← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
>अध्याय तेईसवाँ: अवंती ब्राह्मण का गीत
श्रीबादरायणिरुवाचस एवमाशंसित उद्धवेनभागवतमुख्येन दाशाईमुख्य: ।सभाजयन्भृत्यवचो मुकुन्द-स्तमाबभाषे श्रवणीयवीर्य: ॥
१॥
श्री-बादरायणि: उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; सः--उसने; एवम्--इस प्रकार; आशंसित:--विनती किये जाने पर;उद्धवेन--उद्धव द्वारा; भागवत--भक्तों के; मुख्येन-- प्रमुख; दाशाह--दाशाई वंश ( यदुओं ) के; मुख्य:--प्रमुख;सभाजयन्ू- प्रशंसा करते हुए; भृत्य--उनके सेवक के; वच:--शब्द; मुकुन्दः--मुकुन्द, कृष्ण; तमू--उससे; आबभाषे --कहने लगे; श्रवणीय--सुनने योग्य; वीर्य:--जिसकी सर्वशक्तिमत्ता
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब भक्तों में श्रेष्ठ श्री उद्धव ने दाशाई प्रमुख भगवान् मुकुन्द सेइस तरह सादर अनुरोध किया, तो पहले उन्होंने अपने सेवक के कथन की उपयुक्तता स्वीकारकी। फिर वे भगवान्, जिनके यशस्वी कार्य सुनने के सर्वाधिक योग्य हैं, उन्हें बतलाने लगे।
श्रीभगवानुवाचबा्हस्पत्य स नास्त्यत्र साधुर्वें दुर्जनेरितेः ।दुरक्तैभिन्नमात्मानं यः समाधातुमी श्वर: ॥
२॥
श्री-भगवान् उवाच-- भगवान् ने कहा; बा्हईस्पत्य--हे बृहस्पति के शिष्य; सः--वह; न अस्ति--नहीं है; अत्र--इस जगत में;साधु:--साधु पुरुष; वै--निस्सन्देह; दुर्जन--असभ्य पुरुषों द्वारा; ईरितै:--प्रयोग में लाए गए; दुरुक्ते:--अपमानजनक शब्दोंसे; भिन्नमू--विचलित; आत्मानम्-- अपना मन; य:--जो; समाधातुम्--वश में करने में; ईश्वरः --समर्थ हो
श्रीकृष्ण ने कहा : हे बृहस्पति-शिष्य, इस जगत में कोई भी ऐसा साधु पुरुष नहीं है, जोअसभ्य व्यक्तियों के अपमानजनक शब्दों से विचलित हुए अपने मन को फिर से स्थिर कर सके।
न तथा तप्यते विद्धः पुमान्बाणैस्तु मर्मगैः ।यथा तुदन्ति मर्मस्था हासतां परुषेषव: ॥
३॥
न--नहीं; तथा--उसी तरह से; तप्यते--पीड़ा पहुँचाता है; विद्धः--बेधा गया; पुमान्--व्यक्ति; बाणैः--बाणों के द्वारा; तु--किन्तु; मर्म-गैः--हृदय तक जाने वाला, मर्मभेदी; यथा--जिस प्रकार; तुदन्ति--चुभते हैं; मर्म-स्था:--हृदय तक पहुँचने वाले;हि--निस्सन्देह; असताम्--दुष्ट पुरुषों के; परुष--कठोर ( वचन ); इषव:--तीर।
छाती को बेध कर हृदय तक पहुँचने वाले पैने बाण उतना कष्ट नहीं देते जितने कि असभ्यपुरुषों द्वारा बोले जाने वाले कटु, अपमानजनक शब्दरूपी तीर जो हृदय के भीतर धँस जाते हैं।
कथयन्ति महत्पुण्यमितिहासमिहोद्धव ।तमहं वर्णयिष्यामि निबोध सुसमाहितः ॥
४॥
कथयन्ति--कहते हैं; महत्--महान्; पुण्यम्--पवित्र; इतिहासमू--क था; इह--इस सम्बन्ध में; उद्धव--हे उद्धव; तम्--उसे;अहम्ू--ैं; वर्णयिष्यामि--कहूँगा; निबोध--सुनो; सु-समाहित:--ध्यानपूर्वक
हे उद्धव, इस सम्बन्ध में एक अत्यन्त पवित्र कथा कही जाती है, जिसे अब मैं तुमसे कहूँगा।तुम उसे ध्यानपूर्वक सुनो।
केनचिद्धिक्षुणा गीत॑ परिभूतेन दुर्जनैः ।स्मरता धृतियुक्तेन विपाक्क॑ निजकर्मणाम् ॥
५॥
केनचित्--किसी; भिक्षुणा--संन्यासी द्वारा; गीतम्--गाया गया; परिभूतेन--अपमानित किया गया; दुर्जनैः--अपवित्र लोगोंद्वारा; स्मरता--स्मरण करते हुए; धृति-युक्तेन--धैर्यपूर्वक; विपाकम्--परिणामों को; निज-कर्मणामू--अपने विगत कर्मो के |
एक बार किसी संन्यासी को दुर्जनों द्वारा नाना प्रकार से अपमानित किया गया। किन्तु उसनेधैर्यपूर्वक स्मरण किया कि वह अपने ही विगत कर्मों का फल भोग रहा है। मैं तुमसे यहइतिहास तथा उसने जो कुछ कहा था उसे सुनाऊँगा।
अवन्तिषु द्विज: कश्चिदासीदाढ्यतमः थिया ।वार्तावृत्ति: कदर्यस्तु कामी लुब्धोडतिकोपन: ॥
६॥
अवन्तिषु--अवन्ती देश में; द्विजः--ब्राह्मण; कश्चित्ू--कोई; आसीत्-- था; आढ्य-तम:--अत्यन्त धनाढ्य; अया--ऐश्वर्य से;वार्ता--व्यापार से; वृत्तिः:--अपनी जीविका चलाते हुए; कदर्य:--कंजूस; तु--लेकिन; कामी --विषयी; लुब्धक्--लालची;अति-कोपनः--अतत्यन्त क्रोध करने वाला
अवन्ती देश में किसी समय कोई ब्राह्मण रहता था, जो अत्यन्त धनी था और समस्त ऐश्वर्योसे युक्त था तथा व्यापार-कार्य में लगा रहता था। किन्तु वह अत्यन्त कंजूस, कामी, लालची तथाक्रोधी था।
ज्ञातयोतिथयस्तस्य वाड्मात्रेणापि नार्चिता: ।शून्यावसथ आत्मापि काले कामैरनर्चित: ॥
७॥
ज्ञातय: --सम्बन्धीजन; अतिथय:--तथा अतिथिगण; तस्य--उसके; वाक्-मात्रेण अपि--शब्दों से भी; न अर्चिता:--आदरितनहीं होते थे; शून्य-अवसथे--धर्म तथा इन्द्रियतृप्ति से विहीन घर में; आत्मा--स्वयं; अपि-- भी; काले--उपयुक्त समय में;कामै:--इन्द्रिय-सुख से; अनर्चितः--अतृप्त |
उसका घर धर्म तथा वैध इन्द्रियतृप्ति से विहीन था, उसमें पारिवारिक जनों तथा अतिथियोंका ठीक से, यहाँ तक कि शब्दों से भी, आदर नहीं होता था। वह उपयुक्त अवसरों पर अपनेशरीर की भी इन्द्रियतृष्ति नहीं होने देता था।
दुह्शीलस्य कदर्यस्य द्रह्नान्ते पुत्रबान्धवा: ।दारा दुहितरो भृत्या विषण्णा नाचरन्प्रियम् ॥
८ ॥
दुःशीलस्थ--बुरे चरित्र वाला; कदर्यस्य--कंजूस का; ब्रह्मन्ते--दुश्मनी कर लिया; पुत्र--उसके पुत्रों ने; बान्धवा:--तथासम्बन्धीजन; दारा:--उसकी पत्ती; दुहितरः--उसकी पुत्रियाँ; भृत्या:--उसके नौकर; विसण्णा: --ऊबे हुए; न आचरनू--आचरण नहीं करते थे; प्रियम्--स्नेहपूर्वक ।
चूँकि वह कठोर हृदय तथा कंजूस था, इसलिए उसके पुत्र, उसके ससुराल वाले, उसकीपतली, उसकी पुत्रियाँ तथा नौकर उसके प्रति वैर-भाव रखने लगे। ऊब जाने के कारण वे उससेकभी भी स्नेहपूर्ण व्यवहार नहीं करते थे।
तस्यैवं यक्षवित्तस्य च्युतस्योभयलोकतः ।धर्मकामविहीनस्य चुक्रुधु: पञ्ञभागिन: ॥
९॥
