← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
अध्याय बाईसवां: भौतिक निर्माण के तत्वों की गणना
श्रीउद्धव उवाचकति तत्त्वानि विश्वेश सड्ख्यातान्यूषिभि: प्रभो ।नवैकादश पज्ञ त्रीण्यात्थ त्वमिह शुश्रुम ॥
१॥
केचित्षड्िवशतिं प्राहुर॒परे पञ्ञविंशतिं ।सप्तैके नव षट्केचिच्चत्वार्येकादशापरे ।केचित्सप्तदश प्राहु: षोडशैके त्रयोदश ॥
२॥
एतावत्त्वं हि सडख्यानामृषयो यद्विवक्षया ।गायन्ति पृथगायुष्मत्रिदं नो वक्तुमहसि ॥
३॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; कति--कितने; तत्त्वानि--सृष्टि के मूलभूत तत्त्व; विश्व-ईश--हे ब्रह्माण्ड के स्वामी;सड्ख्यातानि--गिनाये गये हैं; ऋषिभि:--महान् अधिकारियों द्वारा; प्रभो--हे स्वामी; नव--नौ ( ईश्वर, आत्मा, महत् तत्त्व,मिथ्या अहंकार तथा पाँच स्थूल तत्त्व ); एकादश- ग्यारह ( दस ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन ); पञ्ञ-- पाँच( पाँच इन्द्रिय-विषय ); त्रीणि--तीन ( सतो, रजो तथा तमोगुण इस प्रकार कुल मिलाकर अट्ठाईस ); आत्थ--कहा है; त्वमू--तुमने; इह--इस जगत में आविर्भूत होकर; शुश्रुम--ऐसा मैंने सुना है; केचित्--कुछ; षट्-विंशतिम्--छब्बीस; प्राहु: --कहतेहैं; अपरे-- अन्य; पञ्ञ-विंशतिम्--पच्चीस; सप्त--सात; एके--कुछ; नव--नौ; षट्--छः: ; केचित्-- कुछ; चत्वारि-- चार;एकादश- ग्यारह; अपरे--और दूसरे; केचित्--कुछ; सप्तदश--सत्रह; प्राहु:--कहते हैं; षोडश--सोलह; एके--कुछ;त्रयोदश--तेरह; एतावत्त्वमू--ऐसी गणनाएँ; हि--निस्सन्देह; सड्ख्यानाम्--तत्त्वों की गणना करने की विविध विधियों के;ऋषय: --ऋषिगण; यत् विवक्षया--यह व्यक्त करने के विचार से कि कौन-से भाव; गायन्ति--उन्होंने घोषित किया है;पृथक्--विविध प्रकारों से; आयु:-मन्--हे परम शाश्वत; इृदम्--यह; न:--हमसे; वक्तुमू--बताने के लिए; अर्हसि-तुम्हेंचाहिए।
उद्धव ने पूछा : हे प्रभु, हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, ऋषियों ने सृष्टि के तत्त्वों की कितनी संख्याबतलाई है? मैंने आपके मुख से कुल अट्ठाइस का वर्णन सुना है--ई श्वर, जीवात्मा, महत तत्त्व,मिथ्या अहंकार, पाँच स्थूल तत्त्व, दस इन्द्रियाँ, मन, पाँच सूक्ष्म इन्द्रिय-विषय तथा तीन गुण।किन्तु कुछ विद्वान छब्बीस तत्त्व बतलाते हैं जबकि अन्य लोग इनकी संख्या पच्चीस या सात,नौ, छह, चार या ग्यारह और कुछ लोग सत्रह, सोलह या तेरह बतलाते हैं। जब ये ऋषि ऐसेविविध प्रकारों से सर्जक तत्त्वों की गणना कर रहे थे, तो उनके मनों में क्याथा ? हे परम शाश्वत,कृपा करके मुझे यह बतलायें।
श्रीभगवानुवाचयुक्त च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा यथा ।मायां मदीयामुदगृह्म बदतां कि नु दुर्घटम् ॥
४॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; युक्तम्--युक्तियुक्त; च-- भी; सन्ति--उपस्थित रहते हैं; सर्वत्र--सभी जगह; भाषन्ते--कहते हैं; ब्राह्मणा:--ब्राह्मणजन; यथा--कैसे; मायाम्--योगशक्ति; मदीयम्--मेरी; उद्गृह्य-- अपनाकर; वदताम्--बोलनेवाले के; किम्ू-- क्या; नु--आखिरकार; दुर्घटमू-- असम्भव होगा।
भगवान् कृष्ण ने उत्तर दिया : चूँकि सारे तत्त्व सभी जगह उपस्थित रहते हैं इसलिए यहयुक्तियुक्त है कि विभिन्न विद्वान ब्राह्मणों ने उनकी व्याख्या भिन्न भिन्न विधियों से की है। ऐसेसभी दार्शनिकों ने मेरी योगशक्ति का आश्रय लेकर ही ऐसा कहा है, अतएव वे सत्य काखण्डन किये बिना कुछ भी कह सकते हैं।
नैतदेवं यथात्थ त्वं यद॒हं वच्मि तत्तथा ।एवं विवदतां हेतुं शक्तयो मे दुरत्यया: ॥
५॥
न--नहीं है; एतत्--यह; एवम्--ऐसा; यथा--जिस तरह; आत्थ--कहते हो; त्वमू--तुम; यत्--जो; अहम्--मैं; वच्मि--कहरहा हूँ; तत्ू--वह; तथा--उस तरह; एवम्--इस तरह; विवदताम्ू--तर्क करनेवालों के लिए; हेतुम्-तर्कपूर्ण कारणों पर;शक्तय:--शक्तियाँ; मे--मेरी; दुरत्यया:--दुर्लघ्य |
जब दार्शनिकजन तर्क करते हैं, 'तुम जिस तरह इस विशेष प्रसंग की व्याख्या करना चाहतेहो, मैं उसे उस रूप में नहीं करना चाहता' तो इसमें मेरी दुर्लध्य शक्तियाँ ही उनकीविश्लेषणान्तमक असहमतियों को प्रेरणा देती हैं।
यासां व्यतिकरादासीद्विकल्पो वदतां पदम् ।प्राप्त शमदमेउप्येति वादस्तमनु शाम्यति ॥
६॥
यासाम्ू--जिन ( मेरी शक्तियों ) के; व्यतिकरात्-परस्पर क्रिया से; आसीत्--उत्पन्न हुआ है; विकल्प:--मतभेद; बदताम्ू--विवाद करने वालों के; पदम्--विवाद का विषय; प्राप्ते--प्राप्त कर चुकने पर; शम--मुझ पर अपनी बुद्धि स्थिर करने कीसामर्थ्य; दमे--बाह्य इन्द्रियों पर नियंत्रण; अप्येति--( मतभेद ) दूर हो जाता है; वादः--विवाद, तर्क; तम् अनु--फलस्वरूप;शाम्यति--शमन हो जाता है।
मेरी शक्तियों की अन्योन्य क्रिया से विभिन्न मत ( वाद ) उत्पन्न होते हैं। किन्तु जिन लोगों नेअपनी बुद्धि मुझ पर स्थिर कर ली है और अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, उनके मतभेददूर हो जाते हैं और इस तरह तर्क ( वाद-विवाद ) का कारण ही मिट जाता है।
परस्परानुप्रवेशात्तत्त्वानां पुरुषर्षभ ।पौर्वापर्यप्रसड्ख्यानं यथा वक्तुर्विवक्षितम् ॥
७॥
परस्पर--आपफस में; अनुप्रवेशात्-- प्रवेश करने के कारण ( सूक्ष्म कारण का स्थूल कारण में या इसके विपरीत ); तत्त्वानाम्ू--विभिन्न तत्त्वों के; पुरुष-ऋषभ--हे पुरुष- श्रेष्ठ ( उद्धव ); पौर्ब--पूर्व कारणों के रूप में; अपर्य--अथवा प्रतिफलों की;प्रसड्ख्यानम्-- गणना; यथा--किन्तु; वक्तु:--वक्ता; विवक्षितम्--वर्णन करने के लिए इच्छुक |
हे पुरुष-श्रेष्ठ, चूँकि सूक्ष्म तथा स्थूल तत्त्व एक-दूसरे में प्रविष्ट हो जाते हैं, इसलिएदार्शनिकजन अपनी अपनी इच्छानुसार विभिन्न प्रकारों से मूलभूत भौतिक तत्त्वों की गणना करसकते हैं।
