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अध्याय पचासी: भगवान कृष्ण ने वासुदेव को निर्देश दिया और देवकी के पुत्रों को पुनः प्राप्त किया
10.85श्रीबादरायणिरुवाचअथैकदात्मजौ प्राप्तौ कृतपादाभिवन्दनौ ।
वसुदेवोभिनन्द्याह प्रीत्या सड्डर्षणाच्युतौ ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उबाच-- श्री बादरायणि ( शुकदेव गोस्वामी ) ने कहा; अथ--तब; एकदा--एक दिन; आत्मजौ--दोनों पुत्र;प्राप्ती--उनके पास आये; कृत--करके; पाद--चरणों का; अभिवन्दनौ--आदर; वसुदेव: --वसुदेव ने; अभिनन्द्य--उनकासत्कार करके; आह--कहा; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक; सड्भूर्षण-अच्युतौ--बलराम तथा कृष्ण से
श्री बादरायण ने कहा : एक दिन वसुदेव के दोनों पुत्र संकर्षण तथा अच्युत उनके( बसुदेव के ) पास आये और उनके चरणों पर नतमस्तक होकर प्रणाम किया।
वसुदेव ने बड़े हीस्नेह से उनका सत्कार किया और उनसे इस प्रकार बोले।
मुनीनां स बच: श्रुत्वा पुत्रयोर्धामसूचकम् ।
तद्दीर्यर्जातविश्रम्भ: परिभाष्याभ्यभाषत ॥
२॥
मुनीनाम्-मुनियों के; सः--उसने; बच: --शब्द; श्रुत्वा--सुन कर; पुत्रयो: --अपने दोनों पुत्रों की; धाम--शक्ति; सूचकम्--बताने वाले; तत्--उनके; वीर्यैं:--वीरतापूर्ण कार्यों से; जात--उत्पन्न; विस्त्रम्भ:--संकल्प; परिभाष्य--नाम लेकर;अभ्यभाषत--उनसे कहा |
अपने दोनों पुत्रों की शक्ति के विषय में महर्षियों के कथन सुन कर तथा उनके बीरतापूर्णकार्यो को देख कर वसुदेव को उनकी दिव्यता पर पूरा-पूरा विश्वास हो गया।
अतः उनका नामलेकर, वे उनसे इस प्रकार बोले।
कृष्ण कृष्ण महायोगिन्सड्डूर्षण सनातन ।
जाने वामस्य यत्साक्षात्प्रधानपुरुषी परौ ॥
३॥
कृष्ण कृष्ण--हे कृष्ण, हे कृष्ण; महा-योगिन्--हे महान् योगी; सड्डूर्षण--हे बलराम; सनातन--नित्य; जाने--मैं जानता हूँ;वाम्--तुम दोनों को; अस्य--इस ( ब्रह्माण्ड ) के; यत्--जो; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; प्रधान--प्रकृति का सृजनात्मक तत्त्व;पुरुषौ--तथा स्त्रष्टा भगवान्; परौ--परम
वसुदेव ने कहा : हे कृष्ण, हे कृष्ण, हे योगी श्रेष्ठ, हे नित्य संकर्षण, मैं जानता हूँ कि तुमदोनों निजी तौर पर ब्रह्माण्ड की सृष्टि के कारणस्वरूप और साथ ही साथ सृष्टि के अवबयव भीहो।
यत्र येन यतो यस्य यस्मै यद्यद्यथा यदा ।
स्यादिदं भगवान्साक्षात्प्रधानपुरुषे श्वर: ॥
४॥
यत्र--जिसमें; येन--जिसके द्वारा; यतः--जिससे; यस्य--जिसका; यस्मै--जिसको; यत् यत्--जो जो; यथा--फिर भी;यदा--जब भी; स्थात्--हो; इृदम्--इस ( सृष्टि ) को; भगवान्-- भगवान्; साक्षात्-- अपनी उपस्थिति में; प्रधान-पुरुष--प्रकृति तथा उसके स्त्रष्टा ( महाविष्णु ) के; ईश्वरः --अधिष्ठता |
आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, जो प्रकृति तथा प्रकृति के स्त्रष्टा ( महाविष्णु ) दोनों केस्वामी के रूप में प्रकट होते हैं।
फिर भी प्रत्येक वस्तु जिस का अस्तित्व बनता है और जब कभीऐसा होता है, वह आपके भीतर, आपके द्वारा, आपसे, आपके लिए तथा आपसे ही सम्बन्धित होती है।
एतन्नानाविध॑ विश्वमात्मसृष्टमधोक्षज ।
आत्मनानुप्रविश्यात्मन्प्राणो जीवो बिभर्ष्यवज ॥
५॥
एतत्--इस; नाना-विधम्--विविध; विश्वम्--ब्रह्मण्ड को; आत्म--अपने द्वारा; सृष्टम्-उत्पन्न किये गये; अधोक्षज--हे दिव्यप्रभु; आत्मना--अपने में ( परमात्मा रूप में ); अनुप्रविश्य-- भीतर प्रवेश करके; आत्मन्--हे परमात्मा; प्राण: --प्राण, तत्त्व;जीव:--तथा चेतना तत्त्व; बिभर्षि--पालन करते हो; अज--हे अजन्मा |
हे दिव्य प्रभु, आपने इस विचित्र ब्रह्माण्ड की रचना अपने में से की और तब अपने परमात्मास्वरूप में आप इसके भीतर प्रविष्ट हुए।
इस तरह हे अजन्मा परमात्मा, आप प्रत्येक व्यक्ति केप्राण तथा चेतना के रूप में सृष्टि का पालन करने वाले हैं।
प्राणादीनां विश्वसृजां शक्तयो या: परस्य ता: ।
पारतन्त्याद्वैसादृष्यादूदवयो श्रेष्टव चेष्टताम् ॥
६॥
प्राण-- प्राण; आदीनाम्ू--इत्यादि का; विश्व--ब्रह्माण्ड का; सृजामू--सृजनकारी तत्त्व; शक्तय:--शक्तियाँ; या:--जो;'परस्य--परमात्मा की; ताः--वे; पारतन्त्रयातू--परतंत्रता के कारण; बैसाहश्यात्ू--असमानता के कारण; द्वयो:--दोनों( चराचर ) की; चेष्टा--क्रियाशीलता; एब--केवल; चेष्टताम्ू--सक्रिय जीवों की ( प्राण इत्यादि की )॥
प्राण तथा ब्रह्मण्ड-सृजन के अन्य तत्त्व, जो भी शक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं, वे वास्तव मेंभगवान् की निजी शक्तियाँ हैं, क्योंकि प्राण तथा पदार्थ दोनों ही उनके अधीन तथा उनकेआश्ित हैं और एक-दूसरे से भिन्न भी हैं।
इस तरह इस भौतिक जगत की प्रत्येक सक्रिय वस्तुभगवान् द्वारा ही गतिशील बनाई जाती है।
कान्तिस्तेज: प्रभा सत्ता चन्द्राग्न्यर्क क्षविद्युताम् ।
यस्थेर्य भूभूतां भूमेर्वृत्तिर्गन््धोर्थतो भवान् ॥
७॥
कान्तिः--आकर्षक चमक; तेज:--चटक; प्रभा-- प्रकाश; सत्ता--तथा विशिष्ट अस्तित्व; चन्द्र--चन्द्रमा; अग्नि-- आग;अर्क--सूर्य; ऋक्ष --तारे; विद्युतामू--तथा बिजली के; यत्--जो; स्थैर्यम्ू--स्थायित्व; भू-भृूताम्--पर्वतों के; भूमेः --पृथ्वीके; वृत्तिः--धारणशक्ति का गुण; गन्ध: --सुगन्धि; अर्थतः--सचमुच; भवान्ू-- आप