तस्य--उस पर; एवम्--इस प्रकार; यक्ष-वित्तस्य--जो यक्षों की तरह अपनी सम्पत्ति को बिना खर्चे रखता था ( यक्ष कुबेर केकोष की रखवाली करते हैं ); च्युतस्य--विहीन; उभय--दोनों के; लोकत:--लोक ( यह जीवन तथा अगला ); धर्म--धार्मिकता; काम--तथा इन्द्रियतृप्ति; विहीनस्थ--विहीन; चक्रु धु:--क्रुद्ध हो गये; पञ्ञ-भागिन:--पाँच नियत गृहस्थ यज्ञों केदेवता |
इस तरह पाँच पारिवारिक यज्ञों के अधिष्ठाता देव उस ब्राह्मण से क्रुद्ध हो उठे जो कंजूस होनेके कारण अपनी सम्पत्ति की रखवाली यक्ष की तरह करता था और जिसका न इस जगत में, नही उस लोक में कोई अच्छा गन्तव्य था और जो धर्म तथा विषय-भोग से पूरी तरह विहीन होगया था।
तदवध्यानविस्त्रस्तपुण्यस्कन्धस्य भूरिद ।अर्थोप्यगच्छन्निधनं बह्मायासपरिश्रम: ॥
१०॥
तत्--उनके ; अवध्यान--उसकी उपेक्षा से; विस्त्स्रस्त--विहीन; पुण्य--पुण्य का; स्कन्धस्थ--जिसका अंश; भूरि-द--हे वदान्यउद्धव; अर्थ:--सम्पत्ति; अपि--निस्सन्देह; अगच्छत् निधनमू--नष्ट हो गया; बहु--अधिक; आयास--प्रयास का; परिश्रम: --परिश्रम से युक्त |
हे बदान्य उद्धव, इन देवताओं की उपेक्षा करने से उसके पुण्य तथा उसकी सारी सम्पत्ति काभंडार खाली हो गया। उसके बारम्बार निएशेष प्रयास द्वारा संचित भंडार पूरी तरह समाप्त होगया।
ज्ञात्यो जगृहुः किश्ञित्किन्लिहस्यव उद्धव ।दैवतः कालत: किज्ञिद्गह्मबन्धोनपार्थिवात् ॥
११॥
ज्ञातयः--सम्बन्धी; जगृहुः--हर लिया; किश्चित्ू--कुछ; किश्चित्--कुछ; दस्यव: --चोर; उद्धव--हे उद्धव; दैवतः--भाग्य से;कालतः--काल द्वारा; किल्ञित्-- कुछ; ब्रह्म-बन्धो;--तथाकथित ब्राह्मण का; नृ--सामान्य लोगों द्वारा; पार्थिवात्--तथा उच्चसरकारी अधिकारियों द्वारा
हे उद्धव, इस तथाकथित ब्राह्मण का कुछ धन उसके समबन्धियों ने, कुछ चोरों ने, कुछभाग्य ने, कुछ काल के फेर ने, कुछ सामान्य जनों ने तथा कुछ सरकारी अधिकारियों ने लेलिया।
स एवं द्रविणे नष्टे धर्मकामविवर्जित: ।उपेक्षितश्न स्वजनैश्चिन्तामाप दुरत्ययाम् ॥
१२॥
सः--वह; एवम्--इस तरह; द्रविणे--जब उसकी सम्पत्ति; नष्टे--नष्ट हो गई; धर्म--धार्मिकता; काम--तथा इन्द्रिय-भोग;विवर्जित:--से रहित; उपेक्षित:--उपेक्षित; च--तथा; स्व-जनैः--अपने पारिवारिक जनों द्वारा; चिन्तामू--चिन्ता; आप--प्राप्तकिया; दुरत्ययाम्-- असहा।
अन्त में जब उसकी सम्पत्ति पूरी तरह नष्ट हो गई, तो वह ब्राह्मण जिसने कभी भी धर्म याइन्द्रिय-भोग नहीं किया था, अपने पारिवारिक जनों से उपेक्षित रहने लगा। इस प्रकार वह असहाचिन्ता का अनुभव करने लगा।
तस्यैवं ध्यायतो दीर्घ नष्टरायस्तपस्विनः ।खिद्यतो बाष्पकण्ठस्य निर्वेद: सुमहानभूत् ॥
१३॥
तस्य--उसका; एवम्--इस प्रकार; ध्यायत:ः--सोचते हुए; दीर्घम्--दीर्घकाल तक; नष्ट-राय: --सम्पत्ति नष्ट होने पर;तपस्विन:--पीड़ा अनुभव करते हुए; खिद्यतः--शोक करते हुए; बाष्प-कण्ठस्य--अश्रु से रुद्ध कण्ठ; निर्वेद:--वैराग्य कीभावना; सु-महान्--अत्यन्त महान्; अभूत्--उठी |
अपनी सारी सम्पत्ति खो जाने से उसे महान् पीड़ा तथा शोक हुआ। उसका गला आँसुओं सेरुँध गया और वह दीर्घकाल तक अपनी सम्पत्ति के बारे में सोचता रहा। तब उसके मन में वैराग्यकी प्रबल अनुभूति जाग्रत हुई।
स चाहेदमहो कष्ट वृथात्मा मेडनुतापित: ।न धर्माय न कामाय यस्यार्थायास ईहशः ॥
१४॥
सः--वह; च--तथा; आह--बोला; इदम्--यह; अहो--ओह, हाय; कष्टम्--कष्ट प्रद दुर्भाग्य; वृथा--व्यर्थ ही; आत्मा--आत्मा; मे--मेरा; अनुतापित: --सताया हुआ; न--नहीं; धर्माय--धर्म के लिए; न--नहीं; कामाय--इन्द्रियतृप्ति के लिए;यस्य--जिसका; अर्थ--सम्पत्ति के लिए; आयास:-- श्रम; ईहश:--इस तरह का |
ब्राह्मण इस प्रकार बोला : हाय! क्या दुर्भाग्य है मेरा! मैंने उस धन के लिए इतना कठिनपरिश्रम करते हुए व्यर्थ ही अपने को कष्ट पहुँचाया जो न तो धर्म के लिए था, न ही भौतिकभोग के लिए था।
प्रायेणाथा: कदर्याणां न सुखाय कदाचन ।ड्ह चात्मोपतापाय मृतस्यथ नरकाय च ॥
१५॥
प्रायेण--सामान्यतया; अर्था:--सम्पत्ति की वस्तुएँ; करदर्याणाम्--कंजूसों की; न--नहीं; सुखाय--सुख के लिए; कदाचन--किसी समय; इह--इस जीवन में; च--दोनों; आत्म--अपना; उपतापाय--कष्ट पहुँचाने के लिए; मृतस्य--तथा मरे हुए का;नरकाय--नरक की प्राप्ति में; च--तथा |
सामान्यतया कंजूसों की सम्पत्ति उन्हें कभी कोई सुख नहीं दे पाती। इस जीवन में उनकाआत्म-पीड़न करती है और उनके मरने पर उन्हें नरक भेजती है।
यशो यशस्विनां शुद्ध श्लाघ्या ये गुणिनां गुणा: ।लोभ: स्वल्पोपि तानहन्ति श्रित्रो रूपमिवेप्सितम् ॥
१६॥
यशः--यश; यशस्विनामू--सुप्रसिद्ध व्यक्तियों का; शुद्धम्ू-शुद्ध; श्लाध्या:-- प्रशंसनीय; ये-- जो; गुणिनाम्--गुणवानों के;गुणा:--गुण; लोभ:--लालच; सु-अल्प:--थोड़ा; अपि-- भी; तान्ू--उनको; हन्ति--नष्ट करता है; श्रित्र:-- श्वेत कुष्ठ;रूपम्--शारीरिक सौन्दर्य; इब--सहृश; ईप्सितमू--मोहक
प्रसिद्ध व्यक्ति की जो भी शुद्ध प्रसिद्धि होती है और गुणवान् में जो भी प्रशंसनीय गुण रहतेहैं, वे किश्लित् मात्र लालच से उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह आकर्षक शारीरिक सौन्दर्यरंचमात्र श्वेत कुष्ठ से नष्ट हो जाता है।
अर्थस्य साधने सिद्धे उत्कर्षे रक्षणे व्यये ।नाशोपभोग आयासस्त्रासश्चिन्ता भ्रमो नृणाम् ॥
१७॥
अर्थय्स--सम्पत्ति के; साधने--कमाने में; सिद्धे--उपलब्धि में; उत्कर्षे--वृद्धि में; रक्षणे-- रक्षा करने में; व्यये--खर्च में;नाश--हानि में; उपभोगे--तथा उपभोग में; आयास:-- श्रम; त्रास:-- भय; चिन्ता--चिन्ता; भ्रम:-- भ्रम; नृणाम्--मनुष्यों केलिए
सभी मनुष्यों को सम्पत्ति की कमाई, प्राप्ति, वृद्धि, रक्षा, व्यय, हानि तथा उपभोग में महान्श्रम, भय, चिन्ता तथा भ्रम का अनुभव होता है।
स्तेयं हिंसानृतं दम्भ: कामः क्रोधः स्मयो मदः ।भेदो वैरमविश्वास: संस्पर्धा व्यसनानि च ॥
१८॥
एते पञ्जदशानर्था हार्थभमूला मता नृणाम् ।तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोर्थी दूरतस्त्यजेतू ॥
१९॥
