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अध्याय चौरासी: कुरूक्षेत्र में ऋषियों की शिक्षा
10.84श्रीशुक उवाचश्रुत्वा पृथा सुबलपुत्रथथ याज्ञसेनीमाधव्यथ क्षितिपपत्नय उत स्वगोप्य: ।
कृष्णेखिलात्मनि हरौ प्रणयानुबन्धंसर्वा विसिस्म्युरलमश्रुकलाकुलाक्ष्य: ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; श्रुत्वा--सुनकर; पृथा--कुन्ती; सुबल-पुत्री --सुबल की पुत्री गान्धारी; अथ--तथा; याज्ञसेनी--द्रौपदी; माधवी --सुभद्रा; अथ--तथा; क्षिति-प--राजाओं की; पत्य: --पत्नियाँ; उत-- भी; स्व--( भगवान्कृष्ण की ) निजी; गोप्य:--गोपियाँ; कृष्णे--कृष्ण को; अखिल--सबों के; आत्मनि--आत्मा; हरौ-- भगवान् हरि को;प्रणय--प्रेममय; अनुबन्धम्--आसक्ति; सर्वा:--सभी; विसिस्म्यु:--विस्मित हुईं; अलम्ू--अत्यधिक; अश्रु-कल--आँसुओंसे; आकुल-पूर्ण ; अक्ष्य:--नेत्रों वाली |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : पृथा, गान्धारी, द्रौपदी, सुभद्रा, अन्य राजाओं की पत्नियाँ तथाभगवान् की ग्वालिन सखियाँ सभी जीवों के आत्मा तथा भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उनकीरानियों के अगाध प्रेम को सुनकर चकित थीं और उनके नेत्रों में आँसू डबडबा आये थे।
इति सम्भाषमाणासु स्त्रीभि: स्त्रीषु नृभिर्नषु ।
आययुर्मुनयस्तत्र कृष्णरामदिदक्षया ॥
२॥
द्वैषायनो नारदश्व च्यवनो देवलोडसित: ।
विश्वामित्र: शतानन्दो भरद्वाजोथ गौतम: ॥
३॥
राम: सशिष्यो भगवान्वसिष्ठो गालवो भृगु: ।
पुलस्त्य: कश्यपोडत्रिश्व मार्कण्डेयो बृहस्पति: ॥
४॥
द्वितस्त्रितश्चेकतश्च ब्रह्मपुत्रास्तथाड्रिरा: ।
अगस्त्यो याज्ञवल्क्यश्च वामदेवादयोपरे ॥
५॥
इति--इस प्रकार; सम्भाषमाणासु--बात करती हुईं; स्त्रीभि:--स्त्रियों के साथ; स्त्रीषु--स्त्रियाँ; नृभि:ः--पुरुषों के साथ; नृषु--पुरुष; आययु:--आ गये; मुनयः--मुनिगण; तत्र--वहाँ पर; कृष्ण-राम--कृष्ण तथा बलराम का; दिददक्षया--दर्शन करने कीइच्छा से; द्वैपायन:--द्वैपायन वेद॒व्यास; नारद: --नारद; च--तथा; च्यवन: देवल: असित:--च्यवन, देवल तथा असित;विश्वामित्र: शतानन्द:--विश्वामित्र तथा शतानन्द; भरद्वाज: अथ गौतम: --भरद्वाज तथा गौतम; राम:--परशुराम; स--सहित;शिष्य:--उनके शिष्यगण; भगवान्--भगवान्; वसिष्ठ: गालव: भूगुः--वसिष्ठ, गालव तथा भृगु; पुलस्त्य: कश्यप: अत्रि: च--पुलस्त्य, कश्यप तथा अत्रि; मार्कण्डेय: बृहस्पति:ः--मार्कण्डेय तथा बृहस्पति; द्वित: त्रित: च एकत:ः च-द्वित, त्रित तथा एकत;ब्रह्म-पुत्रा:--ब्रह्मा के पुत्र ( सनक, सनत, सननन््द तथा सनातन ); तथा--और; अड्डिरा:--अंगिरा; अगस्त्य: याज्ञवल्क्य: च--अगस्त्य तथा याज्ञवल्क्य; वामदेव-आदय:--वामदेव इत्यादि; अपरे--अन्य मुनि |
जब स्त्रियाँ स्त्रियों से और पुरुष पुरुषों से परस्पर बातें कर रहे थे, तो अनेक मुनिगण वहाँआ पधारे।
वे सभी के सभी कृष्ण तथा बलराम का दर्शन पाने के लिए उत्सुक थे।
इनमेंद्वैषायन, नारद, च्यवन, देवल तथा असित, विश्वामित्र, शतानन्द, भरद्वाज तथा गौतम, परशुरामतथा उनके शिष्य, वसिष्ठ, गालव, भृगु, पुलस्त्य तथा कश्यप, अत्रि, मार्कण्डेय तथा बृहस्पति,द्वित, त्रित, एकत तथा चारों कुमार एवं अंगिरा, अगस्त्य, याज्ञवल्क्य तथा वामदेव सम्मिलित थे।
तान्हष्ठा सहसोत्थाय प्रागासीना नृपादय:ः ।
पाण्डवा: कृष्णरामौ च प्रणेमुर्विश्चवन्दितानू ॥
६॥
तानू--उनको; हृश्रा--देखकर; सहसा--तुरन्त; उत्थाय--उठकर; प्राकू--अभी तक; आसीना:--बैठे हुए; नृप-आदय:--राजातथा अन्य लोग; पाण्डवा:--पाँचों पाण्डव; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम; च--भी; प्रणेमु:--प्रणाम किया; विश्व--विश्व-भर के द्वारा; वन्दितान्ू--सम्मानितों को |
ज्योंही, उन्होंने मुनियों को आते देखा, सारे राजा तथा अन्य लोग, जो वहाँ बैठे थे, तुरन्त उठखड़े हुए, जिनमें पाँचों पाण्डव तथा कृष्ण एवं बलराम भी थे।
तब सबों ने उन विश्ववन्द्य मुनियोंको प्रणाम किया।
तानानर्चुर्यथा सर्वे सहरामोच्युतोर्चयत् ।
स्वागतासनपाद्यार्ष्यमाल्यधूपानुलेपने: ॥
७॥
तानू--उनको; आनर्चु:--उन्होंने पूजा की; यथा--उचित रीति से; सर्वे--उन सबों की; सह-राम--बलराम सहित; अच्युतः--तथा कृष्ण ने; अर्चयत्--उनकी पूजा की; स्व्ू-आगत--स्वागत; आसन--बैठने के स्थान; पाद्य--पाँव धोने के लिए जल;अर्घ्य--पीने के लिए जल; माल्य--फूलों की मालाएँ; धूप--अगुरु; अनुलेपनै:--तथा चन्दन-लेप से |
भगवान् कृष्ण, बलराम तथा अन्य राजाओं एवं प्रमुख व्यक्तियों ने उन मुनियों का, सत्कार,आसन, पाद-प्रक्षालल का जल, पीने के लिए जल, फूल-मालाएँ, अगुरु तथा चन्दन-लेप अर्पितकरते हुए विधिपूर्वक पूजा की।
उवबाच सुखमासीनान्भगवान्धर्मगुप्तनु: ।
सदसस्तस्य महतो यतवाचोनुश्रुण्वतः ॥
८॥
उवाच--कहा; सुखम्--सुखपूर्वक; आसीनान्--बैठे हुओं को; भगवान्-- भगवान्; धर्म--धर्म के; गुपू--रक्षा के साधन;तनु:--शरीर वाले; सदस:ः--सभा में; तस्य--उस; महतः--महात्माओं को; यत--संयमित; वाच:--वाणी वाले;अनुश्ुण्वत: --ध्यानपूर्वक सुनते हुए।
जब सारे मुनि सुखपूर्वक बैठ गये, तो धर्म की रक्षा के निमित्त दिव्य शरीर धारण करने वालेभगवान् कृष्ण ने उस विराट सभा में उन्हें सम्बोधित किया।
हर व्यक्ति ने मौन होकर बड़े हीध्यान से सुना।
श्रीभगवानुवाच अहो वयं जन्मभूतो लब्ध॑ कार्त्स्येन तत्फलम् ।
देवानामपि दुष्प्रापं यद्योगेश्वरदर्शनम् ॥
९॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; अहो --ओह; वयम्--हम सभी; जन्म-भृतः--सफलतापूर्वक जन्म लेने वाले; लब्धम्--प्राप्त किये हुए; कार्त्स्येन--एकसाथ; तत्--उसका ( जन्म का ); फलम्--फल; देवानाम्ू--देवताओं के लिए; अपि--भी;दुष्प्रापप्-दुष्प्राप्प; यत्ू--जो; योग-ईश्वर--योगे श्वर का; दर्शनम्ू--दर्शन |
भगवान् ने कहा : अब हमारे जीवन निश्चित रूप से सफल हो गये, क्योंकि हमें जीवन काचरम लक्ष्य--महान् योगेश्वरों के दर्शन, जो देवताओं को भी विरले ही मिल पाता है--प्राप्त होगया है।
कि स्वल्पतपसां नृणामर्चायां देवचक्षुषाम् ।
दर्शनस्पर्शनप्रश्नप्रह्यणादार्चनादिकम् ॥
१०॥
किम्--क्या; सु-अल्प--अ त्यन्त न्यून; तपसाम्--तपस्या वाले; नृणाम्--मनुष्यों के लिए; अर्चायाम्--मन्दिर के अर्चाविग्रह में;देव--ई श्वर; चक्षुषाम्ू--जिनका देखना; दर्शन--देखना; स्पर्शन--छूना; प्रश्न-- प्रश्न करना; प्रह-- नमस्कार करना; पाद-अर्चन--पाँवों की पूजा करना; आदिकम्--इत्यादि
वे लोग जो अधिक तपस्वी नहीं और जो ईश्वर को मन्दिर में उनके अर्चाविग्रह के रूप में हीपहचानते हैं, भला ऐसे लोग अब आपको कैसे देख सकते हैं, छू सकते हैं, आपसे प्रश्न करसकते हैं, आपको नमस्कार कर सकते हैं, आपके चरणों की पूजा कर सकते हैं और अन्यविधियों से आपकी सेवा कर सकते हैं ?
