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अध्याय छियासी: अर्जुन ने सुभद्रा का अपहरण किया, और कृष्ण ने अपने भक्तों को आशीर्वाद दिया

10.86श्रीराजोबाचब्रह्मन्वेदितुमिच्छाम: स्वसारां रामकृष्णयो: ।

यथोपयेमेविजयो या ममासीत्पितामही ॥

१॥

श्री-राजा उवाच--राजा ( परीक्षित ) ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण ( शुकदेव ); वेदितुमू--जानना; इच्छाम: --चाहते हैं;स्वसारमू--बहन को; राम-कृष्णयो:--बलराम तथा कृष्ण की; यथा--कैसे; उपयेमे--विवाह किया; विजय:--अर्जुन; या--जो; मम--मेरी; आसीत्‌-- थी; पितामही--दादी

राजा परीक्षित ने कहा : हे ब्राह्मण, हम जानना चाहेंगे कि किस तरह अर्जुन ने बलराम तथाकृष्ण की बहन से विवाह किया, जो मेरी दादी थीं।

श्रीशुक उबाचअर्जुनस्तीर्थयात्रायां पर्यटन्नव्नीं प्रभु: ।

गतः प्रभासमश्रृणोन्मातुलेयीं स आत्मन: ॥

२॥

दुर्योधनाय रामस्तां दास्यतीति न चापरे ।

तल्लिप्सु: स यतिर्भूत्वा त्रिदण्डी द्वारकामगात्‌ ॥

३॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; अर्जुन: --अर्जुन; तीर्थ--पवित्र स्थानों की; यात्रायामू--यात्रा करते समय;पर्यटन्‌ू-- भ्रमण करते हुए; अवनीम्‌-पृथ्वी; प्रभु:--स्वामी; गत:ः--गये हुए; प्रभासम्‌--प्रभास को; अश्रुणोत्‌--सुना;मातुलेयीम्‌--मामा की कन्या; सः--उसने; आत्मन:--अपने; दुर्योधनाय--दुर्योधन को; राम:--बलराम; ताम्‌--उसको;दास्यति--देना चाहता है; इति--इस प्रकार; न--नहीं; च--तथा; अपरे-- अन्य कोई; तत्‌--उसके; लिप्सु:--प्राप्त करने कीइच्छुक; सः--वह, अर्जुन; यतिः--संन्यासी; भूत्वा--बन कर; त्रि-दण्डी--दण्ड धारण किये; द्वारकाम्‌-द्वारका; अगातू--गया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : दूर दूर तक यात्रा करते हुए और विविध तीर्थस्थानों का दर्शनकरके अर्जुन प्रभास आये।

वहाँ उन्होंने सुना कि बलराम अपने मामा की लड़की का विवाहदुर्योधन के साथ करना चाहते हैं और कोई भी उनकी इस योजना का समर्थन नहीं करता।

अर्जुनस्वयं उसके साथ विवाह करना चाहते थे, अतः उन्होंने त्रिदंड से सज्जित होकर सन्‍्यासी का वेशबना लिया और द्वारका गये।

तत्र वे वार्षितान्मासानवात्सीत्स्वार्थसाधकः ।

पौरेः सभाजितोभीक्ष्णं रामेणाजानता च सः ॥

४॥

तत्र--वहाँ; बै--निस्सन्देह; वार्षिकान्‌--वर्षाऋतु के; मासान्‌ू--मासों; अवात्सीत्‌--रहता रहा; स्व--अपने; अर्थ--प्रयोजन;साधक:--प्राप्त करने का प्रयत्न करते हुए; पौरै:--नगर के लोगों के द्वारा; सभाजित:--सम्मानित; अभीक्षणम्‌--निरन्तर;रामेण--बलराम द्वारा; अजानता--अनभिज्ञ; च--तथा; सः--वह।

अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिए, वे वर्षाऋतु-भर वहीं रहते रहे ।

बलराम तथा नगर के अन्यवासियों ने उन्हें न पहचानते हुए, उनका सभी तरह से सम्मान तथा सत्कार किया।

एकदा गृहमानीय आतिथ्येन निमन्त्रय तम्‌ ।

श्रद्धयोपहतं भैक्ष्यं बलेन बुभुजे किल ॥

५॥

एकदा--एक बार; गृहम्‌--अपने ( बलराम के ) घर पर; आनीय--लाकर; आतिथ्येन--अतिथि के रूप में; निमन्र्य--निमंत्रितकरके; तमू--उस ( अर्जुन ) को; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; उपहतम्‌--भेंट किया; भैक्ष्म्‌-- भोजन; बलेन--बलराम द्वारा;बुभुजे--खाया; किल--निस्सन्देह

एक दिन बलराम, उन्हें अपने घर आमंत्रित अतिथि के रूप में ले आये और अर्जुन ने बलरामद्वारा आदरपूर्वक अर्पित भोजन ग्रहण किया।

सोपश्यत्तत्र महतीं कन्यां वीरमनोहराम्‌ ।

प्रीत्युत्फुल्लेक्षणस्तस्यां भावश्षुब्धं मनो दधे ॥

६॥

सः--उसने; अपश्यत्‌--देखा; तत्र--वहाँ; महतीम्‌ू-- अद्भुत; कन्याम्‌ू--लड़की को; वीर--वीरों को; मनः-हराम्‌--मुग्धकरते हुए; प्रीति--सुखपूर्वक; उत्फुल्ल--प्रफुल्लित; ईक्षन:--उसकी आँखें; तस्याम्‌--उस पर; भाव-- भाव द्वारा; क्षुब्धम्‌ --विचलित; मन:--मन; दधे--रखा, लगाया।

वहाँ उन्होंने अद्भुत कुमारी सुभद्रा को देखा, जो वीरों को मोहने वाली थी।

उनकी आँखेहर्ष से खुली की खुली रह गई, उनका मन विचलित हो उठा और उसी के विचारों में लीन होगया।

सापि तं चकमे वीक्ष्य नारीणां हृदयंगमम्‌ ।

हसन्ती ब्रीडितापड़ी तन्न्यस्तहदयेक्षणा ॥

७॥

सा--वह; अपि--भी; तम्‌--उसको; चकमे--चाहने लगी; वीक्ष्य--देखकर; नारीणाम्‌--स्त्रियों के; हृदयम्‌-गमम्‌--हृदयों कोचुराने वाली; हसन्ती--हँसती हुईं; ब्रीडिता--लज्जा से युक्त; अपाड्री--तिरछी दृष्टि डालती; तत्‌--उस पर; न्यस्त--स्थिर;हृदय--हृदय; ईक्षणा--तथा आँखेंअर्जुन स्त्रियों के लिए अतीव आकर्षक थे

अतः ज्योंही सुभद्रा ने उन्हें देखा, वे उन्हें पतिरूप में पाने की इच्छा करने लगीं।

लजीली हँसी से तथा तिरछी चितवनों से उसने अपना हृदयतथा अपनी आँखें उन्हीं पर गड़ा दीं।

तां परं समनुध्यायत्नन्तरं प्रेप्सुर्जुन: ।

न लेभे शं भ्रमच्चित्त: कामेनातिबलीयसा ॥

८॥

तामू--उस पर; परम्‌--एकमात्र; समनुध्यायन्‌ू-- ध्यान करती; अन्तरम्‌ू--उचित अवसर; प्रेप्सु:--प्राप्त करने की प्रतीक्षा हुए;अर्जुन:--अर्जुन; न लेभे--अनुभव नहीं कर सका; शम्‌--शान्ति; भ्रमत्‌--विचलित; चित्त:--हृदय; कामेन--काम द्वारा;अति-बलीयसा--अ त्यन्त प्रबल |

उसी का ध्यान करते तथा उसे उठा ले जाने के अवसर की प्रतीक्षा करते हुए अर्जुन को चैननहीं मिल पा रहा था।

उनका हृदय कामेच्छा से धकधका रहा था।

महत्यां देवयात्रायां रथस्थां दुर्गनिर्गतां ।

जहारानुमतः पित्रो: कृष्णस्य च महारथ: ॥

९॥

महत्याम्‌-महत्त्वपूर्ण; देब--भगवान्‌ के लिए; यात्रायाम्‌--उत्सव के मध्य; रथ--रथ पर; स्थाम्‌--आरूढ़; दुर्ग--किले से;निर्गतामू--बाहर आई हुई; जहार--उसे पकड़ लिया; अनुमतः --अनुमति से; पित्रो: --अपने माता-पिता की; कृष्णस्थ--कृष्णकी; च--तथा; महा-रथ:-- अन्य बलशाली रथी योद्धा |

