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अध्याय छिहत्तर: शाल्व और वृष्णियों के बीच युद्ध

10.76श्रीशुक उवाचअथान्यदपि कृष्णस्य श्रुणु कर्माद्भुतं नृप ।

क्रीडानरशरीरस्य यथा सौभपतिहतः ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अथ--अब; अन्यत्‌--दूसरा; अपि-- भी; कृष्णस्य--कृष्ण का; श्रूणु--सुनो;कर्म--कार्य; अद्भुतम्‌-विचित्र; नृप--हे राजा; क्रीडा--खिलवाड़ करने के लिए; नर--मनुष्य जैसा; शरीरस्य--शरीर का;यथा--कैसे; सौभ-पति:--सौभ का स्वामी ( शाल्व ); हतः--मारा गया

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, अब उन भगवान्‌ कृष्ण द्वारा सम्पन्न एक अन्य अद्भुत्‌कार्य सुनो, जो दिव्य लीलाओं का आनन्द लेने के लिए अपने मानव शरीर में प्रकट हुए।

अबसुनो कि उन्होंने किस तरह सौभपति का वध किया।

शिशुपालसख: शाल्वो रुक्मिण्युद्राह आगतः ।

यदुभिर्निर्जितः सड्ख्ये जरासन्धादयस्तथा ॥

२॥

शिशुपाल-सख: --शिशुपाल का मित्र; शाल्व:--शाल्व नामक; रुक्मिणी-उद्बाहे--रूक्मिणी के विवाह में; आगत:--आयाहुआ; यदुभि:--यदुओं द्वारा; निर्जित: --परास्त; सड़्ख्ये--युद्ध में; जरासन्ध-आदय:--जरासन्ध इत्यादि; तथा--भी |

शाल्व शिशुपाल का मित्र था।

जब वह रुक्मिणी के विवाह में सम्मिलित हुआ था, तोयदुवीरों ने उसे जरासन्ध तथा अन्य राजाओं समेत युद्ध में परास्त कर दिया था।

शाल्व: प्रतिज्ञामकरोच्छुण्वतां सर्वभूभुजाम्‌ ।

अयादवां क्ष्मां करिष्ये पौरुषं मम पश्यत ॥

३॥

शाल्व:--शाल्व ने; प्रतिज्ञामू--प्रतिज्ञा।

अकरोत्‌--की; श्रृण्वताम्‌--सुनते हुए; सर्व--सभी; भू-भुजाम्‌--राजाओं के;अयादवामू्‌--यादवों से विहीन; क्ष्माम्‌ू-पृथ्वी को; करिष्ये--करूँगा; पौरुषम्‌--पराक्रम; मम--मेरा; पश्यत--जरा देखो

शाल्व ने समस्त राजाओं के समक्ष प्रतिज्ञा की, 'मैं पृथ्वी को यादवों से विहीन कर दूँगा।

जरा मेरे पराक्रम को देखो।

'इति मूढः प्रतिज्ञाय देवं पशुपतिं प्रभुम्‌ ।

आराधयामास नृपः पांशुमुष्टिं सकृदग्रसन्‌ ॥

४॥

इति--इन शब्दों से; मूढ: --मूर्ख ने; प्रतिज्ञाय--प्रतिज्ञा करके ; देवम्‌--स्वामी; पशु-पतिम्‌--पशु सहश पुरुषों के रक्षक, शिवको; प्रभुम्‌ू--अपने स्वामी; आरधयाम्‌ आस--पूजा की; नृप:--राजा; पांशु-- धूल की; मुष्टिम्‌--मुट्ठी; सकृत्‌ू--एक बार( नित्य ही ); ग्रसन्‌--खाते हुए।

यह प्रतिज्ञा कर चुकने के बाद वह मूर्ख राजा प्रतिदिन मात्र एक मुट्ठी धूल फाँक करभगवान्‌ पशुपति ( शिव ) की पूजा करने लगा।