एकस्मिन्नपि दृश्यन्ते प्रविष्टानीतराणि च ।पूर्वस्मिन्वा परस्मिन्वा तत्त्वे तत्त्वानि सर्वश: ॥
८॥
एकस्मिनू--एक ( तत्त्व ) में; अपि-- भी; दृश्यन्ते--देखे जाते हैं; प्रविष्टानि-- भीतर घुसे हुए; इतराणि-- अन्य; च-- भी;पूर्वस्मिन्ू--पूर्व वाले में; बा--अथवा; परस्मिन्ू-- अथवा बाद वाले में; वा--अथवा; तत्त्वे--किसी तत्त्व में; तत्त्वानि-- अन्यतत्त्व; सर्वशः--विभिन्न गणनाओं में से हर एक में
सारे सूक्ष्म तत्त्व वस्तुतः अपने स्थूल कार्यों के भीतर उपस्थित रहते हैं। इसी तरह सारे स्थूलतत्त्व अपने सूक्ष्म कारणों के भीतर उपस्थित रहते हैं क्योंकि भौतिक सृष्टि सूक्ष्म से स्थूल तत्त्वोंकी क्रमागत अभिव्यक्ति के रूप में होती है। इस तरह हम किसी एक तत्त्व में सारे भौतिक तत्त्वोंको पा सकते हैं।
पौर्वापर्यमतोमीषां प्रसड्ख्यानमभीप्सताम् ।यथा विविक्तं यद्वक्त्रं गृह्कीमो युक्तिसम्भवात् ॥
९॥
पौर्व--कारणरूप तत्त्वों को उनके व्यक्त कार्यो में सम्मिलित मानते हुए; अपर्यम्--अथवा तत्त्वों में उनके सूक्ष्म कारणों कोनिहित मानते हुए; अत:--इसलिए; अमीषाम्--इन चिन्तकों के; प्रसड्ख्यानम्--गणना करते हुए; अभीप्सताम्ू--इच्छाकरनेवालों के; यथा--जिस तरह; विविक्तम्--निश्चित; यत्-वक्त्रमू--जिसके मुख से; गृह्लीम:--हम स्वीकार करते हैं; युक्ति-- तर्कका; सम्भवात्--सम्भावना से |
इसलिए इनमें से चाहे जो भी विचारक बोल रहा हो और इसकी परवाह न करते हुए कि वेअपनी गणनाओं में भौतिक तत्त्वों को उनके पिछले सूक्ष्म कारणों में सम्मिलित करें अथवा उनकेपरवर्ती प्रकट कार्यों के भीतर करें, मैं उनके मतों को प्रामाणिक मान लेता हूँ क्योंकि विभिन्नसिद्धान्तों में से हर एक की तार्किक व्याख्या प्रस्तुत की जा सकती है।
अनाद्यविद्यायुक्तस्य पुरुषस्यात्मवेदनम् ।स्वतो न सम्भवादन्यस्तत्त्वज्ञो ज्ञानदो भवेत् ॥
१०॥
अनादि--जिसका आदि न हो; अविद्या--अज्ञान से; युक्तस्थ--जुड़े रहने वाले; पुरुषस्य--पुरुष का; आत्म-वेदनम्-- आत्म-साक्षात्कार की विधि; स्वतः--अपनी योग्यता से; न सम्भवात्--चूँकि ऐसा हो नहीं सकता; अन्य:--दूसरा व्यक्ति; तत्त्व-ज्ञ:--दिव्य सचाई को जानने वाला; ज्ञान-द:--असली ज्ञान का प्रदाता; भवेत्--हो |
चूँकि अनादि काल से अज्ञान से आवृत व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार करने में अक्षम होता है,अतएव ऐसा कोई अन्य व्यक्ति होना चाहिए जो परब्रह्म को पूरी तरह जानता हो और उसे यहज्ञान प्रदान कर सकता हो।
पुरुषेश्वरयोरत्र न वैलक्षण्यमण्वपि ।तदन्यकल्पनापार्था ज्ञानं च प्रकृतेर्गुण: ॥
११॥
पुरुष--भोक्ता; ईश्वरयो:-- तथा परम नियन्ता के मध्य; अत्र--यहाँ पर; न--नहीं है; वैलक्षण्यम्-- असमानता; अणु--सूक्ष्म;अपि--भी; तत्--उनके; अन्य--सर्वथा पृथक् होकर के; कल्पना--कल्पित भाव; अपार्था--व्यर्थ; ज्ञामम्ू--ज्ञान; च--तथा;प्रकृते:--प्रकृति का; गुण:--गुण |
सतोगुणी ज्ञान के अनुसार जीव तथा परम नियन्ता में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं हैं। उनमेंगुणात्मक अन्तर की कल्पना व्यर्थ है।
पप्रकृतिर्गुणसाम्यं बै प्रकृते्नात्मनो गुणा: ।सत्त्वं रजस्तम इति स्थित्युत्पत्त्यन्तहहेतव: ॥
१२॥
्रकृति:-- प्रकृति; गुण--तीन गुणों की; साम्यम्--आदि साम्यावस्था; बै--निस्सन्देह; प्रकृते:--प्रकृति के; न आत्मन:--आत्मा के नहीं; गुणा:--ये गुण; सत्त्वम्--सतो; रज:--रजो; तम:--तमो; इति--इस प्रकार कहलाने वाले; स्थिति--सृष्टि केपालन; उत्पत्ति--इसके उत्पन्न होने; अन्त--तथा इसके संहार के; हेतवः--कारण |
मूलतः प्रकृति तीन गुणों की साम्यावस्था के रूप में विद्यमान रहती है और ये गुण दिव्यआत्मा के न होकर एकमात्र प्रकृति के होते हैं। ये गुण--सतो, रजो तथा तमोगुण--इसब्रह्माण्ड के सृजन, पालन तथा संहार के प्रभावशाली कारण हैं।
डेसतच्त्व॑ ज्ञानं रज: कर्म तमोज्ञानमिहोच्यते ।गुणव्यतिकरः काल: स्वभाव: सूत्रमेव च ॥
१३॥
सत्त्वम्--सतोगुण; ज्ञानम्--ज्ञान; रज:--रजोगुण; कर्म--सकाम कर्म; तम:--तमोगुण; अज्ञानम्-मूर्खता; इह--इस जगतमें; उच्चते--कहलाता है; गुण--गुणों का; व्यतिकरः--क्षुब्ध विकार; काल:--काल; स्वभाव: --आन्तरिक मनोवृत्ति, प्रकृति;सूत्रमू--महत् तत्त्व; एव--निस्सन्देह; च--भी |
इस जगत में सतोगुण को ज्ञान, रजोगुण को सकाम कर्म तथा तमोगुण को अज्ञान मानाजाता है। काल को भौतिक गुणों की क्षुब्ध अन्तःक्रिया के रूप में देखा जाता है और आदि सूत्र अर्थात् महत् तत्त्व से समग्र कार्य की मनोवृत्ति प्रकट होती है।
पुरुष: प्रकृतिर्व्यक्तमहड्डारो नभोडउनिलः ।ज्योतिराप: क्षितिरिति तत्त्वान्युक्तानि मे नव ॥
१४॥
पुरुष: --भोक्ता; प्रकृति:--प्रकृति; व्यक्तमू-पदार्थ की आदि अभिव्यक्ति; अहड्डार:--मिथ्या अहंकार; नभ:--आकाश;अनिलः--वायु; ज्योति:ः--अग्नि; आप: --जल; क्षिति:-- पृथ्वी; इति--इस प्रकार; तत्त्वानि--सृष्टि के सारे तत्त्व; उक्तानि--कहे गये; मे--मेरे द्वारा; नव--नौ |
मैं नौ मूल तत्त्वों का वर्णन भोक्ता आत्मा, प्रकृति, महत् तत्त्व की आदि अभिव्यक्ति, मिथ्याअहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी के रूप में कर चुका हूँ।
श्रोत्रं त्वग्दर्शनं घ्राणो जिल्नेति ज्ञानशक्तय: ।वाक्पाण्युपस्थपाय्वड्प्रि: कर्माण्यड्री भयं मनः ॥
१५॥
श्रोत्रमू--सुनने की इन्द्रिय; त्वक्--स्पर्श जो त्वचा पर अनुभव किया जाता है उसकी इन्द्रिय; दर्शनम्--दृष्टि; प्राण: --गंध;जिह्ना--स्वाद की इन्द्रिय, जिसका अनुभव जीभ पर होता है; इति--इस प्रकार; ज्ञान-शक्तय:--ज्ञानअर्जित करने वाली इन्द्रियाँ;बाक्ू--वाणी; पाणि--हाथ; उपस्थ--जननांग; पायु--गुदा; अड्प्रि:--पाँव; कर्माणि--कर्मेन्द्रियाँ; अड्र--हे उद्धव;उभयम्--दोनों ही कोटियों की; मन:--मन।
