← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 11 की सूची

अध्याय आठ: पिंगला की कहानी

श्रीज्राह्मण उवाचसुखमैन्द्रियकं राजन्स्वर्ग नरक एव च ।देहिनां यद्यथा दुःखं तस्मान्नेच्छेत तद्‌ बुध: ॥

१॥

श्री-ब्राह्मणः उबाच--उस साधु-ब्राह्मण ने कहा; सुखम्‌--सुख; ऐन्द्रियकम्‌--इन्द्रियों से उत्पन्न; राजन्‌--हे राजा; स्वर्गे--स्वर्गमें; नरके--तथा नरक में; एबव--निश्चय ही; च-- भी; देहिनाम्‌ू--देहधारी जीवों के; यत्‌ू--चूँकि; यथा--जिस तरह; दुःखम्‌--दुख; तस्मात्‌ू--इसलिए; न--नहीं; इच्छेत--इच्छा करे; तत्‌--वह; बुध:--जाननहारा |

साधु-ब्राह्मण ने कहा : हे राजन, देहधारी जीव स्वर्ग या नरक में स्वतः दुख का अनुभवकरता है। इसी तरह बिना खोजे ही सुख का भी अनुभव होता है। इसलिए बुद्धिमान तथाविवेकवान व्यक्ति ऐसे भौतिक सुख को पाने के लिए कभी कोई प्रयास नहीं करता।

ग्रासं सुमृष्टे विरसं महान्तं स्तोकमेव वा ।यहच्छयैवापतितं ग्रसेदाजगरोउक्रिय: ॥

२॥

ग्रासम्‌ू-- भोजन; सु-मृष्टम्‌--स्वच्छ तथा स्वादिष्ट; विरसम्‌--स्वादरहित; महान्तम्‌--बड़ी मात्रा में; स्तोकम्‌--छोटी मात्रा;एव--निश्चय ही; वा--अथवा; यहृच्छया--बिना निजी प्रयास के; एब--निस्सन्देह; आपतितम्‌--प्राप्त किया गया; ग्रसेत्‌ू--खालेना चाहिए; आजगर:--अजगर की तरह; अक्रिय:--निष्क्रिय, बिना प्रयास के उदासीन बने रहना।

अजगर का अनुकरण करते हुए मनुष्य को भौतिक प्रयास का परित्याग कर देना चाहिएऔर अपने उदर-पोषण के लिए उस भोजन को स्वीकार करना चाहिए, जो अनायास मिल जाय,चाहे वह स्वादिष्ट हो या स्वादरहित, पर्याप्त हो या स्वल्प।

शयीताहानि भूरीणि निराहारोनुपक्रमः ।यदि नोपनयेदग्रासो महाहिरिव दिष्टभुक्‌ ॥

३॥

शयीत--शान्तिपूर्वक रहता रहे; अहानि--दिनों तक; भूरीणि-- अनेक; निराहार: --उपवास करते हुए; अनुपक्रम:--बिनाप्रयास के; यदि--यदि; न उपनयेत्‌--नहीं आता; ग्रास:--भोजन; महा-अहि:-- अजगर; इब--सहश; दिष्ट-- भाग्य द्वारा प्रदत्त;भुक्‌ू-खाते हुए।

यदि कभी भोजन न भी मिले, तो सन्त-पुरुष को चाहिए कि बिना प्रयास किये वह अनेकदिनों तक उपवास रखे। उसे यह समझना चाहिए कि ईश्वर की व्यवस्था के कारण उसे उपवासकरना चाहिए। इस तरह अजगर का अनुसरण करते हुए उसे शान्त तथा धीर बने रहना चाहिए।

ओज:सहोबलयुतं बिभ्रद्देहमकर्मकम्‌ ।शयानो वीतनिद्रश्न नेहेतेन्द्रयवानपि ॥

४॥

ओज:--काम-शक्ति; सह:--मानसिक शक्ति; बल--शारीरिक शक्ति; युतम्‌ू--से युक्त; बिभ्रतू--पालन-पोषण करते हुए;देहम्‌--शरीर को; अकर्मकम्‌--बिना प्रयास के; शयान:--शान्त रहते हुए; बीत--मुक्त; निद्र: --अज्ञान से; च--तथा; न--नहीं; ईहेत-- प्रयास करे; इन्द्रिय-वान्‌ू--पूर्ण शारीरिक, मानसिक तथा काम-शक्ति से युक्त; अपि--यद्यपि।

सन्‍्त-पुरुष को शान्त रहना चाहिए और भौतिक दृष्टि से अक्रिय रहना चाहिए। उसे बिनाअधिक प्रयास के अपने शरीर का पालन-पोषण करना चाहिए। पूर्ण काम, मानसिक तथाशारीरिक शक्ति से युक्त होकर भी सन्त-पुरुष को भौतिक लाभ के लिए सक्रिय नहीं होनाचाहिए, अपितु अपने वास्तविक स्वार्थ के लिए सदैव सतर्क रहना चाहिए।

मुनि: प्रसन्नगम्भीरो दुर्विगाह्मो दुरत्ययः ।अनन्तपारो ह्यक्षोभ्य: स्तिमितोद इवार्णव: ॥

५॥

मुनि:ः--मुनि; प्रसन्न--प्रसन्न; गम्भीर: --अत्यन्त गम्भीर; दुर्विगाह्मः--अगाध; दुरत्यय:--दुर्लध्य; अनन्त-पार: --असीम; हि--निश्चय ही; अक्षोभ्य:--अश्लुब्ध; स्तिमित--शान्त; उदः -- जल; इब--सहश; अर्णवः--समुद्र

मुनि अपने बाह्य आचरण में सुखी और मधुर होता है, किन्तु भीतर से अत्यन्त गम्भीर तथाविचारवान होता है। चूँकि उसका ज्ञान अगाध तथा असीम होता है, अतः वह कभी क्षुब्ध नहींहोता। इस तरह वह सभी प्रकार से अगाध तथा दुर्लध्य सागर के शान्त जल की तरह होता है।

समृद्धकामो हीनो वा नारायणपरो मुनिः ।नोत्सपेत न शुष्येत सरिद्धिरिव सागर: ॥

६॥

समृद्ध--सम्पन्न; काम:-- भौतिक ऐश्वर्य; हीन:--रहित, विहीन; वा--अथवा; नारायण-- भगवान्‌; पर: --परम मानते हुए;मुनिः--सन्त भक्त; न--नहीं; उत्सपेत--बढ़ जाता है; न--नहीं; शुष्येत--सूख जाता है; सरिद्द्धिः--नदियों के द्वारा; इब--सहश; सागर:--समुद्र