संवत्सरान्ते भगवानाशुतोष उमापति: ।

वरेण च्छन्दयामास शाल्वं शरणमागतम्‌ ॥

५॥

संवत्सर--एक वर्ष के; अन्ते--अन्त में; भगवान्‌-- भगवान्‌; आशु-तोष: --तुरन्त प्रसन्न होने वाले; उमा-पति:--उमा के पति;वरेण--वर से; छन्दयाम्‌ आस--चुनने के लिए; शाल्वम्‌--शाल्व को; शरणम्‌--शरण लेने के लिए; आगतम्‌--आया हुआ।

भगवान्‌ उमापति शीघ्र प्रसन्न होने वाले अर्थात्‌ आशुतोष कहलाते हैं, फिर भी उन्होंने अपनीशरण में आये शाल्व को एक वर्ष के बाद ही यह कह कर तुष्ट किया कि तुम जो वर चाहो माँगसकते हो।

देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्‌ ।

अभेद्यं कामगं वत्रे स यान॑ं वृष्णिभीषणम्‌ ॥

६॥

देव--देवताओं द्वारा; असुर--असुरों; मनुष्याणाम्‌--तथा मनुष्यों को; गन्धर्व--गन्धर्वों द्वारा; उरग--दैवी सर्प; रक्षसामू--तथाराक्षसगण को; अभेद्यमू--नष्ट न किया जा सकने वाला; काम--इच्छानुसार; गम्‌-- भ्रमण करते हुए; वब्रे--चुना; सः --उसने;यानमू्‌--सवारी, यान; वृष्णि--वृष्णियों को; भीषणम्‌-- भयभीत बनाने के लिए।

शाल्व ने ऐसा यान चुना, जो न तो देवताओं, असुरों, मनुष्यों, गन्धर्वों, उरगों और न हीराक्षसों द्वारा नष्ट किया जा सके और जो उसकी इच्छानुसार कहीं भी यात्रा करा सके औरवृष्णियों को भयभीर करा सके।

तथेति गिरिशादिष्टो मय: परपुरंजय: ।

पुरं निर्माय शाल्वाय प्रादात्सौभमयस्मयम्‌ ॥

७॥

तथा--ऐसा ही हो; इति--ऐसा कहने के बाद; गिरि-श--शिव द्वारा; आदिष्ट:--आदेश दिया; मय:--मय दानव; पर--शत्रुके; पुरम्‌ू--नगरों को; जय:--जीतने वाला; पुरमू--नगर; निर्माय--बनाने के लिए; शाल्वाय--शाल्व के लिए; प्रादात्‌--दिया; सौभम्‌--सौभ नामक; अयः--लोहे का; मयम्‌--निर्मित |

शिवजी ने कहा, 'ऐसा ही हो।

' उनके आदेश पर अपने शत्रुओं के नगरों को जीत लेनेवाले मय दानव ने एक लोहे की उड़न नगरी बनाई, जिसका नाम सौभ था और लाकर शाल्वको भेंट कर दी।

स लब्ध्वा कामगं यानं तमोधाम दुरासदम्‌ ।

ययस्द्वारवतीं शाल्वो बैरं वृष्णिकृतं स्मरन्‌ ॥

८॥

सः--वह; लब्ध्वा--प्राप्त करके; काम-गम्‌--इच्छानुसार भ्रमण करने वाला; यानमू--यान को; तम:ः ---अंधकार का; धाम--घर; दुरासदम्‌--जहाँ पहुँचा न जा सके; ययौ--गया; द्वारवतीम्‌--द्वारका; शाल्व:--शाल्व; वैरम्‌--शत्रुता; वृष्णि-कृतम्‌--वृष्णियों द्वारा की गई; स्मरन्‌ू--स्मरण करते हुए।

यह दुर्दम्य यान अंधकार से पूर्ण था और कहीं भी जा सकता था।

इसे प्राप्त करने पर शाल्वअपने प्रति वृष्णियों की शत्रुता स्मरण करते हुए द्वारका गया।

