← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची
अध्याय सात: भगवान कृष्ण उद्धव को निर्देश देते हैं
श्रीभगवानुवाचयदात्थ मां महाभाग तच्चिकीर्षितमेव मे ।ब्रह्मा भवो लोकपाला: स्वर्वासं मेडभिकाड्क्षिण: ॥
१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; यत्--जो कुछ; आत्थ--आपने कहा; माम्--मुझसे; महा-भाग--हे अत्यन्तभाग्यशाली उद्धव; तत्ू--वह; चिकीर्षितम्--जिसे मैं करने का इच्छुक हूँ; एबव--निश्चय ही; मे--मेरा; ब्रह्मा --ब्रह्मा; भव: --शिव; लोक-पाला:--सारे लोकों के नायक; स्व:-वासम्--वैकुण्ठ धाम; मे--मेरा; अभिकाडुभक्षिण: --वे इच्छा कर रहे हैं।
भगवान् ने कहा : हे महाभाग्यशाली उद्धव, तुमने इस पृथ्वी पर से यदुबंश को समेटने कीतथा बैकुण्ठ में अपने धाम लौटने की मेरी इच्छा को सही सही जान लिया है। इस तरह ब्रह्मा,शिव तथा अन्य सारे लोक-नायक, अब मुझसे प्रार्थना कर रहे हैं कि मैं अपने वैकुण्ठ-धामवापस चला जाऊँ।
मया निष्पादितं ह्वत्र देवकार्यमशेषतः ।यदर्थमवतीर्णो हमंशेन ब्रह्मणाथित: ॥
२॥
मया--मेरे द्वारा; निष्पादितम्--सम्पन्न किया गया; हि--निश्चय ही; अत्र--इस जगत में; देव-कार्यम्ू--देवताओं के लाभ केलिए कार्य; अशेषत:--पूर्णतया, करने को कुछ भी शेष नहीं रहा; यत्--जिसके; अर्थम्--हेतु; अवतीर्ण: --अवतरित हुआ;अहम्--ैं; अंशेन--अपने स्वांश, बलदेव सहित; ब्रह्मणा--ब्रह्मा द्वारा; अर्थित: --प्रार्थना किये जाने पर।
ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थना करने पर मैंने इस संसार में अपने स्वांश बलदेव सहित अवतार लियाथा और देवताओं की ओर से अनेक कार्य सम्पन्न किये। अब यहाँ पर मैं अपना मिशन पूरा करचुका हूँ।
कुल वै शापनिर्दग्धं नड्छ््यत्यन्योन्यविग्रहात् ।समुद्र: सप्तमे होनां पुरीं च प्लावयिष्यति ॥
३॥
कुलम्--यह यदुवंश; बै--निश्चित रूप से; शाप--शाप से; निर्दग्धम्--समाप्त; नड्छ््यति--विनष्ट हो जायेगा; अन्योन्य--परस्पर; विग्रहात्ू--झगड़े से; समुद्र:--समुद्र; सप्तमे--सातवें दिन; हि--निश्चय ही; एनामू--इस; पुरीम्ू--नगरी को; च--भी;प्लावयिष्यति--आप्लावित कर देगा।
अब ब्राह्मणों के शाप से यह यदुवंश निश्चित रूप से परस्पर झगड़ कर समाप्त हो जायेगाऔर आज से सातवें दिन यह समुद्र उफन कर इस द्वारका नगरी को आप्लावित कर देगा।
यहाँवायं मया त्यक्तो लोकोयं नष्टमड्रल: ।भविष्यत्यचिरात्साधो कलिनापि निराकृत:ः ॥
४॥
यहि--जब; एव--निश्चित रूप से; अयम्ू--यह; मया--मेरे द्वारा; त्यक्त:--छोड़ा हुआ; लोक: --संसार; अयम्ू--यह; नष्ट-मड्ुलः--समस्त मंगल या दया से विहीन; भविष्यति--हो जायेगा; अचिरातू--शीघ्र ही; साधो--हे साधु-पुरुष; कलिना--'कलि के कारण; अपि--स्वयं; निराकृतः --अभिभूत |
हे साधु उद्धव, मैं निकट भविष्य में इस पृथ्वी को छोड़ दूँगा। तब कलियुग से अभिभूतहोकर यह पृथ्वी समस्त पवित्रता से विहीन हो जायेगी।
न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले ।जनोभद्गरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे ॥
५॥
न--नहीं; वस्तव्यम्--रहे आना चाहिए; त्वया--तुम्हारे द्वारा; एव--निश्चय ही; इह--इस जगत में; मया--मेरे द्वारा; त्यक्ते--त्यागे हुए; महीतले--पृथ्वी पर; जन:ः--लोग; अभद्र--पापी, अशुभ वस्तुएँ; रुचिः--लिप्त; भद्ग--हे पापरहित एवं मंगलमय;भविष्यति--हो जायेगा; कलौ--इस कलि; युगे--युग में |
हे उद्धव, जब मैं इस जगत को छोड़ चुकूँ, तो तुम्हें इस पृथ्वी पर नहीं रहना चाहिए। हे प्रियभक्त, तुम निष्पाप हो, किन्तु कलियुग में लोग सभी प्रकार के पापपूर्ण कार्यों में लिप्त रहेंगे,अतएव तुम्हें यहाँ नहीं रूकना चाहिए।
त्वं तु सर्व परित्यज्य स्नेह स्वजनबन्धुषु ।मय्यावेश्य मन: संयकक््समहग्विचरस्व गाम् ॥
६॥
त्वम्--तुम; तु--वस्तुतः; सर्वम्--समस्त; परित्यज्य--छोड़ कर; स्नेहम्--स्नेह; स्व-जन-बन्धुषु-- अपने सम्बन्धियों तथा मित्रोंके प्रति; मयि--मुझ भगवान् में; आवेश्य--एकाग्र करके; मनः--मन को; संयक्--पूरी तरह; सम-हक्--हर एक को समानइृष्टि से देखते हुए; विचरस्व--विचरण करो; गाम्--पृथ्वी-भर में |
अब तुम्हें चाहिए कि अपने निजी मित्रों तथा सम्बन्धियों से अपने सारे नाते त्याग कर, अपनेमन को मुझ पर एकाग्र करो। इस तरह सदैव मेरी भावना से भावित होकर, तुम्हें सारी वस्तुओंको समान दृष्टि से देखना चाहिए और पृथ्वी-भर में विचरण करना चाहिए।
text:यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्या श्रवणादिभि: । नथ्वरं गृह्ममाणं चर विद्धि मायामनोमयम् ॥
७॥
यत्--जो; इृदम्--इस जगत को; मनसा--मन से; वाचा--वाणी से; चश्षुभ्याम्-आँखों से; श्रवण-आदिभि:--कानों तथा अन्य इन्द्रियों से; नश्वरम्--क्षणिक; गृह्ममाणम्--जिसे स्वीकार या अनुभव किया जा रहा हो; च--तथा; विद्धधि--तुम्हें जानना चाहिए; माया-मनः-मयम्--माया के प्रभाव से इसे असली करके केवल कल्पित किया जाता है।
हे उद्धव, तुम जिस ब्रह्माण्ड को अपने मन, वाणी, नेत्रों, कानों तथा अन्य इन्द्रियों से देखते हो वह भ्रामक सृष्टि है, जिसे माया के प्रभाव से मनुष्य वास्तविक मान लेता है। वास्तव में, तुम्हें यह जानना चाहिए कि भौतिक इन्द्रियों के सारे विषय क्षणिक हैं। पुंसोयुक्तस्य नानार्थो भ्रम: स गुणदोषभाक् ।कर्माकर्मविकर्मेति गुणदोषधियो भिदा ॥
८॥
पुंसः--व्यक्ति का; अयुक्तस्थ--जिसका मन सत्य से पराड्मुख है; नाना--अनेक; अर्थ:--अर्थ; भ्रम:--सन्देह; सः--वह;गुण--अच्छाई; दोष--बुराई; भाक्ू--देहधारण किये; कर्म--अनिवार्य कर्तव्य; अकर्म--नियत कर्तव्यों का न किया जाना;विकर्म--निषिद्ध कर्म; इति--इस प्रकार; गुण--अच्छाइयाँ; दोष--बुराइयाँ; धियः--अनुभव करने वाले की; भिदा--यह
अन्तर जिसकी चेतना माया से मोहित होती है, वह भौतिक वस्तुओं के मूल्य तथा अर्थ में अनेकअन्तर देखता है। इस प्रकार वह भौतिक अच्छाई तथा बुराई के स्तर पर निरन्तर लगा रहता हैऔर ऐसी धारणाओं से बँधा रहता है। भौतिक द्वैत में लीन रहते हुए, ऐसा व्यक्ति अनिवार्यकर्तव्यों की सम्पन्नता, ऐसे कर्तव्यों की असम्पन्नता तथा निषिद्ध कार्यों की सम्पन्नता के विषय मेंकल्पना करता रहता है।
तस्मायुक्तेन्द्रियग्रामो युक्तचित्त इदम्जगत् ।आत्मनीक्षस्व विततमात्मानं मय्यधी श्वर ॥
९॥
तस्मात्ू--इसलिए; युक्त--वश में लाकर; इन्द्रिय-ग्राम:--सारी इन्द्रियों को; युक्त--दमन करके; चित्त:--अपना मन; इृदम्--यह; जगत्--संसार; आत्मनि--आत्मा के भीतर; ईक्षस्व--देखो; विततम्--विस्तीर्ण ( भौतिक भोग की वस्तु के रूप में );आत्मानम्--तथा उस आत्मा को; मयि--मुझ; अधी श्वरे--परम नियन्ता में |
इसलिए अपनी सारी इन्द्रियों को वश में करते हुए तथा मन को दमन करके, तुम सारे जगतको आत्मा के भीतर स्थित देखो, जो सर्वत्र प्रसारित है। यही नहीं, तुम इस आत्मा को मुझ पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् के भीतर भी देखो।