एक बार भगवान्‌ के सम्मान में विशाल मन्दिर-उत्सव के अवसर पर, सुभद्रा रथ पर आरूढ़होकर दुर्ग जैसे महल से बाहर आई।

उस समय महारथी अर्जुन को उसका हरण करने काअवसर प्राप्त हुआ।

सुभद्रा के माता-पिता तथा कृष्ण ने इसकी स्वीकृति दे दी थी।

रथस्थो धनुरादाय शूरांश्वारुन्थतो भटान्‌ ।

विद्राव्य क्रोशतां स्वानां स्वभागं मृगगाडिव ॥

१०॥

रथ--रथ पर; स्थ:--खड़े; धनु:--अपना धनुष; आदाय--लेकर; शूरान्‌--वीरों को; च--तथा; अरुन्धतः--उसे रोकने काप्रयत्न करते हुए; भटानू--तथा रक्षकों को; विद्राव्य-- भगाकर; क्रोशताम्‌--क्रोध से चिल्लाते; स्वानाम्‌--उसके सम्बन्धियोंके; स्व--अपना; भागम्‌-- उचित अंश; मृग-राट्‌--पशुओं का राजा, सिंह; इब--सहश

अपने रथ पर खड़े होकर अर्जुन ने अपना धनुष धारण किया और उन बहादुर योद्धाओं तथामहल के रक्षकों को मार भगाया, जो उसका रास्ता रोकना चाह रहे थे।

जब सुभद्रा के सम्बन्धीक्रोध से शोर मचाने लगे, तो उसने सुभद्रा को उसी तरह उठा लिया, जिस तरह सिंह छोटे-छोटेपशुओं के बीच से अपना शिकार ले जाता है।

तच्छुत्वा क्षुभितो राम: पर्वणीव महार्णव: ।

गृहीतपादः कृष्णेन सुहद्धिश्चानुसान्त्वित: ॥

११॥

तत्‌--यह; श्रुत्वा--सुनकर; क्षुभित:--विचलित; राम:--बलराम; पर्वणि--मास की सन्धि आने पर; इब--मानो; महा-अर्णव:ः--सागर; गृहीत--पकड़ने पर; पाद:--पाँव; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; सुहृद्धिः--अपने पारिवारिक सदस्यों द्वारा; च--तथा; अनुसान्त्वित:ः--सावधानी से सान्त्वना दिये गये।

जब बलराम ने सुभद्रा के अपहरण के विषय में सुना, तो वे उसी तरह विचलित हो उठे,जिस तरह पूर्णिमा के अवसर पर सागर क्षुब्ध होता है।

किन्तु भगवान्‌ कृष्ण ने अपने परिवार केअन्य सदस्यों सहित आदरपूर्वक उनके पैर पकड़ लिये और सारा मामला समझाकर उन्हें शान्तकिया।

प्राहिणोत्पारिबर्हाणि वरवध्वोर्मुदा बल: ।

महाधनोपस्करेभरथाश्वनरयोषित: ॥

१२॥

प्राहिणोत्‌-- भेजा; पारिबर्हाणि--दहेज के रूप में; बर-वध्वो: --दूल्हे तथा दुलहिन के लिए; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक; बल: --बलराम ने; महा-धन--अ त्यन्त मूल्यवान; उपस्कर-भेंटें; इभ--हा थी; रथ--रथ; अस्व--घोड़े; नर--पुरुष; योषित:--तथास्त्रियाँ॥

तब बलराम ने खुशी खुशी वर-वधू के पास अत्यन्त मूल्यवान दहेज की वस्तुएँ भेजीं,जिनमें हाथी, रथ, घोड़े तथा दास और दासियाँ सम्मिलित थे।

श्रीशुक उबाचकृष्णस्यासीद्‌ द्विजश्रेष्ठ: श्रुतदेव इति श्रुतः ।

कृष्णैकभक्त्या पूर्णार्थ: शान्तः कविरलम्पतः ॥

१३॥

श्री-शुक: उवाच-- श्रीशुकदेव ने कहा; कृष्णस्य-- भगवान्‌ कृष्ण का; आसीतू--था; द्विज--ब्राह्मणों में; श्रेष्ठ: --उत्तम;श्रुतदेव: -- श्रुतदेव; इति--इस प्रकार; श्रुतः:--प्रसिद्ध; कृष्ण--कृष्ण को; एक--एकमात्र; भक्त्या-- भक्ति द्वारा; पूर्ण--पूर्ण;अर्थ:--इच्छा के समस्त लक्ष्यों में; शान्त:--शान्त; कवि:--विद्वान तथा विवेकशील; अलम्पट:--इन्द्रिय-तृप्ति के लिएअनिच्छुक।

शुकदेव गोस्वामी ने आगे कहा : श्रुददेव नामक कृष्ण का एक भक्त था, जो उच्च कोटिका ब्राह्मण था।

भगवान्‌ कृष्ण की अनन्य भक्ति करने से पूर्णतया तुष्ट होने के कारण, वह शान्तएवं विद्वान था तथा इन्द्रिय-तृप्ति से सर्वथा मुक्त था।

स उवास विदेहेषु मिथिलायां गृहाश्रमी ।

अनीहयागताहार्यनिर्वर्तितनिजक्रिय: ॥

१४॥

सः--वह; उबास--रहता था; विदेहेषु--विदेह के राज्य में; मिथिलायाम्‌--मिथिला नामक नगरी में; गृह-आश्रमी--गृहस्थ केरूप में; अनीहया--बिना प्रयास के; आगत--उसके पास आया; आहार्य-- भोजन तथा अन्य उदर-पोषण के साधनों द्वारा;निर्वर्तित--पूरा करता था; निज--अपने; क्रियः--करणीय कार्य |

विदेह के राज्य में मिथिला नामक नगरी में धार्मिक गृहस्थ के रूप में रहते हुए, वह अपनेकर्तव्यों को पूरा करता था और जो कुछ उसे आसानी से मिल जाता था, उसी से अपना निर्वाहकरता था।

यात्रामात्रं त्वहरहर्देवादुपनमत्युत ।

नाधिकं तावता तुष्ट: क्रिया चक्रे यथोचिता: ॥

१५॥

यात्रा-मात्रमू--मात्र उदर-भरण; तु--तथा; अहः अह:--दिन प्रतिदिन; दैवात्‌-- अपने भाग्य से; उपनमति--उसको मिल जाताथा; उत--निस्सन्देह; न अधिकम्‌--अधिक नहीं; तावता--उसी से; तुष्ट:--सन्तुष्ट; क्रिया:--कर्तव्य; चक्रे --वह करता था;यथा--जैसा; उचिता: --उपयुक्त |

विधाता की इच्छा से उसे प्रतिदिन अपने उदर-भरण के लिए उतना मिल जाता, जितने कीउसे आवश्यकता होती--उससे अधिक नहीं।

इतने से ही तुष्ट हुआ, वह अपने धार्मिक कार्यो कोउचित रीति से सम्पन्न करता था।

तथा तद्राष्ट्रपालोउड्र बहुलाश्व इति श्रुतः ।

मैथिलो निरहम्मान उभावप्यच्युतप्रियां ॥

१६॥

तथा--भी ( कृष्ण-भक्त ); तत्‌--उस; राष्ट्र--राज्य का; पाल:--शासक; अड्ग-हे प्रिय ( परीक्षित ); बहुलाश्वः इति श्रुतः--बहुलाश्व नाम से विख्यात; मैथिल:--राजा मिथिल ( जनक ) के राजवंश के; निरहम्‌-मान:--मिथ्या अहंकार से रहित; उभौ--दोनों; अपि--निस्सन्देह; अच्युत-प्रियौ-- भगवान्‌ अच्युत को प्रिय

हे परीक्षित, इसी तरह से उस राज्य का मिथिलवंशी शासक, जिसका नाम बहुलाश्व था,मिथ्या अहंकार से रहित था।