निरुध्य सेनया शाल्वो महत्या भरतर्षभ ।

पुरी बभझ्लोपवनानुद्यानानि च सर्वशः ॥

९॥

सगोपुराणि द्वाराणि प्रासादाद्चालतोलिका: ।

विहारान्स विमानाछयान्रिपेतु: शस्त्रवृष्टय: ॥

१०॥

शिलादुमाश्राशनय: सर्पा आसारशर्करा: ।

प्रचण्डश्चक्रवातो भूद्रजसाच्छादिता दिश: ॥

११॥

निरुध्य--घेरा डाल कर; सेनया--सेना के साथ; शाल्व:--शाल्व; महत्या--महान्‌; भरत-ऋषभ--हे भरत- श्रेष्ठ; पुरीमू--नगरको; बभञ्ञ--तोड़ डाला; उपवनान्‌--वाटिकाओं को; उद्यनानि--बगीचे; च--तथा; सर्वश:--चारों ओर; स-गोपुराणि--बुर्जियों समेत; द्वाराणि--तथा द्वार; प्रासाद--महल; अट्टाल--अटारियाँ; तोलिका:--तथा चार दीवारियाँ; विहारान्‌ू--मनोरंजनके स्थलों को; सः--वह, शाल्व; विमान--हवाईंजहाज से; अछयात्‌--सर्व श्रेष्ठ; निपेतु:--गिराया; शस्त्र--हथियारों की;वृष्टय: --वर्षा; शिला--पत्थर; द्रुमा:--तथा वृक्ष; च-- भी; अशनय:--वज्; सर्पा:--सर्प; आसार-शर्करा:--तथा ओले;प्रचण्ड:-- भयानक; चक्रवात:--बवण्डर; अभूत्‌--उठा; रजसा-- धूल से; आच्छाद्विता:--ढकी हुई; दिशः--समस्त दिशाएँ |

हे भरतश्रेष्ठ, शाल्व ने विशाल सेना के साथ नगर को घेर लिया और बाहरी वाटिकाओं तथाउद्यानों, अद्डालिकाओं समेत महलों, गोपुरों तथा चार दीवारियों के साथ साथ सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों को भी ध्वस्त कर दिया।

उसने अपने इस उत्कृष्ट यान से पत्थरों, वृक्ष के तनों,वबज्नों, सर्पो, ओलों इत्यादि हथियारों की वर्षा की।

एक भीषण बवण्डर उठ खड़ा हुआ औरउसने धूल से सारी दिशाओं को ओझल बना दिया।

इत्यर्यमाना सौभेन कृष्णस्य नगरी भृशम्‌ ।

नाभ्यपद्यत शूं राजंस्त्रिपुरुण यथा मही ॥

१२॥

इति--इस प्रकार; अर्द्यमाना--सतायी हुई; सौभेन--सौभ नामक विमान से; कृष्णस्य--कृष्ण की; नगरी--पुरी; भूशम्‌--बुरीतरह से; न अभ्यपद्यत--नहीं पा सका; शम्‌--शान्ति; राजनू--हे राजन्‌; त्रि-पुरेण--असुरों की तीन हवाई-नगरियों द्वारा;यथा--जिस तरह; मही--पृथ्वी |

हे राजनू, इस तरह सौभ विमान द्वारा बुरी तरह सताये जाने से कृष्ण की पुरी में अमन-चैननहीं रहा, जिस तरह असुरों की तीन हवाई-नगरियों द्वारा आक्रमण किये जाने पर पृथ्वी अशान्तहो गई थी।

प्रद्युम्नो भगवान्वीक्ष्य बाध्यमाना निजा: प्रजा: ।

म भेष्टेत्यभ्यधाद्वीरो रथारूढो महायशा: ॥

१३॥

प्रद्मुम्न:--प्रद्यम्न; भगवानू-- भगवान्‌; वीक्ष्य--देख कर; बाध्यमाना:--सताया जाकर; निजा:--अपनी; प्रजा:--प्रजा; माभैष्ट--मत डरो; इति--इस प्रकार; अभ्यधात्‌--सम्बोधित किये गये; वीर:--महान्‌ वीर; रथ-- अपने रथ पर; आरूढ:ः--सवारहुआ; महा--महान्‌; यशा:--कीर्ति वाला