चन्द्रमा की कान्ति, अग्नि का तेज, सूर्य की चमक, तारों का टिमटिमाना, बिजली कीदमक, पर्वतों का स्थायित्व तथा पृथ्वी की सुगंध एवं धारणशक्ति--ये सब वास्तव में आप हीहैं।
तर्पणं प्राणनमपां देव त्वं ताश्न तद्रसः ।
ओज: सहो बल चेष्टा गतिर्वायोस्तवेश्वर ॥
८॥
तर्पणम्--संतोष उत्पन्न करने की क्षमता; प्राणनम्--जीवनदान; अपाम्--जल का; देव--हे प्रभु; त्वम्ू--तुम; ता:ः--वही( जल ); च--तथा; तत्--उस ( जल ) का; रसः--आस्वाद; ओज: --शारीरिक उष्णता तथा प्राण-वायु के कारण जीवन-शक्ति; सह:--मानसिक शक्ति; बलमू--शारीरिक शक्ति; चेष्टा-- प्रयास; गति:--तथा चाल-फेर; वायो:--वायु का; तव--तुम्हारा; ईश्वर--हे परम नियन्ता।
हे प्रभु, आप जल हैं और इसका आस्वाद तथा प्यास बुझाने एवं जीवन धारण करने कीक्षमता भी हैं।
आप अपनी शक्तियों का प्रदर्शन वायु के द्वारा शरीर की उष्णता, जीवन-शक्ति,मानसिक शक्ति, शारीरिक शक्ति, प्रयास तथा गति के रूप में करते हैं।
दिशां त्वमवकाशोसि दिश: खं स्फोट आश्रय: ।
नादो वर्णस्त्वम्ड४कार आकृतीनां पृथक्ृति: ॥
९॥
दिशाम्ू--दिशाओं के; त्वमू--तुम; अवकाश:--सहनशक्ति; असि--हो; दिशः--दिशाएँ; खम्-- आकाश; स्फोट:--धध्वनि;आश्रयः--अपने आधार के रूप ( आकाश ); नाद:--अप्रकट गूँज के रूप में ध्वनि; वर्ण:--आदि अक्षर; त्वमू--तुम; ३४७-कार:ः--ओम्; आकृतीनाम्--विशेष रूपों के; पृथक्-कृतिः--अन्तर का कारण ( अर्थात् प्रकट भाषा )॥
आप ही दिशाएँ एवं उनकी अनुकूलन-क्षमता, सर्वव्यापक आकाश तथा इसके भीतर वासकरने वाली ध्वनि ( स्फोट ) हैं।
आप आदि अप्रकट ध्वनि रूप हैं, आप ही प्रथम अक्षर ३% हैंऔर आप ही श्रव्य वाणी हैं, जिसके द्वारा शब्दों के रूप में ध्वनि विशिष्ट प्रसंग बन जाती है।
इन्द्रियं त्विन्द्रियाणां त्वं देवाश्व॒ तदनुग्रहः ।
अवबोधो भवानज्बुद्धेर्जीवस्यानुस्मृति:ः सती ॥
१०॥
इन्द्रियम्ू--वस्तुओं को प्रकाशित करने की शक्ति; तु--तथा; इन्द्रियाणाम्ू--इन्द्रियों के; त्वम्--तुम; देवा: --देवता ( जोविविध इन्द्रियों का नियमन करते हैं )) च--एवं; तत्--उनका ( देवताओं की ); अनुग्रह:--कृपा ( जिसके द्वारा इन्द्रियाँ कार्यकर सकती हैं ); अवबोध:--निर्णय लेने की शक्ति; भवान्--आप; बुद्धेः--बुद्धि की; जीवस्थ--जीव की; अनुस्मृति:--स्मरण रखने की शक्ति; सती--सही सही
आप वस्तुओं को प्रकट करने की इन्द्रिय-शक्ति, इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता तथा ऐन्द्रियकार्यों को करने के इन देवताओं द्वारा दिये गये अधिकार हैं।
आप निर्णय लेने की बुद्धि-क्षमतातथा जीव द्वारा वस्तुओं को सही सही स्मरण रखने की क्षमता हैं।
भूतानामसि भूतादिरिन्द्रियाणां च तैजसः ।
वैकारिको विकल्पानां प्रधानमनुशायिनम् ॥
११॥
भूतानामू-- भौतिक तत्त्वों के; असि--हो; भूत-आदि: --उनका स्त्रोत, तमोगुणी मिथ्या अहंकार; इन्द्रियाणाम्--इन्द्रियों के;च--तथा; तैजस:--रजोगुणी मिथ्या अहंकार; वैकारिक:--सतोगुणी मिथ्या अहंकार; विकल्पानाम्--सृजनकारी देवताओं के;प्रधानम्--अप्रकट सम्पूर्ण भौतिक शक्ति; अनुशायिनम्-- आधारभूत |
आप ही तमोगुणी मिथ्या अहंकार हैं, जो भौतिक तत्त्वों का स्रोत है; आप रजोगुणी मिथ्याअहंकार हैं, जो शारीरिक इन्द्रियों का स्त्रोत है; सतोगुणी मिथ्या अहंकार हैं, जो देवताओं कास्त्रोत है तथा आप ही अप्रकट सम्पूर्ण भौतिक शक्ति हैं, जो हर वस्तु की मूलाधार है।
नश्वरेष्विह भावेषु तदसि त्वमनश्वरम् ।
यथा द्रव्यविकारेषु द्र॒व्यमात्रं निरूपितम् ॥
१२॥
नश्वरेषु--नश्वर; इहह--इस संसार में; भावेषु--जीवों में; तत्--वह; असि--हो; त्वमू--तुम; अनश्वरम्-- अनश्वर; यथा--जिसतरह; द्रव्य--पदार्थ के; विकारेषु--रूपान्तरों में; द्रव्य-मात्रमू--स्वयंपदार्थ; निरूपितम्--सुनिश्चित किया हुआ।
आप इस जगत की समस्त नश्वर वस्तुओं में से एकमात्र अनश्वर जीव हैं, जिस तरह कोईमूलभूत वस्तु अपरिवर्तित रहती दिखती है, जबकि उससे बनी वस्तुओं में रूपान्तर आ जाता है।
सत्त्वम्रजस्तम इति गुणास्तद्वत्तयश्च या: ।
त्वय्यद्धा ब्रह्मणि परे कल्पिता योगमायया ॥
१३॥
सत्त्वम् रज: तमः इति--सतो, रजो तथा तमोगुण नामक; गुणा:-- प्रकृति के गुण; तत्--उनके; वृत्तय:--कार्य; च--तथा;या:--जो; त्वयि--तुममें; अद्धा:--प्रकट रूप से; ब्रह्मणि--परब्रह्म में; परे--परम; कल्पिता:--नियोजित; योग-मायया--योगमाया ( भगवान् की अन्तरंगा शक्ति जो उनकी लीलाओं को सुगम बनाती है ) द्वाराप्रकृति के गुण--यथा सतो, रजो तथा तमो गुण--अपने सारे कार्यो समेत
आप अर्थात्परम सत्य के भीतर आपकी योगमाया की व्यवस्था के द्वारा सीधे प्रकट होते हैं।
तस्मान्न सन्त्यमी भावा यर्हिं त्वयि विकल्पिता: ।
त्वं चामीषु विकारेषु ह्ान्यदाव्यावहारिकः ॥
१४॥
तस्मात्ू--इसलिए; न--नहीं; सन्ति--हैं; अमी --ये; भावा:--जीव; यर्हि-- जब; त्वयि--तुममें; विकल्पिता: --व्यवस्थित;त्वमू--तुम; च-- भी; अमीषु--इनके भीतर; विकारेषु--सृष्टि के फल, विकार; हि--निस्सन्देह; अन्यदा--किसी अन्य समय;अव्यावहारिक:--अ-भौतिक
इस तरह प्रकृति के विकार स्वरूप ये सृजित जीव तभी विद्यमान रहते हैं, जब भौतिकप्रकृति उन्हें आपके भीतर प्रकट करती है।
उस समय आप भी उनके भीतर प्रकट होते हैं।
किन्तुसृजन के ऐसे अवसरों के अतिरिक्त आप दिव्य सत्य की भाँति अकेले रहते हैं।
