← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 2 की सूची
अध्याय दस: भागवत सभी प्रश्नों का उत्तर है
2.10श्री -शुक उवाचअन्न सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतय: ।
मन्वन्तरेशानुकथानिरोधो मुक्तिराभ्रय: ॥
१॥
श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; अत्र--इस श्रीमद्भागवत में; सर्ग:--ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का वर्णन;विसर्ग:--उप-सृष्टि का वर्णन; च--भी; स्थानम्--लोक; पोषणम्--संरक्षण; ऊतयः--सृष्टि की प्रेरणा; मन्वन्तर--मनुओं कापरिवर्तन; ईश-अनुकथा:--ई श्वर का ज्ञान; निरोध: -- भगवान् के धाम को वापस जाना; मुक्ति:--मुक्ति; आश्रय:--आधार।
श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा--इस श्रीमद्भागवत में दस विभाग हैं, जो ब्रह्माण्ड कीउत्पत्ति, उप-सृष्टि, लोकान्तर, भगवान् द्वारा पोषण, सृष्टि प्रेरणा, मनुओं के परिवर्तन, ईश्वर ज्ञान,अपने घर-भगवद्धाम गमन, मुक्ति तथा आश्रय से सम्बन्धित हैं।
दशमस्य विशुद्धरर्थ नवानामिह लक्षणम् ।
वर्णयन्ति महात्मान: श्रुतेनार्थन चाजझ्सा ॥
२॥
दशमस्य--दसवें ( आश्रय ) का; विशुद्धि--एकमात्र; अर्थभम्--कारण; नवानाम्--अन्य नौ के; इह--इसी श्रीमद्भागवत में;लक्षणम्--लक्षण; वर्णयन्ति--वर्णन करते हैं; महा-आत्मान:--ऋषिगण; श्रुतेन--वैदिक साक्ष्यों से; अर्थन-- प्रत्यक्ष व्याख्याद्वारा; च--तथा; अद्भजसा--संक्षिप्त रूप में ।
इनमें से जो दसवाँ 'आश्रय' तत्त्व है उसकी दिव्यता को अन्यों से पृथक्् करने के लिए, उनसबका वर्णन कभी वैदिक साक्ष्य से, कभी प्रत्यक्ष व्याख्या से और कभी महापुरुषों द्वारा दी गईसंक्षिप्त व्याख्याओं से किया जाता है।
भूत-मात्रेन्द्रिय-धियां जन्म सर्ग उदाहत: ।
ब्रह्मणो गुण-वैषम्याद् विसर्ग: पौरुष: स्मृतः ॥
३॥
भूत--पाँच स्थूल तत्त्व ( क्षिति, जल आदि ); मात्रा--इन्द्रियों द्वारा हश्य वस्तुएँ; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; धियामू-- मन; जन्म--उत्पत्ति; सर्ग:--प्राकट्य; उदाहत: --सृष्टि कहलाती है; ब्रह्मण:-- आदि पुरुष ब्रह्मा का; गुण-वैषम्यात्--तीनों गुणों की अन्तःक्रिया से; विसर्ग:--दुबारा सृष्टि; पौरुष:--चेष्टाएँ; स्मृत:--कहलाती हैं ।
पदार्थ के सोलह प्रकार--अर्थात् पाँच तत्त्व ( क्षिति, जल, पावक, गगन तथा वायु ),ध्वनि, रूप, स्वाद, गंध, स्पर्श तथा नेत्र, कान, नाक, जीभ, त्वचा एवं मन--की तात्विक सृष्टि सर्ग कहलाती है और प्रकृति के गुणों की बाद की अन्तःक्रिया विसर्ग कहलाती है।
स्थितिर्वैकुण्ठ-विजय: पोषणं तदनुग्रह: ।
मन्वन्तराणि सद्धर्म ऊतयः कर्म-वासना: ॥
४॥
स्थितिः--उचित दशा; वैकुण्ठ-विजय:--वैकुण्ठ के स्वामी की विजय; पोषणम्--पालन; तत्-अनुग्रह:--अहैतुकी कृपा;मन्वन्तराणि--मनुओं के शासन; सतू-धर्म:--पूर्ण धर्म; ऊतय:ः--कार्य करने की प्रेरणा; कर्म-वासना: --सकाम कर्म कीआकाांक्षा।
जीवात्मा के लिए उचित तो यही है कि वह भगवान् के नियमों का पालन करे और पूर्णपुरुषोत्तम भगवान् के संरक्षण में पूरी तरह से मानसिक शान्ति प्राप्त करे।
सभी मनु तथा उनकेनियम जीवन को सही दिशा प्रदान करने के लिए हैं।
कार्य करने की प्रेरणा ही सकाम कर्म कीआकांक्षा है।
अवतारानुचरित हरेश्वास्यानुवर्तिनाम् ।
पुंसामीश-कथाः प्रोक्ता नानाख्यानोपबृंहिता: ॥
५॥
अवतार--भगवान् का अवतार; अनुचरितम्-कार्यकलाप; हरे: -- भगवान् के; च-- भी; अस्य--उसके ; अनुवर्तिनाम्--अनुयायी; पुंसाम्--मनुष्यों का; ईश-कथा:--ईश्वर का विज्ञान, भगवत्तत्व; प्रोक्ता:--कहा गया; नाना--विविध; आख्यान--कथाएँ; उपबृूंहिता:--वर्णित ।
ईश्वर-विज्ञान ( ईश-कथा ) श्रीभगवान् के विविध अवतारों, उनकी लीलाओं तथा साथ हीउनके भक्तों के कार्यकलापों का वर्णन करता है।
निरोधोस्यानुशयनमात्मन: सह शक्तिभि: ।
मुक्तिह्हित्वान्यथारूपं स्व-रूपेण व्यवस्थिति: ॥
६॥
निरोध:--जगत का लय; अस्य--उसका; अनुशयनम्--पुरुष अवतारी महाविष्णु का योगनिद्रा में लेटना; आत्मन:--जीवात्माओं का; सह--साथ; शक्तिभि:--शक्तियों के साथ; मुक्ति: --मुक्ति; हित्वा--त्याग कर; अन्यथा--नहीं तो; रूपम्--रूप; स्व-रूपेण-- स्वरूप में; व्यवस्थिति:--स्थायी पद
अपनी बद्धावस्था के जीवन-सम्बन्धी प्रवृत्ति के साथ जीवात्मा का शयन करते हुएमहाविष्णु में लीन होना प्रकट ब्रह्माण्ड का परिसमापन कहलाता है।