अपनी प्रजा को इस प्रकार सताई जाते देखकर यशस्वी तथा वीर भगवान्‌ प्रद्युम्न ने उनसेइस प्रकार कहा, 'डरो मत' तथा वह अपने रथ पर सवार हो गया।

सात्यकिश्चारुदेष्णश्व साम्बोक्रूरः सहानुज: ।

हार्दिक्यो भानुविन्दश्च गदश्च शुकसारणौ ॥

१४॥

अपरे च महेष्वासा रथयूथपयूथपा: ।

निर्ययुर्दशिता गुप्ता रथेभाश्रपदातिभि: ॥

१५॥

सात्यकिः चारुदेष्ण: च--सात्यकि तथा चारुदेष्ण; साम्ब:--साम्ब; अक्रूर: --एवं अक्रूर; सह--साथ; अनुज:--छोटे भाई;हार्दिक्य:--हार्दिक्य; भानुविन्दः-- भानुविन्द; च--तथा; गद:ः--गद; च--तथा; शुक-सारणौ--शुक एवं सारण; अपरे--अन्य; च--भी; महा-- प्रमुख; इष्व्‌-आसा: -- धनुर्धर; रथ--रथ के ( योद्धा ); यूथ-प--नेताओं के; यूथ-पा: --नेता;निर्ययु:--बाहर चले गये; दंशिता:--कवच धारण किये; गुप्ता:--सुरक्षित; रथ--रथों ( पर सवार सैनिकों ) द्वारा; इभ--हाथियों; अश्व--तथा घोड़ों; पदातिभि:--तथा पैदल सैनिकों से

रथियों के प्रमुख सेनापति यथा सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, अक्रूर तथा उसके छोटे भाईऔर उनके साथ ही हार्दिक्य, भानुविन्द, गद, शुक तथा सारण अनेक अन्य प्रमुख धनुर्धरों केसाथ कवच धारण करके तथा रथों, हाथियों और घोड़ों पर सवार सैनिकों एवं पैदल सिपाहियोंकी टुकड़ियों से सुरक्षित होकर नगर से बाहर आ गये।

ततः प्रववृते युद्धं शाल्वानां यदुभि: सह ।

यथासुराणां विबुधस्तुमुलं लोमहर्षणम्‌ ॥

१६॥

ततः--तब; प्रववृते--शुरू कर दिया; युद्धम्‌-युद्ध; शाल्वानाम्‌ू--शाल्व के अनुयायियों का; यदुभि: सह--यदुओं के साथ;यथा--जिस तरह; असुराणाम्‌--असुरों का; विबुधे:--देवताओं के साथ; तुमुलम्‌--घनघोर; लोम-हर्षणम्‌--रोंगटे खड़ा करनेबाला।

तब शाल्व की सेनाओं तथा यदुओं के बीच रोंगटे खड़ा कर देने वाला भीषण युद्ध प्रारम्भहुआ।

यह असुरों तथा देवताओं के मध्य हुए महान्‌ युद्ध के तुल्य था।

ताश्व सौभपतेर्माया दिव्यास्त्रे रुक्मिणीसुत: ।

क्षणेन नाशयामास नैशं तम इवोष्णगु: ॥

१७॥

ताः--वे; च--तथा; सौभ-पते:--सौभ के स्वामी की; माया:--जादुई माया; दिव्य--दैवी; अस्त्रै:--हथियारों से; रुक्मिणी-सुतः--रुक्मिणी-पुत्र ( प्रद्युम्न ); क्षणेन-- क्षण में; नाशयाम्‌ आस--नष्ट कर दिया; नैशम्‌--रात्रि का; तमः--अंधकार; इब--सहश; उष्ण--गर्म; गु;ः--जिसकी किरणें ( सूर्य )॥

प्रद्युम्न ने अपने दैवी हथियारों से शाल्व की सारी माया को क्षण-भर में उसी तरह नष्ट करदिया, जिस तरह सूर्य की तप्त किरणें रात्रि के अँधेरे को दूर कर देती हैं।

