← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 10 की सूची

अध्याय नवासी: कृष्ण और अर्जुन ने एक ब्राह्मण के पुत्रों को पुनः प्राप्त किया

10.89श्रीशुक उबाचसरस्वत्यास्तटे राजन्नषयः सत्रमासत ।

वितर्कः समभूत्तेषां त्रिष्वधीशेषु को महान्‌ ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सरस्वत्या:--सरस्वती नदी के; तटे--किनारे; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित );ऋषय: --ऋषिगण; सत्रम्‌--वैदिक यज्ञ; आसत--कर रहे थे; वितर्क:--वाद-विवाद; समभूत्‌--उठ खड़ा हुआ; तेषाम्‌--उनमेंसे; त्रिषु--तीन; अधीशेषु--मुख्य स्वामियों में से; क:ः--कौन; महान्‌--सबसे बड़ा |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन, एक बार जब सरस्वती नदी के तट पर ऋषियों कासमूह वैदिक यज्ञ कर रहा था, तो उनके बीच यह वाद-विवाद उठ खड़ा हुआ कि तीन मुख्यदेवों में से सर्वश्रेष्ठ कौन है।

तस्य जिज्ञासया ते वै भृगुं ब्रह्सुतं नूप ।

तज्न्प्त्यै प्रेषयामासु: सोभ्जगाद्गह्मण: सभाम्‌ ॥

२॥

तस्य--इसके विषय में; जिज्ञासया--जानने की इच्छा से; ते--वे; बै--निस्सन्देह; भगुम्‌-- भूगु मुनि को; ब्रह्म-सुतम्‌--ब्रह्मा केपुत्र; नृप--हे राजा; तत्‌--यह; ज्ञप्त्यै--ढूँढ़ निकालने के लिए; प्रेषयाम्‌ आसु:--उन्होंने भेजा; सः--वह; अभ्यगात्‌--गया;ब्रह्मण:--ब्रह्मा के; सभामू--दरबार में

हे राजन, इस प्रश्न का हल ढूँढ़ निकालने के इच्छुक ऋषियों ने ब्रह्मा के पुत्र भूगु को उत्तरखोजने के लिए भेजा।

वे सर्वप्रथम, अपने पिता ब्रह्मा के दरबार में गये।

न तस्मै प्रह्नणं स्तोत्र चक्रे सत्त्वपरीक्षया ।

तस्मै चुक्रोध भगवान्प्रज्वलन्स्वेन तेजसा ॥

३॥

न--नहीं; तस्मै--उस ( ब्रह्मा ) को; प्रहणम्‌--नमस्कार करना; स्तोत्रमू--स्तुति; चक्रे --की; सत्त्व--सतोगुण में स्थिति;परीक्षया--परीक्षण करने के उद्देश्य से; तस्मै--उसको; चुक्रोध--क्रुद्ध हो गया; भगवान्‌-प्रभु; प्रज्बलन्‌-- जल उठे; स्वेन--अपने ही; तेजसा-- भावावेश से |

यह परीक्षा लेने के लिए कि ब्रह्माजी कहाँ तक सतोगुण को प्राप्त हैं, भूगु ने न तो उन्हेंप्रणाम किया न ही स्तुतियों द्वारा उनका महिमा-गान किया।

अतः वे अपने ही भावावेश से जल-भुन कर भृगु पर क्रुद्ध हो उठे।

स आत्मन्युत्थितम्मन्युमात्मजायात्मना प्रभु: ।

अशीशमस्यथा वह्ि स्वयोन्या वारिणात्मभू: ॥

४॥

सः--उस; आत्मनि--अपने भीतर; उत्थितम्‌--उठे हुए; मन्युमू--क्रोध; आत्म-जाय--अपने पुत्र के प्रति; आत्मना--अपनीबुद्धि से; प्रभु:--प्रभु ने; अशीशमत्‌--दमन कर लिया; यथा--जिस तरह; वहिम्‌-- आग; स्व--अपने; योन्या--उद्‌गम से;वारिणा--जल से; आत्म- भू: --अपने से उत्पन्न ब्रह्मा |

यद्यपि उनके हृदय के भीतर अपने पुत्र के प्रति क्रोध उठ रहा था, किन्तु ब्रह्माजी ने अपनीबुद्धि के प्रयोग से, उसे वैसे ही दबा लिया, जिस तरह अग्नि अपने ही उत्पाद जल से बुझ जातीहै।

ततः कैलासमगमत्स तं॑ देवो महेश्वरः ।

परिरब्धुं समारेभ उत्थाय भ्रातरं मुदा ॥

५॥

ततः--तब; कैलासम्‌--कैलास पर्वत पर; अगमत्‌--गया; सः--वह ( भृगु ); तम्‌ू-- उसको; देव: महा-ई श्वरः --शिव ने;परिरब्धुमू--आलिंगन करने के लिए; समारेभे--प्रयास किया; उत्थाय--उठ कर; भ्रातरम्‌--अपने भाई को; मुदा--हर्षपूर्वक |

तब भृगु कैलास पर्वत गये।

वहाँ पर शिवजी उठ खड़े हुए और अपने भाई का आलिंगनकरने प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े।

नैच्छत्त्वमस्युत्पथग इति देवश्वलुकोप ह ।

शूलमुद्यम्य तं हन्तुमारेभे तिग्मलोचन: ॥

६॥

पतित्वा पादयोर्देवी सान्त्ववामास तं गिरा ।

अथो जगाम बैकुण्ठं यत्र देवो जनार्दन: ॥

७॥

न ऐच्छत्‌--उसने इसे ( आलिंगन को ) नहीं स्वीकारा; त्वमू--तुम; असि--हो; उत्पथ-ग: --( धर्म ) पथ का उल्लंघन करनेवाले; इति--इस तरह कहते हुए; देव:--देवता ( शिव ); चुकोप ह--क्रुद्ध हो गये; शूलम्‌-- अपना त्रिशूल; उद्यम्य--उठाकर;तम्‌--उस ( भृगु ) को; हन्तुमू--मार डालने के लिए; आरेभे--उद्यत; तिग्म-- भयानक; लोचन:--जिसकी आँखें; पतित्वा--गिरते हुए; पादयो: --( शिव के ) पैरों पर; देवी --देवी ने; सान्वयाम्‌ आस--शान्‍्त किया; तम्‌--उसको; गिरा--शब्दों से; अथउ--तब; जगाम--( भूगु ) चला गया; वैकुण्ठम्‌--वैकुण्ठ नामक आध्यात्मिक लोक को; यत्र--जहाँ; देव: जनार्दन:--भगवान्‌ जनार्दन ( विष्णु )।

किन्तु भूगु ने यह कहते हुए उनके आलिंगन का त्याग कर दिया कि आप तो विपथगामी हैं।

इस पर शिवजी क्रुद्ध हो उठे और उनकी आँखें भयावने रूप से जलने लगीं।

उन्होंने अपनात्रिशूल उठा लिया और भृगु को जान से मारने ही वाले थे कि देवी उनके चरणों पर गिर पड़ीं और उन्होंने उन्हें शान्त करने के लिए कुछ शब्द कहे।

तब भूगु उस स्थान से चल पड़े औरवैकुण्ठ गये, जहाँ भगवान्‌ जनार्दन निवास करते हैं।

शयानं भ्रिय उत्सड़े पदा वक्षस्यताडयत्‌ ।

तत उत्थाय भगवान्सह लक्ष्म्या सतां गति: ।

स्वतल्पादवरुह्माथ ननाम शिरसा मुनिम्‌ ॥

८॥

आह ते स्वागत ब्रह्मन्निषीदात्रासने क्षणम्‌ ।

अजानतामागतान्व: क्षन्तुमरहथ न: प्रभो ॥

९॥

शयानमू--लेटे हुए; थ्रिय:--लक्ष्मी की; उत्सड्रे--गोद में; पदा--अपने पाँव से; वक्षसि---उनकी छाती पर; अताडयत्‌-- प्रहारकिया; ततः--तब; उत्थाय--उठ कर; भगवान्‌-- भगवान्‌; सह लक्ष्म्या--लक्ष्मीजी समेत; सताम्‌--शुद्ध भक्तों के; गति:--गन्तव्य; स्व--अपने; तल्पात्‌--बिस्तर से; अवरुह्म--उतर कर; अथ--तब; ननाम--नमस्कार किया; शिरसा--सिर द्वारा;मुनिमू--मुनि को; आह--उन्होंने कहा; ते--तुम्हारा; सु-आगतम्‌--स्वागत है; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; निषीद--बैठिये; अत्र--इस;आसने--आसन पर; क्षणम्‌--क्षण-भर के लिए; अजानताम्‌--अनजानों को; आगतानू्‌--आये हुए; वः--तुम्हारे; क्षन्तुम--क्षमा; अर्हध--करना चाहिए; न: --हमको; प्रभो--हे प्रभु