ये दोनों ही भक्त भगवान्‌ अच्युत को अत्यन्त प्रिय थे।

तयोः प्रसन्नो भगवान्दारुकेणाहतं रथम्‌ ।

आरुह्म साकं मुनिभिर्विदेहान्प्रययौ प्रभु: ॥

१७॥

तयो:--उन दोनों से; प्रसन्न:--प्रसन्न; भगवान्‌ू-- भगवान्‌; दारुकेण --दारुक द्वारा; आहतम्‌--लाये गये; रथम्‌--अपने रथ पर;आरुह्म--चढ़ कर; साकम्‌--साथ; मुनिभि: --मुनियों के; विदेहान्‌--विदेह राज्य में; प्रययौ --गये; प्रभु:--स्वामी |

इन दोनों से प्रसन्न होकर, दारुक द्वारा लाये गये अपने रथ पर चढ़ कर, भगवान्‌ ने मुनियोंकी टोली समेत विदेह की यात्रा की।

नारदो वामदेवोत्रि: कृष्णो रामोउसितोरुणि: ।

अहं बृहस्पति: कण्वो मैत्रेयशच्यवनादय: ॥

१८॥

नारद: वामदेव:ः अत्रिः--नारद, वामदेव तथा अत्रि मुनि; कृष्ण:--कृष्णद्वैपायन व्यास; राम: --परशुराम; असितः अरुणि:--असित तथा अरुणि; अहम्‌--मैं ( शुकदेव ); बृहस्पति: कण्व:--बृहस्पति तथा कण्व; मैत्रेय:--मैत्रेय ; च्यवन--च्यवन;आदयः--त्यादि।

इन मुनियों में नारद, वामदेव, अत्रि, कृष्णद्वैधायन व्यास, परशुराम, असित, अरुणि, स्वयंमैं, बृहस्पति, कण्व, मैत्रेय तथा च्यवन सम्मिलित थे।

तत्र तत्र तमायान्तं पौरा जानपदा नृप ।

उपतस्थुः साध्यहस्ता ग्रहैः सूर्यमिवोदितम्‌ ॥

१९॥

तत्र तत्र--प्रत्येक स्थान में; तम्‌ू--उसको; आयान्तम्‌--आया हुआ; पौरा: --नगर निवासी; जानपदा: --तथा ग्रामवासी; नृप--हेराजा ( परीक्षित ); उपतस्थु;--स्वागत करने आये; स--सहित; अर्घ्य--आदरसूचक जल की भेंट; हस्ता: --अपने हाथों में;ग्रहैः--ग्रहों से; सूर्यम्‌--सूर्य; इब--सहश; उदितम्‌--उदित ।

हे राजनू, भगवान्‌ जिस जिस नगर तथा ग्राम से होकर गुजरे, वहाँ के निवासी अपने अपनेहाथों में अर्घ्य की भेंट लेकर उनकी पूजा करने हेतु आगे आये, मानो वे ग्रहों से घिरे हुए सूर्य कीपूजा करने आये हों।

आनर्त धन्वकुरुजाडुलकटड्डमत्स्थ-पाञ्जालकुन्तिमधुकेकयकोशलार्णा: ।

अन्ये च तन्मुखसरोजमुदारहास-स्निग्धेक्षणं नृप पपुर्दशिभिखर्ना्य: ॥

२०॥

आनर्त--आनर्त ( वह प्रदेश जिसमें द्वारका स्थित है ) के लोग; धन्‍्व--मरुथल ( गुजरात या राजस्थान का ); कुरु-जाडुल--कुरु जंगलों का प्रदेश ( जिसमें थानेश्वर तथा कुरुक्षेत्र के जिले आते हैं ); कड्ढू--कंक; मत्स्य--मत्स्य ( जयपुर तथा अलवर केराज्य ); पाञ्ञाल--गंगा नदी के दोनों किनारों वाले जिले; कुन्ति--मालव; मधु--मथुरा; केकय--उत्तर पूर्व पंजाब में, शतद्भुतथा विपाशा नदियों के बीच का प्रदेश; कोशल--भगवान्‌ रामचन्द्र का प्राचीन राज्य जो काशी के उत्तरी छोर से हिमालय तकविस्तृत था; अर्गा:--तथा पूर्व में मिथिला से लगा राज्य; अन्ये--अन्य; च-- भी; तत्‌--उसके; मुख--मुँह; सरोजम्‌ू--कमलको; उदार--उदार; हास--हँसी से युक्त; स्निग्ध--तथा स्नेहिल; ईक्षणम्‌--चितवन; नृप--हे राजा; पपु:--पिया; हशिभि:--अपनी आँखों से; नृ-नार्य:--पुरुषों तथा स्त्रियों ने।

आनर्त, धन्‍्व, कुरु-जांगल, कंक, मत्स्य, पाज्ञाल, कुन्ति, मधु, केकय, कोशल, अर्ण तथाअन्य कई राज्यों के पुरुषों तथा स्त्रियों ने भगवान्‌ कृष्ण के कमल सद्ृश मुख की अमृतमयीसुन्दरता का अपने नेत्रों से पान किया, जो उदार हँसी तथा स्नेहिल चितवन से सुशोभित था।

तेभ्य: स्ववीक्षणविनष्टतमिस्त्रवग्भ्यःक्षेमं त्रिलोकगुरुरर्थहशं च यच्छन्‌ ।

श्रण्वन्दिगन्तधवलं स्वयशोशुभघ्नंगीत॑ सुरै्नुभिरगाच्छनकैर्विदेहान्‌ू ॥

२१॥

तेभ्य:--उनको; स्व--अपनी; वीक्षण--चितवन से; विनष्ट--नष्ट किया हुआ; तमिस्त्र--अँधेरा; हृग्भ्य:--जिसकी आँखों का;क्षेममू--निर्भीकता; त्रि--तीनों; लोक--जगतों के; गुरु:--गुरु ; अर्थ-हशम्‌-- आध्यात्मिक दृष्टि; च--तथा; यच्छन्‌--प्रदानकरते हुए; श्रुण्वनू--सुनते हुए; दिकु--दिशाओं के; अन्त--छोर; धवलम्‌--शुद्ध करने वाले; स्व-- अपना; यशः--यश;अशुभ--अशुभ; घ्तम्‌--विनष्ट करने वाले; गीतम्‌--गाये हुए; सुरैः--देवताओं द्वारा; नृभि:--तथा मनुष्यों द्वारा; अगात्‌--आये; शनकै:--धीरे धीरे; विदेहान्‌ू--विदेह के राज्य में ।

तीनों लोकों के गुरु भगवान्‌ कृष्ण ने उन सबों पर, जो उनको देखने आये थे, मात्र अपनीइष्टि डालते हुए, उन्हें भौतिकतावाद के अंधकार से उबार लिया।

इस तरह उन्हें निर्भीकता तथादिव्य दृष्टि देते हुए भगवान्‌ ने देवताओं तथा मनुष्यों को उन्हीं का यश गाते सुना, जो सारेब्रह्माण्ड को शुद्ध करने वाला है और सारे दुर्भाग्य को विनष्ट करता है।

धीरे धीरे वे विदेह पहुँचगये।

तेडच्युतं प्राप्तमाकर्ण्य पौरा जानपदा नृप ।

अभीयुर्मुदितास्तस्मै गृहीताहणपाणय: ॥

२२॥

ते--वे; अच्युतम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; प्राप्तम्‌--आया हुआ; आकर्णय्य--सुन कर; पौरा:-- नगरवासी; जानपदा:--तथाग्रामवासी; नृप--हे राजा; अभीयु:--आगे आये; मुदिता:-- प्रसन्न मुख; तस्मै--उसको; गृहीत--पकड़े हुए; अर्हण--उन्हेंअर्पित करने के लिए भेंटें; पाणय:--अपने हाथों में |

हे राजा, यह सुनकर कि भगवान्‌ अच्युत आ चुके हैं, विदेह के नगर तथा ग्रामनिवासीहर्षपूर्वक अपने अपने हाथों में भेंटें लेकर, उनका स्वागत करने आये।