विव्याध पञ्जविंशत्या स्वर्णपुद्डैरयोमुखे: ।

शाल्वस्य ध्वजिनीपालं शरैः सन्नतपर्वभि: ॥

१८॥

शतेनाताडयच्छाल्वमेकैकेनास्थ सैनिकान्‌ ।

दश्भिर्दशभिमनेतृन्वाहनानि त्रिभिस्त्रिभि: ॥

१९॥

विव्याध--चलाया; पञ्ञ--पाँच; विंशत्या--बीस; स्वर्ण--सोना; पुद्छैः--जिनके पुछलल्‍ले; अयः--लोहा के; मुखैः --जिनकेसिरे; शाल्वस्थ--शाल्व का; ध्वजिनी-पालम्‌--प्रधान सेनापति; शरैः--तीरों से; सन्नत--समतल; पर्वभि:--जोड़ों से; शतेन--एक सौ; अताडयत्‌-- प्रहार किया; शाल्वमू--शाल्व को; एक-एकेन-- प्रत्येक को एक-एक से; अस्य--उसका; सैनिकानू--सिपाही; दशभि: दशाभि:--दस-दस करके; नेतृनू--रथ हाँकने वाले; वाहनानि--वाहनों को; त्रिभिः त्रिभि:--प्रत्येक को तीन-तीन से।

प्रद्युम्न के सारे तीरों के पुछलल्‍ले सोने के, सिरे लोहे के तथा जोड़ एकदम सपाट थे।

उसनेपच्चीस तीरों से शाल्व के प्रधान सेनापति द्युमान्‌ को मार गिराया और एक सौ तीरों से शाल्व परप्रहार किया।

फिर उसने शाल्व के हर अधिकारी को एक-एक तीर से, सारथियों में से प्रत्येकको दस-दस तीरों से तथा उसके घोड़ों एवं अन्य वाहनों को तीन-तीन बाणों से बेध डाला।

तदद्धुतं महत्कर्म प्रद्युम्नस्थ महात्मन: ।

इृष्ठा तं पूजयामासु: सर्वे स्वपरसैनिका: ॥

२०॥

तत्‌--उस; अद्भुतमू--चकित करने वाले; महत्‌--बलशाली; कर्म--कर्तब; प्रद्यम्नस्थ--प्रद्युम्त का; महा-आत्मन:--महापुरुष;इृष्ठा--देखकर; तम्‌ू--उसको; पूजयाम्‌ आसु:--आदर-सम्मान किया; सर्वे--सभी; स्व--अपने पक्ष के; पर--तथा शत्रु पक्षके; सैनिकाः--सिपाही

जब उन्होंने यशस्वी प्रद्युम्म को वह चकित करने वाला तथा बलशाली ऐसा करतब करतेदेखा, तो दोनों पक्षों के सैनिकों ने उसकी प्रशंसा की।

बहुरूपैकरूपं तहृश्यते न च दृश्यते ।

मायामयं मयकृतं दुर्विभाव्यं पैरभूत्‌ ॥

२१॥

बहु--अनेक; रूप--रूपों के साथ; एक--एक; रूपमू--रूप के साथ; तत्‌--वह ( सौभ विमान ); दृश्यते--दिखाई पड़ता है;न--नहीं; च--तथा; दृश्यते--दिखता है; माया-मयम्‌--जादूमय; मय--मय दानव द्वारा; कृतम्‌ू--बनाया गया; दुर्विभाव्यम्‌--ढूँढ़ पाना कठिन; परैः--शत्रु ( यादवों ) द्वारा; अभूत्‌ू--बन गया ।

मय दानव द्वारा निर्मित यह मायावी विमान एक क्षण अनेक एक जैसे रूपों में प्रकट होताऔर दूसरे क्षण पुनः: केवल एक रूप में दिखता।

