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अध्याय तिरासी: द्रौपदी की कृष्ण की रानियों से मुलाकात

10.83श्रीशुक उवाचतथानुगृहा भगवान्गोपीनां स गुरुर्गतिः।

युथिष्टिरमथापृच्छत्सर्वाश्व सुहृदोउव्ययम्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; तथा--इस तरह से; अनुगृह्य-- अनुग्रह दिखलाकर; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने;गोपीनाम्‌--तरुण गोपियों के; सः--वह; गुरुः--उनका गुरु; गतिः:--तथा लक्ष्य; युधिष्ठिरम्‌--युधिष्ठिर से; अथ--तब;अपृच्छत्‌--पूछा; सर्वानू--सबों के; च--तथा; सु-हृदः--अपने शुभचिन्तक परिवार वालों; अव्ययम्‌--कुशल-श्षेम |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह गोपियों के आध्यात्मिक गुरु तथा उनके जीवन केगन्तव्य भगवान्‌ कृष्ण ने उन पर अपनी कृपा प्रदर्शित की।

तत्पश्चात्‌ वे युधिष्ठटिर तथा अपने अन्यसभी सम्बन्धियों से मिले और उनसे उनकी कुशलता पूछी।

त एवं लोकनाथेन परिपृष्ठा: सुसत्कृता: ।

प्रत्यूचुईष्टमनसस्तत्पादेक्षाहतांहस: ॥

२॥

ते--वे ( युधिष्ठिर तथा भगवान्‌ कृष्ण के अन्य सम्बन्धी ); एवम्‌--इस प्रकार; लोक--ब्रह्माण्ड के; नाथेन--स्वामी द्वारा;परिपृष्टा:--पूछे जाकर; सु--अत्यधिक; सत्‌-कृता:--सम्मानित; प्रत्यूचु:--उत्तर दिया; हष्ट--प्रसन्न; मनस:ः--मन वाले;तत्‌--उसका; पाद--पैर; ईक्षा--देखने से; हत--विनष्ट; अंहसः--जिसके पाप |

ब्रह्माण्ड के स्वामी के चरणों को देखकर समस्त पापों से मुक्त राजा युथ्चिष्ठटिर तथा अन्यों नेअत्यधिक सम्मानित अनुभव करते हुए उनके प्रश्नों का खुशी खुशी उत्तर दिया।

कुतोशिवं त्वच्चरणाम्बुजासवंमहन्मनस्तो मुखनि:सृतं क्वचित्‌ ।

पिबन्ति ये कर्णपुटैरलं प्रभोदेहंभूतां देहकृदस्मृतिच्छिदम्‌ ॥

३ ॥

कुतः--कहाँ से; अशिवम्‌--अशुभ; त्वत्‌-तुम्हारे; चरण--पाँवों के; अम्बुज--कमलवत्‌; आसवमू--मदोन्मत्तकारी अमृतको; महत्‌--महात्माओं के; मनस्तः--मनों से; मुख--उनके मुँहों से होकर; निःसृतम्‌ू--निकला हुआ; क्वचित्‌--किसी समय;पिबन्ति--पीते हैं; ये--जो; कर्ण--उनके कानों के; पुटैः--प्यालों से; अलमू--इच्छानुसार; प्रभो--हे प्रभु; देहम्‌ू-- भौतिकशरीर; भूताम्‌-- धारण करने वालों के लिए; देह--देहों के; कृत्‌--स्त्रष्टा के विषय में; अस्मृति--विस्मरण के; छिदम्‌--उच्छेदक |

भगवान्‌ कृष्ण के सम्बन्धियों ने कहा : हे प्रभु, उन लोगों का अमंगल कैसे हो सकता है,जिन्होंने आपके चरणकमलों से निकले अमृत का छक कर पान किया हो ? यह मदोन्मत्तकारीतरल बड़े बड़े भक्तों के मनों से बहता हुआ, उनके मुखों से निकल कर, उनके कान रूपी प्यालोंमें उड़ेला जाता है।

यह देहधारी जीवात्माओं द्वारा अपने शरीर के बनाने वाले के प्रति विस्मृतिको विनष्ट करता है।

हि त्वात्म धामविधुतात्मकृतत्रयवस्था-मानन्द्सम्प्लवमखण्डमकुण्ठबोधम्‌ ॥

'कालोपसूष्टनिगमावन आत्तयोग-मायाकृतिं परमहंसगतिं नता: सम ॥

४॥

हि--निस्सन्देह; त्वा--तुमको; आत्म--आपके साकार रूप का; धाम--प्रकाश द्वारा; विधुत--दूर किया हुआ; आत्म--भौतिक चेतना द्वारा; कृत--उत्पन्न; त्रि--तीन; अवस्थाम्‌-- भौतिक अवस्थाएँ; आनन्द--आनन्द में; सम्प्लवम्‌--( जिसकेभीतर ) पूर्णतया निमग्न; अखण्डम्‌--अनन्त; अकुण्ठ--अनियंत्रित; बोधम्‌--जिसका ज्ञान; काल--समय द्वारा; उपसूष्ट--संकटग्रस्त; निगम--वेदों के; अवने--संरक्षण के लिए; आत्त-- धारण करते हुए; योग-माया--अपनी योगमाया द्वारा;आकृतिम्‌--इस स्वरूप को; परम-हंस--पूर्ण-सन्तों के; गतिमू--लक्ष्य को; नताः स्म--( हम ) नतमस्तक हैं।

आपके स्वरूप का तेज भौतिक चेतना के त्रिगुण प्रभावों को दूर करता है और आपकेअनुग्रह से हम पूर्ण सुख में निमग्न हो जाते हैं।

आपका ज्ञान अविभाज्य तथा असीम है।

अपनीयोगमाया शक्ति से आपने उन वेदों की रक्षा करने के लिए यह मानव रूप धारण किया है, जोकालक्रम से संकटग्रस्त हो गये थे।

हे पूर्ण-सन्तों के चरम लक्ष्य, हम आपके समक्ष नतमस्तकहैं।

श्रीऋषिरुवाचइत्युत्तर:शलोकशिखामएणिं जने-घ्वभिष्ठृवत्स्वन्धककौरवस्त्रिय: ।

समेत्य गोविन्दक था मिथोगृनं-स्त्रिलोकगीता: श्रृणु वर्णयामि ते ॥

५॥

श्री-ऋषि: उवाच--ऋषि, शुकदेव ने कहा; इति--इस प्रकार; उत्तम:-शलोक--महापुरुषों के जिनका यशोगान उत्तम एलोकोंद्वारा किया जाता है; शिखा-मणिम्‌--शिरोमणि ( भगवान्‌ कृष्ण ); जनेषु--अपने भक्तों में; अभिष्टृवत्सु--महिमागान करते हुए;अन्धक-कौरव--अन्धक तथा कौरव वंशों की; स्त्रियः--स्त्रियाँ; समेत्य--मिल कर; गोविन्द-कथा:-- भगवान्‌ गोविन्द कीकथाएँ; मिथ:--परस्पर; अगृणन्‌ू--कहा; त्रि--तीन; लोक--लोकों में; गीता: --गाई गई; श्रूणु--सुनो; वर्णयामि--मैं वर्णनकरूँगा; ते--तुमसे ( परीक्षित महाराज से ) |

