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अध्याय चार: सार्वभौमिक विनाश की चार श्रेणियाँ
12.4श्रीशुक उबवाचकालस्ते परमाण्वादिद्विपरार्धावधिनृप ।
कथितो युगमानं च श्रुणु कल्पलयावषि ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; काल:--समय; ते--तुमको; परम-अणु-- अखंड परमाणु; आदि:--इत्यादि; द्वि-पर-अर्ध--ब्रह्म की आयु के दो अर्धाश; अवधि: --समाप्ति; नृप--हे राजा परीक्षित; कथित:--वर्णित कीगई; युग-मानम्--युग की अवधि; च--तथा; श्रुणु--अब सुनो; कल्प--ब्रह्मा का दिन; लयौ--संहार, प्रलय; अपि--भी
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजा, मैं पहले ही तुम्हें एक परमाणु की गति से मापेजाने वाले सबसे छोटे अंश से लेकर ब्रह्म की कुल आयु तक काल की माप बतला चुकाहूँ।
मैंने ब्रह्माण्ड के इतिहास के विभिन्न युगों की माप भी बतला दी है।
अब ब्रह्मा के दिनतथा प्रलय की प्रक्रिया के विषय में सुनो।
"
चतुर्युगसहस्त्र तु ब्रह्मणो दिनमुच्यते ।
स कल्पो यत्र मनवश्चतुर्दश विशाम्पते ॥
२॥
चतु:-युग--चार युग; सहस्त्रमू--एक हजार; तु--निस्सन्देह; ब्रह्मण: -- ब्रह्मा का; दिनम्ू--दिन; उच्यते--कहा जाता है;सः--वह; कल्प:--कल्प; यत्र--जिसमें; मनव:ः--मानव जाति का आदि प्रजापति; चतुर्दश--चौदह; विशाम्-पते--हेराजा।
चार युगों के एक हजार चक्रों से ब्रह्म का एक दिन बनता है, जो कल्प कहलाता है।
हेराजा, इस अवधि में चौदह मनु आते-जाते हैं।
"
तदन्ते प्रलयस्तावान्ब्राह्मी रात्रिरुदाहता ।
त्रयो लोका इमे तत्र कल्पन्ते प्रलयाय हि ॥
३॥
ततू-अन्ते--उन ( युगों के हजार चक्रों ) के बाद; प्रलयः--प्रलय; तावान्--उसी अवधि के; ब्राह्मी --ब्रह्मा की; रात्रि: --रात; उदाहता--कहा जाता है; त्रय:--तीन; लोका:--लोक; इमे--ये; तत्र--उस समय; कल्पन्ते-- अभिमुख रहते हैं;प्रलयाय--प्रलय के लिए; हि--निस्सन्देह |
ब्रह्मा के एक दिन के बाद, उनकी रात के समय, जो उतनी ही अवधि की होती है,प्रलय होता है।
उस समय तीनों लोक विनष्ट हो जाते हैं, उनका संहार हो जाता है।
"
एष नैमित्तिकः प्रोक्त: प्रलयो यत्र विश्वसृक् ।
शेतेउनन्तासनो विश्वमात्मसात्कृत्य चात्मभू: ॥
४॥
एष:--यह; नैमित्तिक: --यदा-कदा; प्रोक्त:--कहा जाता है; प्रलय:ः--प्रलय; यत्र--जिसमें; विश्व-सूक् --ब्रह्माण्ड कासृजनकर्ता, भगवान् नारायण; शेते--लेट जाते हैं; अनन्त-आसन: --अनन्त शेष की शय्या पर; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; आत्म-सात्-कृत्य--अपने भीतर लीन करके; च--भी; आत्म-भू: --ब्रह्मा ।
यह नैमित्तिक प्रलय कहलाता है, जिसमें आदि स्त्रष्टा नारायण अनन्त शेष की शैय्या परलेट जाते हैं और ब्रह्मा के सोते समय वे समूचे ब्रह्माण्ड को अपने में लीन कर लेते हैं।
"
द्विपरार्ध त्वतिक्रान्ते ब्रह्मण: परमेष्टिन: ।
तदा प्रकृतयः सप्त कल्पन्ते प्रलयाय वै ॥
५॥
द्वि-परार्धे--दो परार्थ; तु--तथा; अतिक्रान्ते-पूर्ण होने पर; ब्रह्मण: --ब्रह्मा का; परमे-ष्ठटिन:--अत्युच्च स्थित जीव;तदा--तब; प्रकृतयः--प्रकृति के तत्त्व; सप्त--सात; कल्पन्ते-- अधीन होते हैं; प्रलयाय--प्रलय के; बै--निस्सन्देह जब सर्वोच्च जीव भगवान्
ब्रह्म के जीवन काल के दो परार्ध पूरे हो जाते हैं, तो सृष्टिके सात मूलभूत तत्त्व विनष्ट हो जाते हैं।
"
एघ प्राकृतिको राजन्प्रलयो यत्र लीयते ।
अण्डकोष्स्तु सज्ञातो विधाट उपसादिते ॥
६॥
एष:--यह; प्राकृतिक:--प्रकृति के तत्त्वों का; राजन्--हे राजा परीक्षित; प्रलय:--संहार; यत्र--जिसमें; लीयते--लयहो जाता है; अण्ड-कोष:--ब्रह्माण्ड; तु--तथा; सज्ञट:--मिश्रण; विघाते--विच्छिन्न होने का कारण; उपसादिते--सामना करना होता है |
हे राजा, भौतिक तत्त्वों के प्रलय के बाद, सृष्टि के तत्त्वों के मिश्रण से बने ब्रह्माण्ड कोविनाश का सामना करना होता है।