कभी यह दिखता और कभी नहीं दिखता था।

इस तरह शाल्व के विरोधी यह निश्चित नहीं कर पाते थे कि वह कहाँ है।

क्वचिद्धूमौ क्वचिद्व्योम्नि गिरिमूर्थिन जले क्वचित्‌ ।

अलातचक्रवदश्चाम्यत्सौभं तहुरवस्थितम्‌ ॥

२२॥

क्वचित्‌--एक क्षण में; भूमौ--पृथ्वी पर; क्वचित्‌--एक क्षण में; व्योग्नि--आकाश में; गिरि--पर्वत की; मूर्ध्नि--चोटी पर;जले--जल में; क्वचित्‌--कभी; अलात-चक्र--आग का गोला; वत्‌--सहृश; भ्राम्यत्‌--घूमते हुए; सौभम्‌--सौभ को;तत्‌--उस; दुरवस्थितम्‌--कभी एक स्थान में न रहते हुए।

एक क्षण से दूसरे क्षण में सौभ विमान पृथ्वी में, आकाश में, पर्वत की चोटी पर या जल मेंदिखता था।

घूमते हुए अग्नि-पुंज की तरह वह कभी एक स्थान पर नहीं टिकता था।

यत्र यत्रोपलक्ष्येत ससौभ: सहसैनिक: ।

शाल्वस्ततस्ततोमुझ्जज्छरान्सात्वतयूथपा: ॥

२३॥

यत्र यत्र--जहाँ जहाँ; उपलक्ष्येत--दिखता; स-सौभ: --सौ भ के साथ; सह-सैनिक:--अपने सिपाहियों के साथ; शाल्व: --शाल्व; ततः ततः--वहाँ वहाँ; अमुझ्नन्‌ू--छोड़ा, चलाया; शरान्‌--अपने बाणों को; सात्वत--यदुओं के; यूथ-पा:--सेना केप्रधानों ने

शाल्व जहाँ जहाँ अपने सौभ यान तथा अपनी सेना के साथ प्रकट होता, वहाँ वहाँ यदु-सेनापति अपने बाण छोड़ते।

शरैरग्न्यर्कसंस्पर्शराशीविषदुरासदै: ।

पीड्यमानपुरानीकः शाल्वोमुहात्परेरिते: ॥

२४॥

शरैः--बाणों से; अग्नि--अग्नि के समान; अर्क--तथा सूर्य के समान; संस्पशैं:--स्पर्श से; आशी--सर्प के; विष--विष कीतरह; दुरासदैः--असहा; पीड्यमान--पीड़ित; पुर--वायव-पुरी; अनीक:--तथा जिसकी सेना; शाल्व:--शाल्व; अमुहात्‌--मोहित हो गया; पर--शत्रु द्वारा; ईरितै:--चलाया या छोड़ा गया।

अपने शत्रु के बाणों से त्रस्त हो रही अपनी सेना तथा वायव-पुरी को देखकर शाल्वमोहग्रस्त हो गया, क्योंकि शत्रु के बाण अग्नि तथा सूर्य की तरह प्रहार कर रहे थे और सर्प-विषकी तरह असह् हो रहे थे।

शाल्वानीकपशस्त्रौधेर्वृष्णिवीरा भूशार्दिता: ।

न तत्यजू रणं स्वं स्व॑ लोकटठ्रबजिगीषव: ॥

२५॥

शाल्व--शाल्व की; अनीक-प--सेना के नायकों के; शस्त्र--हथियारों की; ओघषै: --बाढ़ से; वृष्णि-वीरा:--वृष्णि-कुल केवीर; भूश--अत्यन्त; अर्दिता:--पीड़ित; न तत्यजु:--नहीं छोड़ा; रणम्‌--युद्धभूमि में नियत स्थानों को; स्वम्‌ स्वम्‌-- अपनेअपने; लोक--लोक; द्वय--दो; जिगीषवः--जीतने की इच्छा करते हुए।

चूँकि वृष्णि-कुल के वीरगण इस जगत में तथा अगले लोक में विजय पाने के लिए उत्सुकथे, इसलिए उन्होंने रणभूमि में अपने नियत स्थानों का परित्याग नहीं किया, यद्यपि शाल्व केसेनापतियों द्वारा चलाये गये हथियारों की वर्षा से उन्हें त्रास हो रहा था।