स्तेयम्--चोरी; हिंसा--हिंसा; अनृतम्--असत्य भाषण; दम्भ:--दुहरा बर्ताव; काम:--काम, विषय-वासना; क्रोध: --क्रो ध;स्मय:ः--चिन्ता; मदः--घमंड; भेद:-- भेद-भाव; वैरम्--शत्रुता; अविश्वास: --विश्वास की कमी; संस्पर्धा--बराबरी, होड;व्यसनानि--खतरे ( स्त्री, जुए तथा नशे से उत्पन्न ); च--तथा; एते--ये; पदञ्चदश--पन्द्रह; अनर्था:--अवांछित वस्तुएँ; हि--निस्सन्देह; अर्थ-मूला:--सम्पत्ति पर आधारित; मता:--विख्यात हैं; नृणाम्-- मनुष्यों द्वारा; तस्मात्ू--इसलिए; अनर्थम्--अवांछित; अर्थ-आख्यम्--वांछित कही जाने वाली सम्पत्ति; श्रेय:-अर्थी--जीवन का चरम लक्ष्य चाहने वाला; दूरत:--दूर सेही; त्यजेत्--छोड़ दे।
चोरी, हिंसा, असत्य भाषण, दुहरा बर्ताव, काम, क्रोध, चिन्ता, गर्व, झगड़ा-लड़ाई,शत्रुता, अविश्वास, ईर्ष्या, स्त्रियों के द्वारा उत्पन्न संकट, जुआ खेलना तथा नशा करना--ये पंद्रहदुर्गुण सम्पत्ति-लोभ के कारण मनुष्यों को दूषित बनाने वाले हैं। यद्यपि ये दुर्गुण हैं किन्तु लोगभ्रमवश इनको महत्त्व देते हैं। इसलिए जिस व्यक्ति को जीवन का असली लाभ उठाना हो, वहअवांछित भौतिक सम्पत्ति से अपने को अलग रखे।
भिद्चन्ते भ्रातरो दारा: पितरः सुहृदस्तथा ।एकास्निग्धा: काकिणिना सद्य: सर्वेडरय: कृता: ॥
२०॥
भिद्यन्ते--विलग हो जाते हैं; भ्रातरः -- भाई; दारा:-- पत्ती; पितर: --माता-पिता; सुहृदः --मित्र; तथा--और; एक--मानोएक; आस्निग्धा: -- अत्यन्त प्रिय; काकिणिना--छोटे-से सिक्के ( कौड़ी ) से; सद्यः--तुरन्त; सर्वे--सभी; अरयः --शत्रु;कृताः:--किया गया।
यहाँ तक कि मनुष्य के सगे भाई, पत्नी, माता-पिता तथा मित्र जो उससे प्रेम से बद्ध थे,तुरन्त ही अपना स्नेह-सम्बन्ध तोड़ लेते हैं और एक कौड़ी के कारण शत्रु बन जाते हैं।
अर्थनाल्पीयसा होते संरब्धा दीप्तमन्यवः ।त्यजन्त्याशु स्पृधो घ्नन्ति सहसोत्सृज्य सौहदम् ॥
२१॥
अर्थन--सम्पत्ति से; अल्पीयसा--तुच्छ, नगण्य; हि--भी; एते--वे; संरब्धा:--श्षुब्ध; दीप्त--क्रुद्ध; मन्यव: --उनका क्रोध;त्यजन्ति--त्याग देते हैं; आशु--बहुत जल्दी; स्पृध:--झगड़ालू बन कर; घ्नन्ति--नष्ट कर देते हैं; सहसा--तुरन्त; उत्सूज्य--बहिष्कार करके; सौहदम्--शुभकामना।
ये सम्बन्धी तथा मित्रगण थोड़े-से भी धन के लिए अत्यन्त श्षुब्ध हो उठते हैं और क्रोध सेआग-बबूला बन जाते हैं। प्रतिद्वन्द्दी बन कर वे तुरन्त सारी शुभकामनाएँ छोड़ देते हैं और क्षण-भर में ही उसका त्याग करके उसकी हत्या तक कर देते हैं।
लब्ध्वा जन्मामपप्रार्थ्य मानुष्यं तदिद्वजाछयताम् ।तदनाहत्य ये स्वार्थ घ्नन्ति यान्त्यशुभां गतिम्ू ॥
२२॥
लब्ध्वा-प्राप्त करके; जन्म--जन्म; अमर--देवताओं द्वारा; प्रार्थम्--कामना किया गया; मानुष्यम्--मनुष्य का; तत्--औरउस; द्विज-आछयतामू-- श्रेष्ठ द्विज होने के पद में; तत्--उसे; अनाहत्य--अनादर करके; ये--जो लोग; स्व-अर्थम्--निजी हितका; घ्तन्ति--नष्ट करते हैं; यान्ति--जाते हैं; अशुभाम्-- अशुभ; गतिम्ू--गन्तव्य को |
जो लोग देवताओं द्वारा भी प्रार्थित मनुष्य जीवन प्राप्त करते हैं और उस मनुष्य जन्म मेंसर्वोत्तम ब्राह्मण पद को प्राप्त होते हैं, वे परम भाग्यशाली हैं। यदि वे इस महत्त्वपूर्ण अवसर काअनादर करते हैं, तो वे निश्चय ही अपने निजी हित का हनन करते हैं और परम दुखद अन्त कोप्राप्त होते हैं।
स्वर्गापवर्गयोद्दरिं प्राप्प लोकमिमं पुमान् ।द्रविणे को<नुषज्जेत मर्त्यो उनर्थस्य धामनि ॥
२३॥
स्वर्ग--स्वर्ग; अपवर्गयो:--तथा मोक्ष का; द्वारम्-द्वार; प्राप्प--प्राप्त करके; लोकम्--मनुष्य जीवन को; इमम्--इस;पुमान्--मनुष्य; द्रविणे--सम्पत्ति के प्रति; क:ः--कौन; अनुषज्जेत--अनुरक्त होगा; मर्त्य:--मरणशील; अनर्थस्य--व्यर्थता के;धामनि--धाम में
ऐसा मर्त्य व्यक्ति कौन होगा जो इस मनुष्य जीवन को जो कि स्वर्ग तथा मोक्ष का द्वार है,प्राप्त करके भौतिक सम्पत्ति रूपी व्यर्थ के धाम के प्रति अनुरक्त होगा ? देवर्षिपितृ भूतानि ज्ञातीन्बन्धूंश्व भागिन: ।असंविभज्य चात्मानं यक्षवित्त: पतत्यध: ॥
२४॥
देव--देवतागण; ऋषि--ऋषिगण; पितृ--पितरगण; भूतानि--तथा सामान्य जीव; ज्ञातीनू--निकट के सगे-सम्बन्धियों;बन्धूनू--विस्तारित परिवार; च--तथा; भागिन: -- हिस्सा बटाने वाले; असंविभज्य--न बाँट कर; च--तथा; आत्मानम्-- अपनेको; यक्ष-वित्त:--जिसकी सम्पत्ति यक्ष की सम्पत्ति जैसी; पतति--गिरता है; अध: --नीचे |
जो व्यक्ति अपनी सम्पत्ति को उचित भागीदारों--देवताओं, ऋषियों, पितरों तथा सामान्यजीवों में तथा अपने निकट सम्बन्धियों, ससुराल वालों और स्वयं में वितरित नहीं कर देता, वहमात्र यक्ष की तरह अपनी सम्पत्ति को बनाये रखता है और अधोगति को प्राप्त होगा।
व्यर्थयार्थेहया वित्तं प्रमत्तस्य वयो बलम् ।कुशला येन सिध्यन्ति जरठ: कि नु साधये ॥
२५॥
व्यर्थथा--व्यर्थ; अर्थ--सम्पत्ति के; ईहया--प्रयास से; वित्तम्--धन; प्रमत्तस्य--उन्मत्त हुए; वब:--नौजवान; बलम्--बल;कुशला:--विवेकवान्; येन--जिसके द्वारा; सिध्यन्ति--सिद्ध बनते हैं; जरठ: --वृद्ध व्यक्ति; किमू-- क्या; नु--निस्सन्देह;साधये--मैं प्राप्त कर सकता हूँ।
विवेकशील व्यक्ति अपने धन, यौवन तथा बल को सिद्धि प्राप्त करने में लगाने में सक्षमहोते हैं। किन्तु मैंने उत्तेजित होकर अपनी सम्पत्ति के संवर्धन के व्यर्थ के प्रयास में ही इनकोलुटा दिया है। अब वृद्ध हो चुकने पर मैं क्या प्राप्त कर सकता हूँ? कस्मात्सड्क्लिश्यते दिद्वान्व्यर्थयार्थहयासकृत् ।'कस्यचिन्मायया नूनं लोकोयं सुविमोहित: ॥
२६॥
कस्मात्-क्यों; सड्क्लिश्यते--कष्ट भोगता है; विद्वानू--विद्वान व्यक्ति; व्यर्थया--व्यर्थ की; अर्थ-ईहया--सम्पत्ति की खोजमें; असकृत्--निरन्तर; कस्यचित्--किसी का; मायया--मायाशक्ति से; नूनमू--निश्चय ही; लोक:--जगत; अयम्--यह; सु-विमोहित:--अत्यधिक मोहग्रस्त |