"
पर्जन्य: शतवर्षाणि भूमौ राजन्न वर्षति ।
तदा निरत्ने ह्न्योन्यं भक्ष्यमाणा: क्षुधार्दिता: ।
क्षयं यास्यन्ति शनकै: कालेनोपद्वुता: प्रजा: ॥
७॥
पर्जन्य:--बादल; शत-वर्षाणि--एक सौ वर्षों तक; भूमौ--पृथ्वी पर; राजन्--हे राजा; न वर्षति--वृष्टि नहीं करेगा;तदा--तब; निरत्ने--अकाल आने पर; हि--निस्सन्देह; अन्योन्यम्ू--परस्पर; भक्ष्यमाणा:--खाते हुए; क्षुधा--भूख से;अर्दिता:--पीड़ित; क्षयम्--विनाश को; यास्यन्ति--जाते हैं; शनकै: --क्रमश:; कालेन--काल की शक्ति से; उपद्रुता:--दिग्भ्रमित; प्रजा:--लोग
हे राजा, ज्यों-ज्यों प्रलय निकट आयेगा, त्यों-त्यों पृथ्वी पर एक सौ वर्षों तक वर्षा नहींहोगी।
सूखे से दुर्भिक्ष पड़ जायेगा और भूखी मरने वाली जनता एक-दूसरे को सचमुच खाजायेगी।
पृथ्वी के निवासी काल की शक्ति से मोहग्रस्त होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाएँगे।
"
सामुद्रं दैहिकं भौम॑ रस सांवर्तको रवि: ।
रश्मिभि: पिबते घोरैः सर्व नैव विमुज्ञति ॥
८॥
सामुद्रमू--समुद्र का; दैहिकम्--शरीरों का; भौमम्-- भूमि का; रसम्ू--रस; सांवर्तक:--संहार करने वाला; रवि: --सूर्य;रश्मिभि:--किरणों से; पिबते--पी जाता है; घोरै:--घोर; सर्वम्--सर्वस्व; न--नहीं; एब--तक; विमुजञ्ञति--देता है।
सूर्य अपने संहारक रूप में अपनी घोर किरणों के द्वारा, समुद्र का, शरीरों का तथापृथ्वी का सारा पानी पी लेगा।
किन्तु बदले में यह विनाशकारी सूर्य वर्षा नहीं करेगा।
"
ततः संवर्तको वह्लिः सड्डर्षणमुखोत्थित: ।
दहत्यनिलवेगोत्थ: शून्यान्भूविवरानथ ॥
९॥
ततः--तब; संवर्तक:--संहार का; वह्लिः--अग्नि; सड्डूर्षण -- भगवान् संकर्षण के; मुख--मुख से; उत्थित:--निकला;दहति--जलाता है; अनिल-वेग--वायु के वेग से; उत्थ:--उठा हुआ; शून्यानू--रिक्त; भू--पृथ्वी-लोक के; विवरान्--दरारों; अथ--उसके बाद।
इसके बाद प्रलय की विशाल अग्नि भगवान् संकर्षण के मुख से धधक उठेगी।
वायु केप्रबल वेग से ले जाई गई, यह अग्नि निर्जीव विराट खोल को झुलसाकर, सारे ब्रह्माण्ड मेंजल उठेगी।
"
उपर्यध: समन्ताच्च शिखाभिर्वहिसूर्ययो: ।
दह्ममानं विभात्यण्डं दग्धगोमयपिण्डवत् ॥
१०॥
उपरि--ऊपर; अध:--तथा नीचे; समन्तात्ू--सभी दिशाओं में; च--तथा; शिखाभि: --लपटों से; वहि-- अग्नि का;सूर्ययो: --तथा सूर्य का; दह्ममानम्--जलना; विभाति--जगमगाता है; अण्डम्--ब्रह्माण्ड; दग्ध--जला हुआ; गो-मय--गोबर के; पिण्ड-वत्--गोले के समान।
ऊपर से दहकते सूर्य के तथा नीचे से भगवान् संकर्षण की अग्नि से--इस तरह सभीदिशाओं से--जलता हुआ ब्रह्माण्ड गोबर के दहकते पिंड की तरह चमकने लगेगा।
"
ततः प्रचण्डपवनो वर्षाणामधिकं शतम् ।
परः सांवर्तको वाति धूम्रं खं रजसावृतम् ॥
११॥
ततः--तब; प्रचण्ड-- भीषण; पवन: --वायु; वर्षाणाम्--वर्षो का; अधिकम्--अधिक; शतम्--एक सौ; पर:--महान्;साम्बर्तक:--प्रलय लाने वाली; वाति--बहती है; धूप्रमू-- भूरा; खमू-- आकाश; रजसा-- धूल से; आवृतम्--ढका
महान् तथा भीषण विनाशकारी वायु एक सौ वर्षों से भी अधिक काल तक बहेगी औरधूल से आच्छादित आकाश भूरा हो जायेगा।
"
ततो मेघकुलान्यड् चित्र वर्णान्यनेकश: ।
शतं वर्षाणि वर्षन्ति नदन्ति रभसस्वनैः: ॥
१२॥
ततः--तब; मेघ-कुलानि--बादल; अड्ग--हे राजा; चित्र-वर्णानि--नाना प्रकार के रंगों के; अनेकश:--असंख्य;शतम्--एक सौ; वर्षाणि--वर्ष; वर्षन्ति--मूसलाधार वर्षा करते हैं; नदन्ति--गरजते हैं; रभस-स्वनै:--घोर ध्वनि से ॥
हे राजा, उसके बाद नाना रंग के बादलों के समूह बिजली के साथ घोर गर्जना करते हुएएकत्र होंगे और एक सौ वर्षों तक मूसलाधार वर्षा करते रहेंगे।
"
तत एकोदकं विश्व ब्रह्मण्डविवरान्तरम् ॥
१३॥
ततः--तब; एक-उदकम्--जल की एक राशि; विश्वम्--ब्रह्माण्ड को; ब्रह्म-अण्ड--सृष्टि के अंडे के; विवर-अन्तरम्--भीतर