हे उद्धव, श्रवण, स्पर्श, दृष्टि, गंध तथा स्वाद--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं और वाणी, हाथ,जननेन्द्रिय, गुदा तथा पाँव--ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। मन इन दोनों कोटियों में आता है।
शब्दः स्पर्शो रसो गन्धो रूप॑ चेत्यर्थजातय: ।गत्युक्त्युत्सर्गशिल्पानि कर्मायतनसिद्धय: ॥
१६॥
शब्द: --ध्वनि; स्पर्श:--स्पर्श; रस:--स्वाद; गन्ध: --सुगन्धि; रूपम्ू--रूप; च--तथा; इति--इस प्रकार; अर्थ--इन्द्रिय-विषयों की; जातय:--कोटियाँ; गति--चाल; उक्ति--वाणी; उत्सर्ग--मलमूत्र का त्याग ( जननेन्द्रिय तथा गुदा दोनों द्वारा );शिल्पानि--तथा निर्माण; कर्म-आयतन--उपर्युक्त कर्मेन्द्रियों द्वारा; सिद्धयः--सम्पन्न
ध्वनि, स्पर्श, स्वाद, गंध तथा रूप ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं और गति, वाणी, उत्सर्ग तथाशिल्प--ये कर्मेन्द्रियों के विषय हैं।
सर्गादौ प्रकृतिहास्य कार्यकारणरूपिणी ।सत्त्वादिभिर्गुणैर्धत्ते पुरुषोव्यक्त ईक्षते ॥
१७॥
सर्ग--सृष्टि का; आदौ--प्रारम्भ में; प्रकृतिः:-- भौतिक प्रकृति; हि--निस्सन्देह; अस्य--इस ब्रह्माण्ड का; कार्य--प्रकट फल;कारण--तथा सूक्ष्म कारण; रूपिणी --साकार; सत्त्व-आदिभि:--सतो, रजो तथा तमो; गुणैः--गुणों द्वारा; धत्ते--अपना पदग्रहण करता है; पुरुष:--परमे श्वर; अव्यक्त:-- भौतिक अभिव्यक्ति में जो लोग न हो; ईक्षते--देखता है
सृष्टि के प्रारम्भ में सतो, रजो तथा तमोगुणों के द्वारा प्रकृति इस ब्रह्माण्ड में समस्त सूक्ष्मकारणों तथा स्थूल अभिव्यक्तियों से युक्त होकर अपना रूप ग्रहण करती है। भगवान् भौतिकअभिव्यक्ति की पारस्परिक क्रिया में प्रविष्ट नहीं होता, अपितु प्रकृति पर केवल दृष्टिपात करताहै।
व्यक्तादायो विकुर्वाणा धातव: पुरुषेक्षया ।लब्धवीर्या: सृजन्त्यण्डं संहता: प्रकृतेबलातू ॥
१८ ॥
व्यक्त-आदय: --महत्_ तत्त्व इत्यादि; विकुर्वाणा: --रूपान्तरित होने वाले; धातव:--तत्त्व; पुरुष-- भगवान् की; ईक्षया--चितवन से; लब्ध--प्राप्त हुआ; वीर्या:--उनकी शक्तियाँ; सृजन्ति--सृष्टि करती हैं; अण्डम्--ब्रह्माण्ड; संहता:--घुला-मिला;प्रकृते:--प्रकृति का; बलात्ू--बल द्वारा |
जब महत् तत्त्व आदि भौतिक तत्त्व रूपान्तरित होते हैं, तो वे भगवान् के दृष्टिपात से अपनीविशिष्ट शक्तियाँ प्राप्त करते हैं। वे प्रकृति की शक्ति के मिलने-जुलने से विश्व अंडा ( ब्रह्माण्ड )उत्पन्न करती हैं।
सप्तैव धातव इति तत्रार्था: पञ्ञन खादयः ।ज्ञानमात्मोभयाधारस्ततो देहेन्द्रयासवः ॥
१९॥
सप्त--सात; एव--निस्सन्देह; धातव:--तत्त्व; इति--इस प्रकार कह कर; तत्र--वहाँ; अर्था:--भौतिक तत्त्व; पञ्ञ--पाँच;ख-आदयः--आकाश इत्यादि; ज्ञामम्ू--ज्ञान का स्वामी आत्मा; आत्मा--परमात्मा; उभय--दोनों का ( जीव, जो कि द्रष्टा हैतथा दृष्ट प्रकृति )) आधार: --मूलभूत आधार; तत:--इनसे; देह--शरीर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; असब:ः--तथा जीवनदायी वायु
कुछ दार्शनिकों के अनुसार तत्त्व सात हैं। ये हैं--पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश।इसी के साथ चेतन आत्मा तथा परमात्मा भी सम्मिलित हैं, जो भौतिक तत्त्वों तथा सामान्यआत्मा दोनों ही के आधाररूप हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार शरीर, इन्द्रियाँ, प्राण-वायु तथा अन्यसारे भौतिक कार्य इन्हीं सात तत्त्वों से उत्पन्न हैं।
षडित्यत्रापि भूतानि पतञ्ञ षष्ठ: परः पुमान् ।तैर्युडत आत्मसम्भूतै: सृष्ठेदं समपाविशत् ॥
२०॥
घट्--छह; इति--इस सिद्धान्त में; अत्र--इस सिद्धान्त में; अपि-- भी; भूतानि--तत्त्व; पञ्म-- पाँच; षष्ठ:--छठा; पर: --दिव्य; पुमान्ू-- भगवान्; तैः--उन ( पाँच स्थूल तत्त्वों ) से; युक्त:--जुड़ा; आत्म--अपने से; सम्भूतै:ः--उत्पन्न; सृष्ठा --निर्मितकर; इृदम्--यह सृष्टि; समुपाविशत्--उन्होंने भीतर प्रवेश किया।
अन्य दार्शनिकों का कहना है कि तत्त्व छः हैं--पाँच तो भौतिक तत्त्व ( पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु तथा आकाश ) हैं तथा छठा तत्त्व भगवान् है। वही भगवान् जो अपने से निकले हुए तत्त्वोंसे युक्त होकर इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि करते हैं और तब स्वयं उसके भीतर प्रवेश करते हैं।
चत्वार्येबेति तत्रापि तेज आपोऊच्नमात्मन: ।जातानि तैरिदं जातं जन्मावयविन: खलु ॥
२१॥
चत्वारि--चार; एव-- भी; इति--इस प्रकार; तत्र--उस दशा में; अपि-- भी; तेज: --अग्नि; आप:--जल; अन्नमू--पृथ्वी;आत्मन:--आत्मा से; जातानि--उत्पन्न; तैः--उनके द्वारा; इदमू--यह जगत; जातमू्--उत्पन्न हुआ; जन्म--जन्म; अवयविन:--प्रकट फल का; खलु--निस्सन्देह
कुछ दार्शनिक चार मूलभूत तत्त्वों की उपस्थिति का अनुमोदन करते हैं जिनमें से अग्नि,जल तथा पृथ्वी--ये तीन तत्त्व एक चौथे तत्त्व आत्मा से उद्भूत हैं। एक बार अस्तित्व में आनेपर ये तत्त्व विराट जगत उत्पन्न करते हैं जिसमें सारा भौतिक सृजन होता है।
सड्ख्याने सप्तदशके भूतमात्रेन्द्रियाणि च ।पञ्ञ पञ्जलैकमनसा आत्मा सप्तदशः स्मृत: ॥
२२॥
सड्ख्याने--गणना में; सप्तदशके --सत्रह तत्त्वों के रूप में; भूत--पाँच स्थूल तत्त्व; मात्र--पाँचों की सूक्ष्म अनुभूतियाँ;इन्द्रियाणि--तथा पाँच संगत इन्द्रियाँ; च-- भी; पञ्ञ पञ्ञ--पाँच पाँच के समूहों में; एक-मनसा--एक मन के साथ साथ;आत्मा--आत्मा; सप्तदश:--सत्रहवाँ; स्मृत:--ऐसा माना जाता है।
कुछ लोग सत्तरह मूलभूत तत्त्वों के अस्तित्व की गणना करते हैं--ये हैं पाँच स्थूल तत्त्व,पाँच इन्द्रिय-विषय, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, मन तथा सत्तरहवाँ आत्मा।
तद्वत्योडशसड्ख्याने आत्मैव मन उच्यते ।भूतेन्द्रियाणि पञ्जैब मन आत्मा त्रयोदश ॥
२३॥