इष्ठा त उत्तम:एलोकं प्रीत्युत्फुलाननाशया: ।

कैर्धृताञजलिभिनेंमु: श्रुतपूर्वास्तथा मुनीन्‌ ॥

२३॥

इष्ठा--देख कर; ते--वे; उत्तम:-शलोकम्‌--उत्तम एलोकों से प्रशंसित भगवान्‌ कृष्ण को; प्रीति--प्रेमपूर्वक ; उत्फुल्ल --प्रफुल्लित; आनन--उनके मुखड़े; आशया:--तथा उनके हृदय; कैः--अपने सिरों पर; धृत-- धारण किये; अज्ञलिभि:--अंजुलियों से; नेमु:--प्रणाम किया; श्रुत--सुना गया; पूर्वानू--पहले; तथा-- भी; मुनीन्‌--मुनियों को

ज्योंही लोगों ने उत्तमशएलोक भगवान्‌ को देखा, उनके मुखड़े तथा हृदय स्नेह से प्रफुल्लित होउठे।

अपने सिरों के ऊपर अंजुली बाँध कर, उन्होंने भगवान्‌ को तथा उनके साथ आये मुनियोंको प्रणाम किया, जिनके विषय में उन्होंने पहले केवल सुन रखा था।

स्वानुग्रहाय सम्प्राप्तं मन्‍्वानौ त॑ं जगद्गुरुम्‌ ।

मैथिल: श्रुतदेवश्च पादयो: पेततु: प्रभोः ॥

२४॥

स्त--अपने को; अनुग्रहाय--अनुग्रह करने के लिए; सम्प्राप्तम्‌--अब; मन्वानौ--दोनों सोचते हुए; तम्‌--उस; जगतू--ब्रह्माण्ड के; गुरुम्‌-गुरु को; मैथिल:--मिथिला का राजा; श्रुतदेव:-- श्रुतदेव; च--तथा; पादयो:--चरणों पर; पेततु:--गिरपड़े; प्रभोः--प्रभु के

मिथिला का राजा तथा श्रुतदेव दोनों ही प्रभु के चरणों पर गिर पड़े और उनमें से हर एकयही सोच रहा था कि ब्रह्माण्ड के गुरु उन पर अनुग्रह करने आये हैं।

न्यमन्त्रयेतां दाशाहमातिथ्येन सह द्विजै: ।

मैथिल: श्रुतदेवश्च युगपत्संहताझ्लली ॥

२५॥

न्यमन्त्रयेताम्‌ू-दोनों ने निमंत्रित किया; दाशाहम्‌--दशाई वंशज कृष्ण को; आतिथ्येन--अपना अतिथि बनने के लिए; सह--साथ; द्विजैः--ब्राह्मणों के; मैधिल:--बहुलाश्व; श्रुतदेव:-- श्रुददेव; च--तथा; युगपत्‌--एकसाथ; संहत--हढ़ता से पकड़ेहुए; अज्लली--दोनों हथेलियाँ |

एक ही समय पर मैथिलराज तथा श्रुतदेव हाथ जोड़े हुए आगे आये और दशाहों के स्वामीको ब्राह्मण मुनियों समेत अपने अतिथि बनने के लिए आमंत्रित किया।

भगवांस्तदभिप्रेत्य द्वययो: प्रियचिकीर्षया ।

उभयोराविशद्गेहमुभाभ्यां तदलक्षित: ॥

२६॥

भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; तत्‌--इसे; अभिप्रेत्य--स्वीकार करके; द्ययो:--उन दोनों के; प्रिय-- अच्छा लगने वाला; चिकीर्षया--करने की इच्छा से; उभयो:--दोनों के; आविशत्‌--प्रवेश किया; गेहम्‌--घरों में; उभाभ्याम्‌--दोनों; तत्‌--उस ( दूसरे के घरमें प्रवेश करने ) में; अलक्षित:--अनदेखा |

दोनों ही को प्रसन्न करने की इच्छा से भगवान्‌ ने दोनों का निमंत्रण स्वीकार कर लिया।

इसतरह एक ही समय वे दोनों के घरों में गये और उनमें से कोई भी उन्हें दूसरे के घर में प्रवेश करतेनहीं देख सका।

श्रान्तानप्यथ तान्दूराजनक: स्वगृहागतान्‌ ।

आनीतेष्वासनाछयेषु सुखासीनान्महामना: ॥

२७॥

प्रवृद्धभक्‍त्या उद्धर्षहदयास्त्राविलेक्षण: ।

नत्वा तदद्घ्नीन्प्रक्षाल्य तदपो लोकपावनी: ॥

२८॥

सकुटुम्बो वहन्मूर्ध्ना पूजयां चक्र ईश्वरान्‌ ।

गन्धमाल्याम्बराकल्पधूपदीपार्ध्यगोवृषै: ॥

२९॥

श्रान्तानू-- थके हुए; अपि--निस्सन्देह; अथ--तब; तान्‌--उन्‍्हें; दूरात्‌ू--दूर से; जनक:--जनक का वंशज, राजा बहुला श्व;स्व--अपने; गृह--घर; आगतान्‌--आये हुए; आनीतेषु--जो लाये गये; आसन--आसनों पर; अछयेषु---उत्तम; सुख--सुखपूर्वक; आसीनान्‌--बैठे हुए; महा-मना: --अत्यन्त बुद्धिमान; प्रवृद्ध--गहन; भक्त्या--भक्ति के साथ; उत्‌-धर्ष--आह्लादित; हृदय--हृदय वाले; अस्त्र--आँसुओं से; आविल--धूमिल; ईक्षण:--आँखों वाले; नत्वा--नमन करके; तत्‌--उनके; अद्श्नीन्‌--पाँवों को; प्रक्षाल्य-- धोकर; तत्‌ू--उस; अप:--जल से; लोक--सारे जगत को; पावनी:--शुद्ध करने मेंसमर्थ; स--सहित; कुटुम्ब:--अपने परिवार; वहन्‌--लेकर; मूर्धा--अपने सिर पर; पूजयाम्‌ चक्रे --पूजा की; ईंश्वरान्‌ू--ई श्वरोंकी; गन्ध--सुगन्धित ( चन्दन के ) लेप से; माल्य--फूल की मालाओं; अम्बर--वस्त्र; आकल्प--आभूषण; धूप--अगुरू;दीप--दीपक; अर्ध्य--अर्ध्य जल; गो--गौवों; वृषैः--तथा साँडड़ों से |

जब जनकवंशी बहुलाश्व ने दूर से भगवान्‌ कृष्ण को मुनियों समेत, जो यात्रा से कुछ कुछथके थे, अपने घर की ओर आते देखा, तो उसने तुरन्त उनके लिए सम्मानित आसन लाये जानेकी व्यवस्था की।

जब वे सब सुखपूर्वक बैठ गये, तो बुद्धिमान राजा ने, जिसका हृदय प्रसन्नतासे आप्लावित हो रहा था और जिसके नेत्र अश्रुओं से धूमिल हो रहे थे, उन सबों को नमन कियाऔर गहन भक्ति के साथ उनके चरण पखारे।

फिर इस प्रक्षालन-जल को, जो सारे संसार कोशुद्ध कर सकता था, उन्होंने अपने सिर पर तथा अपने परिवार के सदस्यों के सिरों पर छिड़का।

तत्पश्चात्‌ उसने सुगंधित चन्दन-लेप, फूल की मालाओं, सुन्दर वस्त्र तथा आभूषणों, अगुरु,दीपक, अर्ध्य तथा गौवों और साँड़ों की भेंट देते हुए, उन महानुभावों की पूजा की।

वबाचा मधुरया प्रीणन्निदमाहान्नतर्पितान्‌ ।

पादावड्जूगतौ विष्णो: संस्पृशज्छनकैर्मुदा ॥

३०॥

वाचा--वाणी से; मधुरया--मधुर, धीमी; प्रीणन्‌--प्रसन्न करने का प्रयास करते हुए; इदम्‌--यह; आह--कहा; अन्न--भोजनसे; तर्पितानू--कृतकृत्य किये गये; पादौ--पाँवों को; अड्भू--अपनी गोद में; गतौ--स्थित; विष्णो:-- भगवान्‌ कृष्ण के;संस्पृशन्‌--दबाते हुए; शनकैः -- धीरे धीरे; मुदा--सुखपूर्वक ।

जब वे जी-भरकर भोजन कर चुके, तो उनको और प्रसन्न करने के लिए भगवान्‌ विष्णु केचरणों को अपनी गोद में रखकर और उन्हें सुखपूर्वक दबाते हुए राजा धीरे धीरे तथा मृदुल वाणीमें बोला।