उस समय ब्रह्माण्ड की खोल जल से भर जायेगी और एक विराट सागर का निर्माणकरेगी।
"
तदा भूमेर्गन्धगुणं ग्रसन्त्याप उदप्लवे ।
ग्रस्तगन्धा तु पृथिवी प्रलयत्वाय कल्पते ॥
१४॥
तदा--तब; भूमे: --पृथ्वी का; गन्ध-गुणम्--सुगन्ध का गुण; ग्रसन्ति--हर लेते हैं; आप:--जल; उद-प्लवे--बाढ़ केसमय; ग्रस्त-गन्धा--सुगन्ध से विहीन; तु--तथा; पृथिवी--भूमि; प्रलयत्वाय कल्पते--अप्रकटहो जाती है |
जब सारा ब्रह्माण्ड जलमग्न हो जाता है, तो यह जल पृथ्वी के अद्वितीय सुगन्धि गुण कोहर लेगा और पृथ्वी, अपने इस विभेदकारी गुण से विहीन होकर, विलीन हो जायेगी।
"
अपां रसमथो तेजस्ता लीयन्तेडथ नीरसा: ।
ग्रसते तेजसो रूप॑ वायुस्तद्रहितं तदा ॥
१५॥
लीयते चानिले तेजो वायो: खं ग्रसते गुणम् ।
स वै विशति खं राजंस्ततश्च नभसो गुणम् ॥
१६॥
शब्दं ग्रसति भूतादिर्नभस्तमनुलीयते ।
तैजसश्रैन्द्रियाण्यड़ देवान्वैकारिको गुणै: ॥
१७॥
महान्ग्रसत्यहड्डारं गुणा: सत्त्वादयश्च तम् ।
ग्रसतेव्याकृतं राजन्गुणान्कालेन चोदितम् ॥
१८॥
न तस्य कालावयवबै: परिणामादयो गुणा: ।
अनाचनन्तमव्यक्तं नित्यं कारणमव्ययम् ॥
१९॥
अपाम्--जल का; रसम्--स्वाद; अथ--तब; तेज:--अग्नि; ता:--वह जल; लीयन्ते--विलीन कर लेता है; अथ--उसके बाद; नीरसा:--स्वाद-गुण से रहित; ग्रसते--हर लेता है; तेजस:--अग्नि का; रूपम्--रूप; वायु:--वायु; तत्ू-रहितमू--उस रूप से विहीन; तदा--तब; लीयते--विलीन हो जाता है; च--तथा; अनिले--वायु में; तेज:-- अग्नि;वायो:--वायु का; खम्--आकाश; ग्रसते--हरण कर लेता है; गुणम्--अनुभव होनेवाले गुण ( स्पर्श ); सः--वह वायु;बै--निस्सन्देह; विशति--प्रवेश करती है; खम्--आकाश में; राजन्--हे राजा परीक्षित; ततः--तत्पश्चात्; च--तथा;नभसः:--आकाश का; गुणम्--गुण; शब्दम्--शब्द, ध्वनि; ग्रसति--हर लेती है; भूत-आदि:--तमोगुणी अहंकार तत्त्वको; नभ:--आकाश; तम्--उस मिथ्या अहंकार में; अनु--पीछे-पीछे; लीयते--विलीन हो जाता है; तैजसः--रजोगुणीमिथ्या अहंकार; च--तथा; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; अड़--हे राजा; देवान्ू--देवतागण; वैकारिक: --सतोगुणी मिथ्याअहंकार में; गुणै: --( मिथ्या अहंकार के ) प्रकट कार्यों समेत; महान्--महत्_ तत्त्व; ग्रसति--पकड़ लेता है; अहड्ढारम्--मिथ्या अहंकार को; गुणा:-- प्रकृति के गुण; सत्त्त-आदय:--सतो, रजो तथा तमो; च--तथा; तम्--उस महत् को;ग्रसते--पकड़ लेता है; अव्याकृतम्-प्रकृति का अव्यक्त आदि रूप; राजन्--हे राजा; गुणान्--गुणों को; कालेन--समय के द्वारा; चोदितम्--प्रेरित; न--नहीं; तस्य--अव्यक्त प्रकृति का; काल--समय का; अवयबै:--खंडों द्वारा;'परिणाम-आदय: --रूपान्तर तथा दृश्य पदार्थ के अन्य परिवर्तन ( सृजन, वृद्धि आदि ); गुणा:--ऐसे गुण; अनादि-- आदिरहित; अनन्तम्ू--बिना अन्त के; अव्यक्तम्--अप्रकट; नित्यमू--नित्य; कारणम्--कारण; अव्ययम्-- अव्यय |
तब अग्नि जल से स्वाद ग्रहण करती है, जो अपने अद्वितीय गुण स्वाद को त्याग कर,अग्नि में लीन हो जाता है।
वायु, अग्नि में निहित रूप को ग्रहण करता है और तब अग्निअपना रूप खोकर वायु में विलीन हो जाती है।
आकाश, वायु के गुण स्पर्श को पा लेता हैऔर वह वायु आकाश में प्रवेश करती है।
तब हे राजा, तमोगुणी मिथ्या अहंकार, आकाशके गुण ध्वनि को ग्रहण करता है, जिसके बाद आकाश मिथ्या अहंकार में विलीन हो जाताहै।
रजोगुणी मिथ्या अहंकार, इन्द्रियों को ग्रहण करता है और सतोगुणी अहंकार देवताओंको विलीन कर लेता है।
तब सम्पूर्ण महत् तत्त्व मिथ्या अहंकार को उसके विविध कार्यों समेत ग्रहण करता है और यह महत् प्रकृति के तीन गुणों--सतो, रजो तथा तमो--द्वाराजकड़ लिया जाता है।
हे राजा परीक्षित, ये गुण काल द्वारा प्रेरित प्रकृति के मूल अव्यक्तरूप द्वारा अधिगृहीत हो जाते हैं।