तद्बत्ू--इसी तरह; षोडश-सड्ख्याने--सोलह की गणना में; आत्मा--आत्मा; एव--निस्सन्देह; मन: --मन के रूप में;उच्यते--पहचाना जाता है; भूत--पाँच स्थूल तत्त्व; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; पञ्ञ--पाँच; एब--निश्चय ही; मन:ः--मन; आत्मा--आत्मा ( आत्मा तथा परमात्मा दोनों ); त्रयोदश--तेरह |
सोलह तत्त्वों की गणना करने पर पिछले सिद्धान्त से केवल इतना ही अन्तर होता है किआत्मा की पहचान मन से कर ली जाती है। यदि हम पाँच भौतिक तत्त्वों, पाँच इन्द्रियों, मन,आत्मा तथा परमेश्वर की कल्पना करें, तो तत्त्वों की संख्या तेरह होती है।
एकादशत्व आत्मासौ महाभूतेन्द्रियाणि च ।अष्टौ प्रकृतयश्चैव पुरुषश्च नवेत्यथ ॥
२४॥
एकादशत्वे--ग्यारह के विचार में; आत्मा--आत्मा; असौ--यह; महा- भूत--स्थूल तत्त्व; इन्द्रयाणि--इन्द्रियाँ; च--तथा;अष्टौ--आठ; प्रकृतयः --प्राकृतिक तत्त्व ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा अहंकार ); च--भी; एब--निश्चय ही; पुरुष:--परमे श्वर; च--तथा; नव--नव; इति--इस प्रकार; अथ--और भी |
ग्यारह की गणना में आत्मा, स्थूल तत्त्व तथा इन्द्रियाँ आती हैं। आठ स्थूल तथा सूक्ष्म तत्त्वोंके साथ परमेश्वर को मिलाने पर नौ की संख्या हो जाती है।
इति नानाप्रसड्ख्यानं तत्त्वानामृषिभि: कृतम् ।सर्व न्याय्यं युक्तिमत्त्वाद्विदुषां किमशोभनम् ॥
२५॥
इति--इसी तरह से; नाना--विविध; प्रसड्ख्यानम्--गणना; तत्त्वानाम्ू-तत्त्वों की; ऋषिभि: --ऋषियों द्वारा; कृतम्--कियागया; सर्वम्--यह सारा; न्याय्यमू-तार्किक; युक्ति-मत्त्वात्--युक्तियुक्त होने से; विदुषाम्-विद्वानों के; किमू-क्या;अशोभनम्-प्रखरता का अभाव
इस तरह दार्शनिकों ने भौतिक तत्त्वों का विश्लेषण अनेक प्रकारों से किया है। उनके सारेप्रस्ताव युक्तियुक्त हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त तर्क के साथ प्रस्तुत किया गया है। निस्सन्देह ऐसीतार्किक प्रखरता की आशा वास्तविक विद्वानों से ही की जाती है।
श्रीउद्धव उवाचप्रकृति: पुरुषश्चोभौ यद्यप्यात्मविलक्षणौ ।अन्योन्यापाश्रयात्कृष्ण हृश्यते न भिदा तयो: ।प्रकृतौ लक्ष्यते ह्यात्मा प्रकृतिश्चव तथात्मनि ॥
२६॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; प्रकृति:--प्रकृति; पुरुष: -- भोक्ता, जीव; च--तथा; उभौ--दोनों; यदि अपि--यद्यपि;आत्म--स्वाभाविक रूप से; विलक्षणौ--सुस्पष्ट, भिन्न; अन्योन्य--पारस्परिक; अपाश्रयात्--आश्रय के कारण; कृष्ण--हेकृष्ण; दृश्यते न--दिखाई नहीं पड़ता; भिदा--कोई अन्तर; तयो:--उनके मध्य; प्रकृतौ--प्रकृति में; लक्ष्यते-- आभास होता है;हि--निस्सन्देह; आत्मा--आत्मा; प्रकृति:--प्रकृति; च--तथा; तथा-- भी; आत्मनि--आत्मा में |
श्री उद्धव ने पूछा : हे कृष्ण, यद्यपि स्वभाव से प्रकृति तथा जीव भिन्न हैं, किन्तु उनमें कोईअन्तर नहीं दिखता क्योंकि वे एक-दूसरे के भीतर निवास करते पाये जाते हैं। इस तरह आत्माप्रकृति के भीतर और प्रकृति आत्मा के भीतर प्रतीत होती है।
एवं मे पुण्डरीकाक्ष महान्तं संशय हृदि ।छेत्तुमहसि सर्वज्ञ वचोभिर्नयनैपुणै: ॥
२७॥
एवम्--इस प्रकार; मे--मेरा; पुण्डरीक-अक्ष--हे कमलनयन भगवान्; महान्तम्-महान्; संशयम्--सन्देह को; हृदि--मेंरेहृदय के भीतर; छेत्तुमू--काट देना; अहसि--आपको चाहिए कि; सर्व-ज्ञ-हे सर्वज्ञाता; बचोभि:--अपने शब्दों से; नय--तर्क में; नैपुणैः--अत्यन्त निपुण |
हे कमलनयन कृष्ण, हे सर्वज्ञ, कृपया आप अपने उन शब्दों से मेरे हृदय के इस महान्संशय को छिन्न-भिन्न कर दें जो आपकी परम तर्क-पटुता को दिखलाने वाले हैं।
त्वत्तो ज्ञानं हि जीवानां प्रमोषस्तेउत्र शक्तित: ।त्वमेव ह्यात्ममायाया गतिं वेत्थ न चापर: ॥
२८॥
त्वत्तः:--आपसे; ज्ञानम्ू--ज्ञान; हि--निस्सन्देह; जीवानाम्ू--सजीव प्राणियों का; प्रमोष:--चुराया जाना; ते--आपका; अत्र--इस ज्ञान में; शक्तित:--शक्ति से; त्वमू--आप; एव--एकमात्र; हि--निस्सन्देह; आत्म--आपकी ; मायाया: --माया का;गतिमू--असली स्वभाव; वेत्थ--आप जानते हैं; न--नहीं; च--तथा; अपर:ः--कोई अन्य व्यक्ति।
आपसे ही जीवों का ज्ञान उदय होता है और आपकी शक्ति से वह ज्ञान चला जाता है।निस्सन्देह, आपके अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति आपकी माया के असली स्वभाव को नहीं जानसकता।
श्रीभगवानुवाचप्रकृति: पुरुषश्चेति विकल्प: पुरुषर्षभ ।एष वैकारिक: सर्गो गुणव्यतिकरात्मकः ॥
२९॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; प्रकृति:--प्रकृति; पुरुष:-- भोक्ता, जीव; च--तथा; इति--इस प्रकार; विकल्प: --पूर्ण अन्तर; पुरुष-ऋषभ--हे पुरुषों में श्रेष्ठ; एष:--यह; वैकारिक:--रूपान्तरशील; सर्ग:--सृष्टि; गुण--प्रकृति के गुणों के;व्यतिकर--विक्षोभ पर; आत्मक:--आधारित ।
भगवान् ने कहा : हे पुरुष- श्रेष्ठ, प्रकृति तथा इसका भोक्ता स्पष्ट रूप से पृथक् पृथक हैं।यह व्यक्त सृष्टि प्रकृति के गुणों के विक्षोभ पर आधारित होने के कारण निरन्तर रूपान्तरित होतीरहती है।
ममाड़ माया गुणमय्यनेकधाविकल्पबुद्धी श्व गुणर्विधत्ते ।वैकारिकस्त्रिविधो ध्यात्ममेक-मथाधिदेवमधिभूतमन्यत् ॥
३०॥
मम--मेरा; अड़--हे उद्धव; माया--भौतिक शक्ति; गुण-मयी--तीन गुणों वाली; अनेकधा--कई प्रकार के; विकल्प--विभिन्न स्वरूप; बुद्धी:--तथा इन अन्तरों की अनुभूतियाँ; च--तथा; गुणै:--गुणों के द्वारा; विधत्ते--स्थापित करती हैं;वैकारिकः--विकारों ( परिवर्तनों ) की पूरी अभिव्यक्ति; त्रि-विध:--तीन पक्षों वाला; अध्यात्मम्ू--अध्यात्म कहलाने वाला;एकम्--एक; अथ--तथा; अधिदैवम्-- अधिदेव; अधिभूतम्--अधिभूत; अन्यत्--दूसरा |