ज्ञानविज्ञानसंयुक्त आत्मभूतः शरीरिणाम् ।अत्मानुभवतुष्टात्मा नान्तरायैर्विहन्यसे ॥
१०॥
ज्ञान--वेदों का निर्णायक ज्ञान; विज्ञान--तथा व्यावहारिक ज्ञान; संयुक्त:--से युक्त; आत्म-भूतः--स्नेह की वस्तु;शरीरिणाम्--सारे देहधारी जीवों ( देवतादि से शुरु करके ) के लिए; आत्म-अनुभव--आत्मा के प्रत्यक्ष अनुभव द्वारा; तुष्ट-आत्मा--तुष्ट मन वाला; न--कभी नहीं; अन्तरायै: --उत्पातों ( विध्नों ) से; विहन्यसे--तुम्हारी प्रगति रोक दी जायेगी।
वेदों के निर्णायक ज्ञान से समन्वित होकर तथा व्यवहार में ऐसे ज्ञान के चरम उद्देश्य कीअनुभूति करके, तुम शुद्ध आत्मा का अनुभव कर सकोगे और इस तरह तुम्हारा मन तुष्ट हो जायेगा। उस समय तुम देवतादि से लेकर सारे जीवों के प्रिय बन जाओगे और तब तुम जीवन केकिसी भी उत्पात से रोके नहीं जाओगे।
दोषबुद्धयो भयातीतो निषेधान्न निवर्तते ।गुणबुद्धया च विहितं न करोति यथार्भक: ॥
११॥
दोष-बुद्धबा--यह सोचने से कि ऐसा काम गलत है; उभय-अतीतः--दोनों ( संसारी अच्छे तथा बुरे की धारणाओं ) को लाँघजाने वाला; निषेधात्--जो वर्जित है, उससे; न निवर्तते--अपने को दूर नहीं रखता; गुण-बुद्धया--यह सोचकर कि यह ठीकहै; च-- भी; विहितम्ू--जिसका आदेश हुआ है, वैध; न करोति--नहीं करता; यथा--जिस तरह; अर्भक:--छोटा बालक
जो भौतिक अच्छाई तथा बुराई को लाँघ चुका होता है, वह स्वतः धार्मिक आदेशों केअनुसार कार्य करता है और वर्जित कार्यों से बचता है। स्वरूपसिद्ध व्यक्ति यह सब अबोधबालक की तरह अपने आप करता है वरन् इसलिए नहीं कि वह भौतिक अच्छाईं तथा बुराई केरूप में सोचता रहता है।
सर्वभूतसुहच्छान्तो ज्ञानविज्ञाननिश्चय: ।पश्यन्मदात्मकं विश्व न विपद्येत वै पुन: ॥
१२॥
सर्व-भूत--समस्त प्राणियों के प्रति; सु-हत्--शुभेषी; शान्तः--शान्त; ज्ञान-विज्ञान--ज्ञान तथा दिव्य अनुभूति में; निश्चय: --हढ़तापूर्वक स्थित; पश्यनू--देखते हुए; मत्-आत्मकम्-मेरे द्वारा व्याप्त; विश्वम्--ब्रह्माण्ड को; न विपद्येत--जन्म-पृत्यु केअक्कर में कभी नहीं पड़ेगा; वै--निस्सन्देह; पुनः--फिर से |
जो व्यक्ति सारे जीवों का शुभेषी है, जो शान्त है और ज्ञान तथा विज्ञान में हृढ़ता से स्थिर है,वह सारी वस्तुओं को मेरे भीतर देखता है। ऐसा व्यक्ति फिर से जन्म-मृत्यु के चक्र में कभी नहींपड़ता।श्रीशुक उबाच इत्यादिष्टो भगवता महाभागवतो नृप ।उद्धव: प्रणिपत्याह तत्त्वं जिज्ञासुरच्युतम् ॥
१३॥
श्री-शुकः उवाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; आदिष्ट:--आदेश दिया गया; भगवता-- भगवान् द्वारा;महा-भागवतः-- भगवान् के महान् भक्त; नृप--हे राजा; उद्धवः--उद्धव ने; प्रणिपत्य--नमस्कार करके; आह--कहा;तत्त्वम्-वैज्ञानिक सत्य; जिज्ञासु:--सीखने के लिए उत्सुक होने से; अच्युतम्--अच्युत
भगवान् से श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, इस तरह भगवान् कृष्ण ने अपने शुद्ध भक्त उद्धवको उपदेश दिया, जो उनसे ज्ञान पाने के लिए उत्सुक थे। तत्पश्चात्, उद्धव ने भगवान् कोनमस्कार किया और उनसे इस प्रकार बोले।
श्रीउद्धव उवाचयोगेश योगविन्यास योगात्मन्योगसम्भव ।निःश्रेयसाय मे प्रोक्तस्त्याग: सन््यासलक्षण: ॥
१४॥
श्री-उद्धवः उबाच-- श्री उद्धव ने कहा; योग-ईश--हे योग के फल को देने वाले; योग-विन्यास-- अयोग्यों को भी योगशक्तिप्रदान करने वाले; योग-आत्मन्--योग के द्वारा जाने जानेवाले, हे परम आत्मा; योग-सम्भव--हे समस्त योगशक्ति के उद्गम;निःश्रेयसाय--परम लाभ हेतु; मे--मेरे; प्रोक्त:--आपने, जो कहा है; त्याग:--वैराग्य; सन््यास--संन्यास आश्रम स्वीकार करनेसे; लक्षण:--लक्षण से युक्त |
श्री उद्धव ने कहा : हे स्वामी, आप ही योगाभ्यास के फलों को देने वाले हैं और आप इतनेकृपालु हैं कि अपने प्रभाव से आप अपने भक्त को योगसिद्धि वितरित करते हैं। इस तरह आपपरमात्मा हैं, जिसकी अनुभूति योग द्वारा होती है और आप ही समस्त योगशक्ति के उद्गम हैं।आपने मेरे उच्चतम लाभ के लिए संन्यास या वैराग्य द्वारा भौतिक जगत त्यागने की विधिबतलाई है।
त्यागो<यं दुष्करो भूमन्कामानां विषयात्मभिः ।सुतरां त्वयि सर्वात्मिन्नभक्तिरिति मे मति: ॥
१५॥
त्याग: --वैराग्य; अयम्ू--यह; दुष्कर:--सम्पन्न करना कठिन; भूमन्--हे स्वामी; कामानाम्-- भौतिक भोग का; विषय--इन्द्रियतृप्ति; आत्मभि:--समर्पित; सुतराम्ू--विशेष रूप से; त्वयि--तुममें; सर्व-आत्मन्--हे परमात्मा; अभक्तै: --भक्तिविहीनोंद्वारा; इति-- इस प्रकार; मे--मेरा; मतिः--मत।
हे प्रभु, हे परमात्मा, ऐसे लोगों के लिए, जिनके मन इन्द्रियतृप्ति में लिप्त रहते हैं औरविशेषतया उनके लिए, जो आपकी भक्ति से वंचित हैं, भौतिक भोग को त्याग पाना अतीवकठिन है। ऐसा मेरा मत है।
सोहं ममाहमिति मूढमतिर्विगाढ-स्त्वन्मायया विरचितात्मनि सानुबन्धे ।तत्त्वज्जसा निगदितं भवता यथाहंसंसाधयामि भगवन्ननुशाधि भृत्यम् ॥
१६॥
सः--वह; अहम्--मैं; मम अहमू---' मैं ' तथा 'मेरा ' का झूठा विचार; इति--इस प्रकार; मूढ--अत्यन्त मूर्ख; मतिः --चेतना; विगाढ:--लीन; त्वत्ू-मायया--आपकी माया से; विरचित--निर्मित; आत्मनि--शरीर में; स-अनुबन्धे --शारीरिकसम्बन्धों सहित; ततू--इसलिए; तु--निस्सन्देह; अज्लसा--सरलता से; निगदितम्--उपदेश दिया हुआ; भवता--आपके द्वारा;यथा--विधि जिससे; अहम्--मैं; संसाधयामि--सम्पन्न कर सकूँ; भगवन्--हे भगवान्; अनुशाधि--शिक्षा दें; भृत्यम्ू-- अपनेसेवक को।
हे प्रभु, मैं स्वयं सबसे बड़ा मूर्ख हूँ, क्योंकि मेरी चेतना आपकी माया द्वारा निर्मित भौतिकदेह तथा शारीरिक सम्बन्धों में लीन है। इस तरह मैं सोच रहा हूँ, 'मैं यह शरीर हूँ और ये सारे सम्बन्धी मेरे हैं।अतएव हे स्वामी, अपने इस दीन सेवक को उपदेश दें। कृपया मुझे बतायें किमैं आपके आदेशों का किस तरह सरलता से पालन करूँ ? सत्यस्य ते स्वहश आत्मन आत्मनोन्यंवक्तारमीश विबुधेष्वपि नानुचक्षे ।सर्वे विमोहितधियस्तव माययेमेब्रह्मादयस्तनुभूतो बहिरर्थभावा: ॥
१७॥
सत्यस्य--परम सत्य का; ते-- आपके अतिरिक्त; स्व-हृशः--आपको प्रकट करने वाला; आत्मन:--मेरे स्वयं के लिए;आत्मन:-- भगवान् की अपेक्षा; अन्यम्--दूसरा; वक्तारम्--योग्य वक्ता; ईश--हे प्रभु; विबुधेषु--देवताओं से; अपि--ही;न--नहीं; अनुचक्षे--मैं देख सकता हूँ; सर्वे--वे सभी; विमोहित--मोह ग्रस्त; धियः--उनकी चेतना; तव--तुम्हारी; मायया--माया द्वारा; इमे--ये; ब्रह्य-आदय: --ब्रह्मा इत्यादि; तनु-भूृतः-- भौतिक शरीर से युक्त बद्धजीव; बहि:--बाह्य वस्तुओं में;अर्थ--परम मूल्य; भावा: --विचार करते हुए।
हे प्रभु, आप परम सत्य भगवान् हैं और आप अपने भक्तों को अपना रूप दिखलाते हैं। मुझेआपके अतिरिक्त कोई ऐसा नहीं दिखता जो वास्तव में मुझे पूर्ण ज्ञान बतला सके। ऐसा पूर्णशिक्षक स्वर्ग में देवताओं के बीच भी ढूँढ़े नहीं मिलता। निस्सन्देह ब्रह्मा इत्यादि सारे देवता आपकी मायाशक्ति से मोहग्रस्त हैं। वे बद्धजीव हैं, जो अपने भौतिक शरीरों तथा शारीरिक अंशोंको सर्वोच्च सत्य मान लेते हैं।