वर्षाऋतु में उफनती हुई नदियाँ सागर में जा मिलती हैं और ग्रीष्पऋतु में उधली होने से उनमेंजल की मात्रा बहुत कम हो जाती है। फिर भी समुद्र न तो वर्षाऋतु में उमड़ता है, न ही ग्रीष्मऋतुमें सूखता है। इसी तरह से जिस सन्‍्त-भक्त ने भगवान्‌ को अपने जीवन का लक्ष्य स्वीकार कियाहै, उसे कभी तो भाग्य से प्रचुर भौतिक ऐश्वर्य प्राप्त हो जाता है और कभी वह अपने को भौतिकइृष्टि से कंगाल पाता है। फिर भी भगवान्‌ का ऐसा भक्त न तो प्रोन्नति के समय हर्षित होता है, नदरिद्र बनने पर खिन्न होता है।

इष्टा स्त्रियं देवमायां तद्धावैरजितेन्द्रिय: ।प्रलोभित: पतत्यन्धे तमस्यग्नौ पतड़वत्‌ ॥

७॥

इृष्ठा--देखकर; स्त्रियम्‌--स्त्री को; देव-मायाम्‌-- भगवान्‌ की माया से, जिसका रूप निर्मित हुआ है; तत्‌-भावै:--स्त्री केमोहक कार्यों से; अजित--जिसने वश में नहीं किया; इन्द्रियः--अपनी इन्द्रियाँ; प्रलोभितः--मुग्ध; पतति--नीचे गिरता है;अन्धे--अज्ञान के अंधकार में; तमसि--नरक के अंधकार में; अग्नौ-- अग्नि में ; पतड़-बत्‌--पतिंगे की तरह ।

जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं कर पाता, वह परमेश्वर की माया से उत्पन्न स्त्री केस्वरूप को देखकर तुरन्त आकृष्ट हो जाता है। दरअसल जब कोई स्त्री मोहक शब्द बोलती है,नखरे से हँसती है और अपने शरीर को काम-वासना से युक्त होकर मटकाती है, तो मनुष्य कामन तुरन्त मुग्ध हो जाता है और वह भव-अंधकार में उसी तरह जा गिरता है, जिस तरह पतिंगाअग्नि पर मदान्ध होकर उसकी लपटों में तेजी से गिर पड़ता है।

योषिद्धिरण्याभरणाम्बरादि-द्रव्येषु मायारचितेषु मूढ: ।प्रलोभितात्मा ह्ुपभोगबुद्धयापतड़वन्नश्यति नष्टदृष्टि: ॥

८॥

योषित्‌--स्त्री के; हिरण्य--सुनहरे; आभरण--गहने; अम्बर--वस्त्र; आदि--इ त्यादि; द्रव्येषु--ऐसी वस्तुओं के देखने पर;माया--भगवान्‌ की माया द्वारा; रचितेषु--निर्मित; मूढ:--विवेकहीन मूर्ख; प्रलोभित--काम-वासना से जाग्रत; आत्मा--ऐसाव्यक्ति; हि--निश्चय ही; उपभोग--इन्द्रियतृप्ति के लिए; बुद्धया--इच्छा से; पतड़-वबत्‌--पतिंगा की तरह; नश्यति--नष्ट होजाता है; नष्ट--नष्ट हो गई है; दृष्टिः--जिसकी बुद्धि |

विवेकरहित मूर्ख व्यक्ति सुनहले गहनों, सुन्दर वस्त्रों और अन्य प्रसाधनों से युक्त कामुक स्त्रीको देखकर तुरन्त ललचा हो उठता है। ऐसा मूर्ख इन्द्रियतृप्ति के लिए उत्सुक होने से अपनी सारीबुद्धि खो बैठता है और उसी तरह नष्ट हो जाता है, जिस तरह जलती अग्नि की ओर दौड़ने वालापतिंगा।

स्तोकं स्तोकं ग्रसेदग्रासं देहो वर्तेत यावता ।गृहानहिंसन्नातिष्ठेद्रत्ति माधुकरीं मुनि: ॥

९॥

स्तोकम्‌ स्तोकम्‌--थोड़ा थोड़ा करके; ग्रसेतू--खाये; ग्रासम्‌ू-- भोजन; देह:--शरीर; वर्तेत--जिससे जीवित रह सके;यावता--उतने से; गृहान्‌--गृहस्थों को; अहिंसन्‌ू--तंग न करते हुए; आतिष्ठेत्‌-- अभ्यास करे; वृत्तिमू--पेशा, व्यवसाय; माधु-करीम्‌ू--मधुमक्खी का; मुनि:--सन्त-पुरुष

सन्‍्तपुरुष को उतना ही भोजन स्वीकार करना चाहिए, जितने से उसका जीवन-निर्वाह होसके। उसे द्वार-द्वार जाकर प्रत्येक परिवार से थोड़ा-थोड़ा भोजन स्वीकार करना चाहिए। इसतरह उसे मधुमक्खी की वृत्ति का अभ्यास करना चाहिए।

अणुभ्यश्च महदभ्यश्व शास्त्रेभ्य:ः कुशलो नरः ।सर्वतः सारमादद्यात्पुष्पे भ्य इव घटूपदः ॥

१०॥

अणुभ्य:--छोटे से छोटे से लेकर; च--तथा; महद्भ्य: --सबसे बड़े से; च-- भी; शास्त्रेभ्य: --शास्त्रों से; कुशल:--बुद्धिमान;नरः--मनुष्य; सर्वतः--सबों से; सारम्‌ू--निचोड़, सार; आदद्यात्‌-ग्रहण करे; पुष्पेभ्य:--फूलों से; इब--सहश; षट्पद: --मधुमक्खी |

जिस तरह मधुमक्खी बड़े तथा छोटे सभी प्रकार के फूलों से मधु ग्रहण करती है, उसी तरहबुद्धिमान मनुष्य को समस्त धार्मिक शास्त्रों से सार ग्रहण करना चाहिए।

सायन्तनं श्रस्तनं वा न सड्ूह्लीत भिक्षितम्‌ ।पाणिपात्रोदरामत्रो मक्षिकेव न सड़ग्रही ॥

११॥

सायन्तनम्‌--रात के निमित्त; श्रस्तनम्‌ू--कल के लिए; वा--अथवा; न--नहीं; सड्डह्नीत-- स्वीकार करे; भिक्षितम्‌-भिक्षा;पाणि--हाथ से; पात्र--स्तरी के रूप में; उदर--पेट से; अमत्र:--संग्रह पात्र ( कोठार ) की तरह; मक्षिका--मधुमक्खी; इब--सहश; न--नहीं; सड्ग्रही--संग्रह करने वाला।