वे भगवान्‌ के पास तक गये, जो अपना सिर अपनी प्रियतमा श्री की गोद में रख कर लेटे थेऔर वहाँ भूगुने उनकी छाती पर पाँव से प्रहार किया।

तब भगवान्‌ आदर सूचित करने के लिएदेवी लक्ष्मी सहित उठ कर खड़े हो गये।

अपने बिस्तर से उतर कर शुद्ध भक्तों के चरम लक्ष्यभगवान्‌ ने मुनि के समक्ष अपना सिर झुकाया और उनसे कहा, 'हे ब्राह्मण, आपका स्वागत है।

आप इस आसन पर बेठें और कुछ क्षण विश्राम करें।

हे प्रभु, आपके आगमन पर ध्यान न देपाने के लिए हमें क्षमा कर दें।

'पुनीहि सहलोकं मां लोकपालां श्व मद्गतान्‌ ।

पादोदकेन भवतस्तीर्थानां तीर्थकारिणा ॥

१०॥

अद्याहं भगवँललक्ष्म्या आसमेकान्तभाजनम्‌ ।

वल्सयत्युरसि मे भूतिर्भवत्पादहतांहस: ॥

११॥

पुनीहि--कृपया पवित्र करें; सह--सहित; लोकम्‌--मेरे लोक; माम्‌--मुझको; लोक--विभिन्न लोकों के; पालानू--शासकोंको; च--तथा; मतू-गतान्‌--मेरे भक्तों को; पाद--पाँवों ( को धो दिया है ); उदकेन--जल से; भवत:--आप ही के;तीर्थानामू--तीर्थस्थलों के; तीर्थ--उनकी पवित्रता; कारिणा--उत्पन्न करने वाला; अद्य--आज; अहमू--मैं; भगवन्‌-हहे प्रभु;लक्ष्म्या:--लक्ष्मी का; आसम्‌--बन गये हो; एक-अन्त--एकमात्र; भाजनम्‌--आश्रय; वत्स्यति--निवास करेगी; उरसि--छाती पर; मे--मेरी; भूतिः--लक्ष्मी; भवत्‌--आपके; पाद--पाँव से; हत--समूल नष्ट किये गये; अंहसः--जिसके पापों के'फल।

कृपा करके, अपने पाँवों के प्रक्षालित जल को मुझे देकर मुझे, मेरे धाम तथा मेरेलोकपालक भक्तों के राज्यों को पवित्र कीजिये।

निस्सन्देह यही पवित्र जल तीर्थस्थानों कोपवित्र बनाता है।

हे प्रभु, आज मैं लक्ष्मी का एकमात्र आश्रय बन गया हूँ।

वह मेरी छाती परनिवास करने के लिए सहमत होंगी, क्योंकि आपके पाँव ने इसके सारे पापों को दूर कर दियाहै।

श्रीशुक उबाचएवं ब्रुवाणे वैकुण्ठे भृगुस्तन्मन्द्रया गिरा ।

निर्व॒तस्तर्पितस्तृष्णीं भक्त्युत्कण्ठो श्रुलोचन: ॥

१२॥

श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एवम्‌--इस तरह; ब्रुवाणे--कहने पर; बैकुण्ठे-- भगवान्‌ विष्णु के; भृगु:--भृगु; तत्‌--उस; मन्द्रया--गम्भीर; गिरा--वाणी से; निर्वृत:--प्रसन्न हुए; तर्पित:--तुष्ट; तृष्णीम्‌--चुप था; भक्ति--भक्ति से;उत्कण्ठ:--भावविहल; अश्रु-- आँसू; लोचन:--जिसकी आँखों में |

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान्‌ वैकुण्ठ द्वारा कहे गये गम्भीर शब्दों को सुन कर भृगुसंतुष्ट तथा प्रसन्न हो उठे।

वे भक्तिमय आनन्द से विहल होकर निःशब्द हो गए और उनकी आँखेंअश्रुओं से भर आईं।

पुनश्च सत्रमात्रज्य मुनीनां ब्रह्मगादिनाम्‌ ।

स्वानुभूतमशेषेण राजन्भूगुरवर्णयत्‌ ॥

१३॥

पुन:ः--फिर; च--तथा; सत्रमू--यज्ञ तक; आतब्रज्य--जाकर; मुनीनाम्‌--मुनियों के; ब्रह्म-वादिनाम्‌--वेदों के ज्ञान में दक्ष;स्व--अपने द्वारा; अनुभूतम्‌-- अनुभव किया गया; अशेषेण--पूर्णतया; राजन्‌--हे राजा ( परीक्षित ); भृगुः--भूगु ने;अवर्णयत्‌--वर्णन किया।

हे राजन, तब भूगु वैदिक विद्वानों की यज्ञशाला में लौट आये और उनसे अपना साराअनुभव कह सुनाया।

तन्निशम्याथ मुनयो विस्मिता मुक्तसंशया: ।

भूयांसं श्रद्धधुर्विष्णुं यतः शान्तिर्यतो भयम्‌ ॥

१४॥

धर्म: साक्षाद्यतो ज्ञानं वैराग्यं च तदन्वितम्‌ ।

ऐश्वर्य चाष्टधा यस्माद्यशश्चात्ममलापहम्‌ ॥

१५॥

मुनीनां न्यस्तदण्डानां शान्तानां समचेतसाम्‌ ।

अकिझ्ञनानां साधूनां यमाहु: परमां गतिम्‌ ॥

१६॥

सत्त्वं यस्य प्रिया मूर्तिब्राहिणास्त्विष्टदेवता: ।

भजन्त्यनाशिष: शान्ता यं वा निपुणबुद्धयः ॥

१७॥

तत्‌--यह; निशम्य--सुन कर; अथ--तब; मुनय:--मुनिगण; विस्मिता:--चकित; मुक्त--रहित; संशया:--अपने संदेहों से;भूयांसम्‌ू--सबसे महान्‌ के रूप में; श्रद्दधु:--उन्होंने श्रद्धा व्यक्त की; विष्णुम्‌ू--विष्णु में; यत:--जिससे; शान्ति:--शान्ति;यतः--जिससे; अभयम्‌--निर्भयता; धर्म:--धर्म; साक्षात्‌--साक्षात्‌ रूप में; यतः--जिससे; ज्ञानम्‌--ज्ञान; वैराग्यम्‌--विरक्ति;च--तथा; तत्‌--यह ( ज्ञान ); अन्वितम्‌--समेत; ऐश्वर्यमू--योगशक्ति ( योगाभ्यास द्वारा प्राप्त); च--तथा; अष्टधा--आठप्रकार की; यस्मात्‌--जिससे; यश:ः--उनका यश; च--भी; आत्म--मन का; मल--दूषण; अपहम्‌--दूर करने वाला;मुनीनाम्‌--मुनियों के; न्यस्त--जिन्होंने त्याग दिया है, त्यक्त; दण्डानाम्‌--हिंसा; शान्तानामू--शान्त; सम--समभाव;चेतसाम्‌--मनों वाले; अकिद्ञनानाम्‌--स्वार्थरहित; साधूनाम्‌--सन्त स्वभाव के; यमू--जिसको; आहु:--वे कहते हैं;परमाम्‌--परम; गतिम्‌--लक्ष्य; सत्त्वम्‌--सतोगुण; यस्य--जिसका; प्रिया--प्रिय; मूर्ति:--स्वरूप; ब्राह्मणा:--ब्राह्मणजन;तु--तथा; इष्ट--पूजित; देवता:--अर्चा विग्रह; भजन्ति--वे पूजा करते हैं; अनाशिष:--बिना किसी कामना के; शान्ता:--आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त कर चुके; यम्‌--जिसको; वा--निस्सन्देह; निपुण--चतुर; बुद्धयः--जिसकी बुद्धि की क्षमताएँ।

भूगु के विवरण को सुन कर चकित हुए मुनियों के सारे सन्देह दूर हो गये और वे आश्वस्तहो गये कि विष्णु सबसे बड़े देव हैं।

उन्हीं से शान्ति, निर्भयता, धर्म के अनिवार्य सिद्धान्त, ज्ञानसहित वैराग्य, आठों योगशक्तियाँ तथा मन के सारे कल्मषों को धो डालने वाली उनकी महिमाप्राप्त होती है।

वे शान्त तथा समभाव वाले स्वार्थरहित निपुण उन मुनियों के परम गन्तव्य जानेजाते हैं, जिन्होंने सारी हिंसा का परित्याग कर दिया है।

उनका सबसे प्रिय स्वरूप शुद्ध सत्त्वमयहै और ब्राह्मण उनके पूज्य देव हैं।

तीब्र बुद्धि वाले व्यक्ति, जिन्होंने आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त करली है, निःस्वार्थ भाव से उनकी पूजा करते हैं।