हे उद्धव, मेरी माया तीन गुणों वाली है और वह उन्हीं के माध्यम से कार्य करती है। सृष्टि कीविविधताओं को उनकी अनुभूति करने के लिए वह चेतना की विविधताओं समेत प्रकट करती है। भौतिक परिवर्तन का व्यक्त परिणाम तीन रूपों में समझा जाता है--अध्यात्मिक, अधिदैविकतथा अधिभौतिक।
हग् रूपमार्क वपुरत्र रन्श्रेपरस्परं सिध्यति यः स्वतः खे ।आत्मा यदेषामपरो य आद्यःस्वयानुभूत्याखिलसिद्धसिद्धि: ॥
३१॥
हक्--दृष्टि का कार्य ( यथा अध्यात्म ); रूपम्--हृश्य रूप ( यथा अधिभूत ); आर्कम्--सूर्य का; वपु:--आंशिक बिम्ब ( यथाअधिदैव ); अत्र--इस; रन्श्रे--( आँख की पुतली के ) छिद्र में; परस्परमू-- आपस में; सिध्यति--एक-दूसरेकी अभिव्यक्तिकरता है; यः--जो; स्वतः--अपनी शक्ति से; खे--आकाश में; आत्मा--परमात्मा; यत्--जो; एषाम्--इन ( तीन रूपों ) का;अपरः--पृथक् ; यः--जो; आद्य:--आदि कारण; स्वया--अपने से; अनुभूत्या--दिव्य अनुभव; अखिल--समस्त; सिद्ध--प्रकट घटना; सिद्द्धिः--अभिव्यक्ति का स्त्रोत)
इृष्टि, दहृश्यरूप तथा आँख के छिद्र के भीतर सूर्य का बिम्ब--ये तीनों मिल कर एक दूसरेको प्रकट करने का कार्य करते हैं। किन्तु आकाश में स्थित आदि सूर्य स्वतः प्रकट है। इसी तरहसमस्त जीवों का आदि कारण परमात्मा, जो सबों से पृथक् है, अपने ही दिव्य अनुभव केप्रकाश से, समस्त प्रकट होने वाली वस्तुओं के परम स्त्रोत के रूप में कार्य करता है।
एवं त्वगादि श्रवणादि चश्लु-जिह्वादि नासादि च चित्तयुक्तम् ॥
३२॥
एवम्--इसी तरह से; त्वक्-आदि--त्वचा, स्पर्श की अनुभूति तथा वायुदेव; श्रवण-आदि--कान, ध्वनि की अनुभूति तथादिशाओं के देव; चक्षु:ः--आँखें ( पिछले श्लोक में वर्णित ); जिह्वा-अदि--जीभ स्वाद की अनुभूति तथा वरुण देव; नास-आदि--नाक प्राण की अनुभूति तथा अश्विनी कुमार; च--भी; चित्त-युक्तम्--चेतना समेत
इसमें न केवल बद्ध चेतना तथाउसका विषय एवं अधिष्ठाता वासुदेव के साथ मन, चिंतन का विषय तथा चन्द्र देव, बुद्धि तथा ब्रह्मा, अहंकार तथा रुद्र देवसम्मिलित हैं ),इसी तरह से त्वचा, कान, आँखें, जीभ तथा नाक जैसी इन्द्रियाँ तथा सूक्ष्म शरीर के कार्यो--यथा बद्ध चेतना, मन, बुद्धि तथा अहंकार--की व्याख्या इन्द्रिय, अनुभूति के विषयतथा अधिष्ठाता देव के तेहरे अन्तर के रूप में की जा सकती है।
योउसौ गुणक्षोभकृतो विकारःप्रधानमूलान्महतः प्रसूतः ।अहं त्रिवृन्मोहविकल्पहेतु-वैकारिकस्तामस ऐन्द्रियश्व ॥
३३॥
यः असौ--यह; गुण--प्रकृति के गुणों के; क्षोभ--श्षुब्ध होने से; कृत:--उत्पन्न; विकार: --रूपान्तर; प्रधान-मूलात्ू--प्रधानसे उत्पन्न; महत:ः--महत तत्त्व से; प्रसूत:--उत्पन्न; अहमू--अहंकार; त्रि-वृतू--तीन अवस्थाओं में; मोह--मोह का; विकल्प--भौतिक विविधता; हेतु:--कारण; वैकारिक:--सतोगुण में सात्विक; तामसः--तमोगुण में तामस; ऐन्द्रियः--रजोगुणी राजस;च-तथा।
जब प्रकृति के तीनों गुण विश्लुब्ध होते हैं, तो जो विकार उत्पन्न होता है, वह अहंकार तत्त्वकी तीन अवस्थाओं में प्रकट होता है--ये हैं सात्विक, तामस तथा राजस। यह अहंकार जो महततत्त्व से उत्पन्न होता है और जो स्वयं भी अव्यक्त प्रधान से उत्पन्न है, समस्त भौतिक मोह तथा द्वैतका कारण बन जाता है।
आत्मापरिज्ञानमयो विवादोहास्तीति नास्तीति भिदार्थनिष्ठ: ।व्यर्थोडपि नैवोपरमेत पुंसांमत्त: परावृत्तधियां स्वलोकात् ॥
३४॥
आत्म--परमात्मा का; अपरिज्ञान-मय: --पूर्ण ज्ञान के अभाव पर आधारित; विवाद:--काल्पनिक तर्क-वितर्क; हि--निस्सन्देह; अस्ति--( यह जगत ) सत्य है; इति--ऐसा कहते हुए; न अस्ति--सत्य नहीं है; इति--ऐसा कहते हुए; भिदा--भौतिक अन्तर; अर्थ-निष्ठ:--विवाद का केन्द्रबिन्दु मानते हुए; व्यर्थ:--व्यर्थ; अपि--यद्यपि; न--नहीं; एव--निश्चय ही;उपरमेत--शान्त हो जाते हैं; पुंसाम्ू--मनुष्यों के लिए; मत्त:--मुझसे; परावृत्त--विमुख; धियाम्--ध्यान; स्व-लोकात्--जोउनसे अभिन्न हैं
दार्शनिकों का यह काल्पनिक विवाद कि, 'यह जगत सत्य है, अथवा यह जगत सत्य नहींहै' परमात्मा के अपूर्ण ज्ञान पर आधारित है और भौतिक द्वैत को समझने के लिए ही है। यद्यपिऐसा विवाद व्यर्थ है किन्तु जिन व्यक्तियों ने अपने वास्तविक आत्म रूप मुझसे, अपना ध्यानहटा लिया है, वे इसे त्याग पाने में असमर्थ हैं।
श्रीउद्धव उवाचत्वत्त: परावृत्तधिय: स्वकृतैः कर्मभिः प्रभो ।उच्चावचान्यथा देहान्गृह्लन्ति विसृजन्ति च ॥
३५॥
तन्ममाख्याहि गोविन्द दुर्विभाव्यमनात्मभि: ।न होतत्प्रायशो लोके विद्वांस: सन्ति वश्धिता: ॥
३६॥
श्री-उद्धवः उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; त्वत्तः--आप से; परावृत्त--पराड्मुख; धिय:--जिनके मन; स्व-कृतैः --अपने द्वाराकिये गये; कर्मभि:--सकाम कर्मों से; प्रभो--हे प्रभु; उच्च-अवचानू--उच्चतर तथा निम्नतर; यथा--जिस तरह; देहानू--भौतिक शरीरों को; गृह्न्ति-- स्वीकार करते हैं; विसृजन्ति--त्याग देते हैं; च--तथा; तत्--वह; मम--मुझसे; आख्याहि--कृपा करके बतलाइये; गोविन्द--हे गोविन्द; दुर्विभाव्यमू--समझना असम्भव; अनात्मभि:--जो बुद्द्धिमान नहीं हैं उनके द्वारा;न--नहीं; हि--निस्सन्देह; एतत्--इसके विषय में; प्रायश:-- अधिकांशत: ; लोके --इस जगत में; विद्वांस:--जानने योग्य;सन्ति--हैं; वश्चिता:--ठगेहुए ( माया द्वारा ) |
श्री उद्धव ने कहा : हे परम स्वामी, सकाम कर्मियों की बुद्धि निश्चय ही आपसे विमुख होतीहै। अतः कृपा करके यह बतलायें कि ऐसे लोग किस तरह अपने भौतिकतावादी कार्यो से उच्चतथा निम्न शरीर ग्रहण करते हैं और फिर उनका त्याग करते हैं? हे गोविन्द, यह विषय मूर्खो कीसमझ में आने वाला नहीं है। वे इस जगत में माया से ठगे जाने पर भी इस तथ्य से अवगत नहींहो पाते।
श्रीभगवानुवाचमनः कर्ममयं णृणामिन्द्रिये: पञ्नभिर्युतम् ।लोकाल्लोकं प्रयात्यन्य आत्मा तदनुवर्तते ॥