न हाम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामया: ।
ते पुनन्त्युरूुकालेन दर्शनादेव साधव: ॥
११॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अपू--जल से; मयानि--निर्मित; तीर्थानि--ती र्थस्थानों को; न--नहीं; देवा: --अर्चा विग्रह; मृत्--मिट्टी; शिला--तथा पत्थर; मया:--निर्मित; ते--वे; पुनन्ति--पवित्र बनाते हैं; उर-कालेन--दीर्घकाल के बाद; दर्शनात्ू--दर्शन करने से; एब--केवल; साधव:--साधुजन
केवल जलमय स्थान ही असली पवित्र तीर्थस्थान नहीं होते, न ही मिट्टी तथा पत्थर की कोरी प्रतिमाएँ असली आराध्यदेव हैं।
ये किसी को दीर्घकाल के बाद ही पवित्र कर पाते हैं, किन्तुसन्त स्वभाव वाले मुनिजन दर्शन मात्र से पवित्र कर देते हैं।
किनाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारकान भूर्जलं खं श्रसनोथ वाड्मन: ।
उपासिता भेदकृतो हरन्त्यघंविपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया ॥
१२॥
न--न तो; अग्नि: --अग्नि; न--न तो; सूर्य: --सूर्य; न--न ही; च--तथा; चन्द्र-- चन्द्रमा; तारका:--तथा तारे; न--न तो;भू:--पृथ्वी; जलमू--जल; खम्--आकाश; श्रसनः-- श्वास; अथ--अथवा; वाक्ू--वाणी; मन: --तथा मन; उपासिता:--'पूजित; भेद--अन्तर ( उसके तथा अन्य जीवों के बीच ); कृतः--उत्पन्न करने वाले के; हरन्ति--छीन लेते हैं; अधम्--पापोंको; विपश्चित:--ज्ञानी लोग; घ्नन्ति--नष्ट कर देते हैं; मुहूर्त--कुछ मिनटों की ही; सेवया--सेवा के द्वारा।
न तो अग्नि के नियामक देवता सूर्य तथा चन्द्रमा, न ही पृथ्वी, तारागण, जल, आकाश,वायु, वाणी तथा मन के अधिष्ठाता देवता अपने उन पूजकों के पापों को हर पाते हैं, जो द्वैत के इृष्टिकोण से देखने के अभ्यस्त हैं।
किन्तु ज्ञानी मुनिजन आदरपूर्वक कुछ ही क्षणों तक भी सेवाकिये जाने पर, मनुष्य के पापों को नष्ट कर देते हैं।
यस्यात्मबुद्धि: कुणपे त्रिधातुकेस्वधी: कलत्रादिषु भौम इज्यधीः ।
यत्तीर्थबुद्धि:ः सलिले न कर्हिचि-ज्ननेष्वभिज्ेषु स एव गोखर: ॥
१३॥
यस्य--जिसकी; आत्म--आत्मा के रूप में; बुद्धिः--विचार; कुणपे--शव में; त्रि-धातुके--तीन मूल तत्त्वों से बनी; स्व--निज के रूप में; धी:--विचार; कलत्र-आदिषु--पत्नी इत्यादि में; भौमे-- पृथ्वी पर; इज्य--पूज्य के रूप में; धी:--विचार;यत्--जिसका; तीर्थ--तीर्थस्थान के रूप में; बुद्धिः--विचार; सलिले--जल में; न कर्हिचित्ू--कभी नहीं; जनेषु--लोगों में;अभिज्ञेषु--ज्ञानी; सः--वह; एव--निस्सन्देह; ग:--गाय; खर:--या गधा
जो व्यक्ति कफपित्त तथा वायु से बने निष्क्रिय काया को स्वयं मान बैठता है, जो अपनीपत्नी तथा अपने परिवार को स्थायी रूप से अपना मानता है, जो मिट्टी की प्रतिमा या अपनीजन्मभूमि को पूज्य मानता है या जो तीर्थस्थल को केवल जल मानता है, किन्तु आध्यात्मिकज्ञानियों को अपना ही रूप नहीं मानता, उनसे सम्बन्ध का अनुभव नहीं करता, उनकी पूजा नहींकरता अथवा उनके दर्शन नहीं करता--ऐसा व्यक्ति गाय या गधे के तुल्य है।
श्रीशुक उवाचनिशम्येत्थं भगवतः कृष्णस्याकुण्थमेधस: ।
बच्चो दुरन्वयं विप्रास्तृष्णीमासन्भ्रमद्धिय: ॥
१४॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; निशम्य--सुनकर; इत्थम्--ऐसा; भगवत: -- भगवान्; कृष्णस्य--कृष्ण का;अकुण्ठ-- असीम; मेधस:--बुद्धि; वच:--शब्द; दुरन््वयम्--समझ पाना कठिन; विप्रा: --विद्वान ब्राह्मण; तृष्णीम्--मौन;आसनू--थे; भ्रमत्ू--चलायमान; धिय:--मन वाले
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : असीम ज्ञानी भगवान् कृष्ण से ऐसा अगाध शब्द सुनकर विद्वानब्राह्मण मौन रह गये।
उनके मन भ्रमित थे।
चिरं विमृश्य मुनय ई श्वरस्येशितव्यताम् ।
जनसडग्रह इत्यूचु: स्मयन्तस्तं जगद्गुरुम् ॥
१५॥
चिरम्ू--कुछ काल तक; विमृश्य--सोचकर; मुनयः --मुनियों ने; ईश्वरस्थ--परम नियन्ता के; ईशितव्यताम्--नियंत्रित होने कीस्थिति; जन-सड्ग्रह:--सामान्य लोगों की जागृति; इति--इस तरह ( निष्कर्ष निकालते हुए ); ऊचु:--कहा; स्मयन्तः --हँसतेहुए; तमू--उन; जगत्--ब्रह्माण्ड के; गुरुम्-गुरु से
मुनिगण कुछ समय तक भगवान् के इस आचरण पर विचार करते रहे, जो एक अधीनस्थजीव के आचरण जैसा लग रहा था।
उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि वे सामान्य जनों कोउपदेश देने के लिए ऐसा अभिनय कर रहे हैं।
अतः वे मुस्कराये और जगदगुरु से इस प्रकारबोले।
श्रीमुन॒य ऊचु:यन्मायया तत्त्वविदुत्तमा वयंविमोहिता विश्वसृजामधी श्वरा: ।
यदीशितव्यायति गूढ ईहयाअहो विचित्रम्भगवद्विचेष्टितम् ॥
१६॥
श्री-मुनयः ऊचु:--मुनियों ने कहा; यत्ू--जिसकी; मायया--माया-शक्ति से; तत्त्त--सत्य के; वित्--वेत्ता; उत्तमा:--सर्वश्रेष्ठ; बयम्--हम; विमोहिता:--विचलित; विश्व--ब्रह्माण्ड के; सृजाम्--स्त्रष्टाओं के; अधी श्वर: -- प्रमुख; यत्--जिससे;ईशितव्यायति--( भगवान् ) अपने को उच्चतर नियंत्रण के अधीन मानता है; गूढः--छिपा; ईहया--कार्यों द्वारा; अहो--ओह;विचित्रमू--आश्चर्यजनक; भगवत्-- भगवान् का; विचेष्टितम्-कार्य, चेष्टा |
उन महान् मुनियों ने कहा : आपकी माया-शक्ति ने सत्य को सर्वोत्तम ढंग से जानने वालेतथा विश्व के प्रमुख स्त्रष्टा हम सबों को मोहित कर लिया है।
ओह! भगवान् का आचरण कितनाआश्चर्यजनक है! वे अपने को मानव जैसे कार्यो से आच्छादित करके अपने को किसी श्रेष्ठ नियंत्रण के अधीन होने का स्वाँग रच रहे हैं।
अनीह एतद्नहुघैक आत्मनासृजत्यवत्यत्ति न बध्यते यथा ।
भौमैर्हि भूमिरबहुनामरूपिणीअहो विभूम्नश्चरितं विडम्बनम् ॥
१७॥
अनीहः--बिना चेष्टा किये; एतत्--यह ( ब्रह्माण्ड ); बहुधा--नाना प्रकार; एक:--अकेला; आत्मना--अपने द्वारा; सृजति--उत्पन्न करता है; अवति--पालन करता है; अत्ति--संहार करता है; न बध्यते--बँधता नहीं है; यथा--जिस तरह; भौमै:--पृथ्वीके रूपान्तरों ( विकारों ) से; हि--निस्सन्देह; भूमि:-- पृथ्वी; बहु-- अनेक; नाम-रूपिणी--नाम तथा रूपों वाली; अहो--ओह;विभूम्न: --सर्वशक्तिमान भगवान् का; चरितमू--कार्यकलाप; विडम्बनमू--बहाना |
निस्सन्देह, सर्वशक्तिमान की मनुष्य जैसी लीलाएँ केवल बहाना हैं।
वे बिना प्रयास के हीअपने में से इस रंगबिरंगी सृष्टि को उत्पन्न करते हैं, इसका पालन करते हैं और फिर इसे निगलजाते हैं।
आप यह सब बिना बँधे ही करते हैं, जिस तरह पृथ्वी-तत्त्व अपने विविध रूपान्तरों(विकारों ) में अनेक नाम तथा रूप ग्रहण करती रहती है।
अथापि काले स्वजनाभिगुप्तयेबिभर्षि सत्त्वं खलनिग्रहाय च ।
स्वलीलया वेदपथं सनातनवर्णाश्रमात्मा पुरुष: परो भवान् ॥
