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अध्याय नब्बे: भगवान कृष्ण की महिमा का सारांश
10.90श्रीशुक उबाच सुख स्वपुर्या निवसन्द्वारकायां थ्रिय: पति: ।
सर्वसम्पत्समृद्धायां जुष्टायां वृष्णिपुड्रबै: ॥
१॥
स्त्रीभिश्लोत्तमवेषाभि्नवयौवनकान्तिभि: ।
कन्दुकादिभिर््म्येषु क्रीडन्तीभिस्तडिद्द्युभि: ॥
२॥
नित्यं सद्जु लमार्गायां मदच्युद्धिर्मतड्जजैः ।
स्वलड्ड तैर्भटैरश्वे रथेश्न कनकोज्चलै: ॥
३॥
उद्यानोपवनाढ्यायां पुष्पितद्रुमराजिषु ।
निर्विशद्धृड़विहगै्नादितायां समन््ततः ॥
४॥
रेमे घोडशसाहस्त्रपलीनां एकवल्लभ: ।
तावद्विचित्ररूपोसौ तद्गेहेषु महर्द्धिषु ॥
५॥
प्रोत्फुल्लोत्पलकह्ारकुमुदाम्भोजरेणुभि: ।
वासितामलतोयेषु कूजद्दिवजकुलेषु च ॥
६॥
विजहार विगाह्माम्भो हृदिनीषु महोदय: ।
कुचकुड्डू मलिप्ताडुः परिरब्धश्च योषिताम् ॥
७॥
श्री-शुकः उबाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सुखम्--सुखपूर्वक; स्व--अपनी; पुर्यामू--नगरी में; निवसन्--निवास करतेहुए; द्वारकायाम्-द्वारका में; श्रियः--लक्ष्मी के; पति:--पति; सर्व--समस्त; सम्पत्--ऐश्वर्यमय गुणों में; समृद्धायाम्--सम्पन्नथा; जुष्टायामू--आबाद; वृष्णि-पुड़वैः --सर्वप्रमुख वृष्णियों द्वारा; स्त्रीभि: --स्त्रियों द्वारा; च--तथा; उत्तम--उत्तम;वेषाभि:--वेश वाली; नव--नवीन; यौवन--यौवन की; कान्तिभि:--सुन्दरता द्वारा; कन्दुक-आदिभि:--गेंदों तथा अन्यखिलौनों से; हम्येंषु--छतों पर; क्रीडन्तीभि:--खेलती हुईं; तडित्--बिजली जैसे; द्युभिः--तेज से; नित्यम्--सदैव; सद्डभु ल--भीड़-भाड़ से भरी हुई; मार्गायामू--जिसकी सड़कें; मद-च्युद्धि:--मद चुआते; मतम्--उन्मत्त; गजै:ः--हाथियों से; सु--अच्छीतरह; अलड्डू तैः--सुसज्जित; भटैः--पैदल सैनिकों से; अश्वैः--घोड़ों से; रथेः--रथों से; च--तथा; कनक--सोने से;उज्वलै:--चमकीले; उद्यान--बगीचों; उपवन--तथा पार्को से; आढ्यायाम्--युक्त; पुष्पित--फूले हुए; द्रुम--वृक्षों की;राजिषु--पंक्तियों से; निर्विशत्--प्रवेश करते; भूड़--भौंरों; विहगैः--तथा पक्षियों से; नादितायाम्--गुझ्जलरित; समन्ततः--चारोंओर; रेमे--रमण किया; षघोडश--सोलह; साहस्त्र--हजार; पलीनाम्--पत्नियों के; एक--एकमात्र; बल्लभ:--प्रियतम;तावत्--उतने ही; विचित्र--विविध; रूप: --रूपों वाला; असौ--वह; तत्--उनके; गेहेषु--घरों में; महा-ऋद्धिषु-- अत्यधिकसजे-धजे; प्रोत्फुल्ल--खिले हुए; उत्पल--कमलिनियों; कहार-- श्रेत कमल; कुमुद--रात में खिलने वाले कमल; अम्भोज--तथा दिन में खिलने वाले कमलों के; रेणुभि: --पराग से; वासिता--सुगन्धित; अमल--निर्मल; तोयेषु--जल में; कूजत् --कूकते हुए; द्विज--पक्षियों के; कुलेषु--झुंडों में; च--तथा; विजहार--क्रीड़ा की; विगाह्म --डुबकी लगाकर; अम्भ:--जलमें; हृदिनीषु--नदियों में; महा-उदय: --सर्वशक्तिमान भगवान्; कुच--उनके स्तनों से; कुट्डुम--लाल रंग के अंगराग, गेरू;लिप्त--लेप किया हुआ; अड्डभड--उनका शरीर; परिरब्ध:--आलिंगित; च--तथा; योषिताम्--स्त्रियों द्वारा |
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : लक्ष्मीपति भगवान् सुखपूर्वक अपनी राजधानी द्वारका पुरी मेंरहने लगे, जो समस्त ऐश्वर्यों से युक्त थी और गण्य-मान्य वृष्णियों तथा आलंकारिक वेशभूषा सेसजी उनकी पतियों द्वारा आबाद थी।
जब ये यौवन-भरी सुन्दर स्त्रियाँ शहर की छतों पर गेंदतथा अन्य खिलौने खेलतीं, तो वे बिजली की चमक जैसी चमचमातीं।
नगर के प्रमुख मार्गों मेंमद चुवाते उन्मत्त हाथियों और खूब सजे घुड़सवारों, खूब सजे-धजे पैदल सैनिकों तथा सोने सेसुसज्जित चमचमाते रथों पर सवार सिपाहियों की भीड़ लगी रहती।
शहर में पुष्पित वृक्षों कीपंक्तियों वाले अनेक उद्यान तथा वाटिकाएँ थी, जहाँ भौरे तथा पक्षी एकत्र होते और अपने गीतोंसे सारी दिशाओं को व्याप्त कर देते।
भगवान् कृष्ण अपनी सोलह हजार पत्नियों के एकमात्र प्रियतम थे।
इतने ही रूपों में अपनाविस्तार करके, उन्होंने प्रत्येक रानी के साथ उनके भरपूर सुसज्जित आवासों में रमण किया।
इन महलों के प्रांगण में निर्मल तालाब थे, जो खिले हुए उत्पल, कह्लार, कुमुद तथा अम्भोज कमलोंके पराग-कणों से सुगन्धित थे और कूजते हुए पक्षियों के झुडों से भरे थे।
सर्वशक्तिमान प्रभु इनतालाबों में तथा विविध नदियों में प्रवेश कर जल-क्रीड़ा का आनन्द लूटते और उनकी पत्नियाँउनका आलिंगन करतीं, जिससे उनके स्तनों पर लेपित लाल कुंकम उनके शरीर पर लग जाता।
उपगीयमानो गन्धर्वैर्मुदृड़गणवानकान् ।
वादयद्ध्र्मुदा वीणां सूतमागधवन्दिभि: ॥
८ ॥
सिच्यमानोच्युतस्ताभिईसन्तीभि: सम रेचकै: ।
प्रतिषिश्जन्विचिक्रीडे यक्षीभिर्यक्षराडिव ॥
९॥
उपगीयमान:--गीतों द्वारा प्रशंसित; गन्धर्वै: --गन्धर्वों द्वारा; मृदड्ू-पणव-आनकानू--मृदंग, पणव तथा आनक नामक ढोलों;वादयद्धि:--बजा रहे; मुदा--हर्षपूर्वक; वीणामू--वीणाओं को; सूत-मागध-वन्दिभि: --सूतों, मागधों तथा वन्दियों द्वारा;सिच्यमान:--भिगोई जा रही; अच्युत:-- भगवान् कृष्ण; ताभि:--अपनी पतियों द्वारा; हसन्तीभि: --हँस रही; स्म--निस्सन्देह;रेचकै:--पिचकारियों से; प्रतिषिल्ञनन्ू--उलट कर भिगोये जाते; विचिक्रीडे--उन्होंने क्रीड़ा की; यक्षीभि:--यक्षियों से; यक्ष-रादटू--यक्षों के स्वामी ( कुबेर ); इब--सदश |
जब गन्धर्वो ने हर्षपूर्वक मृदढ़, पणव तथा आनक नामक ढोलों के साथ उनकी प्रशंसा मेंगीत गाये एवं सूतों, मागधों तथा वन्दियों ने वीणा बजाकर उनकी प्रशंसा में कविताएँ सुनाई, तोभगवान् कृष्ण अपनी पत्नियों के साथ जल-क्रीड़ा करने लगे।
रानियाँ ठिठोली करती हुईं, उनपर पिचकारियों से पानी के फुहारे छोड़ती और वे भी प्रत्युत्तर में उन पर पानी छिड़क देते।
