← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 12 की सूची

अध्याय तीन: भूमि-गीता

12.3श्रीशुक उबवाचइष्ठात्मनि जये व्यग्रान्नपान्हसति भूरियम्‌ ।

अहो माविजिगीषन्ति मृत्यो: क्रीडनका नृपा: ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; हृष्ठा--देख कर; आत्मनि--अपने आपमें; जये--विजय में; व्यग्रान्‌ --व्यस्त; नृपान्‌--राजाओं को; हसति--हँसती है; भू:--पृथ्वी; इयम्‌--यह; अहो-- ओह; मा--मुझको; विजिगीषन्ति--जीतना चाहते हैं; मृत्यो: --मृत्यु के; क्रीडनका:--खिलौने; नृूपा: --राजा।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस जगत के राजाओं को अपने पर विजय प्राप्त करने केप्रयास में व्यस्त देख कर, पृथ्वी हँसने लगी।

उसने कहा : 'जरा देखो तो इन राजाओं कोजो मृत्यु के हाथों में खिलौनों जैसे हैं, मुझ पर विजय पाने की इच्छा कर रहे हैं!" 'काम एष नरेन्द्राणां मोघः स्याद्विदुषामपि ।

येन फेनोपमे पिण्डे येडतिविश्रम्भिता नूपा: ॥

२॥

कामः--काम; एष:--यह; नर-इन्द्राणाम्‌--मनुष्यों के शासकों की; मोघ:--असफलता; स्यात्‌--हो जाती है;विदुषाम्‌-विद्वानों के; अपि-- भी; येन--जिस ( काम ) से; फेन-उपमे-- क्षणिक बुलबुले के सहश; पिण्डे--इसपिण्डमें; ये--जो; अति-विश्रम्भिता: --पूरी तरह विश्वास करते हुए; नृप:--राजागण |

'मनुष्यों के महान्‌ शासक, यहाँ तक कि जो विद्वान भी हैं, भौतिक कामेच्छा केकारण हताशा तथा असफलता को प्राप्त होते हैं।

ये राजा काम से प्रेरित होकर, मांस के मृतपिण्ड में, जिसे हम शरीर कहते हैं, अत्यधिक आशा तथा श्रद्धा रखते हैं यद्यपि भौतिकढाँचा जल पर तैरते फेन के बुलबुलों के समान क्षणभंगुर है।

"

'पूर्व निर्जित्य षड़्वर्ग जेष्यामो राजमन्त्रिण: ।

ततः सचिवपौराप्तकरीन्द्रानस्थ कण्टकान्‌ ॥

३॥

एवं क्रमेण जेष्याम: पृथ्वीं सागरमेखलाम्‌ ।

इत्याशाबद्धहदया न पश्यन्त्यन्तिकेउन्तकम्‌ ॥

४॥

पूर्वम्‌--सर्वप्रथम; निर्जित्य--जीत कर; षट््‌-वर्गम्‌--पाँच इन्द्रियाँ तथा मन; जेष्याम:--हम जीत लेंगे; राज-मन्त्रिण: --राजा के मंत्रियों को; ततः--तब; सचिव--निजी सचिवों; पौर--राजधानी के नागरिकों; आप्त--मित्रों; करि-इन्द्रानू--हाथी रखने वालों; अस्य--छुटकारा पाकर; कण्टकान्‌--काँटों; एवम्‌ू--इस तरह; क्रमेण--धीरे धीरे; जेष्याम:--जीतलेंगे; पृथ्वीम्‌--पृथ्वी को; सागर--समुद्र रूपी; मेखलाम्‌--मेखला ( कमर की पेटी ); इति--इस तरह सोचते हुए;आशा--आशा से; बद्ध--बँधे; हृदया:--हृदय वाले; न पश्यन्ति--नहीं देखते; अन्तिके--निकटस्थ; अन्तकम्‌--अपनाअन्त)'राजे तथा राजनीतिज्ञ

यह कल्पना करते हैं, 'सर्वप्रथम मैं अपनी इन्द्रियों तथा मन कोजीतूँगा; फिर मैं अपने मुख्य मंत्रियों का दमन करूँगा और अपने सलाहकारों, नागरिकों,मित्रों तथा सम्बन्धियों एवं अपने हाथियों के रखवालों रूपी कंटकों से अपने को मुक्त करलूँगा।

इस तरह मैं धीरे धीरे पूरी पृथ्वी को जीत लूँगा।

' चूँकि इन नेताओं के हृदयों में बड़ी-बड़ी आशाएँ रहती हैं अतएव ये पास ही खड़ी प्रतीक्षारत मृत्यु को नहीं देख पाते।

"

समुद्रावरणां जित्वा मां विशन्त्यव्धिमोजसा ।

कियदात्मजयस्यैतन्मुक्तिरात्मजये फलम्‌ ॥

५॥

समुद्र-आवरणाम्‌--समुद्र द्वारा सीमाबद्ध; जित्वा--जीत कर; माम्‌ू--मुझमें; विशन्ति--प्रवेश करते हैं; अब्धिम्‌--समुद्रको; ओजसा--अपने बल से; कियत्‌--कितना; आत्म-जयस्य--आत्मा पर विजय का; एतत्‌--यह; मुक्ति:--मुक्ति;आत्म-जये--आत्मा पर विजय का; फलम्‌--फल।

'ये गर्वित राजागण मेरे तल पर सारी भूमि को जीत लेने के बाद, समुद्र को जीतने केलिए बलपूर्वक समुद्र में प्रवेश करते हैं।

भला उनके ऐसे आत्मसंयम से क्या लाभ जिसकालक्ष्य राजनीतिक शोषण हो ? आत्मसंयम का वास्तविक लक्ष्य तो आध्यात्मिक मुक्ति है।

"

'यां विसृज्यैव मनवस्तत्सुताश्च॒ कुरूद्रह ।

गता यथागतं युद्धे तां मां जेष्यन्त्यबुद्धय: ॥

६॥

याम्‌ू--जिसको; विसृज्य--त्याग कर; एबव--निस्सन्देह; मनव:--मनुष्यगण; तत्‌-सुता:--उनके पुत्र; च--भी; कुरु -उद्दद-हे कुरु श्रेष्ठ; गता:--चले गये; यथा-आगतम्‌--जिस तरह वे पहले आये; युद्धे--युद्ध में; तामू--उसको; माम्‌ू--मुझ पृथ्वी को; जेष्यन्ति--जीतने का प्रयास करते हैं; अबुद्धयः--अज्ञानी |

हे कुरुश्रेष्ठ, पृथ्वी आगे कहती है, 'यद्यपि भूतकाल में बड़े-बड़े पुरुष तथा उनकेवंशज इस संसार से मुझे छोड़ कर, उसी असहायवस्था में चले गये जिस रूप में इसमें आयेथे, किन्तु आज भी मूर्ख लोग मुझे जीतने का प्रयास कर रहे हैं।

"