गुणप्रवाह एतस्मिन्नबुधास्त्वखिलात्मन: ।
गतिं सूक्ष्मामबोधेन संसरन्तीह कर्मभि: ॥
१५॥
गुण--गुणों के; प्रवाहे--प्रवाह में; एतस्मिनू--इस; अबुधा:--अज्ञानी; तु--लेकिन; अखिल--हर वस्तु का; आत्मन:--आत्माका; गतिमू--गन्तव्य; सूक्ष्मम्--दिव्य; अबोधेन--ज्ञान का अभाव होने से; संसरन्ति--जन्म-पमृत्यु के चक्र में घूमते हैं; इह--इस जगत में; कर्मभि:ः -- भौतिक कार्य से बाध्य होकर।
वे सचमुच अज्ञानी हैं, जो इस जगत में भौतिक गुणों के निरन्तर प्रवाह के भीतर बन्दी रहते हुए आपको अपने चरम सूक्ष्म गन्तव्य परमात्मा स्वरूप जान नहीं पाते।
अपने अज्ञान के कारणभौतिक कर्म का बन्धन ऐसे जीवों को जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमने के लिए बाध्य कर देता है।
यहच्छया नृतां प्राप्प सुकल्पामिह दुर्लभाम् ।
स्वार्थ प्रमत्तस्य वयो गत त्वन्माययेश्वर ॥
१६॥
यहच्छया--जैसे तैसे; नृतामू--मानव पद; प्राप्प--प्राप्त करके; सु-कल्पाम्--उपयुक्त; इहह--इस जीवन में; दुर्लभाम्--प्राप्तकरना कठिन; स्व--अपने; अर्थ--कल्याण के विषय में; प्रमत्तस्य--प्रमत्त अर्थात् मूढ़ के; वयः--आयु; गतम्--बीती हुई;त्वत्-तुम्हारी; मायया--माया द्वारा; ईश्वर--हे प्रभु |
सौभाग्य से जीव स्वस्थ मनुष्य-जीवन प्राप्त कर सकता है, जो कि विरले ही प्राप्त होनेवाला सुअवसर होता है।
किन्तु हे प्रभु, यदि इतने पर भी वह अपने लिए, जो सर्वोत्तम है, उसकेविषय में मोहग्रस्त रहता है, तो आपकी माया उसको अपना सारा जीवन नष्ट करने के लिए बाध्यकर सकती है।
असावहम्ममैवैते देहे चास्यान्वयादिषु ।
स्नेहपाशर्निबध्नाति भवान्सर्वमिदं जगत् ॥
१७॥
असौ--यह; अहम्--मैं; मम--मेरा; एव--निस्सन्देह; एते--ये; देहे--शरीर में; च--तथा; अस्य--इसका; अन्वय-आदिषु--सनन््तान तथा अन्य सम्बद्ध वस्तुओं में; स्नेह--स्नेह को; पाशैः--रस्सियों से; निबध्नाति--बाँधते हैं; भवान्--आप; सर्वम्--समस्त; इृदम्--इस; जगत्--संसार को
आप स्नेह की रस्सियों से इस सारे संसार को बाँधे रहते हैं, अत: जब लोग अपने भौतिकशरीरों पर विचार करते हैं, तो वे सोचते हैं, 'यह मेरा है!' और जब वे अपनी सनन््तान तथा अन्यसम्बन्धियों पर विचार करते हैं, तो वे सोचते हैं, 'ये मेरे हैं।
युवां न नः सुतौ साक्षात्प्रधानपुरुषे श्वरौ ।
भूभारक्षत्रक्षपण अवतीर्णों तथात्थ ह ॥
१८॥
युवाम्ू--तुम दोनों; न--नहीं; न:--हमारे; सुतौ--पुत्र; साक्षात्- प्रत्यक्ष; प्रधान-पुरुष-- प्रकृति तथा इसके स्त्रष्टा ( महाविष्णु )के; ईश्वरौ--परम नियन्ता; भू--पृथ्वी के; भार--बोझा; क्षत्र--राजा; क्षपणे--विनाश करने के लिए; अवतीर्णौं--अवतरितहुए; तथा--ऐसा; आत्थ--आपने कहा है; ह--निस्सन्देह
आप दोनों हमारे पुत्र नहीं हैं, अपितु प्रकृति तथा उसके स्त्रष्टा ( महाविष्णु ) दोनों ही केस्वामी हैं।
जैसा कि आपने स्वयं हमसे कहा है, आप पृथ्वी को उन शासकों से मुक्त करने केलिए अवतरित हुए हैं, जो उस पर अत्यधिक भार बने हुए हैं।
तत्ते गतोस्म्थरणमद्य पदारविन्द-मापन्नसंसूतिभयापहमार्तबन्धो ।
'एतावतालमलमिन्द्रियलालसेनमर्त्यात्महक्त्वयि परे यदपत्यबुद्धि: ॥
१९॥
तत्--इसलिए; ते--तुम्हारी; गत:--आया हुआ; अस्मि--हूँ; अरणम्--शरण के लिए; अद्य--आज; पाद-अरविन्दम्--चरणकमलों पर; आपन्न--शरणागतों के लिए; संसृति-- भौतिक बन्धन का; भय--डर; अपहम्--जो दूर करते हैं; आर्त--दुखियों के; बन्धो--हे मित्र; एतावता--इतना; अलम् अलमू--बस, बस ( बहुत हुआ ); इन्द्रिय--इन्द्रिय-भोग के लिए;लालसेन--लालसा से; मर्त्य--मरणशील ( भौतिक देह ) के रूप में; आत्म--स्वयं; हक्--जिनकी दृष्टि; त्वयि--तुम्हारे प्रति;परे--परम; यत्--जिसके कारण ( लालसा ); अपत्य--सनन््तान; बुर्दधिः--मानसिकता |
इसलिए, हे दुखियों के मित्र, अब मैं शरण के लिए आपके चरणकमलों के पास आयाहूँ--ये वही चरणकमल हैं, जो शरणागतों के सारे संसारिक भय को दूर करने वाले हैं।
बस,इन्द्रिय-भोग की लालसा बहुत हो चुकी, जिसके कारण मैं अपनी पहचान इस मर्त्य शरीर से करता हूँ और आपको अर्थात् परम पुरुष को अपना पुत्र समझता हूँ।
सूतीगृहे ननु जगाद भवानजो नौसजञ्ञज्ञ इत्यनुयुगं निजधर्मगुप्त्ये ।
नानातनूर्गगनवद्विदधजहासिको वेद भूम्न उरुगाय विभूतिमायाम् ॥
२०॥
सूती-गृहे--प्रसूति-गृह में; ननु--निस्सन्देह; जगाद--कहा; भवान्--आप; अज:--अजन्मा भगवान्; नौ--हमको; सझ्ज्ञे--आपने जन्म लिया; इति--इस प्रकार; अनु-युगम्--युग-युग में; निज-- अपना; धर्म--धर्म; गुप्त्य--रक्षा करने के लिए;नाना--विविध; तनू:--दैवी शरीर; गगन-वत्--बादल की तरह; विदधत्-- धारण करके; जहासि--छिपा देते हो; कः--कौन;वेद--जान सकता है; भूम्न:--सर्वव्यापी भगवान् का; उर-गाय--हे अत्यधिक प्रशंसित; विभूति--ऐश्वर्यशशाली अंशों के;मायाम्ू--योगमयी मोहक शक्ति
निस्सन्देह आपने हमें प्रसूति-गृह में ही बतला दिया था कि आप अजन्मा हैं और इसके पूर्वके युगों में कई बार हमारे पुत्र के रूप में जन्म ले चुके हैं।
आपने अपने धर्म की रक्षा करने केलिए इन दिव्य शरीरों को प्रकट करने के बाद उन्हें छिपा लिया, जिस तरह बादल प्रकट होते हैंऔर लुप्त हो जाते हैं।
हे परम महिमामय सर्वव्यापक भगवान्, आपके विभूति अंशों कीभ्रान्तिपूर्ण माया को कौन समझ सकता है ?