इसप्रकार से कृष्ण ने अपनी रानियों के साथ उसी तरह क्रीड़ा की, जिस तरह यक्षराज 'यक्षीअप्सराओं ' के साथ क्रीड़ा करता है।
ताः क्लिन्नवस्त्रविवृतोरुकुचप्रदेशा:सिज्जन्त्य उद्धृतबृहत्कवरप्रसूना: ।
कान्तं सम रेचकजिहीर्षययोपगुहाजातस्मरोत्स्मयलसद्वदना विरेजु: ॥
१०॥
ताः--वे ( भगवान् कृष्ण की रानियाँ ); क्लिन्न--भीगे; वस्त्र--वस्त्रों वाली; विवृत--खुली हुई; ऊरुू--जाँघों; कुच--स्तन के;प्रदेशा:--भाग; सिद्जन्त्यः --छिड़कते हुए; उद्धृत--बिखरे; बृहत्--विशाल; कवर--बालों की चोटी से; प्रसूना:--फूल;कान्तम्--उनके प्रियतम को; स्म--निस्सन्देह; रेचक--उनकी पिचकारी; जिहीर्षयया--छीन लेने के विचार; उपगुहा --आलिंगन करके; जात--उत्पन्न; स्मर--काम की इच्छा के; उत्स्मय--अट्टहास से; लसदू--चमकते; वदना:--जिनकेमुखमण्डल; विरेजु:--देदीप्यमान लग रहे थे।
रानियों के भीगे वस्त्रों के नीचे उनकी जाँघें तथा उनके स्तन दिख रहे थे।
अपने प्रियतम परजल छिड़कने से उनके विशाल जूड़ों से बँधे फूल बिखर गये।
वे उनकी पिचकारी छीनने केबहाने, उनका आलिंगन कर लेती थीं।
उनका स्पर्श करने से उनमें काम-भावना बढ़ जाती,जिससे उनके मुखमंडल हँसी से चमचमाने लगते।
इस तरह कृष्ण की रानियाँ देदीप्यमान सौन्दर्यसे चमचमा रही थीं।
कृष्णस्तु तत्स्तनविषज्नितकुड्डू मस्रक्-क्रीडाभिषड्डधुतकुन्तलवृन्दबन्ध: ।
सिद्भन्मुहुर्युवतिभि: प्रतिषिच्यमानोरैमे करेणुभिरिवेभपति: परीत: ॥
११॥
कृष्ण:--भगवान् कृष्ण ने; तु--तथा; तत्--उनके; स्तन--स्तनों से; विषज्जित--लिपटे हुए; कुद्डू म-कुंकुम-चूर्ण; स्रक्--जिनकी फूल-माला; क्रीडा--क्री ड़ा में; अभिषड़--लीन होने से; धुत--हिलाये गये; कुन्तल--बालों के गुच्छों के; वृन्द--समूह की; बन्ध:--व्यवस्था, सज्जा; सिज्धन्ू--छिड़कते हुए; मुहुः--बारम्बार; युवतिभि: --युवती स्त्रियों द्वारा;प्रतिषिच्यमान: --उलट कर छिड़के जाते हुए; रेमे-- आनन्द लूटा; करेणुभि:--हथिनियों द्वारा; इब--सहृश; इभ-पति:--हाथियों का राजा; परीत:--घिरा हुआ
भगवान् कृष्ण की फूल-माला उनके स्तनों के कुंकुम से पुत गई और क्रीड़ा में लीन रहनेके फलस्वरूप उनके बालों के बहुत-से गुच्छे अस्त-व्यस्त हो गये।
जब भगवान् ने अपनी युवाप्रेमिकाओं पर बारम्बार जल छिड़का और उन्होंने भी उलटकर उन पर जल छिड़का, तो उन्होंनेवैसा ही आनन्द लूटा, जिस तरह हाथियों का राजा हथिनियों के संग में आनंद लूटता है।
नटानां नर्तकीनां च गीतवाद्योपजीविनाम् ।
क्रीडालड्डारवासांसि कृष्णोउदात्तस्य च स्त्रियः ॥
१२॥
नटानामू--पुरुष नर्तकों को; नर्तकीनाम्--तथा स्त्री नर्तकियों को; च--तथा; गीत--गाने; वाद्य--तथा बाजे से;उपजीविनाम्--जीविका चलाने वाले; क्रीडा--अपने खिलवाड़ से; अलड्जार--गहने; वासांसि--तथा वस्त्र; कृष्ण:-- भगवान्कृष्ण ने; अदात्ू--दे दिया; तस्य--उसका ( अपना ); च--तथा; स्त्रियः --पत्नियाँ
तत्पश्चात्भगवान् कृष्ण तथा उनकी पत्नियों ने जल-क्रीड़ा के दौरान अपने पहने हुए गहनेतथा वस्त्र, उन नटों तथा नर्तकियों को दे दिये जो गाना गाकर तथा वाद्य बजाकर, अपनीजीविका कमाते थे।
कृष्णस्यैवं विहरतो गत्यालापेक्षितस्मितै: ।
नर्मक्ष्वेलिपरिष्वड्रैः सत्रीणां किल हृता धिय: ॥
१३॥
कृष्णस्य--कृष्ण के; एवम्--इस प्रकार; विहरत:--क्रीड़ा करते; गति--हिलने-डुलने; आलाप--बातचीत; ईक्षित--निहारने;स्मितैः--तथा हँसने से; नर्म--परिहास से; क्ष्वेलि--छेड़छाड़ से; परिष्वड्भै:--तथा आलिंगन से; स्त्रीणाम्--स्त्रियों के; किल--निस्सन्देह; हता:--चुराये गये; धियः--हृदय
इस तरह भगवान् कृष्ण अपनी रानियों से क्रीड़ा करके और अपने हाव-भावों, बातों,चितवनों तथा हँसी से तथा अपने परिहास, छेड़छाड़ तथा आलिंगन द्वारा भी, उनके हृदयों कोपूरी तरह मुग्ध कर लेते।
ऊ्चुर्मुकुन्दैकधियो गिर उन्मत्तवज्जडम् ।
चिन्तयन्त्यो रविन्दाक्ष॑ं तानि मे गदत: श्रुणु ॥
१४॥
ऊचु:--वे बोलीं; मुकुन्द-- भगवान् कृष्ण; एक--एकमात्र; धिय: --मन; गिर:--शब्द; उन्मत्त--उन्मादी व्यक्ति; वत्--सहृश;जडमू--जड़; चिन्तयन्त्यः--सोचते हुए; अरविन्द-अक्षम्--कमल जैसे नेत्र वाले प्रभु के विषय में; तानि--वे ( शब्द ); मे--मुझसे; गदत:--कह रहे; श्रुणु--सुनो |
रानियाँ भावमय आत्मविस्मृति में जड़ बन जातीं और उनके मन एकमात्र कृष्ण में लीन होजाते।
तब, वे अपने कमल नेत्र प्रभु के विषय में सोचती हुई इस तरह बोलतीं मानों पागल( उन्मादग्रस्त ) हों।
कृपया ये शब्द मुझसे सुनें, जैसे जैसे मैं उन्हें बतला रहा हूँ।
महिष्य ऊचु:कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषेस्वपिति जगति रात्र्यामी श्वरो गुप्तबोध: ।
वयमिव सखि कच्चिद््गाढनिर्विद्धचेतानलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥
१५॥
महिष्य: ऊचु:--रानियों ने कहा; कुररि--हे कुररी पक्षी; विलपसि--विलाप करती हो; त्वमू--तुम; बीत--विहीन; निद्रा --नींदसे; न शेषे--तुम विश्राम नहीं कर सकते; स्वपिति--सोती है; जगति--( कहीं ) संसार में; राज्याम्--रात में; ईश्वर: -- भगवान्;गुप्त--छिपे; बोध: --अता-पता; वयम्--हम; इब--जिस तरह; सखि--हे सखी; कच्चित्--क्या; गाढ--गहराई से;निर्विद्ध-बिंधा हुआ; चेता:--जिसका हृदय; नलिन--कमल ( की तरह ); नयन--जिसकी आँखें; हास--हँसती हुई; उदार--उदार; लीला--कौतुकपूर्ण ; ईक्षितेन--चितवन से |
रानियों ने कहा : हे कुररी पक्षी, तुम विलाप कर रही हो।
अब तो रात्रि है और भगवान् इसजगत में कहीं गुप्त स्थान में सोये हुए हैं।
किन्तु हे सखी, तुम जगी हुई हो और सोने में असमर्थहो।
कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारी ही तरह कमलनेत्र भगवान् की उदार कौतुक-भरी हँसीलीचितवन से तुम्हारा हृदय अन्दर तक बिंध गया हो ?