१८॥
अथ अपि--तो भी; काले--सही समय पर; स्व-जन--अपने भक्तों की; अभिगुप्तये--रक्षा के लिए; बिभर्षि-- धारण करतेहो; सत्त्वमू--सतोगुण; खल--दुष्टों को; निग्रहाय--दण्ड देने के लिए; च--तथा; स्व--अपनी; लीलया--लीलाओं से; बेद-पथम्--वेदों का मार्ग; सनातनम्--नित्य; वर्ण-आ श्रम--वर्णो तथा आश्रमों का; आत्मा--आत्मा; पुरुष: -- भगवान्; पर: --सर्वोच्च; भवान्ू--आप।
तो भी उचित अवसरों पर आप अपने भक्तों की रक्षा करने तथा दुष्टों को दण्ड देने के लिएशुद्ध सतोगुणी रूप धारण करते हैं।
इस तरह वर्णाश्रम के आत्मास्वरूप आप भगवान् अपनीआनन्द-लीलाओं का भोग करते हुए वेदों के शाश्वत पथ को बनाये रखते हैं।
ब्रह्म ते हृदयं शुक्लं तपःस्वाध्यायसंयमै: ।
यत्रोपलब्धं सद्व्यक्तमव्यक्त च ततः परम् ॥
१९॥
ब्रह्म--वेद; ते--तुम्हारे; हदयम्--हृदय; शुक्लम्--शुद्ध; तपः--तपस्या; स्वाध्याय-- अध्ययन; संयमैः--तथा आत्मसंयमद्वारा; यत्र--जिसमें; उपलब्धम्--अनुभव किये गये; सत्--शुद्ध आध्यात्मिक; व्यक्तम्--प्रकट ( भौतिक सृष्टि का प्रतिफल );अव्यक्तम्--अप्रकट ( सृष्टि के सूक्ष्म कारण ); च--तथा; तत:ः--उसको; परम्--दिव्य को |
वेद आपके निर्मल हृदय हैं और उनके माध्यम से तपस्या, अध्ययन एवं आत्मसंयम द्वारामनुष्य प्रकट, अप्रकट तथा इन दोनों से परे शुद्ध अस्तित्व को देख सकता है।
तस्माद्ृह्मकुलं ब्रह्मन्शास्त्रयोनेस्त्वमात्मन: ।
सभाजयसि सद्धाम तद्गह्मण्याग्रणीर्भवान् ॥
२०॥
तस्मात्--इसीलिए; ब्रह्म--ब्राह्मणों के; कुलम्--वंश को; ब्रह्मनू--हे परम सत्य; शास्त्र--शास्त्र; योने:--अनुभूति के साधनरूप; त्वमू--तुमको; आत्मन:--अपने आप; सभाजयसि--सम्मान प्रदर्शित करते हैं; सत्--पूर्ण; धाम--वास, स्थान; तत्--फलस्वरूप; ब्रह्मण्य--ब्राह्मण संस्कृति का आदर करने वालों के; अग्रणी:--नायक; भवानू--आप |
अतएव हे परब्रह्म, आप ब्राह्मण कुल के सदस्यों का आदर करते हैं, क्योंकि वे ही पूर्णअभिकर्ता हैं, जिनके माध्यम से वेदों के साक्ष्य द्वारा कोई व्यक्ति आपका साक्षात्कार कर सकताहै।
इसी कारण से आप ब्राह्मणों के अग्रणी पूजक हैं।
अद्य नो जन्मसाफल्यं विद्यायास्तपसो हश: ।
त्वया सड़म्य सदगत्या यदन्तः श्रेयसां पर: ॥
२१॥
अद्य--आज; न: --हमारा; जन्म--जन्म का; साफल्यम्--फलीभूत; विद्याया:--शिक्षा का; तपसः--तपस्या का; हशः --देखने की शक्ति का; त्वया--तुम्हारे द्वारा; सड्रम्थ--संगति दी जाकर; सत्--साधु-पुरुषों की; गत्या--गन्तव्य; यत्-क्योंकि;अन्तः--सीमा; श्रेयसामू--लाभों की; पर:--चरम।
आज हमारा जन्म, शिक्षा, तपस्या तथा दृष्टि सभी पूर्ण हो चुके हैं, क्योंकि हम समस्त सन्त-पुरुषों के लक्ष्य, आपसे सात्निध्य प्राप्त करने में समर्थ हो सके हैं।
निस्सन्देह आप स्वयं हीअनन्तिम, अर्थात् परम आशीर्वाद हैं।
नमस्तस्मै भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।
स्वयोगमाययाच्छन्नमहिम्ने परमात्मने ॥
२२॥
नमः--नमस्कार; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान् को; कृष्णाय--कृष्ण को; अकुण्ठ-- असीम; मेधसे--बुद्द्धिमान; स्व--निजी; योग-मायया-- अन्तरंगा माया-शक्ति द्वारा; आच्छन्न--ढका; महिम्ने--महिमा वाले; परम-आत्मने--परमात्मा को ।
हम अनन्त बुद्धि वाले परमात्मा अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को नमस्कार करतेहैं, जिन्होंने अपनी योगमाया द्वारा अपनी महानता को छिपा रखा है।
न यं विदन्त्यमी भूपा एकारामाश्च वृष्णय: ।
मायाजवनिकाच्छन्नमात्मानं कालमी श्वरम् ॥
२३॥
न--नहीं; यम्ू--जिसको; विदन्ति--जानते हैं; अमी--ये; भू-पा:--राजागण; एक--एकसाथ; आरामा:-- भोग करने वाले;च--तथा; वृष्णय:--वृष्णिगण; माया--माया की दैवी शक्ति के; जवनिका--पर्दे द्वारा; आच्छन्नम्ू--आच्छादित; आत्मानम्ू--परमात्मा को; कालमू--काल को; ईश्वरम्-थे सुप्रेमे चोन्त्रोल्लेर्न तो
ये राजा, न ही वृष्णिगण, जो आपकी घनिष्ठ संगति का आनन्द उठाते हैं, आपकोसमस्त सृष्टि के आत्मा, काल की शक्ति तथा परम नियन्ता के रूप में जानते हैं।
उनके लिए तोआप माया के पर्दे से ढके रहते हैं।
यथा शयान: पुरुष आत्मानं गुणतत्त्वहक् ।
नाममात्रेन्द्रिया भातं न वेद रहितं परम् ॥
२४॥
एवं त्वा नाममात्रेषु विषयेष्विन्द्रियिहया ।
मायया विश्रमच्चित्तो न वेद स्मृत्युपप्लवात् ॥
२५॥
यथा--जिस तरह; शयान:ः --सोता हुआ; पुरुष:--व्यक्ति; आत्मानम्--अपने को; गुण--गौण; तत्त्व--यथार्थ के; हक्--जिसकी दृष्टि; नाम--नामों; मात्र--तथा स्वरूपों के साथ; इन्द्रिय--उसके मन से; आभातम्--प्रकट; न वेद--नहीं जानता;रहितम््-पृथक्; परम्-प्रत्युत; एवम्ू--इसी तरह; त्वा--तुम; नाम-मात्रेषु--नामों तथा स्वरूपों से युक्त; विषयेषु-- भौतिकअनुभूति की वस्तुओं में; इन्द्रिय--इन्द्रियों की; ईहया--क्रियाशीलता से; मायया--आपकी माया के प्रभाव से; विभ्रमत्--मोहग्रस्त होकर; चित्त:--चेतना वाला; न वेद--नहीं जानता; स्मृति--अपनी स्मरणशक्ति के; उपप्लवात्-- भंग हो जाने से |
सोया हुआ व्यक्ति अपने को एक वैकल्पिक सत्य मानता है और स्वयं यह देखते हुए किउसके विविध नाम तथा रूप हैं, वह अपनी जाग्रत पहचान को भूल जाता है, जो उसके स्वप्न सेसर्वथा पृथक् होती है।
इसी प्रकार जिसकी चेतना माया द्वारा मोहित हो जाती है, वह भौतिकवस्तुओं के ही नामों तथा स्वरूपों को देखता है।
इस तरह ऐसा पुरुष अपनी स्मरणशक्ति खोदेता है और आपको जान नहीं सकता।
तस्याद्य ते दहशिमाड्प्रिमघौघमर्ष -तीर्थास्पदं हृदि कृतं सुविपक्वयोगै: ।
उत्सिक्तभक्त्युपहताशय जीवकोशाआपुर्भवद्गतिमथानुगृहान भक्तान् ॥
२६॥
तस्य--उसका; अद्य--आज; ते--तुम्हारा; ददशिम--हम देख चुके हैं; अड्प्रिमू--पैरों को; अध--पापों की; ओघ--बाढ़ें;मर्ष--नष्ट करते हैं; तीर्थ--तीर्थस्थानों ( गंगा नदी ) के; आस्पदम्--स््रोत; हृदि--हृदय में; कृतम्--रखा; सु--अच्छी तरह;विपक्व--पका हुआ; योगै: --उनके द्वारा जिनका योगाभ्यास; उत्सिक्त--पूर्णतया विकसित; भक्ति--भक्ति द्वारा; उपहत--विनष्ट; आशय--भौतिक मनोवृत्ति; जीव--जीवात्मा का; कोशा: --बाह्य आवरण; आपुः--उन्होंने प्राप्त किया; भवत्--आपका; गतिमू्--गन्तव्य; अथ--इसलिए; अनुगृहाण--कृपा प्रदर्शित कीजिये; भक्तान्ू--अपने भक्तों पर।
आज हमने आपके उन चरणों का प्रत्यक्ष दर्शन पा लिया, जो उस पवित्र गंगा नदी के उद्गमहैं, जो पापों के ढेरों को धो डालती है।
पूर्णयोगी आपके चरणों का ध्यान उत्तम विधि से अपनेहृदयों में कर सकते हैं, किन्तु केवल वे, जो आपकी पूरे मन से भक्ति करते हैं और इस तरहआत्मा के आवरण--भौतिक मन--को दूर करते हैं, वे आपको अपने अन्तिम गन्तव्य के रूप मेंप्राप्त करते हैं।