श्रीशुक उबाचआकर्प्येत्थं पितुर्वाक्यं भगवान्सात्वतर्षभ:ः ।
प्रत्याह प्रश्नयानप्र: प्रहसन्श्लक्ष्णया गिरा ॥
२१॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; आकर्णर्य --सुनकर; इत्थम्--इस तरह से; पितु:--अपने पिता के; वाक्यम्--कथन; भगवान्--भगवान् ने; सात्वत-ऋषभ: --यदुओं में श्रेष्ठ; प्रत्याह--उत्तर दिया; प्रश्रय--विनयपूर्वक; आनप्र:--झुकाकर( अपना सिर ); प्रहसन्--जोर से हँसते हुए; श्लक्ष्णया--धीमी; गिरा--वाणी से
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : अपने पिता के वचनों को सुनने के बाद सात्वतों के नायकभगवान् ने विनयपूर्वक अपना सिर झुकाया और मन्द-मन्द हँसे और फिर मृदुल वाणी में उत्तरदिया।
श्रीभगवानुवाचबचो व: समवेतार्थ तातैतदुपमन्महे ।
यतन्नः पुत्रान्समुद्दिश्य तत्त्वग्राम उदाहृत: ॥
२२॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; वच: --शब्द; व:--आपके; समवेत--उपयुक्त; अर्थम्--अर्थ वाले; तात--हे पिता;एतत्--ये; उपमन्महे--मैं मानता हूँ; यत्-- क्योंकि; नः--हम; पुत्रान्--आपके पुत्रों को; समुद्ििशय--बतलाकर; तत्त्व--तथ्योंकी कोटियों के; ग्राम:--सम्पूर्ण रूप से; उदाहतः--सामने रखा
भगवान् ने कहा: हे पिताश्री, मैं आपके वचनों को सर्वथा उपयुक्त मानता हूँ, क्योंकिआपने हमें अर्थात् अपने पुत्रों का सन्दर्भ देते हुए संसार की विविध कोटियों की व्याख्या की है।
अहं यूयमसावार्य इमे च द्वारकाउकसः ।
सर्वेडप्येवं यदुश्रेष्ठ विमृग्या: सचराचरम् ॥
२३॥
अहम्-ैं; यूयमू-- आपको; असौ--वह; आर्य:--मेरे पूज्य भ्राता ( बलराम ); इमे--ये; च--तथा; द्वारका-ओकसः--द्वारकावासी; सर्वे--सभी; अपि--ही; एवम्--इसी तरह से; यदु-श्रेष्ठ--हे यदु श्रेष्ठ; विमृग्या:--माना जाना चाहिए; स--सहित;चर--चेतन; अचरम्--जड़
हे यदुश्रेष्ठ न केवल मुझे, अपितु आपको, मेरे पूज्य भ्राता को तथा ये द्वारकावासी इन सबोंको भी इसी दार्शनिक आलोक में देखा जाना चाहिए।
दरअसल हमें जड़ तथा चेतन दोनों हीप्रकार के समस्त सृष्टि को इसमें सम्मिलित करना चाहिए।
आत्मा होकः स्वयंज्योतिर्नित्योउन्यो निर्गुणो गुणैः ।
आत्मसूष्टैस्तत्कृतेषु भूतेषु बहुधेयते ॥
२४॥
आत्मा--परमात्मा; हि--निस्सन्देह; एक:--एक; स्वयम्-ज्योति:--आत्मज्योतित; नित्य:--नित्य; अन्य:--पृथक् ( भौतिकशक्ति से ); निर्गुण:--भौतिक गुणों से मुक्त; गुणै:ः--गुणों के द्वारा; आत्म--स्वयं से; सृष्टै:--उत्पन्न; तत्--अपने फलों में;कृतेषु--उत्पादन; भूतेषु--भौतिक जीवों में; बहुधा--कई प्रकार का; ईयते--प्रतीत होता है
दरअसल परमात्मा एक है।
वह आत्मज्योतित तथा नित्य, दिव्य एवं भौतिक गुणों से रहितहै।
किन्तु इन्हीं गुणों के माध्यम से उसने सृष्टि की है, जिससे एक ही परम सत्य उन गुणों केअंशों में अनेक रूप में प्रकट होता है।
खं वायुर्ज्योतिरापो भूस्तत्कृतेषु यथाशयम् ।
आविस्तिरोउल्पभूर्येको नानात्वं यात्यमावषि ॥
२५॥
खम्--आकाश; वायु:--वायु; ज्योति:--अग्नि; आप:--जल; भू:--पृथ्वी; तत्--उनके; कृतेषु--फलों में; यथा-आशयम्--विशेष स्थितियों के अनुसार; आवि:--व्यक्त; तिर:--अव्यक्त; अल्प--लघु; भूरि--बृहत्; एक:--एक; नानात्वम्--अनेकरूपता; याति--धारण करता है; असौ--वह; अपि-- भी |
आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी--ये तत्त्व विविध वस्तुओं में प्रकट होते समय दृश्य,अदृश्य, लघु या विशाल बन जाते हैं।
इसी तरह परमात्मा एक होते हुए भी अनेक प्रतीत होता है।
श्रीशुक उबाचएवं भगवता राजन्वसुदेव उदाहतः ।
श्र॒ुत्वा विनष्टनानाधीस्तृष्णीं प्रीतमना अभूत् ॥
२६॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्--इस प्रकार; भगवता-- भगवान् द्वारा; राजन्ू--हे राजा ( परीक्षित );वसुदेव:--वसुदेव; उदाहत:--कहे गये; श्रुत्वा--सुनकर; विनष्ट--विनष्ट; नाना--द्वैतयुक्त; धीः --बुद्ध्ि; तृष्णीम्ू--मौन;प्रीत--तुष्ट; मना:--अपने मन में; अभूत्-- था।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्ू, भगवान् द्वारा कहे गये इन उपदेशों को सुनकर वसुदेवसमस्त द्वैत-भाव से मुक्त हो गये।
हृदय में तुष्ट होकर वे मौन रहे।
अथ तत्र कुरुश्रेष्ठ देवकी सर्वदेवता ।
श्र॒ुत्वानीतं गुरो: पुत्रमात्मजाभ्यां सुविस्मिता ॥
२७॥
कृष्णरामौ समाश्राव्य पुत्रान्कंसविहिंसितान् ।
स्मरन्ती कृपणं प्राह वैक्लव्यादश्रुलोचना ॥
२८॥
अथ--तब; तत्र--उसी स्थान पर; कुरु-श्रेष्ठ--हे कुरु श्रेष्ठ; देवकी--माता देवकी ने; सर्व--सबों की; देवता--पूज्य देवी;श्रुत्वा--सुनकर; नीतम्--वापस लाये हुए; गुरो:--अपने गुरुओं के ; पुत्रमू-पुत्र को; आत्मजाभ्याम्-- अपने दोनों पुत्रों द्वारा;सु--अत्यधिक; विस्मिता--चकित; कृष्ण-रामौ--कृष्ण तथा बलराम; समाश्राव्य--स्पष्ट रूप से सम्बोधित करके; पुत्रान्ू--अपने पुत्रों को; कंस-विहिंसितान्--कंस द्वारा मारे गये; स्मरन्ती--स्मरण करती हुई; कृपणम्--दीनतापूर्वक; प्राह--कहा;बैक्लव्यात्ू--विकलता के कारण; अश्रु--आँसुओं ( से पूरित )) लोचना--आँखें |
हे कुरु श्रेष्ठ, उसी समय सर्वत्र पूजनीय देवकी ने अपने दोनों पुत्रों, कृष्ण तथा बलराम कोसम्बोधित करने का अवसर पाया।
इसके पूर्व उन्होंने अत्यन्त विस्मय के साथ यह सुन रखा थाकि उनके ये पुत्र अपने गुरु के पुत्र को मृत्यु से वापस ले आये थे।
अब वे कंस द्वारा वध कियेगये अपने पुत्रों का चिन्तन करते हुये अत्यन्त दुखी हुईं और अश्रुपूरित नेत्रों से कृष्ण तथा बलरामसे दीनतापूर्वक बोलीं श्रीदेवक्युवाचराम रामाप्रमेयात्मन्कृष्ण योगे श्वरेश्वर ।
वेदाहं वां विश्वसृजामी श्ररावादिपूरुषी ॥
२९॥