मत्कृते पितृपुत्राणां भ्रातृणां चापि विग्रह: ।

जायते हासतां राज्ये ममताबद्धचेतसाम्‌ ॥

७॥

मत्‌-कृते-मेरे हेतु; पितृ-पुत्राणाम्‌ू--पिता तथा पुत्र के बीच; भ्रातृणाम्‌-- भाइयों के बीच; च--तथा; अपि-- भी;विग्रह:--झगड़ा; जायते--उठ खड़ा होता है; हि--निस्सन्देह; असताम्‌--भौतिकतावादियों के बीच; राज्ये--राज्य में;ममता--स्वामित्व बोध के कारण; बद्ध--बद्ध; चेतसामू--हृदयों वाले |

'मुझे जीतने के उद्देश्य से भौतिकतावादी लोग परस्पर लड़ते हैं।

पिता अपने पुत्र काविरोध करता है और भाई एक-दूसरे से झगड़ते हैं क्योंकि उनके हृदय राजनीतिक शक्तिपाने के लिए बँधे रहते हैं।

"

'ममैवेयं मही कृत्स्ना न ते मूढेति वादिनः ।

स्पर्धमाना मिथो घ्नन्ति प्रियन्ते मत्कृते नूपा: ॥

८॥

मम--मेरा; एब--निस्सन्देह; इयम्‌--यह; मही--पृथ्वी; कृत्सना--पूरी; न--नहीं; ते--तुम्हारी; मूढ--रे मूर्ख; इतिवादिन:--इस प्रकार बोलते; स्पर्धभाना:--लड़ते-झगड़ते; मिथ: -- परस्पर; घ्नन्ति--मार डालते हैं; प्रियन्ते--मारे जाते हैं;मत्‌-कृते--मेरे लिए; नृपा:--राजे |

'राजनीतिक लोग एक-दूसरे को ललकारते हैं 'यह सारी भूमि मेरी है।

ओरे मूर्ख।

यहतुम्हारी नहीं है।

' इस तरह वे एक-दूसरे पर हमला करते हैं और मर जाते हैं।

"

पृथु: पुरूरवा गाधिनहुषो भरतोउर्जुन: ।

मान्धाता सगरो राम: खट्वाड़ो धुन्धुहा रघु: ॥

९॥

तृणबिन्दुर्ययातिश्व शर्यातिः शन्तनुर्गय: ।

भगीरथ: कुवलयाश्र: ककुत्स्थो नैषधो नूग: ॥

१०॥

हिरण्यकशिपुर्वत्रो रावणो लोकरावण: ।

नमुचि: शम्बरो भौमो हिरण्याक्षोथ तारकः ॥

११॥

अन्ये च बहवो दैत्या राजानो ये महेश्वरा: ।

सर्वे सर्वविदः शूरा: सर्वे सर्वजितोडजिता: ॥

१२॥

ममतां मय्यवर्तन्त कृत्वोच्चैर्मर्त्यधर्मिण: ।

कथावशेषा: कालेन ह्कृतार्था: कृता विभो ॥

१३॥

पृथु: पुरूरवा: गाधि:--महाराज पृथु, पुरूरवा तथा गाधि; नहुष: भरत: अर्जुन:--नहुष, भरत तथा कार्तवीर्य अर्जुन;मान्धाता सगर: राम:--मान्धाता, सगर तथा राम; खट्वाडूः धुन्धुहा रघु;--खट्वांग, धुन्धुहा तथा रघु; तृणबिन्दु: ययातिःच--तृणबिन्दु तथा ययाति; शर्यातिः शन्तनु: गय: --शर्याति, शन्तनु तथा गय; भगीरथ: कुवलयाश्व:-- भगीरथ तथाकुवलयाश्व; ककुत्स्थः नैषध: नृग:--ककुत्स, नैषध तथा नृग; हिरण्यकशिपु: वृत्र:--हिरण्यकशिपु तथा वृत्रासुर;रावण:--रावण; लोक-रावण: --जिसने सारे जगत को रुला मारा; नमुचि: शम्बर: भौम: --नमुचि, शम्बर तथा भौम;हिरण्याक्ष:--हिरण्याक्ष; अथ--तथा; तारक:--तारक; अन्ये--दूसरे; च--भी; बहव:--अनेक; दैत्या: --दैत्यगण;राजान:--राजे; ये--जो; महा-ई श्वराः--महान्‌ नियन्ता; सर्वे--वे सभी; सर्व-विद: --सबकुछ जानने वाले; शूरा:--वीर;सर्वे--सभी; सर्व-जित:--सबों को जीतने वाले; अजिता:--न जीते जा सकने योग्य; ममताम्‌--ममत्व; मयि--मेरे लिए;अवर्तन्त--वे जीवित रहे; कृत्वा--व्यक्त करके; उच्चै:--बहुत हद तक; मर्त्य-धर्मिण:--जन्म-मृत्यु के नियमों के अधीन;कथा-अवशेषा:--केवल ऐतिहासिक कथा के रूप में बचे हुए; कालेन--काल के बल से; हि--निस्सन्देह; अकृत-अर्था:--जिनकी इच्छाएँ अपूर्ण रह गईं; कृताः--बनाये गये; विभो--हे स्वामी |

'पृथु, पुरूरवा, गाधि, नहुष, भरत, कार्तवीर्य अर्जुन, मान्धाता, सगर, राम, खट्वांग,धुन्धुहा, रघु, तृणबिन्दु, ययाति, शर्याति, शन्तनु, गय, भगीरथ, कुवलयाश्र, ककुत्स्थ,नैषध, नृग, हिरण्यकशिपु, वृत्र, सारे जग को रुलाने वाला रावण, नमुचि, शम्बर, भौम,हिरण्याक्ष तथा तारक के साथ साथ अन्य असुर तथा अन्यों पर शासन करने की महान्‌ शक्तिसे युक्त राजे--ये सारे के सारे ज्ञानी, शूर, सबको जीतने वाले तथा अजेय थे।

तो भी हेसर्वशक्तिमान प्रभु, ये सारे राजा मुझे पाने के लिए गहन प्रयास करते हुए जीवन बिताते रहे,किन्तु काल के अधीन थे जिसने सबों को मात्र ऐतिहासिक वृत्तान्त बना दिया है।

इनमें सेएक भी स्थायी रूप से अपना शासन स्थापित नहीं कर सका।

"

'कथा इमास्ते कथिता महीयसांविताय लोकेषु यशः परेयुषाम्‌ ।

विज्ञानवैराग्यविवक्षया विभोवचोविभूतीर्न तु पारमार्थ्यम्‌ ॥

१४॥

कथा:--कथाएँ; इमा:--ये; ते--तुमसे; कथिता: --कही गई; महीयसाम्‌--महान्‌ राजाओं की; विताय--फैलाकर;लोकेषु--सारे जगतों में; यश:--उनका यश; परेयुषाम्‌-प्रस्थान कर चुके; विज्ञान--दिव्य ज्ञान; बैराग्य--तथा वैराग्य;विवक्षया--शिक्षा देने की इच्छा से; विभो--हे शक्तिशाली परीक्षित; वच:--शब्दों का; विभूती:--अलंकरण; न--नहीं;तु--लेकिन; पारम-अर्थ्यम्‌ू-- अत्यन्त आवश्यक तात्पर्य का