त्रिविधाकृतयस्तस्य राक्षसा असुरा: सुरा: ।

गुणिन्या मायया सूष्टा: सत्त्वं तत्तीर्थसाधनम्‌ ॥

१८॥

त्रि-विध--तीन प्रकार के; आकृतय:--स्वरूप; तस्य--उसके; राक्षसा: --अज्ञानी प्रेत; असुरा: --असुर; सुरा:--तथादेवतागण; गुणिन्या: --गुणों से युक्त; मायया--उनकी भौतिक शक्ति से; सृष्टा:--उत्पन्न; सत्त्वम्‌ू--सतोगुण; तत्‌--उनमें से;तीर्थ--जीवन में सफलता के; साधनम्‌--प्राप्ति के साधन |

भगवान्‌ तीन प्रकार के व्यक्त प्राणियों में विस्तार करते हैं--ये हैं राक्षस, असुर तथा देवता।

ये तीनों ही भगवान्‌ की भौतिक शक्ति से उत्पन्न हैं और उसके गुणों से बद्ध हैं।

किन्तु इन तीनगुणों में से सतोगुण ही जीवन की अन्तिम सफलता प्राप्त करने का साधन है।

श्रीशुक उबाचइत्थं सारस्वता विप्रा नृणाम्संशयनुत्तये ।

पुरुषस्य पदाम्भोजसेवया तदगतिं गता: ॥

१९॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इत्थम्‌--इस प्रकार से; सारस्वता:--सरस्वती नदी के तट पर रहने वाले;विप्रा:--विद्वान ब्राह्मणों ने; नृणाम्‌--लोगों के; संशय--सन्देह; नुत्तये--दूर करने के लिए; पुरुषस्य--परम पुरुष के; पद-अम्भोज--चरणकमलों की; सेवया--सेवा से; तत्‌-- उसके; गतिम्‌--गन्तव्य, धाम को; गतः--प्राप्त किया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : सरस्वती नदी के तट पर रहने वाले विद्वान ब्राह्मणों ने समस्तलोगों के संशयों को दूर करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला।

तत्पश्चात्‌ उन्होंने भगवान्‌ केचरणकमलों की भक्ति की और वे सभी उनके धाम को प्राप्त हुए।

श्रीसूत उबाच इत्येतन्मुनितनयास्यपद्ागन्ध-पीयूषं भवभयभित्परस्य पुंस: ।

सुश्लोक॑ श्रवणपुटै: पिबत्यभीक्ष्णम्‌पान्थोध्वभ्रमणपरिश्रम॑ जहाति ॥

२०॥

श्री-सूतः उवाच-- श्री सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार कहने के बाद; एतत्‌--यह; मुनि--मुनि ( वेदव्यास ) के;तनय--पुत्र ( शुकदेव ) के; आस्य--मुख से; पद्य--कमल ( सहश ); गन्ध--सुगन्धि से; पीयूषम्‌--अमृत; भव--भौतिकजीवन के; भय--डर को; भित्‌--छिन्न छिन्न करने वाला; परस्थ--परम के; पुंसः-- भगवान्‌; सु-शलोकम्‌--महिमावान्‌ ;श्रवण--कानों के; पुटैः--रन्श्रों से; पिबति--पीता है; अभीक्षणम्‌--निरन्तर; पान्थ:--यात्री; अध्व--मार्ग पर; भ्रमण-- भ्रमणकरने से; परिश्रमम्‌-- थकान; जहाति--त्याग देता है।

श्री सूत गोस्वामी ने कहा : व्यासदेव मुनि के पुत्र शुकदेव गोस्वामी के मुख कमल से इसप्रकार सुगन्धित अमृत बहा।

परम पुरुष का यह अद्भुत महिमा-गायन भौतिक संसार के सारेभय को नष्ट करने वाला है।

जो यात्री इस अमृत को अपने कान के छेदों से निरन्तर पीता रहताहै, वह सांसारिक जीवन के मार्गों पर भ्रमण करने से उत्पन्न थकान को भूल जायेगा।

श्रीशुक उबाचएकदा द्वारवत्यां तु विप्रपत्या: कुमारकः ।

जातमात्रो भुव॑ स्पृष्ठा ममार किल भारत ॥

२१॥

श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; एकदा--एक बार; द्वारवत्याम्-द्वारका में; तु--और; विप्र--एक ब्राह्मण की;पल्या: --पत्नी के; कुमारक:--शिशु पुत्र; जात--उत्पन्न; मात्र:--एकमात्र; भुवम्‌--पृथ्वी को; स्पृष्ठा--छूते ही; ममार--मरगया; किल--निस्सन्देह; भारत--हे भरतवंशी ( परीक्षित महाराज )।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : एक बार द्वारका में एक ब्राह्मण की पत्नी ने पुत्र को जन्म दियाकिन्तु, हे भारत, यह नवजात शिशु पृथ्वी का स्पर्श करते ही मर गया।

विप्रो गृहीत्वा मृतक॑ राजद्वार्युपधाय सः ।

इदं प्रोवाच विलपन्नातुरो दीनमानस: ॥

२२॥

विप्र:--ब्राह्मण ने; गृहीत्वा--लेकर; मृतकम्‌--शव को; राज--राजा ( उग्रसेन ) के ; द्वारि--दरवाजे पर; उपधाय-- प्रस्तुतकरके; सः--उसने; इृदम्‌--यह; प्रोवाच--कहा; विलपन्‌--शोक करते हुए; आतुरः--विश्लुब्ध; दीन--दुखियारा; मानस:--मन वाला

ब्राह्मण ने उस मृत शरीर को ले जाकर राजा उग्रसेन के दरबार के द्वार पर रख दिया।

फिरक्षुब्ध तथा दीन-हीन भाव से शोक-विलाप करता, वह इस प्रकार बोला।

ब्रह्मद्विष: शठधियो लुब्धस्य विषयात्मन: ।

क्षत्रबन्धो: कर्मदोषात्पञ्ञत्वं मे गतोर्भकः ॥

२३॥

ब्रह्म-ब्राह्मणों के विरुद्ध; द्विष:--द्वेषपूर्ण; शठ--शैतान; धियः--बुद्धि वाला; लुब्धस्य--लोभी; विषय-आत्मन: --इन्द्रिय-तृप्ति में लिप्त रहने वाला; क्षत्र-बन्धो: --अयोग्य क्षत्रिय का; कर्म--कर्त व्य पूरा करने में; दोषात्‌-त्रुटि से; पञ्जञत्वम्‌--मृत्युको; मे--मेरा; गत:--प्राप्त हुआ; अर्भक:-पुत्र |

ब्राह्मण ने कहा : ब्राह्मणों के इस शठ, लालची शत्रु तथा इन्द्रिय-सुख में लिप्त रहनेवाले अयोग्य शासक द्वारा, अपने कर्तव्यों को सम्पन्न करने में हुई, किसी त्रुटि के कारण मेरे पुत्रकी मृत्यु हुई है।

हिंसाविहारं नृपतिं दुःशीलमजितेन्द्रियम्‌ ।

प्रजा भजन्त्य: सीदन्ति दरिद्रा नित्यदु:खिता: ॥

२४॥

हिंसा--हिंसा; विहारमू--जिसका खिलवाड़; नृ-पतिम्‌--इस राजा को; दुःशीलम्‌--दुष्ट; अजित--अजेय; इन्द्रियम्‌--जिसकीइन्द्रियाँ; प्रजा:--नागरिक जन; भजन्त्य:--सेवा करते हुए; सीदन्ति--कष्ट उठाते हैं; दरिद्रा:--निर्धन; नित्य--सदैव;दुःखिता:--दुखी

हिंसा में सुख पाने वाले तथा अपनी इन्द्रियों को वश में न कर सकने वाले दुष्ट राजा कीसेवा करने वाले नागरिकों को निरन्तर निर्धनता तथा दुख का सामना करना पड़ता है।

एवं द्वितीयं विप्रषिस्तृतीयं त्वेबमेव च ।

विसृज्य स नृपद्वारि तां गाथां समगायत ॥

२५॥

एवम्‌--इसी प्रकार से; द्वितीयम्‌ू--दुबारा; विप्र-ऋषि: --बुद्धिमान ब्राह्मण; तृतीयम्‌--तिबारा; तु--तथा; एवम्‌ एव च--इसीप्रकार से; विसृज्य--छोड़ कर ( अपने पुत्र को ); सः--वह; नृप-द्वारि--राजा के दरवाजे पर; ताम्‌--उसी; गाथाम्‌ू--गीत को;समगायत--गाता रहा।

उस बुद्धिमान ब्राह्मण को अपने दूसरे तथा तीसरे पुत्र के साथ भी यही दुख भोगना पड़ाप्रत्येक बार वह अपने मृत पुत्र का शरीर राजा के दरवाजे पर छोड़ जाता और वही शोक-गीतगाता।