सन्त-पुरुष को यह नही सोचना चाहिए 'मैं इस भोजन को आज रात के लिए रखूँगा औरइस दूसरे भोजन को कल के लिए बचा लूँगा।दूसरे शब्दों में, सन्‍्त-पुरुष को भीख से प्राप्तभोज्य सामग्री का संग्रह नहीं करना चाहिए प्रत्युत उसे अपने हाथ को ही पात्र बनाकर उसमेंजितना आ जाय उसी को खाना चाहिए। उसका एकमात्र कोठार उसका पेट होना चाहिए औरउसके पेट में आसानी से जितना आ जाय वही उसका भोजन-संग्रह होना चाहिए। इस तरह उसेलोभी मधुमक्खी का अनुकरण नहीं करना चाहिए, जो अधिक से अधिक मधु एकत्र करने केलिए उत्सुक रहती है।

सायन्तनं श्रस्तनं वा न सड्डूह्लीत भिक्षुकः ।मक्षिका इव सड्डहन्सह तेन विनश्यति ॥

१२॥

सायन्तनम्‌--रात के लिए; श्रस्तनम्‌--कल के लिए; वा--अथवा; न--नहीं; सड्डह्लीत-- स्वीकार करे; भिक्षुक:--सन्त-साथधु;मक्षिका--मधुमक्खी; इब--सहश; सड्डहन्‌ू--एकत्र करते हुए; सह--साथ; तेन--उससंग्रह के; विनश्यति--नष्ट हो जाता है।

साधु-संत को उसी दिन या अगले दिन खाने के लिए भी भोजन का संग्रह नहीं करनाचाहिए। यदि वह इस आदेश की अवहेलना करता है और मधुमक्खी की तरह अधिक से अधिकस्वादिष्ट भोजन एकत्र करता है, तो उसने, जो कुछ एकत्र किया है, वह निस्सन्देह उसे नष्ट करदेगा।

पदापि युवतीं भिक्चुर्न स्पृशेद्दरावीमपि ।स्पृशन्करीव बध्येत करिण्या अड्गसड्भरत: ॥

१३॥

पदा--पाँव से; अपि-- भी; युवतीम्‌--युवती को; भिक्षु:--साधु संत; न--नहीं; स्पृशेतू--छूना चाहिए; दारवीम्‌ू--लकड़ी कीबनी; अपि--भी; स्पृशन्‌--स्पर्श करते हुए; करी--हाथी; इब--सहृश; बध्येत--बँधा लेता है; करिण्या:--हथिनी के; अड़-सड़त:--शरीर के स्पर्श से |

सनन्‍त-पुरुष को चाहिए कि वह किसी युवती का स्पर्श न करे। वस्तुत:, उसे काठ की बनीस्त्री के स्वरूप वाली गुड़िया को भी अपने पाँव से भी स्पर्श नहीं होने देना चाहिए। स्त्री के साथशारीरिक सम्पर्क होने पर वह निश्चित ही उसी तरह माया द्वारा बन्दी बना लिया जायेगा, जिसतरह हथिनी के शरीर का स्पर्श करने की इच्छा के कारण हाथी पकड़ लिया जाता है।

नाधिगच्छेल्स्त्रियं प्राज्ञ: कर्हिचिन्मृत्युमात्मनः ।बलाधिकै: स हन्येत गजैरन्यैर्गजो यथा ॥

१४॥

न अधिगच्छेत्‌ू--आनन्द पाने के लिए नहीं जाये; स्त्रियम्‌ू--स्त्री; प्राज्ः--जो बुद्धिमत्तापूर्वक भेदभाव कर सके; कहिचित्‌--किसी समय; मृत्युम्‌ू--साक्षात्‌ मृत्यु; आत्मतः--अपने लिए; बल--बल में; अधिकै:--जो श्रेष्ठ हैं उनके द्वारा; सः--वह;हन्येत--विनष्ट कर दिया जायेगा; गजैः--हाथियों के द्वारा; अन्यैः--अन्यों के लिए; गज:ः--हाथी; यथा--जिस तरह।

विवेकवान्‌ व्यक्ति को किसी भी परिस्थिति में अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए स्त्री के सुन्दर रूपका लाभ उठाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। जिस तरह हथिनी से संभोग करने का प्रयासकरने वाला हाथी उसके साथ संभोग कर रहे अन्य हाथियों के द्वारा मार डाला जाता है, उसीतरह, जो व्यक्ति किसी नारी के साथ संभोग करना चाहता है, वह किसी भी क्षण उसके अन्यप्रेमियों द्वारा मार डाला जा सकता है, जो उससे अधिक बलिष्ठ होते हैं।

न देय॑ नोपभोग्यं च लुब्धर्यहु:खसज्चितम्‌ ।भुड्े तदपि तच्चान्यो मधुहेवार्थविन्मधु ॥

१५॥

न--नहीं; देयम्‌--अन्यों को दान में दिये जाने के लिए; न--नहीं; उपभोग्यम्‌--स्वयं भोगे जाने के लिए; च--भी; लुब्धैः--लोभीजनों के द्वारा; यत्‌-- जो; दुःख--अत्यन्त संघर्ष तथा कष्ट से; सब्लितम्‌--एकत्र किया जाता है; भुड्ढे --भोग करता है;तत्‌--वह; अपि--तिस पर भी; तत्‌ू--वह; च-- भी; अन्य: --अन्य कोई; मधु-हा--छत्ते से शहद चुराने वाला; इब--सहश;अर्थ--धन; वित्‌--जो यह जानता है कि किस तरह पहचाना जाय; मधु--शहद

लोभी व्यक्ति बहुत संघर्ष तथा कष्ट से प्रचुर मात्रा में धन एकत्र करता है, किन्तु इस धन कोएकत्र करने वाले व्यक्ति को इसका भोग करने या अन्यों को दान हमेशा करने नहीं दिया जाता।लोभी व्यक्ति उस मधुमक्खी के समान है, जो प्रचुर मात्रा में शहद उत्पन्न करने के लिए संघर्षकरती है, किन्तु इसे उस व्यक्ति द्वारा चुरा लिया जाता है, जो या तो स्वयं उसका भोग करता हैया अन्‍्यों को बेच देता है। कोई चाहे कितनी सावधानी के साथ अपनी कठिन कमाई को क्‍यों नछिपाये या उसकी रक्षा करने का प्रयास करे, किन्तु मूल्यवान वस्तुओं का पता लगाने वाले पटुलोग उसे चुरा ही लेंगे।

सुदुःखोपार्जितैर्वित्तैराशासानां गृहाशिष: ।मधुहेवाग्रतो भुड्ढे यतिर गृहमेधिनाम्‌ ॥

१६॥

सु-दुःख--अत्यधिक संघर्ष से; उपार्जितैः--अर्जित किया गया; वित्तै:--भौतिक एऐ श्वर्य से; आशासानाम्‌--अत्यधिक इच्छारखने वालों के; गृह--घरेलू भोग से सम्बद्ध; आशिष:--आशीर्वाद, वर; मधु-हा--शहद-चोर; इब--सहृश; अग्रत:--प्रथम,औरों से पहले; भुड़े -- भोग करता है; यति:--भिक्षु, साधु-संत; वै--निश्चय ही; गृह-मेधिनाम्‌--गृहस्थ-जीवन के प्रति समर्पितलोगों के |