नेत्रे निमीलयसि नक्तमदृष्टबन्धु-स्त्वं रोरवीषि करुणं बत चक्रवाकि ।
दासस््यं गत वयमिवाच्युतपादजुष्टांकिं वा स्त्रजं स्पृहयसे कवरेण बोढुम् ॥
१६॥
नेत्रे--आँखें; निमीलयसि--बन्द रखती हो; नक्तम्--रात्रि में; अदृष्ट--न देखा हुआ; बन्धु:--जिसका प्रेमी; त्वम्--तुम;रोरवीषि--क्रन्दन करती हो; करुणम्--करुणापूर्वक; बत--हाय; चक्रवाकि--हे चक्रवाकी; दास्यम्--दासता; गता--प्राप्त;वयम् इव--हमारी ही तरह; अच्युत--कृष्ण के; पाद--पैरों से; जुष्टामू--आदरित; किम्--शायद; वा--अथवा; स्त्रजमू--फूलकी माला को; स्पृहयसे--चाहती हो; कवरेण--अपने जूड़े में; बोढुमू--लगाने के लिए
हे बेचारी चक्रवाकी, तुम अपनी आँखें मूँद कर भी अपने अद्ृष्ट जोड़े ( साथी ) के लिएरात-भर करुणापूर्वक बहकती रहती हो।
अथवा कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारी ही तरह तुम भीअच्युत की दासी बन चुकी हो और अपने जूड़े में उस माला को लगाना चाहती हो, जिसे वेअपने पाद-स्पर्श से धन्य कर चुके हैं ?
भो भो: सदा निष्टनसे उदन्व-आ्लब्धनिद्रो इधिगतप्रजागरः किम्बा मुकुन्दापहतात्मलाउ्छनःप्राप्तां दशां त्वं च गतो दुरत्ययाम् ॥
१७॥
भो:--प्रिय; भो:--प्रिय; सदा--सदैव; निष्टनसे-- तुम निरन्तर उच्च ध्वनि करते हो; उदन्वन्--हे समुद्र; अलब्ध--न पाकर;निद्र:--नींद; अधिगत--अनुभव करते हुए; प्रजागर: --उन्निद्र रोग; किम् वा--अथवा शायद; मुकुन्द--कृष्ण द्वारा; अपहत--चुराये गये; आत्म--निजी; लाउ्छन: --चिह्; प्राप्ताम्ू--( हमारे द्वारा ) प्राप्त; दशाम्--अवस्था को; त्वमू--तुम; च-- भी;गतः-प्राप्त हुए हो; दुरत्ययाम्-मुक्त हो पाना असम्भव।
हे प्रिय समुद्र, तुम सदैव गर्जते रहते हो, रात में सोते नहीं।
क्या तुम्हें उन्नेद्र रोग हो गया है?या कहीं ऐसा तो नहीं है कि मुकुन्द ने हमारी ही तरह, तुमसे तुम्हारे चिन्ह छीन लिए हैं और तुमउन्हें फिर पाने में निराश हो ?
त्वं यक्ष्मणा बलवतासि गृहीत इन्दोक्षीणस्तमो न निजदीधितिभि: क्षिणोषि ।
कच्चिन्मुकुन्दगदितानि यथा वयं त्वंविस्पृत्य भो; स्थगितगीरुपलक्ष्यसे न: ॥
१८॥
त्वमू--तुम; यक्ष्मणा--यक्ष्मा रोग से; बल-वता--शक्तिशाली; असि--हो; गृहीत:--पकड़े हुए; इन्दो--हे चन्द्रमा; क्षीण:--दुर्बल; तम:--अंधकार; न--नहीं; निज--अपनी; दीधितिभि:--किरणों से; क्षिणोषि--नष्ट करते हो; कच्चित्--क्या; मुकुन्द-गदितानि--मुकुन्द द्वारा कहे गये; यथा--जिस तरह; वयम्--हमको; त्वमू--तुम; विस्मृत्य-- भुला कर; भो:--प्यारे;स्थगित--जड़ीभूत; गी:--जिसकी वाणी; उपलक्ष्यसे-- प्रतीत होते हो; न:--हमको |
हे प्रिय चन्द्रमा, घोर यक्ष्मा रोग ( क्षयरोग ) से ग्रसित होने से तुम इतने क्षीण हो गये हो कितुम अपनी किरणों से अंधकार को भगाने में असफल हो।
या फिर कहीं ऐसा तो नहीं है कि तुमइसलिए अवाक् प्रतीत हो रहे हो, क्योंकि हमारी ही तरह तुम भी मुकुन्द द्वारा दिये गये,उत्साहप्रद वादों को स्मरण नहीं कर सकते हो ?
कि न््वाचरितमस्माभिर्मलयानिल तेप्रियम् ।
गोविन्दापाड़ुनिर्भिन्ने हदीरयसि नः स्मरम् ॥
१९॥
किम्--क्या; नु--निस्सन्देह; आचरितम्--किया कार्य; अस्माभि: --हमारे द्वारा; मलय--मलय पर्वत के; अनिल--हे वायु;ते--तुमको; अप्रियम्--अच्छी न लगने वाली; गोविन्द--कृष्ण की; अपाड्ु--चितवनों द्वारा; निर्भिन्ने--विदीर्ण; हदि--हृदयोंमें; ईरयसि--प्रेरणा दे रहे हो; नः--हमारी; स्मरमू--काम-वासना को
हे मलय समीर, ऐसा हमने कया किया है कि तुम हमसे अप्रसन्न हो और हमारे उन हृदयों मेंकाम-भावना जागृत कर रहे हो, जो पहले ही गोविन्द की चितवनों से विदीर्ण हो चुके हैं ?