श्रीबहुलाश्व उबाचभवान्हि सर्वभूतानामात्मा साक्षी स्वहग्विभो ।

अथ नस्त्वत्पदाम्भोजं स्मरतां दर्शनं गत: ॥

३१॥

श्री-बहुला श्र: उवाच--श्री बहुलाश्व ने कहा; भवान्‌ू--आप; हि--निस्सन्देह; सर्व--समस्त; भूतानामू--जीवों के; आत्मा--परमात्मा; साक्षी--गवाह; स्व-हक्‌ --आत्म-प्रकाशित; विभो--हे सर्वशक्तिमान; अथ--इस प्रकार; न:--हमको; त्वत्‌--तुम्हारे; पद-अम्भोजम्‌--चरणकमलों को; स्मरताम्‌--स्मरण करने वालों को; दर्शनम्‌ गत:--दिख रहे हैं।

श्री बहुलाश्व ने कहा : हे सर्वशक्तिमान प्रभु, आप समस्त जीवों के आत्मा एवं उनके स्व-प्रकाशित साक्षी हैं और अब आप हम सबों को, जो निरन्तर आपके चरणकमलों का ध्यान करतेहैं, अपना दर्शन दे रहे हैं।

स्ववचस्तहतं कर्तुमस्महृग्गोचरो भवान्‌ ।

यदात्थेकान्तभक्तान्मे नानन्‍्तः श्रीरज: प्रिय: ॥

३२॥

स्व--अपना; वच:--कथन; तत्‌-- उस; ऋतम्‌-- सत्य; कर्तुमू--बनाने के लिए; अस्मत्‌--हमारी; हक्‌-- आँखों को;गोचर: --दिखने वाला; भवान्‌ू--आप; यत्‌--जो; आत्थ--कहा; एक-अन्त--एक ही उद्देश्य से; भक्तात्‌ू-भक्त की अपेक्षा;मे--मेरा; न--नहीं; अनन्तः-- भगवान्‌ अनन्त; श्री:-- श्री देवी; अजः --अजन्मा ब्रह्मा; प्रिय: --प्रिय ॥

आपने कहा है, 'मुझे अपने अनन्य भक्त की तुलना में न तो अनन्त, देवी श्री या न हीअजन्मा ब्रह्मा अधिक प्रिय हैं।

अपने ही शब्दों को सत्य सिद्ध करने के लिए, अब आपने हमारेनेत्रों के समक्ष अपने को प्रकट किया है।

को नु त्वच्चरणाम्भोजमेवंविद्विसूजेत्पुमान्‌ ।

निष्किद्ननानां शान्तानां मुनीनां यस्त्वमात्मद: ॥

३३॥

कः--कौन; नु--तनिक भी; त्वत्‌-तुम्हारे; चरण-अम्भोजम्‌--चरणकमलों को; एवम्‌--इस तरह; वित्‌ू--जानते हुए;विसृजेत्‌-त्याग देंगे; पुमान्‌--व्यक्ति को; निष्किज्ञनानामू--निष्काम व्यक्तियों के लिए; शान्तानाम्‌--शान्त; मुनीनाम्‌--मुनियोंके लिए; य:--जो; त्वम्‌--तुम; आत्म--स्वयं को; दः--देने वाले।

ऐसा कौन पुरुष है, जो इस सत्य को जानते हुए कभी आपके चरणकमलों का परित्यागकरेगा, जब आप उन शान्त मुनियों को अपने आप तक को दे डालने के लिए उद्यत रहते हैं, जोकिसी भी वस्तु को अपनी नहीं कहते ?

योउवतीर्य यदोर्वशे नृणां संसरतामिह ।

यशो वितेने तच्छान्त्यै त्रैलोक्यवृजिनापहम्‌ ॥

३४॥

यः--जो; अवतीर्य--अवतरित होकर; यदो:--यदु के; वंशे--वंश में; नृणाम्‌--मनुष्यों के लिए; संसरताम्‌--जन्म-मृत्यु केअक्र में फँसे हुए; इह--इस संसार में; यशः--आपका यश; वितेने-- प्रसार कर चुका है; तत्‌ू--उस ( जगत ) के; शान्त्यै--शमन के लिए; त्रै-लोक्य--तीनों लोकों के; वृजिन--पाप; अपहम्‌--दूर करने वाला।

आपने यदुवंश में प्रकट होकर तीनों लोकों के समस्त पापों को दूर कर सकने में समर्थअपने यश का विस्तार, जन्म-मृत्यु के चक्कर में फँसे हुओं का उद्धार करने के लिए ही किया है।

नमस्तुभ्यं भगवते कृष्णायाकुण्ठमेधसे ।

नारायणाय ऋषये सुशान्तं तप ईयुषे ॥

३५॥

नमः--नमस्कार; तुभ्यमू--तुमको; भगवते-- भगवान्‌; कृष्णाय--कृष्ण को; अकुण्ठ--विस्तृत; मेधसे--बुद्धि वाले;नारायणाय ऋषये--ऋषि नर-नारायण को; सु-शान्तम्‌-पूर्णतया शान्त; तपः--तपस्या में; ईयुषे--संलग्न |

हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ कृष्ण, आपको नमस्कार है, जिनकी बुद्धि सदैव ही असीम है।

ऋषि नर-नारायण को नमस्कार है, जो पूर्ण शान्ति में रह कर सदैव तपस्या करते रहते हैं।

दिनानि कतिचिद्धूमन्गृहान्नो निवस द्विजैः ।

समेत: पादरजसा पुनीहीदं निमे: कुलम्‌ ॥

३६॥

दिनानि--दिन; कतिचित्‌--कुछ; भूमन्‌--हे सर्वव्यापी; गृहान्‌ू--घर में; नः--हमारे; निवस--कृपया निवास करें; द्विजैः--ब्राह्मणों द्वारा; समेत:--सम्मिलित; पाद--अपने चरणों की; रजसा--धूल से; पुनीहि--पवित्र करें; इदम्‌--इस; निमेः--राजानिमि के; कुलमू--वंश को

हे सर्वव्यापी, कृपया इन ब्राह्मणों समेत मेरे घर में कुछ दिन ठहरें और अपने चरणों कीधूलि से इस निमिवंश को पवित्र बनायें।

इत्युपामन्त्रितो राज्ञा भगवॉल्लोकभावन: ।

उवास कुर्वन्कल्याणं मिथिलानरयोषिताम्‌ ॥

३७॥

इति--इस प्रकार; उपामन्त्रित:--आमंत्रित; रज्ञा--राजा द्वारा; भगवानू-- भगवान्‌ ने; लोक--पूरे संसार के; भावन:--पालनकर्ता; उबास--निवास किया; कुर्वन्‌--उत्पन्न करते हुए; कल्याणम्‌--सौभाग्य; मिथिला--मिथिला नगरी के; नर--मनुष्यों; योषिताम्‌--तथा स्त्रियों के |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : राजा द्वारा इस तरह आमंत्रित किये जाने पर जगत केपालनकर्ता भगवान्‌ ने मिथिला के नर-नारियों को सौभाग्य प्रदान करने हेतु कुछ समय तकठहरने की सहमति दे दी।

श्रुतदेवोच्युतं प्राप्त स्‍्वगृहाज्लनको यथा ।

नत्वा मुनीन्सुसंहष्टो धुन्वन्वासो ननर्त ह ॥

३८॥

श्रुतदेव:-- श्रुतदेव; अच्युतम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण को; प्राप्तम्‌--पाया हुआ; स्व-गृहान्‌--अपने घर में; जनक: --बहुला श्व ने;यथा--जिस तरह; नत्वा--नमस्कार करके; मुनीन्‌--मुनियों को; सु--अत्यधिक; संदृष्ट:--प्रसन्न; धुन्बन्‌--हिलाते हुए;वास:--अपना वस्त्र; ननर्त ह--नाचने लगा।

श्रुतदेव ने अपने घर में भगवान्‌ अच्युत का उतने ही उत्साह के साथ स्वागत किया, जैसा किराजा बहुलाश्व ने प्रदर्शित किया था।

भगवान्‌ तथा मुनियों को नमस्कार करके श्रुतदेव अपनादुशाला हिला-हिला कर परम हर्ष से नाचने लगा।