अतएवं आप हम अपने भक्तों पर कृपा प्रदर्शित करें।
श्रीशुक उवाचइत्यनुज्ञाप्य दाशाहईं धृतराष्ट्र युधिष्ठटिरम् ।
राजर्षे स्वाश्रमानान्तुं मुन॒यो दधिरे मनः ॥
२७॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार कह कर; अनुज्ञाप्प--विदा होने की अनुमति लेकर;दाशाईम्--महाराज दाशाह के वंशज कृष्ण से; धृतराष्ट्रम्-- धृतराष्ट्र से; युधिष्ठिरम्--युधिष्ठिर से; राज--राजाओं में से; ऋषे--हेऋषि; स्व-- अपने अपने; आश्रमान्--कुटियों को; गन्तुम्--जाने में; मुनयः --मुनिगण; दधिरे--उन्मुख किया; मनः --अपनेमनों को
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे ज्ञानवान राजा, इस तरह कहकर मुनियों ने दाशाई, धुृतराष्ट्रतथा युधिष्ठिर से विदा होने की अनुमति ली और अपने अपने आश्रमों को जाने के लिए तैयारहोने लगे।
तद्दीक्ष्य तानुपब्रज्य वसुदेवो महायशा: ।
प्रणम्य चोपसड्ूह्य बभाषेदं सुयन्त्रित: ॥
२८ ॥
तत्--यह; वीक्ष्य--देखकर; तान्ू--उनको; उपक्रज्य--पास आकर; वसुदेव: --वसुदेव ने; महा--महान्; यशा:--यशस्वी;प्रणम्य--प्रणाम करके; च--तथा; उपसड्ूरह्म--उनके चरण पकड़ कर; बभाष--कहा; इृदम्--यह; सु--अत्यन्त; यन्त्रित:--सावधानी के साथ बनाया हुआ।
यह देखकर कि वे साधु प्रस्थान करने वाले हैं, सम्मान्य वसुदेव उनके पास पहुँचे और उन्हेंनमस्कार करने एवं उनके चरण-स्पर्श करने के बाद, उन्होंने अत्यन्त सावधानी से चुने हुए शब्दोंमें उनसे कहा।
श्रीवसुदेव उवाचनमो वः सर्वदेवेभ्य ऋषय: श्रोतुमरहथ ।
कर्मणा कर्मनिर्हारो यथा स्यान्नस्तदुच्यताम् ॥
२९॥
श्री-वसुदेवः उवाच-- श्री वसुदेव ने कहा; नम:--नमस्कार; व:--आपको; सर्व--समस्त; देवेभ्य: --देवताओं के; ऋषय: --हेऋषि; श्रोतुम् अ्हथ--कृपया सुनें; कर्मणा-- भौतिक कार्य द्वारा; कर्म--( पूर्व ) कार्य का; निर्हारः--निराकरण, नाश; यथा--कैसे; स्थातू--हो; नः--हमको; तत्--वह; उच्चताम्--कृपया कहें |
श्री वसुदेव ने कहा : हे समस्त देवताओं के आश्रय, आपको नमस्कार है।
हे ऋषियो, कृपाकरके मेरी बात सुनें ।
कृपा करके हमें यह बतलायें कि मनुष्य का कर्मफल किस तरह आगे औरकर्म करके विनष्ट किया जा सकता है ?
श्रीनारद उवाचनातिचित्रमिदं विप्रा वसुदेवो बुभुत्सया ।
कृष्णम्तत्वार्भक॑ यन्नः पृच्छति श्रेय आत्मन: ॥
३०॥
श्री-नारदः उबाच-- श्री नारद ने कहा; न--नहीं; अति--अ त्यन्त; चित्रमू--विचित्र; इदम्--यह; विप्रा:--हे ब्राह्मणो;बसुदेव:--वसुदेव; बुभुत्सया--जानने की इच्छा से; कृष्णम्--कृष्ण को; मत्वा--सोच कर; अर्भकम्--बालक; यत्--यहतथ्य कि; न:ः--हमसे; पृच्छति--पूछता है; श्रेयः--सर्वोच्च मंगल के विषय में; आत्मन:--अपने लिए।
श्री नारद मुनि ने कहा : हे ब्राह्मणो, यह उतना आश्चर्यजनक नहीं है कि जानने की उत्सुकतासे वसुदेव ने अपने चरम लाभ के विषय में हमसे प्रश्न किया है, क्योंकि वे कृष्ण को मात्र एकबालक ही मानते हैं।
सन्निकर्षोउत्र मर्त्यानामनादरणकारणम् ।
गाड़ूं हित्वा यथान्याम्भस्तत्रत्यो याति शुद्धये ॥
३१॥
सन्निकर्ष:--निकटता; अत्र--यहाँ ( इस जगत में ); मर्त्यानाम्ू--मर्त्यों के लिए; अनादरण---अनादर का; कारणम्--कारण;गाड़म्-गंगा ( के जल ) को; हित्वा--त्याग कर; यथा--जिस तरह; अन्य--दूसरा; अम्भ: --पानी; तत्रत्यः--उसके पास रहनेवाला; याति--जाता है; शुद्धये --शुद्धि के लिए।
इस संसार में परिचय बढ़ने से अनादर पनपता है।
उदाहरणार्थ जो व्यक्ति गंगा के तट पररहता है, वह अपनी शुद्धि के लिए गंगा की उपेक्षा करके अन्य किसी जलाशय को जाय।
यस्यानुभूति: कालेन लयोत्पत्त्यादिनास्य वै ।
स्वतोन्यस्माच्च गुणतो न कुतश्चन रिष्यति ॥
३२॥
तं॑ क्लेशकर्मपरिपाकगुण प्रवाहै-रव्याहतानुभवमी श्वरमद्वितीयम् ।
प्राणादिभि: स्वविभवैरुपगूढमन्योमन्येत सूर्यमिव मेघहिमोपरागै: ॥
३३॥
यस्य--जिसकी; अनुभूति:--जानकारी से; कालेन--समय द्वारा उत्पन्न; लय--विनाश; उत्पत्ति--सृष्टि; आदिना--इत्यादि केद्वारा; अस्य--इस ( ब्रह्माण्ड ) का; बै--निस्सन्देह; स्वतः--अपने से; अन्यस्मात्--किसी अन्य कारण से; च--अथवा;गुणतः--अपने गुणों के रूप में; न--नहीं; कुतश्रन--किसी कारण से; रिष्यति--टूट जाता है; तम्ू--उसको; क्लेश-- भौतिककष्ट; कर्म--भौतिक कार्यकलाप; परिपाक--उनके परिणाम; गुण--प्रकृति के गुणों के; प्रवाहै:--तथा प्रवाह द्वारा;अव्याहत--अप्रभावित; अनुभवम्--जिसकी चेतना; ईश्वरमू--परम नियन्ता को; अद्वितीयम्--अद्वितीय; प्राण--प्राणवायु;आदिभि:--इत्यादि से; स्व--निजी; विभवै:--अंशों द्वारा; उपगूढम्--दूसरे वेश में; अन्य:--अन्य कुछ; मन्येत--मानता है;सूर्यम् इब--सूर्य की तरह; मेघ--बादलों के द्वारा; हिम--बर्फ; उपरागैः--तथा ग्रहणों के द्वारा।
भगवान् की चेतना कभी भी काल द्वारा, ब्रह्माण्ड की सृष्टि तथा संहार द्वारा, अपने ही गुणोंमें परिवर्तन द्वारा, या किसी अन्य कारण से, चाहे वह स्वजनित हो या बाह्य हो, विचलित नहींहोती।
भले ही अद्वितीय भगवान् की चेतना भौतिक कष्ट द्वारा, भौतिक कर्म द्वारा या प्रकृति केगुणों के निरन्तर प्रवाह द्वारा प्रभावित न होती हो, किन्तु तो भी सामान्य व्यक्ति यही सोचते हैं किभगवान् प्राण तथा अन्य भौतिक तत्त्वों की अपनी ही सृष्टियों से आच्छादित हैं, जिस तरह कोईव्यक्ति यह सोच सकता है कि सूर्य बादल, बर्फ या ग्रहण से ढक गया है।
अथोचुर्मुनयो राजन्नाभाष्यानल्सदुन्दभिम् ।
सर्वेषां श्रण्वतां राज्ञां तथेवाच्युतरामयो: ॥
३४॥
अथ--तब; ऊचु:--कहा; मुनयः--मुनियों ने; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); आभाष्य--कहकर; आनक-दुन्दुभिम्--वसुदेवको; सर्वेषाम्--समस्त; श्रृण्वताम्--सुनते हुए; राज्ञामू--राजाओं के; तथा एब-- भी; अच्युत-रामयो: --कृष्ण तथा बलरामके
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्ू, तब मुनियों ने वसुदेव को सम्बोधित करते हुए फिरसे कहा, जबकि भगवान् अच्युत तथा बलराम के साथ ही साथ सारे राजा सुन रहे थे।
कर्मणा कर्मनिर्हार एष साधुनिरूपित: ।
यच्छुद्धया यजेद्दिष्णुं सर्वयज्ञेश्वरं मै: ॥
३५॥
कर्मणा--कर्म द्वारा; कर्म--विगत कर्मो के फलों के; निर्हार: -- प्रतिक्रिया, निष्फल करना; एष:--यह; साधु--सही -सही;निरूपित:--निश्चित किया गया; यत्--जो; श्रद्धया--श्रद्धा के साथ; यजेत्--पूजा करे; विष्णुम्--विष्णु की; सर्व--समस्त;यज्ञ--यज्ञों के; ईश्वरमू--ईश्वर की; मखैः --वैदिक अग्नि-अनुष्ठानों द्वारा