ऋषिवर शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब युथ्िष्ठिर तथा अन्य लोग महापुरुषों में शिरोमणिभगवान्‌ कृष्ण की इस तरह प्रशंसा कर रहे थे, तो अन्धक तथा कौरव वंश की महिलाएँ एक-दूसरे से मिलीं और तीनों लोकों में गाई जाने वाली गोविन्द विषयक कथाओं की चर्चा करनेलगीं।

कृपया सुनो, क्योंकि मैं तुमसे इनका वर्णन करने जा रहा हूँ।

श्रीद्रौपद्युवाचहे वैदर्भ्यच्युतो भद्रे हे जाम्बवति कौशले ।

हे सत्यभामे कालिन्दि शैब्ये रोहिणि लक्ष्मणे ॥

६॥

हे कृष्णपत्नय एतन्नो ब्रूते वो भगवान्स्वयम्‌ ।

उपयेमे यथा लोकमनुकुर्वन्स्वमायया ॥

७॥

श्री-द्रौपदी उवाच-- श्री द्रौपदी ने कहा; हे वैदर्भि--हे विदर्भ-पुत्री ( रुक्मिणी ); अच्युत:-- भगवान्‌ कृष्ण; भद्वे--हे भद्रा; हेजाम्बवति--हे जाम्बवान-पुत्री; कौशले--हे नाग्नजिती; हे सत्यभामे--हे सत्यभामा; कालिन्दि--हे कालिन्दी; शैब्ये--हेमित्रविन्दा; रोहिणि--हे रोहिणी ( नरकासुर के वध के बाद सोलह हजार एक सौ रानियों में से एक, जिसके साथ कृष्ण ने ब्याहकिया था ); लक्ष्मणे--हे लक्ष्मणा; हे कृष्ण-पत्य:--हे कृष्ण की ( अन्य ) पत्नियो; एतत्‌--यह; नः--हमसे; ब्रूते--कहें;वः--तुम; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; स्वयम्‌--साक्षात्‌; उपयेमे--ब्याहा; यथा--कैसे; लोकम्‌--सामान्य समाज; अनुकुर्वन्‌ू--अनुकरण करते हुए; स्व-मायया--अपनी योगशक्ति से |

श्री द्रौयदी ने कहा : हे वैदर्भी, हे भद्रा, हे जाम्बबती, हे कौशला, हे सत्यभामा तथाकालिन्दी, हे शैब्या, रोहिणी, लक्ष्मणा तथा कृष्ण की अन्य पत्नियो, कृपा करके मुझे बतलाइयेकि भगवान्‌ अच्युत ने किस तरह अपनी योगशक्ति से इस संसार की रीति का अनुकरण करतेहुए आपमें से हर एक से विवाह किया।

श्रीरुक्मिण्युवाचचैद्याय मार्पयितुमुद्यतकार्मुकेषुराजस्वजेयभटशेखरिताडूप्रिरेणु: ।

निन्ये मृगेन्द्र इब भागमजावियूथात्‌तच्छीनिकेतचरणोस्तु ममार्चनाय ॥

८॥

श्री-रुक्मिणी उवाच-- श्री रुक्मिणी ने कहा; चैद्याय--शिशुपाल को; मा--मुझको; अर्पयितुम्‌्--प्रदान करने के लिए;उद्यत--तैयार; कार्मुकेषु--जिनके धनुष; राजसु--जब राजा; अजेय--दुर्जय; भट--सैनिकों के; शेखरित--सिर पर रखे;अदडप्रि--जिसके पाँवों की; रेणु;--धूलि; निन्ये--हर ले गया; मृगेन्द्र:--सिंह; इब--मानो; भागम्‌ू--अपना हिस्सा; अज--बकरियों; अवि--तथा भेड़ों के; यूथात्‌ू-रेवड़ से; तत्‌ू--उसका; श्री--लक्ष्मीजी का; निकेत-- धाम; चरण:--पाँव; अस्तु--होयें; मम--मेरी; अर्चनाय--पूजा के लिए

श्री रुक्मिणी ने कहा : जब सारे राजा अपने अपने धनुष लिए यह आश्वासन देने के लिएतैयार खड़े थे कि शिशुपाल को मैं अर्पित कर दी जाऊँ, तो अजेय योद्धाओं के सिरों पर अपनीचरण-धूलि रखने वाले ने उनके बीच में से उसी तरह मेरा हरण कर लिया, जिस तरह एक सिंहअपने शिकार को बकरियों तथा भेड़ों के बीच से बलपूर्वक ले जाता है।

मैं चाहूँगी किलक्ष्मीधाम भगवान्‌ कृष्ण के उन पाँवों की पूजा मुझे करने को मिले।

श्रीसत्यभामोवाचयो मे सनाभिवधतप्तहदा ततेनलिप्ताभिशापमपमा्टमुपाजहार ।

जित्वर्क्ताजमथ रत्नमदात्स तेनभीतः पितादिशत मां प्रभवेपि दत्ताम्‌ू ॥

९॥

श्री-सत्यभामा उबाच--सत्यभामा ने कहा; यः--जो; मे-- मेरा; सनाभि--मेरे भाई के; वध--मारने से; तप्त--दुखी; हृदा--जिसका हृदय; ततेन--मेरे पिता द्वारा; लिप्त--रँगा हुआ; अभिशापम्‌--गहएणा से; अपमा्टमू--स्वच्छ करने के लिए; उपाजहार--हटा दिया; जित्वा--जीत कर; ऋक्ष-राजम्‌--रीछों के राजा जाम्बवान को; अथ--तब; रलम्‌--( स्यमन्तक )मणि; अदात्‌--दे दिया; सः--उसने; तेन--इसके कारण; भीतः-- भयभीत; पिता--मेंरे पिता; अदिशत--अर्पित कर दिया;माम्‌--मुझको; प्रभवे--प्रभु को; अपि--यद्यपि; दत्तामू-पहले ही प्रदत्त

श्री सत्यभामा ने कहा : मेरे पिता का हृदय अपने भाई की हत्या से दुखित था, इसलिएउन्होंने भगवान्‌ कृष्ण को इस अपराध के लिए दोषी ठहराया।

भगवान्‌ ने अपने यश पर लगे इसधब्बे को मिटाने के लिए रीछों के राजा को हराया और स्यमन्तक मणि वापस लेकर उसे मेरेपिता को लौटा दिया।

अपने अपराध के फल से भयभीत मेरे पिता ने मुझे भगवान्‌ को प्रदानकर दिया, यद्यपि मुझे अन्यों को दिये जाने का वायदा ( वाग्दान ) किया जा चुका था।

श्रीजाम्बवत्युवाचप्राज्ञाय देहकूदमुं निजनाथदैवंसीतापतिं त्रिनवहान्यमुनाभ्ययुध्यत्‌ ।