मेघ श्रीमंस्त्वमसि दयितो याददेन्द्रस्य नूनंश्रीवत्साड्डं वयमिव भवान्ध्यायति प्रेमबद्ध: ।
अत्युत्कण्ठ: शवलहृदयोस्मद्विधो बाष्पधारा:स्मृत्वा स्मृत्वा विसृजसि मुहुर्द:खदस्तत्प्रसड़ू ॥
२०॥
मेघ--हे बादल; श्री-मन्--हे सम्मानित; त्वमू--तुम; असि--हो; दयित:--प्रिय मित्र; यादव-इन्द्रस्य--यादवों के प्रधान के;नूनमू--निश्चय ही; श्रीवत्स-अड्डम्-- श्रीवत्स नामक विशेष चिह्न धारण करने वाले ( उनके वक्षस्थल पर ); वयम्--हम; इब--जिस तरह; भवान्ू--आप; ध्यायति--ध्यान करते हैं; प्रेम--शुद्ध प्रेम द्वारा; बद्ध:--बद्ध; अति--अत्यधिक; उत्कण्ठ:--उत्सुक; शवल--किंकर्त व्यविमूढ़; हृदयः--जिसका हृदय; अस्मत्--जिस तरह हमारे ( हृदय ); विध:--उसी तरह से; बाष्प--आँसुओं की; धाराः--धाराएँ; स्मृत्वा स्मृत्वा--बारम्बार स्मरण करके; विसृजसि--आप मुक्त करते हैं; मुहुः--बारम्बार;दुःख--दुख; दः--देने वाले; ततू--उसके साथ; प्रसड़ः--संगति
हे पूज्य बादल, निसन्देह तुम यादवों के उन प्रधान के अत्यन्त प्रिय हो, जो श्रीवत्स का चिन्हधारण किए हुए हैं।
तुम भी हमारी ही तरह उनसे प्रेम द्वारा बद्ध हो और उनका ही चिन्तन करतेहो।
तुम्हारा हृदय हमारे हृदयों की ही तरह अत्यन्त उत्सुकता से किंकर्तव्यविमूढ़ है और जब तुमउनका बारम्बार स्मरण करते हो, तो आँसुओं की धारा बहाते हो।
कृष्ण की संगति ऐसा ही दुखलाती है।
प्रियरावपदानि भाषसे मृत-सञ्जीविकयानया गिरा ।
'करवाणि किमझ्य ते प्रियंबद मे वल्गितकण्ठ कोकिल ॥
२१॥
प्रिय--प्रिय; राब--उसका जिसकी ध्वनियाँ; पदानि--झंकारें; भाषसे--तुम कह रहे हो; मृत--मरे हुए; सञ्जीविकया--पुनःजीवित करने वाला; अनया--इसमें; गिरा--वाणी; करवाणि--मुझे करना चाहिए; किम्ू--क्या; अद्य--आज; ते--तुम्हारेलिए; प्रियमू--अच्छा लगने वाला; बद--कहो; मे-- मुझसे; वल्गित--इन ध्वनियों से मधुरित; कण्ठ--कण्ठ वाले;कोकिल--हे कोयल।
रे मधुर कंठ वाली कोयल, तुम मृत को भी जीवित करनेवाली वह बोली बोल रही हो, जिसे हमने एक बार अत्यन्त मधुरभाषी अपने प्रेमी से सुनी थी।
कृपा करके मुझे बताओ कि मैं तुम्हेंप्रसन्न करने के लिए आज क्या कर सकती हूँ?
न चलसि न वदस्युदारबुद्धेपक्षितिधर चिन्तयसे महान्तमर्थम् ।
अपि बत वसुदेवनन्दनाडिंध्रवयमिव कामयसे स्तनैर्विधर्तुम्ू ॥
२२॥
न चलसि--तुम हिलते-डुलते नहीं हो; न बदसि--न बोलते हो; उदार--उदार; बुद्धे--जिसकी बुद्द्धि; क्षिति-धर--हे पर्वत;चिन्तयसे--तुम सोचते हो; महान्तम्--महान्; अर्थम्--बात के विषय में; अपि बत--शायद; वसुदेव-नन्दन--वसुदेव केलाड़ले पुत्र को; अड्प्रिमू--पाँवों को; वयम्--हम; इब--जिस तरह; कामयसे--तुम चाहते हो; स्तनै: --तुम्हारे स्तनों( चोटियों ) पर; विधर्तुमू--धारण करने के लिए।
हे उदार पर्वत, तुम न तो हिलते-डुलते हो, न बोलते-चालते हो।
तुम अवश्य ही किसीअत्यन्त महत्त्व वाली बात पर विचार कर रहे होगे।
अथवा क्या तुम हमारी ही तरह अपने स्तनों( शिखिरों ) पर वसुदेव के लाड़ले के पाँवों को धारण करना चाहते हो ?
शुष्यद्ध्रदा: करशिता बत सिन्धुपत्यःसम्प्रत्यपास्तकमलश्रिय इृष्टभर्तु: ।
यद्वद्वयं मधुपते: प्रणयावलोक-मप्राप्य मुप्टहदयाः पुरुकर्शिताः सम ॥
२३॥
शुष्यत्--सूखती हुई; हृदाः--जिसकी झीलें; करशिता:--दुबली-पतली; बत--हाय; सिन्धु--समुद्र की; पत्य:--हे पत्नियों;सम्प्रति--अब; अपास्त--खोया हुआ; कमल--कमलों का; श्रीय:--तेज; इष्ट--प्रिय; भर्तु:--पति का; यद्वत्--जिस तरह;वयम्--हम; मधु-पते: --मथधु के स्वामी; प्रणय--प्रेम; अवलोकम्--झलक; अप्राप्य--न पाते हुए; मुष्ट--ठगी हुई; हृदया: --हृदयों वाली; पुरु--पूरी तरह; कर्शिता:--विदीर्ण ; स्म--हो गई हैंहे समुद्र-पत्नी नदियो, अब तुम्हारे कुण्ड सूख गये हैं।
हाय! तुम एकदम दुबली हो गई होऔर तुम्हारी कमलों की सम्पत्ति लुप्त हो गई है।
तो क्या तुम हमारी तरह हो, जो इसलिए म्लानहो रही हैं, क्योंकि उन्हें हृदयों को ठगने वाले अपने प्रिय पति मधुपति की स्नेहिल चितवन नहीं मिल रही ?