मुनियों ने कहा : यह निश्चित निष्कर्ष निकाला जा चुका है कि कर्म को उसके आगे औरभी कर्म करके निष्फल किया जाता है जब मनुष्य श्रद्धापूर्वक समस्त यज्ञों के स्वामी विष्णु कीपूजा करने के साधनस्वरूप वैदिक यज्ञ सम्पन्न करता है।
चित्तस्योपशमोयं वै कविभि: शास्त्रचक्षुसा ।
दर्शितः सुगमो योगो धर्मश्चात्ममुदावह: ॥
३६॥
चित्तस्य--मन की; उपशमः--शान्ति; अयम्ू--यह; बै--निस्सन्देह; कविभिः --विद्वानों द्वारा; शास्त्र--शास्त्र रूप; चक्षुषा--आँख से; दर्शितः:--दिखलाया हुआ; सु-गम:ः--सरलता से सम्पन्न; योग:--मोक्ष प्राप्त करने का साधन; धर्म:--धार्मिककर्तव्य; च--तथा; आत्म--हृदय को; मुत्ू--आनन्द; आवहः: --लाने वाला।
शास्त्र की आँख से देखने वाले विद्वानों ने यह प्रदर्शित कर दिया है कि श्षुब्ध मन को दमनकरने तथा मोक्ष प्राप्त करने की यही सबसे सुगम विधि है और यही पवित्र धर्म है, जिससे मन को आनन्द प्राप्त होता है।
अयं स्वस्त्ययनः पन्था द्विजातेगृहमेधिन: ।
यच्छुद्धयाप्तवित्तेन शुक्लेनेज्येत पूरूष: ॥
३७॥
अयम्--यह; स्वस्ति--मंगल, कल्याण; अयन: --लाने वाला; पन्था--पथ; द्वि-जातेः--ट्विज के लिए; गृह--घर पर;मेधिन:--यज्ञ करने वाला; यत्--जो; श्रद्धया--निःस्वार्थपूर्वक; आप्त--सही साधनों से प्राप्त; वित्तेन-- अपने धन से;शुक्लेन--निर्मल; ईज्येत--पूजा करे; पूरुष:-- भगवान् की
धार्मिक द्विज गृहस्थ के लिए सर्वाधिक शुभ पथ यही है कि वह ईमानदारी से प्राप्त की गईसम्पदा से भगवान् की पूजा निःस्वार्थ भाव से करे।
वित्तैषणां यज्ञदानैर्गृहेर्दारसुतैषणाम् ।
आत्मलोकैषणां देव कालेन विसूजेद्ुध: ।
ग्रामे त्यक्तैषणा: सर्वे ययुर्धीरास्तपोवनम् ॥
३८ ॥
वित्त--सम्पदा की; एषणाम्--इच्छा को; यज्ञ--यज्ञ से; दानैः--तथा दान द्वारा; गृहैः--गृहस्थी के कार्यों में व्यस्तता द्वारा;दार--पली; सुत--तथा सन्तान की; एषणाम्--इच्छा को; आत्म--अपने लिए; लोक--( अगले जन्म में ) उच्च लोक के लिए;एषणाम्--इच्छा; देव--हे सन्त स्वभाव वाले वसुदेव; कालेन--काल के कारण; विसूजेत्--त्याग देना चाहिए; बुध: --बुद्धिमान को; ग्रामे--गृहस्थ जीवन के लिए; त्यक्त--छोड़ी हुईं; एषणा:--इच्छाएँ; सर्वे--समस्त; ययु:--चले गये; धीरा:--गम्भीर मुनिगण; तपः--तपस्या के; वनमू--वन को |
बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि यज्ञ करके तथा दान-कर्मो के द्वारा धन-सम्पदा की अपनीइच्छा का परित्याग करना सीखे।
उसे गृहस्थ जीवन के अनुभव से पत्नी तथा सन््तान की अपनीइच्छा का परित्याग करना सीखना चाहिए।
हे सन्त वसुदेव, उसे काल के प्रभाव का अध्ययनकरके अगले जीवन में उच्चतर लोक में जाने की अपनी इच्छा का परित्याग करना सीखनाचाहिए।
जिन आत्मसंयमी मुनियों ने गृहस्थ जीवन के प्रति अपनी आसक्ति का इस तरह परित्याग कर दिया है, वे तपस्या करने के लिए वन में चले जाते हैं।
ऋणैस्त्रिभिद्विजो जातो देवर्षिपितृणां प्रभो ।
यज्ञाध्ययनपुत्रैस्तान्यनिस्तीर्य त्यजन्पतेत् ॥
३९॥
ऋणै:--ऋणों से; त्रिभि:--तीनों; द्वि-ज:--द्विज जाति का सदस्य; जात:--उत्पन्न होता है; देव--देवताओं को; ऋषि--मुनिगण; पितृणाम्--तथा पूर्वजों के; प्रभो--हे स्वामी ( वसुदेव ); यज्ञ--यज्ञ; अध्ययन--शास्त्र का अध्ययन; पुत्रै:--तथासन्तान ( उत्पन्न करने ) से; तानि--ये ( ऋण ); अनिस्तीर्य--न समाप्त करके, उऋण हुए बिना; त्यजन्--( अपना शरीर ) त्यागतेहुए; पतेत्ू--नीचे गिर जाता है।
हे प्रभु, एक द्विज तीन प्रकार के ऋण--देवताओं के प्रति ऋण, मुनियों के प्रति ऋण तथाअपने पुरखों के प्रति ऋण--लेकर उत्पन्न होता है।
यदि वह यज्ञ, शास्त्र-अध्ययन तथासन्तानोत्पत्ति द्वारा इन ऋणों को चुकता किये बिना अपना शरीर त्याग देता है, तो वह नरक मेंजा गिरेगा।
त्वं त्वच्य मुक्तो द्वाभ्यां वे ऋषिपित्रोर्महामते ।
य्ञैर्देवर्णमुन्मुच्य निरणोउशरणो भव ॥
४०॥
त्वमू--तुम; तु--लेकिन; अद्य--आज; मुक्त:--मुक्त, स्वतंत्र; द्वाभ्यामू--दो ( ऋणों ) से; बै--निश्चय ही; ऋषि--ऋषियों ;पित्रो:--तथा पूर्वजों के प्रति; महा-मते--हे उदार; यज्जैः--वैदिक यज्ञों द्वारा; देब--देवताओं के प्रति; ऋणम्ू--ऋण से;उन्मुच्य--अपने को छुड़ाकर; निरण:--उऋण; अशरण: --शरणविहीन; भव--बनो |
किन्तु हे महामते, आप तो पहले ही अपने दो ऋणों--मुनियों के तथा पुरखों के ऋणों--सेमुक्त हैं।
अब आप वैदिक यज्ञ सम्पन्न करके देव-ऋण से भी उऋण हो लें।
इस तरह आप अपनेको ऋण से पूरी तरह मुक्त कर लें और समस्त भौतिक आश्रय का परित्याग कर दें।
वसुदेव भवान्नूनं भक्त्या परमया हरिम् ।
जगतामीश्ररं प्रार्च: स यद्ठां पुत्रतां गत: ॥
४१॥
वसुदेव--हे वसुदेव; भवान्--आप; नूनम्--निस्सन्देह; भक्त्या-- भक्ति से; परमया--परम; हरिमू-- भगवान् कृष्ण को;जगताम्--सारे जगतों के; ईश्वरमू--परम नियन्ता को; प्रार्च:--ढंग से पूजा की है; सः--वह; यत्--जितना कि; वाम्--तुमदोनों ( बसुदेव-देवकी ) के; पुत्रताम्-पुत्र के कार्य को; गत:--ग्रहण किया हुआ।
हे वसुदेव, निस्सन्देह इसके पूर्व आपने समस्त जगतों के स्वामी भगवान् हरि की पूजा कीहोगी।
आप तथा आपकी पतली दोनों ने ही परम भक्ति के साथ उनकी पूरी तरह से पूजा कीहोगी, क्योंकि उन्होंने आपके पुत्र की भूमिका स्वीकार की है।
श्रीशुक उवाचइति तद्गचनं श्रुत्वा वसुदेवो महामना: ।
तानृषीनृत्विजो वतद्रे मूर्ध्ननम्य प्रसाद्य च ॥
४२॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--ऐसा कहे जाने पर; तत्--उनके; वचनम्--शब्दों को; श्रुत्वा--सुनकर;वसुदेव:--वसुदेव ने; महा-मना:--उदार; तानू--उन; ऋषीन्--ऋषियों को; ऋत्विज:--पुरोहितों के रूप में; वद्रे--चुना;मूर्श्न--अपने सिर से; आनम्य--झुक कर; प्रसाद्य--तुष्ट करके; च--तथा
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : ऋषियों के इन कथनों को सुनकर उदार वसुदेव ने भूमि तकअपना सिर झुकाया और उनकी प्रशंसा करते हुए, उनसे अनुरोध किया कि वे उनके पुरोहित बनजायाँ।
त एनमृषयो राजन्वृता धर्मेण धार्मिकम् ।
तस्मिन्नयाजयश्क्षेत्रे मखैरुत्तमकल्पकै: ॥
४३॥
ते--उन; एनम्ू--उसको; ऋषय: --ऋषियों ने; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); वृता:--चुने हुए; धर्मेण--धार्मिक सिद्धान्तों केअनुसार; धार्मिकम्-- धार्मिक; तस्मिन्ू--उसमें; अयाजयन्--यज्ञ करने लग गये; क्षेत्रे--पतित्र क्षेत्र ( कुरुक्षेत्र के ) में; मखै:--यज्ञों के द्वारा; उत्तम-श्रेष्ठ; कल्पकैः--जिसकी व्यवस्था |
हे राजनू, इस तरह अनुरोध किये जाने पर ऋषियों ने पवित्र वसुदेव को कुरुक्षेत्र के पावनस्थान पर कठोर धार्मिक नियमों के अनुसार तथा उत्तम अनुष्ठानिक व्यवस्था के अनुसार अग्नियज्ञ करने में लगा लिया।