बुद्धिमान मनुष्य सम्पत्ति पाने के लिए व्यर्थ के सतत् प्रयासों से कष्ट क्यों भोगे ? निस्सन्देह,यह सारा संसार किसी की मायाशक्ति से अत्यधिक मोहग्रस्त है।
कि धनैर्धनदैर्वा कि कामैर्वा कामदैरुत ।मृत्युना ग्रस्यमानस्य कर्मभिर्वोत्र जन्मदै:ः ॥
२७॥
किम्ू--किस काम का; धनै:--विभिन्न प्रकारों के धन से; धन-दैः--धन देने वाले; वा--अथवा; किम्--क्या लाभ; कामै:--इन्द्रिय-विषयों से; वा--अथवा; काम-दैः--ऐसी इन्द्रियतृप्ति प्रदान करने वालों से; उत--अथवा; मृत्युना--मृत्यु द्वारा;ग्रस्थमानस्थ--पकड़े हुए व्यक्ति का; कर्मभि:--सकाम कर्मों से; वा उत---अथवा; जन्म-दैः--अगला जन्म देने वाले |
जो व्यक्ति मृत्यु के चंगुल में जकड़ा हो, उसके लिए धन या उस धन को देने वाले,इन्द्रियतृप्ति अथवा इन्द्रियतृप्ति प्रदान करने वाले या किसी प्रकार का सकाम कर्म जो उसे इसभौतिक जगत में फिर से जन्म दिलाये, इन सबसे क्या लाभ है ? नूनं मे भगवांस्तुष्ट: सर्वदेवमयो हरिः ।येन नीतो दशामेतां निर्वेदश्चात्मनः प्लव: ॥
२८॥
नूनमू--निश्चय ही; मे--मुझसे; भगवानू-- भगवान्; तुष्ट: --तुष्ट; सर्व-देव-मय: --समस्त देवताओं से युक्त; हरि:ः-- भगवान्विष्णु; येन--जिससे; नीत:--मैं लाया गया; दशाम्--स्थिति तक; एताम्ू--इस; निर्वेद: --विराग; च--तथा; आत्मन:--अपनी; प्लव:--नाव ( भवसागर से पार ले जाने वाली )।
समस्त देवों से युक्त भगवान् हरि अवश्य ही मुझ पर प्रसन्न हैं। उन्होंने ही मुझे इस कष्टमयस्थिति तक पहुँचाया है और वैराग्य का अनुभव करने के लिए बाध्य कर दिया है, जो इसभवसागर को पार कराने की नाव है।
सोहं कालावशेषेण शोषयिष्येड्रमात्मन: ।अप्रमत्तोखिलस्वार्थे यदि स्यात्सिद्ध आत्मनि ॥
२९॥
सः अहम्-मैं; काल-अवशेषेण --बचे हुए समय से; शोषयिष्ये--कम से कम कर दूँगा; अड्भमू--यह शरीर; आत्मन:--अपना; अप्रमत्त:--मोहित न होने वाला; अखिल--समस्त; स्व-अर्थ-- आत्म-हित में; यदि--यदि; स्थात्ू--कोई ( समय )बचता है, तो; सिद्धः--सन्तुष्ट; आत्मनि--अपने भीतर |
यदि मेरे जीवन का कोई समय शेष है, तो मैं तपस्या करूँगा और अपने शरीर कीआवश्यकताओं को कम से कम कर दूँगा। अब मैं और अधिक भ्रम में न पड़ कर जीवन केसमग्र आत्म-हित में लग कर अपने आप में तुष्ट रहूँगा।
तत्र मामनुमोदेरन्देवास्त्रिभुवनेश्वरा: ।मुहूर्तेन ब्रह्मलोक॑ खट्वाड़: समसाधयत् ॥
३०॥
तत्र--इस सम्बन्ध में; माम्ू--मुझसे; अनुमोदेरन्--प्रसन्न हों; देवा:--देवतागण ; त्रि-भुवन--तीनों लोकों के; ई श्वरा: --नियन्ता;मुहूर्तेन-- क्षण-भर में; ब्रहलोकम्--वैकुण्ठ-लोक; खट्वाड़ु--राजा खट्वांग ने; समसाधयत्--प्राप्त कर लिया।
इस तरह इन तीनों लोकों के अधिनायक देवता मुझ पर कृपा करें। निस्सन्देह, महाराजखट्वांग को क्षण-भर में वैकुण्ठ-लोक प्राप्त हो गया था।
श्रीभगवानुवाचइत्यभिप्रेत्य मनसा ह्यावन्त्यो द्विजसत्तम: ।उन्मुच्य हृदयग्रन्थीन्शान्तो भिक्षुरभून्मुनि: ॥
३१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; इति--इस प्रकार; अभिप्रेत्य--निष्कर्ष पर पहुँच कर; मनसा--मन से; हि--निस्सन्देह;आवल्त्य:--अवन्ती जनपद का; द्विज-सत्-तमः--अत्यन्त पवित्र ब्राह्मण; उन्मुच्य--खोल कर; हृदय--हृदय की; ग्रन्थीन्--( इच्छाओं की ) गाँठों को; शान्त:--शान्त; भिक्षु:--भिक्षुक संन्यासी; अभूत्--हो गया; मुनि:--मौन |
भगवान् कृष्ण ने कहा : वह हृढ़ संकल्प वाला सर्वोत्तम अवन्ती ब्राह्मण अपने हृदय कीइच्छारूपी ग्रंथियों को खोलने में समर्थ हो गया। तब उसने शान्त तथा मौन संन््यासी साधु कीभूमिका ग्रहण कर ली।
स चचार महीमेतां संयतात्मेन्द्रयानिल: ।भिक्षार्थ नगरग्रामानसड्े इलक्षितोविशत् ॥
३२॥
सः--वह; चचार--घूमने वाला; महीम्--पृथ्वी पर; एताम्--इस; संयत--नियंत्रित; आत्म--अपनी चेतना; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ;अनिल:--तथा प्राण-वायु; भिक्षा-अर्थम्-- भीख माँगने के लिए; नगर--शहरों; ग्रामान्ू--तथा गाँवों में; असड्र:--बिना किसीसंगी के; अलक्षित:--अपने को न जनाते हुए; अविशत्--प्रविष्ट हुआ |
वह अपनी बुद्धि, इन्द्रियों तथा प्राण-वायु को अपने वश में रखते हुए पृथ्वी पर विचरणकरने लगा। भिक्षा माँगने के लिए वह विविध नगरों तथा ग्रामों में अकेले ही यात्रा करता। उसने अपने उच्च आध्यात्मिक पद का प्रचार नहीं किया, इसलिए अन्य लोग उसे पहचान नहीं पाते थे।
तं वै प्रवयसं भिक्षुमवधूतमसज्जना: ।इृष्टा पर्यभवन्भद्र बह्नीभि: परिभूतिभि: ॥
३३॥
तम्--उसको; बै--निस्सन्देह; प्रवयसम्--वृद्ध; भिक्षुमू--भिखारी को; अवधूतम्--मलिन; असत्--निम्न श्रेणी के; जना:--लोग; इृष्ठा--देख कर; पर्यभवन्--अनादर करते हुए; भद्ग--हे दयालु उद्धव; बह्नीभि:--अनेक; परिभूतिभि: --अपमानों से।
हे दयालु उद्धव, उसे वृद्ध, मलिन भिखारी के रूप में देख कर ऊधमी व्यक्ति अनेक प्रकारसे उसे अपमानित करने लगे।
केचित्ररिवेणुं जगृहुरेके पात्रं कमण्डलुम् ।पीठं चैके क्षसूत्रं च कन्थां चीराणि केचन ।प्रदाय च पुनस्तानि दर्शितान्याददुर्मुने: ॥
३४॥
केचित्--उनमें से कुछ; त्रि-वेणुम्-त्रिदण्ड को; जगृहुः--छीन लिया; एके --कुछ; पात्रम्ू--उसके भिक्षापात्र को;'कमण्डलुम्--जलपात्र को; पीठम्--आसन, पीढ़ा; च--तथा; एके--किसी ने; अक्ष-सूत्रमू--जपमाला; च--तथा;कन्थाम्--गुदड़ी; चीराणि--फटी, जीर्ण-शीर्ण; केचन--कुछेक ने; प्रदाय--वापस करके; च--तथा; पुन:ः--फिर से;तानि--वे; दर्शितानि--दिखने वाले; आददुः--छीन लिया; मुनेः--मुनि का
इनमें से कुछ लोग तो उसका संन्यासी दण्ड छीन लेते और कुछ उस जलपात्र को, जिसे वह भिक्षापात्र के रूप में काम में ला रहा था। कोई उसका मृगचर्म आसन, तो कोई उसकी जपमालाले लेता और कोई उसकी फटी-पुरानी गुदड़ी चुरा लेता; वे इन वस्तुओं को उसे दिखा-दिखाकरवापस करने का बहाना करते किन्तु उन्हें पुनः छिपा देते।