जिस प्रकार शहद-चोर मधुमक्खियों द्वारा बड़े ही परिश्रमपूर्वक एकत्र की गई शहद कोनिकाल लेता है, उसी तरह ब्रह्मचारी तथा संन्‍्यासी जैसे साधु-संत पारिवारिक भोग में समर्पितगृहस्थों द्वारा बहुत ही कष्ट सहकर संचित किये गये धन का भोग करने के अधिकारी हैं।

ग्राम्यगीतं न श्रृणुयाद्यतिर्बनचर: क्वचित्‌ ।शिक्षेत हरिणाद्वद्धान्मृगयोर्गीतमोहितातू ॥

१७॥

ग्राम्य--इन्द्रियतृप्ति से सम्बद्ध; गीतम्‌--गीत; न--नहीं; श्रुणुयात्‌--सुने; यतिः--साधु-संत; बन--जंगल में; चर:--विचरणकरते; क्वचित्‌--कभी; शिक्षेत--सीखे ; हरिणात्‌--हिरन से; बद्धात्‌--बाँधे गये; मृगयो: --शिकारी के; गीत--गीत द्वारा;मोहितात्‌ू--मोहित किये गये।

वनवासी सन्‍्यासी को चाहिए कि भौतिक भोग को उत्तेजित करने वाले गीत या संगीत कोकभी भी न सुने। प्रत्युत सन्‍त पुरुष को चाहिए कि ध्यान से उस हिरन के उदाहरण का अध्ययनकरे, जो शिकारी के वाद्य के मधुर संगीत से विमोहित होने पर पकड़ लिया जाता है और मारडाला जाता है।

नृत्यवादित्रगीतानि जुषन्ग्राम्याणि योषिताम्‌ ।आसां क्रीडनको वश्य ऋष्यश्रुज्ञो मृगीसुतः ॥

१८ ॥

नृत्य--नाच; वादित्र--वादन; गीतानि--गीतों को; जुषन्‌--अनुशीलन करते हुए; ग्राम्याणि--इन्द्रियतृप्ति विषयक;योषिताम्‌--स्त्रियों की; आसामू--उनके; क्रीडनक:--क्रीड़ा की वस्तु; वश्य: --पूरी तरह वशी भूत; ऋष्य- श्रृड़: --ऋष्यश्रृंगमुनि; मृगी-सुत:--मृगी का पुत्र

सुन्दर स्त्रियों के सांसारिक गायन, नृत्य तथा संगीत-मनोरंजन से आकृष्ट होकर मृगी-पुत्रऋष्यश्रृंग मुनि तक उनके वश में आ गये, मानों कोई पालतू पशु हों।

जिह्नयातिप्रमाथिन्या जनो रसविमोहितः ।मृत्युमृच्छत्यसद्दुद्धिर्मी नस्तु बडिशैर्यथा ॥

१९॥

जिह॒या--जीभ से; अति-प्रमाथिन्या--जो अत्यधिक मथने वाली है; जनः--पुरुष; रस-विमोहितः--स्वाद के प्रति आकर्षण सेमोहित हुआ; मृत्युम्‌--मृत्यु; ऋच्छति--प्राप्त करता है; असत्‌--व्यर्थ; बुद्धिः--जिसकी बुद्धि; मीन:--मछली; तु--निस्सन्देह;बडिशै:--काँटे द्वारा; यथा--जिस तरह ।

जिस तरह जीभ का भोग करने की इच्छा से प्रेरित मछली मछुआरे के काँटे में फँस करमारी जाती है, उसी तरह मूर्ख व्यक्ति जीभ की अत्यधिक उद्दवेलित करने वाली उमंगों से मोहग्रस्तहोकर विनष्ट हो जाता है।

इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिण: ।वर्जयित्वा तु रसन॑ तन्निरन्नस्य वर्धते ॥

२०॥

इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; जबन्ति--जीत लेती हैं; आशु--शीकघ्रतापूर्वक; निराहारा:--जो लोग इन्द्रियों को उनके विषयों से रोकतेहैं; मनीषिण: --विद्वान; वर्जयित्वा--के अतिरिक्त; तु--लेकिन; रसनम्‌ू--जीभ; तत्‌--उसकी इच्छा; निरन्नस्य--उपवास करनेवाले की; वर्धते--बढ़ाती है।

उपवास द्वारा विद्वान पुरुष जीभ के अतिरिक्त अन्य सारी इन्द्रियों को जल्दी से अपने वश मेंकर लेते हैं, क्योंकि ऐसे लोग अपने को खाने से दूर रखकर स्वादेन्द्रिय को तृप्त करने की प्रबलइच्छा से पीड़ित हो उठते हैं।

तावजितेन्द्रियो न स्याद्विजितान्येन्द्रिय: पुमान्‌ ।न जयेद्गसनं यावज्िितं सर्व जिते रसे ॥

२१॥

तावत्‌--तब तक; जित-इन्द्रियः:--जिसने अपनी इन्द्रियों पर विजय पा ली है; न--नहीं; स्थातू--हो सकता है; विजित-अन्य-इन्द्रियः--जिसने अन्य इन्द्रियों पर विजय पा ली है; पुमान्‌ू--मनुष्य; न जयेत्‌--नहीं जीत सकता; रसनम्‌--जीभ को; यावत्‌--जब तक; जितमू्‌--जीता हुआ; सर्वम्‌--हर वस्तु; जिते--जीत लेने पर; रसे--जीभ को |

भले ही कोई मनुष्य अन्य सारी इन्द्रियों को क्‍यों न जीत ले, किन्तु जब तक जीभ को नहींजीत लिया जाता, तब तक वह इन्द्रियजित नहीं कहलाता। किन्तु यदि कोई मनुष्य जीभ को वशमें करने में सक्षम होता है, तो उसे सभी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण करने वाला माना जाता है।

पिड्ला नाम वेश्यासीद्विदेहनगरे पुरा ।तस्या मे शिक्षितं किश्ञिन्निबोध नृपनन्दन ॥

२२॥

पिड्ूला नाम--पिंगला नाम की; वेश्या--वेश्या; आसीतू-- थी; विदेह-नगरे--विदेह नामक नगर में ; पुरा--प्राचीन काल में;तस्या:--उससे; मे--मेरे द्वारा; शिक्षितं--जो कुछ सीखा गया; किझ्जित्‌ू--जो कुछ; निबोध---अब सीखो; नृप-नन्दन--हे राजाके पुत्र |

हे राजपुत्र, पूर्वकाल में विदेह नामक शहर में पिंगला नामकी एक वेश्या रहती थी। अबकृपा करके, वह सुनिये, जो मैंने उस स्त्री से सीखा है।