तद्दीक्षायां प्रवृत्तायां वृष्णय: पुष्करस्त्रज: ।
स्नाताः सुवाससो राजन्राजानः सुष्ठवलड्डू ता; ॥
४४॥
तन्महिष्यश्च मुदिता निष्ककण्ठ्य: सुवासस: ।
दीक्षाशालामुपाजग्मुरालिप्ता वस्तुपाणय: ॥
४५॥
तत्--उनकी ( वसुदेव की ); दीक्षायाम्--यज्ञ के लिए दीक्षा; प्रवृत्तायामू--जब यह शुरू होने वाला था; वृष्णय:--वृष्णिगण;पुष्कर--कमलों की; स्त्रज:--माला पहने; स्नाता:--स्नान किये हुए; सुवासस:--अच्छे वस्त्र धारण किये; राजन्--हे राजा;राजान:--( अन्य ) राजा; सुष्ठ-- भव्य रीति से; अलड्डू ता:--आभूषित; तत्--उनकी; महिष्य:--रानियाँ; च--तथा; मुदिता: --प्रसन्नचित्त; निष्क--रत्नजटित हार; कण्ठ्य:--जिनके गलों में; सु-वासस:--सुन्दर वस्त्रों से युक्त; दीक्षा--दीक्षा के लिए;शालाम्--मंच, स्थल पर; उपाजग्मु:--गये; आलिप्ता:--लेप किये; वस्तु--शुभ वस्तुओं से; पाणय:--जिसके हाथों में |
है राजनू, जब महाराज वसुदेव यज्ञ के लिए दीक्षित किये जाने वाले थे, तो वृष्णिजन स्नानकरके तथा सुन्दर वस्त्र पहने एवं कमल की मालाएँ पहने दीक्षा-स्थल पर आये।
अन्य राजा भीखूब सज-धज कर आये।
उनके साथ उनकी प्रसन्नचित्त रानियाँ भी थीं।
वे अपने गलों मेंरतलजटित हार पहने थीं तथा सुन्दर वस्त्र धारण किये थीं।
ये रानियाँ चन्दन का लेप किये थीं और हाथों में पूजा की शुभ सामग्री लिये थीं।
नेदुर्मृदड्पटहशड्डुभेयानकादय: ।
ननृतुर्नटनर्तक्यस्तुष्ठुवु: सूतमागधा: ।
जगु: सुकण्ठो गन्धर्व्य: सड़ीत॑ सहभर्तुका: ॥
४६॥
नेदु:--बजने लगे; मृदड़-पटह--मृदंग तथा पटह जैसे ढोल; शट्गभु--शंख; भेरी-आनक--भेरि तथा आनक जैसे ढोल;आदयः--तथा अन्य बाजे; ननृतुः--नाचने लगे; नट-नर्तक्य: --पुरुष नर्तक तथा स्त्री नर्तकियाँ; तुष्ठवु:--यशोगान किया; सूत-मागधा: --सूतों तथा मागधों ने; जगु:--गाया; सु-कण्ठ्य:--मधुर वाणी वाली; गन्धर्व्य:--गन्धर्वियों ने; सड्रीतम्--गीत;सह--साथ; भर्तृका:ः--अपने पतियों केमृदंग, पटह, शंख, भेरी, आनक तथा अन्य वाद्य बजने लगे।
नर्तकों तथा नर्तकियों ने नृत्यकिया और सूतों तथा मागधों ने यशोगान किया।
मधुर वाणी वाली गन्धर्वियों ने अपने अपनेपतियों के साथ गीत गाये।
तमभ्यषिज्ञन्विधिवदक्तम भ्यक्तमृत्विज: ।
पत्नीभिरष्टाइशभि: सोमराजमिवोडुभि: ॥
४७॥
तम्--उसको; अभ्यषिश्नन्--पवित्र जल छिड़कते हुए; विधिवत्--शास्त्रीय नियमों के अनुसार; अक्तमू--आँखों में अंजनलगाये; अभ्यक्तम्--ताजे नवनीत से शरीर को लेप किये; ऋत्विज:--पुरोहितगण; पतल्लीभि:--अपनी अपनी पतियों के साथ;अष्टा-दशभि:--अठारह; सोम-राजम्--राजसी; इब--सहश; उड्ुभि:--तारों से |
वसुदेव की आँखों में काजल लगाने तथा उनके शरीर को ताजे मक्खन से लेप करने केबाद पुरोहितों ने शास्त्रीय विधि के अनुसार उन पर तथा उनकी अठारह रानियों पर पवित्र जलछिड़क कर उन्हें दीक्षा दी।
वे अपनी पत्नियों से घिर कर तारों से घिरे राजसी चन्द्रमा जैसे लग रहेथे।
ताभिर्दुकूलवलयैहारनूपुरकुण्डलै: ।
स्वलड्डू ताभिर्विबभौ दीक्षितोडजिनसंवृत: ॥
४८॥
ताभि:ः--उनके साथ; दुकूल--रेशमी साड़ियों के साथ; वलयै:--तथा चूड़ियों से; हार--गले का हार; नूपुर--पायल;कुण्डलै:ः--तथा कान के कुण्डलों से; सु--सुन्दर; अलड्डू ताभि:--सजी हुई; विबभौ--खूब चमक रहा था; दीक्षित:--दीक्षितहोकर; अजिन--मृगचर्म से; संवृत:--आवृत, लपेटा हुआ।
वसुदेव ने अपनी पत्नियों के साथ साथ दीक्षा ग्रहण की।
उनकी पत्नियाँ रेशमी साड़ियाँपहने थीं और चूड़ियों, हारों, पायलों तथा कुण्डलों से सजी थीं।
वसुदेव का शरीर मृगचर्म सेलपेटा हुआ था, जिससे वे खूब शोभायमान हो रहे थे।
तस्यर्त्विजो महाराज रत्नकौशेयवाससः ।
ससदस्या विरेजुस्ते यथा वृत्रहणो ध्वरे ॥
४९॥
तस्य--उसके ; ऋत्विज: --पुरोहितगण; महा-राज--हे महान् राजा ( परीक्षित ); रत्त--रत्नों से; कौशेय--रेशमी; वासस: --तथा वस्त्र; स--सहित; सदस्या:--सभा के सदस्य; विरेजु:--तेजवान प्रतीत हो रहे थे; ते--वे; यथा--मानो; बृत्र-हण: --वृत्रको मारने वाले इन्द्र के; अध्वरे--यज्ञ में |
हे महाराज परीक्षित, रेशमी धोतियाँ पहने तथा रत्नजटित आभूषणों से अलंकृत वसुदेव केपुरोहितगण तथा सभा के कार्यकर्ता सदस्य इतने तेजवान दिख रहे थे, मानो बे वृत्र के मारने वाले इन्द्र की यज्ञशाला में खड़े हों।
तदा रामश्च कृष्णश्र स्वैः स्वैर्बन्धुभिरन्वितौ ।
रेजतुः स्वसुतैदारिर्जीवेशौ स्वविभूतिभि: ॥
५०॥
तदा--उस समय; राम:--बलराम; च--तथा; कृष्ण:--कृष्ण; च-- भी; स्वैः स्वै:--अपने अपने; बन्धुभि:--सम्बन्धियों से;अन्वितौ--साथ में; रेजतु:--शोभायमान हो रहे थे; स्व--अपने; सुतैः--पुत्रों के साथ; दारैः--तथा पत्नियों के साथ; जीव--सारे जीवों के; ईशौ--दोनों प्रभु; स्व-विभूतिभि:--अपने ऐश्वर्य के अंशों सहित।
उस समय समस्त जीवों के प्रभु बलराम तथा कृष्ण अपने अपने पुत्रों, पत्नियों तथा अन्यपारिवारिक सदस्यों के साथ, जो उनके ऐश्वर्य के अंशरूप थे, अत्यधिक शोभायमान हो रहे थे।
ईजेनुयज्ञं विधिना अग्निहोत्रादिलक्षणै: ।
प्राकृतैवेकृतैर्यस्रैर्द्रव्यज्ञानक्रियेश्वरम् ॥
५१॥
ईजे--पूजा की; अनु-यज्ञम्--हर तरह के यज्ञ से; विधिना--समुचित नियमों के द्वारा; अग्नि-होत्र--पवित्र अग्नि में आहुतियाँडाल कर; आदि--त्यादि; लक्षणै:--लक्षणों से युक्त; प्राकृत:--बिना किसी संशोधन के, श्रुति के आदेशों के सर्वथाअनुकूल; बैकृतैः--संशोधित, अन्य स्रोतों के लक्षणों के अनुसार समंजित; यज्जै:--यज्ञों से; द्रव्य--यज्ञ की साज-सामग्री के;ज्ञान--मंत्रों के ज्ञान के; क्रिया--तथा अनुष्ठानों के; ई श्वरमू-प्रभु को ।
विविध प्रकार के वैदिक यज्ञों को समुचित विधि-विधानों के अनुसार सम्पन्न करते हुएबसुदेव ने समस्त यज्ञों की साज-सामग्री सहित, मंत्रों तथा अनुष्ठानों द्वारा ईश्वर की पूजा की।
उन्होंने पवित्र अग्नि में आहुतियाँ डाल कर तथा यज्ञ-पूजा के अन्य पक्षों का पालन करते हुएमुख्य तथा गौण यज्ञों को सम्पन्न किया।
अथर्लिग्भ्योददात्काले यथाम्नातं स दक्षिणा: ।
स्वलड्ड तेभ्योउलड्डू त्य गोभूकन्या महाधना: ॥
५२॥
अथ--तब; ऋत्विग्भ्य:--पुरोहितों को; अददात्--दिया; काले--उचित समय पर; यथा-आम्नातम्--शास्त्रों के अनुसार;सः--उसने; दक्षिणा:--धन्यवाद की भेंटें; सु-अलड्डू तेभ्य:--सुन्दर ढंग से सजाई; अलइड्डू त्य--खूब सजाकर; गो--गौवें;भू-- भूमि; कन्या:-- तथा विवाहयोग्य कन्याएँ; महा--अत्यधिक; धना:--मूल्यवान |