३७॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; मन:ः--मन; कर्म-मयम्--कर्म द्वारा निर्मित; नृणाम्--मनुष्यों की; इन्द्रिये:--इन्द्रियोंसमेत; पशञ्चञभिः--पाँच; युतम्--संयुक्त; लोकात्--एक संसार से; लोकम्--दूसरे जगत को; प्रयाति--यात्रा करता है; अन्य: --पृथक्; आत्मा--आत्मा; तत्--वह मन; अनुवर्तते--अनुगमन करता है।
भगवान् कृष्ण ने कहा : मनुष्यों का भौतिक मन सकाम कर्मों के फल से निर्मित होता है।वह पाँच इन्द्रियों के साथ एक शरीर से दूसरे शरीर में विचरण करता है। यद्यपि आत्मा मन सेभिन्न है, किन्तु वह उसका अनुगमन करता है।
ध्यायन्मनोनु विषयान्दष्टान्वानुश्रुतानथ ।उद्यत्सीदत्कर्मतन्त्रं स्मृतिस्तदनु शाम्यति ॥
३८ ॥
ध्यायत्-- ध्यान करता; मन:--मन; अनु--नियमित रूप से; विषयान्--इन्द्रिय-विषयों को; दृष्टानू--देखा हुआ; वा--अथवा;अनुश्रुतान्--वैदिक प्रमाण से सुना हुआ; अथ--फलस्वरूप; उद्यत्--उदय होता; सीदत्--विलीन करते; कर्म-तन्त्रमू--सकामकर्मो के फलों से बँधा; स्मृति:--स्मृति; तत् अनु--उसके बाद; शाम्यति--नष्ट हो जाता है।
सकाम कर्मों के फलों से बँधा हुआ मन सदैव उन इन्द्रिय-विषयों का ध्यान करता है, जोइस जगत में दिखते हैं और उन विषयों का भी जो वैदिक विद्वानों से सुने जाते हैं। फलस्वरूपमन अपनी अनुभूति की वस्तुओं के साथ उत्पन्न और विनष्ट होता प्रतीत होता है। इस तरह भूततथा भविष्य में अन्तर करने की इसकी क्षमता जाती रहती है।
विषयाभिनिवेशेन नात्मानं यत् स्मरेत्युन: ।जन्तोर्वे कस्यचिद्धेतोर्मुत्युरत्यन्तविस्मृति: ॥
३९॥
विषय--नवीन अनुभूति के विषयों में; अभिनिवेशेन--तल्लीनता से; न--नहीं; आत्मानम्-- अपने पूर्व आत्मा को; यतू--जिसस्थिति में; स्मरेत्--स्मरण करता है; पुन:--और आगे; जन्तोः--जीव का; बै--निस्सन्देह; कस्यचित् हेतो:--किसी न किसीबहाने; मृत्यु:--मृत्यु नामक; अत्यन्त--पूर्ण; विस्मृतिः--विस्मरण |
जब जीव वर्तमान शरीर से दूसरे शरीर में जाता है, जो उसके अपने कर्म से उत्पन्न होता है,तो वह नये शरीर की आनन्दप्रद तथा पीड़ादायक अनुभूतियों में लीन हो जाता है और पहलेवाले शरीर के अनुभव को पूरी तरह भूल जाता है। इस तरह से पूर्व भौतिक पहचान की पूर्णविस्मृति, जो किसी न किसी बहाने उत्पन्न होती है, मृत्यु कहलाती है।
जन्म त्वात्मतया पुंस: सर्वभावेन भूरिद ।विषयस्वीकृतिं प्राहुर्यथा स्वप्नमनोरथ: ॥
४०॥
जन्म--जन्म; तु--तथा; आत्मतया-- अपने साथ पहचान से; पुंसः--पुरुष की; सर्व-भावेन--पूरी तरह; भूरि-द--हे अत्यन्तदानी उद्धव; विषय--शरीर का; स्वी-कृतिम्--स्वीकृति; प्राहु:--कहलाती है; यथा--जिस तरह; स्वप्न--सपना; मनः-रथ:--या मानसिक विलास।
हे परम दानी उद्धव, जिसे जन्म कहा जाता है, वह नवीन शरीर के साथ मनुष्य की पूर्णपहचान ही है। मनुष्य नया शरीर उसी तरह स्वीकार करता है, जिस तरह कोई स्वप्न के अनुभव या मनोविलास को सत्य मान लेता है।
स्वप्न॑ मनोरथं चेत्थ॑ प्राक्तनं न स्मरत्यसौ ।तत्र पूर्वमिवात्मानमपूर्वम्चानुपश्यति ॥
४१॥
स्वणम्--स्वण; मन:ः-रथम्--दिवास्वन; च--तथा; इत्थम्--इस प्रकार; प्राक्तनम्--पूर्ववर्ती; न स्मरति--स्मरण नहीं करता;असौ--वह; तत्र--उस ( वर्तमान शरीर ) में; पूर्वम्--पूर्ववर्ती, पिछला; इब--मानो; आत्मानम्--स्वयं; अपूर्वम्--जिसकाभूतकाल न हो; च--तथा; अनुपश्यति--देखता है|
जिस प्रकार मनुष्य स्वप्न या दिवास्वप्न का अनुभव करते हुए अपने पहले के स्वप्णों यादिवास्वप्नों को स्मरण नहीं रख पाता, उसी तरह अपने वर्तमान शरीर में स्थित मनुष्य इसके पूर्वविद्यमान होने पर भी यही सोचता है कि वह अभी हाल ही में उत्पन्न हुआ है।इन्द्रियायनसूष्टय्रेदं त्रैविध्यं भाति वस्तुनि ।श़ बहिरन्तर्भिदाहेतुर्जनीो उसज्जनकृद्यथा ॥
४२॥
इन्द्रिय-अयन--इन्द्रियों के वास ( मन ) द्वारा; सृष्ठदया--सृष्टि होने से ( नये शरीर के साथ पहचान से ); इदम्--यह; त्रै-विध्यम्--तीन प्रकार का ( उच्च, मध्य तथा निम्न श्रेणी का ); भाति--प्रकट होता है; वस्तुनि--वास्तविकता ( आत्मा ) में;बहि:ः--बाह्य; अन्त:--तथा आन्तरिक; भिदा--अन्तरों का; हेतु:--कारण; जन: --व्यक्ति; असत्-जन--बुरे व्यक्ति का;कृतू--जनक; यथा--जिस तरह
चूँकि मन, जो कि इन्द्रियों का आश्रय है, नवीन शरीर के साथ अपनी पहचान कर लेता हैअतएव उच्च, मध्यम तथा निम्न--ये तीन भौतिक श्रेणियाँ ऐसी प्रतीत होने लगती हैं मानोआत्मा की असलियत के भीतर उपस्थित हों। इस तरह आत्मा बाह्य तथा अन्त: द्वैत उत्पन्न करताहै, जिस तरह मनुष्य कुपुत्र को जन्म दे।
परत नित्यदा हाड़ भूतानि भवन्ति न भवन्ति च ।कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते ॥
४३॥
नित्यदा--निरन्तर; हि--निस्सन्देह; अड्भ--हे उद्धव; भूतानि--सूजित शरीर; भवन्ति--उत्पन्न होते हैं; न भवन्ति--नहीं रहते;च--तथा; कालेन--समय द्वारा; अलक्ष्य--अदृश्य; वेगेन--वेग से; सूक्ष्मत्वात्-- अत्यन्त सूक्ष्म होने से; तत्--वह; न दृश्यते--नहीं दिखलाई पड़ती।
हे उद्धव, भौतिक शरीर काल के अदृश्य तीब्र वेग से निरन्तर उत्पत्ति तथा विनाश को प्राप्तहोते रहते हैं। सूक्ष्म प्रकृति होने से काल को कोई देख नहीं पाता।
यथार्चिषां सत्रोतसां च फलानां वा वनस्पते: ।तथेव सर्वभूतानां वयोवस्थादय: कृता: ॥
४४॥
यथा--जिस तरह; अर्चिषाम्--दीपक की लौ; स््रोतसामू--नदी की धाराओं के; च--तथा; फलानाम्--फलों के; वा--अथवा; वनस्पते:--वृक्ष के; तथा--इस तरह; एव--निश्चय ही; सर्व-भूतानाम्--सारे शरीरों के; वयः--विभिन्न आयु के;अवस्था--अवस्था; आदय:--इत्यादि; कृता:--उत्पन्न की जाती हैं।
समस्त भौतिक शरीरों के रूपान्तर की विभिन्न अवस्थाएँ उसी तरह बदलती रहती हैं जिसतरह दीपक की लौ, नदी की धारा या वृक्ष के फल बदलते रहते हैं।
सोअयं दीपोडर्चिषां यद्वत्त्रोतसां तदिदं जलम् ।सोडयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीमृषायुषाम् ॥