ज्ञात्वा परीक्षित उपाहरदर्हणं मांपादौ प्रगृह्य मणिनाहममुष्य दासी ॥

१०॥

श्री-जाम्बवती उवाच-- श्री जाम्बवती ने कहा; प्राज्ञाय--अनभिज्ञ; देह--शरीर का; कृत्‌--बनाने वाला ( मेरा पिता ); अमुम्‌--उसको; निज--अपना; नाथ--स्वामी रूप; दैवमू--तथा पूज्य देव; सीता--देवी सीता के; पतिम्‌--पति को; त्रि--तीन; नव--गुणे नौ; अहानि--दिन; अमुना--उसके साथ; अभ्ययुध्यत्‌--युद्ध किया; ज्ञात्वा--पहचान कर; परीक्षित:--ठीक से जानकर;उपाहरत्‌--भेंट कर दिया; अर्हणम्‌ू--सादर भेंट तुल्य; मामू--मुझको; पादौ--उनके चरणों को; प्रगृह्य--पकड़ कर;मणिना--मणि के साथ; अहम्‌--मैं; अमुष्य--उसकी; दासी--नौकरानी |

श्री जाम्बबती ने कहा: यह न जानते हुए कि भगवान्‌ कृष्ण उन्हीं के स्वामी तथाआशध्यदेव, देवी सीता के पति हैं, मेरे पिता उनके साथ सत्ताईस दिनों तक युद्ध करते रहे।

अन्त में जब मेरे पिता को ज्ञान हुआ और उन्होंने प्रभु को पहचाना, तो उन्होंने उनके चरण पकड़ लियेऔर मुझे तथा स्यमंतक मणि दोनों को आदर के प्रतीक रूप में अर्पित कर दिया।

मैं तो प्रभु कीदासी मात्र हूँ।

श्रीकालिन्द्युवाचतपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया ।

सख्योपेत्याग्रहीत्याणिं योहं तद्गृहमार्जनी ॥

११॥

श्री-कालिन्दी उबाच-- श्री कालिन्दी ने कहा; तप:ः--तपस्या; चरन्तीम्‌--करते हुए; आज्ञाय--जानते हुए; स्व--उनके; पाद--पैरों के; स्पर्शन--स्पर्श की; आशया--इच्छा से; सख्या-- अपने मित्र ( अर्जुन ) सहित; उपेत्य--आकर; अग्रहीत्‌--ग्रहणकिया; पाणिम्‌--मेरा हाथ; यः--जो; अहम्‌--मैं; तत्‌ू-- उसके; गृह--घर की; मार्जनी--बुहारने वाली |

श्री कालिन्दी ने कहा : भगवान्‌ जानते थे कि मैं इस आशा से कठिन तपस्या कर रही हूँ किएक दिन मुझे उनके चरणकमल स्पर्श करने को मिलेंगे।

अतएव वे अपने मित्र के साथ मेरे पासआये और मेरा पाणिग्रहण किया।

अब मैं उनके महल को बुहारने वाली दासी के रूप में लगीरहती हूँ।

श्रीमित्रविन्दोवाचयो मां स्वयंवर उपेत्य विजित्य भूपान्‌निनये श्रयूथगं इवात्मबलि द्विपारि: ।

भ्रातृंश्व मेडपकुरुतः स्वपुरं अ्रियौक-स्तस्यास्तु मेडनुभवमड्स्र्यवनेजनत्वम्‌ ॥

१२॥

श्री-मित्रविन्दा उबाच-- श्री मित्रविन्दा ने कहा; य:--जो; माम्‌--मुझको; स्वयं-वरे--मेरे स्वयंवर के समय ( उत्सव जिसमेंराजकुमारी कई योग्य वरों में से पति का वरण करती है ); उपेत्य--आकर; विजित्य--हराकर; भू-पानू--राजाओंको; निन्‍्ये--ले गया; श्व--कुत्तों के; यूथ--समूह में; गम्‌--गया हुआ; इब--मानो; आत्म--निजी; बलिम्‌-- भाग को; द्विप-अरि:--हाथियों का शत्रु, सिंह; भ्रातून्‌ू-- भाइयों को; च--तथा; मे--मेरा; अपकुरुत:--उनकी निन्दा करने वाले; स्व--अपनी;पुरम--राजधानी; श्री--लक्ष्मी के; ओक:--निवास; तस्य--उसका; अस्तु--होए; मे--मेरे लिए; अनु-भवम्‌--जन्म-जन्मांतर;अद्प्रि--पाँव; अवनेजनत्वमू--प्रक्षालल करने का पद

श्री मित्रविन्दा ने कहा : मेरे स्वयंवर समारोह में वे आगे बढ़ आये, वहाँ पर उपस्थित सारेराजाओं को, जिनमें उनका अपमान करने का दुस्साहस करने वाले मेरे भाई भी थे, हरा दियाऔर मुझे उसी तरह उठा ले गये, जिस तरह सिंह कुत्तों के झुंड में से अपना शिकार उठा ले जाताहै।

इस तरह लक्ष्मीनिवास भगवान्‌ कृष्ण मुझे अपनी राजधानी में ले आये।

मैं चाहती हूँ कि मुझेजन्म-जन्मांतर उनके चरण धोने की सेवा करने का अवसर मिलता रहे।

श्रीसत्योवाचसप्तोक्षणोतिबलवीर्यसुती कण श्रुड्रान्‌पित्रा कृतान्क्षितिपवीर्यपरीक्षणाय ।

तान्वीरदुर्मदहनस्तरसा निगृहयक्रीडन्बबन्ध ह यथा शिशवोजतोकान्‌ ॥

१३॥

य इत्थं वीर्यशुल्कां मां दासीभिश्चतुरन्गिणीम्‌ ।

पथि निर्जित्य राजन्यान्निन्ये तद्ास्यमस्तु मे ॥

१४॥

श्री-सत्या उवाच-- श्री सत्या ने कहा; सप्त--सात; उक्षण:--साँड़; अति--विशाल; बल--बलवान्‌; वीर्य--तथा वीर्यवान्‌;सु--अत्यधिक; तीक्षण--पैने; श्रृड्रान्‌ू--जिनके सींगों को; पित्रा--मेरे पिता द्वारा; कृतान्‌ू--बनाये गये; क्षितिप--राजाओं के;वीर्य--पराक्रम के; परीक्षणाय--परीक्षा लेने के लिए; तानू--उन ( साँड़ों ) को; वीर--वीरों के; दुर्मद--मिथ्या अहंकार को;हनः--विनष्ट करने वाले; तरसा--फुर्ती से; निगृह्द--दमन करके; क्रीडन्‌--खेल करते हुए; बबन्ध ह--बाँध लिया; यथा--जिस तरह; शिशव: --बच्चे; अज--बकरी के; तोकान्‌--बच्चों को; यः--जो; इत्थम्‌--इस तरह; वीर्य--बहादुरी; शुल्काम्‌--मूल्य वाले; माम्‌--मुझको; दासीभि:--दासियों समेत; चतुः-अड्डिणीम्‌--चार टुकड़ियों ( रथ, घोड़े, हाथी तथा पैदल ) वालीसेना से सुरक्षित; पथि--रास्ते में; निर्जित्य--हराकर; राजन्यानू--राजाओं को; निन्‍्ये--मुझे उठा ले गये; तत्‌--उनके प्रति;दास्यम्‌--दास्य भाव; अस्तु--होए; मे--मेरा |