तामर्जुन उपश्रुत्य कहिचित्केशवान्तिके ।

परेते नवमे बाले ब्राह्मणं समभाषत ॥

२६॥

कि स्विद्नह्मंंस्त्वन्निवासे इह नास्ति धनुर्धर: ।

राजन्यबन्धुरेते वै ब्राह्मणा: सत्रमासते ॥

२७॥

तामू--उस ( विलाप ) को; अर्जुन:--अर्जुन ने; उपश्रुत्य--सुन कर; कर्हिचित्‌ू--एक बार; केशव--भगवान्‌ कृष्ण के;अन्तिके--निकट; परेते--मृत; नवमे--नौवें; बाले--शिशु; ब्राह्मणम्‌--ब्राह्मण से; समभाषत--कहा; किम्‌ स्वित्‌ू--क्या;ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण; त्वत्‌-तुम्हारे; निवासे--घर पर; इह--यहाँ; न अस्ति--नहीं है; धनुः-धर:--हाथ में धनुष लिए; राजन्य-बन्धु:--राज-परिवार का पतित सदस्य; एते--ये ( क्षत्रिय ); व:--निस्सन्देह; ब्राह्मणा: --ब्राह्मणों ( की तरह ); सत्रे-- प्रमुखयज्ञ में; आसते--उपस्थित हैं।

जब उस ब्राह्मण का नौवाँ पुत्र मरा, तो भगवान्‌ केशव के निकट खड़े अर्जुन ने उस ब्राह्मणके विलाप को सुना अतः अर्जुन ने ब्राह्मण से कहा, 'हे ब्राह्मण, क्या बात है? कया यहाँ परकोई राजसी दरबार का निम्न सदस्य अर्थात्‌ क्षत्रिय-बन्धु नहीं है, जो कम-से-कम अपने हाथ मेंधनुष लेकर आपके घर के सामने खड़ा रहे ? ये क्षत्रिय ऐसा आचरण कर रहे हैं, मानो यज्ञ मेंव्यर्थ ही लगे हुए ब्राह्मण हों।

धनदारात्मजापृक्ता यत्र शोचन्ति ब्राह्मणा: ।

ते वै राजन्यवेषेण नटा जीवन्त्यसुम्भरा: ॥

२८॥

धन--सम्पत्ति; दार--पत्नी; आत्मज--तथा पुत्रों से; अपृक्ता:--पृथक्‌; यत्र--जिस ( स्थिति ) में; शोचन्ति--शोक करते हैं;ब्राह्मणा:--ब्राह्मणजन; ते--वे; बै--निस्सन्देह; राजन्य-वेषेण--राजाओं के वेश में; नटा:-- अभिनेता; जीवन्ति-- जीते हैं;असुम्‌-भरा:--अपना पेट पालते हुए।

'जिस राज्य में ब्राह्मण अपनी नष्ट हुई सम्पत्ति, पत्नियों तथा सन्‍्तानों के लिए शोक करतेहैं, उसके शासक निरे वज्ञक हैं, जो अपना उदर-पोषण करने के लिए राजाओं का अभिनयकरते हैं।

'अहं प्रजा: वां भगवन्नक्षिष्ये दीनयोरिह ।

अनिस्तीर्णप्रतिज्ञोउगिन प्रवेक्ष्य हतकल्मष: ॥

२९॥

अहम्‌-ैं; प्रजा:--सन्तान; वामू--तुम दोनों की ( पति-पत्नी की ); भगवनू--हे प्रभु; रक्षिष्ये--रक्षा करूँगा; दीनयो:--दीन;इह--इस मामले में; अनिस्तीर्ण--पूरा न कर पाने पर; प्रतिज्ञ:--वायदा ( प्रतिज्ञा ); अग्निमू--अग्नि में; प्रवेक्ष्ये--प्रविष्टकरूँगा; हत--विनष्ट; कल्मष: --जिसके कल्मष।

हे प्रभु, मैं ऐसे अत्यन्त दुखियारे आप तथा आपकी पत्ली की सन्‍्तान की रक्षा करूँगा यदिमैं यह वचन पूरा न कर सका, तो मैं अपने पाप का प्रायश्चित करने के लिए अग्नि में प्रवेशकरूँगा।

रीत्राह्मण उबाचसट्डूर्षणो वासुदेव: प्रद्युम्नो धन्विनां वर: ।

अनिरुद्धोप्रतिरथो न त्रातुं शकनुवन्ति यत्‌ ॥

३०॥

तत्कथं नु भवान्कर्म दुष्करं जगदी श्वरै: ।

त्वं चिकीर्षसि बालिश्यात्तन्न श्रददध्महे वयम्‌ ॥

३१॥

श्री-ब्राह्मण: उबाच--ब्राह्मण ने कहा; सड्डर्षण:--संकर्षण ( बलराम ); वासुदेव:--वासुदेव ( कृष्ण ); प्रद्युम्न: --प्रद्युम्न;धन्विनाम्‌-- धनुर्धारियों के; वर:--सबसे बड़े; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध; अप्रति-रथ:--अद्वितीय रथी; न--नहीं; त्रातुमू--बचानेके लिए; शकक्‍्नुवन्ति--समर्थ थे; यत्‌--इतना कि; तत्‌--इस प्रकार; कथम्‌--क्यों; नु--निस्सन्देह; भवान्‌ू--आप; कर्म--कौशल; दुष्करम्‌--कर पाना असम्भव; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; ईश्वर: --ई ध्वरों द्वारा; त्वम्‌--तुम; चिकीर्षसि--करना चाहते;बालिश्यात्‌ू--बदमाशी से; तत्‌--इसलिए; न श्रद्दध्महे --विश्वास नहीं करते; वयम्‌--हम |

ब्राह्मण ने कहा: न तो संकर्षण, वासुदेव, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर प्रद्यम्म, न अद्वितीय योद्धाअनिरुद्ध ही, मेरे पुत्रों को बचा सके तो फिर तुम क्‍यों ऐसा कौशल करने का मूर्खतापूर्ण प्रयासकरने जा रहे हो, जिसे ब्रह्माण्ड के स्वामी भी नहीं कर सके ? हमें तुम पर विश्वास नहीं हो रहा।

श्रीअर्जुन उवाचनाहं सड्डूर्षणो ब्रह्मन्न कृष्ण: कार्ण्णरिव च ।

अहं वा अर्जुनो नाम गाण्डीवं यस्य वै धनु: ॥

३२॥

श्री-अर्जुन: उवाच-- श्री अर्जुन ने कहा; न--नहीं; अहम्‌--मैं; सड्डूर्षण:--बलराम; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; न--न तो; कृष्ण:--कृष्ण; कार्ष्णि:--कृष्ण का वंशज; एवं च--ही; अहम्‌--मैं; वै--निस्सन्देह; अर्जुन: नाम--अर्जुन नाम वाला; गाण्डीवम्‌--गांडीव; यस्य--जिसका; वै--निस्सन्देह; धनु:-- धनुष |

श्री अर्जुन ने कहा: हे ब्राह्मण, मैं न तो संकर्षण हूँ, न कृष्ण और न ही कृष्ण का पुत्र,प्रत्युत मैं गाण्डीव धनुष धारण करने वाला अर्जुन हूँ।

मावमंस्था मम ब्रह्ान्वीर्य त्यम्बकतोषणम्‌ ।

मृत्युं विजित्य प्रधने आनेष्ये ते प्रजा: प्रभो ॥

३३॥

मा अवमंस्था: --मत छोटा मानो; मम--मेरा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; वीर्यम्‌--पराक्रम; त्रि-अम्बक--शिवजी; तोषणम्‌--संतुष्टकरने के लिए; मृत्युम्‌--मृत्यु को; विजित्य--हराकर; प्रधने--युद्ध में; आनेष्ये--वापस लाऊँगा; ते--तुम्हारी; प्रजा:--सन्तानें;प्रभो--हे स्वामी |

हे ब्राह्मण, मेरी उस क्षमता को कम न करें, जो शिवजी को भी तुष्ट करने में सफल हुई थी।

हे स्वामी, मैं आपके पुत्रों को वापस ले आऊँगा, चाहे मुझे युद्ध में साक्षात्‌ काल को ही क्‍यों नपराजित करना पड़े।

एवं विश्रम्भितो विप्र: फाल्गुनेन परन्तप ।

जगाम स्वगृहं प्रीतः पार्थवीर्य निशामयन्‌ ॥

३४॥

एवम्‌--इस प्रकार; विश्रम्भित:--विश्वास दिलाया गया; विप्र:--ब्राह्मण; फाल्गुनेन--अर्जुन द्वारा; परम्‌--शत्रुओं का; तप-हेसताने वाले ( परीक्षित महाराज ); जगाम--गया; स्व--अपने; गृहम्‌--घर; प्रीतः--तुष्ट होकर; पार्थ--पृथा के पुत्र का;वीर्यमू--पराक्रम को; निशामयन्‌--सुनता हुआ।

हे शत्रुओं को सताने वाले, इस तरह अर्जुन द्वारा आश्वस्त किये जाने पर अर्जुन के पराक्रम की घोषणा सुन कर तुष्ट हुआ ब्राह्मण अपने घर चला गया।