तस्माद्धवन्तमनवद्यमनन्तपारंसर्वज्ञमी श्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम् ।निर्विण्णधीरहमु हे वृजिनाभितप्तोनारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥
१८ ॥
तस्मात्ू--इसलिए; भवन्तम्--आपको; अनवद्यम्--पूर्ण; अनन्त-पारम्-- असीम; सर्व ज्ञम्--सर्वज्ञ; ईश्वरम्-- भगवान् को;अकुण्ठ--किसी शक्ति से अविचलित; विकुण्ठ--वैकुण्ठ-लोक ; धिष्ण्यम्ू--जिनका निजी धाम; निर्विण्ण--विरक्त अनुभवकरते हुए; धीः--मेरा मन; अहम्--मैं; उ हे--हे ( स्वामी ); वृजिन-- भौतिक कष्ट द्वारा; अभितप्त:ः--सताया हुआ;नारायणम्--नारायण की; नर-सखम्--अति सूक्ष्म जीव का मित्र; शरणमू् प्रपद्ये--शरण में जाता हूँ।
अतएबव हे स्वामी, भौतिक जीवन से ऊब कर तथा इसके दुखों से सताया हुआ मैं आपकीशरण में आया हूँ, क्योंकि आप पूर्ण स्वामी हैं। आप अनन्त, सर्वज्ञ भगवान् हैं, जिनकाआध्यात्मिक निवास बैकुण्ठ में होने से समस्त उपद्रवों से मुक्त है। वस्तुतः: आप समस्त जीवों केमित्र नारायण नाम से जाने जाते हैं।
श्रीभगवानुवाचप्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणा: ।समुद्धरन्ति ह्ात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥
१९॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् कृष्ण ने कहा; प्रायेण--सामान्यतः; मनुजा:--मनुष्यगण; लोके--इस जगत में; लोक-तत्त्व--भौतिक जगत की वास्तविक स्थिति; विचक्षणा:--पंडित; समुद्धरन्ति--उद्धार करते हैं; हि--निस्सन्देह; आत्मानम्--अपने से;आत्मना--अपनी बुद्धि से; एब--निस्सन्देह; अशुभ-आशयातू--इन्द्रियतृप्ति की इच्छा की अशुभ मुद्रा से।
भगवान् ने उत्तर दिया : सामान्यतया वे मनुष्य, जो भौतिक जगत की वास्तविक स्थिति कादक्षतापूर्वक विश्लेषण कर सकते हैं, अपने आपको स्थूल भौतिक तृप्ति के अशुभ जीवन सेऊपर उठाने में समर्थ होते हैं।
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।यत्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोडइसावनुविन्दते ॥
२०॥
आत्मन:--अपना ही; गुरु:--उपदेश देने वाला गुरु; आत्मा--स्वयं; एव--निस्सन्देह; पुरुषस्य--मनुष्य का; विशेषत:ः --विशेषअर्थ में; यत्--क्योंकि; प्रत्यक्ष--प्रत्यक्ष अनुभूति से; अनुमानाभ्याम््--तर्क के प्रयोग से; श्रेयः--असली लाभ; असौ--वह;अनुविन्दते--प्राप्त कर सकता है।
बुद्धिमान व्यक्ति, जो अपने चारों ओर के जगत का अनुभव करने तथा ठोस तर्क का प्रयोगकरने में निपुण होता है, अपनी ही बुद्धि के द्वारा असली लाभ प्राप्त कर सकता है। इस प्रकारकभी कभी मनुष्य अपना ही उपदेशक गुरु बन जाता है।
पुरुषत्वे च मां धीरा: साड्ख्ययोगविशारदा: ।आविस्तां प्रपश्यन्ति सर्वशक्त्युपबृंहितम् ॥
२१॥
पुरुषत्वे--मनुष्य-जीवन में; च--तथा; माम्--मुझको; धीरा: --आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से ईर्ष्या से मुक्त हुए; साइ्ख्य-योग--वैश्लेषिक ज्ञान तथा भगवद्भक्ति से बने आध्यात्मिक विज्ञान में; विशारदा:--दक्ष; आविस्तराम्--प्रत्यक्षतः प्रकट;प्रपश्यन्ति--वे स्पष्ट देखते हैं; सर्व--सभी; शक्ति--मेरी शक्ति से; उपबूंहितम्--प्रदत्त, समन्वित |
मनुष्य-जीवन में जो लोग आत्मसंयमी हैं और सांख्य योग में दक्ष हैं, वे मुझे मेरी सारीशक्तियों समेत प्रत्यक्ष देख सकते हैं।
एकद्वित्रिचतुस्पादो बहुपादस्तथापद: ।बह्व्यः सन्ति पुरः सृष्टास्तासां मे पौरुषी प्रिया ॥
२२॥
एक--एक; द्वि--दो; त्रि--तीन; चतु:--चार; पाद:--पाँव से युक्त; बहु-पाद:-- अनेक पाँवों से युक्त; तथा-- भी; अपद:--बिना पाँव के; बह्व्यः--अनेक; सन्ति-- हैं; पुरः--विभिन्न प्रकार के शरीर; सृष्टाः--निर्मित; तासाम्--उनका; मे--मुझको;पौरुषी--मनुष्य-रूप; प्रिया--अत्यन्त प्रिय |
इस जगत में अनेक प्रकार के सृजित शरीर हैं--कुछ एक पाँव वाले, कुछ दो, तीन, चार याअधिक पाँवों वाले तथा अन्य बिना पाँव के हैं, किन्तु इन सबों में मनुष्य-रूप मुझे वास्तविकप्रिय है।
अत्र मां मृगयन्त्यद्धा युक्ता हेतुभिरी ध्वरम् ।गृह्ममाणैर्गुणैलिड्रैरग्राह्ममनुमानतः ॥
२३॥
अत्र--यहाँ ( मनुष्य-रूप में ); माम्--मुझे; मृगयन्ति--ढूँढ़ते हैं; अद्धा--सीधे; युक्ता:--स्थित; हेतुभिः--प्रकट लक्षणों से;ईश्वरम--ईश्वर को; गृह्ममाणै: गुणै:--अनुभव करने वाली बुद्धि, मन तथा इन्द्रियों से; लिड्रे:--तथा अप्रत्यक्ष रूप से निश्चितकिये गये लक्षणों से; अग्राह्मम--प्रत्यक्ष अनुभूति की पकड़ से परे; अनुमानतः--तर्क विधि से |
यद्यपि मुझ भगवान् को सामान्य इन्द्रिय अनुभूति से कभी पकड़ा नहीं जा सकता, किन्तुमनुष्य-जीवन को प्राप्त लोग प्रत्यक्ष रूप से मेरी खोज करने के लिए प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्षनिश्चित लक्षणों द्वारा अपनी बुद्धि तथा अन्य अनुभूति-इन्द्रियों का उपयोग कर सकते हैं।
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।अवधूतस्य संवादं यदोरमिततेजस: ॥
२४॥
अत्र अपि--इस विषय में; उदाहरन्ति--उदाहरण देते हैं; इमम्--इस; इतिहासम्--ऐतिहासिक वृत्तान्त को; पुरातनम्ू-- प्राचीन;अवधूतस्य--सामान्य विधि-विधानों की परिधि से बाहर कार्य करने वाला पवित्र व्यक्ति; संवादम्--वार्ता को; यदो: --तथाराजा यदु की; अमित-तेजस:--असीम शक्ति वाले |
इस सम्बन्ध में साधु-पुरुष अत्यन्त शक्तिशाली राजा यदु तथा एक अवधूत से सम्बद्ध एकऐतिहासिक वार्ता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
अवधूत॑ द्वियं कदश्धिच्चरन्तमकुतो भयम् ।कविं निरीक्ष्य तरुणं यदु: पप्रच्छ धर्मवित् ॥
२५॥
अवधूतम्--साधु; द्विजम्--ब्राह्मण को; कञ्ञित्--कुछ; चरन्तम्ू--विचरण करते हुए; अकुत:-भयम्--किसी प्रकार के भयके बिना; कविम्--विद्धान; निरीक्ष्य--देखकर; तरुणम्--युवा; यदुः--राजा यदु ने; पप्रच्छ--पूछा; धर्म-वित्-- धार्मिकसिद्धान्तों में दक्ष
महाराज यदु ने एक बार किसी ब्राह्मण अवधूत को देखा, जो तरूण तथा दिद्वान प्रतीतहोता था और निर्भय होकर विचरण कर रहा था। आध्यात्मिक विज्ञान में अत्यन्त पारंगत होने केकारण राजा ने इस अवसर का लाभ उठाया और उसने इस प्रकार उससे पूछा।
श्रीयदुरुवाचकुतो बुद्धिरियं ब्रह्मन्नकर्तु: सुविशारदा ।यामासाद्य भवाल्लोकं दिद्वांश्वतति बालवत् ॥
२६॥
श्री-यदुः उवाच--राजा यदु ने कहा; कुतः--कहाँ से; बुद्धिः--बुद्धि; इयम्--यह; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; अकर्तु:--किसी काममें न लगे रहने वाले के; सु-विशारदा--अत्यन्त विस्तृत; यामू--जो; आसाद्य--प्राप्त करके; भवान्ू-- आप; लोकम्--संसारमें; विद्वानू--ज्ञान से पूर्ण होकर; चरति--विचरण करता है; बाल-वत्--बालक के समान।