श्री-देवकी उबाच-- श्री देवकी ने कहा; राम राम--ओरे राम, ओरे राम; अप्रमेय-आत्मन्--हे अमाप्य परमात्मा; कृष्ण--हेकृष्ण; योग-ईश्वर--योग के स्वामियों के; ई ध्वर--हे स्वामी; वेद--जानती हूँ; अहम्--मैं; वाम्--तुम दोनों को; विश्व--ब्रह्माण्ड के; सृजामू--स्त्रष्टाओं के; ईश्वरौ--स्वामी; आदि--मूल; पूरुषौ--दो पुरुष
श्री देवकी ने कहा : हे राम, हे राम, हे अप्रमेय परमात्मा, हे कृष्ण, हे सभी योगेश्वरों केस्वामी, मैं जानती हूँ कि तुम दोनों समस्त ब्रह्माण्ड सृष्टिकार्ताओं के परम शासक आदि भगवान्हो।
कलविध्वस्तसत्त्वानां राज्ञामुच्छास्त्रवर्तिनाम् ।
भूमेर्भारायमाणानामवतीर्णों किलाद्य मे ॥
३०॥
काल--समय द्वारा; विध्वस्त--विनष्ट; सत्त्वानामू--अच्छे गुणों वाले; राज्ञामू--राजाओं ( के मारने ) के लिए; उत्-शास्त्र--शास्त्रीय नियमों से बाहर; वर्तिनाम्ू--कार्य करने वाले; भूमेः --पृथ्वी के लिए; भारायमाणानाम्-- भार बनते हुए; अवतीर्णो--( तुम दोनों ) अवतरित हुए हो; किल--निस्सन्देह; अद्य--आज; मे--मुझसे |
मुझसे जन्म लेकर तुम इस जगत में उन राजाओं का वध करने के लिए अवतरित हुए हो,जिनके उत्तम गुण वर्तमान युग के द्वारा विनष्ट हो चुके हैं और जो इस प्रकार से शास्त्रों की सत्ताका उल्लंघन करते हैं और पृथ्वी का भार बनते हैं।
यस्यांशांशांशभागेन विश्वोत्पत्तिलयोदया: ।
भवन्ति किल विश्वात्मंस्तं त्वाद्याहं गतिं गता ॥
३१॥
यस्य--जिसके; अंश--अंश के; अंश--अंश के; अंश--अंश के; भागेन--एक आंश द्वारा; विश्व--ब्रह्माण्ड की; उत्पत्ति--जन्म; लय--विलय; उदया:--तथा सम्पन्नता; भवन्ति--उदय होते हैं; किल--निस्सन्देह; विश्व-आत्मन्--हे विश्व के आत्मा;तत्--उसके पास; त्वा--तुम; अद्य--आज; अहमू--मैं; गतिमू--शरण के लिए; गता--आई हुई |
हे विश्वात्मा, ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, पालन तथा संहार--ये सभी आपके अंश के अंश केअंश के भी एक आंश द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं।
हे भगवान्, मैं आज आपकी शरण में आई हूँ।
चिरान्मृतसुतादाने गुरुणा किल चोदितौ ।
आनिन्यथुः पितृस्थानादगुरवे गुरुदक्षिणाम् ॥
३२॥
तथा मे कुरुतं काम युवां योगेश्वरेश्वरौ ।
भोजराजहता-न्पुत्रान्कामये ड्रष्टमाहतान् ॥
३३॥
चिरात्--बहुत समय से; मृत--मरे हुए; सुत--पुत्र; आदाने--वापस लाने के लिए; गुरुणा--अपने गुरु द्वारा; किल--ऐसासुना गया है; चोदितौ--आज्ञा दिये जाकर; आनिन्यथु:--तुम उसे ले आये; पितृ--पूर्वजों के; स्थानात्--स्थान से; गुरवे--अपने गुरु को; गुरु-दक्षिणाम्--गुरु-दक्षिणा के रूप में; तथा--उसी तरह; मे--मेरी; कुरुतम्--पूरा करो; कामम्--इच्छा;युवाम्--तुम दोनों; योग-ईश्रर--योग के स्वामियों के; ईश्वरौ --हे प्रभुओ; भोज-राज-- भोज के राजा ( कंस ) द्वारा; हतान्--मारे हुए; पुत्रान्--पुत्रों को; कामये--मैं चाहती हूँ; द्रष्टम्ू--देखना; आहतान्--वापस लाये हुए।
ऐसा कहा जाता है कि जब आपके गुरु ने अपने बहुत पहले मर चुके पुत्र को वापस लानेके लिए आपको आदेश दिया, तो आप गुरु-दक्षिणा के प्रतीकस्वरूप उसे पूर्वजों के धाम सेवापस ले आये।
हे योगेश्वरों के भी ईश्वर, मेरी इच्छा को भी उसी तरह पूरी कीजिये।
कृपयाभोजराज द्वारा मारे गये मेरे पुत्रों को वापस ला दीजिये, जिससे मैं उन्हें फिर से देख सकूँ।
ऋषिरुवाचएवं सशञ्जोदितौ मात्रा राम: कृष्णश्च भारत ।
सुतलं संविविशतुर्योगमायामुपाअतौ ॥
३४॥
ऋषि: उवाच--ऋषि ( श्रीशुकदेव ) ने कहा; एवम्--इस तरह; सज्ञोदितौ--याचना किये जाने पर; मात्रा--माता द्वारा; राम:--बलराम; कृष्ण: --कृष्ण; च--तथा; भारत--हे भरतवंशी ( परीक्षित ); सुतलम्--सुतल नामक अधोलोक, जिसमें बलिमहाराज शासन करते हैं; संविविशतु:-- प्रवेश किया; योग-मायायम्ू-- अपनी योगमाया को; उपाश्चितौ--काम में लाते हुए
शुकदेव मुनि ने कहा : हे भारत, अपनी माता द्वारा इस प्रकार याचना किये जाने पर कृष्णतथा बलराम ने अपनी योगमाया शक्ति का प्रयोग करके सुतल लोक में प्रवेश किया।
तस्मिन्प्रविष्टावुपलभ्य दैत्यराड्विश्वात्मदैवं सुतरां तथात्मन: ।
तदर्शनाह्नादपरिप्लुताशय:सद्यः समुत्थाय ननाम सान्वय: ॥
३५॥
तस्मिन्ू--वहाँ; प्रविष्टी--( दोनों ने ) प्रवेश करके; उपलभ्य--देखकर; दैत्य-राट्--दैत्यों के राजा ( बलि ); विश्व--सारे विश्वके; आत्म--आत्मा; दैवमू--तथा पर-देव; सुतरामू--विशेष रूप से; तथा-- भी; आत्मन:--अपना; तत्--उनका; दर्शन--दर्शन करने के कारण; आह्ाद--प्रसन्नता से; परिप्लुत--विभोर; आशय: --हृदय वाले; सद्यः--तुरन््त; समुत्थाय--खड़े होकर;ननाम--उसने प्रणाम किया; स--सहित; अन्वय:--उनके संगियों ( कुटुम्बियों )
जब दैत्यराज बलि ने दोनों प्रभुओं को आते देखा, तो उसका हृदय प्रसन्नता के मारे फूलउठा, क्योंकि वह उन्हें परमात्मा तथा सम्पूर्ण विश्व के पूज्य देव के रूप में, विशेष रूप से अपनेपूज्य देव के रूप में, जानता था।
अतः वह तुरन्त उठ खड़ा हुआ और अपने सारे पार्षदों सहितउसने उन्हें झुक कर प्रणाम किया।
तयो: समानीय वरासनं मुदानिविष्टयोस्तत्र महात्मनोस्तयो: ।
दधार पादाववनिज्य तज्जलंसवृन्द आन्रहा पुनद्यदम्बु ह ॥
३६॥
तयो:--उनके लिए; समानीय--लाकर; वर--उच्च; आसनम्--आसन; मुदा-प्रसन्नतापूर्वक; निविष्टयो: --आसन ग्रहण कियेहुए; तत्र--वहाँ; महा-आत्मनो: --महापुरुषों के; तयो:--उनके ; दधार--पकड़ लिया; पादौ--पाँव; अवनिज्य-- धोकर;तत्--उस; जलमू--जल को; स--सहित; वृन्दः--अपने अनुयायियों; आ-ब्रह्म--ब्रह्म तक को; पुनत्ू--पवित्र बनाने वाला;यत्--जो; अम्बु--जल; ह--निस्सन्देह |
बलि ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें उच्च आसन प्रदान किया।
जब वे बैठ गये, तो उसने दोनों प्रभुओंके पाँव पखारे।
फिर उसने उस जल को, जो ब्रह्मापर्यन्त सारे जगत को पवित्र बनाने वाला है,लेकर अपने तथा अपने अनुयायियों के ऊपर छिड़का।