तब उचित समय पर तथा शास्त्रों के अनुसार वसुदेव ने पुरोहितों को मूल्यवान आभूषणों सेअलंकृत किया, यद्यपि वे पहले से सुसज्जित थे और उन्हें गौवें, भूमि तथा विवाह योग्य कन्याओंके मूल्यवान उपहार दान में दिये।
पतीसंयाजावभृथ्यैश्वरित्वा ते महर्षयः ।
सस्नू रामह॒दे विप्रा यजमानपुरःसरा: ॥
५३॥
'पत्नी-संयाज-- अपनी पत्नी के साथ मिलकर किया गया अनुष्ठान; अवभृथ्यै;:--तथा अवभृथ्य नामक अन्तिम अनुष्ठान से;चरित्वा--सम्पन्न करके; ते--उन; महाऋषय: --महर्षियों ने; सस्नु;--स्नान किया; राम--परशुराम के; हृदे--सरोवर में;विप्रा:--ब्राह्मणों ने; यजमान--यज्ञकर्ता ( बसुदेव ) को; पुर:-सरा:--आगे करके |
पतलीसंयाज तथा अवश्ृथ्य अनुष्ठानों को सम्पन्न कराने के बाद महान ब्रह्मर्षियों ने यज्ञ केकर्ता वसुदेव को आगे करके, परशुराम सरोवर में स्नान किया।
स्नातोलड्डारवासांसि वन्दिभ्योउदात्तथा स्त्रिय: ।
ततः स्वलड्डू तो वर्णानाश्वभ्योउन्नेन पूजयत् ॥
५४॥
स्नातः--स्नान किये; अलड्जार--आभूषण; वासांसि--तथा वस्त्र; वन्दिभ्य:--वन्दीजनों को; अदातू--दिया; तथा-- भी;स्त्रियः--स्त्रियाँ; तत:--तब; सु-अलड्डू त:--सुन्दर आभूषणों से युक्त; वर्णानू--सारी जातियों के लोग; आ--तक; श्वभ्य:--कुत्तों को; अन्नेन-- भोजन से; पूजयत्--सम्मान किया।
पवित्र स्नान पूरा हो जाने पर, वसुदेव ने अपनी पत्नियों के साथ साथ पेशेवर वन्दीजनों कोवे आभूषण तथा वस्त्र दान में दिये, जिन्हें वे पहने हुए थे।
तब वसुदेव ने नवीन वस्त्र धारण कियेऔर उसके बाद सभी वर्णो के लोगों को, यहाँ तक कि कुत्तों को भी, भोजन कराकर सम्मानितकिया।
बन्धून्सदारान्ससुतान्पारिबहेण भूयसा ।
विदर्भकोशलकुरून्काशिकेकयसूझ्ञयान् ॥
५५॥
सदस्यर्त्विक्सुरगणान्रुभूतपितृचारणान् ।
श्रीनिकेतमनुज्ञाप्य शंसन्तः प्रययुः क्रतुम् ॥
५६॥
बन्धून्--अपने सम्बन्धियों; स-दारानू--पत्नियों समेत; स-सुतान्--अपने पुत्रों सहित; पारिबहेंण--भभेंटों सहित; भूयसा--ऐश्वर्यवान्; विदर्भ-कोशल-कुरून्ू-विदर्भ, कोशल तथा कुरुवंशियों के प्रमुखों को; काशि-केकय-सृज्ञलयान्ू--काशी, केकयतथा सृज्ञयवंशियों को भी; सदस्य--यज्ञसभा के सदस्यों; ऋत्विक्--पुरोहितों; सुर-गणान्--विविध श्रेणी के देवताओं को;नृ--मनुष्यों; भूत-- भूत-पिशाचों; पितृ--पूर्वजों; चारणान्ू--चारणों को, जो देवताओं की क्षुद्र श्रेणी के सदस्य हैं; श्री-निकेतम्--लक्ष्मी के निवास श्रीकृष्ण से; अनुज्ञाप्प--विदा लेकर; शंसन्त:--प्रशंसा करते हुए; प्रययु;--विदा ली; क्रतुम्--यज्ञ समाप्ति की
उन्होंने अपनी पत्नियों तथा पुत्रों सहित अपने सारे सम्बन्धियों, विदर्भ, कोशल, कुरु,काशी, केकय तथा सूझ्जय राज्यों के राजाओं, सभा के कार्यकर्ता सदस्यों तथा पुरोहितों, दर्शकदेवताओं, मनुष्यों, भूत-प्रेतों, पितरों तथा चारणों को बड़ी बड़ी भेंटें दीं।
तब लक्ष्मीनिवासभगवान् कृष्ण से अनुमति लेकर विविध अतिथि वसुदेव के यज्ञ की महिमा का गुणगान करतेवहाँ से विदा हुए।
धृतराष्ट्रोउनुजः पार्था भीष्मो द्रोण: पृथा यमौ ।
नारदो भगवान्व्यासः सुहत्सम्बन्धिबान्धवा: ॥
५७॥
बन्धून्परिष्वज्य यदून्सौहदाक्लिन्नचेतस: ।
ययुर्विरहकृच्छेण स्वदेशां श्वापरे जना: ॥
५८॥
धृतराष्ट्र: -- धृतराष्ट्र; अनुज: --( धृतराष्ट्र का ) छोटा भाई ( विदुर ); पार्था:--पृथा के पुत्र ( युधिष्ठिर, भीम तथा अर्जुन );भीष्म:-- भीष्म; द्रोण:--द्रोण; पृथा--कुन्ती; यमौ-- जुड़वाँ ( नकुल-सहदेव ); नारद:--नारद; भगवान् व्यास: --व्यासदेव;सुहत्--मित्र; सम्बन्धि--निकट सम्बन्धीगण; बान्धवा:--तथा अन्य सम्बन्धी; बन्धूनू--सम्बन्धी तथा मित्रों को; परिष्वज्य--आलिंगन करके; यदून्ू--यदुओं को; सौहद--मैत्री भाववश; आक्लन्न--द्रवित; चेतस:--हृदयों वाले; ययु:--चले गये;विरह--विछोह से; कृच्छेण -- कठिनाई से; स्व--अपने अपने; देशान्--राज्यों को; च-- भी; अपरे--अन्य; जना:--लोग
यदुओं के मित्रों, निकट परिवार के सदस्यों तथा अन्य सम्बन्धियों ने, जिनमें धृतराष्ट्र तथाउसके छोटे भाई विदुर, पृथा तथा उसके पुत्र, भीष्म, द्रोण, जुड़वाँ भाई नकुल एवं सहदेव, नारदतथा भगवान् व्यासदेव सम्मिलित थे, यदुओं का आलिंगन किया।
स्नेह से द्रवित हृदयों वाले येतथा अन्य अतिथिगण अपने अपने राज्यों के लिए प्रस्थान कर गये, किन्तु इनकी गति विरह कीपीड़ा के कारण मन्द पड़ गई थी।
नन्दस्तु सह गोपालैरबहत्या पूजयार्चित: ।
कृष्णरामोग्रसेनाञैर्न्यवात्सीद्वन्थुवत्सल: ॥
५९॥
नन्दः--नन्द महाराज; तु--तथा; सह--साथ; गोपालैः --ग्वालों के; बृहत्या--विशेष रूप से ऐश्वर्यवान्; पूजया--पूजा सहित;अर्चितः--सम्मानित; कृष्ण-राम-उग्रसेन-आद्यै:--कृष्ण, बलराम, उग्रसेन तथा अन्यों द्वारा; न्यवात्सीत्ू--रूक गये; बन्धु--अपने सम्बन्धियों के प्रति; वत्सलः--स्नेहिल ।
ग्वालों समेत नन््द महाराज ने अपने यदु-सम्बन्धियों के साथ वहाँ कुछ दिन और रह करअपना स्नेह दर्शाया।
उनके इस विश्राम-काल में कृष्ण, बलराम, उग्रसेन तथा अन्यों ने उनकीवृहद् ऐश्वर्ययुक्त पूजा करके उनका सम्मान किया।
वसुदेवोञ्सोत्तीर्य मनोरथमहार्णवम् ।
सुहृद्बुतः प्रीतमना नन्दमाह करे स्पृशन् ॥
६०॥
वसुदेव:--वसुदेव; अज्ञसा--आसानी से; उत्तीर्य--पार करके; मनः-रथ-- अपनी इच्छाओं ( यज्ञ करने की ) के; महा--विशाल; अर्णवम्--सागर को; सुहृत्--अपने शुभचिन्तकों द्वारा; वृत:--घिरे हुए; प्रीत--प्रसन्न; मना:--अपने मन में; नन्दम्--ननन््द से; आह--कहा; करे--हाथ का; स्पृशन्--स्पर्श करते हुए
अपनी इच्छाओं रूपी विशाल सागर को इतनी आसानी से पार कर लेने पर वसुदेव को पूर्णतुष्टि का अनुभव हुआ।
उन्होंने अपने अनेक शुभचिन्तकों की संगति में उन्होंने नन्द महाराज काहाथ पकड़ कर, उनसे इस प्रकार कहा।
श्रीवसुदेव उवाचभ्रातरीशकृतः पाशो नूनां यः स्नेहसंज्ञितः ।
त॑ दुस्त्यजमहं मन्ये शूराणामपि योगिनाम् ॥
६१॥
श्री-वसुदेवः उवाच-- श्री वसुदेव ने कहा; भ्रात:--हे भाई; ईश-- भगवान् द्वारा; कृत:--तैयार किया गया; पाश:--फन्दा,बन्धन; नृणाम्-मनुष्यों के; यः--जो; स्नेह--स्नेह; संज्ञितः--नामक; तम्--उसको; दुस्त्यजम्--छुड़ा पाना कठिन; अहमू--मैं; मन्ये--सोचता हूँ; शूराणाम्--वीरों के लिए; अपि-- भी; योगिनाम्--तथा योगियों के लिए।
श्री वसुदेव ने कहा : हे भ्राता, स्वयं भगवान् ने स्नेह नामक गाँठ बाँधी है, जो मनुष्यों कोहढ़तापूर्वक एक-दूसरे से बाँधे रखती है।
मुझे लगता है कि बड़े बड़े वीरों तथा योगियों तक कोइससे छूट पाना कठिन होता है।
अस्मास्वप्रतिकल्पेयं यत्कृताज्ञेषु सत्तमैः ।
मैत्ररर्पिताफला चापि न निवर्तेत कहिंचित् ॥
६२॥