हंस स्वागतमास्यतां पिब पयो ब्रूह्मड़ शौरे: कथांदूतं त्वां नु विदाम कच्चिदजित:ः स्वस्त्यास्त उक्त पुरा ।
किं वा नश्चवलसौहदः स्मरति तं॑ कस्माद्धजामो वयंक्षौद्रालापय कामदं थ्रियमृते सैवेकनिष्ठा स्त्रियाम्ू ॥
२४॥
हंस--हे हंस; सु-आगतम्--स्वागत है; आस्यताम्--आओ और बैठो; पिब--पियो; पय:--दूध; ब्रूहि--हमें बतलाओ; अड्ग--हे प्रिय; शौरे:--शौरि के; कथाम्--समाचार; दूतम्--संदेशवाहक को; त्वामू--तुम; नु--निस्सन्देह; विदाम--हम पहचानतीहैं; कच्चित्--क्या; अजित:--अजेय; स्वस्ति--कुशलपूर्वक; आस्ते--है; उक्तम्--कहा हुआ; पुरा--बहुत पहले; किम्--क्या; वा--अथवा; न:ः--हमको; चल--चलायमान; सौहृद:--जिसकी मित्रता; स्मरति--स्मरण करता है; तम्--उसको;कस्मात्--किस कारण से; भजाम: --पूजा करें; वयम्--हम; क्षौद्र--हे क्षुद्र के सेवक; आलापय--उसे आने के लिए कहो;काम--इच्छा; दम्ू-देनेवाला; थ्रियम्--लक्ष्मी के; ऋते--बिना; सा--वह; एव--अकेले; एक-निष्ठा--एकान्त भाव केअनुसार; स्त्रियाम्-स्त्रियों में से
हे हंस, स्वागत है।
कृपया यहाँ बैठो और थोड़ा दूध पियो।
हमें अपने प्रिय शूरवंशी के कुछसमाचार बतलाओ।
हम जानती हैं कि तुम उनके दूत हो।
वे अजेय प्रभु कुशल से तो हैं? क्याहमारा वह अविश्वसनीय मित्र अब भी उन शब्दों का स्मरण करता है, जिन्हें उसने बहुत काल पूर्वकहा था? हम उसके पास क्यों जाँय और उसकी पूजा क्यों करें? हे क्षुद्र स्वामी के सेवक,जाकर उससे कहो कि वह लक्ष्मी के बिना यहाँ आकर हमारी इच्छाएँ पूरी करे।
कया वहीएकमात्र स्त्री है, जो उसके प्रति विशेषरूप से अनुरक्त हो गया है ?
श्रीशुक उवाचइतीहशेन भावेन कृष्णे योगेश्वरेश्वरे ।
क्रियमाणेन माधव्यो लेभिरे परमां गतिम् ॥
२५॥
श्री-शुकः उवाच--शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस तरह कहते हुए; ईदहशेन--ऐसे; भावेन-- भावपूर्ण प्रेम से; कृष्णे--कृष्ण के लिए; योग-ईश्वर--योग के स्वामियों के; ई श्वर-- स्वामी; क्रियमाणेन-- आचरण करते हुए; माधव्य:--माधव कीपत्नियों ने; लेभिरे--प्राप्त किया; परमाम्ू--चरम; गतिम्--गन्तव्य, लक्ष्य
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : योग के समस्त ईश्वरों के ईश्वर भगवान् कृष्ण के ऐसे भावमयप्रेम में बोलती तथा कार्य करती हुईं, उनकी प्रिय पत्नियों ने जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त किया।
श्रुतमात्रोपि यः स्त्रीणां प्रसहयाकर्षते मनः ।
उरुगायोरुगीतो वा पश्यन्तीनां च कि पुनः ॥
२६॥
श्रुत--सुना हुआ; मात्र:--केवल; अपि-- भी; य:ः--जो ( भगवान् कृष्ण ); स्त्रीणाम्--स्त्रियों के; प्रसह्या--बल से;आकर्षते--आकर्षित करता है; मन:--मनों को; उरुू--अनेक; गाय--गीतों द्वारा; उरु--असंख्य प्रकारों से; गीत:--गायाहुआ; वा--दूसरी ओर; पश्यन्तीनाम्--उसे देखने वाली स्त्रियों के; च--तथा; किम्--क्या; पुनः --अधिक ।
भगवान् जिनका महिमागान असंख्य गीतों द्वारा असंख्य प्रकार से होता हैं, वे उन समस्तस्त्रियों के मन को बलपूर्वक आकर्षित करते हैं, जो उनके विषय में श्रवण मात्र करती हैं।
तोफिर उन स्त्रियों के विषय में क्या कहा जाय, जो प्रत्यक्ष रुप से उनका दर्शन करती हैं ?
याः सम्पर्यचरन्प्रेम्णा पादसंवाहनादिभि: ।
जगदणुरु भर्तृबुद्धया तासां किम्वर्ण्यते तप: ॥
२७॥
या:--जो; सम्पर्यचरन्ू-- पूरी तरह सेवित; प्रेम्णा--शुद्ध प्रेम से; पाद--उनके पैर; संवाहन--मालिश; आदिभि:--इत्यादि केद्वारा; जगत्ू--ब्रह्माण्ड के; गुरुम्-गुरु को; भर्तु--अपने पति रूप में; बुद्धया--प्रवृत्ति से; तासामू--उनकी; किम्--कैसे;वर्ण्यते--वर्णन किया जा सकता है; तपः--तपस्या का।
और उन र्त्रियों द्वारा, जिन्होंने शुद्ध प्रेमभाव से ब्रह्माण्ड के गुरु की सेवा की उनके द्वारासम्पन्न महान् तपस्या का भला कोई कैसे वर्णन कर सकता है ? उन्हें अपना पति मानकर, उन्होंनेउनके पाँव दबाने जैसी घनिष्ठ सेवाएँ कीं।
एवं वेदोदितं धर्ममनुतिष्ठन्सतां गति: ।
गहं धर्मार्थकामानां मुहुश्चादर्शयत्पदम् ॥
२८ ॥
एवम्--इस तरह; वेद--वेदों द्वारा; उदितम्--कहा गया; धर्मम्--धर्म; अनुतिष्ठन्--सम्पन्न करते हुए; सताम्--सन्त-भक्तों के;गतिः--लक्ष्य; गृहम्ू--घर; धर्म--धार्मिकता; अर्थ--आर्थिक विकास; कामानाम्--तथा इन्द्रिय-तृप्ति के; मुहुः--बारम्बार;च--तथा; आदर्शयत्-- उन्होंने प्रदर्शित किया; पदम्--स्थान के रूप में
इस तरह वेदों द्वारा आदेशित कर्तव्यों का पालन करते हुए सन्त-भक्तों के लक्ष्य भगवान्कृष्ण ने बारम्बार प्रदर्शित किया कि कोई व्यक्ति घर पर किस तरह धर्म, आर्थिक विकास तथानियमित इन्द्रिय-तृप्ति के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकता है।
आस्थितस्य परं धर्म कृष्णस्य गृहमेधिनाम् ।
आसन्षोडशसाहस्त्रं महिष्यश्च शताधिकम् ॥
२९॥
आस्थितस्य--स्थित; परम्--सर्वोच्च; धर्मम्-- धार्मिक सिद्धान्तों को; कृष्णस्य--कृष्ण के; गृह-मेधिनाम्--गृहस्था श्रम वालोंके; आसनू--थे; घोडश--सोलह; साहस्त्रमू--हजार; महिष्य:--रानियाँ; च--तथा; शत--एक सौ से; अधिकम्-प्लुस्धार्मिक गृहस्थ-जीवन के सर्वोच्च आदर्शों को पूरा करते हुए, भगवान् कृष्ण के १६,१००से अधिक पत्ियाँ थीं।
तासां स्त्रीरत्नभूतानामष्टौ या: प्रागुदाहता: ।
रुक्मिणीप्रमुखा राजंस्तत्पुत्राश्चानुपूर्वश: ॥
३०॥
तासाम्--उनमें से; स्त्री--स्त्रियों की; रत्त--रत्न या मणियों जैसी; भूतानाम्ू-- थीं; अष्टौ-- आठ; या:--जो; प्राक् --इसके पूर्व;उदाहता: --वर्णित; रुक्मिणी -प्रमुखा: --रुक्मिणी इत्यादि; राजन्--हे राजा ( परीक्षित ); तत्ू--उनके; पुत्रा: --पुत्र; च-- भी;अनुपूर्वश: --उसी क्रम में |