यह अव्यक्त प्रकृति काल के प्रभाव द्वारा उत्पन्न छः प्रकारके विकारों के अधीन नहीं होती, प्रत्युत् इसका न तो आदि होता है, न अन्त।
यह सृष्टि काअव्यक्त, शाश्वत, अव्यय कारण है।
"
न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वंतमो रजो वा महदादयोमी ।
न प्राणबुद्धीन्द्रियदेवता वान सन्निवेश: खलु लोककल्प: ॥
२०॥
न स्वण्नजाग्रन्न च तत्सुषुप्तंन खं जलं॑ भूरनिलोउग्निरर्क: ।
संसुप्तवच्छून्यवदप्रतर्क्यतन्मूलभूतं पदमामनन्ति ॥
२१॥
न--नहीं; यत्र--जहाँ; वाच: --वाणी; न--नहीं; मन:--मन; न--नहीं; सच्त्वमू--सतोगुण; तम:--तमोगुण; रज:--रजोगुण; वा--अथवा; महत्--महत् तत्त्व: आदय:--इत्यादि; अमी--ये तत्त्व; न--नहीं; प्राण--प्राणवायु; बुद्धि--बुद्धि; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; देवता:--तथा अधिष्ठाता देवता; वा--अथवा; न--नहीं; सन्निवेश:--विशेष रचना; खलु--निस्सन्देह; लोक-कल्प:-्रहों की व्यवस्था का; न--नहीं; स्वप्न--नींद; जाग्रत्ू--जाग्रत अवस्था; न--नहीं; च--तथा;तत्--वह; सुषुप्तम्--गहरी नींद; न--नहीं; खम्--आकाश; जलमू्--जल; भू:--पृथ्वी; अनिल:--वायु; अग्नि: --अग्नि; अर्क:--सूर्य; संसुप्त-वत्--गहरी नींद में रहने वाले के समान; शून्य-वत्--शून्य की तरह; अप्रतर्क्यम्-तर्क केद्वारा अभेद्य; तत्-वह प्रधान; मूल-भूतम्--आधार के रूप में; पदम्--वस्तु; आमनन्ति--महापुरुष कहते हैं |
प्रकृति की अव्यक्त अवस्था, जिसे प्रधान कहते हैं, में न वाणी, न मन, न महत् इत्यादिसूक्ष्म तत्त और न ही सतो, रजो तथा तमोगुण होते हैं।
उसमें न तो प्राणवायु, न बुद्धि, नकोई इन्द्रियाँ या देवता रहते हैं।
उसमें न तो ग्रहों की स्पष्ट व्यवस्था होती है, न ही चेतना कीविभिन्न अवस्थाएँ--सुप्त, जागृत तथा सुषुप्त--ही होती हैं।
उसमें आकाश, जल, पृथ्वी,वायु, अग्नि या सूर्य नहीं होते।
यह स्थिति सुषुप्ति अथवा शून्य जैसी होती है।
निस्सन्देह, यहअवर्णनीय है।
किन्तु आध्यात्मिक विज्ञानवेत्ता बताते हैं कि प्रधान के मूल वस्तु होने से यहभौतिक सृष्टि का वास्तविक कारण है।
"
लय: प्राकृतिको होष पुरुषाव्यक्तयोर्यदा ।
शक्तय: सम्प्रलीयन्ते विवशा: कालविद्गुता: ॥
२२॥
लयः--प्रलय; प्राकृतिक:-- भौतिक तत्त्वों की; हि--निस्सन्देह; एब:--यह; पुरुष--परमे श्वर का; अव्यक्तयो:--तथाअव्यक्त रूप में उनकी भौतिक प्रकृति का; यदा--जब; शक्तय:--शक्तियाँ; सम्प्रलीयन्ते--पूर्णतया लीन हो जाती हैं;विवशा: --असहाय; काल--काल द्वारा; विद्रुता:--अव्यवस्थित |
यह प्रलय प्राकृतिक कहलाती है, जिसके अन्तर्गत परम पुरुष तथा उनकी अव्यक्तभौतिक प्रकृति से सम्बन्धित शक्तियाँ, काल के वेग द्वारा अव्यवस्थित होकर, उनकीशक्तियों से विहीन होकर, पूरी तरह से लीन हो जाती हैं।
"
बुद्धीन्द्रियार्थरूपेण ज्ञानं भाति तदाश्रयम् ।
इृश्यत्वाव्यतिरिकाभ्यामाद्यन्तवदवस्तु यत् ॥
२३॥
बुद्धि--बुद्धि; इच्द्रिय--इन्द्रियाँ; अर्थ--तथा अनुभूति की वस्तुओं के; रूपेण--रूप में; ज्ञानमू--परब्रह्म; भाति--प्रकटकरता है; तत्--इन तत्त्वों का; आश्रयम्-- आधार; दृश्यत्व--देखे जाने के कारण; अव्यतिरिकाभ्याम्--अपने कारण सेअभिन्न होने के कारण; आदि-अन्त-वत्--जिसका आदि तथा अन्त है; अवस्तु--अपर्याप्त है; यत्ू--जो भी एकमात्र पर
ब्रह्म ही बुद्धि, इन्द्रियों तथा इन्द्रिय-अनुभूति की वस्तुओं के रूपों में प्रकटहोता है और वही उनका परम आधार है।
जिसका भी आदि तथा अन्त होता है, वह अपर्याप्त( अवस्तु ) है क्योंकि वह सीमित इन्द्रियों के द्वारा अनुभूत वस्तु है और अपने कारण सेअभिन्न है।
"
दीपश्चक्षुश्व रूपं च ज्योतिषो न पृथग्भवेत् ।
एवं धी: खानि मात्राश्न न स्युरन््यतमाहतात् ॥
२४॥