प्रसूतिकाल आसत्ने भार्याया द्विजसत्तम: ।

पाहि पाहि प्रजां मृत्योरित्याहार्जुनमातुर: ॥

३५॥

प्रसूति--प्रसव; काले--के समय; आसन्ने--निकट होने पर; भार्याया: --उसकी पत्नी के; द्विज--ब्राह्मण; सत्‌-तम:--अत्यन्तपूज्य; पाहि--रक्षा कीजिये; पाहि--रक्षा कीजिये; प्रजाम्‌--मेरे बच्चे की; मृत्यो: --मृत्यु से; इति--इस प्रकार; आह--उसनेकहा; अर्जुनम्‌--अर्जुन से; आतुरः--किंकर्त व्यविमूढ़ |

जब पुनः उस पूज्य ब्राह्मण की पत्नी के बच्चा जनने वाली थी, तो वह अत्यन्त चिन्तितहोकर अर्जुन के पास गया और उनसे याचना की, 'कृपा करके मेरे बच्चे को मृत्यु से बचा लें,बचा लें।

'स उपस्पृश्य शुच्यम्भो नमस्कृत्य महे धरम्‌ ।

दिव्यान्यस्त्राणि संस्मृत्य सज्यं गाण्डीवमाददे ॥

३६॥

सः--वह ( अर्जुन ); उपस्पृश्य--स्पर्श करके; शुचि--शुद्ध; अम्भ:--जल; नमः -कृत्य--नमस्कार करके; महा-ई श्वरम्‌--शिवजी को; दिव्यानि--दैवी; अस्त्राणि-- अपने प्रक्षेपास्त्रों को; संस्मृत्य--स्मरण करके; सज्यम्‌-- धनुष की डोरी को;गाण्डीवम्‌--अपने धनुष गाण्डीव पर; आददे--स्थिर किया।

शुद्ध जल का स्पर्श करके, भगवान्‌ महेश्वर को नमस्कार करके तथा अपने दैवी अस्त्रों केलिए मंत्रों का स्मरण करके अर्जुन ने अपने धनुष गाण्डीव की डोरी चढ़ाई।

न्यरुणत्सूतिकागारं शरैर्नानास्त्रयोजितै: ।

तिर्यगूर्ध्वमध: पार्थ श्रकार शरपञ्धरम्‌ ॥

३७॥

न्यरुणतू--घेर दिया; सूतिका-आगारम्‌--सौरी ( प्रसूति ) गृह को; शरैः--बाणों से; नाना--विविध; अस्त्र-प्रक्षेपास्त्रों से;योजितै:--जुड़े; तिर्यक्‌--समतल रीति से; ऊर्ध्वमू--ऊपर; अध: --नीचे; पार्थ:--अर्जुन ने; चकार--बना दिया; शर--बाणोंका; पञ्चलरम्‌--पिंजरा |

अर्जुन ने विविध प्रक्षेपास्त्रों से लगे बाणों द्वारा उस सौरी-गृह को घेर दिया इस तरह पृथा-पुत्र ने बाणों का एक सुरक्षात्मक पिंजरा बना कर उस गृह को ऊपर से, नीचे से तथा अगल-बगल से आच्छादित कर दिया।

ततः कुमार: सज्जातो विप्रपत्या रुदन्मुहुः ।

सद्योडदर्शनमापेदे सशरीरो विहायसा ॥

३८॥

ततः--तब; कुमार:--बालक; सज्ञात: --उत्पन्न हुआ; विप्र--ब्राह्मण की; पत्या:--पली के; रुदन्‌ू--रोता हुआ; मुहुः--कुछकाल तक; सद्यः--सहसा; अदर्शनम्‌ आपेदे--विलुप्त हो गया; स--सहित; शरीर:--अपने शरीर; विहायसा--आकाश सेहोकर।

तब ब्राह्मण की पत्नी ने बालक को जन्म दिया वह नवजात शिशु कुछ समय तक तो रोतारहा, किन्तु सहसा वह सशरीर आकाश में अदृश्य हो गया।

तदाह विप्रो विजयं विनिन्दन्कृष्णसन्निधौ ।

मौढ्यं पश्यत मे योहं श्रदध्े क्लीबकत्थनम्‌ ॥

३९॥

तदा--तब; आह--कहा; विप्र:--ब्राह्मण ने; विजयम्‌--अर्जुन से; विनिन्दन्‌-- आलोचना करते हुए; कृष्ण-सन्निधौ -- भगवान्‌कृष्ण की उपस्थिति में; मौढ्यम्‌--मूर्खता; पश्यत--देखो तो; मे--मेरी; यः--जो; अहम्‌--मैंने; श्रद्दे--विश्वास किया;क्लीब--नपुंसक की; कत्थनम्‌--डींग पर।

तब उस ब्राह्मण ने भगवान्‌ कृष्ण की उपस्थिति में अर्जुन का उपहास किया, 'जरा देखो तोमैं कितना मूर्ख हूँ कि मैंने इस डींग मारने वाले नपुंसक पर विश्वास किया।

'न प्रद्युम्नो नानिरुद्धो न रामो न च केशव: ।

यस्य शेकुः परित्रातुं कोउन्यस्तदविते श्वर: ॥

४०॥

न--न तो; प्रद्युम्त: --प्रद्मम्त/ न--न ही; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध; न--न; राम:--बलराम; न--नहीं; च-- भी; केशव: --कृष्ण;यस्य--जिनके ( बालक ); शेकु:--समर्थ थे; परित्रातुमू--रक्षा करने में; क:--कौन; अन्य:--अन्य; तत्‌--इस परिस्थिति में;अविता--रक्षक के रूप में; ईश्वर: --समर्थ |

जब न ही प्रद्युम्म, अनिरुद्ध, राम और न ही केशव किसी व्यक्ति को बचा सकते हैं, तोभला अन्य कौन उसकी रक्षा कर सकता है ?

धिगर्जुनं मृषावादं धिगात्मशलाधिनो धनु: ।

दैवोपसूष्टे यो मौढ्यादानिनीषति दुर्मति: ॥

४१॥

धिक्‌-थिक्कार है; अर्जुनमू--अर्जुन को; मृषा--झूठी; वादमू--जिसकी वाणी; धिक्‌--धिक्कार है; आत्म-- अपनी;इएलाधिन:ः--प्रशंसा करने वाले की; धनु:--धनुष पर; दैव-- भाग्यवश; उपसृष्टम्‌--लिये हुए; यः--जो; मौढ्यात्‌ू--मोहवश;आनिनीषति--वापस लाना चाहता है; दुर्मति: --मूर्ख |

'उस झूठे अर्जुन को धिक्कार है उस आत्म-प्रशंसक के धनुष को धिक्कार है, वह इतना मूर्खहै कि वह यह सोचते हुए कि ऐसे व्यक्ति को वापस ला सकता है, जिसे विधाता ने उठा लिया है,मोहग्रस्त हो चुका है।

'एवं शपति विप्रषां विद्यामास्थाय फाल्गुन: ।

ययौ संयमनीमाशु यत्रास्ते भगवान्यम: ॥

४२॥

एवम्‌--इस प्रकार; शपति--शाप देते हुए; विप्र-ऋषौ--ज्ञानी ब्राह्मण; विद्यामू--योगविद्या; आस्थाय--करके; फाल्गुन: --अर्जुन; ययौ--गया; संयमनीम्‌--संयमनी नामक स्वर्गपुरी में; असु--तुरन्‍्त; यत्र--जहाँ; आस्ते--रहता है; भगवान्‌ यमः-लोर्दूयमराज

जब वह बुद्धिमान ब्राह्मण अर्जुन को भला-बुरा कह कर अपमानित कर रहा था, तो अर्जुनने तुरन्त ही संयमनी पुरी जाने के लिए, जहाँ यमराज का वास है, योगविद्या का प्रयोग किया।

विप्रापत्यमचक्षाणस्तत ऐस्‍न्द्रीमगात्पुरीम्‌ ।

आग्नेयीं नेरृतीं सौम्यां वायव्यां वार॒ुणीमथ ।

रसातलं नाकपृष्ठं धिष्ण्यान्यन्यान्युदायुध: ॥

४३॥

ततो<लब्धद्विजसुतो ह्ानिस्तीर्णप्रतिश्रुतः ।

अग्नि विविक्षु: कृष्णेन प्रत्युक्त: प्रतिषिधता ॥

४४॥

विप्र--ब्राह्मण के; अपत्यम्‌ू--बालक को; अचक्षाण:--न देखकर; ततः--वहाँ से; ऐन्द्रीम--इन्द्र की; अगात्‌--गया;पुरीम्‌--नगरी में; आग्नेयीम--अग्नि देव की पुरी; नैर्तीम्‌--मृत्यु के कनिष्ठ देवता ( जो यमराज से भिन्न है ) की नगरी;सौम्यम्‌--चन्द्र देव की नगरी; वायव्याम्‌--वायु देव की नगरी; वारुणीम्‌--वरुण देव की नगरी; अथ--तब; रसातलमू--अधोलोक; नाक-पृष्ठम्‌--स्वर्ग के ऊपर; धिष्ण्यानि--प्रदेश; अन्यानि--अन्य; उदायुध: --हथियार उठाये हुए; ततः--वहाँ से;अलब्ध--न पाकर; द्विज--ब्राह्मण के; सुत:--पुत्र को; हि--निस्सन्देह; अनिस्तीर्ण--पूरा न कर सकने से; प्रति श्रुतः:--वायदाकिया हुआ; अग्निम्‌ू--अग्नि में; विविश्षु;--प्रवेश करने ही वाला था; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; प्रत्युक्त:--विरोध किया गया;प्रतिषेधता--विरत करने का प्रयास कर रहे |

