र का जोड़ा; परिधाय--पहन कर; सु-अलछ्डू त:--सुन्दर ढंग से सज्जित; ऋत्विक्‌ू--पुरोहितगण; सदस्य--सभा के कार्यकारी सदस्य; विप्र--ब्राह्मण; आदीनू--इत्यादि; आनर्च--पूजा की; आभरण--गहनों से; अम्बरैः--तथा वत्त्नों से |

इसके बाद राजा ने नये रेशमी वस्त्र धारण किये और अपने को सुन्दर आभूषणों से अलंकृतकिया।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने पुरोहितों, सभा के सदस्यों, विद्वान ब्राह्मणों तथा अन्य अतिथियों कोआभूषण तथा वस्त्र भेंट करके उनका सम्मान किया।

बन्धूज्ज्ञातीच्पान्मित्रसुहृदो उन्‍्यां श्र सर्वशः ।

अभीक्ष्न॑ पूजयामास नारायणपरो नृपः ॥

२३॥

बन्धूनू--दूर के सम्बन्धियों; ज्ञातीनू--परिवार के निकटजनों; नृपान्‌ू--राजाओं ; मित्र--मित्रों; सुहद:ः--तथा शुभचिन्तकों को;अन्यान्‌--अन्यों को; च-- भी; सर्वश:--सभी प्रकार से; अभीक्ष्णम्‌--निरन्तर; पूजयाम्‌ आस--पूजा की; नारायण-पर: --नारायण-भक्त; नृप:ः--राजा ने

भगवान्‌ नारायण के प्रति पूर्णतया समर्पित राजा युधिष्ठिर ने अपने सम्बन्धियों, परिवारवालों, अन्य राजाओं, अपने मित्रों, अपने शुभचिन्तकों तथा वहाँ पर उपस्थित सारे लोगों कानिरन्तर सम्मान करते रहे।

सर्वे जना: सुररुचो मणिकुण्डलस्त्र-गुष्णीषकञ्जुकदुकूलमहार्ध्यहारा: ।

नार्यश्व॒ कुण्डलयुगालकवृन्दजुष्ट -वक्त्रश्रय: कनकमेखलया विरेजु: ॥

२४॥

सर्वे--सभी; जना: --पुरुष; सुर--देवताओं की तरह; रुचः--तेजस्वी रंग वाले; मणि--मणि; कुण्डल--कान के कुण्डलों से;सत्रकु--फूल-मालाओं ; उष्णीष--पगड़ी; कञ्जुक--ऊपरी वस्त्र, उत्तरीय; दुकूल--रेशमी वस्त्र; महा-अर्घ्य--अत्यन्त कीमती;हारा:--तथा मोती की मालाएँ; नार्य:--स्त्रियाँ; च--तथा; कुण्डल--कुण्डलों की; युग--जोड़ी; अलक-वृन्द--केशराशि( जूड़ा ); जुष्ट--सुसज्जित; वक्त्र--मुखड़ों की; भ्रिय:ः --सुन्दरता; कनक--सोने की; मेखलया--करधनी से; विरेजु:--चमचमा रही थीं।

वहाँ पर उपस्थित सारे पुरुष देवताओं जैसे चमक रहे थे।

वे रलतजटित कुण्डलों, फूल कीमालाओं, पगड़ियों, अंगरखों, रेशमी धोतियों तथा कीमती मोतियों की मालाओं से सज्जित थे।

स्त्रियों के सुन्दर मुखड़े उनसे मेल खा रहे कुण्डलों तथा केश-गुच्छों से सुशोभित हो रहे थे औरवे सुनहरी करधनियाँ पहने थीं।

अथर्तिवजो महाशीला: सदस्या ब्रह्मवादिन: ।

ब्रह्मक्षत्रियविट्शुद्राराजानो ये समागता: ॥

२५॥

देवर्षिपितृभूतानि लोकपाला: सहानुगा: ।

पूजितास्तमनुज्ञाप्य स्वधामानि ययुर्नुप ॥

२६॥

अथ--तब; ऋत्विज: --पुरोहितगण; महा-शीला: --उच्च चरित्र वाले; सदस्या:--यज्ञ के अधिकारीगण; ब्रह्म--वेदों के;वादिन:--विशेषज्ञ; ब्रह्म--ब्राह्मण; क्षत्रिय--क्षत्रिय; विट्‌ू--वैश्य; शुद्राः--तथा शूद्रगण; आजान:--राजा; ये--जो;समागता:--आये हुए; देव--देवता; ऋषि--ऋषिगण; पितृ--पितरगण; भूतानि--तथा भूत-प्रेत; लोक--लोकों के;पाला:--शासक; सह--सहित; अनुगा: -- अनुयायी; पूजिता: --पूजित; तम्‌--उससे; अनुज्ञाप्प-- अनुमति लेकर; स्व-- अपने;धामानि--घरों को; ययु:--चले गये; नूप--हे राजा ( परीक्षित ) |