तृणपीठबृषीष्वेतानानीतेषूपवेश्य सः ।

स्वागतेनाभिनन्द्याड्स्रीन्सभार्यो उवनिजे मुदा ॥

३९॥

तृण--घास के; पीठ--आसनों पर; बृषीषु--तथा दर्भ की बनी चटाइयों पर; एतान्‌--उन्हें; आनीतेषु--लाये गये; उपवेश्य--बैठाकर; सः--वह; स्व-आगतेन--स्वागत के शब्दों से; अभिनन्द्य--अभिनन्दन करके; अद्घ्रीन्‌ू--चरणों को; स-भार्य:--अपनी पत्नी सहित; अवनिजे-- धोया; मुदा--प्रसन्नतापूर्वक ।

घास तथा दर्भ तृण से बनी चटाइयाँ लाकर तथा अपने अतिथियों को उन पर बैठाकर, उसनेस्वागत के शब्दों द्वारा उनका सत्कार किया।

तब उसने तथा उसकी पली ने बड़ी ही प्रसन्नता केसाथ उनके चरण पखारे।

तदम्भसा महाभाग आत्मानं सगृहान्वयम्‌ ।

स्नापयां चक्र उद्धर्षो लब्धसर्वमनोरथ: ॥

४०॥

तत्‌--उस; अम्भसा--जल से; महा-भाग: --अत्यन्त पवित्र; आत्मानम्‌ू--स्वयं को; स--सहित; गृह-- अपने घर; अन्वयम्‌--तथा अपने परिवार; स्नापयाम्‌ चक्रे--स्नान किया; उद्धर्ष: --अत्यधिक हर्षित; लब्ध--प्राप्त की हुई; सर्व--समस्त; मनः-रथः--इच्छाएँ।

उस चरणोदक को महाभाग श्रुतदेव ने अपने, अपने घर तथा अपने परिवार वालों पर जी भरकर छिड़का।

अति हर्षित होकर उसने अनुभव किया कि अब उसकी सारी इच्छाएँ पूरी हो गईहैं।

'फलाईणोशीरशिवामृताम्बुभि-मृदा सुरभ्या तुलसीकुशाम्बुयै: ।

आराधयामास यथोपपन्नयासपर्यया सत्त्वविवर्धनान्थसा ॥

४१॥

'फल--फलों की; अर्हण-- भेंट से; उशीर--खस से; शिव--शुद्ध; अमृत--अमृत जैसे मीठे; अम्बुभि:--तथा जल से; मृदा--मिट्टी; सुरभ्या--सुगंधित; तुलसी--तुलसी दलों; कुश--कुश घास; अम्बुजै:ः--तथा कमल के फूलों से; आराधयाम्‌ आस--उसने उनकी पूजा की; यथा--जिस तरह; उपपन्नया--प्राप्त किया जा सके; सपर्यया--पूजा सामग्री सहित; सत्त्व--सतोगुण;विवर्धन--वृद्धि; अन्धसा-- भोजन से |

उसने सहज उपलब्ध होने वाली शुभ सामग्री यथा फल, उशीर, शुद्ध अमृत तुल्य जल,सुगंधित मिट्टी, तुलसी दल, कुश तृण तथा कमल के फूल अर्पित करते हुए उनकी पूजा की।

तबउसने उन्हें वह भोजन परोसा, जो सतोगुण को बढ़ाता है।

स तर्कयामास कुतो ममान्वभूत्‌गृहान्धकूपे पतितस्य सड्रम: ।

यः सर्वतीर्थास्पदपादरेणुभि:कृष्णेन चास्यात्मनिकेतभूसुरै: ॥

४२॥

सः--उसने; तर्कयाम्‌ आस--समझने की कोशिश की; कुतः--किस कारण से; मम--मेरे; अनु--निस्सन्देह; अभूत्‌ू--हुआ है;गृह--घर रूपी; अन्ध--अंधे; कूपे--कुएँ में; पतितस्थ--गिरे हुए; सड्भम: --संगति; यः--जो; सर्व--सभी; तीर्थ--तीर्थस्थानोंके; आस्पद--शरण स्वरूप; पाद--जिसके पाँवों की; रेणुभि:--धूलि से; कृष्णेन--कृष्ण से; च-- भी; अस्य--इसके;आत्म--स्वयं का; निकेत--घर स्वरूप; भू-सुरैः--ब्राह्मणों से |

वह आश्चर्य करने लगा कि गृहस्थ जीवन के अंध कूप में गिरा हुआ, मैं भगवान्‌ कृष्ण सेभेंट करने में कैसे समर्थ हो सका? और मुझे कैसे इन महान्‌ ब्राह्मणों से मिलने दिया गया, जोअपने हृदयों में सदैव भगवान्‌ को धारण किये रहते हैं ? निस्सन्देह उनके चरणों की धूलि समस्ततीर्थस्थानों के आश्रय रूप है।

सूपविष्टान्कृतातिथ्यान्श्रुददेव उपस्थित: ।

सभार्यस्वजनापत्य उवाचाड्ठ्यभिमर्शन: ॥

४३॥

सु-उपविष्टानू--सुखपूर्वक बैठे हुए; कृत--की गईं; आतिथ्यान्‌ू--मेहमानगिरी, सत्कार; श्रुतदेव:-- श्रुतदेव; उपस्थित: --उनकेपास बैठा हुआ; स-भार्य--अपनी पत्नी के साथ; स्व-जन--सम्बन्धीजन; अपत्य:--तथा सन्तानें; उवाच--बोला; अड्धूप्रि--( भगवान्‌ कृष्ण के ) पाँव; अभिमर्शन:--दबाते हुए।

जब उसके अतिथि समुचित सम्मान प्राप्त करके सुखपूर्वक बैठ गये, तो श्रुतदेव उनकेनिकट गया और अपनी पली, बच्चों तथा अन्य आश्ञितों समेत उनके समीप बैठ गया।

तत्पश्चात्‌भगवान्‌ के चरणों को दबाते हुए, उसने कृष्ण तथा मुनियों को सम्बोधित किया।

श्रुददेव उबाचनाद्य नो दर्शन प्राप्त: पर परमपूरुष: ।

यहांदं शक्तिभि: सृष्ठ्रा प्रविष्टो ह्मात्मसत्तया ॥

४४॥

श्रुतदेव: उवाच-- श्रुतदेव ने कहा; न--नहीं; अद्य--आज; न: --हमरे द्वारा; दर्शनम्‌--दर्शन; प्राप्त: --प्राप्त किया हुआ;परम्‌--एकमात्र; परम--सर्वोच्च; पूरूष:--पुरुष; यहिं--- जब; इृदम्‌--यह ( ब्रह्माण्ड ); शक्तिभि:--अपनी शक्तियों सहित;सृष्ठा--उत्पन्न करके; प्रविष्ट:--प्रविष्ट; हि--निस्सन्देह; आत्म--अपनी; सत्तया--सत्ता से

श्रुददेव ने कहा : ऐसा नहीं है कि हमने केवल आज ही परम पुरुष का दर्शन किया है,क्योंकि जब से उन्होंने अपनी शक्तियों से इस ब्रह्माण्ड की रचना की है और अपने दिव्य रूप सेउसमें प्रविष्ट हुए हैं, तब से हम उनका सात्निध्य प्राप्त करते रहे हैं।

यथा शयानः पुरुषो मनसैवात्ममायया ।

सृष्टा लोक॑ परं स्वाप्ममनुविश्यावभासते ॥

४५॥

यथा--जिस तरह; शयान:--सोते हुए; पुरुष:--व्यक्ति; मनसा--मस्तिष्क से; एबव--केवल; आत्म--अपना; मायया--कल्पना से; सृधप्ठा--सृजन करके; लोकम्‌--जगत; परम्‌ू--पृथक्‌; स्वाणम्‌--स्वण; अनुविश्य-- प्रवेश करके; अवभासते--प्रकट होता है

भगवान्‌ उस सोये हुए व्यक्ति की तरह हैं, जो अपनी कल्पना में पृथक्‌ जगत का निर्माणकरता है और तब अपने ही स्वणन में प्रवेश करता है तथा उसके भीतर अपने को देखता है।