परिवर्तनशील स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों को त्याग कर जीवात्मा के रूप की स्थायी स्थिति ' मुक्ति ' है।
आभासश्च निरोधश्व यतोउस्त्यध्यवसीयते ।
स आश्रय: परं ब्रह्म परमात्मेति शब्द्यते ॥
७॥
आभास: --जगत की उत्पत्ति; च--तथा; निरोध:--तथा लय; च-- भी; यत:--स्त्रोत से; अस्ति--है; अध्यवसीयते--प्रकटहोता है; सः--वह; आश्रय:--आगार; परम्ू--परम; ब्रह्म--जीव; परमात्मा--परम-आत्मा; इति--इस प्रकार; शब्द्यते--कहागया है।
परम पुरुष अथवा परमात्मा कहलाने वाले परमेश ही दृश्य जगत के परम स्त्रोत, इसकेआगार ( आश्रय ) तथा लय हैं।
इस प्रकार वे परम स्त्रोत, परम सत्य हैं।
योडध्यात्मिकोयं पुरुष: सोडइसावेवाधिदैविक: ।
यस्तत्रो भय-विच्छेद: पुरुषो ह्याधिभौतिक: ॥
८॥
यः--जो; अध्यात्मिक:--इन्द्रियों से युक्त; अयम्ू--यह; पुरुष:--व्यक्ति; सः--वह; असौ--वह; एव-- भी; अधिदैविक:--नियामक देव; यः--जो; तत्र--वहाँ; उभय--दोनों का; विच्छेद: --वियोग; पुरुष: -- व्यक्ति; हि-- क्योंकि; आधिभौतिक:--हृए्य शरीर अथवा देहवान जीवात्मा ।
विभिन्न इन्द्रियों से युक्त व्यक्ति आध्यात्मिक पुरुष कहलाता है और इन इन्द्रियों को वश मेंरखने वाला देव ( श्रीविग्रह ) अधिदेविक कहलाता है।
नेत्रगोलकों में दिखने वाला स्वरूपअधिभौतिक पुरुष कहलाता है।
एकमेकतराभावे यदा नोपलभामहे ।
त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रया श्रय: ॥
९॥
एकम्--एक; एकतर--अन्य; अभावे--के न होने पर; यदा--क्योंकि; न--नहीं; उपलभामहे -- दृश्य; त्रितयम्--तीनअवस्थाएँ; तत्र--वहाँ; यः--जो; वेद-- जानता है; सः--वह; आत्मा--परमात्मा; स्व--निज; आश्रय--शरण; आश्रय: --शरण का।
विभिन्न जीवात्माओं की उपर्युक्त तीनों अवस्थाएँ अन्योन्याश्रित हैं।
किसी एक के अभाव मेंदूसरे को नहीं समझा जा सकता।
किन्तु परमेश्वर इन सबको एक दूसरे के आश्रय रूप में देखताहुआ इन सबसे स्वतन्त्र है, अत: वह परम आश्रय है।
पुरुषोण्डं विनिर्भिद्य यदासौ स विनिर्गत: ।
आत्मनोयनमन्विच्छन्नपो उस्त्राक्षीच्छुचि: शुच्ची: ॥
१०॥
पुरुष: --परम पुरुष, परमात्मा; अण्डम्ू--ब्रह्माण्ड को; विनिर्भिद्य--प्रत्येक को अलग-अलग स्थापित करके; यदा--जब;असौ--वही; सः--वह ( भगवान् ); विनिर्गतः--बाहर निकल आया; आत्मन:--अपना; अयनम्--स्थान पर पड़े हुए;अन्विच्छन्--चाहते हुए; अप:--जल; अस्त्राक्षीत्--उत्पन्न किया; शुच्िः:--परम पवित्र; शुच्ची: --दिव्य ।
विभिन्न ब्रह्मण्डों को पृथक् करके विराट स्वरूप भगवान् ( महाविष्णु ), जो प्रथम पुरुषअवतार के प्रकट होने के स्थान कारणार्णव से बाहर आये थे, सृजित दिव्य जल ( गर्भोदक ) मेंशयन करने की इच्छा से उन विभिन्न ब्रह्माण्डों में प्रविष्ट हुए ।
तास्ववात्सीत् स्व-सृष्टासु सहस्त्रंपरिवत्सरान् ।
तेन नारायणो नाम यदाप:ः पुरुषोद्धवा: ॥
११॥
तासु--उसमें; अवात्सीत्--रह रहे; स्व-- अपनी ; सृष्टासु--सृष्टि करने में; सहस्त्रमू--एक हजार; परिवत्सरान्--वर्ष; तेन--उसकारण से; नारायण: --नारायण; नाम--नाम; यत्-- क्योंकि; आप: --जल; पुरुष-उद्धवा: --परम पुरुष से उद्भूत।
परम पुरुष निराकार नहीं हैं, अतः वे स्पष्टत: नर अथवा पुरुष हैं।
इसीलिए इन परम नर द्वाराउत्पन्न दिव्य जल नार कहलाता है।
चूँकि वे इसी जल में शयन करते हैं इसीलिए नारायणकहलाते हैं।
द्र॒व्यं कर्म च कालश्च स्वभावो जीव एव च ।
यदनुग्रहतः सन्ति न सन्ति यदुपेक्षया ॥
१२॥
द्रव्यमू-- भौतिक तत्त्व; कर्म--कर्म; च--तथा; काल:--समय; च-- भी; स्व-भाव: जीव:--जीवात्माएँ; एव--निश्चय ही;च--भी; यत्--जिसके; अनुग्रहत:--अनुग्रह से; सन्ति--हैं, स्थित हैं; न--नहीं; सन्ति--स्थित हैं; यत्-उपेक्षया--उपेक्षा से
मनुष्य को यह भलीभाँति समझ लेना चाहिए कि समस्त भौतिक तत्त्व, कर्म, काल तथागुण और इन सब को भोगने वाली जीवात्माएँ भगवत्कृपा से ही विद्यमान हैं।
उनके द्वारा उपेक्षितहोते ही ये सारी वस्तुओं अस्तित्वहीन हो जाती हैं।
एको नानात्वमन्विच्छन् योग-तल्पात् समुत्थित: ।
वीर्य हिरण्मयं देवो मायया व्यसूजत् त्रिधा ॥
१३॥
एक:--अकेला, वह; नानात्वम्--अनेक; अन्विच्छन्--ऐसी इच्छा से; योग-तल्पात्--योगनिद्रा की शय्या से; समुत्थित: --उत्पन्न; वीर्यम्ू--वीर्य; हिरण्मयम्--सुनहले रंग का; देव: --देवता; मायया--माया से; व्यसृजत्--रचना की; त्रिधा--तीनभागों में |