दीप:--दीपक; चक्षुः--देखने वाली आँख; च--तथा; रूपम्--देखा गया रूप; च--तथा; ज्योतिष:--मूल तत्त्व अग्निसे; न--नहीं; पृथक्ू--विलग; भवेत्--हैं; एवम्--इसी तरह; धीः--बुदर्द्धि; खानि--इन्द्रयाँ; मात्रा:--अनुभूतियाँ; च--तथा; न स्युः--नहीं हैं; अन्यतमात्--जो स्वयं पूर्णतया विलग है; ऋतात्--सत्य से |
दीपक, उस दीपक के प्रकाश से देखने वाली आँख तथा देखा जाने वाला दृश्य रूप,मूलतः अग्नि तत्त्व से अभिन्न हैं।
इसी तरह बुद्धि, इन्द्रियों तथा इन्द्रिय अनुभूतियों का परमसत्य से पृथक् कोई अस्तित्व नहीं है यद्यपि वह परम सत्य ( परब्रह्म ) उनसे सर्वथा भिन्न होताहै।
"
बुद्धेर्जागरणं स्वप्न: सुषुप्तिरिति चोच्यते ।
मायामात्रमिदं राजन्नानात्वं प्रत्यगात्मनि ॥
२५॥
बुद्धेः--बुद्धि का; जागरणम्--जागृत चेतना; स्वप्न:--नींद; सुषुष्ति:--गहरी नींद; इति--इस तरह; च--तथा; उच्यते--कहलाते हैं; माया-मात्रमू--निरी माया; इृदम्ू--यह; राजनू--हे राजा; नानात्वम्--द्वैत; प्रत्यक्-आत्मनि--शुद्ध आत्माद्वारा अनुभव किया हुआ।
बुद्धि की तीन अवस्थाएँ जाग्रत, सुप्त तथा सुषुप्त कहलाती हैं।
लेकिन हे राजा, इनविभिन्न अवस्थाओं से शुद्ध जीव के लिए उत्पन्न नाना प्रकार के अनुभव माया के अतिरिक्तकुछ भी नहीं हैं।
"
यथा जलधरा व्योम्नि भवन्ति न भवन्ति च ।
ब्रह्मणीदं तथा विश्वमवयव्युदयाप्ययात् ॥
२६॥
यथा--जिस तरह; जल-धरा:--बादल; व्योम्नि-- आकाश में; भवन्ति-- हैं; न भवन्ति--नहीं होते; च--तथा; ब्रह्मणि--परब्रह्म में; इदम्--यह; तथा--उसी तरह; विश्वम्--ब्रह्मण्ड; अवयवि--अंशों से युक्त; उदय--उत्पत्ति; अप्ययात्--तथाप्रलय के कारण
जिस तरह आकाश में बादल बनते हैं और तब अपने घटक तत्त्वों के मिश्रण तथाविलय के द्वारा इधर-उधर बिखर जाते हैं, उसी तरह यह भौतिक ब्रह्माण्ड, परब्रह्म के भीतर,अपने अवयवब रूपी तत्त्वों के मिश्रण तथा विलय से, बनता और विनष्ट होता है।
सत्यं हवयव: प्रोक्त: सर्वावयविनामिह ।
विनार्थेन प्रतीयेरन्पटस्येवाड़ तन्तवः ॥
२७॥
सत्यम्ू--सत्य; हि-- क्योंकि; अवयव:--अवयवी कारण; प्रोक्त:--कहा गया है; सर्व-अवयविनाम्--समस्त अवयवोंका; इह--इस जगत में; विना--से विलग; अर्थेन--प्रकट फल; प्रतीयेरन्ू-- अनुभव किये जा सकते हैं; पटस्य--वस्त्रके; इब--सहृश; अड़--हे राजा; तन्तव: --धागे |
हे राजा, ( वेदान्त-सूत्र में ) यह कहा गया है कि इस ब्रह्माण्ड में किसी व्यक्त पदार्थ कोनिर्मित करने वाला अवययी कारण, पृथक् सत्य के रूप में, उसी तरह देखा जा सकता है,जिस तरह वस्त्र को बनाने वाले धागे उनसे बनी हुईं वस्तु ( वस्त्र ) से अलग देखे जा सकतेहैं।
"
यत्सामान्यविशेषाभ्यामुपलभ्येत स भ्रम: ।
अन्योन्यापाश्रयात्सर्वमाद्यन्तवदवस्तु यत् ॥
२८॥
यत्--जो भी; सामान्य--सामान्य कारण के रूप में; विशेषाभ्यामू--तथा विशेष कार्य के रूप में; उपलभ्येत-- अनुभवकिया जाता है; सः--वह; भ्रम:--मोह; अन्योन्य--पारस्परिक; अपाश्रयात्-- अधीनता के कारण; सर्वम्--हर वस्तु;आदि-अन्त-वत्--आदि तथा अन्त होने से; अवस्तु--असत्य; यत्--जो |
सामान्य कारण तथा विशिष्ट कार्य के रूप में अनुभव की हुई कोई भी वस्तु भ्रम होनीचाहिए क्योंकि ऐसे कारण तथा कार्य एक-दूसरे के सापेक्ष होते हैं।
निस्सन्देह, जिसका भीआदि तथा अन्त है, वह असत्य है।
"
विकारः ख्यायमानोपि प्रत्यगात्मानमन्तरा ।
न निरूप्योस्त्यणुरपि स्याच्चेच्चित्सम आत्मवत् ॥
२९॥
विकार:--जगत का रूपान्तर; ख्यायमान:--प्रकट होने वाला; अपि--यद्यपि; प्रत्यक्-आत्मानम्--परमात्मा; अन्तरा--बिना; न--नहीं; निरूप्य:--चिन्तनीय; अस्ति--है; अणु: --एक परमाणु; अपि-- भी; स्थात्--ऐसा हो; चेत्--यदि;चित्-सम:ः--समान रूप से आत्मा; आत्म-वत्--बिना परिवर्तन के उसी रूप में।
भौतिक प्रकृति के एक भी परमाणु का अनुभव किया जाने वाला रूपान्तर, उसपरमात्मा के उल्लेख के बिना कोई परम अर्थ नहीं रखता।