श्री सत्या ने कहा : मेरे पिता ने मेरे साथ पाणिग्रहण के इच्छुक राजाओं के पराक्रम कीपरीक्षा लेने के लिए घातक पैने सींगों वाले सात अत्यन्त बलशाली तथा जोशीले साँड़ों कीव्यवस्था की।

यद्यपि ये साँड़ अनेक वीरों के मिथ्या गर्व को चूर-चूर कर चुके थे, किन्तुभगवान्‌ कृष्ण ने बिना प्रयास के ही उन्हें वश में करके बाँध लिया, जिस तरह बच्चे खेल-खेल में बकरी के बच्चों को बाँध लेते हैं।

इस तरह उन्होंने मुझे अपने शौर्य के बल पर मोल ले लिया।

तत्पश्चात्‌ वे मेरे मार्ग में विरोध करने वाले सारे राजाओं को हराते हुए मुझे मेरी दासियों तथाचतुरंगिणी सेना समेत ले गये।

मेरी यही अभिलाषा है कि उन प्रभु की सेवा करने का सुअवसरमुझे प्राप्त होता रहे।

श्रीभद्रोवाचपिता मे मातुलेयाय स्वयमाहूय दत्तवान्‌ ।

कृष्णे कृष्णाय तच्चित्तामक्षौहिण्या सखीजनै: ॥

१५॥

अस्य मे पादसंस्पर्शों भवेज्जन्मनि जन्मनि ।

कर्मभिर्भ्राम्यमाणाया येन तच्छेय आत्मन: ॥

१६॥

श्री-भद्रा उबाच-- श्री भद्रा ने कहा; पिता--पिता ने; मे--मेरे; मातुलेयाय--मेरे मामा के पुत्र को; स्वयम्‌--स्वेच्छा से;आहूय--बुलाकर; दत्तवान्‌--दिया; कृष्णे--हे कृष्णा ( द्रौपदी ); कृष्णाय--भगवान्‌ कृष्णको; तत्‌--जिसमें समाया;चित्तामू--जिसका हृदय; अक्षौहिण्या--एक अक्षौहिणी सैनिक रक्षक सहित; सखी-जनैः--अपनी सखियों के साथ; अस्य--उसका; मे--मेरे लिए; पाद--पाँवों का; संस्पर्श:--स्पर्श; भवेत्‌--शायद हो; जन्मनि जन्मनि--जन्म-जन्मांतर तक; कर्मभि:--भौतिक कार्यों के फलस्वरूप; भ्राम्यमाणाया:--जो घूम रहा होगा; येन--जिससे; तत्‌--वह; श्रेयः--चरम सिद्धि; आत्मन:--अपने को।

श्री भद्रा ने कहा : हे द्रौपदी, मेरे पिता ने स्वयं ही मेरे मामा के पुत्र कृष्ण को बुलाया था,जिन्हें में पहले ही अपना हृदय सौंप चुकी थी और उन्होंने मुझे उनकी दुलहन के रूप में अर्पितकर दिया।

मेरे पिता ने मेरे साथ उन्हें एक अक्षौहिणी सैन्य रक्षक और मेरी सखियों की एकटोली भी दी थी।

मेरी चरम सिद्धि यही होगी कि जब मैं अपने कर्म से बँध कर एक जन्म सेदूसरे जन्म में भ्रमण करूँ, तो मुझे भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमलों को स्पर्श करने की अनुमतिसदैव मिलती रहे।

श्रीलक्ष्मणोवाचममापि राज्ञ्यच्युतजन्मकर्मश्र॒त्वा मुहुर्नारदगीतमास ह ।

चित्तं मुकुन्दे किल पद्महस्तयावृतः सुसम्मृश्य विहाय लोकपान्‌ ॥

१७॥

श्री-लक्ष्मणा उबाच-- श्री लक्ष्मणा ने कहा; मम--मेरा; अपि-- भी; राज्ञि--हे रानी; अच्युत--भगवान्‌ कृष्ण के; जन्म--जन्मों; कर्म--तथा कर्मो के विषय में; श्रुत्वा--सुन कर; मुहुः--बारम्बार; नारद--नारदमुनि द्वारा; गीतमू--उच्चारित; आसह--बन गया; चित्तम्‌-मेरा हृदय; मुकुन्दे--मुकुन्द पर ( टिका ); किल--निस्सन्देह; पढ्य-हस्तया--हाथ में पढ्य धारण कियेलक्ष्मी द्वारा; वृत:--चुनी हुई; सु--सावधानीपूर्वक; सम्मृश्य--विचार करके; विहाय--त्याग कर; लोक--लोकों के; पान्‌--शासकगण को।

श्री लक्ष्मणा ने कहा : हे रानी, मैंने नारद मुनि को भगवान्‌ अच्युत के अवतारों तथा कार्योंकी बारम्बार महिमा गाते सुना और इस तरह मेरा मन भी उन्हीं भगवान्‌ मुकुन्द के प्रति आसक्तहो गया।

दरअसल, देवी पद्महस्ता ने विविध लोकों पर शासन करने वाले बड़े बड़े देवताओं कोतिरस्कृत करके काफी ध्यानपूर्वक विचार करने के बाद, उन्हें अपने पति के रूप में चुना है।

ज्ञात्वा मम मतं साध्वि पिता दुहितृवत्सल: ।

बृहत्सेन इति ख्यातस्तत्रोपायमचीकरत्‌ ॥

१८॥

ज्ञात्वा--जान कर; मम--मेरी; मतम्‌--मानसिकता; साध्वि--हे साधु स्वभाव वाली स्त्री; पिता--मेरा पिता; दुहितृ--अपनीपुत्री के प्रति; वत्सल:--स्नेही; बृहत्सेन: इति ख्यात:ः--बृहत्सेन के रूप में विख्यात; तत्र--उस दिशा में; उपायम्‌--साधन की;अचीकरत्‌--व्यवस्था कर दी।

मेरे पिता बृहत्सेन स्वभाव से अपनी पुत्री के ऊपर अनुकम्पावान थे और हे साध्वी, यहजानते हुए कि मैं कैसा अनुभव कर रही हूँ, उन्होंने मेरी इच्छा पूरी करने की व्यवस्था कर दी।

