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अध्याय नौ: प्रभु के संस्करण का हवाला देकर उत्तर

2.9श्री -शुक उवाचआत्म-मायामृते राजन्‌ परस्यानुभवात्मन: ।

न घटेतार्थ-सम्बन्ध: स्वप्न-द्रष्टरेवाज्लसा ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; आत्म--भगवान्‌; मायाम्‌--शक्ति; ऋते--बिना; राजनू--हे राजा; परस्थ--शुद्ध आत्मा का; अनुभव-आत्मन:--विशुद्ध रूप से चेतन का; न--कभी नहीं; घटेत--इस प्रकार घटित होता है; अर्थ--अभिप्राय; सम्बन्ध:--भौतिक शरीर के साथ सम्बन्ध; स्वप्न--सपना; द्रष्टः--देखने वाले का; इब--सहृश; अद्धसा--पूर्णतः |

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा--हे राजन्‌, जब तक मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ की शक्तिसे प्रभावित नहीं होता तब तक भौतिक शरीर के साथ शुद्ध चेतना में शुद्ध आत्मा के सम्बन्धकोई अर्थ नहीं होता।

ऐसा सम्बन्ध स्वप्न देखने वाले द्वारा अपने ही शरीर को कार्य करते हुएदेखने के समान है।

बहु-रूप इवाभाति मायया बहु-रूपया ।

रममाणो गुणेष्वस्था ममाहमिति मन्‍्यते ॥

२॥

बहु-रूप:--विविधरूप वाली; इब--मानो; आभाति-- प्रकट होती है; मायया--बहिरंगा शक्ति के प्रभाव से; बहु-रूपया--विविध रूपों में; रममाण: --मानो रमण ( भोग ) कर रहा हो; गुणेषु--विभिन्न गुणों में; अस्या: --बहिरंगा शक्ति का; मम--मेरा; अहम्‌--मैं; इति--इस प्रकार; मन्यते--सोचता है।

मोहग्रस्त जीवात्मा भगवान्‌ की बहिरंगा शक्ति के द्वारा प्रदत्त अनेक रूप धारण करता है।

जब बद्ध जीवात्मा भौतिक प्रकृति के गुणों में रम जाता है, तो वह भूल से सोचने लगता है कियह 'मैं हूँ' और यह 'मेरा ' है।

यहिं वाव महिम्नि स्वे परस्मिन्‌ काल-माययो: ।

रमेत गत-सम्मोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम्‌ ॥

३॥

यहि--किसी समय; वाव--निश्चय ही; महिम्नि--महिमा में; स्वे-- अपने आप का; परस्मिनू--परमेश्वर में; काल--समय;माययो:-- भौतिक शक्ति ( माया ) का; रमेत-- भोग करता है; गत-सम्मोहः -- भ्रान्त धारणा ( सम्मोह ) से मुक्त होकर;त्यक्त्वा--त्याग कर; उदास्ते-- पूर्णतः; तदा--तब; उभयम्‌--दोनों ( मैं तथा मेरे की भ्रान्त धारणा )।

जैसे ही जीवात्मा अपनी स्वाभाविक महिमा में स्थित हो जाता है और काल तथा माया सेगुणातीत हो जाता है, वैसे ही वह जीवन की दोनों भ्रान्त धारणाओं ( मैं तथा मेरा ) को त्याग देताहै और शुद्ध आत्मस्वरूप में प्रकट हो जाता है।

आत्म-तत्त्व-विशुद्धदर्थ यदाह भगवानृतम्‌ ।

ब्रह्मणे दर्शयन्‌ रूपमव्यलीक-ब्रताहत: ॥

४॥

आत्म-तत्त्व--ईश्वर का ज्ञान अथवा जीवात्मा का ज्ञान; विशुद्धि--शुद्धीकरण; अर्थम्‌--लक्ष्य; यत्‌--जो; आह--कहा;भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; ऋतम्‌--सचमुच; ब्रह्मणे--ब्रह्माजी को; दर्शयन्‌ू--दिखलाकर; रूपम्‌--नित्य रूप; अव्यलीक--निष्कपट भाव से; ब्रत--संकल्प; आहत: --पूजित ॥