योगनिद्रा की शय्या में लेटे हुए भगवान् ने एकाकी रूप में से नाना प्रकार के जीवों कोप्रकट करने की इच्छा करते हुए अपनी बहिरंगा शक्ति से सुनहरे रंग का वीर्य-प्रतीक उत्पन्नकिया।
अधिदैवमथाध्यात्ममधिभूतमिति प्रभु: ।
अथेकं पौरुषं वीर्य त्रिधाभिद्यत तच्छुणु ॥
१४॥
अधिदेवम्--नियंत्रक जीव; अथ-- अब; अध्यात्मम्-- नियन्त्रित जीव; अधिभूतम्-- भौतिक शरीर; इति--इस प्रकार; प्रभु:--भगवान्; अथ--इस प्रकार; एकम्--केवल एक; पौरुषमू--पुरुष की, भगवान् की; वीर्यम्--शक्ति; त्रिधा--तीन भागों में;अभिद्यत--विभक्त हुई; तत्ू--वह; श्रूणु--सुनो
मुझसे सुनो कि भगवान् अपनी एक शक्ति को किस प्रकार अधिदैव, अध्यात्म तथाअधिभूत नामक तीन भागों में विभक्त करते हैं, जिसका उल्लेख ऊपर हो चुका है।
अन्तःशरीर आकाशातू पुरुषस्य विचेष्टतः ।
ओज: सहो बल जज्ञे ततः प्राणो महानसु: ॥
१५॥
अन्तः शरीरे--शरीर के भीतर; आकाशात्--आकाश से; पुरुषस्य--महाविष्णु के; विचेष्टत:--चेष्टा करते हुए; ओज:--इन्द्रियबल; सह:--मानसिक बल; बलमू्--शारीरिक बल; जज्ञे--उत्पन्न किया; ततः--तत्पश्चात्; प्राण:--प्राण, जीवनी शक्ति; महान्असुः--प्रत्येक जीवन का उत्स ।
महाविष्णु के दिव्य शरीर के भीतर स्थित आकाश से इन्द्रिय बल, मानसिक बल तथाशारीरिक बल उत्पन्न होते हैं।
इनके साथ ही सम्पूर्ण जीवनी शक्ति ( प्राण ) का समग्र उत्स( स्रोत ) उत्पन्न होता है।
अनुप्राणन्ति य॑ प्राणा: प्राणन्तं सर्व-जन्तुषु ।
अपानन्तमपानन्ति नर-देवमिवानुगा: ॥
१६॥
अनुप्राणन्ति--जीवित लक्षणों का अनुसरण करते हैं; यम्--जिसको; प्राणा:--इन्द्रियाँ; प्राणन््तम्--चेष्टावान्; सर्व-जन्तुषु--समस्त जीवों में; अपानन्तम्--चेष्टा रोकने पर; अपानन्ति--अन्य सभी रुक जाते हैं; नर-देवम्--राजा; इब--सहृश; अनुगा:--अनुयायी
जिस प्रकार राजा के अनुयायी अपने स्वामी का अनुसरण करते हैं उसी तरह सम्पूर्ण शक्तिके गतिशील होने पर अन्य समस्त जीव हिलते-डुलते ( गति करते ) हैं और जब सम्पूर्ण शक्तिनिश्चेष्ट हो जाती है, तो अन्य समस्त जीवों की इन्द्रिय-क्रियाशीलता रुक जाती है।
प्राणेनाक्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते विभो: ।
पिपासतो जक्षतश्च प्राइमुखं निरभिद्यत ॥
१७॥
प्राणेन--जीवनी शक्ति से; आक्षिपता--विचलित होकर; क्षुत्-- भूख; तृटू--प्यास; अन्तरा-- भीतर से; जायते--उत्पन्न करतीहैं; विभो:--परमे श्वर की; पिपासतः--प्यास बुझाने के लिए इच्छुक; जक्षतः--खाने के लिए इच्छुक; च--तथा; प्राक् --पहले;मुखम्--मुँह; निरभिद्यत--प्रकट हुआ।
विराट पुरुष द्वारा विचलित किए जाने पर जीवनी शक्ति ( प्राण ) ने भूख तथा प्यास कोउत्पन्न किया और जब विराट पुरुष ने पीने तथा खाने की इच्छा की तो मुँह खुल गया।
मुखतस्तालु निर्भिन्नं जिह्ना तत्रोपजायते ।
ततो नाना-रसो जज्ने जिहयया योउधिगम्यते ॥
१८॥
मुखतः:--मुख से; तालु--तालू; निर्भिन्नम्ू--उत्पन्न; जिह्वा--जीभ; तत्र--तत्पश्चात्; उपजायते--प्रगट होती है; ततः--तत्पश्चात्;नाना-रसः--अनेक स्वाद; जज्ञे--प्रकट हुए; जिहृया--जी भ से; यः--जो; अधिगम्यते--आस्वादित होते हैं।
मुख से तालू प्रकट हुआ और फिर जीभ भी उत्पन्न हुईं।
इन सबके बाद विविध स्वादों कीउत्पत्ति हुई जिससे जीभ उनका स्वाद ले सके।
विवज्षोर्मुखतो भूम्नो वहिर्वाग् व्याहतं तयो: ।
जले चैतस्य सुचिरं निरोध: समजायत ॥
१९॥
विवक्षो:--जब बोलने की आवश्यकता हुईं; मुखतः --मुख से; भूम्न:--परमे श्वर की; वह्विः-- अग्नि या अग्निदेव; वाक्--शब्द; व्याहतम्--वाणी; तयो: --दोनों के द्वारा; जले--जल में; च--फिर भी; एतस्य--इन सबका; सुचिरम्--दीर्घ काल तक;निरोध:--अवरोध; समजायत--बना रहा।
जब परम पुरुष की बोलने की इच्छा हुईं तो उनके मुख से वाणी गूँजी।
फिर मुख सेअधिष्ठाता देव अग्नि की उत्पत्ति हुईं।
किन्तु जब वे जल में शयन कर रहे थे तो ये सारे कार्य बन्दपड़े थे।
नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति ।
तत्र वायुर्गन््ध-वहो पघ्राणो नसि जिघृक्षतः ॥
२०॥
नासिके--नथुनों में; निरभिद्येतामू--विकसित होकर; दोधूयति--तेजी से निकलती हुई; नभस्वति-- श्वास; तत्र--तत्पश्चात्;वायु:--वायु; गन्ध-वह: --सुगन्धि; प्राण:--घ्राण शक्ति; नसि--नाक में; जिघृक्षतः--सुगन्ध सूँघने की इच्छा करते हुए।