तत्पश्चात्‌, हे राजन, अत्यन्त सुसंस्कृत पुरोहितजन, महान्‌ वैदिक विशेषज्ञ, जो यज्ञ-साक्षियोंके रूप में सेवा कर चुके थे, विशेष रूप से आमंत्रित राजागण, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र,देवता, ऋषि, पितर, भूत-प्रेत एवं मुख्य लोकपाल तथा उनके अनुयायीगण--ये सारे लोग राजायुथिष्ठिर से पूजे जाने के बाद उनकी अनुमति लेकर अपने अपने घरों के लिए प्रस्थान कर गये।

हरिदासस्य राजर्षे राजसूयमहोदयम्‌ ।

नेवातृप्यन्प्रशंसन्तः पिबन्मर्त्योमृतं यथा ॥

२७॥

हरि--भगवान्‌ कृष्ण के; दासस्य--सेवक के; राज-ऋषे: --राजर्षि के; राजसूय--राजसूय यज्ञ के; महा-उदयम्‌--महान्‌उत्सव; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; अतृप्यन्‌ू--सन्तुष्ट हो गये; प्रशंसन्तः--प्रशंसा करते हुए; पिबन्‌--पीते हुए; मर्त्य:--मरणशील मनुष्य; अमृतम्‌--अमृत; यथा--जिस तरह

वे उस राजर्षि तथा हरि-सेवक द्वारा सम्पन्न अद्भुत राजसूय यज्ञ की प्रशंसा करते अघा नहींरहे थे, जिस तरह सामान्य व्यक्ति अमृत पीते नहीं अघाता।

ततो युधिष्ठिरो राजा सुहत्सम्बन्धिबान्धवान्‌ ।

प्रेमणा निवारयामास कृष्णं च त्यागकातर: ॥

२८॥

ततः--तत्पश्चात; युथिष्टिर: राजा--राजा युधिष्ठिर; सुहृत्‌--अपने मित्रों; सम्बन्धि--सम्बन्धी लोग; बान्धवान्‌--तथा बान्धव;प्रेमणा--प्रेम के वशीभूत; निवारयाम्‌ आस--उन्हें रोका; कृष्णम्‌--कृष्ण को; च--तथा; त्याग--वियोग से; कातरः --दुखी ।

उस समय राजा युधिष्ठिर ने अपने अनेक मित्रों, निकट सम्बन्धियों तथा बान्धवों को जाने सेरोक लिया, जिनमें कृष्ण भी थे।

प्रेम के वशीभूत युथिष्ठिर ने उन्हें जाने नहीं दिया, क्योंकि उन्हेंआसतन्न विरह की पीड़ा अनुभव हो रही थी।

भगवानपि तत्राड़ न्यावात्सीत्तत्प्रियंकर: ।

प्रस्थाप्य यदुवीरां श्व साम्बादीं श्व कुशस्थलीम्‌ ॥

२९॥

भगवानू-- भगवान्‌; अपि--तथा; तत्र--वहाँ; अड्ग--प्रिय ( राजा परीक्षित ); न्यावात्सीतू--रह गए; तत्‌--उसके लिए( युधिष्ठिर के लिए ); प्रियम्‌ू-- आनन्द; कर: --करते हुए; प्रस्थाप्प-- भेज कर; यदु-वीरान्‌--यदुबंश के वीरों को; च--तथा;साम्ब-आदीनू--साम्ब इत्यादि; च--तथा; कुशस्थलीम्‌--द्वारका |

हे परीक्षित, साम्ब तथा अन्य यदु-वीरों को द्वारका वापस भेज कर भगवान्‌ राजा को प्रसन्नकरने के लिए कुछ काल तक वहाँ ठहर गए।

इत्थं राजा धर्मसुतो मनोरथमहार्णवम्‌ ।

सुदुस्तरं समुत्तीर्य कृष्णेनासीद्‌गतज्वर: ॥

३०॥

इत्थम्‌--इस तरह से; राजा--राजा; धर्म--धर्म के ( यमराज ); सुत:--पुत्र; मनः-रथ--अपनी इच्छाओं के; महा--विशाल;अर्णवम्‌--समुद्र को; सु--अत्यन्त; दुस्तरम्‌ू--पार करना कठिन; समुत्तीर्य--भलीभाँति पार करके; कृष्णेन--कृष्ण के माध्यमसे; आसीत्‌--हो गया; गत-ज्वरः --ज्वर से मुक्त |