हे राजनू, भगवान्‌ ने ब्रह्मजी की भक्तियोग की निष्कपट तपस्या से अत्यन्त प्रसन्न होकरउनके समक्ष अपना शाश्वत दिव्य रूप प्रकट किया और बद्धजीव की शुद्धि के लिए यही परमलक्ष्य भी है।

स आदि-देवो जगतां परो गुरु:स्वधिष्ण्यमास्थाय सिसृक्षयैक्षत ।

तां नाध्यगच्छद्‌ दशमत्र सम्मतांप्रपञ्ञ-निर्माण-विधिर्यया भवेत्‌ ॥

५॥

सः--वह; आदि-देव: -- प्रथम देवता; जगताम्‌ू--ब्रह्माण्ड का; पर: --परम; गुरु:--गुरु; स्वधिष्ण्यम्‌-- अपने कमल-आसनका; आस्थाय--स्त्रोत जानने के लिए; सिसृक्षया--सांसारिक व्यापार की सृष्टि करने के लिए; ऐक्षत--सोचने लगा; तामू--उसविषय में; न--नहीं; अध्यगच्छत्‌--समझ सका; दृशम्‌--दिशा; अत्र--वहाँ; सम्मताम्‌--उचित राह; प्रपज्ञ-- भौतिक;निर्माण--रचना; विधि: --विधि, ढंग; यया--जितना कि; भवेत्‌--होना चाहिए।

प्रथम गुरु एवं ब्रह्माण्ड के सर्वश्रेष्ठ जीव होते हुए भी ब्रह्माजी अपने कमल आसन के स्त्रोतका पता न लगा सके और जब उन्होंने भौतिक जगत की सृष्टि करनी चाही तो वे यह भी न जानपाये कि किस दिशा से यह कार्य प्रारम्भ किया जाय, न ही ऐसी सृष्टि करने के लिए कोई विधिही ढूँढ पाये।

स चिन्तयन्‌ द्य॒स्‍क्षरमेकदाम्भ-स्युपाश्रुणोद्‌ द्विर्गदितं बचो विभु: ।

स्पशेषु यत्वोडशमेकविंशंनिष्किज्जनानां नृप यद्‌ धनं विदु; ॥

६॥

सः--उसने; चिन्तयन्‌--सोचते हुए; द्वि--दो; अक्षरम्‌--अक्षर; एकदा--एक बार; अम्भसि--जल में; उपाश्रुणोत्‌--पास हीसुना; द्विः--दो बार; गदितम्‌--उच्चरित; वच:--शब्द; विभुः--महान्‌; स्पर्शेषु--स्पर्शाक्षि; यत्‌--जो; घोडशम्‌--सोलहवाँ;एकविंशम्‌--तथा इक्कीसवाँ; निष्किज्लनानाम्‌--संन्यासियों का; नृप--हे राजा; यत्‌--जो हैं; धनम्‌--सम्पत्ति; विदु:--जैसाकिज्ञात है।

इस प्रकार जब जल में स्थित ब्रह्माजी सोच रहे थे तब पास ही उन्होंने परस्पर जुड़े हुए दोशब्द दो बार सुने।