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे बलशाली परीक्षित, मैंने इन सारे महान्‌ राजाओं कीकथाएँ तुमसे बतला दीं जिन्होंने संसार-भर में अपना यश फैलाया और फिर चले गये।

मेराअसली उद्देश्य दिव्य ज्ञान तथा वैराग्य की शिक्षा देना था।

राजाओं की कथाएँ इन वृत्तान्तोंको शक्ति तथा ऐश्वर्य प्रदान करती हैं लेकिन वे स्वयं ज्ञान के चरम पक्ष से युक्त नहीं हैं।

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यस्तूत्तम:शलोकगुणानुवादःसड्जीयतेभी क्ष्णममड्भलघ्न: ।

तमेव नित्य॑ श्रुणुयादभीक्ष्णंकृष्णेमलां भक्तिमभीप्समान: ॥

१५॥

यः--जो; तु--दूसरी ओर; उत्तम:-शलोक--दिव्य एलोकों द्वारा प्रशंसित भगवान्‌ के; गुण--गुणों की; अनुवाद:--वर्णन;सड्जीयते--गाया जाता है; अभीक्ष्णम्‌--सदैव; अमड्भल-घ्न:--अमंगल का विनाश करने वाला; तमू--उसको; एव--निस्सन्देह; नित्यमू--नियमित रूप से; श्रुणुयात्‌--सुने; अभीक्षणम्‌--निरन्तर; कृष्णे--कृष्ण के प्रति; अमलाम्‌ू--निर्मल;भक्तिमू-- भक्ति; अभीष्समान:--इच्छा रखने वाला।

जो व्यक्ति भगवान्‌ कृष्ण की शुद्ध भक्ति चाहता है उसे भगवान्‌ उत्तमशलोक केयशःपूर्ण गुणों की कथाएँ सुननी चाहिए जिनके निरन्तर कीर्तन से सारे अमंगल विनष्ट होजाते हैं।

भक्तों को नियमित दैनिक सभाओं में ऐसे श्रवण में अपने को लगाना चाहिए औरदिन-भर इसी में लगे रहना चाहिए।

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केनोपायेन भगवन्कलेदेषान्कलौ जना: ।

विधमिष्यन्त्युपचितांस्तन्मे ब्रूहि यथा मुने ॥

१६॥

श्री-राजा उवाच--राजा परीक्षित ने कहा; केन--किस; उपायेन--उपाय से; भगवनू--हे प्रभु; कलेः--कलियुग के;दोषान्‌--बुराइयों को; कलौ--कलियुग में रहते हुए; जना:--लोग; विधमिष्यन्ति--समूल नष्ट करेंगे; उपचितान्‌--संचित;तत्‌--वह; मे--मुझसे; बृहि--कहिए; यथा--उपयुक्त रीति से; मुने--हे मुनि

राजा परीक्षित ने कहा : हे स्वामी, कलियुग में रहने वाले लोग किस तरह इस युग केसंचित कल्मष से अपने को छुटा सकते हैं ? हे महामुनि, यह मुझे बतलायें।

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युगानि युगधर्माश्च मान॑ प्रलयकल्पयो: ।

कालस्येश्वररूपस्य गतिं विष्णोर्महात्मन: ॥

१७॥

युगानि--विश्व इतिहास के युग; युग-धर्मान्‌--प्रत्येक युग के विशिष्ट गुण; च--तथा; मानम्‌--माप; प्रलय--संहार;कल्पयो:--तथा ब्रह्माण्ड की स्थिति; कालस्य--समय का; ईश्वर-रूपस्थ--भगवान्‌ का प्रतिनिधित्व; गतिमू--चाल;विष्णो:--विष्णु की; महा-आत्मन:--परमात्मा |

कृपया विश्व इतिहास के विभिन्न युगों, प्रत्येक युग के विशिष्ट गुणों, ब्रह्माण्ड स्थिति कीअवधि तथा संहार एवं परमात्मा स्वरूप विष्णु के प्रत्यक्ष प्रतनिधि काल की गति के बारे मेंबतलायें।

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श्रीशुक उबवाचकृते प्रवर्तते धर्मश्चतुष्पात्तज्जनैर्धृत: ।

सत्यं दया तपो दानमिति पादा विभोनप ॥

१८॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; कृते--सत्ययुग में; प्रवर्तत--पाया जाता है; धर्म:--धर्म; चतु:-पात्‌--चार पैरों वाला; तत्‌--उस युग के; जनै: --लोगों के द्वारा; धृत:-- धारण किया हुआ; सत्यम्‌--सत्य; दया--दया; तप:ः--तपस्या; दानम्‌--दान; इति--इस प्रकार; पादा:--पैर; विभोः --शक्तिशाली धर्म के; नृप--हे राजा

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा, प्रारम्भ में, सत्ययुग में, धर्म अपने चार अक्षत पैरोंसे युक्त रहता है और उस युग के लोगों द्वारा सावधानी से धारण किया जाता है।

शक्तिशालीधर्म के चार पैर हैं--सत्य, दया, तपस्या तथा दान।

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सन्तुष्टाः करुणा मैत्रा: शान्ता दान्तास्तितिक्षव: ।

आत्मारामा: समहशः प्रायशः श्रमणा जना; ॥

१९॥

सन्तुष्टा:--आत्मतुष्ट; करुणा: --दयालु; मैत्रा: --मैत्री भाव वाले; शान्ता:--शान्त; दान्ता:--आत्मसंयमी; तितिक्षव: --सहिष्णु; आत्म-आरामा:-- भीतर से आनन्दित; सम-हश:--समहदृष्टि रखने वाला; प्रायश:--अधिकांशत:; श्रमणा: --( आत्म-साक्षात्कार के लिए ) उद्योगशील; जना:--लोग |

सत्ययुग के लोग प्रायः आत्मतुष्ट, दयालु, सबों के मित्र, शान्त, गम्भीर तथा सहिष्णुहोते हैं।

वे अन्तःकरण से आनन्द लेने वाले, सभी वस्तुओं को एक-सा देखने वाले तथाआध्यात्मिक सिद्धि के लिए सदैव उद्योगशील होते हैं।

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ज्रेतायां धर्मपादानां तुर्याशो हीयते शनेः ।

अधर्मपादैरनृतहिंषासन्तोषविग्रहै: ॥

२०॥

त्रेतायामू-द्वितीय युग में; धर्म-पादानाम्‌-- धर्म के पैरों का; तुर्य--एक चौथाई; अंश:--अंश; हीयते--नष्ट हो जाता है;शनै:--धीरे धीरे; अधर्म-पादैः:--अधर्म के पैरों द्वारा; अनृत--झूठ; हिंसा--हिंसा; असन्तोष--असंतोष; विग्रहैः--तथाझगड़े से, कलह से |

त्रेतायुग में अधर्म के चार पैरों--झूठ, हिंसा, असंतोष तथा कलह--के प्रभाव से धर्मका प्रत्येक पैर क्रमशः एक चौथाई क्षीण हो जाता है।