इस तरह धर्म-पुत्र राजा युधिष्ठिर भगवान्‌ कृष्ण की कृपा से अपनी इच्छाओं के विशाल एवंदुर्लघ्य समुद्र को भलीभाँति पार करके अपनी उत्कट महत्त्वाकांक्षा से मुक्त हो गये।

एकदान्तःपुरे तस्य वीक्ष्य दुर्योधन: यम ।

अतप्यद्राजसूयस्य महित्वं चाच्युतात्मस: ॥

३१॥

एकदा--एक दिन; अन्तः-पुरे--महल के भीतर; तस्य--उसके ( युधिष्ठिर के ); वीक्ष्य--देख कर; दुर्योधन: --दुर्यो धन;श्रीयम्‌-ऐश्वर्य; अतप्यत्‌--दुखी हुआ; राजसूयस्थ--राजसूय यज्ञ की; महित्वमू--महानता को; च--तथा; अच्युत-आत्मन: --उसका ( युथिष्ठिर का ) जिसकी आत्मा भगवान्‌ अच्युत थे।

एक दिन दुर्योधन राजा युथ्रिष्ठिर के महल के ऐश्वर्य को देख कर राजसूय यज्ञ तथा यज्ञकर्ताराजा की महानता से, जिसका जीवन तथा आत्मा अच्युत भगवान्‌ थे, अत्यधिक विचलित हुआ।

यस्मिस्नरेन्द्रदितिजेन्द्रसुरेन्द्रलक्ष्मी -नाना विभान्ति किल विश्वसृजोपक्रिप्ता: ।

ताभिः पतीन्द्रुपदराजसुतोपतस्थेयस्यां विषक्तहदय: कुरुराडतप्यत्‌ ॥

३२॥

यस्मिन्‌ू--जिसमें ( महल में ); नर-इन्द्र--मनुष्यों के राजा के; दितिज-इन्द्र-- असुरराज के; सुर-इन्द्र--तथा देवताओं के राजाके; लक्ष्मी:--ऐ श्वर्य; नाना--विविध; विभान्ति--प्रकट थे; किल--निस्सन्देह; विश्व-सूजा--विराट स्त्रष्टा ( मय दानव );उपक्रिप्ता: -- प्रदान किया; ताभि: --उनसे; पतीन्‌ू--उसके पति, पाण्डव; द्रुपद-राज--राजा द्रुपद की; सुता--पुत्री, द्रौपदी ने;उपतस्थे--सेवा की; यस्याम्‌--जिसकी; विषक्त--अनुरक्त; हृदय: --हृदय वाले; कुरू-राट्‌--कुरु-कुमार दुर्योधन; अतप्यत्‌--सनन्‍्ताप करने लगा।

उस महल में मनुष्यों, दानवों तथा देवताओं के राजाओं के समस्त संचित ऐश्वर्य जगमगा रहेथे, जो विश्व के अन्वेषक मय दानव द्वारा ले आया गया था।

उस ऐश्वर्य से द्रौपदी अपने पतियोंकी सेवा करती थी, किन्तु कुरू-राजकुमार दुर्योधन संतप्त था, क्योंकि वह उसके प्रतिअत्यधिक आकृष्ट था।

यस्मिन्तदा मधुपतेर्महिषीसहस्त्श्रोणी भरेण शनकै: क्वणदड्प्रिशोभम्‌ ।

मध्ये सुचारु कुचकुड्डू मशोणहारंश्रीमन्मुखं प्रचलकुण्डलकुन्तलाढ्यम्‌ ॥

३३ ॥

यस्मिन्‌ू--जिसमें; तदा--उस समय; मधु--मथुरा के; पतेः--स्वामी की; महिषी--रानियाँ; सहस््रमू--हजारों; श्रोणी--अपनेनितम्बों के; भरेण-- भार से; शनकै: -- धीरे-धीरे; क्वणत्‌--शब्द करती हुई; अड्प्रि--पाँव; शोभमू--शोभा; मध्ये--बीच में( कमर में ); सु-चारु--अत्यन्त मनोहर; कुच--उनके स्तनों से; कुद्डू म--कुंकुम-चूर्ण से; शोण--रक्तिम; हारम्‌ू-मोती कीमाला; श्री-मत्‌--सुन्दर; मुखम्‌--मुखों वाली; प्रचल--हिलते, गतिमान्‌; कुण्डल--कुण्डलों से; कुन्तल--बालों के गुच्छे;आद्यम्‌--धनी |