वहाँ ब्राह्मण-पुत्र को न देखकर अर्जुन अग्नि, निरऋति, सोम, वायु तथा वरुण की पुरियोंमें गया।

हाथ में हथियार तैयार रखे हुए उसने अधोलोक से लेकर स्वर्ग के ऊपर तक ब्रह्माण्ड केसारे प्रदेशों को खोज मारा।

अन्त में ब्राह्मण के पुत्र को कहीं भी न पाकर, अर्जुन ने अपनावायदा पूरा न करने के कारण पवित्र अग्नि में प्रवेश करने का निश्चय किया किन्तु जब वह ऐसा करने जा ही रहा था, तो भगवान्‌ कृष्ण ने उसे रोक लिया और उससे निम्नलिखित शब्द कहे।

दर्शये द्विजसूनूंस्ते मावज्ञात्मानमात्मना ।

ये ते नः कीर्ति विमलां मनुष्या: स्थापयिष्यन्ति ॥

४५॥

दर्शये--मैं दिखला दूँगा; द्विज--ब्राह्मण के; सूनून्‌--पुत्रों को; ते--तुमको; मा--मत; अवज्ञ--छोटा करो; आत्मानम्‌-- अपनेआपको; आत्मना--अपने मन से; ये--जो; ते--वे ( आलोचक ); नः--हम दोनों के; कीर्तिमू--यश; विमलाम्‌ू--निर्मल;मनुष्या:--मनुष्यगण; स्थापयिष्यन्ति--स्थापना करने जा रहे हैं

भगवान्‌ कृष्ण ने कहा : मैं तुम्हें ब्राह्मण के पुत्र दिखलाऊँगा, अतः तुम अपने आपकोइस प्रकार छोटा मत बनाओ।

यही मनुष्य, जो अभी हमारी आलोचना करते हैं, शीघ्र ही हमारीनिष्कलुष कीर्ति को स्थापित करेंगे।

इति सम्भाष्य भगवानर्जुनेन सहे श्र: ।

दिव्यं स्वर्थमास्थाय प्रतीचीं दिशमाविशत्‌ ॥

४६॥

इति--इस प्रकार; सम्भाष्य--वार्तालाप करके; भगवान्‌-- भगवान्‌; अर्जुनेन सह--अर्जुन के साथ; ईश्वर: --ईश्वर; दिव्यम्‌--दिव्य; स्व-- अपने; रथम्‌--रथ पर; आस्थाय--चढ़ कर; प्रतीचीम्‌--पश्चिम की; दिशम्‌--दिशा में; आविशत्‌--प्रविष्ट हुआ |

अर्जुन को इस प्रकार सलाह देकर भगवान्‌ ने अर्जुन को अपने दैवीरथ में बैठाया और वेदोनों एकसाथ पश्चिम दिशा की ओर रवाना हो गये।

सप्त द्वीपान्ससिन्धूंश्व सप्त सप्त गिरीनथ ।

लोकालोकं तथातीत्य विवेश सुमहत्तम: ॥

४७॥

सप्त--सात; द्वीपान्‌ू-द्वीपों; स--सहित; सिन्धून्‌ू--समुद्रों; च--तथा; सप्त सप्त--सात सात; गिरीन्‌ू--पर्वतों को; अथ--तब; लोक-अलोकम्‌--अंधकार से प्रकाश को पृथक्‌ करने वाली पर्वत माला को; तथा-- भी; अतीत्य--लाँघ कर; विवेश--प्रविष्ट हुआ; सु-महत्‌--विशाल; तम:--अंधकार।

भगवान्‌ का रथ मध्यवर्ती ब्रह्माण्ड के सात द्वीपों के ऊपर से गुजरा, जिनके अपने अपनेसमुद्र तथा सात सात मुख्य पर्वत थे।

तब उस रथ ने लोकालोक सीमा पार की और पूर्ण अंधकारके विशाल क्षेत्र में प्रवेश किया।

तत्राश्वा: शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पललाहका: ।

तमसि भ्रष्टगतयो बभूवुर्भरतर्षभ ॥

४८ ॥

तान्दष्ठा भगवान्कृष्णो महायोगेश्वरे श्वरः ।

सहस्त्रादित्यसड्भाशं स्वचक्रं प्राहिणोत्पुर: ॥

४९॥

तत्र--उस स्थान पर; अश्वा:--घोड़े; शैब्य-सुग्रीव-मेघपुष्प-बलाहका: --शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नाम वाले;तमसि--अंधकार में; भ्रष्ट-- भ्रष्टट गतयः--अपना मार्ग; बभूवु:--हो गये; भरत-ऋषभ--हे भारतों में श्रेष्ठ; तानू-- उनको;इृष्ठा--देखकर; भगवान्‌--भगवान्‌; कृष्ण: --कृष्ण; महा--परम; योग-ईश्वर--योग के स्वामियों के; ईश्वर: --स्वामी;सहस्त्र--एक हजार; आदित्य--सूर्य; सल्जाशम्‌--के सहृश; स्व--अपने; चक्रम्‌--चक्र को; प्राहिणोत्‌-- भेजा; पुर:--आगे |

उस अंधकार में रथ के शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक नामक घोड़े अपना मार्ग भटकगये।

हे भारत- श्रेष्ठ, उन्हें इस अवस्था में देखकर, योगेश्वरों के भी परम स्वामी भगवान्‌ कृष्ण नेअपने रथ के आगे, अपने सुदर्शन चक्र को भेज दिया।

वह चक्र सैकड़ों सूर्यों की तरह चमकरहा था।

तमः सुधोरं गहनं कृतं महद्‌विदारयद्धूरितरेण रोचिषा ।

मनोजवं निर्विविशे सुदर्शनगुणच्युतो रामशरो यथा चमू: ॥

५०॥

तमः--अंधकार; सु--अत्यन्त; घोरम्‌ू-- भयावह; गहनम्‌--घना; कृतम्‌-- भौतिक सृष्टि की अभिव्यक्ति; महत्‌--महान्‌;विदारयत्‌--चीरते हुए; भूरि-तरेण--अत्यन्त विस्तृत; रोचिषा--तेज से; मनः--मन की; जवम्‌--गति वाले; निर्विविशे--प्रविष्टहुए; सुदर्शनम्‌--सुदर्शन चक्र; गुण--डोरी से; च्युतः:--छोड़ा गया; राम--भगवान्‌ रामचन्द्र का; शर:ः--बाण; यथा--जिसतरह; चमू:--सेना पर।

भगवान्‌ का सुदर्शन चक्र अपने प्रज्वलित तेज के साथ अंधकार में प्रविष्ट हुआ।

मन कीगति से आगे बढ़ते हुए उसने आदि पदार्थ से विस्तीर्ण भयावह घने अंधकार को उसी तरह काटदिया, जिस तरह भगवान्‌ राम के धनुष से छूटा तीर उनके शत्रु की सेना को काटता हुआ निकलजाता है।

द्वारेण चक्रानुपथेन तत्तमःपरं परं ज्योतिरनन्तपारम्‌ ।

समएनुवानं प्रसमीक्ष्य फाल्गुनःप्रताडिताक्षो पिद्धेडक्षिणी उभे ॥

५१॥

द्वारेण--मार्ग से; चक्र--सुदर्शन चक्र; अनुपथेन--पीछा करता; तत्‌--वह; तम:--अंधकार; परम्‌--परे; परम्‌--दिव्य;ज्योति:--प्रकाश; अनन्त--असीम; पारम्‌--जिसका विस्तार; समश्नुवानम्‌--सर्वव्यापी; प्रसमीक्ष्य--देखकर; फाल्गुन: --अर्जुन; प्रताडित--पीड़ित; अक्ष:--आँखों वाला; अपिदधे --बन्द कर लीं; अक्षिणी--अपनी आँखें; उभे--दोनों |

सुदर्शन चक्र के पीछे-पीछे जाता हुआ, रथ अंधकार को पार करके सर्वव्यापी ब्रह्मज्योतिके अनन्त आध्यात्मिक प्रकाश में जा पहुँचा।

ज्योंही अर्जुन ने इस चमचमाते तेज को देखा,उसकी आँखें दुखने लगीं, अतः उसने उन्हें बन्द कर लिया।