तत्पश्चात् जब परम पुरुष को सुगन्धि सूँघने की इच्छा हुई तो नथुने तथा श्वास, प्राणेन्द्रियतथा सुगन्धियों की उत्पत्ति हुई और सुंगधि को वहन करने वाली वायु के अधिष्ठाता देव भी प्रकट हुए।
यदात्मनि निरालोकमात्मानं च दिदृक्षत: ।
निर्भिन्ने हक्षिणी तस्य ज्योतिश्नश्षुर्गुण-ग्रह: ॥
२१॥
यदा--जब; आत्मनि--अपने को; निरालोकम्--बिना प्रकाश के; आत्मानम्--अपना दिव्य शरीर; च--अन्य शारीरिक रूपभी; दिदृक्षतः--देखने की इच्छा की; निर्भिन्ने--प्रगट होने से; हि--क्योंकि; अक्षिणी-- आँखों के; तस्य--उसका; ज्योति: --सूर्य; चक्षु:--आँखें; गुण-ग्रह:--देखने की शक्ति ।
इस प्रकार जब सारी वस्तुएँ अन्धकार में विद्यमान थीं तो भगवान् की अपने आपको तथाजो कुछ उन्होंने रचा था, उन सबको देखने की इच्छा हुई।
तब आँखें, प्रकाशमान सूर्यदेव, देखनेकी शक्ति तथा दिखने वाली वस्तु--ये सभी प्रकट हुईं।
बोध्यमानस्य ऋषिभिरात्मनस्तजिधृक्षत: ।
कर्णों च निरभिद्येतां दिशः श्रोत्रं गुण-ग्रह: ॥
२२॥
बोध्यमानस्य--जानने की इच्छा से; ऋषिभि: --ऋषियों द्वारा; आत्मन: --परमे श्रर का; तत्--वह; जिधघृक्षतः --ग्रहण करने कीइच्छा होने पर; कर्णौ--दो कान; च-- भी; निरभिद्येतामू--प्रकट हुए; दिश: --दिशा अथवा वायु देवता; श्रोत्रमू--सुनने कीशक्ति; गुण-ग्रह:ः--तथा सुनने की वस्तुएँ।
महान् ऋषियों द्वारा जानने की इच्छा विकसित होने से कान, सुनने की शक्ति, सुनने केअधिष्ठाता देव तथा सुनने की वस्तुएँ प्रकट हुईं।
ऋषिगण आत्मा के विषय में सुनना चाह रहे थे।
वस्तुनो मृदु-काठिन्य-लघु-गुर्वोष्ण-शीतताम् ।
जिधृक्षतस्त्वड़्ः निर्भिन्ना तस्यां रोम-मही-रुहाः ।
तत्र चान्तर्बहिर्वातस्त्वचा लब्ध-गुणो वृतः ॥
२३॥
वस्तुन:--समस्त पदार्थ की; मृदु--कोमलता; काठिन्य--कठोरता; लघु--हल्कापन; गुरु-- भारीपन; ओष्ण --उष्णता;शीतताम्--शीतलता; जिधृक्षत:ः --देखने की इच्छा से; त्वक्--स्पर्श; निर्भिन्ना--वितरित; तस्याम्-त्वचा में; रोम--रोएँ;मही-रुहाः:--तथा वृक्ष, अधिष्ठाता देव; तत्र-- वहाँ; च-- भी; अन्तः-- भीतर; बहिः--बाहर; वात: त्वचा--स्पर्श इन्द्रिय याचमड़ी; लब्ध--देखकर; गुण: --स्पर्शेन्द्रिय का विषय; वृतः--उत्पन्न ।
जब पदार्थ के भौतिक गुणों--यथा कोमलता, कठोरता, उष्णता, शीतलता, हल्कापन तथाभारीपन--को देखने की इच्छा हुई तो अनुभूति की पृष्ठभूमि त्वचा, त्वचा के छिद्र, रोम तथाउनके अधिष्ठाता देवों ( वृक्षों ) की उत्पत्ति हुईं।
त्वचा के भीतर तथा बाहर वायु की खोल है,जिसके माध्यम से स्पर्श का अनुभव होने लगा।
हस्तौ रुरुहतुस्तस्य नाना-कर्म-चिकीर्षया ।
तयोस्तु बलवानिन्द्र आदानमुभयाश्रयम् ॥
२४॥
हस्तौ--दो हाथ; रुरुहतु:--प्रकट हुए; तस्य--उसके; नाना--विविध; कर्म--कर्म ; चिकीर्षया--इच्छा से; तयो: --उनका;तु-किन्तु; बलवान्-शक्ति देने के लिये; इन्द्र:--स्वर्ग का देवता; आदानम्ू--हाथ के कार्य; उभय-आश्रयम्--देवता तथाहाथ दोनों पर आश्रित।
तत्पश्चात् जब परम पुरुष को नाना प्रकार के कार्य करने की इच्छा हुई तो दो हाथ तथाउनकी नियामक शक्ति एवं स्वर्ग के देवता इन्द्र के साथ ही दोनों हाथों तथा देवता पर आश्रितकार्य भी प्रकट हुए।
गति जिगीषतः पादौ रुरुह्मतेईडभिकामिकाम् ।
पदभ्यां यज्ञ: स्वयं हव्यं कर्मभि: क्रियते नृभि: ॥
२५॥
गतिमू--चाल; जिगीषत:ः--इच्छा करने पर; पादौ--दो पाँव; रुरुहाते-- प्रकट होकर; अभिकामिकाम्--सार्थक ; पद्भ्याम्--पाँवों से; यज्ञ:-- भगवान् विष्णु; स्वयम्--स्वयं; हव्यम्--कर्तव्य; कर्मभि:ः--अपने कर्म से; क्रियते--कराता है; नृभि:--विभिन्न मनुष्यों द्वारा
तत्पश्चात् गति ( इधर उधर चलना ) को नियन्त्रित करने की इच्छा से उनकी टाँगें प्रकट हुईंऔर टाँगों से उनके अधिष्ठाता देव विष्णु की उत्पत्ति हुई।
इस कार्य की स्वयं विष्णु द्वारा निगरानीकरने से सभी प्रकार के मनुष्य अपने-अपने निर्धारित यज्ञों ( कार्यों ) में संलग्न हैं।
निरभिद्यत शिश्नो वै प्रजानन्दामृतार्थिन: ।
उपस्थ आसीतू कामानां प्रियं तदुभयाश्रयम् ॥
२६॥
निरभिद्यत--बाहर आया; शिश्न:--पुरुष का लिंग; वै--निश्चय ही; प्रजा-आनन्द--काम-रस; अमृत-अर्थिन:--अमृत कोचखने की इच्छा रखने वाला; उपस्थ:--जननेन्द्रियाँ; आसीत्--संसार में आई; कामानाम्--विषय सुख का; प्रियम्-- अत्यन्तप्रिय; तत्ू--वह; उभय-आश्रयमू--दोनों का आश्रय।