इनमें से एक सोलहवाँ और दूसरा इक्कीसवाँ स्पर्श अक्षर था।

ये दोनों मिलकरविरक्त जीवन की निधि बन गए।

निशम्य तद्ठक्तृ-दिहृक्षया दिशोविलोक्य तत्रान्यदपश्यमान: ।

स्वधिष्ण्यमास्थाय विमृश्य तद््वितंतपस्युपादिष्ट इवादधे मन: ॥

७॥

निशम्य--सुनकर; तत्‌--उस; वकतृ--वक्ता; दिहक्षया--यह जानने के लिए कि कौन बोला; दिश:--सभी ओर; विलोक्य--देखकर; तत्र--वहाँ; अन्यत्‌-- अन्य कोई; अपश्यमान: --न पाकर; स्वधिष्ण्यम्‌ू--अपने कमल आसन पर; आस्थाय--बैठगये; विमृश्य--सोचकर; तत्‌--इसको; हितमू-- कल्याण; तपसि--तपस्या में; उपादिष्ट: --उसे जैसा आदेश मिला था; इब--के पालन में; आदधे--दिया; मन:-- ध्यान

जब उन्होंने वह ध्वनि सुनी तो वे ध्वनिकर्ता को चारों ओर ढूँढ़ने का प्रयत्न करने लगे।

किन्तु जब वे अपने अतिरिक्त किसी को न पा सके, तो उन्होंने कमल-आसन पर हढ़तापूर्वक बैठजाना और आदेशानुसार तपस्या करने में ध्यान देना ही श्रेयस्कर समझा।

दिव्यं सहस्त्राब्दममोघ-दर्शनोजितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रिय: ।

अतप्यत स्माखिल-लोक-तापनंतपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥

८ ॥

दिव्यम्‌--स्वर्ग के देवताओं का; सहस्त्र--एक हजार; अब्दम्‌--वर्ष; अमोघ--निर्मल, निष्कलंक; दर्शन:--ऐसी जीवन-दृष्टिवाला; जित--नियंत्रित; अनिल--प्राण; आत्मा--मन; विजित--वशीकृत; उभय--दोनों; इन्द्रिय:--इन्द्रियों वाला; अतप्यत--तपस्या की; स्म-- भूतकाल में; अखिल--समस्त; लोक--ग्रह; तापनम्‌--प्रकाशनार्थ; तप:ः--तपस्या; तपीयान्‌--अत्यन्तकठिन तप; तपताम्‌--समस्त तपस्वियों का; समाहित:--इस प्रकार स्थित |

ब्रह्मजी ने देवताओं की गणना के अनुसार एक हजार वर्षों तक तपस्या की।

उन्होंनेआकाश से यह दिव्य अनुगूँज सुनी और इसे ईश्वरीय मान लिया।

इस प्रकार उन्होंने अपनी इन्द्रियोंतथा मन को वश में किया।

उन्होंने जो तपस्या की, वह जीवात्माओं के लिए महान्‌ शिक्षा बनगई।

इस प्रकार ब्रह्मा जी तपस्वियों में महानतम माने जाते हैं।

तस्मै स्व-लोक॑ भगवान्‌ सभाजित:सन्दर्शयामास परं न यत्परम्‌ ।

व्यपेत-सड्क्लेश-विमोह-साध्वसंस्व-दृष्टवद्धिर्पुरुषैरभिष्ठृतम्‌ ॥

९॥

तस्मै--उसको; स्व-लोकम्‌-- अपना धाम; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; सभाजित:--ब्रह्मा की तपस्या से प्रसन्न होकर; सन्दर्शयाम्‌आस--प्रकट किया; परमू--सर्व श्रेष्ठ; न--नहीं; यत्‌--जिसका; परम्‌--उससे भी श्रेष्ठ; व्यपेत--पूर्ण रूप से त्यक्त;सड्क्लेश--पाँच प्रकार के भौतिक ताप; विमोह--बिना मोह; साध्वसम्‌--संसार का भय; स्व-दृष्ट-वद्धिः--जो स्वरूपसिद्ध हैंउनके द्वारा; पुरुषै:--पुरुषों द्वारा; अभिष्ठतम्‌--पूजित

श्री भगवान्‌ ने ब्रह्माजी की तपस्या से अत्यधिक प्रसन्न होकर उन्हें समस्त लोकों में श्रेष्ठ अपने निजी धाम, वैकुण्ठ लोक, को दिखलाया।