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तदा क्रियातपोनिष्ठा नातिहिंस्त्रा न लम्पटा: ।

अैवर्गिकास्त्रयीवृद्धा वर्णा ब्रह्मोत्तरा नृूप ॥

२१॥

तदा--तब ( त्रेतायुग में ); क्रिया--कर्मकाण्ड; तपः--तथा तप के प्रति; निष्ठा: --अनुरक्ति; न अति-हिंस्त्रा:--अधिक उग्रनहीं; न लम्पटा:--मनमानी इन्द्रियतृष्ति चाहने वाले; त्रै-वर्गिका:--धर्म, अर्थ तथा इन्द्रियतृप्ति के तीन सिद्धान्तों में रुचिरखने वाले; त्रयी--तीन वेदों के द्वारा; वृद्धा:--सम्पन्न बने; वर्णा:--समाज की चार श्रेणियाँ; ब्रह्म-उत्तरा:--प्रायःब्राह्मण; नृप--हे राजा।

त्रेतायुग में लोग कर्मकाण्ड तथा कठिन तपस्या में लगे रहते हैं।

वे न तो अत्यधिक उग्रहोते हैं न ऐन्द्रिय आनन्द के पीछे अत्यधिक कामुक होते हैं।

उनकी रुचि मुख्यतः धर्म,आर्थिक विकास तथा नियमित इन्द्रियतृप्ति में रहती है और वे तीन वेदों की संस्तुतियों कापालन करते हुए सम्पन्नता प्राप्त करते हैं।

हे राजा, यद्यपि इस युग में समाज में चार पृथक्‌ -पृथक्‌ श्रेणियाँ ( वर्ण ) उत्पन्न हो जाती हैं, किन्तु अधिकांश लोग ब्राह्मण होते हैं।

"

तपःसत्यदयादानेष्वर्ध हस्वति द्वापरे ।

हिंसातुष्टयनृतद्वेषैर्धर्मस्थाधर्मलक्षणै: ॥

२२॥

तपः--तपस्या; सत्य--सत्य; दया--दया; दानेषु--तथा दान का; अर्धम्‌--अर्धम्‌; हस्वति--घट जाता है; द्वापरे--द्वापरयुग में; हिंसा--हिंसा; अतुष्टि-- असंतोष; अनृत--झूठ; द्वेषै:--तथा घृणा से; धर्मस्य-- धर्म का; अधर्म-लक्षणै:--अधर्मके लक्षणों सेद्वापर युग में तपस्या, सत्य, दया तथा दान के धार्मिक गुण अपने अधार्मिक विलोमअंशों--असंतोष, असत्य, हिंसा तथा शत्रुता--के द्वारा घट " कर आधे हो जाते हैं।

यशस्विनो महाशीलाः स्वाध्यायाध्ययने रता: ।

आध्या: कुटुम्बिनो हष्टा वर्णा: क्षत्रद्विजोत्तरा: ॥

२३॥

यशस्विन:--यश के लिए इच्छुक; महा-शीला:--नेक; स्वाध्याय-अध्ययने--वैदिक वाड्मय के अध्ययन में; रता:--लीन; आढ्या:--ऐश्वर्य से युक्त; कुटुम्बिन:--बड़े-बड़े परिवारों वाले; हृष्टा:--प्रसन्न; वर्णा:--समाज की चार श्रेणियाँ;क्षत्र-द्विज-उत्तरा:--प्राय: क्षत्रियों तथा ब्राह्मणों की प्रधानता।

द्वापर युग में लोग यश के भूखे तथा अत्यन्त नेक होते हैं।

वे वेदाध्ययन में अपने कोलगाते हैं, प्रचुर ऐश्वर्य वाले होते हैं, बड़े-बड़े परिवारों वाले होते हैं और जीवन काओजपूर्वक आनन्द लूटते हैं।

चारों वर्णो में से क्षत्रिय तथा ब्राह्मण ही सर्वाधिक संख्या मेंहोते हैं।

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कलौ तु धर्मपादानां तुर्याशोधर्महेतुभि: ।

एधमाने: क्षीयमाणो हान्ते सोडपि विनड्छ््यति ॥

२४॥

कलौ--कलियुग में; तु--तथा; धर्म-पादानाम्‌-- धर्म के पैरों का; तुर्य-अंश:--एक चौथाई; अधर्म--अधर्म के;हेतुभि:--सिद्धान्तों से; एधमानैः--बढ़ने से; क्षीयमाण:--घटते हुए; हि--निस्सन्देह; अन्ते--अन्तमें; सः--वह चतुर्थाश;अपि-- भी; विनड्छ्ष्यति--नष्ट हो जायेगा |

कलियुग में धार्मिक सिद्धान्तों का केवल एक चौथाई शेष रहता है।

और यह अवशेषभी अधर्म के सदैव बढ़ने के कारण लगातार घटता जायेगा और अन्त में नष्ट हो जायेगा।

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तस्मिन्लुब्धा दुराचारा निर्दया: शुष्कवैरिण: ।

दुर्भगा भूरितर्षाश्च शूद्रदासोत्तरा: प्रजा: ॥

२५॥

तस्मिनू--उस युग में; लुब्धा:--लालची; दुराचारा:--बुंरे आचरण वाले; निर्दया:--निर्दयी; शुष्क-वैरिण:--व्यर्थ झगड़ाकरने के लिए उद्यत; दुर्भगा:--अभागे; भूरि-तर्षा:--अनेक प्रकार की लालसाओं से त्रस्त; च--तथा; शूद्र-दास-उत्तरा:--प्रमुखतया निम्न जाति के श्रमिक तथा बर्बर; प्रजा:--लोग ॥

कलियुग में लोग लोभी, दुराचारी तथा निर्दयी होते हैं और वे बिना कारण ही एक-दूसरे से लड़ते-झगड़ते हैं।

कलियुग के लोग अभागे तथा भौतिक इच्छाओं से त्रस्त होकर,प्राय: सभी शूद्र तथा बर्बर होते हैं।

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सत्त्वं रजस्तम इति दृश्यन्ते पुरुषे गुणा: ।

कालसआ्ोदितास्ते वै परिवर्तन्त आत्मनि ॥

२६॥

सत्त्वम्‌ू--सतो; रज:--रजो; तम:--तमो; इति--इस प्रकार; दृश्यन्ते--देखे जाते हैं; पुरुषे--पुरुष में; गुणा:--गुण;काल-सञ्ञोदिता:--काल से प्रेरित; ते--वे; बै--निस्सन्देह; परिवर्तन्ते--परिवर्तन को प्राप्त होते हैं; आत्मनि--मन केभीतर।

सतो, रजो तथा तमोगुण, जिनके रूपान्तर पुरुष के मन के भीतर देखे जाते हैं, कालकी शक्ति से गतिमान होते हैं।

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प्रभवन्ति यदा सत्त्वे मनोबुद्धीन्द्रियाणि च ।