तत्पश्चात् काम-सुख, सनन््तानोत्पत्ति तथा स्वर्गिक अमृत सुख के आस्वादन के लिए भगवान्ने जननेन्द्रियाँ उत्पन्न कीं।
इस प्रकार जननेन्द्रिय तथा उसके अधिष्ठाता देव प्रजापति उत्पन्न हुए।
काम-सुख की वस्तु तथा अधिष्ठाता देव भगवान् की जननेन्द्रियों के अधीन रहते हैं।
उत्सिसुक्षोर्धातु-मलं निरभिद्यत वै गुदम् ।
ततः पायुस्ततो मित्र उत्सर्ग उभयाश्रय: ॥
२७॥
उत्सिसृक्षो;--मल त्याग की इच्छा से; धातु-मलम्--खाद्य पदार्थों का मल; निरभिद्यत--प्रकट हुआ; बै--निश्चय ही; गुदम्--गुदा द्वार; ततः--तत्पश्चात्; पायु;:--विसर्जन इन्द्रिय; तत:--तत्पश्चात्; मित्र:-- अधिष्ठाता देवता; उत्सर्ग:--बाहर निकलने वालीवस्तु; उभय--दोनों; आश्रय: --शरण ।
तत्पश्चात् जब उन्हें खाये हुए भोजन के मल त्याग की इच्छा हुई तो गुदा द्वार और फिर पायु-इन्द्रिय और उनके अधिष्ठातादेव मित्र विकसित हुए।
पायु इन्द्रिय तथा उत्सर्जित पदार्थ ये दोनोंअधिष्ठाता देव के आश्रय में रहते हैं।
आसिसूप्सो: पुर: पुर्या नाभि-द्वारमपानतः ।
तत्रापानस्ततो मृत्यु: पृथक्त्वमुभयाश्रयम् ॥
२८ ॥
आसिसृप्सो: --सर्वत्र जाने की इच्छा से; पुरः--विभिन्न शरीरों में; पुर्या:--एक शरीर से; नाभि-द्वारम्--उदर के छिद्र या नाभि;अपानतः--प्रकट हुआ; तत्र--तत्पश्चात्; अपान: --प्राण का रुकना; तत:--तत्पश्चात्; मृत्यु:--मृत्यु; पृथक्त्वम्--पृथक् रूपसे; उभय--दोनों; आश्रयम्--शरण |
तत्पश्चात् जब उन्हें एक शरीर से दूसरे में जाने की इच्छा हुईं तो नाभि तथा अपानवायु एवंमृत्यु की एकसाथ सृष्टि हुई।
मृत्यु तथा अपानवायु दोनों का ही आश्रय नाभि है।
आदित्सोरन्न-पानानामासन् कुक्ष्यनत्र-नाडय: ॥
नद्यः समुद्राश्च॒ तयोस्तुष्टि: पुष्टिस्तदाभ्रये ॥
२९॥
आदित्सो:-- प्राप्त करने की इच्छा; अन्न-पानानामू-- भोजन तथा जल का; आसनू--हुई; कुक्षि--उदर; अन्त्र-- आँतें;नाडय:--तथा धमनियाँ; नद्यः--नदियाँ; समुद्रा:ः--समुद्र; च-- भी; तयो:--उन दोनों का; तुष्टिः--पोषण पालन; पुष्टिः--उपापचय ( रस प्रक्रिया ); ततू--उनका; आश्रये--स्रोत |
जब भोजन तथा जल लेने की इच्छा हुई तो उदर, आँतें तथा धमनियाँ प्रकट हुईं।
नदियाँतथा समुद्र इनके पोषण तथा उपापचय के स्त्रोत हैं।
निदिध्यासोरात्म-मायां हृदयं निरभिद्यत ।
ततो मनश्चन्द्र इति सल्डुल्प: काम एव च ॥
३०॥
निदिध्यासो: --जानने का इच्छुक; आत्म-मायाम्--अपनी शक्ति को; हृदयम्--मन का स्थान; निरभिद्यत--प्रकट हुआ; तत:--तत्पश्चात्: मनः--मन; चन्द्रः--मन का अधिष्ठाता देव, चन्द्रमा; इति--इस प्रकार; सड्जूल्प:--ह॒ढ़ निश्चय; काम:--इच्छा; एब--भी; च--भी ।
जब उन्हें अपनी शक्ति के कार्यकलापों के विषय में सोचने की इच्छा हुई तो हृदय ( मन कास्थान ), मन, चन्द्रमा, संकल्प तथा सारी इच्छा का उदय हुआ।
त्वक्र्म-मांस-रुधिर-मेदो -मज्जास्थि-धातव: ।
भूम्यप्तेजोमया: सप्त प्राणो व्योमाम्बु-वायुभि: ॥
३१॥
त्वक््--चमड़ी के ऊपर पतली परत; चर्म--चमड़ी; मांस--मांस; रुधिर--रक्त; मेद: --चर्बी; मज्जा--मज्जा; अस्थि-हड्डी;धातव:--तत्त्व; भूमि-- पृथ्वी; अपू--जल; तेज:--अग्नि; मया:--प्रधानतः; सप्त--सात; प्राण:-- ध्वास; व्योम-- आकाश;अम्बु--जल; वायुभि:--वायु से ।
त्वचा, चर्म, मांस, रक्त, मेदा, मज्जा तथा अस्थि--शरीर के ये सात तत्त्व पृथ्वी, जल तथाअग्नि से बने हैं जबकि प्राण की उत्पत्ति आकाश, जल तथा वायु से हुई है।
गुणात्मकानीन्द्रियाणि भूतादि-प्रभवा गुणा: ।
मनः सर्व-विकारात्मा बुद्धिर्विज्ञा-रूपिणी ॥
३२॥
गुण-आत्मकानि--गुणों से लिप्त; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; भूत-आदि--अहंकार; प्रभवा:--से प्रभावित; गुणा: --प्राकृतिकगुण; मनः--मन; सर्व--समस्त; विकार--तनाव ( सुख तथा दुख ); आत्मा--रूप; बुदर्द्धिः--बुद्धि; विज्ञान--तर्क-वितर्क;रूपिणी--के रूप वाली।
इन्द्रियाँ प्रकृत्ति के गुणों से जुड़ी होती हैं और भौतिक प्रकृति के ये गुण मिथ्या अहंकार सेजनित हैं।
मन पर समस्त प्रकार के भौतिक अनुभवों ( सुख-दुख ) का प्रभाव पड़ता है औरबुद्धि मन के तर्क-वितर्क स्वरूप है।
एतद्धगवतो रूपं स्थूलं ते व्याहतं मया ।
महाादिभिश्चावरणैरष्टभिर्बहिरावृतम् ॥
३३॥