शाल्वामात्यो झुमान्नाम प्रद्युम्नं प्रक्प्रपीडितः ।

आसाद्य गदया मौर्व्या व्याहत्य व्यनदद्ली ॥

२६॥

शाल्व-अमात्य:--शाल्व का मंत्री; द्युमान्‌ नाम--जिसका नाम झूुमान्‌ था; प्रद्यम्नम्‌--प्रद्मुम्न को; प्राकु--पहले; प्रपीडित:--आधघात किया था; आसाद्य--सामना करते हुए; गदया--अपनी गदा से; मौर्व्या--लोहे से बनी; व्याहत्य-- प्रहार करके;व्यनदत्‌ू-गर्जना की; बली--शक्तिशाली |

शाल्व का मंत्री द्युमान्‌ू, जो इसके पूर्व श्री प्रद्मम्म द्वारा घायल कर दिया गया था, अब जोरसे गरजता हुआ उनके पास आया और उसने उन पर काले इस्पात की बनी अपनी गदा से प्रहारकिया।

प्रद्युम्नं गदया सीर्णवक्ष:स्थलमरिंदमम्‌ ।

अपोवाह रणात्सूतो धर्मविद्यरूकात्मज: ॥

२७॥

प्रद्मुम्नम्‌--प्रद्युम्म को; गदया--गदा से; शीर्ण -- क्षत-विक्षत; वक्ष:-स्थलम्‌ू--छाती; अरिम्‌ू--शत्रुओं के ; दमम्‌--दमनकर्ता ने;अपोवाह--हटा लिया; रणातू--युद्धक्षेत्र से; सूत:--अपना सारथी; धर्म--अपने धर्म के; वित्‌ू--जानकार; दारुक-आत्मज:--दारुक-पुत्र ( कृष्ण का सारथी )

प्रद्युम्म के सारथी दारुक-पुत्र ने सोचा कि उसके वीर स्वामी की छाती गदा से क्षत-विक्षतहो चुकी है, अतः उसने अपने धार्मिक कर्तव्य को भलीभाँति जानते हुए प्रद्यम्न को युद्धभूमि सेहटा लिया।

लब्धसम्ज्नो मुहूर्तेन कार्षिग: सारथिमब्रवीत्‌ ।

अहो असाध्वदं सूत यद्रणान्मे उपसर्पणम्‌ ॥

२८ ॥

लब्ध--प्राप्त करके; संज्ञ:--होश; मुहूर्तेन--क्षण-भर में; कार्ण्णि:--कृष्ण के पुत्र ने; सारधिम्‌--सारथी से; अब्नवीत्‌--कहा;अहो--ओह; असाधु --अनुचित; इृदम्‌--यह; सूत--हे सारथी; यत्‌--जो; रणात्‌--युद्धभूमि से; मे--मेरा; अपसर्पणम्‌-लेजाया गया हुआ।

तुरन्त ही होश आने पर भगवान्‌ कृष्ण के पुत्र प्रद्यम्म ने अपने सारथी से कहा, 'हे सारथी,यह निन्दनीय है कि तुम मुझे युद्धक्षेत्र से हटा लाये हो।

'न यदूनां कुले जातः श्रूयते रणविच्युतः ।

विना मत्क्लीबचित्तेन सूतेन प्राप्तकिल्बिषातू ॥

२९॥

न--नहीं; यदूनाम्‌--यदुओं के; कुले--परिवार में; जात:--उत्पन्न; श्रूयते--सुना जाता है; रण--युद्धक्षेत्र से; विच्युत:--परित्यक्त; विना--के अलावा; मत्‌--मुझको; क्लीब--नपुंसक की तरह; चित्तेन--जिसकी मनोवृत्ति; सूतेन--सारथी केकारण; प्राप्त--पाया हुआ; किल्बिषात्‌--दाग।

'मेरे अतिरिक्त यदुवंश के जन्मे किसी ने कभी युद्धभूमि का परित्याग नहीं किया।

अब तोमेरी ख्याति एक सारथी द्वारा कलंकित हो चुकी है, जो एक नपुंसक की तरह सोचता है।