यथा स्वयंबरे राज्ञि मत्स्य: पार्थेप्सया कृतः ।

अयं तु बहिराच्छन्नो हृश्यते स जले परम्‌ ॥

१९॥

यथा--जिस तरह; स्वयम्‌-वरे--( तुम्हारे ) स्वयंवर में; राज्ि--हे रानी; मत्स्य:--एक मछली; पार्थ--अर्जुन को; ईप्सया--प्राप्तकरने की इच्छा से; कृत:--( लक्ष्य ) बनाया; अयम्‌--यह ( मछली ); तु--किन्तु; बहि:ः--बाहर से; आच्छन्न:--ढकी;हृश्यते--देखा जा सकता था; सः--वह; जले--जल में; परम्‌--एकमात्र |

है रानी, जिस तरह आपके स्वयंवर समारोह में एक मछली का प्रयोग लक्ष्य के तौर पर यहनिश्चित करने के लिए हुआ था कि आप अर्जुन को पति रूप में पा सकें, उसी तरह मेरे स्वयंवरमें भी एक मछली का ही प्रयोग हुआ।

किन्तु मेरे संबंध में यह मछली चारों ओर से ढक दी गईथी और नीचे रखे जल-पात्र में इसका प्रतिबिम्ब ही देखा जा सकता था।

श्र॒त्वैतत्सर्वती भूषा आययुर्मत्पितु: पुरम्‌ ।

सर्वास्त्रशस्ल्रतत्त्वज्ञा: सोपाध्याया: सहसत्रशः ॥

२०॥

श्रुत्वा--सुनकर; एतत्‌--इसके ; सर्वतः--चारों ओर से; भू-पा:--राजागण; आययु: --आये; मत्‌--मेरे; पितु:--पिता के;पुरमू--नगर में; सर्व--समस्त; अस्त्र--तीर जैसे हथियार; शस्त्र--तथा अन्य हथियार; तत्त्व--विज्ञान के; ज्ञाः--कुशल ज्ञाता;स--सहित; उपाध्याया: --अपने अपने गुरुओं; सहस्त्रश:--हजारों में |

यह सुन कर बाण चलाने तथा अन्य हथियारों को उपयोग में लाने में दक्ष हजारों राजा अपनेसैन्य शिक्षकों के साथ मेरे पिता के नगर में सभी दिशाओं से एकत्र हुए।

पित्रा सम्पूजिता: सर्वे यथावीर्य यथावय: ।

आददुः सशरं चाप॑ं वेद्धूं पर्षदि मद्धियः ॥

२१॥

पित्रा--मेरे पिता द्वारा; सम्पूजिता:--पूर्णतया आदरित; सर्वे--सारे जन; यथा--अनुरूप; वीर्यम्‌ू--शक्ति के; यथा--अनुरूप;वयः--आयु के; आददु:--उठा लिया; स--सहित; शरमू--बाण; चापम्‌-- धनुष; वेद्धुमू--( लक्ष्य ) बेधने के लिए; पर्षदि--सभा में; मत्‌--मुझ पर ( स्थिर ); धिय:--मनों वाले।

मेरे पिता ने हर राजा को उसके बल तथा वरिष्ठता के अनुसार उचित सम्मान दिया।

तब जिनलोगों के मन मुझ पर टिके थे, उन्होंने अपना धनुष-बाण उठाया और सभा के मध्य एक-एककरके, लक्ष्य को बेधने का प्रयत्न करने लगे।

आदाय व्यसृजन्केचित्सज्यं कर्तुमनीश्वरा: ।

आकोष्ड ज्यां समुत्कृष्य पेतुरेके उमुनाहता: ॥

२२॥

आदाय--उठाकर; व्यसृजन्‌--जाने दिया; केचित्‌--उनमें से कुछ ने; सज्यम्‌--डोरी; कर्तुम्‌--चढ़ाने में; अनी श्वरा: --असमर्थ ;आ-कोष्ठम्‌--( धनुष के ) सिरे तक; ज्याम्‌--धनुष की डोरी को; समुत्कृष्य--खींच कर; पेतु:--गिर पड़े; एके--कुछ;अमुना--इस ( धनुष ) से; हताः--चोट खाये

उनमें से कुछ ने धनुष उठाया, किन्तु उसकी डोरी नहीं चढ़ा सके, अतएवं हताश होकरउन्होंने उसे एक ओर फेंक दिया।

कुछ ने धनुष की डोरी को धनुष के एक सिरे तक खींच तोलिया, किन्तु इससे धनुष पीछे उछला और उन्हें ही जमीन पर पटक दिया।

सज्यं कृत्वापरे वीरा मागधाम्बष्ठचेदिपा: ।

भीमो दुर्योधन: कर्णो नाविदंस्तदवस्थितिम्‌ ॥

२३॥

सज्यम्‌-साज; कृत्वा--करके; अपरे--अन्य; वीरा: --वीर पुरुष; मागध--मगध का राजा ( जरासन्ध ); अम्बष्ठ--अम्बष्ठ काराजा; चेदि-पा:--चेदि का शासक ( शिशुपाल ); भीम: दुर्योधन: कर्ण:--भीम, दुर्योधन तथा कर्ण; न अविदन्‌--नहीं ढूँढ़पाये; तद्‌ू--इस ( लक्ष्य ) की; अवस्थितिम्‌--स्थिति, स्थान।

कुछ वीर यथा जरासन्ध, शिशुपाल, भीम, दुर्योधन, कर्ण तथा अम्बष्ठराज धनुष पर डोरीचढ़ाने में सफल तो रहे, किन्तु इनमें से कोई भी लक्ष्य को ढूँढ़ नहीं सका।

मत्स्याभासं जले वीक्ष्य ज्ञात्वा च तदवस्थितिम्‌ ।

पार्थो यत्तोसृजद्वाणं नाच्छिनत्पस्पृशे परम्‌ ॥

२४॥

मत्स्य--मछली की; आभासम्‌--परछाईं; जले--जल में; वीक्ष्य--देखकर; ज्ञात्वा--जान कर; च--तथा; तत्‌--उसकी;अवस्थितिम्‌--स्थिति; पार्थ: --अर्जुन ने; यत्त:--सावधानी से निशाना लगाते हुए; असृजत्‌--छोड़ा; बाणमू--बाण; नअच्छिनत्‌--बेधा नहीं; पस्पृशे--छुआ; परम्‌--केवल |

तब अर्जुन ने जल में मछली की परछाईं की ओर देखा और उसकी स्थिति निर्धारित की।

किन्तु जब उसने सावधानी से उस पर अपना बाण छोड़ा, तो वह लक्ष्य को बेध नहीं पाया,अपितु मात्र उसको स्पर्श करके निकल गया।