यह दिव्य लोक उन समस्त स्वरूपसिद्धव्यक्तियों द्वारा पूजित है, जो समस्त प्रकार के क्लेशों तथा सांसारिक भय से सर्वथा मुक्त हैं।

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयो:सत्त्वं च मिश्र न च काल-विक्रमः ।

न यत्र माया किमुतापरे हरे-रनुब्रता यत्र सुरासुराचिता: ॥

१०॥

प्रवर्तती--रहता है; यत्र--जहाँ पर; रज: तम:--रजो तथा तमोगुण; तयो:--उन दोनों का; सत्त्वमू--सतोगुण; च--तथा;मिश्रमू--मिश्रण; न--कभी नहीं; च--तथा; काल--समय; विक्रम:--प्रभाव; न--न तो; यत्र--जहाँ पर; माया--छलना,बहिरंगा शक्ति; किमू-- क्या; उत--वहाँ है; अपरे-- अन्य; हरेः-- भगवान्‌ के; अनुब्रता:-- भक्त; यत्र--जहाँ पर; सुर--देवताओं; असुर--तथा असुरों द्वारा; अ्चिता:--पूजित |

भगवान्‌ के उस स्वधाम में न तो रजोगुण और तमोगुण रहते हैं, न ही सतोगुण पर इनकाकोई प्रभाव दिखता है।

वहाँ पर काल को प्रधानता प्राप्त नहीं है।

फिर बहिरंगा शक्ति ( माया )का तो कहना ही क्या? इसका तो वहाँ प्रवेश भी नहीं हो सकता।

देवता तथा असुर, बिनाभेदभाव के, भक्तों के रूप में भगवान्‌ की पूजा करते हैं।

श्यामावदाता: शत-पत्र-लोचना:पिशडू-वस्त्रा: सुरुच: सुपेशसः ।

सर्वे चतुर्बाहव उन्मिषन्मणि--प्रवेक-निष्काभरणा: सुवर्चस: ॥

११॥

श्याम--नीलवर्ण; अवदाता:--आभा से युक्त; शत-पत्र--कमल-पुष्प; लोचना:--आँखें; पिशड्ग--पीले रंग का; वस्त्रा:--वस्त्र; सु-रुच:--अत्यन्त आकर्षक; सु-पेशस:--तरुण; सर्वे--सभी; चतु:--चार; बाहवः--बाहें, हाथ; उन्मिषन्‌--कान्तिमान्‌; मणि--मोती; प्रवेक--उत्त कोटि के; निष्क-आभरणा:--आलंकारिक आभूषण; सु-वर्चसः--तेजमयबैकुण्ठ लोक के वासियों को आभामय श्यामवर्ण का बताया गया है।

उनकी आँखेंकमल-पुष्प के समान, उनके वस्त्र पीलाभ रंग के और उनकी शारीरिक संरचना अत्यन्तआकर्षक है।

वे उभरते हुए तरुणों की तरह हैं, उन सबके चार-चार हाथ हैं।

वे मोती के हारोंतथा अलंकृत पदकों से भली-भाँति विभूषित होकर अत्यन्त तेजवान्‌ प्रतीत होते हैं।

प्रवाल-बैदूर्य-मृणाल-वर्चस: ।

परिस्फुरत्कुण्डल-मौलि-मालिन: ॥

१२॥

प्रवाल--मूँगा; बैदूर्य--विशेष मणि; मृणाल--स्वर्गिक कमल; वर्चस:--किरणें; परिस्फुरत्‌--फूल रही है; कुण्डल--कान केआभूषण; मौलि--सिर; मालिन:--हारों से युक्त ।

उनमें से कुछ की आकृतियाँ मूँगे तथा हीरे की भाँति तेजस्वी हैं और वे अपने सिरों परमालाएँ धारण किए हैं, जो कमल-पुष्प के समान खिली हुई हैं।