'कि नु वक्ष्येडभिसड्रम्य पितरौ रामकेशवौ ।

युद्धात्सम्यगपक्रान्तः पृष्ठस्तत्रात्मनः क्षमम्‌ ॥

३०॥

किम्‌--क्या; नु--तब; वक्ष्ये--कहूँगा; अभिसड्भम्य-- भेंट करके; पितरौ--अपने दोनों पिताओं से; राम-केशवौ--बलरामतथा कृष्ण; युद्धात्‌-युद्ध से; सम्यक्‌ --सर्वथा; अपक्रान्त:--भागा हुआ; पृष्ट:--पूछे जाने पर; तत्र--उस अवस्था में;आत्मन:--अपने; क्षमम्‌--योग्य |

मैं अपने पिता-द्वय राम तथा केशव से क्या कहूँगा, जब युद्ध से यों ही भाग कर मैं उनकेपास वापस जाऊँगा ? मैं उनसे क्या कह पाऊँगा, जो मेरी प्रतिष्ठा के अनुरूप हो ?

व्यक्त मे कथयिष्यन्ति हसन्त्यो भ्रातृजामयः ।

क्लैब्यं कथं कथ्थ वीर तवान्यै: कथ्यतां मृथे ॥

३१॥

व्यक्तम्‌--निश्चय ही; मे--मेरी; कथयिष्यन्ति-- कहेंगे; हसन्त्य:--हँस हँस कर; भ्रातृ-जामय:--भाभियाँ; क्लैब्यम्‌ू--क्लीवता;कथम्‌-कैसे; कथम्‌--कैसे; वीर--हे वीर; तव--तुम्हारा; अन्य: --तुम्हारे शत्रुओं द्वारा; कथ्यतामू--बतलाओ; मृधे--युद्धमें

निश्चय ही मेरी भाभियाँ मुझ पर हँसेंगी और कहेंगी, 'हे वीर, हमें यह तो बताओ किकिस तरह इस संसार में तुम्हारे शत्रुओं ने तुम्हें युद्ध में ऐसा कायर बना दिया।

'सारथिरुवाचधर्म विजानतायुष्मन्कृतमेतन्‍्मया विभो ।

सूतः कृच्छुगतं रक्षेद्रधिनं सारथि रथी ॥

३२॥

सारथि: उबाच--सारथी ने कहा; धर्मम्‌--धर्म द्वारा संस्तुत; विजानता--अच्छी तरह जानने वाले के द्वारा; आयु:-मन्‌--हेदीर्घजीवी; कृतम्‌--किया गया; एतत्‌--यह; मया--मेरे द्वारा; विभो--हे प्रभु; सूत:--सारथी; कृच्छु--कठिनाई में; गतम्‌--गया हुआ; रक्षेत्‌--रक्षा करनी चाहिए; रधिनमू--रथ के स्वामी की; सारथिम्‌--अपने सारथी को; रथी--रथ का स्वामी |

साश्थी ने उत्तर दिया : हे दीर्घायु, मैंने अपने निर्दिष्ट कर्तव्य को अच्छी तरह जानते हुए हीऐसा किया है।

हे प्रभु, सारथी को चाहिए कि जब उसका स्वामी संकट में हो, तो उसकी रक्षाकरे और स्वामी को भी चाहिए कि वह अपने सारथी की रक्षा करे।

एतद्विदित्वा तु भवान्मयापोवाहितो रणात्‌ ।

उपसृष्ट: परेणेति मूर्च्छितो गदया हत: ॥

३३॥

एतत्‌--यह; विदित्वा--जान कर; तु--निस्सन्देह; भवान्‌--आप; मया--मेरे द्वारा; अपोवाहितः--हटाये गये; रणात्‌--युद्धभूमि से; उपसूष्ट:--चोट खाये; परेण --शत्रु द्वारा; इति--इस तरह सोचते हुए; मूर्च्छित: --बेहोश; गदया--अपनी गदा से;हत:--प्रहार किया हुआ।

इस नियम को मन में रखते हुए मैंने आपको युद्धस्थल से हटा लिया, क्योंकि आप अपनेशत्रु की गदा से आहत होकर बेहोश हो गये थे और मैंने सोचा कि आप बुरी तरह से घायल हैं।

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