तदा कृतयुगं विद्याज्ज़ाने तपसि यद्रुचि: ॥

२७॥

प्रभवन्ति--प्रधान रूप से प्रकट होते हैं; यदा--जब; सत्त्वे--सतोगुण में; मन:--मन; बुद्धि--बुद्धि; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; च--तथा; तदा--तब; कृत-युगम्‌--कृतयुग में; विद्यात्‌--समझा जाना चाहिए; ज्ञाने--ज्ञान में; तपसि--तथातपस्या में; यत्‌ू--जब; रुचि:--रूचि |

जब मन, बुद्धि तथा इन्द्रियाँ पूरी तरह से सतोगुण में स्थित हैं, तो उस काल को सत्ययुगसमझना चाहिए।

तब लोग ज्ञान तथा तपस्या में रुचि लेते हैं।

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यदा कमंसु काम्येषु भांक्तियेंशांस देहिनाम्‌ ।

तदा त्रेता रजोवृत्तिरिति जानीहि बुद्धिमन्‌ ॥

२८ ॥

यदा--जब; कर्मसु--कर्म में; काम्येषु--स्वार्थ पर आधारित; भक्ति:-- भक्ति; यशसि--सम्मान में; देहिनामू--देहधारीआत्माओं के; तदा--तब; त्रेता--त्रेतायुग; रज:-वृत्ति:--राजसिक कार्यों की प्रधानता; इति--इस तरह; जानीहि--जानो;बुद्धि-मन्‌--हे बुद्धिमान राजा परीक्षित।

हे परम बुद्धिमान, जब बद्धजीव अपने कर्मो के प्रति समर्पित तो होते हैं किन्तु उनमेंबाहा मनोभाव पाये जाते हैं और वे निजी प्रतिष्ठा की खोज करते हैं, तो तुम यह जान लो किऐसी स्थिति त्रेतायुग की है, जिसमें राजसिक कर्मों की प्रधानता होती है।

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यदा लोभस्त्वसन्तोषो मानो दम्भोथ मत्सर: ।

कर्मणां चापि काम्यानां द्वापरं तद्रजस्तम: ॥

२९॥

यदा--जब; लोभ: --लोभ; तु--निस्सन्देह; असन्तोष: --असन्तोष; मान: --मिथ्या अहंकार; दम्भ:--दिखावा; अथ--तथा; मत्सर:--ईर्ष्या; कर्मणाम्‌ू--कर्मों का; च--तथा; अपि-- भी; काम्यानाम्‌--स्वार्थी ; द्वापरम्‌-द्वापर युग; तत्‌ू--बह; रज:-तम:--रजो तथा तमोगुण के मिश्रण की प्रधानता से |

जब लोभ, असनन्‍्तोष, मिथ्या अहंकार, दिखावा तथा ईर्ष्या प्रधान बन जाते हैं और साथमें स्वार्थपूर्ण कार्यों के लिए आकर्षण होता है, तो ऐसा काल द्वापर युग है, जिसमें रजो तथातमोगुण के मिश्रण की प्रधानता होती है।

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यदा मायानृतं तन्द्रा निद्रा हिंसा विषादनम्‌ ।

शोकमोहौ भयं देन्यं स कलिस्तामस: स्मृत: ॥

३०॥

यदा--जब; माया--धोखा; अनृतम्‌--झूठी वाणी; तन्द्रा--आलस्य; निद्रा--नींद तथा नशा; हिंसा--हिंसा; विषादनम्‌--विषाद; शोक--शोक; मोहौ--तथा मोह; भयम्‌-- डर; दैन्यम्‌--दरिद्रता; सः--वह; कलि:--कलियुग; तामस:--तमोगुणी; स्मृतः:--माना जाता है

जब धोखा ( कपट ), झूठ, तन्द्रा, निद्रा, हिंसा, विषाद, शोक, मोह, भय तथा दरिद्रताका बोलबाला होता है, वह युग कलियुग अर्थात्‌ तमोगुण का युग होता है।

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तस्माश््षुद्रहशो मर्त्या: क्षुद्रभाग्या महाशना: ।

कामिनो वित्तहीनाश्च स्वैरिण्यश्व स्त्रियोइसती: ॥

३१॥

तस्मात्‌ू--कलियुग के इन गुणों के कारण; क्षुद्र-हशः --श्षुद्र दृष्टि; मर्त्या:--मनुष्य; क्षुद्र-भाग्या:--अभागे; महा-अशना: --पेटू; कामिन: --काम-वासना से युक्त; वित्त-हीना: --सम्पत्ति से रहित; च--तथा; स्वैरिण्य:--सामाजिकआचरण में स्वतंत्र; च--तथा; स्त्रियः--स्त्रियाँ; असती:--असाध्वी, कुलटा

कलियुग के दुर्गुणों के कारण मनुष्य क्षुद्र दृष्टि वाले, अभागे, पेटू, कामी तथा दरिद्रहोंगे।

स्त्रियाँ कुलटा होने से एक पुरुष को छोड़ कर दूसरे के पास स्वतंत्रतापूर्वक चलीजायेंगी।

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दस्यूत्कृष्टा जनपदा वेदा: पाषण्डदूषिता: ।

राजानश्च प्रजाभक्षा: शिश्नोदरपरा द्विजा: ॥

३२॥

दस्यु-उत्कृष्टा:--चोरों का प्राधान्य होना; जन-पदा:--बसे हुए स्थान; वेदा:--वैदिक शास्त्र; पाषण्ड--नास्तिकों द्वारा;दूषिता:--दूषित; राजान:--राजनीतिक नेता; च--तथा; प्रजा-भक्षा:--जनता के भक्षक; शिश्न-उदर--जननांग तथाउदर; परा:--भक्त; द्विजा:--ब्राह्मण ।

शहर चोरों से भरे होंगे, वेद नास्तिकों के द्वारा की गईं मनमानी व्याख्या से दूषित कियेजायेंगे, राजनीतिक नेता प्रजा का भक्षण करेंगे और तथाकथित पुरोहित तथा बुद्ध्धिजीवीअपने पेट तथा जननांग के भक्त होंगे।

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अब्रता बटवोशौचा भिक्षवश्च कुटुम्बिन: ।

तपस्विनो ग्रामवासा न्यासिनोत्यर्थलोलुपा: ॥

३३॥

अब्रता:--अपने ब्रतों को न कर पाने वाले; बटव:ः--ब्रह्मचारी; अशौचा: --अस्वच्छ; भिक्षव:-- भीख माँगने को उन्मुख;च--तथा; कुटुम्बिन:--गृहस्थ जन; तपस्विन:--जंगल में जाकर तपस्या करने वाले; ग्राम-वासा:--ग्रामवासी;न्यासिन:--संन्यासी; अत्यर्थ-लोलुपाः--धनके लिए अत्यधिक लालची।

ब्रह्मचारी अपने ब्रतों को सम्पन्न नहीं कर सकेंगे और सामान्यतया अस्वच्छ रहेंगे।

गृहस्थलोग भिखारी बन जायेंगे; वानप्रस्थी गाँवों में रहेंगे और संन्‍्यासी लोग धन के लालची बनजायेंगे।

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हस्वकाया महाहारा भूर्यपत्या गतहियः ।