इन रल जैसी स्त्रियों में से रूक्मिणी इत्यादि आठ प्रमुख रानियाँ थीं।
हे राजन, मैं पहले हीइनके पुत्रों के साथ-साथ इनका क्रमिक वर्णन कर चुका हूँ।
एकैकस्यां दश दश कृष्णोजीजनदात्मजानू ।
यावत्य आत्मनो भार्या अमोघगतिरी श्वर: ॥
३१॥
एक-एकस्याम्--उनमें से प्रत्येक के; दश दश--दस-दस; कृष्ण:--कृष्ण ने; अजीजनतू--उत्पन्न किया; आत्म-जानू--पुत्रोंको; यावत्य:--जितनी; आत्मन: --उनकी; भार्या:--पत्नियाँ; अमोघ--कभी विफल न होने वाला; गति:--जिसका प्रयास;ईश्वर: -- भगवान्ऐसे
भगवान् कृष्ण ने, जिनका प्रयास कभी विफल नहीं होता, अपनी हर एक पतली से दस-दस पुत्र उत्पन्न किये।
तेषामुद्दामवीर्याणामष्टादश महारथा: ।
आसन्नुदारयशसस्तेषां नामानि मे श्रुणु ॥
३२॥
तेषाम्--इन ( पुत्रों ) के; उद्यम--असीम; वीर्याणाम्--जिनका पराक्रम; अष्टा-दश--अठारह; महा-रथा:--महारथों, सर्वोच्चश्रेणी के रथ-योद्धा; आसन्-- थे; उदार--विस्तृत; यशसः--जिनकी ख्याति; तेषामू--उनके ; नामानि--नाम; मे--मुझसे;श्रुणु--सुनो |
इन असीम पराक्रम वाले पुत्रों में से अठारह महान् ख्याति वाले महारथ थे।
अब मुझसे उनकेनाम सुनो।
प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्चव दीप्तिमान्भानुरेव च ।
साम्बो मधुर्बृहद्धानुश्ित्रभानुर्व॑को रुण: ॥
३३॥
पुष्करो वेदबाहुश्न श्रुतदेव: सुनन्दन: ।
चित्रबाहुर्विरूपश्च कविर्न्यग्रोध एव च ॥
३४॥
प्रद्युम्न: --प्रद्युम्म; च--तथा; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध; च--तथा; दीप्तिमान् भानु:--दीप्तिमान तथा भानु; एवं च-- भी; साम्बःमधु: बृहत्-भानु:--साम्ब, मधु तथा बहद्भानु; चित्र-भानु: वृक:ः अरुण: --चित्रभानु, वृक तथा अरुण; पुष्करः वेद-बाहुः च--पुष्कर तथा वेदबाहु; श्रुतदेवः सुनन्दन: --श्रुतदेव तथा सुनन्दन; चित्र-बाहुः विरूप: च--चित्रबाहु तथा विरूप; कवि:न्यग्रोध:--कवि तथा न्यग्रोध; एवं च-- भी |
इनके नाम थे प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, दीप्तिमानू, भानु, साम्ब, मधु, बृहदभानु, चित्रभानु, वृक,अरुण, पुष्कर, वेदबाहु, श्रुतदेव, सुनन्दन, चित्रबाहु, विरूप, कवि तथा न्यग्रोध।
एतेषामपि राजेन्द्र तनुजानां मधुद्विष: ।
प्रद्यम्म आसीत्प्रथम: पितृवद् रुक्मिणीसुत: ॥
३५॥
एतेषाम्--इनमें से; अपि--तथा; राज-इन्द्र--हे राजाओं में प्रधान; तनु-जानाम्--पुत्रों में से; मधु-द्विष:--मधु असुर के शत्रुकृष्ण के; प्रद्यम्न:--प्रद्यम्म; आसीत्--था; प्रथम:--पहला; पितृबत्--अपने पिता के ही समान; रुक्मिणी-सुतः--रुक्मिणीका पुत्र
हे राजाओं में श्रेष्ठ, मधु के शत्रु भगवान् कृष्ण द्वारा उत्पन्न किये गये इन पुत्रों में सेरुक्मिणी-पुत्र प्रद्युम्न सर्वप्रमुख था।
वह अपने पिता के ही समान था।
स रुक्मिणो दुहितरमुपयेमे महारथ: ।
तस्यां ततोनिरुद्धो भूलतागायतबलान्वितः ॥
३६॥
सः--उसने ( प्रद्यम्न ने ); रुक्मिण:--रुक््मी ( रुक्मिणी के बड़े भाई ) की; दुहितरम्--पुत्री, रुक्मवती से; उपयेमे--विवाहकिया; महा-रथ: --महारथी; तस्याम्--उससे; तत:ः--तब; अनिरुद्ध:--अनिरुद्ध; अभूत्--उत्पन्न हुआ; नाग--हाथी के;अयुत--दस हजार; बल--बल से; अन्वित:--युक्त |
महारथी प्रद्युम्न ने रुक्मी की पुत्री ( रुक्मवती ) से विवाह किया, जिसने अनिरुद्ध को जन्मदिया।
वह दस हजार हाथियों जितना बलवान् था।
स चापि रुक्मिण: पौत्रीं दौहित्रो जगृहे ततः ।
वज़स्तस्यथाभवद्यस्तु मौषलादवशेषित: ॥
३७॥
सः--उसने ( अनिरुद्ध ने ); च--तथा; अपि--आगे; रुक्मिण: --रुक्मी की; पौत्रीम्--पोती, ( रोचना से ); दौहित्र:--( रुक््मी ) पुत्री का पुत्र; जगृहे--ग्रहण किया; ततः--तत्पश्चात्; वज्ञ:--वज़ ने; तस्य--उसके पुत्र रुप में; अभवत्--जन्मलिया; यः--जो; तु--लेकिन; मौषलात्--लोहे के बने मूसल से यदुओं की विनाश-लीला के बाद; अवशेषित:--बचा रहा |
रुक््मी की पुत्री के पुत्र ( अनिरुद्ध ) ने रुक्मी के पुत्र की कन्या ( रोचना ) से विवाह किया।
उससे वज् उत्पन्न हुआ, जो यदुओं के मूसल-युद्ध के बाद कुछ बचने वालों में से एक था।
प्रतिबाहुरभूत्तस्मात्सुबाहुस्तस्य चात्मज: ।
सुबाहो: शान्तसेनो भूच्छतसेनस्तु तत्सुत: ॥
३८ ॥
प्रति-बाहु:--प्रतिबाहु; अभूत्--हुआ; तस्मात्--उस ( वज़ ) से; सुबाहु:--सुबाहु; तस्य--उसका; च--तथा; आत्म-जः --पुत्र;सु-बाहो: --सुबाहु से; शान्त-सेन: --शान्तसेन; अभूत्--हुआ; शत-सेन:--शतसेन; तु--तथा; तत्--उसका ( शान्तसेन का );सुतः--पुत्र |
वजन से प्रतिबाहु उत्पन्न हुआ, जिसका पुत्र सुबाहु था।
सुबाहु का पुत्र शान्तसेन था औरशान्तसेन से शतसेन उत्पन्न हुआ।
न होतस्मिन्कुले जाता अधना अबहुप्रजा: ।
अल्पायुषोल्पवीर्याश्व अब्रह्मण्याश्व जज्ञिरि ॥
३९॥
न--नहीं; हि--निस्सन्देह; एतस्मिनू--इस; कुले--परिवार में; जाता: --उत्पन्न; अधन:--निर्धन; अ-बहु--अनेक नहीं;प्रजा:--पुत्र; अल्प-आयुष:--कम उप्र वाले; अल्प--कम; वीर्या:--पराक्रम वाले; च--तथा; अब्रह्मण्या:--ब्राह्मण के प्रतिनिष्ठावान् नहीं; च--तथा; जज्ञिरि--उत्पन्न हुए |
इस परिवार के ऐसा कोई भी व्यक्ति उत्पन्न नहीं हुआ, जो निर्धन हो या सन्तानहीन, अल्पायु,निर्बल या ब्राह्मण संस्कृति के प्रति उपेक्षावान् हो।
यदुवंशप्रसूतानां पुंसां विख्यातकर्मणाम् ।
सड्ख्या न शक्यते कर्तुमपि वर्षायुतैनृप ॥
४०॥
यदु-वंश--यदुवंश में; प्रसूतानाम्--जन्म लेने वाले; पुंसाम्ू--मनुष्यों को; विख्यात--प्रसिद्ध; कर्मणाम्-कर्मो वाले;सड्ख्या--गिनती; न शक्यते--सम्भव नहीं; कर्तुमू--कर पाना; अपि-- भी; वर्ष--वर्षो में; अयुतैः --दस हजार; नृप--हे राजा( परीक्षित )॥