श्री यदु ने कहा : हे ब्राह्मण, मैं देख रहा हूँ कि आप किसी व्यावहारिक धार्मिक कृत्य मेंनहीं लगे हुए हैं, तो भी आपने इस जगत में सारी वस्तुओं तथा सारे लोगों की सही-सहीजानकारी प्राप्त कर रखी है। हे महानुभाव, मुझे बतायें कि आपने यह असाधारण बुद्धि कैसेप्राप्त की है और आप सारे जगत में बच्चे की तरह मुक्त रूप से विचरण क्यों कर रहे हैं ? प्रायो धर्मार्थकामेषु विवित्सायां च मानवा: ।हेतुनेव समीहन्त आयुषो यशसः थ्रिय: ॥
२७॥
प्रायः--सामान्यतया; धर्म--धर्म; अर्थ--आर्थिक विकास; कामेषु--तथा इन्द्रियतृप्ति में; विवित्सायामू--आध्यात्मिक ज्ञान कीखोज में; च-- भी; मानवा:--मनुष्यगण; हेतुना-- अभिप्राय के लिए; एव--निस्सन्देह; समीहन्ते--प्रयत्न करते हैं; आयुष: --दीर्घायु की; यशस:--यश की; थ्रियः--तथा भौतिक ऐश्वर्य की |
सामान्यतया मनुष्य धर्म, अर्थ, काम तथा आत्मा विषयक ज्ञान का अनुशीलन करने के लिएकठिन परिश्रम करते हैं। उनका सामान्य मन्तव्य अपनी आयु को बढ़ाना, यश अर्जित करना तथाभौतिक ऐश्वर्य का भोग करना रहता है।
त्वं तु कल्पः कविर्दक्ष: सुभगोईमृतभाषण: ।न कर्ता नेहसे किश्चिज्जडोन्मत्तपिशाचवत् ॥
२८॥
त्वमू--तुम; तु--फिर भी; कल्प:--सक्षम; कवि:--विद्वान; दक्ष: --पटु; सु-भग:ः--सुन्दर; अमृत-भाषण:--अमृततुल्य वाणीसे युक्त; न--नहीं; कर्ता--करने वाला; न ईहसे--तुम इच्छा नहीं करते; किल्ञित्--कोई भी वस्तु; जड--अचर; उन्मत्त--पागल बना हुआ; पिशाच-बत्--पिशाच के समान।
तथापि समर्थ, विद्वान, दक्ष, सुन्दर तथा सुस्पष्ट वक्ता होते हुए भी आप न तो कोई कामकरने में लगे हैं, न ही आप किसी वस्तु की इच्छा करते हैं, प्रत्युत जड़वत तथा उन्मत्त प्रतीत होतेहैं, मानो कोई पिशाच हो।
जनेषु दह्ममानेषु कामलोभदवाग्निना ।न तप्यसेग्निना मुक्तो ग्ढम्भ:स्थ इव द्विप: ॥
२९॥
जनेषु--समस्त लोगों के; दह्ममानेषु--जलते हुए भी; काम--काम; लोभ--तथा लालच की; दव-अग्निना--जंगल की आगद्वारा; न तप्यसे--जल नहीं जाते; अग्निना--अग्नि से; मुक्त:--स्वतंत्र; गड्ञ-अम्भ:--गंगा के जल में; स्थ:--खड़े; इब--मानो; द्विप:--हाथी।
यद्यपि भौतिक जगत में सारे लोग काम तथा लोभ की दावाग्नि में जल रहे हैं, किन्तु आपस्वतंत्र रह रहें हैं और उस अग्नि से जलते नहीं। आप उस हाथी के समान हैं, जो दावाग्नि सेबचने के लिए गंगा नदी के जल के भीतर खड़े होकर आश्रय लिये हुये हो।
त्वं हि नः पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम् ।ब्रृहि स्पर्शणविहीनस्य भवतः केवलात्मन: ॥
३०॥
त्वमू--तुम; हि--निश्चय ही; न:ः--हमसे; पृच्छताम्--पूछ रहे; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; आत्मनि--अपने भीतर; आनन्द--आनन्दके; कारणम्ू--कारण को; ब्रूहि--कहो; स्पर्श-विहीनस्थ-- भौतिक भोग के स्पर्श से विहीन; भवत:--आपका; केवल-आत्मन:--एकान्त में रहने वाले |
हे ब्राह्मण, हम देखते हैं कि आप भौतिक भोग से किसी प्रकार के स्पर्श से रहित हैं औरबिना किसी संगी या पारिवारिक सदस्य के अकेले ही भ्रमण कर रहे हैं। चुँकि हम निष्ठापूर्वक आपसे पूछ रहे है, इसलिए कृपा करके हमें अपने भीतर अनुभव किये जा रहे महान् आनन्द काकारण बतलायें।
श्रीभगवानुवाचयदुनैव॑ महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा ।पृष्ट: सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विज: ॥
३१॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; यदुना--राजा यदु द्वारा; एवम्--इस तरह से; महा-भाग:--परम भाग्यशाली;ब्रह्मण्येन--ब्राह्मणों का आदर करने वाला; सु-मेधसा--तथा बुद्धिमान; पृष्ट:--पूछा; सभाजित: --सत्कार किया; प्राह--बोला; प्रश्रय--दीनतावश; अवनतम्--अपना सिर झुकाते हुए; द्विज:--ब्राह्मण ने
भगवान् कृष्ण ने कहा : ब्राह्मणों का सदैव आदर करने वाला बुद्धिमान राजा यदु अपनासिर झुकाये हुए प्रतीक्षा करता रहा और वह ब्राह्मण राजा की मनोवृत्ति से प्रसन्न होकर उत्तर देनेलगा।
श्रीत्राह्मण उबाचसन्ति मे गुरवो राजन्बहवो बुद्धयुपश्रिता: ।यतो बुद्धिमुपादाय मुक्तोडटामीह तान्थुणु ॥
३२॥
श्री-ब्राह्मण: उबाच--ब्राह्मण ने कहा; सन्ति--हैं; मे--मेंरे; गुरव:--अनेक गुरु; राजन्--हे राजा; बहव:--अनेक; बुद्धि--मेरी बुद्धि; उपश्रिता:--शरणागत; यतः--जिससे; बुद्धिम्--बुद्धि के; उपादाय--प्राप्त करके ; मुक्त:--मुक्त; अटामि--विचरण करता हूँ; हह--इस जगत में; तानू--उनको; श्रूणु--सुनो |
ब्राह्मण ने कहा : हे राजन्, मैंने अपनी बुद्धि से अनेक गुरुओं की शरण ली है। उनसे दिव्यज्ञान प्राप्त करने के बाद अब मैं मुक्त अवस्था में पृथ्वी पर विचरण करता हूँ। जिस रूप में मैंआपसे वर्णन करूँ, कृपा करके सुनें।
पृथिवी वायुराकाशमापोडग्निश्चन्द्रमा रवि: ।कपोतोजगरः सिन्धु: पतड़ो मधुकूदूगज: ॥
३३॥
मधुहा हरिणो मीन: पिड्ुला कुररोर्भक:ः ।कुमारी शरकृत्सर्प ऊर्णनाभिः सुपेशकृत् ॥
३४॥
एते मे गुरवो राजन्चतुर्विशतिराश्रिता: ।शिक्षा वृत्तिभिरेतेषामन्वशिक्षमिहात्मन: ॥
३५॥
पृथिवी--पृथ्वी; वायु: --वायु; आकाशम्--आकाश; आप: --जल; अग्नि:--अग्नि; चन्द्रमा: --चन्द्रमा; रवि: --सूर्य;कपोत:--कबूतर; अजगर:--अजगर; सिन्धु:--समुद्र; पतड्ृः--पतिंगा; मधु-कृत्ू--शहद की मक्खी; गज: --हाथी; मधु-हा--शहद-चोर; हरिण:--हिरन; मीन:--मछली; पिड्ला--पिंगला नामक वेश्या; कुरर:--कुररी पक्षी; अर्भक:--बालक;कुमारी--तरुणी; शर-कृत्--बाण बनाने वाला; सर्प:--साँप; ऊर्ण-नाभि:--मकड़ी; सुपेश-कृत्--बर; एते--ये; मे--मेरे;गुरवः--गुरु; राजन्ू--हे राजा; चतु:-विंशति:ः-- चौबीस; आश्रिता:--जिनकी शरण ली है; शिक्षा--उपदेश; वृत्तिभि:--कार्योसे; एतेषाम्--इनके ; अन्वशिक्षम्--मैंने ठीक से सीखा है; इह--इस जीवन में; आत्मन:--आत्मा ( अपने ) के बारे में |
हे राजन, मैंने चौबीस गुरुओं की शरण ली है। ये हैं--पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि,चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतिंगा, मधुमक्खी, हाथी, मधु-चोर, हिरण, मछली,पिंगला वेश्या, कुररी पक्षी, बालक, तरुणी, बाण बनाने वाला, साँप, मकड़ी तथा बर। हेराजन, इनके कार्यो का अध्ययन करके ही मैंने आत्म-ज्ञान सीखा है।
यतो यदनुशिक्षामि यथा वा नाहुषात्मज ।तत्तथा पुरुषव्याप्र निबोध कथयामि ते ॥
३६॥
यतः--जिससे; यत्--जो; अनुशिक्षामि--मैंने सीखा है; यथा--कैसे; वा--तथा; नाहुष-आत्म-ज--हे राजा नहुष ( ययाति )के पुत्र; ततू--वह; तथा--इस प्रकार; पुरुष-व्याध्र--हे पुरुषों में बाघ; निबोध--सुनो; कथयामि--कहूँगा; ते--तुमसे
हे महाराज ययाति के पुत्र, हे पुरुषों में व्याप्र, सुनो, क्योंकि मैंने इन गुरुओं से, जो सीखाहै, उसे तुम्हें बतला रहा हूँ।
भूतैराक्रम्यमाणोपि धीरो दैववशानुगैः ।तद्विद्वान्न चलेन्मार्गादन्वशिक्षं क्षितेत्रेतम् ॥
३७॥
भूतैः--विभिन्न प्राणियों द्वारा; आक्रम्यमाण:--सताया जाकर; अपि--यद्यपि; धीर:--धीर; दैव-- भाग्य के; वश--नियंत्रण;अनुगैः --अनुयायियों द्वारा; तत्ू--यह तथ्य; विद्वानू--जाननहारा; न चलेतू--विपथ नहीं होना चाहिए; मार्गात्ू--पथ से;अन्वशिक्षम्-मैंने सीखा है; क्षिते:--पृथ्वी से; ब्रतम्--यह व्रत, हृढ़ अभ्यास |