शश्वत्कटुकभाषिण्यश्लौर्यमायोरुसाहसा: ॥

३४॥

हस्व-काया:--नाटे शरीर वाली; महा-आहारा:--अत्यधिक खाने वाली; भूरि-अपत्या:--अनेक सन्‍्तानों वाली; गत-हिय:--बेशर्म; शश्वत्‌ू--निरन्तर; कटुक--कदु, कड़वा; भाषिण्य: --बोलने वाली; चौर्य--चोरी की प्रवृत्ति वाली;माया--कपट; उरु-साहसा:--तथा

अत्यधिक साहसस्त्रियों का आकार काफी छोटा हो जायेगा और वे अधिक भोजन करेंगी, अधिकसन्‍्तानें उत्पन्न करेंगी जिनका पालन-पोषण करने में वे अक्षम होंगी और सारी लाज खोबैठेंगी।

वे सदैव कड़वा बोलेंगी और चोरी, कपट तथा अनियंत्रित साहस के गुण प्रदर्शितकरेंगी।

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'पणयिष्यन्ति वै क्षुद्रा: किराटा: कूटकारिण: ।

अनापद्यपि मंस्यन्ते वार्ता साधु जुगुप्सिताम्‌ू ॥

३५॥

'पणयिष्यन्ति--व्यापार में लगेंगे; बै--निस्सन्देह; क्षुद्रा:--क्षुद्र; किराटा:--व्यापारी; कूट-कारिण:--ठगी में लगे हुए;अनापदि--जब कोई आपात्‌ काल न हो; अपि-- भी; मंस्यन्ते--मानेंगे; वार्तामू--वृत्ति, पेशा; साधु--उत्तम;जुगुप्सिताम्‌--वास्तव में घृषित।

व्यापारी लोग श्षुद्र व्यापार में लगे रहेंगे और धोखाधड़ी से धन कमायेंगे।

आपात्‌ कालन होने पर भी लोग किसी भी अधम पेशे को अपनायेंगे।

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पतिं त्यक्ष्यन्ति निर्द्रव्यं भृत्या अप्यखिलोत्तमम्‌ ।

भृत्यं विपन्नं पतय: कौलं गाश्चापयस्विनी: ॥

३६॥

पतिम्‌--स्वामी को; त्यक्ष्यन्ति--छोड़ देंगे; निर्द्रव्यम्‌ू-- धन से रहित; भृत्या:--नौकर; अपि-- भी; अखिल-उत्तमम्‌-गुणोंमें सर्वश्रेष्ठ; भृत्यम्‌ू--नौकर को; विपन्नम्‌ू--अक्षम; पतय:--स्वामी; कौलमू्‌--पीढ़ियों से परिवार से सम्बद्ध; गा:--गौवें;च--तथा; अपयस्विनी:--जिन्होंने दूध देना बन्द कर दिया है।

नौकर उस मालिक को छोड़ देंगे जिसकी सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है भले ही वह मालिकसन्त उत्कृष्ठ आचरण का क्‍यों न हो।

मालिक भी अक्षम नौकर को त्याग देंगे भले ही वहनौकर पीढ़ियों से उस परिवार में क्‍यों न रहा हो।

दूध न देने वाली गौवों को या तो छोड़ दियाजायेगा या मार दिया जायेगा।

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पितृश्रातृसुहज्ज्ञातीन्हित्वा सौरतसौहदा: ।

ननान्हश्यालसंवादा दीनाः स्त्रैणा: कलौ नरा: ॥

३७॥

पितृ--अपने पिता; भ्रातृ-भाइयों; सुहत्‌--शुभचिन्तक मित्रों; ज्ञातीन्‌ू--तथा निकट सम्बन्धियों को; हित्वा--छोड़ कर;सौरत--यौन-सम्बन्ध पर आधारित; सौहदा:--मित्रता की धारणा; ननान्ह--श्यालियों के साथ; श्याल--तथा साले;संवादा:--लगातार संगति करते हुए; दीना:--कंजूस; स्त्रैणा:--स्त्री-भक्त; कलौ--कलियुग में; नरा:--पुरुष

कलियुग में मनुष्य कंजूस तथा स्त्रियों द्वारा नियंत्रित होंगे।

वे अपने पिता, भाई, अन्यसम्बन्धियों तथा मित्रों को त्याग कर साले तथा सालियों की संगति करेंगे।

इस तरह उनकीमैत्री की धारणा नितान्त यौन-सम्बन्धों पर आधारित होगी।

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शूद्राः प्रतिग्रहीष्यन्ति तपोवेषोपजीविनः ।

धर्म वक्ष्यन्त्यधर्मज्ञा अधिरुह्मोत्तमासनम्‌ ॥

३८ ॥

शूद्राः--निम्न जाति के श्रमिक; प्रतिग्रहीष्यन्ति--धार्मिक दान लेंगे; तप:--तपस्या का दिखावा करके; वेष--तथा साधुका वेश बनाकर; उपजीविन:--अपनी जीविका कमाते हुए; धर्मम्‌-धर्म के सिद्धान्तों के विषय में; वक्ष्यन्ति--बोलेंगे;अधर्म-ज्ञा:--धर्म से अनभिज्ञ; अधिरुह्म--चढ़ कर; उत्तम-आसनमू--उच्च आसन पर

असंस्कृत लोग भगवान्‌ के नाम पर दान लेंगे और तपस्या का स्वाँग रचाकर तथा साधुका वेश धारण करके अपनी जीविका चलायेंगे।

धर्म न जानने वाले उच्च आसन पर बेठेंगेऔर धार्मिक सिद्धान्तों का प्रवचन करने का ढोंग रचेंगे।

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नित्य॑ उद्विग्नमनसो दुर्भिक्षकरकर्शिता: ।

निरन्ने भूतले राजननावृष्टिभयातुरा: ॥

३९॥

वासोन्नपानशयनव्यवायस्नानभूषणै: ।

हीना: पिशाचसन्दर्शा भविष्यन्ति कलौ प्रजा: ॥

४०॥

नित्यमू--निरन्तर; उद्विग्ग--अशान्त; मनस:--उनके मन; दुर्भिक्ष-- अकाल; कर--तथा टैक्स से; कर्शिता:--दुर्बल;निरत्ने--जब खाने को भोजन न मिले; भू-तले--पृथ्वी पर; राजनू--हे राजा परीक्षित; अनावृष्टि--सूखे का; भय-- भयके कारण; आतुरा: --उद्विग्न; वास:--वस्त्र; अन्न-- भोजन; पान--पेय; शयन--विश्राम; व्यवाय--यौन; स्नान-- स्नान;भूषणै:--तथा निजी आभूषणों से; हीना: --रहित; पिशाच-सन्दर्शा:--पिशाचों की तरह लगने वाले; भविष्यन्ति--होंगे;कलौ--कलियुग में; प्रजा:--लोग।

कलियुग में लोगों के मन सदैव अशान्त रहेंगे।

हे राजा, वे अकाल तथा कर-भार सेदुर्बल हो जायेंगे और सूखे के भय से सदैव विचलित रहेंगे।