एतत्--ये सब; भगवत:--भगवान् के; रूपम्--रूप; स्थूलम्--स्थूल; ते-- तुमको; व्याहतम्--बतलाया गया; मया--मेरेद्वारा; मही--लोक; आदिभि:--इत्यादि; च--निरन्तर; अवरणै:ः --आवरणों से; अष्टभिः--आठ; बहि:ः--बाह्ाय; आवृतम्--ढका हुआ
इस तरह भगवान् का बाह्य रूप अन्य लोकों की ही तरह स्थूल रूपों से घिरा हुआ है,जिनका वर्णन मैं तुमसे पहले ही कर चुका हूँ।
अतः परं सूक्ष्मतममव्यक्त निर्विशेषणम् ।
अनादि-मध्य-निधनं नित्यं वाइमनस: परम् ॥
३४॥
अतः--अतः ; परम्ू--दिव्य; सूक्ष्मतमम्--सूक्ष्म से भी सूक्ष्म; अव्यक्तम्ू--अप्रकट; निर्विशेषणम्--बिना भौतिक रूप के;अनादि--आदिरहित; मध्य--माध्यमिक अवस्था के बिना; निधनम्--अन्तरहित; नित्यम्ू--शा श्रत; वाक्--शब्द; मनस: --मनका; परम्-दिव्य |
अतः इस ( स्थूल संसार ) से परे दिव्य संसार है, जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्मतर है।
न तो इसकाआदि है, न मध्य और न अन्त, अतः यह व्याख्या अथवा चिन्तन की सीमाओं के परे है औरभौतिक बोध से भिन्न है।
अमुनी भगवद्रूपे मया ते हानुवर्णिते ।
उभे अपि न गृह्नन्ति माया-सूष्टे विपश्चित: ॥
३५॥
अमुनी--ये सब; भगवत्-- श्रीभगवान् को; रूपे--रूपों में; मया--मेरे द्वारा; ते--तुमको; हि--निश्चय ही; अनुवर्णिते --क्रमशः वर्णित; उभे--दोनों; अपि-- भी; न--कभी नहीं; गृहन्ति-- स्वीकार करता है; माया--बाह्य; सृष्ट--इस प्रकार से प्रकटहोकर; विप:-चित:--जानने वाला विद्वान।
मैंने तुमसे भौतिक दृष्टिकोण से भगवान् के जिन दो रूपों का ऊपर वर्णन किया है, उनमें सेकोई भी भगवान् को जानने वाले शुद्ध भक्तों द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता।
स वाच्य-वाचकतया भगवान् ब्रह्म-रूप-धृक् ।
नाम-रूप-क्रिया धत्ते सकर्माकर्मकः परः ॥
३६॥
सः--वह; वाच्य--अपने रूपों तथा कार्यो से; वाचकतया--अपने दिव्य गुणों एवं परिवेश से; भगवान्-- भगवान्; ब्रह्म --परम; रूप-धृक्ू--हृश्य रूपों को ग्रहण करके; नाम--नाम; रूप--रूप, आकार; क्रिया--लीलाएँ; धत्ते--स्वीकार करता है;स-कर्म--कार्य में संलग्न; अकर्मक:--प्रभावित हुए बिना; पर: --दिव्यातीत |
अपने दिव्य नाम, गुण, लीलाओं, परिवेश तथा विभिन्नताओं के कारण भगवान् अपनेआपको दिव्य रूप में प्रकट करते हैं।
यद्यपि इन समस्त कार्यकलापों का उन पर कोई प्रभावनहीं पड़ता, किन्तु वे व्यस्त से प्रतीत होते हैं।
प्रजा-पतीन्मनून् देवानृषीन् पितृ-गणान् पृथक् ।
सिद्ध-चारण-गन्धर्वान् विद्याक्चासुर-गुह्मकान् ॥
३७॥
किन्नराप्सरसो नागान् सर्पान् किम्पुरुषान्नरान् ।
मातृ रक्ष:-पिशाचां श्र प्रेत-भूत-विनायकान् ॥
३८ ॥
कृष्माण्डोन्माद-वेतालान् यातुधानान् ग्रहानपि ।
खगान्मृगान् पशून् वृक्षान् गिरीन्रुप सरीसृपान् ॥
३९॥
द्वि-विधाश्चतुर्विधा येउन्ये जल-स्थल-नभौकस: ।
कुशलाकुशला मिश्रा: कर्मणां गतयस्त्विमा: ॥
४०॥
प्रजा-पतीन्--ब्रह्मा तथा उनके पुत्र, यथा दक्ष इत्यादि; मनून्ू--वैवस्वत मनु जैसे समय-समय पर होने वाले प्रधान; देवान्--यथा इन्द्र, चन्द्र तथा वरुण; ऋषीन्--यथा भूगु तथा वसिष्ठ; पितृ-गणान्ू--पितर लोक के निवासी; पृथक्--अलग से;सिद्ध--सिद्ध लोक के वासी; चारण--चारण लोक के वासी; गन्धर्वान--गन्धर्व लोक के प्राणी; विद्याश्र--विद्याधर लोक केवासी; असुर--नास्तिक लोग; गुह्मकान्ू--यक्ष लोक के वासी; किन्नर--किन्नर लोक के वासी; अप्सरस:ः--अप्सरा लोक कीसुन्दरियाँ; नागान्ू--नागलोक के नागतुल्य वासी; सर्पानू--सर्प-लोक के वासी; किम्पुरुषानू--किम्पुरुष लोक के बन्दर जैसेवासी; नरान्--पृथ्वी के वासी; मातृ-मातृ लोक के वासी; रक्ष:--राक्षसी लोक के वासी; पिशाचानू--पिशाच लोक केवासी; च--भी; प्रेत--प्रेत लोक के वासी; भूत-- भूत आत्माएँ; विनायकान्--पिशाच, विनायक; कृष्माण्ड--मायाजाल;उन्माद--पागल; वेतालान्ू--वेताल, जिन्न; यातुधानान्-- भूत विशेष; ग्रहान्ू--शुभ तथा अशुभ नक्षत्र; अपि-- भी; खगान्--पक्षी; मृगानू--जंगली पशु; पशून्-घरेलू पशु; वृक्षान्-- भूत; गिरीन्ू--पर्वत; नृप--हे राजन; सरीसूपान्ू--रेंगने वाले जीव;वि-विधा:--जड़ तथा चेतन प्राणी; चतुः-विधा:-- भ्रूण, अंड, स्वेदज तथा बीज से उत्पन्न चार प्रकार के प्राणी; ये-- अन्य;अन्ये--समस्त; जल--पानी; स्थल-- भूमि; नभ-ओकस: -- पक्षी; कुशल--सुखी; अकुशला:--दुखी ; मिश्रा: -- सुखी -दुखीदोनों; कर्मणाम्--अपने पूर्व कर्मों के अनुसार; गतय:--गति, फल; तु--लेकिन; इमा:--वे सब।