अन्य जीवों द्वारा सताये जाने पर भी धीर व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि उसके उत्पीड़कईश्वर के अधीन होकर असहाय रूप से कर्म कर रहे हैं। इस तरह उसे कभी अपने पथ की प्रगतिसे विपथ नहीं होना चाहिए मैंने पृथ्वी से यह नियम सीखा है।
शश्वत्परार्थसर्वेह: परार्थैकान्तसम्भव: ।साधु: शिक्षेत भूभूत्तो नगशिष्य: परात्मताम् ॥
३८॥
शश्वत्--सदैव; पर--दूसरों के; अर्थ--हित के लिए; सर्व-ईह:--सारे प्रयास; पर-अर्थ--दूसरों का लाभ; एकान्त--अकेला;सम्भव:--जीवित रहने का कारण; साधु:--साधु-पुरुष; शिक्षेत--सीखना चाहिए; भू- भृत्त:--पहाड़ से; नग-शिष्य: --वृशक्षका शिष्य; पर-आत्मताम्--अन्यों के प्रति समर्पण |
सनन््त-पुरुष को पर्वत से सीखना चाहिए कि वह अपने सारे प्रयास अन्यों की सेवा में लगायेऔर अन्यों के कल्याण को अपने जीवन का एकमात्र ध्येय बनाये। इसी तरह वृक्ष का शिष्यबनकर उसे स्वयं को अन्यों को समर्पित करना सीखना चाहिए।
प्राणवृत्त्यैव सन्तुष्येन्मुनिनेवेन्द्रियप्रिये: ।ज्ञानं यथा न नश्येत नावकीर्येत वाइमन: ॥
३९॥
प्राण-वृत्त्या--प्राणों के कार्य करते रहने से; एब--ही; सन्तुष्येत्--सन्तुष्ट रहना चाहिए; मुनि:--मुनि; न--नहीं; एव--निस्सन्देह; इन्द्रिय-प्रियै:--इन्द्रियों को तृप्त करने वाली वस्तुओं से; ज्ञानम्--चेतना; यथा--जिससे कि; न नश्येत--नष्ट न होसके; न अवकीर्येत--शक्षुब्ध न हो सके; वाकु--उसकी वाणी; मन:--तथा मन।
विद्वान मुनि को चाहिए कि वह अपने सादे जीवन-यापन में ही तुष्टि माने। वह भौतिकइन्द्रियों की तृप्ति के द्वारा तुष्टि की खोज न करे। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को अपने शरीर कीपरवाह इस तरह करनी चाहिए कि उसका उच्चतर ज्ञान विनष्ट न हो और उसकी वाणी तथा मनआत्म-साक्षात्कार के मार्ग से विचलित न हों।
विषयेष्वाविशन्योगी नानाधर्मेषु सर्वतः ।गुणदोषव्यपेतात्मा न विषज्जेत वायुवत् ॥
४०॥
विषयेषु-- भौतिक वस्तुओं के सम्पर्क में; आविशन्-- प्रवेश करके ; योगी--जिसने आत्म-संयम प्राप्त कर लिया है; नाना-धर्मेषु--विभिन्न गुणों वाले; सर्वतः--सर्वत्र; गुण--सदगुण; दोष--तथा दोष; व्यपेत-आत्मा--वह व्यक्ति जिसने लाँघ लियाहै; न विषज्ेत--नहीं फँसना चाहिए; वायु-वत्--वायु की तरह
यहाँ तक कि योगी भी ऐसी असंख्य भौतिक वस्तुओं से घिरा रहता है, जिनमें अच्छे तथाबुरे गुण पाये जाते हैं। किन्तु जिसने भौतिक अच्छाई तथा बुराई लाँघ ली है, उसे भौतिक वस्तुओंके सम्पर्क में रहते हुए भी, उनमें फँसना नहीं चाहिए, प्रत्युत उसे वायु की तरह कार्य करनाचाहिए।
पार्थिवेष्विह देहेषु प्रविष्टस्तद्गुणा श्रय: ।गुणैर्न युज्यते योगी गन्धैर्वायुरिवात्महक् ॥
४१॥
पार्थिवेषु--पृथ्वी ( तथा अन्य तत्त्वों ) से बना; इह--इस संसार में; देहेषु--शरीरों में; प्रविष्ट: --प्रवेश करके; तत्--उनके;गुण--लाक्षणिक गुण; आश्रय:-- धारण करके; गुणैः:--उन गुणों से; न युज्यते-- अपने को फँसाता नहीं; योगी--योगी;गन्धैः--विभिन्न गंधों से; वायु:--वायु; इब--सदहृश; आत्म-हक्--अपने को ठीक से देखने वाला
( इस पदार्थ से पृथक् रूपमें )इस जगत में स्वरूपसिद्ध आत्मा विविध भौतिक शरीरों में उनके विविध गुणों तथा कार्योका अनुभव करते हुए रह सकता है, किन्तु वह उनमें कभी उलझता नहीं, जिस तरह कि वायुविविध सुगंधों को वहन करती है, किन्तु वह उनमें घुल-मिल नहीं जाती।
अन्तर्हितश्न स्थिरजड्रमेषुब्रह्मात्मभावेन समन्वयेन ।व्याप्त्याव्यवच्छेदमसड्रमात्मनोमुनिर्नभस्त्वं विततस्य भावयेत् ॥
४२॥
अन्तहितः -- भीतर उपस्थित; च-- भी; स्थिर--सारे जड़ जीव; जड़मेषु--तथा चेतन जीव; ब्रह्म-आत्म-भावेन--अपने को शुद्धआत्मा अनुभव करते हुए; समन्वयेन--विभिन्न शरीरों के साथ भिन्न भिन्न सम्पर्कों के परिणामस्वरूप; व्याप्त्या--व्याप्त होने केकारण; अव्यवच्छेदम्--अविभक्त होने का गुण; असड्रम्--लिप्त न रहने से; आत्मन: --परमात्मा से युक्त; मुनि:--मुनि;नभस्त्वम्--आकाश साम्य; विततस्य--विराट का; भावयेत्-- ध्यान करना चाहिए
भौतिक शरीर के भीतर रहते हुए भी विचारवान साधु को चाहिए कि वह अपने आपकोशुद्ध आत्मा समझे। इसी तरह मनुष्य को देखना चाहिए कि आत्मा सभी प्रकार के सजीवों--चरों तथा अचरों के भीतर प्रवेश करता है और इस तरह व्यष्टि आत्मा सर्वव्यापी है। साधु को यहभी देखना चाहिए कि परमात्मा रूप में भगवान् एक ही समय सारी वस्तुओं के भीतर उपस्थितरहते हैं। आत्मा तथा परमात्मा को आकाश के स्वभाव से तुलना करके समझा जा सकता है।यद्यपि आकाश सर्वत्र फैला हुआ है और सारी वस्तुएँ आकाश के भीतर टिकी हैं किन्तु आकाशकिसी भी वस्तु से न तो घुलता-मिलता है, न ही किसी वस्तु के द्वारा विभाजित किया जा सकताहै।
तेजोबन्नमयै भविर्मेघाद्यैर्वायुनेरितै: ।न स्पृश्यते नभस्तद्वत्कालसूष्टैर्गुणै: पुमान् ॥
४३॥
तेज:--अग्नि; अपू--जल; अन्न--तथा पृथ्वी; मयै:--युक्त; भावै:--वस्तुओं से; मेघ-आद्यै:--बादल इत्यादि से; वायुना--वायु से; ईरितैः--उड़ाये जाने वाले; न स्पृश्यते--स्पर्श नहीं हो पाता; नभः--आकाश; तत्-वत्--उसी तरह से; काल-सूष्टै:--काल द्वारा भेजे गये; गुणैः:-- प्रकृति के गुणों द्वारा; पुमान्ू--मनुष्य |
यद्यपि प्रबल वायु आकाश से होकर बादलों तथा झंझावातों को उड़ाती है, किन्तु आकाशइन कार्यों से कभी प्रभावित नहीं होता। इसी प्रकार आत्मा भौतिक प्रकृति के स्पर्श से परिवर्तितया प्रभावित नहीं होती। यद्यपि जीव पृथ्वी, जल तथा अग्नि से बने शरीर में प्रवेश करता है औरयद्यपि वह शाश्वत काल द्वारा उत्पन्न तीन गुणों के द्वारा बाध्य किया जाता है, किन्तु उसकाशाश्रत आध्यात्मिक स्वभाव कभी भी प्रभावित नहीं होता।
स्वच्छ: प्रकृतितः स्निग्धो माधुर्यस्तीर्थभूनणाम् ।मुनिः पुनात्यपां मित्रमीक्षोपस्पर्शकीर्तनी: ॥
४४॥
स्वच्छ: --शुद्ध; प्रकृतित:--प्रकृति से; स्निग्ध:--कोमल या कोमल हृदय वाला; माधुर्य; --मधुर या मधुर वाणी; तीर्थ-भू:--तीर्थस्थान; नृणाम्-मनुष्यों के लिए; मुनिः--मुनि; पुनाति--पवित्र करता है; अपाम्--जल का; मित्रम्--प्रतिरूप; ईक्षा--देखे जाने से; उपस्पर्श--सादर स्पर्श होने से; कीर्तनैः--तथा वाणी से प्रशंसित किये जाने से
हे राजन, सन्त-पुरुष जल के सहृश होता है, क्योंकि वह कल्मषरहित, स्वभाव से मृदुलतथा बोलने में बहते जल की कलकल ध्वनि सहृश होता है। ऐसे सनन््त-पुरुष के दर्शन, स्पर्श याश्रवण मात्र से ही जीव उसी तरह पवित्र हो जाता है, जिस तरह शुद्ध जल का स्पर्श करने सेमनुष्य स्वच्छ हो जाता है। इस तरह सन्त-पुरुष तीर्थस्थान की तरह उन सबों को शुद्ध बनाता है,जो उसके सम्पर्क में आते हैं, क्योंकि वह सदैव भगवान् की महिमा का कीर्तन करता है।