सा स्वैरिण्येकदा कान्तं सल्ढेत उपनेष्यती ।अभूत्काले बहिद्वरि बिभ्रती रूपमुत्तमम्‌ ॥

२३॥

सा--वह; स्वैरिणी --वेश्या; एकदा--एक बार; कान्तम्‌--ग्राहक, प्रेमी; सड्जेते--रमण स्थान में; उपनेष्यती--लाने के लिए;अभूत्‌--खड़ी रही; काले--रात में; बहि:--बाहर; द्वारे--दरवाजे पर; बिभ्रती--पकड़े हुए; रूपम्‌ू--अपना रूप; उत्तमम्‌--अत्यन्त सुन्दर।

एक बार वह वेश्या अपने घर में किसी प्रेमी को लाने की इच्छा से रात के समय अपनासुन्दर रूप दिखलाते हुए दरवाजे के बाहर खड़ी रही।

मार्ग आगच्छतो वीक्ष्य पुरुषान्पुरुषर्षभ ।तान्शुल्कदान्वित्तवतः कान्तान्मेनेर्थकामुकी ॥

२४॥

मार्गे--उस गली में; आगच्छत:--आने वाले; वीक्ष्य--देखकर; पुरुषान्‌ू-- पुरुषों को; पुरुष-ऋषभ-हे श्रेष्ठ पुरुष; तानू--उनको; शुल्क-दानू--जो मूल्य चुका सके; वित्त-वत:-- धनवान; कान्तान्‌--प्रेमियों या ग्राहकों को; मेने--विचार किया;अर्थ-कामुकी-- धन चाहने वाले |

हे पुरुष- श्रेष्ठ, यह वेश्या धन पाने के लिए अत्यधिक आतुर थी और जब वह रात में गली मेंखड़ी थी, तो वह उधर से गुजरने वाले सारे व्यक्तियों का अध्ययन यह सोचकर करती रही कि,'ओह, इसके पास अवश्य ही धन होगा। मैं जानती हूँ यह मूल्य चुका सकता है और मुझेविश्वास है कि वह मेरे साथ अत्यधिक भोग कर सकेगा।वह वेश्या गली पर के सभी पुरुषों केबारे में ऐसा ही सोचती रही।

आगतेष्वपयातेषु सा सद्लेतोपजीविनी ।अप्यन्यो वित्तवान्कोपि मामुपैष्यति भूरिद: ॥

२५॥

एवं दुराशया ध्वस्तनिद्रा द्वार्यवलम्बती ।निर्गच्छन्ती प्रविशती निशीथं समपद्यत ॥

२६॥

आगतेषु--जब वे आये; अपयातेषु--तथा वे चले गये; सा--उसने; सद्लेत-उपजीविनी--वेश्यावृत्ति ही जिसकी आमदनी थी;अपि--हो सकता है; अन्य:--दूसरा; वित्त-वानू-- धनवान; कः अपि--कोई भी; माम्‌--मेंरे पास; उपैष्यति--प्रेम के लिएआयेगा; भूरि-दः--तथा वह प्रचुर धन देगा; एबम्‌--इस प्रकार; दुराशया--व्यर्थ की आशा से; ध्वस्त--नष्ट; निद्रा--उसकीनींद; द्वारि--दरवाजे पर; अवलम्बती--टेक लगाये; निर्गच्छन्‍्ती--गली की ओर जाती हुई; प्रविशती--अपने घर वापस आती;निशीथम्‌--अर्धरात्रि; समपद्यत--हो गई

जब वेश्या पिंगला द्वार पर खड़ी हो गई, कई पुरुष आये और उसके घर के सामने से टहलतेहुए चले गये। उसकी जीविका का एकमात्र साधन वेश्यावृत्ति था, अतएवं उसने उत्सुकतापूर्वकसोचा 'हो सकता है कि अब जो आ रहा है, वह बहुत धनी होहाय! वह तो रूक ही नहीं रहा,किन्तु मुझे विश्वास है कि अन्य कोई अवश्य आयेगा। अवश्य ही यह जो आ रहा है मेरे प्रेम कामूल्य चुकायेगा और शायद प्रचुर धन दे।' इस प्रकार व्यर्थ की आशा लिए वह द्वार पर टेकलगाये खड़ी रही और अपना धंधा पूरा न कर सकी और सोने भी न जा सकी। उद्विग्नता से वहकभी गली में जाती और कभी अपने घर के भीतर लौट आती। इस तरह धीरे धीरे अर्धरात्रि होआई।

तस्या वित्ताशया शुष्यद्वक्त्राया दीनचेतस: ।निर्वेद: परमो जज्ञे चिन्ताहेतु: सुखावह: ॥

२७॥

तस्या:--उसकी; वित्त--धन के लिए; आशया--इच्छा से; शुष्यत्‌ू--सूख गया; वकक्‍्त्राया: --मुख; दीन--खिन्न; चेतस:--मन;निर्वेद:--विरक्ति; परम:--अत्यधिक; जज्ञे--जागृत हो उठी; चिन्ता--चिन्ता; हेतु:--के कारण; सुख--सुख; आवहः--लातेहुए

ज्यों ज्यों रात बीतती गई, वह वेश्या, जो कि धन की अत्यधिक इच्छुक थी, धीरे-धीरे हताशहो उठी और उसका मुख सूख गया। इस तरह धन की चिन्ता से युक्त तथा अत्यन्त निराश होकरवह अपनी स्थिति से अत्यधिक विरक्ति अनुभव करने लगी और उसके मन में सुख का उदयहुआ।

तस्या निर्विण्णचित्ताया गीत॑ श्रुणु यथा मम ।निर्वेद आशापाशानां पुरुषस्य यथा हासि: ॥

२८ ॥

तस्या:--उसका; निर्विण्ण-- क्षुब्ध; चित्ताया:--मन; गीतम्‌--गीत; श्रूणु--सुनो; यथा--मानो; मम--मुझसे; निर्वेद: --विरक्ति; आशा--आशाओं एवं इच्छाओं के; पाशानाम्‌--बन्धनों के; पुरुषस्थ--पुरुष को; यथा--जिस तरह; हि--निश्चय ही;असि:ः--तलवार।

वह वेश्या अपनी भौतिक स्थिति से ऊब उठी और इस तरह वह अन्यमनस्क हो गई।दरअसल, विरक्ति तलवार का काम करती है। यह भौतिक आशाओं तथा इच्छाओं के बन्धन कोखण्ड-खण्ड कर देती है। अब मुझसे वह गीत सुनो, जो उस स्थिति में वेश्या ने गाया।

न ह्ाड्जजातनिर्वेदो देहबन्धं जिहासति ।यथा विज्ञानरहितो मनुजो ममतां नृूप ॥

२९॥

न--नहीं; हि--निस्सन्देह; अड्र--हे राजा; अजात--जिसने उत्पन्न नहीं किया; निर्वेद:--विरक्ति; देह-- भौतिक शरीर का;बन्धम्‌--बन्धन; जिहासति--त्यागने का इच्छुक होता है; यथा--जिस तरह; विज्ञान--अनुभूत ज्ञान; रहित:--विहीन; मनुज: --मनुष्य; ममताम्‌--स्वामित्व का मिथ्या भाव; नृप--हे राजा।