हे राजन, मुझसे यह जान लो कि सभी जीवात्माएँ अपने विपत कर्मों के अनुसार परमेश्वरद्वारा उत्पन्न किए जाते हैं।
इसमें ब्रह्मा तथा उनके दक्ष जैसे पुत्र, वैवस्वत मनु जैसे सामयिकप्रधान, इन्द्र, चन्द्र तथा वरुण जैसे देवता, भूगु, व्यास, वसिष्ठ जैसे महर्षि, पितूलोक तथासिद्धलोक के वासी, चारण, गन्धर्व, विद्याधर, असुर, यक्ष, किन्नर तथा देवदूत, नाग, बन्दर जैसेकिम्पुरुष, मनुष्य, मातृलोक के वासी, असुर, पिशाच, भूत-प्रेत, उन््मादी, शुभ-अशुभ नक्षत्र,विनायक, जंगली पशु, पक्षी, घरेलू पशु, सरीसूप, पर्वत, जड़ तथा चेतन जीव, जरायुज,अण्डज, स्वेदज तथा उदिभज जीव तथा अन्य समस्त जल, स्थल या आकाश के सुखी, दुखीअथवा मिश्रित सुखी-दुखी जीव सम्मिलित हैं।
ये सभी अपने पूर्व कर्मों के अनुसार परमेश्वर द्वारासृजित होते हैं।
सत्त्वं रजस्तम इति तिस्त्र: सुर-नृ-नारका: ।
तत्राप्यकेकशो राजन् भिद्यन्ते गतयस्त्रिधा ।
यदैकैकतरो<न्याभ्यां स्व-भाव उपहन्यते ॥
४१॥
सत्त्वमू--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम:ः--तमोगुण; इति--इस प्रकार; तिस्त्रः--तीन; सुर--देवता; नृ--मनुष्य; नारका:--नारकीय अवस्था में पड़ा हुआ; तत्र अपि--वहाँ भी; एकैकशः--दूसरा; राजन्--हे राजा; भिद्यन्ते--में बाँट देते हैं; गतय: --गतियाँ; त्रिधा--तीन; यदा--उस समय, जब; एकैकतरः--एक दूसरे के प्रति; अन्याभ्याम्--दूसरे से; स्व-भाव:--स्वभाव,आदत; उपहन्यते--प्राप्त करता है।
प्रकृति के विभिन्न गुण--सतो गुण, रजो गुण तथा तमो गुणों--के अनुसार विभिन्न प्रकारके प्राणी होते हैं, जो देवता, मनुष्य तथा नारकीय जीव कहलाते हैं।
हे राजन्, यही नहीं, जबकोई एक गुण अन्य दो गुणों से मिलता है, तो वह तीन में विभक्त होता है और इस प्रकार प्रत्येकप्राणी अन्य गुणों से प्रभावित होता है और उसकी आदतों को अर्जित कर लेता है।
स एवेदं जगद्धाता भगवान् धर्म-रूप-धृक् ।
पुष्णाति स्थापयन् विश्व॑ तिर्यडनर-सुरादिभि: ॥
४२॥
सः--वह; एव--निश्चय ही; इृदम्--यह; जगत्ू-धाता--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालक; भगवानू-- भगवान्; धर्म-रूप-धृक् -- धर्मका रूप धारण करते हुए; पुष्णाति--पालन करता है; स्थापयन्--स्थापित करने के पश्चात्; विश्वम्-ब्रह्माण्ड को; तिर्यक्--मनुष्य से निम्न श्रेणी के जीव; नर--मनुष्य; सुर-आदिभि:--देवता रुप से ।
वे भगवान् ब्रह्माण्ड में सबके पालक रूप में सृष्टि की स्थापना करके विभिन्न अवतारों मेंप्रकट होते हैं और मनुष्यों, अमानवों तथा देवताओं में से समस्त बद्धजीवों का उद्धार करते हैं।
ततः कालाग्नि-रुद्रात्मा यत्सृष्टमिदमात्मन: ।
सन्नियच्छति तत् काले घनानीकमिवानिल: ॥
४३॥
ततः--तत्पश्चात्, अन्त में; काल--विनाश, मृत्यु; अग्नि--आग; रुद्र-आत्मा--रुद्र रूप में; यत्ू--जो भी; सूृष्टम्--उत्पन्न;इदम्--ये सब; आत्मन:--अपने आप; सम्--पूर्णतया; नियच्छति--संहार करता है; तत् काले--युग ( कल्प ) के अन्त में;घन-अनीकम्--बादलों का समूह; इब--सहृश; अनिल:--वायु।
तत्पश्चात् युग के अन्त में भगवान् स्वयं संहारकर्ता रुद्र-रूप में सम्पूर्ण सृष्टि का उसी तरहसंहार करेंगे जिस प्रकार वायु बादलों को हटा देती है।
इत्थम्भावेन कथितो भगवान् भगवत्तम: ।
नेत्थम्भावेन हि परं द्रष्टमरहन्ति सूरय: ॥
४४॥
इत्थम्ू--इन रूपों में; भावेन--सृष्टि तथा संहार का विचार; कथित:--कहा गया; भगवानू्-- भगवान्; भगवत्-तमः --महान्तत्त्वज्ञानियों द्वारा; न--नहीं; इत्थम्--इसमें; भावेन--स्वरूप; हि--केवल; परम्--अत्यन्त महिमावान; द्रष्टमू-देखने के लिए;अहईन्ति--योग्य होते हैं; सूरयः--परम भक्त |
बड़े-बड़े तत्त्वज्ञानी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के कार्यकलापों का ऐसा ही वर्णन करते हैं,किन्तु शुद्ध भक्त भावातीत दशा में ऐसे रूपों से भी बढ़कर महिमामय वस्तुएँ देखने केअधिकारी होते हैं।
नास्य कर्मणि जन्मादौ परस्यानुविधीयते ।
कर्तृत्व-प्रतिषेधार्थ माययारोपितं हि तत् ॥
४५॥
न--कभी नहीं; अस्य--इस सृष्टि के; कर्मणि--कार्य में; जन्म-आदौ--सृष्टि तथा संहार; परस्य--परमेश्वर का; अनुविधीयते--इस प्रकार वर्णित है; कर्तृत्व--कौशल; प्रतिषेध-अर्थम्--निषेध करने के लिए; मायया--बहिरंगा शक्ति द्वारा; आरोपितमू--प्रकट होता है; हि-- क्योंकि; तत्ू--स्त्रष्टा