राजन्येषु निवृत्तेषु भग्नमानेषु मानिषु ।

भगवान्धनुरादाय सज्यं कृत्वाथ लीलया ॥

२५॥

तस्मिन्सन्धाय विशिखं मत्स्यं वीक्ष्य सकृज्जले ।

छित्त्वेषुणापातयत्तं सूर्य चाभिजिति स्थिते ॥

२६॥

राजन्येषु--जब राजाओं ने; निवृत्तेषु--त्याग दिया; भग्न--पराजित; मानेषु--जिनका गर्व; मानिषु--घमंडी; भगवान्‌-- भगवान्‌ने; धनु:-- धनुष; आदाय--लेकर; सज्यम्‌ कृत्वा--डोरी चढ़ाकर; अथ--तब; लीलया--खेल-खेल में; तस्मिन्‌--उसमें;सन्धाय--स्थिर करके; विशिखम्‌--बाण; मत्स्यम्‌ू--मछली को; वीक्ष्य--देखकर; सकृत्‌ू--केवल एक बार; जले--जल में;छित्त्वा-- भेद कर; इषुणा--बाण से; अपातयत्‌--गिरा दिया; तम्‌ू--उसको; सूर्ये--जब सूर्य; च--तथा; अभिजिते--अभिजित नक्षत्र में; स्थिते--स्थित |

जब सारे दम्भी राजाओं का घमंड चूर-चूर हो गया और उन्होंने यह प्रयास त्याग दिया, तोपूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ ने धनुष उठाया, आसानी से डोरी चढ़ाई और तब उस पर बाण स्थिरकिया।

ज्योंही सूर्य अभिजित नक्षत्र में आया, तो उन्होंने जल में मछली को केवल एक बार देखाऔर फिर उसे बाण से बेध कर जमीन पर गिरा दिया।

दिवि दुन्दुभयो नेदुर्जयशब्दयुता भुवि ।

देवाश्व कुसुमासारान्मुमुचुहर्षविह्लला: ॥

२७॥

दिवि--आकाश् में; दुन्दुभय:--दुन्दुभियाँ; नेदु:-- ध्वनि करने लगीं; जय--विजय; शब्द-- ध्वनि; युता:--के साथ; भुवि--पृथ्वी पर; देवा:--देवतागण; च--तथा; कुसुम--फूलों की; आसारान्‌--वर्षा; मुमुचु:--उन्मुक्त की; हर्ष--हर्ष से; विहला:--विहल।

आकाश में दुन्दुभियाँ बजने लगीं और पृथ्वी पर लोग जय! जय! की ध्वनि करने लगे।

देवताओं ने अति प्रसन्न होकर फूल बरसाये।

तद्रड्रमाविशमहं कलनुूपुराभ्यांपदभ्यां प्रगृहा 'कनकोइज्वलरलमालाम्‌ ॥

नूत्ने निवीय परिधाय च कौशिकाछयेसक्रीडहासवदना कवरीधृतस्त्रकू ॥

२८॥

तत्‌--तब; रड्डमू--रंगशाला में; आविशम्‌--प्रविष्ट हुई; अहम्‌-मैं; कल--मधुर ध्वनि करते; नूपुराभ्याम्‌--नूपुरों से;पदभ्याम्‌-पाँवों से; प्रगृह्य-- पकड़ कर; कनक--सोने के; उज्वल--चमकीले; रत्त--रलों से; मालाम्‌--हार; नूत्ले-- नवीन;निवीय--करधनी से बाँध कर; परिधाय--पहन कर; च--तथा; कौशिक --रेशमी वस्त्रों की जोड़ी; अछये --उत्तम; स-ब्रीड--लज्जालु; हास--हँसी से युक्त; वदना--मुख वाली; कवरी--बालों का गुच्छा; धृत-- धारण किये; सत्रकू--फूलों की माला।

तभी मैं रंगशाला में गई।

मेरे पाँवों के नूपुर मन्द ध्वनि कर रहे थे।

मैं उत्तम कोटि के रेशमके नये वस्त्र पहने थी, जिसके ऊपर करधनी बँधी थी और मैं सोने तथा रत्नों से बना चमकीलाहार धारण किये थी।

मेरे मुख पर लजीली मुसकान थी और मेरे बालों में फूलों की माला थी।

उन्नीय वक्त्रमुरुकुन्तलकुण्डलत्विड्‌-गण्डस्थलं शिशिरहासकटाक्षमोक्षे: ।

राज्ञो निरीक्ष्य परितः शनकैर्मुरारे-रंसेनुरक्तहदया निदधे स्वमालाम्‌ ॥

२९॥

उन्नीय--उठाकर; वक्त्रमू-मुखमंडल; उरु--प्रचुर; कुन्तल--बालों के गुच्छों से; कुण्डल--कान के आशभूषणों के; त्विट्‌--तथा तेज से; गण्ड-स्थलमू--गाल; शिशिर--शीतल; हास--हँसी से युक्त; कट-अक्ष--तिरछी चितवनों के; मोक्षैः--डालनेसे; राज्ञ:--राजाओं को; निरीक्ष्य--देख कर; परित:--चारों ओर; शनकै :--धीरे-धीरे; मुरारेः--कृष्ण के; अंसे--कंधे पर;अनुरक्त--आकृष्ट; हृदया--हृदय वाली; निदधे--मैंने पहना दिया; स्व--अपना; मालाम्‌--गले का हार

मैंने अपना सिर उठाया, जो मेरे प्रचुर बालों के गुच्छों तथा मेरे गालों से परावर्तित मेरेकुण्डलों की चमक के तेज से घिरा था।

मैंने शान्त भाव से मन्द-हास के साथ इधर-उधर दृष्टिफेरी।

तब चारों ओर सारे राजाओं को देखते हुए, मैंने धीरे से हार को मुरारी के कन्धों ( गले )पर डाल दिया, जिसने मेरे मन को हर रखा था।

तावन्मृदड्भपटहा: शब्डुभेय्यानकादय: ।

निनेदुर्नटनर्तक्यो ननृतुर्गायका जगु; ॥

३०॥

तावत्‌--तभी; मृदड़-पटहा: --मृदंग तथा पटह; शद्बु--शंख; भेरी--दुन्दुभी; आनक--बड़े बड़े सैन्य नगाड़े; आदय:--इत्यादि; निनेदु:--गूँजने लगे; नट--पुरुष नर्तक; नर्तक्य:--तथा नर्तकियाँ; ननृतु:--नाचने लगीं; गायका:--गाने वाले;जगु:--गाने लगे।

तभी शंखों तथा मृदंग, पटह, भेरी और आनक नगाड़ों एवं अन्य वाद्य जोर-जोर से बजनेलगे।

नट तथा नर्तकियाँ नाचने लगे और गवैये गाने लगे।

एवं वृते भगवति मयेशे नृपयूथपा: ।

न सेहिरे याज्ञसेनि स्पर्धन्तो हच्छयातुरा: ॥

३१॥

एवमू--इस प्रकार; वृते--चुने जाने पर; भगवति-- भगवान्‌ के ; मया--मेरे द्वारा; ईशे--स्वामी; नृप--राजाओं के; यूथ-पा:--नायक; न सेहिरे--सहन नहीं कर सके; याज्ञसेनि--हे द्रौपदी; स्पर्धन्त:--लड़ते-झगड़ते; हत्‌-शय--काम द्वारा; आतुरा:--पीड़ित |