अन्न च भेक्ष्यसम्पन्नं भुझ्नानस्य सरित्तटे ।मूत्रयन्ति च पापिष्ठा: छ्लीवन्त्यस्य च मूर्धनि ॥
३५॥
अन्नमू--भोजन; च--तथा; भैक्ष्य--भिक्षा माँग कर; सम्पन्नम्--प्राप्त; भुझ्ञानस्य-- भाग लेने वाले का; सरित्--नदी के;तटे--तट पर; मूत्रयन्ति--पेशाब करते हैं; च--तथा; पापिष्ठा:--अत्यन्त पापी व्यक्त; प्ठछीवन्ति-- थूकते हैं; अस्य--उसके ;च--तथा; मूर्थनि--सिर पर।
जब वह भिक्षा द्वारा एकत्र किये गये भोजन को खाने के लिए नदी के तट पर बैठता, तोऐसे पापी धूर्त आकर उस पर पेशाब कर देते और उसके सिर पर थूकने का दुस्साहस करते।
यतवाचं वाचयन्ति ताडयन्ति न वक्ति चेत् ।तर्जयन्त्यपरे वाग्भि: स्तेनोडयमिति वादिनः ।बध्नन्ति रज्वा तं केचिद्वध्यतां बध्यतामिति ॥
३६॥
यत-वाचम्--मौनब्रत धारण किये; वाचयन्ति--जबरन बोलवाते; ताडयन्ति--पीटते; न वक्ति--वह नहीं बोलता; चेत्--यदि;तर्जयन्ति--लाठी से मारते; अपरे--अन्य लोग; वाग्भि: --अपने शब्दों से; स्तेन: --चोर; अयम्--यह व्यक्ति; इति--इस प्रकार;वादिन:--कहते हुए; बध्नन्ति--उसे बाँध देते; रज्वा--रस्सी से; तम्--उसको; केचित्ू--कुछ; बध्यताम् बध्यताम्--उसे बाँधलो, उसे बाँध लो; इति--ऐसा कह कर।
यद्यपि उसने मौनब्रत धारण कर रखा था, किन्तु वे उससे बोलवाने का प्रयास करते औरयदि वह न बोलता तो उसे लाठियों से पीटते थे। अन्य लोग उसे यह कह कर प्रताड़ित करते कियह आदमी चोर है। अन्य लोग उसे रस्सी से बाँध देते और चिल्लाते, 'उसे बाँध दो! उसे बाँधदो! क्षिपन्त्येकेउवजानन्त एष धर्मध्वज: शठ: ।क्षीणवित्त इमां वृत्तिमग्रहीत्स्वजनोज्झित:ः ॥
३७॥
क्षिपन्ति--आलोचना करते; एके --कुछ लोग; अवजानन्त:--अपमानित करते हुए; एष:--इस; धर्म-ध्वज:--धार्मिक ढोंगकरने वाले; शठ:--ठगने; क्षीण-वित्त:--अपना धन खोकर; इमाम्--इस; वृत्तिमू--पेशे को; अग्रहीत्--ग्रहण किया है; स्व-जन--अपने परिवार द्वारा; उज्झित:--बाहर निकाला गया।
वे यह कह कर उसकी आलोचना और अपमान करते 'यह व्यक्ति तो ढोंगी और ठग है। यह व्यक्ति धर्म को इसलिए पेशा बनाये हुए है क्योंकि इसने अपनी सारी सम्पत्ति गँवा दी है औरइसके परिवार वालों ने इसे बाहर निकाल दिया है।
अहो एष महासारो धृतिमान्गिरिराडिव ।मौनेन साधयत्यर्थ बकवहूढनिश्चय: ॥
३८ ॥
इत्येके विहसन्त्येनमेके दुर्वातयन्ति च ।त॑ बबन्धुर्निरुरुधुर्यथा क्रीडनकं द्विजम् ॥
३९॥
अहो--ओह; एषः:--यह व्यक्ति; महा-सारः--अत्यन्त शक्तिशाली; धृतिमान्ू-- धैर्यवान; गिरि-राट्--हिमालय पर्वत; इब--सहश; मौनेन-- अपने मौनकब्रत से; साधयति--प्रयास कर रहा है; अर्थम्--अपने लक्ष्य के लिए; बक-वत्--बगुले के समान;हढ--स्थिर; निश्चयः--संकल्प; इति--इस प्रकार कहते हुए; एके--कुछ लोग; विहसन्ति--मजाक उड़ाते; एनम्--उसका;एके--कुछ लोग; दुर्वातयन्ति--अपानवायु निकालते; च--तथा; तम्ू--उसको; बबन्धु:--जंजीरों में बाँध दिया; निरुरुधु: --बन्दी बना रखा; यथा--जिस तरह; क्रीडनकम्--पालतू पशु; द्विजमू--उस ब्राह्मण को |
कुछ लोग यह कह कर उसका मजाक उड़ाते, 'जरा देखो न इस अत्यन्त शक्तिशाली ऋषिको! यह हिमालय पर्वत की तरह थैर्यवान है। यह अपने मौनब्रत से महान् संकल्प करके अपनालक्ष्य पाने के लिए एक बगुले की भाँति प्रयलशील है।' अन्य लोग उसके ऊपर अपानवायुछोड़ते और कुछ लोग इस द्विज ब्राह्मण को जंजीरों में बाँध कर पालतू पशु की तरह बन्दीबनाकर रखते।
एवं स भौतिकं दुःखं दैविकं दैहिकं च यत् ।भोक्त व्यमात्मनो दिुष्ट प्राप्तं प्राप्ममबुध्यत ॥
४०॥
एवम्--इस तरह; सः--वह; भौतिकम्-- अन्य जीवों के कारण; दुःखम्--कष्ट; दैविकम्--देवताओं के कारण; दैहिकम्--अपने शरीर के कारण; च--तथा; यत्--जो भी; भोक्तव्यम्--कष्ट पाने के लिए सुनिश्चित; आत्मन:--अपना; दिष्टमू--विधाताद्वारा नियत; प्राप्तम् प्राप्तम्--जो कुछ भी मिल जाता; अबुध्यत--वह समझ गया।
वह ब्राह्मण समझ गया कि उसका सारा कष्ट--अन्य जीवों से, प्रकृति की उच्च शक्तियों सेतथा अपने ही शरीर से जन्य--दुर्निवार है क्योंकि यह विधाता द्वारा निश्चित हुआ है।
'परिभूत इमां गाथामगायत नराधमै: ।'पातयद्ध्ि: स्व धर्मस्थो धृतिमास्थाय सात्त्विकीम् ॥
४१॥
'परिभूतः--अपमानित; इमाम्ू--यह; गाथामू--गीत; अगायत--गाया; नर-अधमै:--निम्न जाति के लोगों द्वारा; पातयद्धिः --उसे पतित बनाने का प्रयत्न करने वाले; स्व-धर्म--अपने कर्तव्य में; स्थ:--हढ़ रहते हुए; धृतिमू--संकल्प; आस्थाय--स्थिरहोकर; सात्त्विकीम्--सतोगुणी
इन निम्न कोटि के पुरुषों द्वारा, जो उसे पतित करने का प्रयास कर रहे थे, अपमानित होनेपर भी, वह अपने आध्यात्मिक कर्म में अडिग बना रहा। सतोगुण में अपना संकल्प स्थिर करके,वह निम्नलिखित गीत गाने लगा।
द्विज उबाचनायं जनो मे सुखदुःखहेतु-न॑ देवतात्मा ग्रहकर्मकाला: ।मन: पर कारणमामनन्तिसंसारचक्रं परिवर्तयेद्यत् ॥
४२॥
द्विजः उबाच--ब्राह्मण ने कहा; न--नहीं; अयम्--ये; जन: --लोग; मे--मेरे; सुख--सुख; दुःख--तथा दुख के; हेतु:--कारण; न--न तो; देवता--देवतागण; आत्मा--मेरा शरीर; ग्रह-- अधीक्षक ग्रह; कर्म--मेरा विगत कर्म; काला:--अथवासमय; मनः--मन; परम्--प्रत्युत एकमात्र; कारणं--कारण; आमनन्ति--अधिकारी दिद्वानों द्वारा कहा जाता है; संसार--भौतिक जीवन का; चक्रम्--चक्र; परिवर्तयेत्--घुमाता है; यत्--जो
ब्राह्मण ने कहा : न तो ये लोग मेरे सुख तथा दुख के कारण हैं, न ही देवता, मेरा शरीर,ग्रह, मेरे विगत कर्म या काल ही। प्रत्युत यह तो एकमात्र मन है, जो सुख तथा दुख का कारण हैजो भौतिक जीवन को निरन्तर घुमाता रहता है।
मनो गुणान्वै सृजते बलीय-स्ततश्व कर्माणि विलक्षणानि ।शुक्लानि कृष्णान्यथ लोहितानितेभ्य: सवर्णा: सृतयो भवन्ति ॥
४३॥