हे राजन, जिस तरह आध्यात्मिक ज्ञान से विहीन व्यक्ति कभी भी अनेक भौतिक वस्तुओं परअपने मिथ्या स्वामित्व को त्यागना नहीं चाहता, उसी तरह जिस व्यक्ति में विरक्ति उत्पन्न नहीं हुईवह कभी भी भौतिक शरीर के बन्धन को त्यागने के लिए तैयार नहीं होता।

पिड्लोवाचअहो मे मोहविततिं पश्यताविजितात्मन: ।या कान्तादसतः काम॑ कामये येन बालिशा ॥

३०॥

पिड्रला--पिंगला ने; उबाच--कहा; अहो --ओह; मे--मेरा; मोह--मोह का; विततिम्‌--विस्तार; पश्यत--देखो तो;अविजित-आत्मन:--जिसका मन वश में नहीं है, उसका; या--जो ( मैं ); कान्तातू--अपने प्रेमी से; असतः--व्यर्थ, तुच्छ;'कामम्‌--विषय-सुख; कामये--चाहती हूँ; येन-- क्योंकि; बालिशा--मूर्ख हूँ

पिंगला वेश्या ने कहा : जरा देखो न, मैं कितनी मोहग्रस्त हूँ। चूँकि मैं अपने मन को वश मेंनहीं रख सकती, इसलिए मैं मूर्ख की तरह किसी तुच्छ व्यक्ति से विषय-सुख की कामना करती>>हूँ।

सन्‍्तं समीपे रमणं रतिप्रदंवित्तप्रदं नित्यमिमं विहाय ।अकामदं दुःखभयाधिशोक-मोहप्रदं तुच्छमहं भजेउज्ञा ॥

३१॥

सन्तम्‌--होते हुए; समीपे--अत्यन्त निकट ( मेरे हृदय में ); रमणम्‌--अत्यन्त प्रिय; रति--वास्तविक प्रेम या आनन्द; प्रदम्‌--देने वाला; वित्त-- धन; प्रदम्‌ू--देने वाला; नित्यम्‌--नित्य; इमम्‌--उसको; विहाय--त्याग कर; अकाम-दम्‌--जो किसी कीइच्छाओं को कभी नहीं पूरा कर सकता; दुःख--कष्ट; भय--डर; आधि--मानसिक क्लेश; शोक--शोक; मोह--मोह;प्रदम्‌ू--देने वाला; तुच्छम्‌-- अत्यन्त तुच्छ; अहम्‌--मैं; भजे--सेवा करती हूँ; अज्ञा--अज्ञानी मूर्ख |

मैं ऐसी मूर्ख निकली कि मेरे हृदय में जो शाश्वत स्थित है और मुझे अत्यन्त प्रिय है उस पुरुषकी मैंने सेवा छोड़ दी। वह अत्यन्त प्रिय ब्रह्माण्ड का स्वामी है, जो कि असली प्रेम तथा सुखका दाता है और समस्त समृद्धि का स्त्रोत है। यद्यपि वह मेरे ही हृदय में है, किन्तु मैंने उसकीपूर्णरूपेण अनदेखी की है। बजाय इसके मैंने अनजाने ही तुच्छ आदमियों की सेवा की है, जोमेरी असली इच्छाओं को कभी भी पूरा नहीं कर सकते और जिन्होंने मुझे दुख, भय, चिन्ता,शोक तथा मोह ही दिया है।

अहो मयात्मा परितापितो वृथास्लित्यवृत्त्यातिविगर्हावार्तया ।स्त्रैणान्नराद्यार्थतृषो नुशोच्यात्‌क्रीतेन वित्तं रतिमात्मनेच्छती ॥

३२॥

अहो--ओह; मया--मेरे द्वारा; आत्मा--आत्मा; परितापित:--कष्ट दिया गया; वृथा--व्यर्थ ही; साद्लेत्य--वेश्या की; वृत्त्या--वृत्ति या पेशे द्वारा; अति-विगर्ई--अत्यन्त निन्दनीय; वार्तया--वृत्ति द्वारा; स्त्रैणात्‌--कामुक व्यक्तियों द्वारा; नरात्‌ू--मनुष्यों से;या--जो ( मैं ); अर्थ-तृष:--लोभी; अनुशोच्यात्‌--दयनीय; क्रीतेन--बिके हुए; वित्तम्‌-- धन; रतिम्‌ू--मैथुन सुख;आत्मना--अपने शरीर से; इच्छती--चाहती हुई |

ओह! मैंने अपनी आत्मा को व्यर्थ ही पीड़ा पहुँचाई। मैंने ऐसे कामुक, लोभी पुरुषों के हाथअपने शरीर को बेचा जो स्वयं दया के पात्र हैं। इस प्रकार मैंने वेश्या के अत्यन्त गहित पेशे कोअपनाते हुए धन तथा मैथुन का आनन्द पाने की आशा की थी।

यदस्थिभिर्निर्मितवंशवंस्य-स्थूणं त्वचा रोमनखै: पिनद्धम्‌ ।क्षरत्नवद्वारमगारमेतद्‌विष्मूत्रपूर्ण मदुपैति कान्या ॥

३३॥

यत्‌--जो; अस्थिभि:--हड्डियों से; निर्मित--बना हुआ; वंश--रीढ़; वंश्य--पसलियाँ; स्थूणम्‌--हाथ-पैर की हड्डियाँ;त्वचा--चमड़ी से; रोम-नखै:--बाल तथा नाखूनों से; पिनद्धम्‌ू--ढका; क्षरत्‌--टपकता हुआ; नव--नौ; द्वारम्‌्-द्वारों;अगारम्‌--घर; एतत्‌--यह; विट्‌ू--मल; मूत्र--मूत्र, पेशाब से; पूर्णम्‌-- भरा हुआ; मत्‌--मेरे अतिरिक्त; उपैति--अपने कोलगाती है; का--कौन; अन्या--अन्य स्त्री |

यह भौतिक शरीर एक घर के सहृश है, जिसमें आत्मा रूप में मैं रह रही हूँ। मेरी रीढ़,पसलियों, हाथ तथा पाँव को बनाने वाली हड्डियाँ इस घर की आड़ी तथा पड़ी शहतीरें, थूनियाँतथा ख भें हैं और पूरा ढाँचा मल-मूत्र से भरा हुआ है तथा चमड़ी, बाल तथा नाखूनों सेआच्छादति है। इस शरीर के भीतर जाने वाले नौ द्वार निरन्तर गन्दी वस्तुएँ निकालते रहते हैं।भला मेरे अतिरिक्त कौन स्त्री इतनी मूर्ख होगी कि वह इस भौतिक शरीर के प्रति यह सोचकरअनुरक्त होगी कि उसे इस युक्ति से आनन्द तथा प्रेम मिल सकेगा ? विदेहानां पुरे हास्मिन्नहमेकैव मूढधी: ।यान्यमिच्छन्त्यसत्यस्मादात्मदात्काममच्युतात्‌ ॥