उन्हें पर्याप्त वस्त्र, भोजन तथापेय का अभाव रहेगा; वे न तो ठीक से विश्राम कर सकेंगे, न संभोग या स्नान कर सकेंगे।

उनकेपास अपने शरीरों को सुसज्जित करने के लिए आभूषण नहीं होंगे।

वस्तुत: कलियुग केलोग धीरे-धीरे पिशाच दिखने लगेंगे।

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कलौ काकिणिके>प्यर्थे विगृह्य त्यक्तसौहदा: ।

त्यक्ष्यन्ति च प्रियान्प्राणान्हनिष्यन्ति स्वकानपि ॥

४१॥

कलौ--कलियुग में; काकिणिके --छोटे-से सिक्के के; अपि--भी; अर्थ--हेतु; विगृह्य --शत्रुता उत्पन्न करके; त्यक्त--छोड़ते हुए; सौहदा:--मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों; त्यक्ष्यन्ति--त्याग देंगे; च--तथा; प्रियान्‌--प्रिय; प्राणान्‌ू-- अपने जीवनों को;हनिष्यन्ति--मारेंगे; स्वकान्‌-- अपने सगों को; अपि--भीकलियुग में लोग कुछ ही सिक्कों के लिए शत्रुता ठान लेंगे।

बे सारे मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों कोत्याग कर स्वयं मरने तथा अपने ही सम्बन्धियों को मार डालने पर उतारू हो जायेंगे।

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न रक्षिष्यन्ति मनुजा: स्थविरी पितरावषि ।

पुत्रान्भार्या च॒ कुलजां क्षुद्रा: शिश्नोदरंभरा: ॥

४२॥

न रक्षिष्यन्ति--रक्षा नहीं करेंगे; मनुजा: --मनुष्य; स्थविरौ--वृद्ध; पितरौ--माता-पिता; अपि-- भी; पुत्रानू--बच्चों को;भार्यामू--पत्ती को; च-- भी; कुल-जाम्‌--अच्छे परिवार में जन्मे; क्षुद्रा:--नीच; शिश्न-उदरम्‌--अपने जननांगों तथा पेटको; भरा:--भरण करते हुए।

लोग अपने बूढ़े माता-पिता, अपने बच्चों या अपनी सम्मान्य पत्नियों की रक्षा नहीं करसकेंगे।

वे अत्यन्त पतित होकर अपने पेटों तथा जननांगों की तुष्टि में लगे रहेंगे।

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कलौ न राजन्जगतां परं गुरूत्रिलोकनाथानतपादपड्डूजम्‌ ।

प्रायेण मर्त्या भगवन्तमच्युतंयक्ष्यन्ति पाषण्डविभिन्नचेतस: ॥

४३॥

कलौ--कलियुग में; न--नहीं; राजन्‌--हे राजा; जगताम्‌--ब्रह्मण्ड के; परमू--परम; गुरुम्‌--गुरु को; त्रि-लोक--तीनों लोकों के; नाथ--विविध स्वामियों द्वारा; आनत--झुकाये गये; पाद-पड्डजम्‌--जिनके चरणकमल; प्रायेण--प्राय; मर्त्या:--मनुष्य; भगवन्तमू--भगवान्‌; अच्युतम्‌--अच्युत को; यक्ष्यन्ति-- भेंट चढ़ायेंगे; पाषण्ड--नास्तिकताद्वारा; विभिन्न--पृथक्‌-पृथक्‌; चेतस:--बुद्धि वाले |

हे राजा, कलियुग में लोगों की बुद्धि नास्तिकता के द्वारा विचलित हो जायेगी और वेब्रह्माण्ड के परम गुरु स्वरूप भगवान्‌ को कभी भी उपहार नहीं चढ़ायेंगे।

तीनों लोकों केनियन्ता महापुरुष तक भगवान्‌ के चरणकमलों पर अपना शीश झुकाते हैं, किन्तु इस युगके क्षुद्र एवं दुखी लोग ऐसा नहीं करेंगे।

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यन्नामधेयं प्रियमाण आतुरः'पतन्स्खलन्वा विवशो गृणन्पुमान्‌ ।

विमुक्तकर्मार्गल उत्तमां गतिंप्राणोति यशक्ष्यन्ति न तं कलौ जना: ॥

४४॥

यत्‌--जिसका; नामधेयम्‌--नाम; प्रियमाण:--मर रहा व्यक्ति; आतुर:ः --पीड़ित; पतन्‌--गिरता; स्खलन्‌--शब्द रुद्धहोते; वा--अथवा; विवश: --असहाय; गृणन्‌--कीर्तन करते; पुमान्‌ू--पुरुष; विमुक्त--मुक्त; कर्म--सकाम कर्म का;अर्गल:ः--जंजीरों से; उत्तमामू--सर्वोच्च; गतिमू--लक्ष्य; प्राप्पयोति--पाता है; यक्ष्यन्ति न--नहीं पूजते; तम्‌ू--उसको,भगवान्‌ को; कलौ--कलियुग में; जना: --लोगमरने वाला व्यक्ति भयभीत होकर अपने बिस्तर पर गिर जाता है।

यद्यपि उसकी वाणीअवरुद्ध हुई रहती है और उसे इसका बोध नहीं रहता कि वह क्या कह रहा है, किन्तु यदिवह भगवान्‌ का पवित्र नाम लेता है, तो कर्मफल से मुक्त हो सकता है और चरम गन्तव्य कोप्राप्त कर सकता है।

किन्तु तो भी कलियुग में लोग भगवान्‌ की पूजा नहीं करेंगे।

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पुंसां कलिकृतान्दोषान्द्रव्यदेशात्मसम्भवान्‌ ।

सर्वान्हरति चित्तस्थो भगवान्पुरुषोत्तम: ॥

४५॥

पुंसाम्‌-मनुष्यों को; कलि-कृतान्‌--कलि के प्रभाव से उत्पन्न; दोषान्‌ू--दोष; द्रव्य--पदार्थ; देश--स्थान; आत्म--तथासाक्षात्‌ प्रकृति; सम्भवान्‌ू--पर आधारित; सर्वान्‌--सारे; हरति--चुरा लेता है; चित्त-स्थ:--हदय के भीतर स्थित;भगवानू--सर्वशक्तिमान प्रभु; पुरुष-उत्तम:--परम पुरुष |

कलियुग में वस्तुएँ, स्थान तथा व्यक्ति सभी प्रदूषित हो जाते हैं।

किन्तु भगवान्‌ उसव्यक्ति के जीवन से ऐसा सारा कल्मष हटा सकते हैं, जो अपने मन के भीतर भगवान्‌ कोस्थिर कर लेता है।

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श्रुतः सड्डीतितो ध्यात: पूजितश्चाहतोपि वा ।

नृणां धुनोति भगवानहत्स्थो जन्मायुताशुभम्‌ ॥

४६॥

श्रुत:--सुना हुआ; सड्डीतित:--महिमागान किया हुआ; ध्यात:--ध्यान धरा हुआ; पूजित:--पूजित; च--तथा; आहत: --सम्मानित; अपि-- भी; वा--अथवा; नृणाम्‌--मनुष्यों का; धुनोति--धो देता है; भगवान्‌-- भगवान्‌; हत्‌-स्थ:--उनकेहृदयों के भीतर स्थित; जन्म-अयुत--हजारों जन्मों का; अशुभम्‌--अशुभ कल्मष।