मनः--मन; गुणान्-- प्रकृति के गुणों के कार्य; वै--निस्सन्देह; सृजते--पक्रट करता है; बलीय:--अत्यन्त बलवान; ततः--उन गुणों से; च--तथा; कर्माणि-- भौतिक कार्यकलाप; विलक्षणानि--विभिन्न प्रकारों के; शुक्लानि-- श्वेत ( सतोगुणी );कृष्णानि--काला ( तमोगुणी ); अथ--तथा; लोहितानि--लाल ( रजोगुणी ); तेभ्य:--उन कार्यों से; स-वर्णा: --वही वही रंगवाले; सृतयः--उत्पन्न दशाएँ; भवन्ति--उठ खड़ी होती हैं।
शक्तिशाली मन भौतिक गुणों को कार्यशील बनाता है, जिससे सतो, तमो तथा रजोगुण सेसम्बद्ध विभिन्न प्रकार के भौतिक कार्यकलाप विकसित होते हैं। इनमें से प्रत्येक गुण वालेकार्यों से संगत जीवन दशाएँ ( गतियाँ ) उत्पन्न होती हैं।
अनीह आत्मा मनसा समीहताहिरण्मयो मत्सख उद्दिचष्टे ।मनः स्वलिडूुं परिगृह्य कामान्जुषन्निबद्धो गुणसड्रतोडसौ ॥
४४॥
अनीहः--निष्क्रिय; आत्मा--परमात्मा; मससा--मन के साथ साथ; समीहता--संघर्षशील; हिरण्-मय:--दिव्य प्रकाश प्रकटकरते हुए; मत्-सखः:--मेरा मित्र; उद्विचष्टे--ऊपर से नीचे की ओर देखता है; मनः--मन; स्व-लिन्गम्ू--जो भौतिक जगत केप्रतिबिम्ब को अपने ( आत्मा ) ऊपर प्रक्षेपित करता है; परिगृह्य-- स्वीकार करके; कामान्--इन्द्रिय-विषयों को; जुषन्--लगाकर; निबद्ध:--बँध जाता है; गुण-सड्भतः--गुणों की संगति के कारण; असौ--वह सूक्ष्म आत्मा।
परमात्मा यद्यपि भौतिक शरीर के भीतर संघर्षशील मन के साथ उपस्थित रहता है, किन्तुवह प्रयास नहीं करता ( निष्क्रिय रहता है ) क्योंकि वह पहले से दिव्य प्रकाश से समन्वित होताहै। वह मेरे मित्र की भाँति कार्य करते हुए अपने दिव्य पद से केवल साक्षी बनता है। दूसरी ओरअत्यन्त सूक्ष्म आत्मा रूप में इस मन को अपना चुका हूँ जो भौतिक जगत के प्रतिबिम्ब कोपरावर्तित करने वाला दर्पण है। इस तरह मैं इन्द्रिय-विषयों का भोग करने में लगा हूँ और प्रकृतिके गुणों के सम्पर्क के कारण बँधा हुआ हूँ।
दान॑ स्वधर्मो नियमो यमश्चश्रुतं च कर्माणि च सद्व्गतानि ।सर्वे मनोनिग्रहलक्षणान्ताःपरो हि योगो मनसः समाधि: ॥
४५॥
दानम्--दान देना; स्व-धर्म: --अपने नियत कर्तव्य करते रहना; नियम:--दैनिक जीवन के नियम; यमः--आध्यात्मिक अभ्यासके प्रमुख नियम; च--तथा; श्रुतम्--शास्त्रों को सुनना; च--तथा; कर्माणि--पुण्यकर्म; च--तथा; सत्--शुद्ध; ब्रतानि--ब्रत; सर्वे--सभी; मनः-निग्रह:--मन को वश में करना; लक्षण--से युक्त; अन्ता:--उनका लक्ष्य; पर: --परम; हि--निस्सन्देह;योग:--दिव्य ज्ञान; मनसः --मन का; समाधि:--समाधि में
ब्रह्म का ध्यानदान, धर्म, यम तथा नियम, शास्त्रों का श्रवण, पुण्यकर्म तथा शुद्ध बनाने वाले ब्रत--इनसबका अन्तिम लक्ष्य मन का दमन है। निस्सन्देह, ब्रह्म में मन की एकाग्रता ही सर्वोच्च योग है।
समाहितं यस्य मन: प्रशान्तंदानादिभिः कि वद तस्य कृत्यम् ।असंयतं यस्य मनो विनश्यद्दानादिभिश्वेदपरं किमेभि: ॥
४६॥
समाहितम्--पूर्णतया स्थिर; यस्य--जिसका; मन:--मन; प्रशान्तम्--शान्त; दान-आदिभि:--दान तथा अन्य विधियों से;किम्--क्या; वद--कृपया कहें; तस्थ--उन विधियों का; कृत्यम्--उपयोग; असंयतम्--अनियंत्रित; यस्थय--जिसका; मन: --मन; विनश्यत्--विलीन करते हुए; दान-आदिभि:--दान इत्यादि विधियों से; चेत्ू--यदि; अपरमू--आगे; किम्ू--क्या लाभ;एमि:--इनका |
यदि किसी का मन पूर्णतया स्थिर तथा शान्त हो, तो आप मुझे यह बतलायें कि मनुष्य कोकर्मकांडी दान तथा अन्य पुण्यकर्म करने की क्या आवश्यकता है? और यदि किसी का मनअसंयत रहता है, अज्ञान में डूबा रहता है, तो फिर उसके लिए इन कार्यों से क्या लाभ ? मनोवशेडन्ये हाभवन्स्म देवामनश्च नान्यस्य वशं समेति ।भीष्मो हि देवः सहसः सहीयान्युज्ज्याद्वशे तं स हि देवदेव: ॥
४७॥
मनः--मन के; वशे--वश में; अन्ये-- अन्य; हि--निस्सन्देह; अभवनू--हो गये; स्म-- भूतकाल में; देवा: --इन्द्रियाँ ( अपनेअधिष्ठातृ देवों द्वारा प्रदर्शित ); मनः--मन; च--तथा; न--कभी नहीं; अन्यस्य--दूसरे के; वशम्--वश में; समेति--आता है;भीष्मय:--भयावह; हि--निस्सन्देह; देव:--देवता जैसी शक्ति; सहसः--सबसे बलवान की अपेक्षा; सहीयान्ू--बलवान;युज्ज्यात्ू--स्थिर कर सकता है; वशे--वश में; तम्ू--उस मन को; सः--ऐसा व्यक्ति; हि--निस्सन्देह; देव-देव:--समस्त इन्द्रियों का स्वामी
सारी इन्द्रियाँ अनन्त काल से मन के वश में रही हैं और मन कभी भी किसी अन्य के प्रभावमें नहीं आता। वह बलवानों से भी बलवान है और उसकी देवतुल्य शक्ति भयावह है। इसलिएजो अपने मन को वश में कर सकता है, वह सभी इन्द्रियों का स्वामी बन जाता है।
तम्दुर्जयं शत्रुमसह्यवेग-मरुन्तुदं तन्न विजित्य केचित् ।कुर्वन्त्यसद्दिग्रहमत्र मर्त्यै-मित्राण्युदासीनरिपून्विमूढा: ॥
४८ ॥
तम्--उस; दुर्जयम्--न जीता जाने वाला; शत्रुम्--शत्रु को; असहा--असहनीय; वेगम्--जिसका वेग; अरुम्-तुदम्--हृदयको पीड़ा पहुँचाने में सक्षम; तत्ू--इसलिए; न विजित्य--न जीत पाकर; केचित्--कुछ लोग; कुर्वन्ति--करते हैं; असत्--व्यर्थ; विग्रहमू--कलह; अत्र--इस जगत में; मरत्यैं;--मर्त्य जीवों से; मित्राणि--मित्र; उदासीन--अन्यमनस्क लोग; रिपूनू--तथा प्रतिद्वन्द्दी; विमूढा:--पूर्णतया विमोहित।
अनेक लोग इस दुर्जय शत्रुरूपी मन को, जिसके वेग असह्य हैं और जो हृदय को सताता हैजीत न पाने पर, पूर्णतया विमोहित हो जाते हैं और अन्यों से व्यर्थ ही कलह ठान लेते हैं। इसतरह वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अन्य लोग या तो उनके मित्र हैं अथवा उनके शत्रु हैं याफिर उनसे उदासीन रहने वाले हैं।
देहं मनोमात्रमिमं गृहीत्वाममाहमित्यन्धधियो मनुष्या: ।एषोहमन्योयमिति भ्रमेणदुरन्तपारे तमसि भ्रमन्ति ॥
४९॥
देहम्-- भौतिक शरीर को; मनः-मात्रमू--मन से ही उत्पन्न; इमम्--इस; गृहीत्वा--ग्रहण करके; मम--मेरा; अहमू--मैं;इति--इस प्रकार; अन्ध--अन्धी; धियः--बुद्धि वाले; मनुष्या:--मनुष्य; एघ:--यह; अहम्--मैं हूँ; अन्य:--दूसरा कोई;अयमू--यह है; इति--इस प्रकार; भ्रमेण--मोह के द्वारा; दुरन््त-पारे--दुर्लघ्य; तमसि--अंधकार में; भ्रमन्ति-- भटकते रहतेहैं।