किसी वस्तु को यथार्थ रूप मेंविद्यमान होने के लिए उस वस्तु को शुद्ध आत्मा जैसा ही गुण वाला--नित्य तथा अव्यय--होना चाहिए।
"
न हि सत्यस्य नानात्वमविद्वान्यदि मन्यते ।
नानात्वं छिद्रयोर्यद्वज्योतिषोर्वातयोरिव ॥
३०॥
न--नहीं है; हि--निस्सन्देह; सत्यस्य--परम सत्य का; नानात्वम्ू--द्वैत; अविद्वानू--अज्ञानी; यदि--यदि; मन्यते--सोचता है; नानात्वम्--द्वैत; छिद्रयो:--दो आकाशों का; यद्वतू--जिस तरह; ज्योतिषो:--दो स्वर्गिक प्रकाशों का;वातयो:--दो वायुओं का; इब--यथा।
परम सत्य में कोई भौतिक द्वैत नहीं है।
अज्ञानी व्यक्ति द्वारा अनुभूत द्वैत, रिक्त पात्र केभीतर तथा पात्र के बाहर के आकाश के अन्तर के समान, अथवा जल में सूर्य के प्रतिबिम्बतथा आकाश में सूर्य के अन्तर के समान, अथवा एक शरीर के भीतर की प्राणवायु तथादूसरे शरीर की प्राणवायु में, जो अन्तर है उसके समान है।
"
यथा हिरण्यं बहुधा समीयतेनृभि: क्रियाभिवव्यवहारवर्त्मसु ।
एवं वचोभिर्भगवानधोक्षजोव्याख्यायते लौकिकवैदिकैर्जन: ॥
३१॥
यथा--जिस तरह; हिरण्यम्--स्वर्ण; बहुधा--अनेक रूपों में; समीयते--प्रकट होता है; नृभि:--पुरुषों के लिए;क्रियाभि:--विभिन्न कर्मो के रूप में; व्यवहार-वर्त्मससु--सामान्य उपयोग में; एवम्--उसी तरह से; वचोभि:--विभिन्नप्रकार से; भगवान्-- भगवान्; अधोक्षज:-- भौतिक इन्द्रियों के लिए अचिन्त्य दिव्य प्रभु; व्याख्यायते--वर्णन किया जाताहै; लौकिक--संसारी; वैदिकै:--तथा वैदिक; जनै:--लोगों द्वारा
लोग विभिन्न कार्यो के अनुसार सोने का उपयोग नाना प्रकार से करते हैं, इसलिए सोनाविविध रूपों में देखा जाता है।
इसी तरह भौतिक इन्द्रियों के लिए अगम्य भगवान् का वर्णनविभिन्न प्रकार के लोगों द्वारा विभिन्न रूपों में--सामान्य तथा वैदिक रूप में--किया जाताहै।
"
यथा घनोर्कप्रभवोर्कदर्शितोहार्काशभूतस्य च चक्षुषस्तम: ।
एवं त्वहं ब्रह्मगुणस्तदीक्षितोब्रह्मांशकस्यात्मन आत्मबन्धन: ॥
३२॥
यथा--जिस तरह; घन:--बादल; अर्क--सूर्य का; प्रभव:--फल; अर्क--सूर्य द्वारा; दर्शित:ः--दिखलाया जाता है;हि--निस्सन्देह; अर्क --सूर्य; अंश-भूतस्य--जो अंश रूप है; च--तथा; चक्षुष:-- आँख का; तम:--अंधकार; एवम्--उसी तरह से; तु--निस्सन्देह; अहम्--मिथ्या अहंकार; ब्रह्म-गुण:--परब्रह्म का गुण; तत्-ईक्षित:--परब्रह्म के माध्यम सेहृश्य; ब्रहम-अंशकस्य--परब्रह्म के अंश का; आत्मन:--जीवात्मा का; आत्म-बन्धन:--परमात्मा की अनुभूति में बाधक |
यद्यपि बादल सूर्य की ही उपज है और सूर्य द्वारा हश्य भी होता है, तो भी यह देखनेवाली आँख के लिए जो सूर्म का ही दूसरा अंश है, अंधेरा उत्पन्न कर देता है।
इसी तरहपरब्रह्म की विशेष उपज मिथ्या अहंकार जो परब्रह्म द्वारा ही दृश्य बनाई जाती है, आत्मा कोपरब्रह्म का साक्षात्कार करने से रोकता है यद्यपि आत्मा भी परब्रह्म का ही अंश है।
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घनो यदार्कप्रभवो विदीर्यतेचक्षु: स्वरूपं रविमीक्षते तदा ।
यदा ह्यहड्डार उपाधिरात्मनोजिज्ञासया नश्यति तरहानुस्मरेत् ॥
३३॥
घन:--बादल; यदा--जब; अर्क-प्रभव:--सूर्य की उपज; विदीर्यते--तितर-बितर कर दिया जाता है; चक्षु;--आँख;स्वरूपमू-- अपने असली रूप में; रविम्--सूर्य को; ईक्षते--देखता है; तदा--तब; यदा--जब; हि--भी; अहड्ढार:--मिथ्या अहंकार; उपाधि: --बाहरी आवरण; आत्मन:--आत्मा का; जिज्ञासया--आध्यात्मिक पूछताछ से; नश्यति--नष्ट होजाता है; तहिं--उस समय; अनुस्मरेत्--मनुष्य को सही स्मृति प्राप्त होती है
जब सूर्य से उत्पन्न बादल तितर-बितर हो जाता है, तो आँख सूर्य के वास्तविक स्वरूपको देख सकती है।
इसी तरह, जब आत्मा दिव्य विज्ञान के विषय में पूछताछ करके, मिथ्याअहंकार के अपने भौतिक आवरण को नष्ट कर देता है, तो वह अपनी मूल आध्यात्मिकजागरूकता को फिर से प्राप्त होता है।