समईयामास स तौ विभूतिभि-महाईवस्त्राभरणानुलेपनै: ।
ताम्बूलदीपामृतभक्षणादिभिःस्वगोत्रवित्तात्मसमर्पणेन च ॥
३७॥
समर्हयाम् आस--पूजा की; सः--उसने; तौ--उनको; विभूतिभि:--अपनी सम्पत्ति से; महा-अर्ह--अत्यन्त मूल्यवान; वस्त्र--उस्त्रों; आभरण--आभूषणों; अनुलेपनै: --तथा सुगन्धित लेप से; ताम्बूल--पान; दीप--दीपक; अमृत--अमृत तुल्य;भक्षण-- भोजन; आदिभि: --इ त्यादि से; स्व-- अपने; गोत्र-- परिवार; वित्त--सम्पत्ति का; आत्म--तथा स्व; समर्पणेन--समर्पण द्वारा; च--तथा उसने अपने पास उपलब्ध सारी सम्पदा--बहुमूल्य वस्त्र, गहने, सुगन्धित चन्दन-लेप, पान,दीपक, अमृत तुल्य भोजन इत्यादि--से उन दोनों की पूजा की।
इस तरह उसने उन्हें अपनेपरिवार की सारी धन-सम्पदा तथा स्वयं अपने को भी अर्पित कर दिया।
स इन्द्रसेनो भगवत्पदाम्बुजंबिश्रन्मुहुः प्रेमविभिन्नया धिया ।
उबाच हानन्दजलाकुलेक्षण:प्रहष्टरोमा नृप गद्गदाक्षरम् ॥
३८ ॥
सः--वह; इन्द्र-सेन:--इन्द्र की सेना को जीतने वाला, बलि; भगवत्--दोनों विभुओं के; पाद-अम्बुजम्--चरणकमलों को;बिभ्रत्--पकड़ते हुए; मुहुः--बारम्बार; प्रेम--प्रेमवश; विभिन्नया--द्रवित हो रहे; धिया--हृदयसे; उवाच ह--कहा; आनन्द--अपने आनन्द से उत्पन्न; जल--जल ( अश्रु ) से; आकुल--पूरित; ईक्षण:--नेत्रों वाला; प्रहष्ट--सीधे खड़े होते हुए; रोमा--शरीर के रोएँ; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); गदगद--रुद्ध; अक्षरम्--जिनके शब्द
दोनों विभुओं के चरणकमलों को बारम्बार पकड़ते हुए, इन्द्र की सेना के विजेता, गहन प्रेमसे द्रवित हृदय वाले बलि ने कहा : हे राजन, उनकी आँखों में प्रेमाश्रु भरे थे और उनके अंगों केरोएँ खड़े हुए थे।
वह लड़खड़ाती वाणी से बोलने लगा।
बलिरुवाचनमोनन्ताय बृहते नमः कृष्णाय वेधसे ।
साड्ख्ययोगवितानाय ब्रह्मणे परमात्मने ॥
३९॥
बलि: उवाच--बलि ने कहा; नमः--नमस्ते; अनन्ताय-- अनन्त को; बृहते--महानतम जीव; नम:--नमस्कार; कृष्णाय--कृष्ण को; वेधसे--स्त्रष्टा; साइख्य--सांख्य विश्लेषण के; योग--तथा योग के; वितानाय-- प्रसार करने वाले को; ब्रह्मणे --बहा को; परम-आत्मने-- परमात्मा राजा बलि ने कहा : समस्त जीवों में महानतम अनन्त देव को नमस्कार है।
ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा
भगवान् कृष्ण को नमस्कार है, जो सांख्य तथा योग के सिद्धान्तों का प्रसार करने के लिएनिर्विशेष ब्रह्म तथा परमात्मा के रूप में प्रकट होते हैं।
दर्शन वां हि भूतानां दुष्प्रापं चाप्यदुर्लभम् ।
रजस्तमःस्वभावानां यत्नः प्राप्तौी यहच्छया ॥
४०॥
दर्शनम्-दर्शन; वाम्-तुम दोनों का; हि--निस्सन्देह; भूतानामू--सारे जीवों के लिए; दुष्प्रापम्-विरले ही प्राप्त होने वाला;च अपि--फिर भी; अदुर्लभम्--प्राप्त करना कठिन नहीं; रज:--रजो; तम:ः--तथा तमो गुण; स्वभावानाम्--स्वभाव वालों केलिए; यत्--जिसमें; न:--हमारे द्वारा; प्राप्तौ--प्राप्त; यहच्छया-- अहैतुक रूप में ।
अनेक जीवों के लिए आप दोनों विभुओं के दर्शन दुर्लभ हैं, किन्तु तमोगुण तथा रजोगुण मेंस्थित हमारे जैसे व्यक्ति भी सुगमता से आपके दर्शन पा सकते हैं, जब आप स्वेच्छा से प्रकटहोते हैं।
दैत्यदानवगन्धर्वा: सिद्धविद्याश्नचारणा: ।
यक्षरक्ष:पिशाचाश्व भूतप्रमथनायका: ॥
४१॥
विशुद्धसत्त्वधाम्न्यद्धा त्वयि शास्त्रशरीरिणि ।
नित्य॑ निबद्धवैरास्ते वयं चान्ये च ताहशा: ॥
४२॥
केचनोद्बद्धवैरेण भक्त्या केचन कामतः ।
न तथा सत्त्वसंरब्धाः सन्निकृष्टा: सुरादयः: ॥
४३॥
दैत्य-दानव--दैत्य तथा दानव; गन्धर्वा:--गन्धर्वगण; सिद्ध-विद्याधर-चारणा:--सिद्ध, विद्याधर तथा चारण देवतागण;यक्ष--यक्षगण; रक्ष:--राक्षसगण ( मनुष्यों को खा जाने वाले भूत-प्रेत )।
पिशाचा: --मांसाहारी पिशाचगण; च--तथा;भूत-- भूत-प्रेत; प्रमथ-नायका:--प्रमथ तथा नायक नामक भूत-प्रेत; विशुद्ध--नितान्त शुद्ध; सत्त--सतोगुण के; धाम्नि--धाम; अद्धघा- प्रत्यक्ष; त्ववि--तुम में; शास्त्र--शास्त्रों से युक्त; शरीरिणि--ऐसे शरीर के स्वामी; नित्यम्--सदैव; निबद्ध--स्थिर; वैरा: --शत्रुता में; ते--वे; वयम्--हम; च-- भी; अन्ये-- अन्य; च--तथा; ताहशा: --उन्हीं की तरह; केचन--कुछ;उदबद्ध--विशेष दुराग्रही, जिद्दी; वैरैण--तिरस्कार से; भक्त्या--भक्ति से; केचन--कोई; कामत:--काम से उत्पन्न; न--नहीं;तथा--उसी तरह; सत्त्व--सतोगुण द्वारा; संरब्धा:--अधीन; सन्निकृष्टाः--आकृष्ट; सुर--देवतागण; आदय: --इत्यादि |
ऐसे अनेक लोग जो आपके प्रति शत्रुता में निरन्तर लीन रहते थे, अंत में आपके प्रति आकृष्टहो गये, क्योंकि आप शुद्ध सत्त्वगुण के साकार रूप हैं और आपका दिव्य स्वरूप शास्त्रों सेयुक्त है।
इन सुधरे हुए शत्रुओं में दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, यक्ष, राक्षस,पिशाच, भूत, प्रमथ तथा नायक एवं हम तथा हमारे जैसे अनेक लोग सम्मिलित हैं।
हममें सेकुछ तो विशेष घृणा के कारण और कुछ काम-वासना पर आधारित भक्तिभाव से आपके प्रतिआकृष्ट हुए हैं।
किन्तु देवता तथा भौतिक सतोगुण से मुग्ध अन्य लोग आपके प्रति वैसेआकर्षण का अनुभव नहीं कर पाते।
इदमित्थमिति प्रायस्तव योगे श्वरेश्वर ।
न विदन्त्यपि योगेशा योगमायां कुतो वयम् ॥
४४॥
इदम्--यह; इत्थम्--इस तरह के लक्षणों से युक्त; इति--ऐसी बातों से; प्राय:--अधिकांशत:; तब--तुम्हारा; योग-ई श्वर--योग के स्वामियों के; ईश्वर--हे परम स्वामी; न विदन्ति--नहीं जानते; अपि-- भी; योग-ईशा:--योग के स्वामी; योग-मायाम्ू--मोहने की अपनी आध्यात्मिक शक्ति को; कुतः--तो क्या; वयम्--हम हे पूर्ण
योगियों के स्वामी, हम अपने बारे में क्या कहें, बड़े से बड़े योगी भी यह नहीं जानतेकि आपकी योगमाया क्या है, अथवा वह कैसे कार्य करती है?