जो लोग अपनी पहचान इस शरीर से, जो कि भौतिक मन की उपज है, करते हैं उनकीबुद्धि मारी जाती है और वे 'मैं' तथा 'मेरा' के रूप में सोचते हैं। अपने इस भ्रम के कारणकि, 'यह मैं हूँ किन्तु वह अन्य कोई है' वे लोग अनन्त अंधकार में भटकते रहते हैं।
जनस्तु हेतुः सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनश्चात्र हि भौमयोस्तत् ।जिह्लां क्वचित्सन्दशति स्वदद्धि-स्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् ॥
५०॥
जनः--ये लोग; तु--लेकिन; हेतु:--कारण; सुख-दुःखयो:--मेरे सुख तथा दुख का; चेत्--यदि; किम्--क्या; आत्मन:--अपने लिए; च--तथा; अत्र--इस धारणा में; हि--निस्सन्देह; भौमयो: --भौतिक शरीर से सम्बन्धित; तत्ू--वह ( कर्ता तथाभोक्ता का पद ); जिह्ामू--जी भ को; क्वचित्--कभी; सन्दशति--काट लेता है; स्व--अपने; दद्धिः--दाँतों से; तत्--उस;बेदनायाम्--पीड़ा का; कतमाय--किसके साथ; कुप्येत्--कोई क्रोध करे।
यदि आप यह कहते हैं कि ये लोग ही मेरे सुख तथा दुख के कारण हैं, तो फिर ऐसी धारणाहोने पर आत्मा के लिए स्थान कहाँ रहता है? यह सुख तथा दुख आत्मा का नहीं होता अपितुभौतिक शरीरों की अन्योन्य क्रियाओं का है। यदि कोई व्यक्ति अपने ही दाँतों से अपनी जीभकाट लेता है, तो अपनी पीड़ा के लिए वह किस पर क्रोध करे ? दुःखस्य हेतुर्यदि देवतास्तुकिमात्मनस्तत्र विकारयोस्तत् ।यदड़मड़ेन निहन्यते क्वचित्क्रुध्येत कस्मै पुरुष: स्वदेहे ॥
५१॥
दुःखस्य--दुख का; हेतु:--कारण; यदि--यदि; देवता:--देवतागण ( शरीर के भीतर विविध इन्द्रियों के अधिष्ठाता ); तु--लेकिन; किम्ू--क्या; आत्मन:--आत्मा के लिए; तत्र--उस सम्बन्ध में; विकारयो: --विकारों ( इन्द्रियों तथा उनके अधिष्ठातृदेवों ) से सम्बन्धित; ततू--वह ( कर्म तथा उसका फल ); यत्--जब; अड़म्--अंग; अड्लेन--दूसरे अंग द्वारा; निहन्यते--चोटपहुँचाया जाता है; क्वचित्ू--कभी; क्रुध्येत--क्रुद्ध होना चाहिए; कस्मै--किस पर; पुरुष:--जीव; स्व-देहे-- अपने शरीर केभीतर
यदि आप यह कहें कि शारीरिक इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता दुख के देने वाले हैं, तो भीऐसा दुख आत्मा पर कैसे लागू हो सकता है? यह कर्म करना तथा उसके द्वारा प्रभावित होनापरिवर्तनशील इन्द्रियों तथा उनके अधिष्ठाता देवों की अन्योन्य क्रिया मात्र है। यदि शरीर का कोईअंग दूसरे अंग पर आक्रमण करे तो उस शरीर का धारक व्यक्ति किस पर क्रोध करे ? स्यात्सुखदु:खहेतुःकिमन्यतस्तत्र निजस्वभाव: ।न ह्ात्मनो उन्यद्यदि तन्मृषा स्यात्क्रुध्येत कस्मान्न सुखं न दुःखम् ॥
५२॥
आत्मा--आत्मा; यदि--यदि; स्थात्-- हो; सुख-दुःख--सुख तथा दुख का; हेतु:--कारण; किम्ू--क्या; अन्यत:--अन्य;तत्र--उस मत में; निज--अपना; स्वभाव: --स्वभाव, प्रकृति; न--नहीं; हि--निस्सन्देह; आत्मन:-- आत्मा की अपेक्षा;अन्यत्-- अलग से कोई वस्तु; यदि--यदि; तत्--वह; मृषा--झूठी; स्थात्--होगी; क्रुध्येत--कोई क्रोध करे; कस्मातू--किसपर; न--नहीं है; सुखम्--सुख; न--न तो; दुःखम्--दुख |
यदि आत्मा ही सुख तथा दुख का कारण होता, तो हम अन्यों को दोष न दे पाते, क्योंकितब सुख तथा दुख आत्मा के स्वभाव होते। इस मत के अनुसार आत्मा से भिन्न अन्य कुछविद्यमान नहीं होता और यदि हमें आत्मा के अतिरिक्त और किसी वस्तु का अनुभव करना पड़तातो वह मोह होता। इसलिए कोई अपने ऊपर या अन्यों पर क्रोध क्यों करे क्योंकि इस मत केअनुसार सुख तथा दुख का वास्तविक अस्तित्व ही नहीं है।
ग्रहा निमित्तं सुखदुःखयोश्चेत्किमात्मनोजस्य जनस्य ते वै ।ग्रहै्ग्रहस्थैव वदन्ति पीडांक्रुध्येत कस्मै पुरुषस्ततोउन्यः ॥
५३॥
ग्रहा:--अधिष्ठाता ग्रह; निमित्तम्ू--कारण; सुख-दुःखयो: --सुख या दुख का; चेत्ू--यदि; किम्--क्या; आत्मन:--आत्मा केलिए; अजस्य--अजन्मा; जनस्य--जिससे जन्म हुआ है उसका; ते--वे ग्रह; बै--निस्सन्देह; ग्रहैः--अन्य ग्रहों के द्वारा;ग्रहस्थ--ग्रह का; एब--एकमात्र; वदन्ति--( दक्ष ज्योतिषी ) कहते हैं; पीडामू--कष्ट; क्रुध्येत--क्रोध करे; कस्मै--किस पर;पुरुष: --जीव; ततः--उस शरीर से; अन्य:--पृथक् ।
और यदि हम इस संकल्पना की परीक्षा करें कि ग्रह ही सुख तथा दुख के तुरन्त कारणरूपहैं, तो भी नित्य आत्मा से उसका सम्बन्ध कहाँ हैं? आखिर, ग्रहों का प्रभाव केवल उन्हीं वस्तुओं पर पड़ता है जिनका जन्म हो चुका है। इसके अतिरिक्त कुशल ज्योतिषियों ने बतलाया है किकिस तरह विभिन्न ग्रह एक-दूसरे को केवल पीड़ा पहुँचाते हैं। इसलिए, जीव जो कि इन ग्रहोंतथा शरीर से पृथक् है, वह अपना क्रोध किस पर प्रकट करे ? कर्मास्तु हेतु: सुखदुःखयोश्वेत्किमात्मनस्तद्द्धि जडाजडत्वे ।देहस्त्वचित्पुरुषो यं सुपर्ण:क्रुध्येत कस्मै न हि कर्म मूलम् ॥
५४॥
कर्म--अपने सकाम कर्म; अस्तु--मान लिया कि; हेतु:--कारण; सुख-दुःखयो:--सुख तथा दुख का; चेत्--यदि; किम्--क्या; आत्मन:--आत्मा के लिए; तत्ू--वह कर्म; हि--निश्चय ही; जड-अजडत्वे-- भौतिक तथा अभौतिक दोनों में; देह:--शरीर; तु--दूसरी ओर; अचित्--निर्जीव; पुरुष:--पुरुष; अयम्--यह; सु-पर्ण:--सजीबव चेतना से युक्त; क्रुध्येत--क्रोधप्रकट करे; कस्मै--किस पर; न--नहीं हैं; हि--निश्चय ही; कर्म--सकाम कर्म; मूलम्--मूल कारण
यदि हम यह मान लें कि सकाम कर्म सुख तथा दुख का कारण है, तो भी हम आत्मा कीबात नहीं करते। भौतिक कर्म का भाव तब उदय होता है जब कोई चेतनकर्ता और भौतिकशरीर होता है, जो ऐसे कर्म के फल के रूप में सुख तथा दुख के विकारों को प्राप्त होता है।चूँकि शरीर में जीवन नहीं होता, इसलिए यह न तो सुख-दुख का असली प्रापक हो सकता है नही आत्मा जो अन्ततः पूर्णतया आध्यात्मिक है और शरीर से पृथक् रहता है। चूँकि कर्म का न तोशरीर पर, न ही आत्मा पर कोई परम आधार है, तो फिर कोई किस पर क्रोध करे ?श़ कालस्तु हेतु: सुखदुःखयो श्रेत्किमात्मनस्तत्र तदात्मकोडइसौ ।नाग्ने्हि तापो न हिमस्य तत्स्यात्क्रुध्येत कस्मै न परस्य द्वन्द्मम् ॥