हे द्रौपदी, मेरे द्वारा भगवान्‌ का चुना जाना प्रमुख राजाओं को सहन नहीं हो सका।

वेकामातुर होने के कारण लड़ने-झगड़ने लगे।

मां तावद्रथमारोप्य हयरलचतुष्टयम्‌ ।

शाइ़मुद्यम्य सन्नद्धस्तस्थावाजौ चतुर्भुजः ॥

३२॥

माम्‌--मुझको; तावत्‌--उस समय; रथम्‌--रथ पर; आरोप्य--चढ़ाकर; हय--घोड़ों में; रतत--रतल; चतुष्टयम्‌--चार;शार्डमू--शार्ड़् नामक अपना धनुष; उद्यम्य--तैयार करके; सन्नद्ध:--कवच पहन कर; तस्थौ--खड़े रहे; आजौ--युद्धभूमि में;चतु:--चार; भुज:--भुजाओं वाले।

तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ ने मुझे चार अतीव उत्तम घोड़ों से खींचे जाने वाले अपने रथ में बिठालिया।

अपना कवच पहन कर तथा अपना शार्ड्र धनुष तैयार करके, वे रथ पर खड़े हो गये औरयुद्धभूमि में उन्होंने अपनी चार भुजाएँ प्रकट कीं।

दारुकश्लोदयामास काञ्जनोपस्करं रथम्‌ ।

मिषतां भूभुजां राज्ञि मृगाणां मृगराडिव ॥

३३॥

दारुकः--दारुक ( कृष्ण के सारथी ) ने; चोदयाम्‌ आस--हाँक दिया; काझ्जनन--सोने के; उपस्करम्‌--किनारों वाला; रथम्‌--रथ; मिषताम्‌--उनके देखते-देखते; भू-भुजाम्‌--राजाओं के; राज्ञि--हे रानी; मृगाणाम्‌ू--पशुओं के; मृग-राट्‌--पशुओं काराजा, सिंह; इब--सहृश |

हे रानी, सारथी दारुक राजाओं के देखते-देखते भगवान्‌ के सुनहरे किनारों वाले रथ कोउसी तरह हाँक ले गया, जिस तरह छोटे छोटे पशु निस्सहाय होकर सिंह को देखते रह जाते हैं।

तेडन्वसज्जन्त राजन्या निषेद्धुं पथि केचन ।

संयत्ता उद्धृतेष्वासा ग्रामसिंहा यथा हरिम्‌ ॥

३४॥

ते--वे; अन्वसजन्त--पीछा करते हुए; राजन्या:--राजागण; निषेद्धुमू--रोकने के लिए; पथि--रास्ते में; केचन--उनमें सेकुछ; संयत्ता:--सन्नद्ध; उद्धृत--उठे हुए; इषु-आसा:--बाणों वाले; ग्राम-सिंहा--गाँव के शेर ( कुत्ते ); यथा--जिस तरह;हरिमू-सिंह को |

राजाओं ने भगवान्‌ का पीछा किया, जिस तरह सिंह का पीछा गाँव के कुत्ते करते हैं।

कुछराजा अपने धनुष उठाये हुए, उन्हें जाने से रोकने के लिए मार्ग में आ डटे।

ते शार्ड्चच्युतबाणौघै: कृत्तबाह्नड्प्रिकन्धरा: ।

निपेतु: प्रधने केचिदेके सन्त्यज्य दुद्ग॒ुवु:; ॥

३५॥

ते--वे; शार्ड्र--कृष्ण के धनुष से; च्युत--छोड़े गये, निकले; बाण--बाणों की; ओघै:--बाढ़ से; कृत्त--घायल; बाहु--बाहुओं वाले; अड्घ्रि--पैर; कन्धरा:--तथा गर्दनें; निपेतु:--गिरा दिया; प्रधने--युद्धस्थल में; केचित्‌--कुछ; एके --कुछ;सन्‍्त्यज्य--त्याग कर; दुद्गुव:-- भाग गये।

ये योद्धा भगवान्‌ के शार्ड् धनुष द्वारा छोड़े गये बाणों से अभिभूत हो गये।

कुछ राजाओंकी भुजाएँ, टांगें तथा गर्दनें कट गईं और वे युद्धभूमि में गिर पड़े।

शेष लड़ना छोड़ कर भागगये।

ततः पुरी यदुपतिरत्यलड्डू तांरविच्छदध्वजपटचित्रतोरणाम्‌ ।

कुशस्थलीं दिवि भुवि चाभिसंस्तुतांसमाविशत्तरणिरिव स्वकेतनम्‌ ॥

३६॥

ततः--तब; पुरीम्‌--नगरी; यदु-पति:--यादवों के स्वामी; अति--अत्यधिक; अलछड्डू तामू--अलंकृत; रवि--सूर्य; छद--रोकते हुए; ध्वज--दंडों पर; पट--पताकाओं समेत; चित्र--विचित्र; तोरणाम्‌--तथा तोरण से युक्त; कुशस्थलीम्‌--द्वारका;दिवि--स्वर्ग में; भुवि--पृथ्वी पर; च--तथा; अभिसंस्तुताम्‌-प्रशंसित; समाविशत्‌-- प्रवेश किया; तरणि:--सूर्य; इब--सहश; स्व--अपने; केतनम्‌--धाम में |

तब यदुपति ने अपनी राजधानी कुशस्थली (द्वारका ) में प्रवेश किया, जो स्वर्ग में तथापृथ्वी पर प्रशंसित है।

नगर को पताकाओं से युक्त दंडों से सजाया गया था, जो सूर्य को ढक देरहे थे तथा शानदार तोरण भी लगाये गये थे।

जब कृष्ण ने प्रवेश किया, तो वे ऐसे लग रहे थे,मानो सूर्य देव अपने धाम में प्रवेश कर रहे हों ।

पिता मे पूजयामास सुहृत्सम्बन्धिबान्धवान्‌ ।

महाईवासोउलड्डारैः शय्यासनपरिच्छदै: ॥

३७॥

पिता--पिता ने; मे--मेरे; पूजयाम्‌ आस--पूजा की; सुहत्‌--अपने मित्रों; सम्बन्धि--सम्बन्धी लोगों; बान्धवान्‌--तथा अन्यपारिवारिक सदस्यों की; महा--अत्यन्त; अर्ह--मूल्यवान; वास: --वस्त्रों; अलड्डारै:--तथा आभूषणों से; शब्या--पलंग;आसन--सिंहासन; परिच्छदैः--तथा अन्य साज-सामान से |

मेरे पिताजी ने अपने मित्रों, परिवार वालों तथा मेरे ससुराल वालों का सम्मान बहुमूल्यवस्त्रों, आभूषणों, राजसी पलंगों, सिंहासनों तथा अन्य साज-सामग्री से किया।