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यदैवमेतेन विवेकहेतिनामायामयाहड्डरणात्मबन्धनम् ।
छिच्त्वाच्युतात्मानुभवोवतिष्ठतेतमाहुरात्यन्तिकमड़ सम्प्लवम् ॥
३४॥
यदा--जब; एवम्--इस तरह; एतेन--इससे; विवेक--विवेक की; हेतिना--तलवार से; माया-मय--माया से युक्त;अहड्ढडरण--मिथ्या अहंकार; आत्म--आत्मा का; बन्धनम्--बन्धन का कारण; छित्त्वा--काट कर; अच्युत--अच्युत;आत्म--परमात्मा का; अनुभव: --अनुभूति; अवतिष्ठते--हृढ़ता से उत्पन्न करता है; तम्ू--उसको; आहु:--कहते हैं;आत्यन्तिकमू--चरम; अड़--हे राजा; सम्प्लवम्--प्रलय |
हे राजा परीक्षित, जब आत्मा को बाँधने वाले मायामय मिथ्या अहंकार को विवेक-शक्ति की तलवार से काट दिया जाता है और मनुष्य परमात्मा अच्युत का अनुभव प्राप्त करलेता है, तो वह भौतिक जगत का आत्यन्तिक या परम प्रलय कहलाता है।
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नित्यदा सर्वभूतानां ब्रह्मादीनां परन्तप ।
उत्पत्तिप्रलयावेके सूक्ष्मज्ञा: सम्प्रचक्षते ॥
३५॥
नित्यदा--निरन्तर; सर्व-भूतानाम्ू--सारे प्राणियों का; ब्रह-आदीनाम्--ब्रह्मा इत्यादि; परम्-तप--हे शत्रुओं केदमनकर्ता; उत्पत्ति--सूजन; प्रलयौ--तथा संहार; एके --कुछ; सूक्ष्म-ज्ञा:--सूक्ष्म वस्तुओं के ज्ञाता; सम्प्रचक्षते--घोषितकरते हैं।
हे शत्रुओं के दमनकर्ता, प्रकृति की सूक्ष्म कार्य-प्रणाली के ज्ञाताओं ने घोषित किया हैकि उत्पत्ति तथा प्रलय की प्रक्रियायें निरन्तर चलती रहती हैं जिनसे ब्रह्मा इत्यादि सारे प्राणीनिरन्तर प्रभावित होते रहते हैं।
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कालस्त्रोतोजवेनाशु हियमाणस्य नित्यदा ।
परिणामिनां अवस्थास्ता जन्मप्रलयहेतव: ॥
३६॥
काल--समय का; स्त्रोत: प्रबल प्रवाह का; जवेन--वेग से; आशु--तेजी से; हियमाणस्थ--बहाये जाने वाले का;नित्यदा--निरन्तर; परिणामिनाम्--रूपान्तरशील वस्तुओं की; अवस्था:--विभिन्न अवस्थाएँ; ता:--वे; जन्म--जन्म;प्रलय--तथा प्रलय के; हेतव:--कारण |
सारी भौतिक वस्तुओं में रूपान्तर होते हैं और वे काल के प्रबल प्रवाह द्वारा तेजी सेक्षीण की जाती हैं।
भौतिक वस्तुओं द्वारा प्रदर्शित अपने अस्तित्व की विविध अवस्थाएँउनकी उत्पत्ति तथा प्रलय के शाश्रत कारण हैं।
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अनाचन्तवतानेन कालेने श्वरमूर्तिना ।
अवस्था नैव दृश्यन्ते वियति ज्योतिषां इव ॥
३७॥
अनादि-अन्त-वता--बिना आदि अथवा अन्त के; अनेन--इस; कालेन--काल के द्वारा; ईश्वर-- भगवान् की; मूर्तिना--प्रतिनिधि द्वारा; अवस्था:--विभिन्न अवस्थाएँ; न--नहीं; एब--निस्सन्देह; दृश्यन्ते--देखी जाती हैं; वियति--बाहाअवकाश में; ज्योतिषामू--गतिशील नक्षत्रों के; इब--सहश |
भगवान् के निर्विशेष प्रतिनिधि स्वरूप, आदि हीन तथा अन्तहीन काल द्वारा उत्पन्न,जगत की ये अवस्थाएँ उसी तरह दृश्य नहीं हैं जिस तरह आकाश में नक्षत्रों की स्थिति में होने वाले अत्यन्त सूक्ष्म परिवर्तनों को नहीं देखा जा सकता।
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नित्यो नैमित्तिकश्चेव तथा प्राकृतिको लयः ।
आत्यन्तिकश्चव कथित: कालस्य गतिरीहशी ॥
३८॥
नित्य:--संतत; नैमित्तिक: --आकस्मिक; च--तथा; एव--निस्सन्देह; तथा-- भी; प्राकृतिक:--प्राकृतिक; लय॒ः--प्रलय; आत्यन्तिक:--अन्तिम; च--तथा; कथित:--वर्णित होते हैं; कालस्य--काल की; गति:-- प्रगति; ईहशी--इसतरह कीइस प्रकार काल की प्रगति को चार प्रकार के प्रलय के रूप में वर्णित किया जाता है।
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ये हैं स्थायी, नैमित्तिक, प्राकृतिक तथा आत्यन्तिक |