यदुवंश ने विख्यात कृत्यों वाले असंख्य महापुरुषों को जन्म दिया।
हे राजन, उन सबों कीगिनती दस हजार से अधिक वर्षों में भी नहीं की जा सकती।
तिस्त्र: कोट्य: सहस्त्राणामष्टाशीतिशतानि च ।
आसन्यदुकुलाचार्या: कुमाराणामिति श्रुतम् ॥
४१॥
तिस्त्र:--तीन; कोट्य:--करोड़; सहस्त्राणामू--हजार; अष्टा-अशीति--अट्टठासी; शतानि---सौ; च--तथा; आसन्-- थे; यदु-कुल--यदुवंश के; आचार्या:--शिक्षक; कुमाराणामू--बालकों के लिए; इति--इस प्रकार; श्रुतम्--सुना गया है।
मैंने प्रामाणिक स्त्रोतों से सुना है कि यदुवंश ने अपने बालकों को शिक्षा देने के लिए ही ३,८८,००,००० शिक्षक नियुक्त किये थे।
सड्ख्यानं यादवानां कः करिष्यति महात्मनाम् ।
यत्रायुतानामयुतलक्षेणास्ते स आहुक: ॥
४२॥
सड्ख्यानम्--गिनती; यादवानाम्--यादवों की; कः--कौन; करिष्यति--कर सकता है; महा-आत्मनाम्--महापुरुषों की;यत्र--जिनमें से; अयुतानाम्ू--दस हजारों के; अयुत--दस हजार ( गुना ); लक्षेण--( तीन ) सौ हजार ( व्यक्तियों ) समेत;आस्ते--उपस्थित थे; सः--वह; आहुक:--उग्रसेन |
भला महान् यादवों की गणना कौन कर सकता है, जबकि उनमें से राजा उग्रसेन के साथतीन नील ( ३,००, ००, ००,००, ००,००० ) परिचारक रहते थे।
देवासुराहवहता दैतेया ये सुदारुणा: ।
ते चोत्पन्ना मनुष्येषु प्रजा हप्ता बबाधिरे ॥
४३॥
देव-असुर--देवताओं तथा असुरों के मध्य; आहव--युद्धों में; हता:--मारे गये; दैतेया:--असुरगण; ये-- जो; सु-- अत्यन्त;दारुणा:-- भयानक; ते--वे; च--तथा; उत्पन्ना:--उत्पन्न हुए; मनुष्येषु--मनुष्यों के बीच में; प्रजा:--जनता को; हप्ता:--उद्धत; बबाधिरे--सताने लगे |
दिति की जंगली सनन््तानों ने जो भूतकाल में देवताओं तथा असुरों के मध्य हुए युद्धों में मारीगईं थीं, मनुष्यों के बीच जन्म लिया और वे उद्धत होकर सामान्य जनता को सताने लगे थे।
तन्निग्रहाय हरिणा प्रोक्ता देवा यदो: कुले ।
अवतीर्णा: कुलशतं तेषामेकाधिकं नृूप ॥
४४॥
तत्--उनके ; निग्रहाय--दमन के लिए; हरिणा--भगवान् कृष्ण द्वारा; प्रोक्ताः--कहा गया; देवा:--देवतागण; यदो: --यदु के;कुले--कुल में; अवतीर्णा:--अवतरित; कुल--कुलों के; शतम्--एक सौ; तेषाम्--उनके; एक-अधिकमू्--एक और;नृप--हे राजा ( परीक्षित )
इन असुरों का दमन करने के लिए भगवान् हरि ने देवताओं से यदुकुल में अवतार लेने केलिए कहा।
हे राजन् ऐसे १०१ कुल थे।
तेषां प्रमाणं भगवान्प्रभुत्वेनाभवद्धरिः ।
ये चानुवर्तिनस्तस्य ववृधु: सर्वयादवा: ॥
४५॥
तेषाम्--उनमें से; प्रमाणम्-प्रमाण; भगवान्--भगवान; प्रभुत्वेन-- भगवान् होने के कारण; अभवत्-- था; हरिः--भगवान्हरि; ये--जो; च--तथा; अनुवर्तिन:--निजी संगी; तस्य--उसके; ववृधु:--उन्नति की; सर्व--सारे; यादवा:--यादवों ने।
चूँकि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अतएत यादवों ने उन्हें अपना परम प्रमाण( सत्ता ) मान लिया।
और इन सबों में से, जो उनके घनिष्ठ संगी थे उन्होंने विशेष रूप से उन्नतिकी।
शय्यासनाटनालापक्रीडास्नानादिकर्मसु ।
न विदुः सन्तमात्मानं वृष्णय: कृष्णचेतसः ॥
४६॥
शब्या--सोते; आसन--बैठते; अटन--घूमते; आलाप--बात करते; क्रीड--खेलते; स्नान--नहाते; आदि--इत्यादि;कर्मसु-कार्यो में; न विदु:--वे अवगत न थे; सन्तम्--उपस्थित; आत्मानम्--वे स्वयं; वृष्णय:--वृष्णिजन; कृष्ण --कृष्ण में( लीन ); चेतसः--जिनके मन
वृष्णिजन कृष्णभावनामृत में इतने लीन थे कि वे सोते, बैठते, घूमते, बातें करते, खेलते,नहाते इत्यादि कार्य करते समय अपने ही शरीर की सुधि-बुधि भूल गये।
तीर्थ चक्रे नृपोनं यदजनि यदुषु स्वःसरित्पादशौचंविद्विद्स्नग्धा: स्वरूपं ययुरजितपर श्रीर्यदर्थेडन्ययल: ।
यन्नामामड्रलघ्नं श्रुतमथ गदितं यत्कृतो गोत्रधर्म:कृष्णस्यैतन्न चित्र क्षितिभरहरणं कालचक्रायुधस्य ॥
४७॥
तीर्थम्--तीर्थस्थान; चक्रे --बनाया; नृप--हे राजा ( परीक्षित ); ऊनम्--घट कर; यत्--जो ( कृष्ण की महिमा ); अजनि--उसने जन्म लिया; यदुषु--यदुओं के मध्य; स्व:--स्वर्ग की; सरित्ू--नदी; पाद--जिसके पैर; शौचम्--जो ( जल ) धोता है;विद्विदू--शत्रु; स्निग्धा:--तथा प्रियजन; स्वरूपम्--जिनके स्वरूप; ययु:--प्राप्त किया; अजित--अजेय; परा--तथा पूर्ण;श्री:--लक्ष्मी; यत्--जिसके; अर्थे-हेतु; अन्य--अन्य; यल:--प्रयास; यत्--जिसका; नाम--नाम; अमड्रल--अशुभ को;घ्नमू--नष्ट करने वाला; श्रुतम्--सुना हुआ; अथ--अथवा; गदितम्--कहा गया; यत्--जिसके द्वारा; कृत:--उत्पन्न; गोत्र--( विभिन्न मुनियों के ) गोत्रों में; धर्म: --धर्म; कृष्णस्य--कृष्ण के लिए; एतत्--यह; न--नहीं; चित्रमू--आश्चर्यजनक;क्षिति--पृथ्वी के; भर-- भार के; हरणम्--उतारने के लिए; काल--समय का; चक्र--पहिया; आयुधस्य--जिसका हथियार ।
स्वर्ग की गंगा पवित्र तीर्थ है, क्योंकि उसका जल भगवान् के चरणों को पखारता है।
किन्तुजब भगवान् ने यदुओं के बीच अवतार लिया, तो उनके यश के कारण पवित्र स्थान के रूप मेंगंगा नदी का महत्त्व कम हो गया।
किन्तु कृष्ण से घृणा करने वालों तथा उनसे प्रेम करने वालोंने आध्यात्मिक लोक में उन्हीं के समान नित्य स्वरूप प्राप्त किया।
अप्राप्य तथा परम आत्मतुष्टलक्ष्मी जिनकी कृपा के लिए हर कोई संघर्ष करता है एकमात्र उन्हीं की हैं।
उनके नाम काश्रवण या कीर्तन करने से समस्त अमंगल नष्ट हो जाता है।
एकमात्र उन्हीं ने ऋषियों की विविधशिष्य-परम्पराओं के सिद्धान्त निश्चित किये हैं।
इसमें कौन-सा आश्चर्य है कि कालचक्र,जिसका हथियार हो, उसने पृथ्वी के भार को उतारा ?