तेजस्वी तपसा दीप्तो दुर्धषोदरभाजन: ।सर्वभश्ष्योपि युक्तात्मा नादत्ते मलमग्निवत् ॥
४५॥
तेजस्वी--तेजवान्; तपसा--अपनी तपस्या से; दीप्तः--चमकता हुआ; दुर्धर्ष--अचल; उदर-भाजन:--पेट पालने के लिए हीखाने वाला; सर्व--हर वस्तु; भक्ष्य:--खाते हुए; अपि--यद्यपि; युक्त-आत्मा--आध्यात्मिक जीवन में स्थिर; न आदत्ते-- धारणनहीं करता; मलम्--कल्मष; अग्नि-वत्-- अग्नि की तरह।
सन्त-पुरुष तपस्या करके शक्तिमान बनते हैं। उनकी चेतना अविचल रहती है क्योंकि वेभौतिक जगत की किसी भी वस्तु का भोग नहीं करना चाहते। ऐसे सहज मुक्त सनन््त-पुरुष भाग्यद्वारा प्रदत्त भोजन को स्वीकार करते हैं और यदि कदाचित् दूषित भोजन कर भी लें तो उन परकोई प्रभाव नहीं पड़ता जिस तरह अग्नि उन दूषित वस्तुओं को जला देती है, जो उसमें डालीजाती हैं।
क्वचिच्छन्न: क्वचित्स्पष्ट उपास्य: श्रेय इच्छताम् ।भुड़े सर्वत्र दातृणां दहन्प्रागुत्तराशुभम् ॥
४६॥
क्वचित्--कभी; छन्न:--ढका हुआ; क्वचित्--कभी; स्पष्ट:-- प्रकट; उपास्य: --पूज्य; श्रेय:--सर्वोच्च मंगल; इच्छताम्ू--चाहने वालों के लिए; भुड्ढे --निगल जाता है; सर्वत्र--सभी दिशाओं में; दातृणाम्ू--बलि चढ़ाने वालों के; दहन्--जलाते हुए;प्राकु--विगत; उत्तर--तथा भविष्य; अशुभम्-पापों को |
सनन््त-पुरुष अग्नि के ही समान, कभी प्रच्छन्न रूप में, तो कभी प्रकट रूप में दिखता है।असली सुख चाहने वाले बद्धजीवों के कल्याण हेतु सन््त-पुरुष गुरु का पूजनीय पद स्वीकारकर सकता है और इस तरह वह अग्नि के सहृश अपने पूजकों की बलियों को दयापूर्वकस्वीकार करके विगत तथा भावी पापों को भस्म कर देता है।
स्वमायया सूष्टमिदं सदसल्लक्षणं विभु: ।प्रविष्ट ईयते तत्तत्स्वरूपोग्निरिवैधसि ॥
४७॥
स्व-मायया--अपनी माया से; सृष्टम्--सृजित; इदम्--यह ( जीव का शरीर ); सत्-असतू--देवता, पशु इत्यादि के रूप में;लक्षणम्--लक्षणों से युक्त; विभु:--सर्वशक्तिमान; प्रविष्ट: --प्रवेश करके; ईयते--प्रकट होता है; ततू्-तत्--उसी-उसी रूपमें; स्वरूप:--पहचान बनाकर; अग्नि:--अग्नि के; इब--सहश; एधसि--ईधन में |
जिस तरह अग्नि विभिन्न आकारों तथा गुणों वाले काष्ट-खण्डों में भिन्न भिन्न रूप से प्रकटहोती है, उसी तरह सर्वशक्तिमान परमात्मा अपनी शक्ति से उत्पन्न किये गये उच्च तथा निम्नयोनियों के शरीरों में प्रवेश करके प्रत्येक के स्वरूप को ग्रहण करता प्रतीत होता है।
विसर्गद्या: श्मशानान्ता भावा देहस्य नात्मन: ।कलानामिव चन्द्रस्य कालेनाव्यक्तवर्त्मना ॥
४८॥
विसर्ग--जन्म; आद्या:--इत्यादि; एमशान-- मृत्यु का समय, जब शरीर भस्म कर दिया जाता है; अन्ता:--अन्तिम; भावा:--दशाएँ; देहस्य--शरीर की; न--नहीं; आत्मन:--आत्मा का; कलानामू--विभिन्न अवस्थाओं का; इब--सहश; चन्द्रस्य--चन्द्रमा की; कालेन--समय के साथ; अव्यक्त--न दिखने वाला; वर्त्मना--गति से
जन्म से लेकर मृत्यु तक भौतिक जीवन की विभिन्न अवस्थाएँ शरीर के गुणधर्म हैं और येआत्मा को उसी तरह प्रभावित नहीं करतीं, जिस तरह चन्द्रमा की घटती-बढ़ती कलाएँ चन्द्रमाको प्रभावित नहीं करतीं। ऐसे परिवर्तन काल की अव्यक्त गति द्वारा लागू किये जाते हैं।
कालेन होघवेगेन भूतानां प्रभवाप्ययौ ।नित्यावषि न हृश्येते आत्मनोःग्नेर्यथार्चिषाम् ॥
४९॥
कालेन--समय के द्वारा; हि--निस्सन्देद; ओघ--बाढ़ के सहश; वेगेन--चाल से; भूतानाम्--जीवों के; प्रभव--जन्म;अप्ययौ--तथा मृत्यु; नित्यौ--स्थायी; अपि--यद्यपि; न दृश्येते--नहीं देखे जाते; आत्मन:--आत्मा के; अग्ने:--अग्नि की;यथा--जिस तरह; अर्चिषाम्--लपटों को
अग्नि की लपटें प्रतिक्षण प्रकट तथा लुप्त होती रहती हैं, और यह सृजन तथा विनाशसामान्य प्रेक्षकों द्वारा देखा नहीं जाता। इसी तरह काल की बलशाली लहरें नदी की प्रबलधाराओं की तरह निरन्तर बहती रहती हैं और अव्यक्त रूप से असंख्य भौतिक शरीरों को जन्म,वृद्धि तथा मृत्यु प्रदान करती रहती हैं। फिर भी आत्मा, जिसे निरन्तर अपनी स्थिति बदलनीपड़ती है, काल की करतूतों को देख नहीं पाता।
गुणैर्गुणानुपादत्ते यथाकालं विमुझ्जञति ।न तेषु युज्यते योगी गोभिर्गा इब गोपति: ॥
५०॥
गुणैः--अपनी इन्द्रियों से; गुणान्--इन्द्रिय-विषयों को; उपादत्ते--स्वीकार करता है; यथा-कालम्--उपयुक्त समय पर;विमुक्नति--छोड़ देता है; न--नहीं; तेषु--उनमें ; युज्यते-- फँस जाता है; योगी--स्वरूपसिद्ध मुनि; गोभि:--अपनी किरणों से;गाः--जलाशयों; इब--सहश; गो-पति: --सूर्य ।
जिस तरह सूर्य अपनी प्रखर किरणों से पर्याप्त मात्रा में जल को भाप बना कर उड़ा देता हैऔर बाद में उस जल को वर्षा के रूप में पृथ्वी पर लौटा देता है, उसी तरह सन््त-पुरुष अपनीभौतिक इन्द्रियों से सभी प्रकार की भौतिक वस्तुओं को स्वीकार करता है और जब सही व्यक्तिउन्हें लौटवाने के लिए उसके पास जाता है, तो उन भौतिक वस्तुओं को वह लौटा देता है। इसतरह वह इन्द्रिय-विषयों को स्वीकारने तथा त्यागने दोनों में ही फँसता नहीं ।
बुध्यते स्वे न भेदेन व्यक्तिस्थ इव तद्गतः ।लक्ष्यते स्थूलमतिभिरात्मा चावस्थितोर्कवत् ॥
५१॥
बुध्यते--सोचा जाता है; स्वे--अपने मूल रूप में; न--नहीं; भेदेन--विविधता से; व्यक्ति--पृथक् प्रतिबिम्बित पदार्थों पर;स्थ:--स्थित; इब--ऊपर से; ततू-गत:--उनके भीतर प्रवेश करके; लक्ष्यते--प्रकट होता है; स्थूल-मतिभि:--मन्द बुद्धि वालोंके लिए; आत्मा--आत्मा; च--भी; अवस्थित: --स्थित; अर्कवत्--सूर्य की तरह ।
विविध वस्तुओं से परावर्तित होने पर भी सूर्य न तो कभी विभक्त होता है, न अपने प्रतिबिम्बमें लीन होता है। जो मन्द बुद्धि वाले हैं, वे ही सूर्य के विषय में ऐसा सोचते हैं। इसी प्रकारआत्मा विभिन्न भौतिक शरीरों से प्रतिबिम्बित होते हुए भी अविभाजित तथा अभौतिक रहता है।
नातिस्नेह: प्रसझे वा कर्तव्य: क्वापि केनचित् ।कुर्वन्बिन्देत सन््तापं कपोत इव दीनधी: ॥
५२॥
न--नहीं; अति-स्नेह:--अत्यधिक स्नेह; प्रसड़ू:--घनिष्ठ संग; वा--अथवा; कर्तव्य:--प्रकट करना चाहिए; क्व अपि--कभी;केनचित्--किसी से; कुर्वन्ू--ऐसा करते हुए; विन्देत--अनुभव करेगा; सन्तापम्--महान् दुख; कपोत:ः--कबूतर; इब--सहश; दीन-धी:--मन्द बुद्धि |
मनुष्य को चाहिए कि किसी व्यक्ति या किसी वस्तु के लिए अत्यधिक स्नेह या चिन्ता नकरे। अन्यथा उसे महान् दुख भोगना पड़ेगा, जिस तरह कि मूर्ख कबूतर भोगता है।
कपोतः कश्चनारण्ये कृतनीडो वनस्पतौ ।कपोत्या भार्यया सार्थधमुवास कतिचित्समा: ॥
५३॥
कपोत:--कबूतर ने; कश्चन--किसी; अरण्ये--जंगल में; कृत-नीड:--अपना घोंसला बनाकर; वनस्पतौ--वृक्ष में;कपोत्या--कबूतरी के साथ; भार्यया--अपनी पत्नी; स-अर्धम्--अपने संगी के रूप में; उबास--रहने लगा; कतिचित्--कुछ;समाः--वर्षो तक
एक कबूतर था, जो अपनी पत्नी के साथ जंगल में रहता था। उसने एक वृक्ष के भीतरअपना घोंसला बनाया और कबूतरी के साथ कई वर्षों तक वहाँ रहता रहा।