३४॥

विदेहानाम्‌--विदेह के निवासियों के; पुरे--नगर में; हि--निश्चय ही; अस्मिनू--इस; अहम्‌--मैं; एका-- अकेली; एव--निस्सन्देह; मूढ-- मूर्ख; धीः--बुद्धि वाली; या--जो ( मैं ही ); अन्यम्‌ू--दूसरी; इच्छन्ती --चाहती हुई; असती--नितान्तव्यभिचारिणी होकर; अस्मात्‌--उन; आत्म-दात्‌ू--हमें असली आध्यात्मिक रूप प्रदान करने वाला; कामम्‌--इन्द्रियतृप्ति;अच्युतातू-- भगवान्

‌ अच्युत के अतिरिक्तनिश्चित रूप से इस विदेह नगरी में मैं ही अकेली निपट मूर्ख हूँ। मैंने उन भगवान्‌ की उपेक्षाकी है, जो हमें सब कुछ देते हैं, यहाँ तक कि हमारा मूल आध्यात्मिक स्वरूप भी देते हैं। मैंनेउन्हें छोड़ कर अनेक पुरुषों से इन्द्रियतृप्ति का भोग करना चाहा है।

सुहत्प्रेष्ठमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम्‌ ।तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेडनेन यथा रमा ॥

३५॥

सु-हत्‌--शुभेच्छु मित्र; प्रेष्ट-तम:--नितान्त प्रिय; नाथ:--प्रभु; आत्मा--आत्मा; च-- भी; अयम्‌--वह; शरीरिणाम्‌-- समस्तशरीरधारियों के; तमू--उसको; विक्रीय--मोल लेकर; आत्मना--अपने आपको शरणागत करके; एव--निश्चय ही; अहम्‌--मैं; रमे--रमण करूँगी; अनेन-- भगवान्‌ के साथ; यथा--जिस तरह; रमा--लक्ष्मीदेवी |

भगवान्‌ समस्त जीवों के लिए नितान्त प्रिय हैं, क्योंकि वे हर एक के शुभेच्छु तथा स्वामीहैं। वे हर एक के हृदय में स्थित परमात्मा हैं। अतएव मैं पूर्ण शरणागति का मूल्य चुकाकर तथाभगवान्‌ को मोल लेकर उनके साथ उसी तरह रमण करूँगी, जिस तरह लक्ष्मीदेवी करती हैं।

कियत्प्रियं ते व्यभजन्कामा ये कामदा नरा: ।आइद्यन्तवन्तो भार्याया देवा वा कालविद्गुता: ॥

३६॥

कियत्‌--कितना; प्रियम्‌ू--वास्तविक सुख; ते--वे; व्यभजन्‌-- प्रदान किया है; कामाः--इन्द्रियतृप्ति; ये--तथा जो; काम-दाः--इन्द्रियतृष्ति प्रदान करने वाले; नरा:--पुरुष; आदि-- प्रारम्भ; अन्त--तथा अन्त; वन्तः--से युक्त; भार्याया: --पत्नी के;देवा:--देवतागण; वा--अथवा; काल--काल द्वारा; विद्ुता:--विलग किये गये, अतएव क्षुब्ध |

पुरुष स्त्रियों को इन्द्रियतृप्ति प्रदान करते हैं, किन्तु इन सारे पुरुषों का तथा स्वर्ग में देवताओंका भी आदि और अन्त है। वे सभी क्षणिक सृष्टियाँ हैं, जिन्हें काल घसीट ले जायेगा। अतएवइनमें से कोई भी अपनी पत्नियों को कितना वास्तविक आनन्द या सुख प्रदान कर सकता है? नूनं मे भगवान्प्रीतो विष्णु: केनापि कर्मणा ।निर्वेदोयं दुराशाया यन्मे जात: सुखावह: ॥

३७॥

नूनम्‌--निस्सन्देह; मे--मुझसे; भगवान्‌-- भगवान्‌; प्रीत:--प्रसन्न है; विष्णु: -- भगवान्‌; केन अपि--किसी; कर्मणा--कर्म केद्वारा; निर्वेद: --इन्द्रियतृप्ति से विरक्ति; अयम्‌--यह; दुराशाया:-- भौतिक भोगकी बुरी तरह से आशा करने वाले में; यत्‌--क्योंकि; मे--मुझमें; जात:--उत्पन्न हुआ है; सुख--सुख; आवहः--लाते हुए

यद्यपि मैंने भौतिक जगत को भोगने की दुराशा की थी, किन्तु न जाने क्‍यों मेरे हृदय मेंविरक्ति उत्पन्न हो चुकी है और यह मुझे अत्यन्त सुखी बना रही है। इसलिए भगवान्‌ विष्णुअवश्य ही मुझ पर प्रसन्न होंगे। मैंने इसे जाने बिना ही उनको तुष्ट करने वाला कोई कर्म अवश्यकिया होगा।

मैवं स्पुर्मन्दभाग्याया: क्लेशा निर्वेदहितव: ।येनानुबन्ध॑ नित्य पुरुष: शममृच्छति ॥

३८ ॥

मा--नहीं; एवम्‌--इस प्रकार; स्युः--हों; मन्द-भाग्याया:--अभागिनियों के; क्लेशा:--कष्ट; निर्वेद--विरक्ति के; हेतवः--कारण; येन--जिस विरक्ति से; अनुबन्धम्‌--बन्धन; निईत्य--हटाकर; पुरुष: --पुरुष; शमम्‌--असली शान्ति; ऋच्छति--प्राप्त करता है।

जिस व्यक्ति में विरक्ति उत्पन्न हो चुकी है, वह भौतिक समाज, मैत्री तथा प्रेम के बन्धन त्यागसकता है और जो पुरुष महान्‌ कष्ट भोगता है, वह निराशा के कारण धीरे-धीरे विरक्त हो जाताहै तथा भौतिक जगत के प्रति अन्यमनस्क हो उठता है। मेरे महान्‌ कष्ट के कारण ही मेरे हृदय में ऐसी विरक्ति जागी है; अन्यथा यदि मैं सचमुच अभागिन होती, तो मुझे ऐसी दयाद्र पीड़ा क्योंझेलनी पड़ती ? इसलिए मैं सचमुच भाग्यशालिनी हूँ और मुझे भगवान्‌ की दया प्राप्त हुई है। वेअवश्य ही मुझ पर प्रसन्न हैं।