भगवान्‌ मधुपति की हजारों रानियाँ भी महल में ठहरी हुई थीं।

उनके पाँव नितम्बों के भार से धीरे-धीरे गति करते थे और उनके पाँवों के पायजेब मनोहर शब्द करते थे।

उनकी कटिअत्यन्त पतली थी, उनके स्तनों पर लगे कुंकुम से उनकी मोती की मालाएँ लाल-लाल हो गयीथीं।

उनके हिलते कुण्डलों तथा लहराते बालों से उनके मुखों की भव्य शोभा बढ़ रही थी।

सभायां मयक्रिप्तायां क्वापि धर्मसुतोधिराट्‌ ।

वृतोनुगैर्बन्धुभिश्व कृष्णेनापि स्वचक्षुषा ॥

३४॥

आसीन: काञ्जने साक्षादासने मघवानिव ।

पारमेष्ठद्रश्रीया जुष्ट: स्तूयमानश्च वन्दिभि: ॥

३५॥

सभायाम्‌--सभाभवन में; मय--मय दानव द्वारा; क्रिप्तायामू--बनाया; क्व अपि--एक अवसर पर; धर्म-सुत:--यमराज केपुत्र ( युधिष्ठिर ); अधिराट्‌--सप्राट; वृत:ः--घिरे हुए; अनुगैः--अपने सेवकों से; बन्धुभि:--पारिवारिक सदस्यों से; च--तथा;कृष्णेन-- भगवान्‌ कृष्ण द्वारा; अपि-- भी; स्व--अपनी; चक्षुषा-- आँख से; आसीन:--बैठा; काञ्जने--सोने से बने;साक्षात्‌--स्वयं; आसने--सिंहासन पर; मघवानू--इन्द्र; इब--मानो; पारमेष्ठय--ब्रह्मा का, परम सत्ता के; अ्रिया--ऐश्वर्य से;जुष्ट: -- जुड़ा; स्तूयमान:--प्रशंसित होकर; च--तथा; वन्दिभि:--राजकवियों द्वारा |

ऐसा हुआ कि धर्म-पुत्र सम्राट युथिष्ठिर मय दानव द्वारा निर्मित सभाभवन में स्वर्ण सिंहासनपर इन्द्र के समान विराजमान थे।

उनके साथ उनके परिचारक तथा परिवार वाले लोगों केअतिरिक्त उनके विशेष नेत्रस्वरूप भगवान्‌ कृष्ण भी थे।

साक्षात्‌ ब्रह्मा के ऐश्वर्य को प्रदर्शित कररहे राजा युथ्चिष्ठिर राजकवियों द्वारा प्रशंसित हो रहे थे।

तत्र दुर्योधनो मानी परीतो भ्रातृभिननूप ।

किरीटमाली न्‍्यविशदसिहस्तः क्षिपन्रुषा ॥

३६॥

तत्र--वहाँ; दुर्योधन: --दुर्योधन; मानी-- अभिमानी; परीतः --घिरा हुआ; भ्रातृभि:--अपने भाइयों से; नृप--हे राजा;किरीट--मुकुट; माली--तथा हार पहने; न्यविशत्‌--प्रविष्ट हुआ; असि--तलवार; हस्त:--हाथ में; क्षिपन्‌--( द्वारपालों को )अपमानित करते हुए; रुषा--क्रोध से भरा हुआ।

अभिमानी दुर्योधन अपने हाथ में तलवार लिये और मुकुट तथा हार पहने क्रोध से भराअपने भाइयों के साथ महल में गया।

हे राजन, घुसते समय उसने द्वारपालों का अपमान किया।

स्थले भ्यगृह्नाद्वस्त्रान्तं जलं मत्वा स्थलेउपतत्‌ ।

जले च स्थलवदभ्रान्त्या मयमायाविमोहित: ॥

३७॥

स्थले--स्थल पर; अभ्यगृह्नात्‌ू--ऊपर उठा लिया; बस्त्र--अपने वस्त्र का; अन्तमू--छोर; जलमू--जल; मत्वा--मान कर;स्थले--तथा अन्य स्थान पर; अपतत्‌--गिर गया; जले--जल में; च--तथा; स्थल--स्थल; वत्‌--मानो; भ्रान्त्या-- भ्रम से;मय--मय दानव के; माया--जादू से; विमोहित:ः--मोहग्रस्त