श्रण्वतां गदतां शश्वदर्चतां त्वाभिवन्दताम्‌ ।

णृणां संवदतामन्तईदि भास्यमलात्मनाम्‌ ॥

४६॥

श्रुण्वताम्‌ू--सुनने वालों के लिए; गदताम्‌--बोलते हुए; शश्वत्‌--निरन्तर; अर्चताम्‌-पूजा करते हुए; त्वा--तुम;अभिवन्दताम्‌- प्रशंसा करते हुए; नृणाम्‌ू-मनुष्यों के लिए; संवदताम्‌--बातें करते हुए; अन्तः-- भीतर; हृदि--हृदय में;भासि--तुम प्रकट होते हो; अमल--निर्मल; आत्मनाम्‌--मन वालों के लिए।

आप उन शुद्ध चेतना वाले मनुष्यों के हृदयों के भीतर अपने को प्रकट करते हैं, जो निरन्तरआपके विषय में सुनते हैं, आपका कीर्तन करते हैं, आपकी पूजा करते हैं, आपका गुणगानकरते हैं और आपके ही विषय में एक-दूसरे से चर्चायें करते हैं।

हृदिस्थोप्यतिदूरस्थः कर्मविक्षिप्तचेतसाम्‌ ।

आत्मशक्तिभिरग्राह्मोप्यन्त्युपेतगुणात्मनाम्‌ ॥

४७॥

हृदि--हृदय में; स्थ:--स्थित; अपि--यद्यपि; अति--अत्यन्त; दूर-स्थः--बहुत दूर; कर्म-- भौतिक कार्यो द्वारा; विक्षिप्त--विचलित; चेतसामू--मन वालों के लिए; आत्म--अपनी; शक्तिभि:--शक्तियों से; अग्राह्म:--ग्रहण न किया जा सकने वाला;अपि--यद्यपि; अन्ति--निकट; उपेत-- अनुभूति किया हुआ; गुण-- आपके गुण; आत्मनाम्‌ू--हृदय वालों द्वारा |

किन्तु हृदय के भीतर वास करते हुए भी आप उनसे बहुत दूर रहते हैं, जिनके मन भौतिककार्यों में उलझने से विचलित रहते हैं।

दरअसल कोई भी आपको भौतिक शक्तियों द्वारा पकड़नहीं सकता, क्योंकि आप केवल उन लोगों के हृदयों में प्रकट होते हैं, जिन्होंने आपके दिव्यगुणों की प्रशंसा करनी सीख ली है।

नमोउस्तु तेडध्यात्मविदां परात्मनेअनात्मने स्वात्मविभक्तमृत्यवे ।

सकारणाकारणलिड्मीयुषेस्वमाययासंवृतरुद्धहृष्टये ॥

४८ ॥

नमः--नमस्कार; अस्तु--हो; ते--तुमको; अध्यात्म--परम सत्य; विदाम्‌--जानने वालों के लिए; पर-आत्मने--परमात्मा को;अनात्मने--बद्ध जीवात्मा को; स्व-आत्म--( काल रूप में ) आपसे; विभक्त--देने वाला; मृत्यवे--मृत्यु को; स-कारण--कारणयुक्त; अकारण--कारणरहित; लिड्रम्‌-स्वरूप ( ब्रह्माण्ड तथा आपके आदि स्वरूप ); ईयुषे-- धारण करने वाले; स्व-मायया--अपनी योगशक्ति से; असंवृत--खुला; रुद्ध--तथा रुकी; दृष्टये--दृष्टि |

मैं आपको नमस्कार करता हूँ।

परम सत्य को जानने वालों द्वारा आप परमात्मा के रूप मेंअनुभव किये जाते हैं, जबकि काल रूप में आप विस्मरणशील जीवों के लिए मृत्यु स्वरूप हैं।

आप अपने अहैतुक आध्यात्मिक रूप में तथा इस ब्रह्माण्ड के सृजित रूप में प्रकट होते हैं।

इसतरह आप एक ही समय अपने भक्तों की आँखें खोलते हैं और अभक्तों की दृष्टि को बाधितकरते हैं।

स त्वं शाधि स्वभृत्यान्न: कि देव करवाम हे ।

एतदन्तो नृणां क्लेशो यद्धवानक्षिगोचर: ॥

४९॥

सः--वह; त्वम्‌ू--तुम; शाधि--आज्ञा दें; स्व--अपने; भृत्यान्‌ू--दासों को; न:--हम; किम्‌--क्या; देव--हे प्रभु; करवाम--हमें करना चाहिए; हे--ओह; एतत्‌--यह; अन्त:--इसके अन्त के रूप में; नृणाम्‌--मनुष्यों के; क्लेश:--क्लेश; यत्‌--जो;भवान्‌--आपकी; अक्षि--आँखों को; गो-चर:--हृश्य |

हे प्रभु, आप ही वह परमात्मा हैं और हम आपके दास हैं।

हम आपकी किस तरह सेवा करें ?हे प्रभु, आपके दर्शन मात्र से मनुष्य-जीवन के सारे क्लेशों का अन्त हो जाता है।

श्रीशुक उबाचतदुक्तमित्युपाकर्ण्य भगवान्प्रणतार्तिहा ।

गृहीत्वा पाणिना पाएिं प्रहसंस्तमुवाच ह ॥

५०॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; तत्‌--उस ( श्रुतदेव ) के द्वारा; उक्तमू--कहा गया; इति--इस प्रकार;उपाकर्ण्य--सुन कर; भगवान्‌-- भगवान्‌; प्रणत--शरणागत के; आर्ति--कष्ट का; हा--विनाश करने वाला; गृहीत्वा--पकड़कर; पाणिना--अपने हाथ से; पाणिम्‌--उसका हाथ; प्रहसन्‌ू--खिलखिलाकर हँसते हुए; तमू-- उससे; उवाच ह--कहा |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : श्रुतदेव को ये शब्द कहते सुन कर, शरणागतों के कष्ट कोदूर करने वाले भगवान्‌ ने श्रुददेव के हाथ को अपने हाथ में ले लिया और हँसते हुए, उससे इसप्रकार बोले।

श्रीभगवानुवाचब्रह्म॑स्तेउनुग्रहार्थाय सम्प्राप्तान्विद्धयमून्मुनीन्‌ ।

सद्जरन्ति मया लोकान्पुनन्तः पादरेणुभि: ॥

५१॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- भगवान्‌ ने कहा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; ते--तुम्हारा; अनुग्रह-- आशीर्वाद देने के; अर्थाय-नहेतु;सम्प्राप्तान्‌ू--आये हुए; विद्धि--जानो; अमून्‌--इन; मुनीन्‌--मुनियों को; सझ्ञरन्ति-- भ्रमण करते हैं; मया--मेरे साथ साथ;लोकानू--सारे जगतों को; पुनन्त:ः--शुद्ध करते हुए; पाद--अपने पैरों की; रेणुभि:-- धूल से |

भगवान्‌ ने कहा : हे ब्राह्मण, तुम यह जान लो कि ये महान्‌ ऋषिगण यहाँ तुम्हें आशीर्वाद देने ही आये हैं।

ये मेरे साथ साथ सारे जगतों में भ्रमण करते हैं और अपने चरणों की धूल से,उन्हें पवित्र करते हैं।

देवा: क्षेत्राणि तीर्थानि दर्शनस्पर्शनार्चन: ।

शनेः पुनन्ति कालेन तदप्यहत्तमेक्षया ॥

५२॥

देवा:ः--मन्दिर के अर्चाविग्रह; क्षेत्राणि--तीरर्थस्थल; तीर्थानि--तथा पवित्र नदियाँ; दर्शन--दर्शन करने से; स्पर्शन--स्पर्श से;अर्चनै:--तथा पूजा करने से; शनै:--धीरे धीरे; पुनन्ति--पवित्र करते हैं; कालेन--समय से; तत्‌ अपि--वे ही; अहैत्‌-तम--सर्वाधिक पूज्यों ( ब्राह्मणों ) की; ईक्षया--चितवन से।

मनुष्य मन्दिर के अर्चाविग्रहों, तीर्थस्थलों तथा पवित्र नदियों के दर्शन, स्पर्श तथा पूजन सेधीरे धीरे शुद्ध बन सकता है।

किन्तु महान्‌ मुनियों की कृपादृष्टि प्राप्त करने मात्र से, उसे तत्कालवही फल प्राप्त हो सकता है।