भौतिक जगत की सृष्टि तथा संहार के लिए भगवान् के द्वारा किसी प्रकार का प्रत्यक्षकौशल नहीं किया जाता।
उनके प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के विषय में वेदों में जो कुछ वर्णित है, वहकेवल इस विचार का निराकरण करने के लिए है कि भौतिक प्रकृति ही स्त्रष्टा है।
अयं तु ब्रह्मण: कल्प: सविकल्प उदाहत: ।
विधि: साधारणो यत्र सर्गा: प्राकृत-वैकृता: ॥
४६॥
अयम्--सृष्टि तथा संहार की यह क्रिया; तु--लेकिन; ब्रह्मण:--ब्रह्मा का; कल्प: --ब्रह्म का एक दिन; स-विकल्प:--ब्रह्माण्डों की अवधि समेत; उदाहतः --उदाहरण के रूप में; विधि:--विधि-विधान; साधारण: --संक्षेप में; यत्र--जिसमें;सर्गा:--सृष्टि; प्राकृत-- प्रकृति के विषय में; बैकृताः--विनियोग, व्यय |
यहाँ पर सारांश रुप में वर्णित सृष्टि तथा संहार का यह प्रक्रम ब्रह्म के एक दिन ( कल्प ) केलिए विधि-विधान स्वरूप है।
यही महत्-सृष्टि का भी नियामक-विधान है, जिसमें प्रकृतिविसर्जित हो जाती है।
परिमाणं च कालस्य कल्प-लक्षण-विग्रहम् ।
यथा पुरस्ताद्व्याख्यास्थे पाद्यं कल्पमथो श्रूणु ॥
४७॥
परिमाणम्--माप; च--भी; कालस्य--समय की; कल्प--ब्रह्मा का एक दिन; लक्षण--लक्षण; विग्रहम्--रूप; यथा--जिसतरह; पुरस्तात्ू--इसके बाद; व्याख्यास्ये--बताया जाएगा; पाद्मम्ू--पादा नाम से; कल्पम्--एक दिन की अवधि; अथो--इसतरह; श्रुणु--सुनो |
हे राजनू, आगे चलकर मैं काल के स्थूल तथा सूक्ष्म रूपों की माप का उनके विशिष्टलक्षणों सहित वर्णन करूँगा, किन्तु इस समय मैं तुमसे पाद्म कल्प के विषय में कहना चाहताहू।
शौनक उवाचयदाह नो भवान् सूत क्षत्ता भागवतोत्तम: ।
अचार तीर्थानि भुवस्त्यक्त्वा बन्धून् सुदुस्त्यजान् ॥
४८॥
शौनकः उवाच-- श्री शौनक मुनि ने कहा; यत्--जैसा; आह--आपने कहा; नः--हमको; भवान्--आप; सूत--हे सूत;क्षत्ता--विदुर; भागवत-उत्तम:-- भगवान् का श्रेष्ठ भक्त; चचार--अभ्यास किया; तीर्थानि--तीर्थ स्थानों; भुव:--पृथ्वी पर;त्यक्त्वा-- त्याग कर; बन्धून्--सम्बन्धियों को; सु-दुस्त्यजान्-- त्याग कर पाना अत्यन्त कठिन।
सृष्टि के विषय में यह सब सुनने के बाद शौनक ऋषि ने सूत गोस्वामी से विदुर के विषय मेंपूछा, क्योंकि सूत गोस्वामी ने पहले ही उन्हें बता रखा था कि विदुर ने किस प्रकार अपने उनपरिजनों को छोड़कर गृहत्याग किया था जिनको छोड़ पाना बहुत दुष्कर होता है।
क्षत्तु: कौशारवेस्तस्य संवादोध्यात्म-संभ्रित: ।
यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह ॥
४९॥
ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् ।
बन्धु-त्याग-निमित्तं च यथेवागतवान् पुनः ॥
५०॥
क्षत्तु:--विदुर की; कौशारवे:--मैत्रेय की; तस्थ--उनका; संवाद:--समाचार; अध्यात्म--दिव्य ज्ञान के विषय; संश्रित:--सेपूरित; यत्ू--जो; वा--अन्य कुछ; सः--वह; भगवान्-- भगवान्; तस्मै-- उससे; पृष्ट:--पूछा; तत्त्वम्--सत्य; उवाच--उत्तरदिया; ह--पुराकाल में; ब्रृहि--कृपया कहें; नः--हमसे; तत्--वे विषय; इृदम्--यहाँ; सौम्य--हे सौम्य; विदुरस्थ--विदुरका; विचेष्टितम्--कार्यकलाप; बन्धु-त्याग--मित्रों के परित्याग का; निमित्तमू--कारण; च-- भी; यथा--जिस प्रकार; एव--भी; आगतवान्--( घर ) वापस आया; पुन:ः--फिर से |
शौनक ऋषि ने कहा--आप हमें बताएँ कि विदुर तथा मैत्रेय के बीच अध्यात्म पर चर्चाहुईं, विदुर ने क्या पूछा और मैत्रेय ने क्या उत्तर दिया था।
कृपा करके हमें यह भी बताएँ किविदुर ने अपने कुट॒ुम्बियों को क्यों छोड़ा था और वे पुनः घर क्यों लौट आये ? तीर्थस्थानों कीयात्रा के समय उन्होंने जो कार्य किये उन्हें भी बतलाएँ।
सूत उवाचराज्ञा परीक्षिता पृष्टो यदवोचन्महा-मुनि: ।
तद्बोभिधास्ये श्रुणुत राज्ञ: प्रश्नानुसारत: ॥
५१॥
सूतः उवाच-- श्रीसूत गोस्वामी ने उत्तर दिया; राज्ञा--राजा; परीक्षिता--परीक्षित द्वारा; पृष्ठ: --पूछे जाने पर; यत्--जो;अवोचत्--कहा; महा-मुनि:--महा-मुनि ने; तत्--वही बात; वः--तुमको; अभिधास्ये--मैं बताऊँगा; श्रुणुत--कृपया सुनें;राज्ञः--राजा द्वारा; प्रश्न--सवाल; अनुसारत: --के अनुसार।
श्रीसूत गोस्वामी ने बताया--अब मैं तुम्हें वे सारे विषय बताऊँगा जिन्हें राजा परीक्षित केद्वारा पूछे जाने पर महा-मुनि ने उनसे कहा था।
कृपया उन्हें ध्यानपूर्वक सुनो।