५५॥
काल:--समय; तु--लेकिन; हेतु:--कारण; सुख-दुःखयो:--सुख तथा दुख का; चेत्ू--यदि; किम्--क्या; आत्मन:--आत्मा का; तत्र--उस भाव में; तत्ू-आत्मक:--काल पर आधारित; असौ--आत्मा; न--नहीं; अग्ने:-- अग्नि से; हि--निस्सन्देह; ताप:--जलन; न--नहीं; हिमस्थ--बर्फ का; तत्--वह; स्थात्--बनता है; क्रुध्येत--क्रोध करे; कस्मै--किस पर;न--नहीं है; परस्य--दिव्य आत्मा के लिए; दन्द्रम-द्वैत भाव
यदि हम काल को सुख तथा दुख का कारण मान लें, तो भी यह अनुभव आत्मा पर लागूनहीं हो सकता क्योंकि काल भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति की अभिव्यक्ति है और जीव भीउसी शक्ति के अंश हैं, जो काल के माध्यम से प्रकट होती है। यह निश्चित है कि आग अपनी लौया चिनगियों को नहीं जलाती, न ही शीत अपने ही रूप ओलों को हानि पहुँचाती है। वस्तुतःआत्मा दिव्य है और भौतिक सुख-दुख के अनुभव से परे है। इसलिए कोई किस पर क्रोध प्रकटकरे? न केनचित्क्वापि कथशञ्जनास्यद्न्द्दोपरागः परत: परस्य ।यथाहम:ः संसृतिरूपिण: स्या-देवं प्रबुद्धो न बिभेति भूते: ॥
५६॥
न--नहीं है; केनचित्--किसी के द्वारा; कब अपि--कहीं भी; कथज्लन--किसी तरह से; अस्य--उस ( आत्मा ) का; दन्द्र--द्वैत( सुख तथा दुख ) का; उपराग:--प्रभाव; परत: परस्थ-- भौतिक प्रकृति से परे रहने वाला; यथा--जसि तरह; अहम:--मिथ्याअहंकार के लिए; संसृति--जगत के प्रति; रूपिण:--रूप देने वाले; स्थात्--उदय होता है; एवम्--इस प्रकार; प्रबुद्ध:--जिसकी बुद्धि जागृत हो चुकी हो; न बिभेति--डरता नहीं; भूतैः--भौतिक सृष्टि के आधार पर।
मिथ्या अहंकार मायामय जगत को स्वरूप प्रदान करता है और इस तरह वह भौतिक सुखतथा दुख का अनुभव करता है। किन्तु आत्मा भौतिक प्रकृति से परे है। वह किसी भी स्थान,किसी भी दशा में या किसी भी व्यक्ति के माध्यम से भौतिक सुख तथा दुख द्वारा प्रभावित नहींहोता जो व्यक्ति इसे समझ लेता है उसे भौतिक सृष्टि से डरने की कोई बात नहीं।
णतां स आस्थाय परात्मनिष्ठा-मध्यासितां पूर्वतमैर्महर्षिभि: ।अहं तरिष्यामि दुरन्तपारंतमो मुकुन्दाड्घ्रिनिषिवयैव ॥
५७॥
एताम्--यह; सः--ऐसा; आस्थाय--पूरी तरह स्थिर होकर; पर-आत्म-निष्ठाम्--परम पुरुष कृष्ण की भक्ति में;अध्यासिताम्--पूजा किया; पूर्व-तमैः--पिछले; महा-ऋषिभि: -- आचार्य; द्वारा; अहम्--मैं; तरिष्यामि--पार करजाऊँगा;दुरन््त-पारम्--दुर्लघ्य; तम:--अविद्या का सागर; मुकुन्द-अड्ध्रि--मुकुन्द के चरणकमलों की; निषेवया--सेवा द्वारा; एब--निश्चय ही |
मैं कृष्ण के चरणकमलों की सेवा में हढ़ रह कर अविद्या के दुर्लघध्य सागर को पार कर जाऊँगा। इसकी पुष्टि पिछले आचार्यों द्वारा की गई है, जो परमात्मा की भक्ति में स्थिर थे।
श्रीभगवानुवाचनिर्विद्य नष्टद्रविणे गतक्लमःप्रत्नज्य गां पर्यटमान इत्थम् ।निराकृतोसद्धिरपि स्वधर्मा-दकम्पितोमूं मुनिराह गाथाम् ॥
५८ ॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; निर्विद्य--विरक्त होकर; नष्ट-द्रविणे--सम्पत्ति के नष्ट हो जाने पर; गत-क्लम:--खिन्नता से मुक्त; प्रव्रज्य--गृह त्याग कर; गाम्--पृथ्वी पर; पर्यटमान:--पर्यटन करते हुए; इत्थम्--इस प्रकार से; निराकृत:--अपमानित; असद्धि: --धूर्तों द्वारा; अपि-- भी; स्व-धर्मात्--अपने नियत कार्यों से; अकम्पित:--विचलित हुए बिना; अमूम्--यह; मुनिः--साधु ने; आह--गाया; गाथाम्ू--गीत |
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा : अपनी सम्पत्ति नष्ट होने से इस तरह विरक्त हुए इस साधु नेअपनी खिन्नता त्याग दी। उसने संन्यास ग्रहण करके घर त्याग दिया और पृथ्वी पर विचरण करनेलगा। वह मूर्ख धूर्तों द्वारा अपमानित किये जाने पर भी अपने कर्तव्य में अविचल रहा और उसनेयह गीत गाया।
सुखदु:खप्रदो नान्यः पुरुषस्यात्मविश्रम: ।मित्रोदासीनरिपव: संसारस्तमसः कृतः ॥
५९॥
सुख-दुःख-प्रद:--सुख तथा दुख देने वाला; न--नहीं है; अन्य: --कोई दूसरा; पुरुषस्थ--आत्मा का; आत्म--मन का;विशभ्रम:--मोह; मित्र--मित्र; उदासीन-- अन्यमनस्क लोग; रिपव: --तथा शत्रु; संसार: -- भौतिक जीवन; तमस: --अज्ञानवश;कृतः--उत्पन्न
मनुष्य का अपना ही मानसिक भ्रम आत्मा को सुख तथा दुख का अनुभव कराता है, अन्यकोई नहीं। मित्रों, निरपेक्ष लोगों तथा शत्रुओं के विषय में उसकी धारणा तथा इस धारणा केचारों ओर जिस भौतिक जीवन का वह निर्माण करता है, सभी मात्र अज्ञान के कारण उत्पन्न होतेहैं।
तस्मात्सर्वात्मना तात निगृहाण मनो धिया ।मय्यावेशितया युक्त एतावान्योगसड्ग्रह: ॥
६०॥
तस्मात्--इसलिए; सर्व-आत्मना--सभी तरह से; तात--हे उद्धव; निगृहाण --वश में करो; मनः--मन; धिया--बुद्धि से;मयि--मुझमें; आवेशितया--लीन हुआ; युक्त:--संयुक्त; एतावान्--इस प्रकार; योग-सड्ग्रह:--आध्यात्मिक अभ्यास कासार
हे उद्धव, तुम्हें चाहिए कि अपनी बुद्धि मुझ पर स्थिर करके अपने मन को पूरी तरह से वशमें लाओ। योग के विज्ञान का सार यही है।
यएतां भिक्षुणा गीतां ब्रह्मनिष्ठां समाहित: ।धारयज्छावयज्छुण्वन्द्नन्द्दैनैवाभिभूयते ॥
६१॥
यः--जो कोई भी; एताम्--इस; भिक्षुणा--संन्यासी द्वारा; गीताम्--गाया हुआ; ब्रह्म --ब्रह्म-ज्ञान; निष्ठामू--पर आधारित;समाहित: --पूरे ध्यान से; धारयन्-- ध्यान करते हुए; श्राववन्--अन्यों को सुनाते हुए; श्रुण्वन्ू--स्वयं सुनते हुए; दन्द्दैः--द्वैतोंसे; न--कभी नहीं; एब--निस्सन्देह; अभिभूयते-- अभिभूत हो जायेगा।
जो कोई भी संनन््यासी के इस गीत को सुनता या अन्यों को सुनाता है, जिसमें ब्रह्न विषयकवैज्ञानिक ज्ञान प्रस्तुत हुआ है तथा इस तरह जो कोई पूरे मनोयोग से इसका ध्यान करता है, वह फिर कभी भौतिक सुख-दुख के द्वैत से अभिभूत नहीं होगा।