४५॥
सः--यह; अयम्--वही; दीप:-- प्रकाश; अर्चिषाम्--दीपक की ज्योति; यद्वत्--जिस तरह; स्त्रोतसाम--नदी के भीतर बहनेवाली धाराओं के; तत्--वह; इृदम्--वही; जलम्--जल; सः--यह; अयम्--वही; पुमान्--व्यक्ति; इति--इस प्रकार;नृणाम्-मनुष्यों के; मृषा--झूठा; गीः--कथन; धी: --विचार; मृषा-आयुषाम्--व्यर्थ जीवन बिताने वालों के
यद्यपि दीपक-प्रकाश में प्रकाश की असंख्य किरणों का सृजन, रूपान्तर और क्षय होतारहता है, किन्तु मोहग्रस्त व्यक्ति जब क्षण-भर के लिए इस प्रकाश को देखता है, तो वह यहझूठी बात कहेगा, 'यह दीपक का वही प्रकाश है।' जिस तरह प्रवाहित नदी के जल को जोनिरन्तर बह कर आगे बढ़ता जाता है, किसी एक बिंदु को देख कर कोई यह मिथ्या कहे, 'यहनदी का वही जल है।' इसी तरह यद्यपि मनुष्य का शरीर निरन्तर परिवर्तित होता रहता है, किन्तुजो लोग अपने जीवन को व्यर्थ गँवाते हैं, वे झूठे ही यह सोचते और कहते हैं कि शरीर कीप्रत्येक विशेष अवस्था उस व्यक्ति की असली पहचान है।
मा स्वस्थ कर्मबीजेन जायते सोप्ययं पुमान् ।प्रियते वामरो भ्रान्त्या यथाग्निर्दारुसंयुत: ॥
४६॥
मा--मत; स्वस्य--अपने ही; कर्म-बीजेन--कर्म के बीज से; जायते--जन्म लेता है; सः--वह; अपि--निस्सन्देह; अयम्--यह; पुमान्ू--पुरुष; प्रियते--मरता है; वा--अथवा; अमरः--अमर; भ्रान्त्या-- भ्रान्ति के कारण; यथा--जिस तरह; अग्नि:--अग्नि; दारु-काष्ट से; संयुत:--जुड़ी हुई
मनुष्य न तो पूर्वकर्म के बीज से जन्म लेता है न ही अमर होने के कारण मरता है। मोह केकारण जीव जन्म लेता तथा मरता प्रतीत होता है, जिस तरह काष्ठ के संसर्ग से अग्नि जलती औरफिर बुझती प्रतीत होती है।
निषेकगर्भजन्मानि बाल्यकौमारयौवनम् ।वयोमध्यं जरा मृत्युरित्यवस्थास्तनोर्नव ॥
४७॥
निषेक--गर्भस्थापन; गर्भ--गर्भवृद्धि; जन्मानि--तथा जन्म; बाल्य--बाल्यकाल, बचपन; कौमार--कुमार अवस्था;यौवनम्--तथा युवावस्था; वय:-मध्यम्ू--बीच की ( अधेड़ ) आयु; जरा--बुढ़ापा; मृत्यु:--मृत्यु; इति--इस प्रकार;अवस्था:--अवस्थाएँ; तनो:--शरीर की; नव--नौ |
गर्भस्थापन, गर्भवृद्धि, जन्म, बाल्यावस्था, कुमारावस्था, युवावस्था, अधेड़ आयु, बुढ़ापातथा मृत्यु--ये शरीर की नौ अवस्थाएँ हैं।
एता मनोरथमयीरहन्यस्योच्चावचास्तनू: ।गुणसड्भादुपादत्ते क्वचित्कश्चिजहाति च ॥
४८॥
एता:--ये; मन:ः-रथ:-मयी:--मन के चिंतन द्वारा प्राप्त; ह--निश्चय ही; अन्यस्य--( आत्मा से पृथक् ) शरीर का; उच्च--बड़ा;अवचा:--तथा छोटा; तनू: --शारीरिक अवस्था; गुण-सझत्-प्रकृति के गुणों की संगति करने से; उपादत्ते--स्वीकार करताहै; क्वचित्ू--कभी कभी; कश्चित्--कोई; जहाति--त्याग देता है; च--तथा
यद्यपि भौतिक शरीर आत्मा से भिन्न है, किन्तु भौतिक संगति के कारण उत्पन्न अज्ञान सेमनुष्य झूठे ही अपनी पहचान उच्च तथा निम्न शारीरिक अवस्थाओं से करता है। कभी कभीभाग्यशाली व्यक्ति ऐसी मनोकल्पना को त्यागने में समर्थ होता है।
आत्मनः पितृपुत्रा भ्यामनुमेयौ भवाप्ययौ ।न भवाप्ययवस्तूनामभिज्ञो द्वयलक्षण: ॥
४९॥
आत्मन:--अपना ही; पितृ-पिता या पूर्वजों; पुत्राभ्यामू-तथा पुत्र से; अनुमेयौ--यह अनुमान लगाया जा सकता है; भव--जन्म; अप्ययौ--तथा मृत्यु; न--नहीं है; भव-अप्यय-वस्तूनाम्ू--जन्म तथा मृत्यु के अधीन सारी वस्तुओं का; अभिज्ञ:--भलीभाँति जानने वाला; द्वय--इन द्वैतों से; लक्षण:--लक्षित होता है।
अपने पिता या पितामह की मृत्यु से मनुष्य अपनी मृत्यु का अनुमान लगा सकता है औरअपने पुत्र के जन्म से वह अपने जन्म की अवस्था समझ सकता है। इस तरह जो व्यक्तियथार्थरूप से भौतिक शरीरों की उत्पत्ति को समझ लेता है, वह इन द्वैतों में नहीं पड़ता।
तरोबीजविपाकाभ्यां यो दिद्वाज्न्मसंयमौ ।तरोर्विलक्षणो द्रष्टा एवं द्रष्ठा तनो: पृथक् ॥
५०॥
तरो:--वृक्ष का; बीज--बीज; विपाकाभ्याम्--परिपक्वता; य:--जो ; विद्वान्--ज्ञानी; जन्म--जन्म; संयमौ--तथा मृत्यु के;तरो:--वृक्ष से; विलक्षण:--स्पष्ट; द्रष्टा--साक्षी; एवम्--इसी तरह से; द्रष्टा--साक्षी; तनो:-- भौतिक शरीर का; पृठक्--पृथक् है।
जो व्यक्ति बीज से वृक्ष को जन्म लेते देखता है और परिपक्वता प्राप्त करने पर उस वृक्ष कीमृत्यु को भी देखता है, वह निश्चित रूप से वृक्ष से पृथक् रह कर स्पष्ट साक्षी बन जाता है। इसीतरह भौतिक शरीर के जन्म तथा मृत्यु का साक्षी शरीर से पृथक् रहता है।
प्रकृतेरेवमात्मानमविविच्याबुध: पुमान् ।तत्त्वेन स्पर्शसम्मूढ: संसारं प्रतिपद्यते ॥
५१॥
प्रकृते:--भौतिक प्रकृति से; एबम्--इस प्रकार; आत्मानम्--आत्मा; अविविच्य-- भेद न कर पाने से; अबुध:--अज्ञानी;पुमान्ू--पुरुष; तत्त्वेन--( भौतिक वस्तुओं को ) असली समझ कर; स्पर्श--स्पर्श से; सम्मूढ:--पूर्णतया मोहित; संसारम्--भव-चक्र ; प्रतिपद्यते--प्राप्त करता है
अज्ञानी व्यक्ति अपने को प्रकृति से अलग न समझ पाने से प्रकृति को सत्य समझता है।इसके सम्पर्क से वह पूर्णतया मोहित हो जाता है और संसार-चक्र में प्रवेश करता है।
सत्त्वसड्भाहृषीन्देवात्रजसासुरमानुषान् ।तमसा भूततिर्यक्त्वं भ्रामितो याति कर्मभि; ॥
५२॥
सत्त्व-सड्रात्-सतोगुण के साथ से; ऋषीन्--ऋषियों को; देवान्ू--देवताओं को; रजसा--रजोगुण के द्वारा; असुर--असुरोंको; मानुषान्ू--तथा मनुष्यों को; तमसा--तमोगुण द्वारा; भूत-- भूतप्रेतों को; तिर्यक्तवम्--पशु-जगत को; भ्रामित:--घुमायागया; याति--जाता है; कर्मभि:ः--अपने सकाम कर्मों के कारण |
अपने सकाम कर्म के कारण घूमने के लिए बाध्य हुआ, बद्ध आत्मा सतोगुण के सम्पर्क सेऋषियों या देवताओं के बीच जन्म लेता है। रजोगुण के सम्पर्क से वह असुर या मनुष्य बनता हैऔर तमोगुण की संगति से वह भूतप्रेत या पशु-जगत में जन्म लेता है।