यदि कोई व्यक्ति हृदय के भीतर स्थित परमेश्वर के विषय में सुनता है, उनकी महिमा कागान करता है, उनका ध्यान करता है, उनकी पूजा करता है या परमेश्वर का अत्यधिक आदरकरता है, तो भगवान्‌ उसके मन से हजारों जन्मों से संचित कल्मष को दूर कर देते हैं।

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यथा हेम्नि स्थितो वह्निदुर्वर्ण हन्ति धातुजम्‌ ।

एवमात्मगतो विष्णुयोंगिनामशुभाशयम्‌ ॥

४७॥

यथा--जिस तरह; हेम्नि--सोने में; स्थित:--स्थित; वह्लिः--आग; दुर्वर्णम्‌--बदरंगपना; हन्ति--नष्ट कर देती है; धातु-जमू्‌--अन्य धातुओं के कारण उत्पन्न रंग; एवम्‌--इसी तरह; आत्म-गत:--आत्मा में प्रवेश करके; विष्णु:-- भगवान्‌विष्णु; योगिनामू--योगियों का; अशुभ-आशयमू--गंदा मन।

जिस तरह सोने को गलाने पर अग्नि अन्य धातुओं की रंचमात्र उपस्थिति से उत्पन्न बदरंगको दूर कर देती है उसी तरह हृदय के भीतर स्थित भगवान्‌ विष्णु योगियों के मन को शुद्धकर देते हैं।

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विद्यातपःप्राणनिरोधमैत्री -तीर्थाभिषेकब्रतदानजप्यै: ।

नात्यन्तशुद्धि लभतेडन्तरात्मा यथा हृदिस्थे भगवत्यनन्ते ॥

४८ ॥

विद्या--देवताओं की पूजा से; तपः--तपस्या; प्राण-निरोध--प्राणायाम्‌; मैत्री--दया; तीर्थ-अभिषेक --तीर्थ -स्नान;ब्रत--कठिन ब्रत; दान--दान; जप्यै: --तथा मंत्रोच्चार द्वारा; न--नहीं; अत्यन्त--पूर्ण; शुद्धिम्‌ू--शुद्धि; लभते--प्राप्तकर सकता है; अन्तः-आत्मा--मन; यथा--जिस तरह; हृदि-स्थे--हृदय के भीतर स्थित रहने पर; भगवति--भगवान्‌ में;अनन्ते--असीम भगवान्‌, अनन्तदेव

पूजा, तपस्या, प्राणायाम, दया, तीर्थ-स्नान, कठिन ब्रत, दान तथा विविध मंत्रों केउच्चारण से मनुष्य के मन को वैसी परम शुद्धि प्राप्त नहीं हो सकती जैसी कि हृदय के भीतरअनन्त भगवान्‌ के प्रकट होने पर होती है।

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तस्मात्सर्वात्मना राजन्हदिस्थं कुरु केशवम्‌ ।

प्रियमाणो हावहितस्ततो यासि परां गतिम्‌ ॥

४९॥

तस्मात्‌--इसलिए; सर्व-आत्मना--सररे प्रयास से; राजन्‌--हे राजा; हृदि-स्थम्‌--हृदय के भीतर; कुरु--करो;केशवम्‌-- भगवान्‌ केशव को; प्रियमाण:--मरते हुए; हि--निस्सन्देह; अवहित:--एकाग्र; तत:--तब; यासि--जासकोगे; परम्‌--परम; गतिम्‌--गन्तव्य को

इसलिए हे राजा, अपनी शक्ति-भर अपने हृदय में परम भगवान्‌ केशव को स्थिर करनेका प्रयास करो।

यह एकाग्रता भगवान्‌ पर बनाये रखो और अपनी मृत्यु के समय तुमनिश्चित रूप से परम गन्तव्य को प्राप्त करोगे।

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प्रियमाणैरभिध्येयो भगवान्परमे श्वर: ।

आत्मभावं नयत्यड़ु सर्वात्मा सर्वसंभ्रय: ॥

५०॥

प्रियमाणै:--मरने वालों के द्वारा; अभिध्येय:--धध्यान किये गये; भगवान्‌--भगवान्‌; परम-ईश्वर: --परमे श्वर; आत्म-भावम्‌ू--अपनी असली पहचान; नयति--उन्हें ले जाती है; अड़--हे राजा; सर्व-आत्मा--परमात्मा; सर्व-संश्रय:ः--सभीप्राणियों के आश्रय,हे राजा, भगवान्‌ परम नियन्ता हैं।

वे परमात्मा हैं और सारे प्राणियों के परम आश्रय हैं।

मरणासत्न लोगों के द्वारा ध्यान किये जाने पर वे उन्हें अपना नित्य आध्यात्मिक स्वरूप प्रकटकरते हैं।

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कलेदोंषनिधे राजन्नस्ति होको महान्गुण: ।

कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसड्ः परं ब्रजेत्‌ ॥

५१॥

कले:ः--कलियुग के; दोष-निधे: --दोष के सागर में; राजन्‌ू--हे राजा; अस्ति--है; हि--निश्चय ही; एक:--एक;महान्‌ू--महान्‌; गुण: --सदगुण; कीर्तनात्‌ू--कीर्तन से; एब--निश्चय ही; कृष्णस्य--कृष्ण-नाम के; मुक्त-सड़ः--भवबंधन से मुक्त; परम्‌ू--दिव्य धाम को; ब्रजेत्‌--जा सकता है।

हे राजन, यद्यपि कलियुग दोषों का सागर है फिर भी इस युग में एक अच्छा गुण है--केवल हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करने से मनुष्य भवबन्धन से मुक्त हो जाता है और दिव्यधाम को प्राप्त होता है।

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कृते यद्धय्ायतो विष्णु त्रेतायां यजतो मरे: ।

द्वापरे परिचर्यायां कलौ तद्धरिकीर्तनात्‌ ॥

५२॥

कृते--सत्ययुग में; यत्‌--जो; ध्यायतः--ध्यान से; विष्णुम्‌ू--एक विष्णु को; त्रेतायाम्‌-त्रेतायुग में; यजत:--पूजा करनेसे; मखै:--यज्ञ करने से; द्वापरे--द्वापर युग में; परिचर्यायाम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण के चरणकमलों की पूजा करने से;कलौ--कलियुग में; तत्‌ू--वही फल ( प्राप्त किया जा सकता है ); हरि-कीर्तनात्‌ू--केवल हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तनसे

जो फल सत्ययुग में विष्णु का ध्यान करने से, त्रेतायुग में यज्ञ करने से तथा द्वापर युग मेंभगवान्‌ के चरणकमलों की सेवा करने से, प्राप्त होता है, वही कलियुग में केवल हरे कृष्णमहामंत्र का कीर्तन करके प्राप्त किया जा सकता है।

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