तन्नः प्रसीद निरपेक्षविमृग्ययुष्मत्-पादारविन्द्धिषणान्यगृहान्धकूपात् ।
निष्क्रम्य विश्वशरणाड्श्रूयुपलब्धवृत्ति:शान्तो यथेक उत सर्वसखैश्चरामि ॥
४५॥
तत्--इस तरह से; नः--हम पर; प्रसीद--कृपालु होयें; निरपेक्ष--किसी भौतिक इच्छा से रहित हैं, जो; विमृग्य--खोजेजाकर; युष्मत्--तुम्हारे; पाद--चरण; अरविन्द--कमल; धिषण--आश्रय; अन्य-- अन्य; गृह--घर से; अन्ध--अच्धे;कूपातू-कुएँ से; निष्क्रम्यम--निकल कर; विश्व--सारे जगत के; शरण--उनके, जो कि सहायक हैं ( वृक्ष ); अड्प्रि--पाँवोंपर; उपलब्ध--प्राप्त; वृत्तिः--जिसकी जीविका; शान्तः--शान्त; यथा--जिस तरह; एक:--अकेला; उत--अथवा अन्य कुछ;सर्व--सभी का; सखै:--मित्रों के साथ; चरामि--विचरण कर सकता हूँ।
कृपया मुझ पर दया करें, जिससे मैं गृहस्थ जीवन के अंध कूप से--अपने मिथ्या घर से--बाहर निकल सकूँ और आपके चरणकमलों की सच्ची शरण ग्रहण कर सकूँ, जिसकी खोजनिष्काम सदैव साधु करते रहते हैं।
तब मैं या तो अकेले या सबों के मित्र स्वरूप महान् सन््तों केसाथ मुक्तरूप से विचरण कर सकूँ और विश्व-भर को दान देने वाले वृक्षों के नीचे जीवन कीआवश्यकताएँ पूरी कर सकूँ।
शाध्यस्मानीशितव्येश निष्पापान्कुरु नः प्रभो ।
पुमान्यच्छुद्धयातिष्ठे श्रेदन्नाया विमुच्यते ॥
४६॥
शाधि--कृपया आदेश दें; अस्मान्ू--हमको; ईशितव्य--हम अधीनों के; ईश--हे नियन्ता; निष्पापानू--पापरहित; कुरु--करें;नः--हमको; प्रभो-हे प्रभु; पुमान्ू-व्यक्ति; यत्--जो; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; आतिष्ठन्-- सम्पन्न करते हुए; चोदनाया:--शास्त्रीय विधियों के; विमुच्यते--मुक्त हो जाता है।
हे समस्त अधीन प्राणियों के स्वामी, कृपा करके हमें बतायें कि हम कया करें और इस तरहहमें सारे पापों से मुक्त कर दें।
हे प्रभु, जो व्यक्ति आपके आदेश का श्रद्धापूर्वक पालन करता है,उसे सामान्य वैदिक अनुष्ठानों का पालन करना अनिवार्य नहीं है।
श्रीभगवानुवाचआसम्मरीचे: षट्पुत्रा ऊर्णायां प्रथमेउन्तरे ।
देवा: क॑ जहसुर्वीक्ष्य सुतं यभितुमुद्यतम् ॥
४७॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; आसनू-- थे; मरीचे: --मरीचि के; षट्--छ:; पुत्रा:--पुत्र; ऊर्णायाम्--ऊर्णा ( मरीचिकी पत्नी ) से; प्रथमे-- प्रथम; अन्तरे--मनु के राज्य में; देवा:--देवतागण; कम्--ब्रह्मा पर; जहसु:--हँस दिया; वीक्ष्य--देखकर; सुताम्--अपनी पुत्री ( सरस्वती ) के साथ; यभितुम्--संभोग करने के लिए; उद्यतम्-उद्यत |
भगवान् ने कहा : प्रथम मनु के युग में मरीचि ऋषि की पत्नी ऊर्णा से छः पुत्र उत्पन्न हुए।
वेसभी उच्च देवता थे, किन्तु एक बार, जब उन्होंने ब्रह्मा को अपनी ही पुत्री के साथ संभोग करनेके लिए उद्यत देखा, तो उन्हें हँसी आ गई।
तेनासुरीमगन्योनिमधुनावद्यकर्मणा ।
हिरण्यकशिपोर्जाता नीतास्ते योगमायया ॥
४८ ॥
देवक्या उदरे जाता राजन्कंसविहिंसिता: ।
सा तान्शोच्त्यात्मजान्स्वांस्त इमेध्यासतेउन्तिके ॥
४९॥
तेन--उससे; आसुरीम्--असुरों की; अगनू--प्रविष्ट हुए; योनिम्-गर्भ में; अधुना--तुरन्त; अवद्य-- अनुचित; कर्मणा--कर्मद्वारा; हिरण्यकशिपो: --हिरण्यकशिपु के यहाँ; जाता:--उत्पन्न; नीता:--लाया गया; ते--वे; योग-मायया-- भगवान् की दैवीमोहिनी शक्ति द्वारा; देवक्या:--देवकी के; उदरे--गर्भ से; जाता:--उत्पन्न; राजन्ू--हे राजा ( बलि ); कंस--कंस द्वारा;विहिंसिता: --हत्या की गई; सा--वह; तान्ू--उन; शोचति--शोक करती है; आत्म-जानू--पुत्रों के लिए; स्वानू--अपने; ते--वे; इमे--वे ही; अध्यासते--जीवित हैं; अन्तिके--पास ही |
उस अनुचित कार्य के लिए, वे तुरन्त आसुरी योनि में प्रविष्ट हुए और इस तरह उन्होंनेहिरण्यकशिपु के पुत्रों के रूप में जन्म लिया।
देवी योगमाया ने इन सबों को हिरण्यकशिपु सेछीन लिया और वे पुनः देवकी के गर्भ से उत्पन्न हुए।
इसके बाद हे राजा, कंस ने उन सबकावध कर दिया।
देवकी आज भी उन अपने पुत्रों का स्मरण कर-करके शोक करती हैं।
मरीचिके वे ही पुत्र अब आपके साथ यहाँ रह रहे हैं।
इत एतान्प्रणेष्यामो मातृशोकापनुत्तये ।
ततः शापाद्विनिर्मक्ता लोक॑ यास्यन्ति विज्वरा: ॥
५०॥
इतः--यहाँ से; एतान्ू--उन्हें; प्रणेष्याम:--हम ले जाना चाहते हैं; मातृ--उनकी माता का; शोक--शोक; अपनुत्तये--दूर करनेके लिए; तत:ः--तब; शापात्--अपने शाप से; विनिर्मुक्ता:--मुक्त; लोकम्-- अपने ( देवताओं के ) लोक; यास्यन्ति--जायेंगे;विज्वरा:--ज्वर से मुक्त
हम उन्हें इनकी माता का शोक दूर करने के लिए इस स्थान से ले जाना चाहते हैं।
तब अपनेशाप से विमुक्त होकर तथा समस्त कष्टों से छूट कर, वे स्वर्ग में अपने घर लौट जायेंगे।
स्मरोदगीथ: परिष्वड्र: पतड़ु: श्षुद्रभूदधृणी ।
षडिमे मत्प्रसादेन पुनर्यास्यन्ति सदगतिम् ॥
५१॥
स्मर-उद्गीथः परिष्वड्र:--स्मर, उदगीथ तथा परिष्वंग; पतड्ढः क्षुद्रभूत् घृणी--पतंग, क्षुद्रभूत तथा घृणी; घट्ू--छ:; इमे--ये;मत्--मेरी; प्रसादेन--कृपा से; पुनः--फिर से; यास्यन्ति--जायेंगे; सत्--अच्छे पुरुषों के; गतिम्--गन्तव्य को |
मेरी कृपा से समर, उदगीथ, परिष्वंग, पतंग, श्षुद्रभूत तथा घृणी--ये छहों शुद्ध सन््तों केधाम वापस जायेंगे।
इत्युक्त्वा तान्समादाय इन्द्रसेनेन पूजितौ ।
पुनर्द्दारवतीमेत्य मातु: पुत्रानयच्छताम् ॥
५२॥