मय दानव के जादू से निर्मित भ्रम से मोहग्रस्त होकर दुर्योधन ठोस फर्श को जल समझबैठा, अतः उसने अपने वस्त्र का निचला सिरा ऊपर उठा लिया।

अन्यत्र जल को ठोस फर्श समझलेने से वह जल में गिर गया।

जहास भीमस्तं दृष्ठा स्त्रियो नृपतयो परे ।

निवार्यमाणा अप्यड़ राज्ञा कृष्णानुमोदिता: ॥

३८ ॥

जहास--हँस पड़ा; भीम:-- भीमसेन; तम्‌ू--उसको ; दृष्टा--देख कर; स्त्रियः--स्त्रियाँ; नू-पतय:--राजागण; अपरे--तथाअन्य; निवार्यमाणा: --रोके जाने पर; अपि-- भी; अड़--हे प्रिय ( परीक्षित ); राज्ञा--राजा ( युथिष्टिर ) द्वारा; कृष्ण--कृष्णद्वारा; अनुमोदिता:--समर्थित, सहमत ।

हे परीक्षित, यह देख कर भीम हँस पड़े और उसी तरह स्त्रियाँ, राजा तथा अन्य लोग भीहँसे।

राजा युधिष्ठिर ने उन्हें रोकना चाहा, किन्तु भगवान्‌ कृष्ण ने अपनी सहमति प्रदर्शित की ।

स ब्रीडितोवग्वदनो रुषा ज्वलन्‌निष्क्रम्य तूष्णीं प्रययौ गजाह्यम्‌ ।

हाहेति शब्द: सुमहानभूत्सता-मजातशन्रुर्विमना इवाभवत्‌ ।

बभूव तृष्णीं भगवान्भुवो भरंसमुजिहीर्षुर््रमति सम यदुशा ॥

३९॥

सः--वह, दुर्योधन; ब्रीडित:--उद्विग्न; अवाक्‌ू--हक्का-बक्का; वदन:--मुख; रुषा--क्रो ध से; ज्वलन्‌ू--जलता हुआ;निष्क्रम्य--बाहर निकल कर; तृष्णीम्‌--चुपके से; प्रययौ--चला गया; गज-आह्यम्‌-- हस्तिनापुर; हा-हा इति--हाय हाय;शब्द:--शब्द; सु-महान्‌-- भीषण; अभूत्‌--उठा; सताम्‌--सन्त-पुरुषों से; अजात-शत्रु:--राजा युथिष्टिर; विमना:--उदास;इब--कुछ कुछ; अभवत्‌--हो गया; बभूब-- था; तृष्णीम्‌ू--मौन; भगवान्‌-- भगवान्‌; भुवः--पृथ्वी का; भरम्‌-- भार;समुजिहीर्षु:--हटाने की इच्छा से; भ्रमति स्म--( दुर्योधन ) ठगा गया; यत्‌--जिसकी; दशा--दृष्टि से |

लज्जित एवं क्रोध से जलाभुना दुर्योधन अपना मुँह नीचा किये, बिना कुछ कहे, वहाँ सेनिकल गया और हस्तिनापुर चला गया।

उपस्थित सनन्‍्त-पुरुष जोर-जोर से कह उठे, 'हाय!हाय! ' और राजा युथ्रिष्ठिर कुछ दुखी हो गये।

किन्तु भगवान्‌, जिनकी चितवन्‌ मात्र से दुर्योधनमोहित हो गया था, मौन बैठे रहे, क्योंकि उनकी मंशा पृथ्वी के भार को हटाने की थी।

एतत्तेडभिहितं राजन्यत्पृष्टोहमिह त्वया ।

सुयोधनस्य दौरात्म्यं राजसूये महाक्रतो ॥

४०॥

एतत्‌--यह; ते--तुमसे; अभिहितम्‌ू--कहा गया; राजन्‌--हे राजन; यत्‌--जो; पृष्ट:--पूछा गया; अहम्‌--मैंने; इहह--इससम्बन्ध में; त्वया--तुम्हारे द्वारा; सुयोधनस्य--सुयोधन ( दुर्योधन ) का; दौरात्म्यम्‌ू--असंतोष; राजसूये--राजसूय यज्ञ केदौरान; महा-क्रतौ--महान्‌ यज्ञ |

हे राजन, अब मैं तुम्हारे इस प्रश्न का उत्तर दे चुका हूँ कि दुर्योधन महान्‌ राजसूय यज्ञ केअवसर पर क्‍यों असन्तुष्ट था।

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