ब्राह्मणो जन्मना श्रेयान्सर्वेषाम्प्राणिनामिह ।

तपसा विद्यया तुष्टठया किमु मत्कलया युतः ॥

५३॥

ब्राह्मण: --ब्राह्मण; जन्मना--जन्म से; श्रेयान्‌--सर्वोत्तम; सर्वेषामू--सभी; प्राणिनाम्‌--जीवों में; इह--इस जगत में; तपसा--अपनी तपस्या से; विद्यया--अपनी विद्या से; तुष्ठाया--तथा अपने संतोष से; किम्‌ उ--तब और क्या; मत्‌--मुझ पर; कलया--प्रेमपूर्ण ध्यान से; युत:--युक्त |

ब्राह्मण अपने जन्म से ही इस जगत में समस्त जीवों में श्रेष्ठ है, किन्तु वह तब और भीउच्चस्थ बन जाता है, जब वह तपस्या, विद्या तथा आत्म-संतोष से युक्त होता है।

यदि मेरे प्रतिउसकी भक्ति हो, तो फिर कहना ही क्‍या है।

न ब्राह्मणान्मे दयितं रूपमेतच्चतुर्भुजम्‌ ।

सर्ववेदमयो विप्र: सर्वदेवमयो हाहम्‌ ॥

५४॥

न--नहीं; ब्राह्मणातू--ब्राह्मण की अपेक्षा; मे--मुझको; दयितम्‌--अधिक प्रिय; रूपम्‌--स्वरूप; एतत्‌--यह; चतु:-भुजम्‌--चार भुजाओं वाला; सर्व--समस्त; वेद--वेदों से; मय:ः--युक्त; विप्र:--विद्वान ब्राह्मण; सर्व--समस्त; देव--देवताओं से;मयः--युक्त; हि--निस्सन्देह; अहम्‌-मैं |

यहाँ तक कि मुझे ब्राह्मणों की तुलना में अपना चतुर्भुजी रूप अधिक प्रिय नहीं है।

एकविद्वान ब्राह्मण में सारे वेद उसी तरह रहते हैं, जिस तरह मेरे भीतर सारे देवता रहते हैं।

दुष्प्रज्ञा अविदित्वैवमवजानन्त्यसूयव: ।

गुरुं मां विप्रमात्मानमर्चादाविज्यदृष्टय: ॥

५५॥

दुष्प्रज्ध:ः--विकृत बुद्धि वाले; अविदित्वा--न समझ कर; एवम्‌--इस प्रकार; अवजानन्ति--उपेक्षा करते हैं; असूबवः--तथाईर्ष्यापूर्ण व्यवहार करते हैं; गुरुम्‌--अपने गुरु के प्रति; मामू--तथा मुझको; विप्रम्‌ू--विद्वान ब्राह्मण को; आत्मानम्‌--अपनेआपको; अर्चा-आदऊ-- भगवान्‌ के अर्चाविग्रह में; इज्य--पूज्य के रूप में; दृष्टय:--जिनकी दृष्टि |

इस सत्य से अनजान मूर्ख लोग उस दिद्वान ब्राह्मण की उपेक्षा करते हैं और ईर्ष्यावशअपमान करते हैं, जो मुझसे अभिन्न होने के कारण, उनका आत्मा तथा गुरु होता है।

वे मेरेअर्चाविग्रह स्वरूप जैसे स्पष्ट दैवी प्राकटयों को ही, एकमात्र पूज्य स्वरूप मानते हैं।

चराचरमिदं विश्व भावा ये चास्य हेतवः ।

मद्रूपाणीति चेतस्याधत्ते विप्रो मदीक्षया ॥

५६॥

चर--चेतन; अचरम्‌--तथा जड़; इृदम्‌--इस; विश्वम्‌--जगत को; भावा:--तात्विक कोटियाँ; ये--जो; च--तथा; अस्य--इसका; हेतव: --स््रोत; मत्‌--मेरे; रूपाणि--स्वरूप; इति--ऐसा विचार; चेतसि--मन के भीतर; आधत्ते--रखता है; विप्र:--ब्राह्मण; मत्‌ू--मेरा; ईक्षया--अपनी अनुभूति द्वारा

मेरा साक्षात्कार प्राप्त किये होने से, ब्राह्मण इस ज्ञान में सुस्थिर रहता है कि इस ब्रह्माण्ड कीसारी जड़ तथा चेतन वस्तुएँ एवं इसकी सृष्टि के मूल तत्त्व भी, मुझसे ही विस्तारित हुए प्रकट-रूप हैं।

तस्माद्गह्मऋषीनेतान्ब्रह्मन्मच्छुद्धयार्चय ।

एवं चेदर्चितोउस्म्यद्धा नान्यथा भूरिभूतिभि: ॥

५७॥

तस्मात्‌ू--इसलिए; ब्रह्म-ऋषीनू--ब्रह्मर्षियों को; एतान्‌--इन; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण ( श्रुतदेव ); मत्‌--( जैसाकि तुम रखते हो )मेरे लिए; श्रद्धया-- श्रद्धापूर्वक; अर्चय--पूजा करो; एवम्‌--इस प्रकार; चेत्‌--यदि ( तुम करोगे ); अर्चित:--पूजित;अस्मि--होऊँगा; अद्धघा- प्रत्यक्ष; न--नहीं; अन्यथा-- अन्यथा; भूरि--विस्तृत; भूतिभि: --धन से

अतः हे ब्राह्मण, तुम्हें चाहिए कि इन ब्रह्मर्षियों की पूजा उसी श्रद्धा से करो, जो तुम्हें मुझमेंहै।

यदि तुम ऐसा करते हो, तो तुम मेरी प्रत्यक्ष पूजा करोगे, जिसे तुम प्रचुर धन अर्पित करकेकरके भी नहीं कर सकते।

श्रीशुक उबाचस इत्थं प्रभुनादिष्ट: सहकृष्णान्‌ द्विजोत्तमान्‌ ।

आरशरध्यैकात्मभावेन मैथिलश्चाप सदगतिम्‌ ॥

५८॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--वह ( श्रुतदेव ); इत्थम्‌--इस प्रकार से; प्रभुना--अपने स्वामी द्वारा;आदिष्ट:--आदेश दिया जाकर; सह--साथ में; कृष्णान्‌ू--भगवान्‌ कृष्ण को; द्विज--ब्राह्मणों को; उत्तमान्‌-- श्रेष्ठ; आराध्य--पूजा द्वारा; एक-आत्म--एकान्त मन से; भावेन--भक्ति से; मैथिल:--मिथिला का राजा; च-- भी; आप--प्राप्त किया;सत्‌-दिव्य; गतिम्‌--चरम गन्तव्य |

श्रीशुकदेव ने कहा : अपने प्रभु से इस तरह आदेश पाकर श्रुतदेव ने एकात्म भाव सेश्रीकृष्ण की तथा उनके साथ आये सर्वश्रेष्ठ ब्राह्यणों की पूजा की।

राजा बहुलाश्व ने भी ऐसा हीकिया।

इस तरह श्रुतदेव तथा राजा दोनों ही को चरम दिव्य गन्तव्य प्राप्त हुआ।

एवं स्वभक्तयो राजन्भगवान्भक्तभक्तिमान्‌ ।

उषित्वादिश्य सन्मार्ग पुनर्द्वावतीमगात्‌ ॥

५९॥

एवम्‌--इस प्रकार; स्व--अपने; भक्तयो:--दो भक्तों से; राजन्‌ू--हे राजा ( परीक्षित ); भगवान्‌-- भगवान्‌; भक्त--अपने भक्तोंके प्रति; भक्ति-मन्‌-- भक्ति में लगा; उषित्वा--ठहर कर; आदिश्य--शिक्षा देकर; सत्‌--शुद्ध सन्‍्तों के; मार्गमू--पथ पर;पुन:ः--फिर; द्वारवतीम्‌-द्वारका; अगात्‌--चले गए

हे राजनू, इस तरह अपने भक्तों के प्रति अनुरक्त भगवान्‌ अपने दो महान्‌ भक्तों, श्रुतदेव तथाबहुलाश्व के साथ कुछ समय तक उन्हें पूर्ण सन्‍्तों के आचरण की शिक्षा देते हुए वही रहते रहे।

तब भगवान्‌ द्वारका लौट गये।

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