इति--इस प्रकार; उक्त्वा--कहकर; तान्--उनको; समादाय--लेकर; इन्द्रसेनेन--बलि महाराज द्वारा; पूजितौ--दोनोंसम्मानित हुए; पुनः--फिर से; द्वारवतीम्-द्वारका तक; एत्य--जाकर; मातु:ः--अपनी माता के; पुत्रान्ू--पुत्रों को;अयच्छताम्--सौंप दिया।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : यह कहकर भगवान् कृष्ण तथा बलराम बलि महाराज द्वाराभलीभाँति पूजित होकर छहों पुत्रों को लेकर द्वारका लौट आये, जहाँ पर उन्हें उनकी माता कोसौंप दिया।
तान्दरष्टा बालकान्देवी पुत्रस्नेहस्नुतस्तनी ।
परिष्वज्याड्डमारोप्य मूर्ध्न्यजिप्रदभी क्ष्णश: ॥
५३॥
तानू--उन; दृष्ठटा--देखकर; बालकान्--बालकों को; देवी--देवी ( देवकी ); पुत्र--अपने पुत्रों के लिए; स्नेह--स्नेह केकारण; स्नुत--बहते हुए; स्तनी--स्तनों वाली; परिष्वज्य--आलिंगन करके; अड्भूम्--अपनी गोद में; आरोप्य--रख कर;मूर्धिि--उनके सिरों को; अजिप्रत्--सूँघा; अभी क्षणश:--बारम्बार।
जब देवी देवकी ने अपने खोये हुए बालकों को देखा, तो उनके प्रति उन्हें इतना स्नेह उमड़ाकि उनके स्तनों से दूध बह चला।
उन्होंने उनका आलिंगन किया और अपनी गोद में बैठाकरबारम्बार उनका सिर सूँघा।
अपाययत्स्तनं प्रीता सुतस्पर्शपरिस्नुतम् ।
मोहिता मायया विष्णोर्यया सृष्टि: प्रवर्तते ॥
५४॥
अपाययत्--पीने दिया; स्तनम्--स्तनों को; प्रीता--प्रेमपूर्वक; सुत--अपने पुत्रों का; स्पर्श--स्पर्श करने से; परिस्नुतम्--सराबोर ( भीगी हुई ); मोहिता--मोहग्रस्त; मायया--माया द्वारा; विष्णो: -- भगवान् विष्णु की; यया--जिसके द्वारा; सृष्टि: --सृष्टि; प्रवर्तती--उत्पन्न हुई ॥
उन्होंने अपने पुत्रों को बड़े ही प्रेम से स्तन-पान करने दिया और उनके स्पर्श से उनके स्तनदूध से भीग गये।
वे उसी विष्णु-माया से मोहित हो गईं, जो इस ब्रह्माण्ड का सजन करती है।
पीत्वामृतं पयस्तस्या: पीतशेषं गदाभूतः ।
नारायणाडूसंस्पर्शप्रतिलब्धात्मदर्शना: ॥
५५॥
ते नमस्कृत्य गोविन्दं देवकीं पितरं बलम् ।
मिषतां सर्वभूतानां ययुर्धाम दिवौकसाम् ॥
५६॥
पीत्वा--पीकर; अमृतम्-- अमृत तुल्य; पथः--दूध; तस्या:--उनका; पीत--पिया हुआ; शेषम्ू--बचा हुआ; गदा-भूतः--गदाचलाने वाले कृष्ण का; नारायण--नारायण ( कृष्ण ) के; अड़--शरीर के; संस्पर्श--स्पर्श से; प्रतिलब्ध--फिर से पा लिया;आत्म--( देवताओं के रूप में ) अपने मूल स्वरूपों के ; दर्शना:--अनुभूति; ते--वे; नमस्कृत्य--नमस्कार करके; गोविन्दम्--भगवान् कृष्ण को; देवकीम्--देवकी को; पितरमू--अपने पिता को; बलम्--तथा बलराम को; मिषताम्--देखते-देखते;सर्व--समस्त; भूतानाम्-लोगों के ; ययु:--चले गये; धाम--स्थान; दिव-ओकसाम्--देवताओं के
कृष्ण ने इससे पूर्व पीकर जो कुछ बाकी छोड़ा था, उस अमृत तुल्य दूध को पीकर छहोंपुत्रों ने नारायण के दिव्य शरीर का स्पर्श किया और इस स्पर्श से उनकी मूल पहचान उनमें जागगईं।
उन्होंने गोविन्द, देवकी, अपने पिता तथा बलराम को नमस्कार किया और फिर हर एक केदेखते-देखते, वे देवताओं के धाम के लिए रवाना हो गये।
त॑ हृष्ठा देवकी देवी मृतागमननिर्गमम् ।
मेने सुविस्मिता मायां कृष्णस्य रचितां नूप ॥
५७॥
तम्--यह; हृष्टा--देखकर; देवकी --देवकी; देवी--देवी; मृत--मरे हुए ( पुत्रों ) के; आगमन--वापस आना; निर्गममू--तथाविदाई; मेने--उसने सोचा; सु--अत्यधिक; विस्मिता--चकित; मायाम्--जादू को; कृष्णस्य--कृष्ण के; रचिताम्--उत्पन्न;नृप--हे राजा परीक्षित |
हे राजन, अपने पुत्रों को मृत्यु से वापस आते और फिर विदा होते देखकर सन्त स्वभाववाली देवकी को आश्चर्य हुआ।
उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि यह कृष्ण द्वारा उत्पन्न माया मात्रथी।
एवंविधान्यद्भुतानि कृष्णस्य परमात्मन: ।
वीर्याण्यनन्तवीर्यस्य सन्त्यनन्तानि भारत ॥
५८ ॥
एवम्-विधानि--इस तरह; अद्भुतानि-- अद्भुत; कृष्णस्य--कृष्ण की; परम-आत्मन:--परमात्मा; वीर्याणि--लीलाएँ;अनन्त--असीम; वीर्यस्य--जिसका पराक्रम; सन्ति-- हैं; अनन्तानि-- अपार; भारत--हे भरतवंशी ।
हे भारत, असीम पराक्रम वाले प्रभु, परमात्मा श्रीकृष्ण ने इस तरह की आश्चर्यजनकअसंख्य लीलाएँ सम्पन्न कीं।
श्रीसूत उवाचय इदमनुश्रुणोति श्रावयेद्वा मुरारे-श्वरितममृतकीततेर्वर्णितं व्यासपुत्रै: ।
जगदघभिदल तद्धक्तसत्कर्णपूरंभगवति कृतचित्तो याति तत्क्षेमधाम ॥
५९॥
श्री-सूतः उबाच-- श्री सूत ने ( उन मुनियों से, जो नैमिषारण्य में एकत्र हुए, उनसे ) कहा; यः--जो भी; इदम्--इसे;अनुश्वणोति--ठीक से सुनता है; श्रावयेत्--अन्यों को सुनाता है; वा--अथवा; मुरारे:--मुर नामक असुर को मारने वाले, कृष्णकी; चरितम्ू--लीला को; अमृत--अमर; कीर्ते:--जिसकी कीर्ति; वर्णितम्--वर्णित; व्यास-पुत्रै:--व्यासदेव के पुत्र द्वारा;जगतू--ब्रह्माण्ड के; अध--पापों को; भित्--जो ( लीला ) विनष्ट करती है; अलम्--पूरी तरह; तत्--उसके; भक्त-भक्तों केलिए; सत्--दिव्य; कर्ण-पूरम्ू--कान का आभूषण; भगवति-- भगवान् में; कृत--स्थित करते हुए; चित्त:--अपना मन;याति--वह जाता है; तत्ू--उसके; क्षेम--शुभ; धाम--निजी आवास
श्री सूत गोस्वामी ने कहा: नित्य कीर्ति वाले भगवान् मुरारी द्वारा की गई यह लीलाब्रह्माण्ड के सारे पापों को पूरी तरह नष्ट करती है और भक्तों के कानों के लिए दिव्य आभूषणजैसा काम करती है।
जो भी व्यासदेव के पूज्य पुत्र द्वारा सुनाई गई इस कथा को ध्यानपूर्वकसुनता या सुनाता है, वह भगवान् के ध्यान में अपने मन को स्थिर कर सकेगा और ईश्वर केसर्वमंगलमय धाम को प्राप्त करेगा।