ततः प्रविष्ट: सलिलं नभस्वताबलीयसैजह्ृहदूर्मिभूषणम्‌ ।

तत्राद्धुतं वे भवन द्युमत्तमंभ्राजन्मणिस्तम्भसहस्त्रशोभितम्‌ ॥

५२॥

ततः--वहाँ से; प्रविष्ट:--प्रवेश किया; सलिलम्‌--जल में; नभस्वता--वायु द्वारा; बलीयसा--शक्तिशाली; एजत्‌--हिलाया;बृहत्‌--विशाल; ऊर्मि-- लहरें; भूषणम्‌--जिसके आभूषण; तत्र--वहाँ पर; अद्भुतम्‌ू--विचित्र; बै--निस्सन्देह; भवनम्‌ू--घर;झुमत्‌-तमम्‌--अत्यधिक तेजयुक्त; भ्राजत्‌ू--चमकते हुए; मणि--मणियों से युक्त; स्तम्भ--ख भों के; सहस्त्र-हजारों;शोभितम्‌--सुन्दर लग रहे |

उस क्षेत्र से वे जलराशि में प्रविष्ट हुए, जो शक्तिशाली वायु द्वारा मथी जा रही विशाल लहरोंसे तेजयुक्त थी।

उस समुद्र के भीतर अर्जुन ने एक अद्भुत महल देखा, जो उसके द्वारा अभी तकदेखी गई हर वस्तु से अधिक चमकीला था।

इसका सौन्दर्य चमकीले मणियों से जड़े हुए हजारोंअलंकृत ख भों के कारण बढ़ गया था।

तस्मिन्महाभोगमनन्तमद्भुतंसहस्त्रमूर्धन्नफणामणिदयुभि: ।

विध्राजमान द्विगुणेक्षणोल्बणंसिताचलाभं शितिकण्ठजिहम्‌ ॥

५३॥

तस्मिनू--वहाँ; महा--विशाल; भोगम्‌--सर्प; अनन्तमू-- भगवान्‌ अनन्त को; अद्भधुतम्‌ू--आश्चर्यजनक; सहस्त्र--हजार;मूर्धन्य--उनके सिरों पर; फणा--फनों पर; मणि--मणियों की; द्युभि:ः--तेज की किरणों से; विभ्राजमानम्‌--चमकते हुए;वि--दो; गुण--गुना; ईक्षण--जिसकी आँखें; उल्बणम्‌-- भयावनी; सित--श्रेत; अचल--पर्वत ( कैलास ); आभम्‌--जिसकी तुलना; शिति--गहरा नीला; कण्ठ--जिसकी गर्दनें; जिहमू--तथा जीभें।

उस स्थान पर विशाल विस्मयकारी अनन्त शेष सर्प था।

वह अपने हजारों फनों पर स्थितमणियों से निकलने वाले प्रकाश से चमचमा रहा था, जो कि फनों से दुगुनी भयावनी आँखों सेपरावर्तित हो रहा था।

वह श्रेत कैलास पर्वत की तरह लग रहा था और उसकी गर्दनें तथा जीभेंगहरे नीले रंग की थीं।

ददर्श तद्भोगसुखासनं विभुंमहानुभावं पुरुषोत्तमोत्तमम्‌ ।

सान्द्राम्बुदाभं सुपिशड्रवाससंप्रसन्नवकत्रं रुचिरायतेक्षणम्‌ ॥

५४॥

महामणिब्रातकिरीटकुण्डल-प्रभापरिक्षिप्तसहस्त्रकुन्तलम्‌ ।

प्रलम्बचार्वष्टभुजं सकौस्तुभंश्रीवत्सलक्ष्मं बनमालयावृतम्‌ ॥

५५॥

सुनन्दनन्दप्रमुखैः स्वपार्षदै-श्रक्रादिभिमूर्तिधरैनिजायुथे: ।

पुष्टठया श्रीया कीर्त्यजयाखिलधिभि-निरषिव्यमानं परमेष्ठटिनां पतिम्‌ू ॥

५६॥

ददर्श--( अर्जुन ने ) देखा; तत्‌ू--वह; भोग--सर्प; सुख--आरामदेह; आसनम्‌-- आसन; विभुम्‌--सर्वव्यापी; महा-अनुभावमू--सर्वशक्तिमान; पुरुष-उत्तम-- भगवान्‌ के; उत्तमम्‌--परम; सान्द्र--सघन; अम्बुद--बादल; आभम्‌--के ही समान(उनके नीले वर्ण से ); सु--सुन्दर; पिशड्र--पीला; वाससम्‌--जिसका वस्त्र; प्रसन्न--सुहावना; वक्त्रमू--जिसका मुखमण्डल;रुचिर--आकर्षक; आयत--चौड़ी; ईक्षणम्‌--जिसकी आँखें; महा--विशाल; मणि--मणियों के; ब्रात--गुच्छों से;किरीट--मुकुट; कुण्डल--तथा कुण्डलों की; प्रभा--परावर्तित चमक से; परिक्षिप्त--इधर-उधर बिखरी हुईं; सहस्त्र--हजारों;कुन्तलम्‌--जिसके बालों के गुच्छे; प्रलम्ब--लम्बा; चारु--मनोहर; अष्ट--आठ; भुजम्‌-- भुजाएँ; स--सहित; कौस्तुभम्‌--कौस्तुभ मणि; श्रीवत्स-लक्ष्मम्‌ू--तथा श्रीवत्स का विशिष्ट चिह्न प्रदर्शित करते; बन--जंगली फूलों की; मालया--माला से;आवृतम्‌--चुम्बित; सुनन्द-नन्द-प्रमुखैः --सुनन्द तथा नन्द इत्यादि; स्व-पार्षदैः--अपने निजी संगियों सहित; चक्र-आदिभि:--चक्र इत्यादि; मूर्ति--स्वरूपों को; धरैः--प्रकट करते हुए; निज--अपने; आयुधै:--हथियारों से; पुष्ठया भ्रिया कीर्ति-अजया--पुष्टि, श्री, कीर्ति तथा अजा नामक अपनी शक्तियों से; अखिल--समस्त; ऋधिभि:--योगशक्तियों से; निषेव्यमानमू--सेवित;परमेष्ठटिनम्‌-ब्रह्माण्ड के शासकों के; पतिम्‌-प्रधान को |

तत्पश्चात्‌ अर्जुन ने सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान भगवान्‌ महाविष्णु को सर्पशय्या परसुखपूर्वक बैठे देखा।

उनका नील वर्ण घने बादल के रंग का था, वे सुन्दर पीताम्बर पहने थेऔर उनका मुखमण्डल मनोहर लग रहा था।

उनकी चौड़ी आँखें अत्यन्त आकर्षक थीं औरउनके आठ लम्बे सुन्दर बाजू थे।

उनके बालों के घने गुच्छे उनके मुकुट तथा कुण्डलों को विभूषित करने वाले बहुमूल्य मणियों के गुच्छों से परावर्तित प्रकाश से सभी ओर से नहाये हुएथे।

वे कौस्तुभ मणि, श्रीवत्स चिन्ह तथा जंगली फूलों की माला धारण किये हुए थे।

सर्वोच्चईश्वर की सेवा में सुनन्द तथा नन्द जैसे निजी संगी, उनका चक्र तथा अन्य हथियार साकार होकरउनकी संगिनी शक्तियाँ पुष्टि, श्री, कीर्ति तथा अजा एवं उनकी विविध योगशक्तियाँ थीं।

बववन्द आत्मानमनन्तमच्युतोजिष्णुश्न तदर्शनजातसाध्वस: ।

तावाह भूमा परमेष्ठिनां प्रभु-बेंद्धाज्लली सस्मितमूर्जया गिरा ॥

५७॥

ववन्द--सत्कार किया; आत्मानम्‌-- अपना; अनन्तमू--अपने असंख्य रूप में; अच्युत:--अच्युत भगवान्‌ कृष्ण; जिष्णु: --अर्जुन; च--भी; तत्‌--उसके ; दर्शन--दर्शन से; जात--उत्पन्न; साध्वस:--जिसका आश्चर्य; तौ--उन दोनों से; आह--कहा;भूमा--सर्वशक्तिमान ई श्वर ( महाविष्णु ) ने; परमे-स्थिनाम्‌--ब्रह्माण्ड के शासकों में से; प्रभु:--स्वामी; बद्ध-अद्धली--आदरहेतु हाथ जोड़े हुए; स--सहित; स्मितम्‌--हँसी; ऊर्जया--शक्तिमान; गिरा--वाणी में |

भगवान्‌ कृष्ण ने इस अनन्त रूप में अपनी ही वन्दना की और अर्जुन ने भी महाविष्णु केदर्शन से चकित होकर उन्हें नमस्कार किया।

तत्पश्चात्‌, जब ये दोनों हाथ जोड़ कर उनके समक्षखड़े थे, तो ब्रह्माण्ड के समस्त पालकों के परम स्वामी महाविष्णु मुसकाये और अत्यन्त गम्भीरवाणी में उनसे बोले।