जयति जननिवासो देवकीजन्मवादोयदुवरपरिषत्स्वैर्दोर्भिरस्यन्नधर्मम् ।
स्थिरचरवृजिनघ्न: सुस्मितश्रीमुखेनब्रजपुरवनितानां वर्धयन्कामदेवम् ॥
४८ ॥
जयति--शा श्वत यशस्वी बनकर जीवित रहता है; जन-निवास:--जो यदुवंश के सदस्यों जैसे मनुष्यों के बीच रहता है और जोसमस्त जीवों का चरम आश्रय है; देवकी-जन्म-वाद:--देवकी के पुत्र रूप में जाने जाते हैं (
भगवान् का कोई माता-पिता नहींहोता इसलिए वे देवकी के पुत्र जाने जाते हैं।
इसी तरह वे यशोदा, वसुदेव तथा नन्द महाराज के पुत्र जाने जाते हैं ); यदु-बर-परिषत्--यदुवंश के सदस्यों अथवा वृन्दावन के गोपों द्वारा सेवित ( जो सभी भगवान् के नित्य संगी तथा नित्य दास हैं ); स्वैःदोर्भि:--अपनी बाहुओं से या अर्जुन जैसे भक्तों से, जो उनकी भुजाओं जैसे हैं; अस्यन्ू--मारते हुए; अधर्मम्--असुरों को याअमंगलकारियों को; स्थिर-चर-वृजिन-घ्न:--समस्त चर तथा अचर जीवों के दुर्भाग्य के विनाशक; सु-स्मित--सदैव हँसतेहुए; श्री-मुखेन-- अपने सुन्दर मुखड़े से; ब्रज-पुर-वनितानाम्--वृन्दावन की युवतियों की; वर्धयन्--बढ़ाते हुए; काम-देवम्--कामेच्छाओं कोभगवान् श्रीकृष्ण जन-निवास के नाम से विख्यात हैं अर्थात् वे समस्त जीवों के परमआश्रय हैं।
वे देवकीनन्दन या यशोदानन्दन भी कहलाते हैं।
वे यदुकुल के पथ-प्रदर्शक हैं औरवे अपनी बलशाली भुजाओं से समस्त अमंगल को तथा समस्त अपवित्र व्यक्तियों का वध करतेहैं।
वे अपनी उपस्थिति से समस्त चर तथा अचर प्राणियों के अमंगल को नष्ट करते हैं।
उनकाआनन्दपूर्ण मन्द हासयुक्त मुख वृन्दावन की गोपियों की कामेच्छाओं को बढ़ाने वाला है।
उनकीजय हो और वे प्रसन्न हों।
इत्थं परस्य निजवर्त्मरिरक्षयात्त-लीलातनोस्तदनुरूपविडम्बनानि ।
कर्माणि कर्मकषणानि यदूत्तमस्यश्रूयादमुष्य पदयोरनुवृत्तिमिच्छन् ॥
४९ ॥
इत्थम्--इस प्रकार से ( वर्णित ); परस्य--ब्रह्म का; निज--अपना; वर्त्म--मार्ग ( भक्ति का ); रिरक्षया--रक्षा करने की इच्छासे; आत्त--धारण किये हुए; लीला--लीलाओं के लिए; तनोः:--विविध रूप; तत्--इनमें से प्रत्येक को; अनुरूप--उपयुक्त;विडम्बनानि-- अनुकरण करते हुए; कर्माणि--कर्मों को; कर्म--भौतिक कर्म के फल; कषणानि--जो नष्ट करते हैं; यदु-उत्तमस्य--यदुओं में श्रेष्ठ के; श्रूयात्--मनुष्य सुने; अमुष्य--उसके; पदयो:--पैरों के; अनुवृत्तिमू--पालन करने का अधिकार;इच्छन्--इच्छा करते हुए
अपने प्रति भक्ति के सिद्धान्तों की रक्षा करने के लिए यदुश्रेष्ठ भगवान् कृष्ण उन लीला-रूपों को स्वीकार करते हैं, जिनका यहाँ पर श्रीमद्भागवत में महिमा-गान हुआ है।
जो व्यक्तिश्रद्धापूर्वकक उनके चरणकमलों की सेवा करने का इच्छुक हो, उसे उन कार्यकलापों को सुननाचाहिए, जिन्हें वे प्रत्येक अवतार में सम्पन्न करते हैं--वे कार्यकलाप, जो उनके द्वारा धारण किएजाने वाले रूपों के अनुरूप हैं।
इन लीलाओं के वर्णनों को सुनने से सकाम कर्मों के फल विनष्टहोते हैं।
मर्त्यस्तयानुसवमेधितया मुकुन्द-श्रीमत्कथाश्रवणकीर्तनचिन्तयैति ।
तद्धघाम दुस्तरकृतान्तजवापवर्गग्रामाद्वनं क्षितिभुजोपि ययुर्यदर्था: ॥
५०॥
मर्त्य:--मर्त्य; तया--ऐसे; अनुसवम्--निरन्तर; एधितया--वर्धमान; मुकुन्द-- कृष्ण विषयक; श्रीमत्--सुन्दर; कथा--कथाओं के; श्रवण--सुनने; कीर्तन--कीर्तन करने; चिन्तया--तथा चिन्तन करने से; एति--जाता है; तत्--उसके; धाम--घरको; दुस्तर--जिससे बचा न जा सके; कृत-अन्त--मृत्यु के; जब--बल के; अपवर्गम्--मोक्ष को; ग्रामात्--संसारी घर से;वनम्--जंगल को; क्षिति-भुज:--राजा ( यथा प्रियत्रत ); अपि-- भी; ययु:--गये; यत्--जिसको; अर्था:--प्राप्त करने केलिए
नित्यप्रति अधिकाधिक निष्ठापूर्वक भगवान् मुकुन्द की सुन्दर कथाओं के नियमित श्रवण,कीर्तन तथा ध्यान से मर्त्य प्राणी को भगवान् का दैवीधाम प्राप्त होगा, जहाँ मृत्यु की दुस्तरशक्ति का शासन नहीं है।
इसी उद्देश्य से अनेक व्यक्तियों ने, जिनमें बड़े-बड़े राजा सम्मिलित हैंअपने-अपने संसारी घरों को त्याग कर जंगल की राह ली।