तेनोपकृतमादाय शिरसा ग्राम्यसड्रता: ।त्यक्त्वा दुराशा: शरणं ब्रजामि तमधी श्वरम्‌ ॥

३९॥

तेन--उनके ( भगवान्‌ के ) द्वारा; उपकृतम्‌--अधिक सहायता की; आदाय--स्वीकार करके; शिरसा--मेरे सिर पर, भक्ति से;ग्राम्य--सामान्य इन्द्रियतृप्ति; सड्भता:--सम्बन्धित; त्यक्त्वा--त्याग कर; दुराशा:--पापपूर्ण इच्छाएँ; शरणम्‌--शरण में;ब्रजामि--अब आ रही हूँ; तम्‌--उसको; अधीश्वरम्‌--भगवान्

‌भगवान्‌ ने मुझ पर जो महान्‌ उपकार किया है, उसे मैं भक्तिपूर्वक स्वीकार करती हूँ। मैंनेसामान्य इन्द्रियतृप्ति के लिए पापपूर्ण इच्छाएँ त्यागकर अब भगवान्‌ की शरण ग्रहण कर ली है।

सन्तुष्टा श्रदधत्येतद्याथालाभेन जीवती ।विहराम्यमुनैवाहमात्मना रमणेन वै ॥

४०॥

सन्तुष्टा-पूर्णतया तुष्ट; श्रद्धधती --पूर्ण श्रद्धा से युक्त; एतत्‌-- भगवान्‌ की कृपा में; यथा-लाभेन--जो कुछ अपने आप मिलजाय उसी से; जीवती--जीवित; विहरामि--विहार करूँगी; अमुना--उसी एक से; एब--एकमात्र; अहम्‌--मैं; आत्मना--भगवान्‌ से; रमणेन--प्रेम तथा सुख के असली स्त्रोत हैं, जो; बै--इसमें कोई सन्देह नहीं।

अब मैं पूर्ण तुष्ट हूँ और मुझे भगवान्‌ की दया पर पूर्ण श्रद्धा है। अतएव जो कुछ मुझे स्वतःमिल जायेगा, उसी से मैं अपना भरण-पोषण ( निर्वाह ) करूँगी। मैं एकमात्र भगवान्‌ के साथविहार करूँगी, क्योंकि वे प्रेम तथा सुख के असली स्त्रोत हैं।

संसारकूपे पतितं विषयैर्मुषितेक्षणम्‌ ।ग्रस्तं कालाहिनात्मानं को३न्यस्त्रातुमधी श्वर: ॥

४१॥

संसार--भौतिक जगत; कूपे--अन्धे कुएँ में; पतितम्‌--गिरा हुआ; विषयै: --इन्द्रियतृप्ति द्वारा; मुषित--चुराई गई; ईक्षणम्‌--दृष्टि; ग्रस्तमू--पकड़ा हुआ; काल--काल के; अहिना--सर्प द्वारा; आत्मानम्‌--जीवको; क:ः--कौन; अन्य: --दूसरा;त्रातुम्‌--उद्धार करने में समर्थ है; अधी श्वरः-- भगवान्‌ |

इन्द्रियतृप्ति के कार्यो द्वारा जीव की बुद्धि हर ली जाती है और तब वह भौतिक जगत केअंधे कुएँ में गिर जाता है। फिर इस कुएँ में उसे कालरूपी भयानक सर्प पकड़ लेता है। बेचारेजीव को ऐसी निराश अवस्था से भला भगवान्‌ के अतिरिक्त और कौन बचा सकता है? आत्मैव ह्ात्मनो गोप्ता निर्विद्येत यदाखिलात्‌ ।अप्रमत्त इदं पश्येदग्रस्तं कालाहिना जगत्‌ ॥

४२॥

आत्मा--आत्मा; एव--एकमात्र; हि--निश्चय ही; आत्मनः --अपना; गोप्ता--रक्षक; निर्विद्येत--विरक्त हो जाता है; यदा--जब; अखिलातू-- सारी भौतिक वस्तुओं से; अप्रमत्त:-- भौतिक ज्वर से रहित; इृदम्‌--यह; पश्येत्‌ू--देख सकता है; ग्रस्तम्‌--पकड़ा हुआ; काल--काल के; अहिना--सर्प द्वारा; जगत्‌ू--ब्रह्माण्ड |

जब जीव देखता है कि समस्त ब्रह्माण्ड कालरूपी सर्प द्वारा पकड़ा जा चुका है, तो वहगम्भीर तथा विवेकवान्‌ बन जाता है और तब वह अपने को समस्त भौतिक इन्द्रियतृप्ति सेविरक्त कर लेता है। उस अवस्था में जीव अपना ही रक्षक बनने का पात्र हो जाता है।

श्रीज्राह्मण उवाचएवं व्यवसितमतिर्दुराशां कान्ततर्षजाम्‌ ।छित्त्वोपशममास्थाय शय्यामुपविवेश सा ॥

४३॥

श्री-ब्राह्मण: उवाच--अवधूत ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; व्यवसित--कृतसंकल्प; मतिः--उसका मन; दुराशामू--पापीइच्छा; कान्त-प्रेमी; तर्ष--लालायित रहना; जामू-८दवारा उत्पन्न; छित्त्ता--काट कर; उपशमम्‌--शान्ति में; आस्थाय--स्थितहोकर; शब्याम्‌--अपनी सेज पर; उपविवेश--बैठ गई; सा--वह।

अवधूत ने कहा : इस तरह अपने मन में संकल्प करके, पिंगला ने अपने प्रेमियों से संभोगकरने की पापपूर्ण इच्छाओं को त्याग दिया और वह परम शान्ति को प्राप्त हुई। तत्पश्चात्‌, वहअपनी सेज पर बैठ गई।

आशा हि परम॑ दुःखं नैराएयं परमं सुखम्‌ ।यथा सज्छिद्य कान्ताशां सुखं सुष्वाप पिडुला ॥

४४॥

आशा--भौतिक इच्छा; हि--निश्चय ही; परमम्‌--सबसे बड़ा; दुःखम्‌--दुख; नैराश्यमू-- भौतिक इच्छाओं से मुक्ति; परमम्‌--सबसे बड़ा; सुखम्‌--सुख; यथा--जिस तरह; सज्छिद्य--पूरी तरह काट कर; कान्त--प्रेमियों के लिए; आशाम्‌--इच्छा;सुखम्‌--सुखपूर्वक; सुष्वाप--सो गई; पिड्जला-थे फोर्मेर्‌

प्रोस्तितुते, पिड्लानिस्सन्देह भौतिक इच्छा ही सर्वाधिक दुख का कारण है और ऐसी इच्छा से मुक्ति सर्वाधिकसुख का कारण है। अतएवं तथाकथित प्रेमियों से विहार करने की अपनी इच्छा को पूरी तरहछिन्न करके पिंगला सुखपूर्वक सो गई।

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