कपोतौ स्नेहगुणितहदयौ गृहधर्मिणौ ।दृष्टि दृष्ठयाड्रमड्रेन बुद्धि बुद्धया बबन्धतु: ॥
कपोतौ--कबूतर का जोड़ा; स्नेह--स्नेह से; गुणित--मानो रस्सी से बँधे हुए; हृदयौ--उनके हृदय; गृह-धर्मिणौ-- अनुरक्तगृहस्थ; दृष्टिम--दृष्टि; दृष्या--चितवन से; अड्रम्ू--शरीर को; अड्लेन--दूसरे के शरीर से; बुद्धिमू--मन; बुद्धया--दूसरे के मनसे; बबन्धतु:--एक-दूसरे को बाँध लिया।
कबूतर का यह जोड़ा अपने गृहस्थ कार्यो के प्रति अत्यधिक समर्पित था। उनके हृदयभावनात्मक स्नेह से परस्पर बँधे थे, वे एक-दूसरे की चितवनों, शारीरिक गुणों तथा मन कीअवस्थाओं से आकृष्ट थे। इस तरह उन्होंने एक-दूसरे को स्नेह से पूरी तरह बाँध रखा था।
शय्यासनाटनस्थान वार्ताक्रीडाशनादिकम् ।मिथुनीभूय विश्रब्धौ चेरतुर्वनराजिषु ॥
५५॥
शब्या--लेटते; आसन--बैठते; अटन--चलते-फिरते; स्थान--खड़े होते; वार्ता--बातें करते; क्रीडा--खेलते; अशन--भोजन करते; आदिकम्--इत्यादि; मिथुनी-भूय--दम्पति के रूप में; विश्रव्धौ--एक-दूसरे पर विश्वास करते; चेरतु: --उन्होंनेसम्पन्न किया; वन--जंगल के; राजिषु--वृन्दों के कुंजों के बीच।
भविष्य पर निएछल भाव से विश्वास करते हुए बे प्रेमी युगल की भाँति जंगल के वृक्षों केबीच लेटते, बैठते, चलते-फिरते, खड़े होते, बातें करते, खेलते, खाते-पीते रहे।
यं यं वाउ्छति सा राजन्तर्पयन्त्यनुकम्पिता ।तं त॑ समनयत्कामं कृच्छेणाप्यजितेन्द्रिय: ॥
५६॥
यम् यम्--जो कुछ भी; वा्छति--चाहती; सा--वह कबूतरी; राजन्--हे राजन; तर्पयन्ती -- प्रसन्न करती हुईं; अनुकम्पिता--दया दिखाई गई; तम् तम्ू--वह-वह; समनयत्--ले आया; कामम्--अपनी इच्छा; कृच्छेण --बड़ी मुश्किल से; अपि-- भी;अजित-इन्द्रियः--अपनी इन्द्रियों को वश में करना न सीखा हुआ।
हे राजनू, जब भी कबूतरी को किसी वस्तु की इच्छा होती, तो वह अपने पति कीचाटुकारिता करके उसे बाध्य करती और वह स्वयं भारी मुश्किलें उठाकर भी उसे तृप्त करने केलिए वही करता, जो वह चाहती थी। इस तरह वह उसके संग में अपनी इन्द्रियों पर संयम नहींरख सका।
कपोती प्रथम गर्भ गृहन्ती काल आगते ।अण्डानि सुषुवे नीडे स्तपत्यु: सन्निधौ सती ॥
५७॥
कपोती--कबूतरी; प्रथमम्--प्रथम; गर्भम्--गर्भावस्था; गृहन्ती -- धारण करती हुईं; काले--( प्रसव का ) समय के; आगते--आने पर; अण्डानि--अंडे; सुषुवे--दिये; नीडे--घोंसले में; स्व-पत्यु:--अपने पति की; सन्निधौ--उपस्थिति में; सती--साध्वी
तत्पश्चातु, कबूतरी को पहले गर्भ का अनुभव हुआ। जब समय आ गया, तो उस साध्वीकबूतरी ने अपने पति की उपस्थिति में घोंसले में कई अंडे दिये।
तेषु काले व्यजायन्त रचितावयवा हरे: ।शक्तिभिर्दुर्विभाव्याभि: कोमलाडुरतनूरूहा: ॥
५८ ॥
तेषु--उन अंडों से; काले--समय आने पर; व्यजायन्त--उत्पन्न हुए; रचित--निर्मित; अवयवा:--बच्चों के अंग; हरेः-- भगवान्हरि की; शक्तिभि: --श क्तियों से; दुर्विभाव्याभि:-- अचिन्त्य; कोमल-- मुलायम; अड्ड--अंग; तनूरुहा:--तथा पंखहा
जब समय पूरा हो गया, तो उन अंडों से भगवान् की अचिन्त्य शक्तियों से निर्मित मुलायमअंगो तथा पंखों के साथ बच्चे उत्पन्न हुए।
प्रजा: पुपुषतु: प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ ।श्रुण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृती कलभाषितैः ॥
५९॥
प्रजा:--सन्तान; पुपुषतु:--उन्होंने पाला-पोषा; प्रीतौ--अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; दम्-पती --युग्म; पुत्र--अपने बच्चों को;बत्सलौ--दयालु; श्रृण्वन्तौ --सुनते हुए; कूजितमू--चहचहाना; तासाम्--उन बच्चों की; निर्वता--अत्यन्त सुखी; कल-भाषितै:--भद्दी ध्वनि से |
कबूतर का यह जोड़ा अपने बच्चों के प्रति अत्यन्त स्नेहिल बन गया और उनकी अढपटीचहचहाहट को सुनकर अत्यन्त हर्षित होता, क्योंकि उन माता-पिता को यह अतीव मधुर लगती।इस तरह वह जोड़ा उन छोटे-छोटे बच्चों का पालन-पोषण करने लगा।
तासां पतत्रै: सुस्पशैं: कूजितैर्मुग्धचेष्टितेः ।प्रत्युदूगमैरदीनानां पितरौ मुदमापतु: ॥
६०॥
तासाम्--छोटे पक्षियों के; पतत्रैः--पंखों द्वारा; सु-स्पशैं:--छूने में अच्छा; कूजितैः--उनकी चहचहाहट; मुग्ध--आकर्षक;चेष्टितेः:--कार्यों से; प्रत्युदूगमैः--फुदकने के प्रयासों से; अदीनानाम्--सुखी ( बच्चों ) के; पितरौ--माता-पिता; मुदम्आपतुः--हर्षित हो गये।
यें माता-पिता अपने पक्षी बच्चों के मुलायम पंखों, उनकी चहचहाहट, घोंसले के आसपासउनकी कूद-फाँद करना, उनका उछलने और उड़ने का प्रयास करना देखकर अत्यन्त हर्षित हुए।अपने बच्चों को सुखी देखकर माता-पिता भी सुखी थे। स्नेहानुबद्धहदयावन्योन्यं विष्णुमायया ।विमोहितौ दीनधियौ शिशूब्पुपुषतुः प्रजा: ॥
६१॥
स्नेह--स्नेह से; अनुबद्ध--बँधे हुए; हृदयौ--हृदयों वाले; अन्योन्यम्--परस्पर; विष्णु-मायया--भगवान् विष्णु की माया से;विमोहितौ--पूर्णतः मोहग्रस्त; दीन-धियौ--मन्द बुद्धि वाले; शिशून्ू-- अपने बच्चों को; पुपुषतु:--पाला-पोषा; प्रजा: --अपनीसन्तान।
स्नेह से बँधे हुए हृदयों वाले ये मूर्ख पक्षी भगवान् विष्णु की माया द्वारा पूर्णतः मोहग्रस्तहोकर अपने छोटे-छोटे बच्चों का लालन-पालन करते रहे।
एकदा जम्मतुस्तासामन्नार्थ तौ कुटुम्बिनौ ।परितः कानने तस्मिन्नर्थिनौ चेरतुश्चिरम् ॥
६२॥
एकदा--एक बार; जम्मतु:--गये; तासाम्--बच्चों के; अन्न-- भोजन; अर्थम्-हेतु; तौ--वे दोनों; कुटुम्बिनौ--परिवार केमुखिया; परितः--चारों ओर; कानने--जंगल में; तस्मिन्ू--उस; अर्थिनौ--उत्सुकतापूर्वक ढूँढ़ते हुए; चेरतु:--विचरते रहे;चिरम्ू--काफी समय तक।
एक दिन परिवार के दोनों मुखिया अपने बच्चों के लिए भोजन तलाश करने बाहर चलेगये। अपने बच्चों को ठीक से खिलाने की चिन्ता में वे काफी समय तक पूरे जंगल में विचरतेरहे।
इृष्टा तानलुब्धक: कश्चिद्यदच्छातो बनेचर: ।जगूहे जालमातत्य चरत: स्वालयान्तिके ॥
६३॥
इृष्ठटा--देखकर; तान्--उन बच्चों को; लुब्धक:--बहेलिये ने; कश्चित्--कोई; यहच्छात:--संयोगवश; वने--जंगल में;चरः--गुजरते हुए; जगृहे--पकड़ लिया; जालमू--जाल को; आतत्य--फैलाकर; चरत:--विचरण करते; स्व-आलय-अन्तिके--उनके घर के पड़ोस में
उस समय संयोगवश जंगल में विचरण करते हुए किसी बहेलिये ने कबूतर के इन बच्चों कोउनके घोंसले के निकट विचरते हुए देखा। उसने अपना जाल फैलाकर उन सबों को पकड़लिया।
कपोतश्च कपोती च प्रजापोषे सदोत्सुकौ ।गतौ पोषणमादाय स्वनीडमुपजग्मतु: ॥
६४॥
कपोतः--कबूतर; च--तथा; कपोती--कबूतरी; च--तथा; प्रजा--उनके बच्चों के; पोषे--पालन-पोषण में; सदा--सदैव;उत्सुकौ--उत्सुकतापूर्वक; गतौ--गये हुए; पोषणम्--भोजन; आदाय--लाकर; स्व--अपने; नीडम्--घोंसले में;उपजम्मतु:--पहुँचे
कबूतर तथा उसकी पतली अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए सदैव चिन्तित रहते थे औरइसी उद्देश्य से वे जंगल में भटकते रहे थे। समुचित अन्न पाकर अब वे अपने घोंसले पर लौटआये।
कपोती स्वात्मजान्वीक्ष्य बालकान्जालसम्बृतान् ।तानभ्यधावत्क्रोशन्ती क्रोशतो भूशदु:खिता ॥