नृत्यतो गायतः पश्यन्यथेवानुकरोति तान् ।एवं बुद्धिगुणान्पश्यन्ननीहोप्यनुकार्यते ॥
५३॥
नृत्यतः--नाचते हुए पुरुष; गायत:--तथा गाते हुए; पश्यन्ू--देखते हुए; यथा--जिस तरह; एव--निस्सन्देह; अनुकरोति--अनुकरण करता है; तानू--उनको; एवम्--इस तरह; बुद्धि--बुद्धि का; गुणान्--अर्जित गुणों को; पश्यन्ू--देखते हुए;अनीहः --स्वयं कार्य में रत न होकर; अपि--फिर भी; अनुकार्यते--अनुकरण कराया जाता है।
जिस तरह नाचते तथा गाते हुए व्यक्तियों को देख कर कोई व्यक्ति उनका अनुकरण करताहै, उसी तरह आत्मा सकाम कर्मो का कर्ता न होते हुए भी, भौतिक बुद्धि द्वारा मोहित हो जाता हैऔर उसके गुणों का अनुकरण करने के लिए बाध्य हो जाता है।
यथाम्भसा प्रचलता तरवोपि चला इब ।चक्षुसा भ्राम्यमाणेन हृश्यते भ्रमतीव भू: ॥
५४॥
यथा मनोरथधियो विषयस्षानुभवो मृषा ।स्वणदृष्टाश्च दाशाई तथा संसार आत्मन: ॥
५५॥
यथा--जिस तरह; अम्भसा--जल द्वारा; प्रचलता--गतिवानू, चलायमान; तरव:--वृक्ष; अपि--निस्सन्देह; चला:--चलते हुए,गतिवान्; इब--; चक्षुषा--; भ्राम्यमाणेन--; दृश्यते--; भ्रमती--; इव--; भूः--; यथा--; मनः-रथ--; धिय:--;विषय-- अनुभव:-; मृषा--; स्वणज-दृष्ट: --; च--; दाशाई-- $ तथा--; संसार:--आत्मन:है दशाई
वंशज, आत्मा का भौतिक जीवन, इन्द्रियतृष्ति का उसका अनुभव वास्तव में उसीतरह झूठा होता है, जिस तरह क्षुब्ध जल में प्रतिबिम्बित वृक्षों का हिलना-डुलना या आँखों कोचारों ओर घुमाने से पृथ्वी का घूमना या कल्पना अथवा स्वण का जगत होता है।
अर्थ हाविद्यमानेपि संसृतिर्न निवर्तते ।ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेडनर्थागमो यथा ॥
५६॥
अर्थ--वास्तव में; हि--निश्चय ही; अविद्यमाने--न होते हुए; अपि-- भी; संसृतिः--जगत; न निवर्तते--रूकता नहीं;ध्यायत:--ध्यान करता; विषयानू--इन्द्रियतृप्ति की वस्तुओं का; अस्य--उसका; स्वप्ने--स्वप्न में; अनर्थ--अवांछित वस्तुका; आगम:ः--आना; यथा--जिस तरह ।
जो व्यक्ति इन्द्रियतृप्ति पर अपना ध्यान जमाये रखता है, उसके लिए भौतिक जीवनवास्तविक न होते हुए भी उसी तरह हट नहीं पाता जिस तरह स्वप्न के अरुचिकर अनुभव हटायेनहीं हटते।
तस्मादुद्धव मा भुड्छ््व विषयानसदिन्द्रिय: ।आत्माग्रहणनिर्भातं पश्य वैकल्पिकं भ्रमम् ॥
५७॥
तस्मात्--इसलिए; उद्धव--हे उद्धव; मा भुड्छ््व--मत भोग करो; विषयान्--इन्द्रिय-विषयों को; असत्--अशुद्ध; इन्द्रियै: --इन्द्रियों द्वारा; आत्म--आत्मा का; अग्रहण-- अनुभव करने की अक्षमता; निर्भातमू--जिसमेंप्रकट है; पश्य--इसे देखो;वैकल्पिकम्-- भौतिक द्वैत पर आधारित; भ्रमम्--मोह, भ्रम |
इसलिए हे उद्धव, तुम भौतिक इन्द्रियों से इन्द्रियतृप्ति भोगने का प्रयास मत करो। यह देखोकिस तरह भौतिक द्वैत पर आधारित भ्रम मनुष्य को आत्म-साक्षात्कार से रोकता है।
क्षिप्तोउबमानितोसद्धि: प्रलब्धोड्सूयितोथ वा ।ताडितः सन्निरुद्धो वा वृत्त्या वा परिहापित: ॥
५८ ॥
निष्ठ्युतो मूत्रितो वाज्जैर्बहुधैवं प्रकम्पितः ।श्रेयस्काम: कृच्छुगत आत्मनात्मानमुद्धरेत् ॥
५९॥
क्षिप्त:--अपमानित; अवमानित: --उपेक्षित; असद्द्धिः--बुरे व्यक्तियों द्वारा; प्रलब्ध: --उपहास किया गया; असूयित: --ईर्ष्याकिया गया; अथ वा--या फिर; ताडितः--ताड़ना दिया गया; सन्निरुद्ध:--बाँधा गया; वा--अथवा; वृत्त्या--अपनी जीविका-साधन का; वा--अथवा; परिहापित: --वंचित किया गया; निष्ठय्युतः--ऊपर थूका गया; मूत्रित:--पेशाब द्वारा दूषित कियागया; वा--अथवा; अज्जैः--मूर्खो द्वारा; बहुधा--बारम्बार; एवम्--इस प्रकार; प्रकम्पित:--विश्लुब्ध किया गया; श्रेय:-'काम:ः--जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य चाहने वाला; कृच्छु-गत:--कठिनाई का अनुभव करते हुए; आत्मना--अपनी बुद्धि से;आत्मानम्--अपने को; उद्धरेत्--बचाये |
जो व्यक्ति जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य को पाना चाहता है उसे बुरे लोगों द्वारा उपेक्षित होने,अपमानित किये जाने, उपहास या ईर्ष्या किये जाने पर या फिर अज्ञानी व्यक्तियों द्वारा बारम्बारमारे-पीटे जाने, बाँधे जाने या अपनी जीविका छीने जाने, अपने पर थूके जाने या अपने ऊपरपेशाब किए जाने जैसी कठिनाइयों के बावजूद, अपने आप को आध्यात्मिक पद पर सुरक्षितरखने के लिए, अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए।
श्रीउद्धव उवाच यथेवमनुबुध्येयं वद नो वदतां वर ॥
६०॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; यथा--कैसे; एवम्--इस प्रकार; अनुबुध्येयम्--मैं ठीक से समझूँ; बद--कृपा करकेबतलायें; न:--हमसे; बदताम्--समस्त वक्ताओं में; वर-- श्रेष्ठ |
श्री उद्धव ने कहा : हे श्रेष्ठ वक्ता, कृपा करके मुझे बतलायें कि मैं इसे किस तरह ठीक से समझूँ?सुदुःघहमिमं मन््य आत्मन्यसदतिक्रमम् ।विदुषामपि विश्वात्मन्प्रकृतिर्हि बलीयसी ।ऋते त्वद्धर्मनिरतान्शान्तांस्ते चरणालयान् ॥
६१॥
सु-दुःसहम्--अत्यन्त असहा; इमम्ू--इसे; मन्ये--मैं मानता हूँ; आत्मनि-- अपने ऊपर; असत्--अज्ञानी पुरुषों द्वारा;अतिक्रमम्--आक्रमणों को; विदुषाम्-दविद्वानों के लिए; अपि--भी; विश्व-आत्मन्--हे ब्रह्माण्डके आत्मा; प्रकृति:--मनुष्यका बद्ध व्यक्तित्व; हि--निश्चय ही; बलीयसी--अत्यन्त प्रबल; ऋते--के अतिरिक्त; त्वतू-धर्म--आपकी भक्ति में; निरतान्--लगे हुए; शान्तानू--शान्त; ते--आपके; चरण-आलयानू--चरणकमलों पर निवास करने वाले |
हे विश्वात्मा, मनुष्य का भौतिक जीवन में बंधन अत्यन्त प्रबल है; अतः अज्ञानी पुरुषों द्वाराकिये गये अपराधों को सह पाना बड़े बड़े विद्वानों के लिए भी अत्यन्त कठिन है। केवल आपकेवे भक्त, जो आपकी प्रेमाभक्ति में निरत हैं और जिन्होंने आपके चरणकमलों में रहते हुए शान्तिप्राप्त कर ली है, वे ऐसे अपराधों को सह पाने में सक्षम हैं।