द्विजात्मजा मे युवयोर्दिहक्षुणामयोपनीता भुवि धर्मगुप्तये ।

कलावतीर्णाववनेर्भरासुरान्‌हत्वेह भूयस्त्वरयेतमन्ति मे ॥

५८ ॥

द्विज--ब्राह्मण के; आत्म-जा: --पुत्र; मे--मेरा; युवयो: --तुम दोनों; दिदक्षुणा--जो देखना चाहता था; मया--मेरे द्वारा;उपनीता:--लाया गया; भुवि--पृथ्वी पर; धर्म--धर्म के नियमों की; गुप्तये--रक्षा के लिए; कला--( मेरे ) अंशरूप;अवतीर्णो--अवतरित; अबने:--पृथ्वी के; भर-- भारस्वरूप; असुरान्‌-- असुरों को; हत्वा--मार कर; इह--यहाँ; भूय:--फिर;त्वरया--जल्दी से; इतम्‌--चले आना; अन्ति--निकट; मे--मेरे |

महाविष्णु ने कहा : मैं ब्राह्मणों के पुत्रों को यहाँ ले आया था, क्योंकि मैं आप दोनों केदर्शन करना चाह रहा था।

आप मेरे अंश हैं, जो धर्म की रक्षा हेतु पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।

ज्योंही आप पृथ्वी के भारस्वरूप असुरों का वध कर चुकें आप तुरन्त ही मेरे पास यहाँ वापस आजायाँ।

पूर्णकामावपि युवां नरनारायणावृषी ।

धर्ममाचरतां स्थित्य ऋषभौ लोकसड्ग्रहम्‌ ॥

५९॥

पूर्ण--पूर्ण; कामौ--सारी इच्छाओं में; अपि--यद्यपि; युवामू--तुम दोनों; नर-नारायणौ ऋषी--नर तथा नारायण मुनियों केरूप में; धर्मम्‌-- धर्म को; आचरताम्‌--पूरा करना चाहिए; स्थित्यै--पालन करने के लिए; ऋषभौ--समस्त पुरुषों में श्रेष्ठ;लोक-सड्ग्रहमू--सामान्य जनों के लाभ हेतु

हे महापुरुषों में श्रेष्ठ, यद्यपि आपकी सारी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हैं, किन्तु सामान्य जनों केलाभ हेतु आप नर तथा नारायण मुनियों के रूप में अपने धार्मिक आचरण का आदर्श प्रस्तुतकरते रहें।

इत्यादिष्टी भगवता तौ कृष्णौ परमेष्ठिना ।

इत्यानम्य भूमानमादाय द्विजदारकान्‌ ॥

६०॥

न्यवर्तेतां स्वकं धाम सम्प्रहष्टी यथागतम्‌ ।

विप्राय ददतुः पुत्रान्यथारूपं यथावय: ॥

६१॥

इति--इन शब्दों से; आदिष्टौ-- आदेश दिये गये; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; तौ--वे दोनों; कृष्णौ--दो कृष्ण ( कृष्ण तथाअर्जुन ); परमे-प्ठिना--परम धाम के स्वामी द्वारा; ३७ इति--सहमति जताने के लिए ३» का उच्चारण करते हुए; आनम्य--झुककर; भूमानम्‌--परम शक्तिशाली भगवान्‌ को; आदाय--तथा लेकर; द्विज--ब्राह्मण के; दारकान्‌--पुत्रों को; न्यवर्तेताम्‌--लौट गये; स्वकम्‌--अपने; धाम--घर ( द्वारका ) को; सम्प्रहष्टी -- प्रसन्न; यथा--जिस तरह; गतम्‌--वे आये थे; विप्राय--ब्राह्मण को; ददतु:--दे दिया; पुत्रान्‌--उसके पुत्र; यथा--उसी; रूपम्‌--स्वरूप में; यथा--उसी; वय:--आयु में

सर्वोच्च लोक के परमेश्वर द्वारा इस तरह आदेश दिये जाकर कृष्ण तथा अर्जुन ने ॐ काउच्चारण करके अपनी सहमति व्यक्त की और तब सर्वशक्तिमान महाविष्णु को नमन किया।

अपने साथ ब्राह्मण के पुत्रों को लेकर वे परम प्रसन्नतापूर्वक उसी मार्ग से द्वारका लौट गये,जिससे होकर वे आये थे।

वहाँ उन्होंने ब्राह्मण को उसके पुत्र सौंप दिये, जो वैसे ही शौशव शरीरमें थे, जिसमें वे खो गये थे।

निशाम्य वैष्णवं धाम पार्थ: परमविस्मितः ।

यत्किझ्ञित्पौरुषं पुंसां मेने कृष्णानुकम्पितम्‌ ॥

६२॥

निशाम्य--देखकर; वैष्णवम्‌-- भगवान्‌ विष्णु के; धाम--धाम; पार्थ:-- अर्जुन ने; परम--परम; विस्मित:-- चकित; यत्‌किश्ञित्‌ू--जो भी; पौरुषम्‌--विशेष शक्ति; पुंसामू--जीवों से सम्बद्ध; मेने--निष्कर्ष निकाला; कृष्ण--कृष्ण की;अनुकम्पितम्‌--प्रदर्शित अनुग्रह |

भगवान्‌ विष्णु के धाम को देखने के बाद अर्जुन पूर्णतया विस्मित थे।

उन्होंने यह निष्कर्षनिकाला कि मनुष्य, जो भी अद्वितीय शक्ति प्रदर्शित करता है, वह कृष्ण की कृपा कीअभिव्यक्ति मात्र हो सकती है।

इतीहशान्यनेकानि वीर्याणीह प्रदर्शयन्‌ ।

बुभुजे विषयान्ग्राम्यानीजे चात्युर्जितैर्मखै: ॥

६३॥

इति--इस प्रकार; ईहशानि--इस जैसे; अनेकानि-- अनेक ; वीर्याणि--बहादुरी के कार्य; इह--इस जगत में; प्रदर्शयन्‌ --प्रदर्शित करते हुए; बुभुजे--( भगवान्‌ कृष्ण ने ) भोग किया; विषयान्‌--इन्द्रिय-सुख की वस्तुएँ; ग्राम्यान्‌ू--सामान्य; ईजे--पूजा की; च--तथा; अति--अत्यन्त; उर्जितैः --सशक्त; मखैः --वैदिक यज्ञों से |

भगवान्‌ कृष्ण ने इस जगत में ऐसी ही अन्य अनेक लीलाएँ कीं।

उन्होंने ऊपर से सामान्यमानव-जीवन के आनन्दों का भोग किया और अत्यन्त सशक्त यज्ञ सम्पन्न किये।

प्रववर्षाखिलान्कामान्प्रजासु ब्राह्मणादिषु ।

यथाकाल यथेवेन्धों भगवान्श्रेष्ठ्ामास्थित: ॥

६४॥

प्रववर्ष--वर्षा की; अखिलान्‌--समस्त; कामान्‌--इच्छित वस्तुओं की; प्रजासु--अपनी प्रजा पर; ब्राह्मण-आदिषु--ब्राह्मणइत्यादि पर; यथा-कालम्‌--उपयुक्त अवसरों पर; यथा एब--उसी तरह से; इन्द्रः--( जिस तरह ) इन्द्र; भगवान्‌-- भगवान्‌;श्रष्मामू-- अपनी सर्वश्रेष्ठता में; आस्थित:--स्थित |

अपनी सर्वश्रेष्ठता का प्रदर्शन कर चुकने के बाद भगवान्‌ ने उपयुक्त अवसरों पर ब्राह्मणोंतथा अपनी प्रजा पर उसी तरह इच्छित वस्तुओं की वर्षा की, जिस तरह इन्द्र जल की वर्षा करताहै।

हत्वा नृपानधर्मिष्ठान्धाटयित्वार्जुनादिभि: ।

अज्जसा वर्तयामास धर्म धर्मसुतादिभि: ॥

६५॥

हत्वा--मार कर के; नृपानू--राजाओं को; अधधर्मिष्ठान्‌-- अत्यन्त अधार्मिक; घातयित्वा--उनको मरवाकर; अर्जुन-आदिभि:--अर्जुन तथा अन्यों द्वारा; अज्लसा--सरलतापूर्वक; वर्तवाम्‌ आस--पालन करवाया; धर्मम्‌--धर्म के सिद्धान्तों को; धर्म-सुत-आदिभि:--( धर्म के पुत्र ) युधिष्ठिर तथा अन्यों द्वारा

अब, जब कि उन्होंने अनेक दुष्ट राजाओं का वध कर दिया था और अन्यों को मारने केलिए अर्जुन जैसे भक्तों को लगा दिया था, तो वे युधिष्ठिर जैसे पवित्र शासकों के माध्यम सेधार्मिक सिद्धान्तों के सम्पन्न होने के लिए सरलता से आश्वासन दे सके।

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