६५॥
कपोती--कबूतरी; स्व-आत्म-जान्--अपने से उत्पन्न; वीक्ष्य--देखकर; बालकान्--बच्चों को; जाल--जाल से; संवृतान्ू--घिरे हुए; तान्ू--उनकी ओर; अभ्यधावत्--दौड़ी; क्रोशन्ती--पुकारती हुई; क्रोशत:ः--चिल्ला रहे हों, जो उनकी ओर; भूश--अत्यधिक; दुःखिता--दुखी |
जब कबूतरी ने अपने बच्चों को बहेलिये के जाल में फँसे देखा, तो वह व्यथा से अभिभूतहो गई और चिल्लाती हुई उनकी ओर दौड़ी। वे बच्चे भी उसके लिए चिललाने लगे।
सासकृत्स्नेहगुणिता दीनचित्ताजमायया ।स्वयं चाबध्यत शिचा बद्धान्पश्यन्त्यपस्मृति: ॥
६६॥
सा--वह; असकृत्--निरन्तर; स्नेह--स्नेह से; गुणिता--बँधी; दीन-चित्ता--पंगु बुद्धि वाली; अज--अजन्मा भगवान् की;मायया--माया से; स्वयम्--स्वयं; च-- भी; अबध्यत--बँधा लिया; शिचा--जाल से; बद्धान्--बँधे हुए ( बच्चों को );पश्यन्ती --देखती हुई; अपस्मृति:--अपने को भूली हुईं |
चूँकि कबूतरी ने अपने को गहन स्नेह के बन्धन से सदा बाँध रखा था, इसलिए उसका मनव्यथा से विहल था। भगवान् की माया के चंगुल में होने से, वह अपने को पूरी तरह भूल गईऔर अपने असहाय बच्चों की ओर दौड़ती हुई, वह भी तुरन्त बहेलिये के जाल में बँध गई।
कपोतः स्वात्मजान्बद्धानात्मनो प्यधिकान्प्रियान् ।भार्या चात्मसमां दीनो विललापातिदुःखितः ॥
६७॥
कपोतः--कबूतर; स्व-आत्म-जान्--अपने ही बच्चों को; बद्धान्ू--बँधा हुआ; आत्मन:--अपनी अपेक्षा; अपि--ही;अधिकान्--अधिक; प्रियान्--प्रिय; भार्याम्-- अपनी पत्नी को; च--तथा; आत्म-समाम्--अपने समान; दीन:-- अभागाव्यक्ति; वबिललाप--शोक करने लगा; अति-दुःखित:ः--अत्यन्त दुखी |
अपने प्राणों से भी प्यारे अपने बच्चों को तथा साथ में अपने ही समान अपनी पत्नी कोबहेलिये के जाल में बुरी तरह बँधा देखकर बेचारा कबूतर दुखी होकर विलाप करने लगा।
अहो मे पश्यतापायमल्पपुण्यस्य दुर्मतेः ।अतृप्तस्याकृतार्थस्य गृहस्त्रैवर्गिको हतः ॥
६८ ॥
अहो--हाय; मे--मेरा; पश्यत--देखो तो; अपायम्ू--विनाश; अल्प-पुण्यस्य-- अपर्याप्त पुण्य वाले के; दुर्मतेः --दुर्बुद्धि;अतृप्तस्य--असंतुष्ट; अकृत-अर्थस्थ--जिसने जीवन के उद्देश्य को पूरा नहीं किया, उसका; गृह: --पारिवारिक जीवन; त्रै-वर्गिक:--सभ्य जीवन के तीन उद्देश्यों ( धर्म, अर्थ तथा काम ) वाले; हतः--विनष्ट ।
कबूतर ने कहा : हाय! देखो न, मैं किस तरह बरबाद हो गया हूँ। स्पष्ट है कि मैं महामूर्ख हूँ,क्योंकि मैंने समुचित पुण्यकर्म नहीं किये। न तो मैं अपने को संतुष्ट कर सका, न ही मैं जीवन के लक्ष्य को पूरा कर सका। मेरा प्रिय परिवार, जो मेरे धर्म, अर्थ तथा काम का आधार था, अबबुरी तरह नष्ट हो गया।
अनुरूपानुकूला च यस्य मे पतिदेवता ।शून्ये गृहे मां सन्त्यज्य पुत्रै: स्वर्याति साधुभि: ॥
६९॥
अनुरूपा--उपयुक्त; अनुकूला--स्वामिभक्त; च--तथा; यस्य--जिसका; मे--मेरा; पति-देवता--जिसने पति को देवता-रूपमें पूज्य मान लिया है; शून्ये--रिक्त; गृहे--घर में; माम्ू--मुझको; सन्त्यज्य--पीछे छोड़कर; पुत्रैः --अपने पुत्रों के साथ;स्व:--स्वर्ग को; याति--जा रही है; साधुभि:--सन््त जैसे |
मैं तथा मेरी पत्नी आदर्श जोड़ा थे। वह सदैव मेरी आज्ञा का पालन करती थी और मुझेअपने पूज्य देवता की तरह मानती थी, किन्तु अब वह अपने बच्चों को नष्ट हुआ और अपने घरको रिक्त देखकर मुझे छोड़ गई और हमारे सन्त स्वभाव वाले बच्चों के साथ स्वर्ग चली गई।
सोऊहं शून्ये गृहे दीनो मृतदारो मृतप्रज: ।जिजीविषे किमर्थ वा विधुरो दुःखजीवित: ॥
७०॥
सः अहम्-ैं; शून्ये--रिक्त; गृहे--घर में; दीन:--दुखी; मृत-दारः--जिसकी पत्नी मर चुकी है; मृत-प्रज:--जिसके बच्चे मरचुके हैं; जिजीविषे--मैं जीवित रहना चाहूँगा; किम् अर्थम्--किस हेतु; वा--निस्सन्देह; विधुर:--विछोह भोगते हुए; दुःख--दुखी; जीवित: --मेरा जीवन |
अब मैं विरान घर में रहने वाला दुखी व्यक्ति हूँ। मेरी पत्ती मर चुकी है, मेरे बच्चे मर चुकेहैं। मैं भला क्यों जीवित रहना चाहूँ? मेरा हृदय अपने परिवार के विछोह से इतना पीड़ित है किमेरा जीवन मात्र कष्ट बनकर रह गया है।
तांस्तथैवावृतान्शिग्भिमृत्युग्रस्तान्विचेष्टत: ।स्वयं च कृपण: शिक्षु पश्यन्नप्यबुधोडपतत् ॥
७१॥
तान्ू--उनको; तथा-- भी; एव--निस्सन्देह; आवृतान्--घिरे हुए; शिग्भि: --जाल से; मृत्यु--मृत्यु द्वारा; ग्रस्तान्ू--पकड़े हुए;विचेष्टत: --स्तम्भित; स्वयम्-- स्वयं; च-- भी; कृपण:--दुखी; शिक्षु--जाल के भीतर; पश्यन्--देखते हुए; अपि-- भी;अबुध:--अज्ञानी; अपतत्--गिर पड़ा
जब पिता कबूतर अपने बेचारे बच्चों को जाल में बँधा और मृत्यु के कगार पर दीन भाव सेउन्हें अपने को छुड़ाने के लिए करुणावस्था में संघर्ष करते देख रहा था, तो उसका मस्तिष्कशून्य हो गया और वह स्वयं भी बहेलिए के जाल में गिर पड़ा।
त॑ लब्ध्वा लुब्धक: क्रूर: कपोतं गृहमेधिनम् ।कपोतकान्कपोतीं च सिद्धार्थ: प्रययौ गृहम् ॥
७२॥
तम्--उसको; लब्ध्वा-- लेकर; लुब्धक:--बहेलिया; क्रूर: --निष्ठर; कपोतम्--कबूतर को; गृह-मेधिनम्-- भौतिकतावादीगृहस्थ; कपोतकान्--कबूतर के बच्चों को; कपोतीम्--कबूतरी को; च-- भी; सिद्ध-अर्थ:--अपना प्रयोजन सिद्ध करके;प्रययौ--चल पड़ा; गृहम्--अपने घर के लिए।
वह निष्ठर बहेलिया उस कबूतर को, उसकी पत्नी को तथा उनके सारे बच्चों को पकड़ करअपनी इच्छा पूरी करके अपने घर के लिए चल पड़ा।
एवं कुट॒म्ब्यशान्तात्मा द्वन्द्दाराम: पतत्रिवत् ।पुष्णन्कुटुम्बं कृपण: सानुबन्धोवसीद॒ति ॥
७३॥
एवम्--इस प्रकार; कुटुम्बी--परिवार वाला मनुष्य; अशान्त--अशान्त; आत्मा--उसकी आत्मा; दवन्द्र-- भौतिक द्वैत ( यथानर-नारी ); आराम: --आनंदित; पतत्रि-वत्--इस पक्षी की तरह; पुष्णन्ू--पालन-पोषण करते हुए; कुटुम्बम्-- अपने परिवारको; कृपण:--कंजूस; स-अनुबन्ध: -- अपने सम्बन्धियों सहित; अवसीदति--अत्यधिक कष्ट उठायेगा।
इस तरह जो व्यक्ति अपने पारिवारिक जीवन में अत्यधिक अनुरक्त रहता है, वह हृदय मेंक्षुब्ध रहता है। कबूतर की ही तरह वह संसारी यौन-आकर्षण में आनन्द ढूँढता रहता है। अपने परिवार का पालन-पोषण करने में बुरी तरह व्यस्त रहकर कंजूस व्यक्ति अपने परिवार वालों केसाथ अत्यधिक कष्ट भोगता है।
यः प्राप्य मानुषं लोकं मुक्तिद्वारमपावृतम् ।गृहेषु खगवत्सक्तस्तमारूढच्युतं विदु; ॥
७४॥
यः--जो; प्राप्प--पाकर; मानुषम् लोकम्--मनुष्य-जीवन; मुक्ति--मुक्ति का; द्वारमू--दरवाजा; अपावृतम्--खुला हुआ;गृहेषु--घरेलू मामलों में; खग-वत्--इस कथा के पक्षी की ही तरह; सक्त:--लिप्त; तमू--उसको; आरूढ--ऊँचे चढ़कर;च्युतम्ू--नीचे गिरते हुए; विदुः--मानते हैं।
जिसने मनुष्य-जीवन पाया है, उसके लिए मुक्ति के द्वार पूरी तरह से खुले हुए हैं। किन्तु यदिमनुष्य इस कथा के मूर्ख पक्षी की तरह अपने परिवार में ही लिप्त रहता है, तो वह ऐसे व्यक्ति केसमान है, जो ऊँचे स्थान पर केवल नीचे गिरने के लिए ही चढ़ा हो।