अस्मासु--हमारे लिए; अप्रतिकल्पा--अतुलनीय ; इयम्--यह; यत्--चूँकि; कृत-अज्ञेषु-- अपने ऊपर दिखाई गई दया के प्रतिजो विस्मरणशील हैं; सत्-तमैः--अत्यन्त साधु-पुरुषों द्वारा; मैत्री--मित्रता; अर्पिता--अर्पित की हुई; अफला--जिससेआदान-प्रदान न हुआ हो; च अपि--यद्यपि; न निवर्तेत--रूकती नहीं; कहिंचित्ू--कभी |
निस्सन्देह, भगवान् ने ही स्नेह के बन्धनों की रचना की होगी, क्योंकि आप जैसे महान्सन््तों ने कभी भी हम अकृतज्ञों के प्रति अपनी अद्वितीय मैत्री प्रदर्शित करना बन्द नहीं किया,यद्यपि इसका समुचित आदान-प्रदान नहीं हुआ।
प्रागकल्पाच्च कुशल भ्रातर्वों नाचराम हि ।
अधुना श्रीमदान्धाक्षा न पश्याम: पुर: सतः ॥
६३॥
प्राकु-पूर्वकाल में; अकल्पात्--अक्षमता के कारण; च--तथा; कुशलम्--कुशलता; भ्रात:--हे भाई; वः--तुम्हारा; नआचराम--हमने माना नहीं; हि--निस्सन्देह; अधुना--अब; श्री--ऐश्वर्य; मद--नशे के कारण; अन्ध--अन्धी बन कर;अक्षा:--जिनकी आँखें; न पश्याम:--हम देख नहीं पाते; पुरः--सामने; सत:ः--उपस्थित, वर्तमान
हे भ्राता, इसके पूर्व हमने आपके लाभ की कोई बात नहीं की, क्योंकि हम ऐसा करने मेंअशक्त थे।
तो भी इस समय, यद्यपि आप हमारे समक्ष उपस्थित हैं, हमारी आँखें भौतिकसौभाग्य के मद से इस तरह अन्धी हो चुकी हैं कि हम आपकी उपेक्षा करते ही जा रहे हैं।
मा राज्यश्रीरभूत्पुंसः श्रेयस्कामस्य मानद ।
स्वजनानुत बन्धून्वा न पश्यति ययान्धद्कू ॥
६४॥
मा--मत; राज्य--राजा की; श्री:--लक्ष्मी; अभूत्ू--उदय होती है; पुंसः--एक व्यक्ति के लिए; श्रेय:--जीवन का असलीलाभ; कामस्य--चाहने वाले का; मान-द--हे सम्मान प्रदान करने वाले; स्व-जनान्--अपने निकट सम्बन्धियों को; उत--भी;बन्धूनू--अपने मित्रों के; वा--अथवा; न पश्यति--नहीं देखता; यया--जिस ( ऐश्वर्य ) से; अन्ध--अन्धी हुई; दक्--दृष्टि |
है अत्यन्त आदरणीय, ईश्वर करे कि जो व्यक्ति जीवन में सर्वोच्च लाभ प्राप्त करना चाहतेहैं, वे कभी भी राजसी एऐश्वर्य प्राप्त न कर पायें, क्योंकि इससे वे अपने परिवार तथा मित्रों की आवश्यकताओं के प्रति अंधे बन जाते हैं।
रीशुक उवाचएवं सौहदशैधिल्यचित्त आनकदुन्दुभि: ।
रुरोद तत्कृतां मैत्रीं स्मरन्नश्रुविलोचन: ॥
६५॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस तरह; सौहद--घनिष्ठ संवेदना द्वारा; शैधिल्य--मृदु बनाये गये;चित्त:--हदय वाले; आनकदुन्दुभि:--वसुदेव द्वारा; रुरोद--रो पड़ा; तत्--उसके ( नन्द के ) द्वारा; कृतामू--किया गया;मैत्रीमू-मित्रता के कार्य; स्मरन्ू--स्मरण करते हुए; अश्रु--आँसू; विलोचन: --आँखों में |
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : घनिष्ठ संवेदना के कारण हृदय द्रवित होने से वसुदेव रो पड़े।
उनके नेत्र आँसुओं से डबडबा आये, जब उन्होंने अपने प्रति प्रदर्शित नन्द की मित्रता का स्मरणकिया।
नन्दस्तु सख्यु: प्रियकृत्प्रेम्णा गोविन्दरामयो: ।
अद्य श्र इति मासांस्त्रीन्यदुभिर्मानितोउबसत् ॥
६६॥
नन्दः--नन्द; तु--तथा; सख्यु:--अपने मित्रों को; प्रिय--स्नेह; कृतू--दिखलाने वाला; प्रेम्णा--प्रेमवश; गोविन्द-रामयो: --कृष्ण तथा बलराम के लिए; अद्य--आज ( देर से जाऊँगा ); श्र:--( मैं ) कल ( जाऊँगा ); इति--इस प्रकार; मासान्ू--महीने;त्रीनू--तीन; यदुभि:--यदुओं द्वारा; मानित:--सम्मानित; अवसत्--रहता रहा।
नन्द भी अपने मित्र वसुदेव के प्रति स्नेह से भरपूर थे।
अतः बात के दिनों में नन्द बारम्बारयही कहते, 'मैं आज ही कुछ समय के बाद जाने वाला हूँ' तथा 'मैं कल जाऊँगा।
' किन्तुकृष्ण तथा बलराम के स्नेह के कारण, वे समस्त यदुओं द्वारा सम्मानित होकर और तीन मासतक रहते रहे।
ततः कामै: पूर्यमाण: सब्रजः सहबान्धव: ।
परार्ध्या भरणक्षौमनानानर्ध्यपरिच्छदै: ॥
६७॥
बसुदेवोग्रसेनाभ्यां कृष्णोद्धवबलादिभि: ।
दत्तमादाय पारिब्ई यापितो यदुभिर्ययों ॥
६८ ॥
ततः--तब; कामै:--इच्छित वस्तुओं से; पूर्यमाण:--तृप्त; स-ब्रज:--व्रजवासियों सहित; सह-बान्धव:--अपने परिवार वालोंके साथ; पर--अत्यन्त; अर्ध्य--मूल्यवान; आभरण--आशभूषणों से; क्षौम--महीन मखमल; नाना--विविध; अनर्घ्य--अमूल्य;परिच्छदैः--तथा घरेलू साज-सामान से; वसुदेव-उग्रसेना भ्याम्--वसुदेव तथा उग्रसेन द्वारा; कृष्ण-उद्धव-बल-आदिभि:--तथाकृष्ण, उद्धव, बलराम आदि के द्वारा; दत्तमू--दिया हुआ; आदाय--लेकर; पारिब्म्--उपहारों को; यापित:--विदा किया;यदुभिः--यदुओं द्वारा; ययौ--विदा हो गया।
जब वसुदेव, उग्रसेन, कृष्ण, उद्धव, बलराम तथा अन्य लोग नन्द की इच्छाएँ पूरी कर चुकेतथा बहुमूल्य आभूषण, महीन मलमल तथा नाना प्रकार की बहुमूल्य घरेलू सामग्री भेंट करचुके, तो नन््द महाराज ने ये सारी भेंटें स्वीकार कर लीं और सभी यदुओं से विदा ली तथा वेअपने पारिवारिक सदस्यों तथा व्रजवासियों के साथ रवाना हो गये।
नन्दो गोपास्' च गोप्यश्च गोविन्दचरणाम्बुजे ।
मनः क्षिप्तं पुनईर्तुमनीशा मथुरां ययु: ॥
६९॥
नन्दः--नन्द; गोपा:ः--ग्वाले; च--तथा; गोप्य: --गोपियाँ; च-- भी; गोविन्द--कृष्ण के; चरण-अम्बुजे--चरणकमलों पर;मनः--उनके मन; क्षिप्तमू-फेंके हुए; पुनः--फिर; हर्तुमू--दूर करने के लिए; अनीशा:--असमर्थ; मथुराम्--मथुरा; ययु:--चले गये
भगवान् गोविन्द के चरणकमलों पर समर्पित अपने मन को वहाँ से विलग कर पाने मेंअसमर्थ नन्द तथा ग्वाल-ग्वालिनें मथुरा लौट गए।
बन्धुषु प्रतियातेषु वृष्णय: कृष्णदेवता: ।
वीक्ष्य प्रावृषमासन्नाद्ययुर्द्दारवर्ती पुन: ॥
७०॥
बन्धुषु--अपने सम्बन्धियों से; प्रतियातेषु--विदा होकर; वृष्णय:--वृष्णिजन; कृष्ण-देवता:--जिनके आराध्यदेव कृष्ण थे;वीक्ष्य--देखकर; प्रावृषम्--वर्षाऋतु; आसन्नातू--सन्निकट; ययु:--गये; द्वारवतीम्--द्वारका; पुन:--फिर |
इस तरह जब उनके सम्बन्धी विदा हो चुके और जब उन्होंने वर्षाऋतु को निकट आते देखा,तो वृष्णिजन, जिनके एकमात्र स्वामी कृष्ण थे, द्वारका वापस चले गये।
जनेभ्य: कथयां चक्रुर्यदुदेवमहोत्सवम् ।
यदासीत्तीर्थयात्रायां सुहत्सन्दर्शनादिकम् ॥
७१॥
जनेभ्य:--लोगों को; कथयाम् चक्करु:--कह सुनाया; यदु-देव--यदुओं के स्वामी वसुदेव का; महा-उत्सवम्--महान् उत्सव;यत्--जो; आसीत्--घटना घटी; तीर्थ-यात्रायाम्--ती र्थयात्रा के दौरान; सुहृत्ू-मित्रों के; सन्दर्शन--दर्शन करने;आदिकम्ू--इत्यादि।
उन्होंने नगर के लोगों को यदुओं के स्वामी वसुदेव द्वारा सम्पन्न यज्ञोत्सवों के बारे में तथाउनकी तीर्थयात्रा के दौरान, जो भी घटनाएँ घटी थीं, विशेष रूप से, जिस तरह वे अपनेप्रियजनों से मिले, इन सबके बारे में कह सुनाया।