एता: कुरु श्रेष्ठ जगद्ठिधातु-नॉरायणस्याखिलसत्त्वधाम्न: ।
लीलाकथास्ते कधिता: समासतःकार्ल्स्येन नाजोउप्यभिधातुमीश: ॥
३९॥
एता:--ये; कुरु-श्रेष्ठ--हे कुरुओं में श्रेष्ठ; जगत्-विधातु:--ब्रह्माण्ड के स्त्रष्टा का; नारायणस्थ--नारायण का; अखिल-सत्त्व-धाम्न:--सारे अस्तित्वों के आगार; लीला-कथा:--लीलाओं की कथाएँ; ते--तुमसे; कथिता:--कही जा चुकी हैं;समासतः--संक्षेप में; कार्त्स्येन--पूरी तरह; न--नहीं; अज:--अजन्मा ब्रह्मा; अपि--तक; अभिधातुम्--बतला सकनेमें; ईशः--सक्षम है |
हे कुरुश्रेष्ठ, मैंने तुम्हें भगवान् नारायण की लीलाओं की ये कथाएँ संक्षेप में बतला दींहैं।
भगवान् इस जगत के सत्रष्टा हैं और सारे जीवों के अन्ततः आगार हैं।
यहाँ तक कि ब्रह्माभी उन कथाओं को पूरी तरह बतलाने में अक्षम हैं।
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संसारसिन्धुमतिदुस्तरमुत्तितीर्षो -नॉान्य: प्लवो भगवत: पुरुषोत्तमस्य ।
लीलाकथारसनिषेवणमन्तरेणपुंसो भवेद्विविधदुःखदवार्दितस्य ॥
४०॥
संसार--संसार के; सिन्धुम्--सागर को; अति-दुस्तरम्--पार करने में असम्भव; उत्तितीर्षो:--पार करने की इच्छा करनेवाले के लिए; न--नहीं; अन्य: --कोई दूसरी; प्लव: --नाव; भगवत:-- भगवान्; पुरुष-उत्तमस्य--परमे श्वर की; लीला-कथा--लीलाओं की कथाएँ; रस--दिव्य आस्वाद के प्रति; निषेवणम्--सेवा भाव; अन्तरेण--इसके अतिरिक्त; पुंसः--पुरुष के लिए; भवेत्--हो सकता है; विविध--अनेक; दुःख-- भौतिक दुख की; दव--अग्नि द्वारा; अर्दितस्थय--पीड़ित |
असंख्य संतापों की अग्नि से पीड़ित तथा दुलल॑घ्य संसार सागर को पार करने के इच्छुकव्यक्ति के लिए, भगवान् की लीलाओं की कथाओं के दिव्य आस्वाद के प्रति भक्ति काअनुशीलन करने के अतिरिक्त कोई अन्य उपयुक्त नाव नहीं है।
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पुराणसंहितामेतामृषिर्नारायणोव्यय: ।
नारदाय पुरा प्राह कृष्णद्वैषायनाय सः ॥
४१॥
पुराण--सारे पुराणों; संहितामू--आवश्यक संहिता के; एताम्--यह; ऋषि: --महामुनि; नारायण: -- नर-नारायण;अव्यय:--अव्यय; नारदाय--नारद मुनि से; पुरा--प्राचीन काल में; प्राह--कहा; कृष्ण-द्वैणायनाय--कृष्ण द्वैपायनवेदव्यास से; सः--उसने, नारद ने
बहुत दिन बीते सारे पुराणों की यह आवश्यक संहिता, अच्युत नर-नारायण ऋषि नेनारद से कही थी, जिन्होंने फिर इसे कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास से कही।
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सब महां महाराज भगवान्बादरायण: ।
इमां भागवतीं प्रीतः संहितां वेदसम्मिताम् ॥
४२॥
सः--उसने; बै--निस्सन्देह; महाम्--मुझसे, शुकदेव गोस्वामी से; महाराज--हे राजा परीक्षित; भगवान्--परमे श्वर केशक्तिशाली अवतार; बादरायण: -- श्रील व्यासदेव ने; इमाम्ू--इस; भागवतीम्-- भागवत शास्त्र को; प्रीत:--तुष्ट होकर;संहिताम्--संहिता; वेद-सम्मिताम्--चारों वेदों के ही तुल्य |
हे महाराज परीक्षित, महापुरुष श्रील व्यासदेव ने मुझे उसी शास्त्र श्रीमद्भागवत कीशिक्षा दी जो महत्त्व में चारों वेदों के ही तुल्य है।
इमां वक्ष्यत्यसी सूत ऋषिभ्यो नैमिषालये ।
दीर्घसत्रे कुरु श्रेष्ठ सम्पृष्ट: शौनकादिभि: ॥
४३॥
इमम्--इसे; वक्ष्यति--कहेगा; असौ--हमारे समक्ष उपस्थित; सूत:--सूत गोस्वामी; ऋषिभ्य: --ऋषियों से; नैमिष-आलये--नैमिषारण्य में; दीर्घ-सत्रे--दीर्घकाल तक चलने वाले यज्ञ के अवसर पर; कुरु-श्रेष्ठ--हे कुरुओं में श्रेष्ठ;सम्पृष्ट: --पूछे जाने पर; शौनक-आदिभि:--शौनक इत्यादि के द्वारा
हे कुरुश्रेष्ठ, हमारे समक्ष आसीन यही सूत गोस्वामी नैमिषारण्य के विराट यज्ञ में एकत्रऋषियों से इस भागवत का प्रवचन करेंगे।
ऐसा वे तब करेंगे जब शौनक आदि सभा केसटस्य उनसे प्रन करेंगे।
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