दासीभि: सर्वसम्पद्धिर्भटेभरथवाजिभि: ।

आयुधानि महाहाणि ददौ पूर्णस्य भक्तित: ॥

३८ ॥

दासीभि:--दासियों के साथ; सर्व--समस्त; सम्पद्धि:ः--धन से; भट--पैदल सिपाहियों से; इभ--हाथी पर सवार सैनिकों से;रथ--रथ पर सवार सैनिकों से; वाजिभि: --तथा घोड़े पर सवार सैनिकों से; आयुधानि--हथियार; महा-अर्हाणि-- अत्यन्तमूल्यवान; ददौ--दिया; पूर्णस्य--परम पूर्ण भगवान्‌ को; भक्तित:--भक्तिवश |

उन्होंने परमपूर्ण भगवान्‌ को भक्तिपूर्वक अनेक दासियाँ दीं, जो बहुमूल्य आभूषणों सेअलंकृत थीं।

इन दासियों के साथ अंगरक्षक थे, जिनमें से कुछ पैदल थे, तो कुछ हाथियों, रथोंऔर घोड़ों पर सवार थे।

उन्होंने भगवान्‌ को अत्यन्त मूल्यवान हथियार भी दिये।

आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिका: ।

सर्वसड्निवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥

३९॥

आत्म-आरामस्य--आत्पमतुष्ट की; तस्य--उस; इमा:--ये; वयम्‌--हम; वै--निस्सन्देह; गृह--घर में; दासिका:--दासियाँ;सर्व--सभी; सड़-- भौतिक संगति के; निवृत्त्या--परित्याग से; अद्धा-प्रत्यक्ष; तपसा--तपस्या द्वारा; च--तथा; बभूविम--बन गई हैं।

इस तरह समस्त भौतिक संगति का परित्याग करके तथा तपस्या करके, हम सारी रानियाँआत्माराम भगवान्‌ की दासियाँ बन चुकी हैं।

महिष्य ऊचुःभौम॑ निहत्य सगणं युधि तेन रुद्धाज्ञात्वाथ नः क्षितिजये जितराजकन्या: ।

निर्मुच्य संसृतिविमो क्षमनुस्मरन्ती:पादाम्बुजं परिणिनाय य आप्तकाम: ॥

४०॥

महिष्य: ऊचु:--( अन्य ) रानियों ने कहा; भौमम्‌-- भौम असुर को; निहत्य--मार कर; स--सहित; गणम्‌--अपने अनुचरों के;युधि--युद्ध में; तेन--उस ( भौम ) के द्वारा; रुद्धा:--बन्दी बनाई; ज्ञात्वा--जान कर; अथ--तब; न:ः--हमको; क्षिति-जये --( भौम द्वारा ) पृथ्वी पर विजय के समय; जित--पराजित; राज--राजाओं की; कन्या:--पुत्रियों को; निर्मुच्य--छुड़ाकर;संसृति--संसार से; विमोक्षम्‌--मोक्ष ( के स्त्रोत ); अनुस्मरन्ती:--निरन्तर स्मरण करती हुई; पाद-अम्बुजम्‌--उनके चरणकमल;'परिणिनाय--विवाह किया; यः--जो; आप्त-काम:--जिनकी सारी इच्छाएँ पहले से पूर्ण हो चुकी हैं।

अन्य रानियों की ओर से रोहिणीदेवी ने कहा : भौमासुर तथा उसके अनुयायियों का वधकरने के बाद भगवान्‌ ने हमें उस असुर के बन्दीगृह में पाया और वे यह समझ गये कि हम उन राजाओं की कनन्‍्याएँ हैं, जिन्हें भौम ने पृथ्वी पर विजय करते समय पराजित किया था।

भगवान्‌ने हमें बन्दी-गृह से मुक्त कराया और चूँकि हम भौतिक बन्धन से मोक्ष के स्रोत उन भगवान्‌ केचरणकमलों का निरन्तर ध्यान करती रही थीं, इसलिए वे हमसे विवाह करने के लिए राजी होगये, यद्यपि उनकी हर इच्छा पहले से पूरी रहती है।

न वयं साध्वि साम्राज्यं स्वाराज्यं भौज्यमप्युत ।

वैराज्यं पारमेछ्यं च आनन्त्यं वा हरे: पदम्‌ ॥

४१॥

कामयामह एतस्य श्रीमत्पादरजः थ्रियः ।

कुचकुड्डू मगन्धाढय॑ मूर्ध्ना वोढुं गदाभूत:ः ॥

४२॥

न--नहीं; वयम्‌--हम; साध्वि--हे सन्त स्वभाव वाली ( द्रौपदी ); साप्राज्यमू--समस्त पृथ्वी पर शासन; स्वा-राज्यम्‌ू--स्वर्ग केराजा इन्द्र का पद; भौज्यम्‌-- भोग की असीम शक्ति; अपि उत-- भी; वैराज्यम्‌--योगशक्ति; पारमेष्ठयम्‌--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टाब्रह्म का पद; च--तथा; आनन्‍्त्यम्‌--अमरता; वा--अथवा; हरेः-- भगवान्‌ के; पदम्‌-- धाम की; कामयामहे --कामना करतीहैं; एतस्थय--उनके; श्री-मत्‌--दैवी; पाद--पैरों की; रज:-- धूल; थ्रियः--लक्ष्मी के; कुच--स्तन से; कुड्डु म--सुगन्धित चूर्णकी; गन्ध--सुगन्ध से; आढ्यम्‌--समृद्ध, युक्त; मूर्ध्न--अपने सिरों पर; बोढुमू-- धारण करने के लिए; गदाभूत:--गदा चलानेवाले भगवान्‌ कृष्ण के |

हे साध्वी, हमें पृथ्वी पर शासन, इन्द्र का पद, भोग की असीम सुविधा, योगशक्ति, ब्रह्मा कापद, अमरता या भगवद्धाम प्राप्त करने की भी इच्छा नहीं है।

हम केवल इतना ही चाहती हैं किभगवान्‌ कृष्ण के उन चरणों की यशस्वी धूल को अपने सिर पर धारण करें, जो उनकी प्रियतमाके स्तन के कुंकुम की सुगन्धि से युक्त है।

ब्रजस्त्रियो यद्वाउछन्ति पुलिन्द्स्तृणवीरुध: ।

गावश्चारयतो गोपा: पदस्पर्श महात्मन:ः ॥

४३॥

ब्रज--ब्रज की; स्त्रियः--स्त्रियाँ; यत्‌--जैसा; वाउ्छन्ति--चाहती हैं; पुलिन्द्यः--ब्रज में पुलिन्द आदिवासी स्त्रियाँ; तृण--घास;वीरुध:--तथा पौधों से; गाव:--गौवें; चारयत:ः--चराने वाले; गोपा:--ग्वालबाल; पाद--पाँवों के; स्पर्शम्‌--स्पर्श; महा-आत्मन:--परमात्मा के

हम भगवान्‌ के चरणों का वही स्पर्श चाहती हैं, जो ब्रज की तरुणियों, ग्वालबालों तथाआदिवासिनी पुलिन्द स्त्रियाँ चाहती हैं--वह है, भगवान्‌ द्वारा अपनी गौवें चराते समय पौधोंतथा घास पर उनके द्वारा, छोड़ी गई धूल का स्पर्श ।

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