कुछ ने कानों में कुण्डल पहनरखे हैं।

भ्राजिष्णुभिर्य: परितो विराजतेलसद्विमानावलिभिर्महात्मनाम्‌ ।

विद्योतमान: प्रमदोत्तमाह्युभिःसर्विद्युदभ्रावलिभिरयथा नभः ॥

१३॥

भ्राजिष्णुभि:--आभा से; यः--वैकुण्ठ लोक; परित:--घिरा हुआ; विराजते--स्थित है; लसत्‌--तेजमान; विमान--विमान के;अवलिभि: --समूह से; महा-आत्मनाम्‌-- भगवान्‌ के महान्‌ भक्तों का; विद्योतमान:--बिजली के समान सुन्दर; प्रमद--स्त्रियाँ;उत्तम--स्वर्गिक; अद्युभि: --मुखड़ों से; स-विद्युतू--बिजली सहित; अभ्रावलिभि:--आकाश में बादलों से; यथा--जिसप्रकार; नभः--आकाश।

सारे वैकुण्ठ लोक विभिन्न चमचमाते विमानों से भी घिरे हैं।

ये विमान महात्माओं या भगवदभक्तों के हैं।

स्त्रियाँ अपने स्वर्गिक मुखमण्डल के कारण बिजली के समान सुन्दर लगतीहैं और ये सब मिलकर ऐसी प्रतीत होती हैं मानो बादलों तथा बिजली से आकाश सुशोभित हो।

शरीर्यत्र रूपिण्युरुगाय-पादयो:करोति मान॑ बहुधा विभूतिभि: ।

प्रेड्डं भरता या कुसुमाकरानुगै-विंगीयमाना प्रिय-कर्म गायती ॥

१४॥

श्री:--लक्ष्मी जी; यत्र--वैकुण्ठ लोक में; रूपिणी--अपने दिव्य रूप में; उरुगाय-- भगवान्‌, जिनकी स्तुति बड़े-बड़े भक्तकरते हैं; पादयो:-- भगवान्‌ के चरणकमलों में; करोति--करती है; मानमू--सादर सेवा; बहुधा--विविध सामग्री से;विभूतिभि:--अपने पार्षदों के सहित; प्रेड्डम्‌-- प्रसन्नता से संचलन ( धिरकन ); थ्रिता--शरणागत; या--जो; कुसुमाकर--वसन्त; अनुगैः -- भौरों से; विगीयमाना--गुण-गान करते हुए; प्रिय-कर्म--अपने प्रियतम के कार्यकलापों; गायती--गाती हुई

दिव्य रूपधारी लक्ष्मीजी भगवान्‌ के चरणकमलों की प्रेमपूर्ण सेवा में लगी हुई हैं औरवसनन्‍्त के अनुचर भौरों के द्वारा विचलित होकर, वे न केवल विविध विलास--अपनी सहेलियोंसहित भगवान्‌ की सेवा--में तत्पर हैं, अपितु भगवान्‌ की लीलाओं का गुणगान भी कर रही हैं।

ददर्श तत्राखिल-सात्वतां पतिंश्रियः पतिं यज्ञ-पतिं जगत्पतिम्‌ ।

सुनन्द-नन्द-प्रबलाईणादिभि:ःस्व-पार्षदाग्रै: परिसेवितं विभुम्‌ ॥

१५॥

ददर्श--ब्रह्मा ने देखा; तत्र--वहाँ ( बैकुण्ठ लोक में ); अखिल--सम्पूर्ण; सात्वताम्‌ू--परम भक्तों के; पतिमू--स्वामी;भ्रिय:--लक्ष्मी के; पतिम्‌--स्वामी; यज्ञ--यज्ञ के; पतिम्‌--स्वामी; जगत्‌--ब्रह्माण्ड के; पतिम्‌ू-- स्वामी; सुनन्द--सुनन्द;नन्द--नन्द; प्रबल-- प्रबल; अर्हण--अ्हण; आदिभि: --आदि से; स्व-पार्षद--अपने संगी; अग्रै:--अग्रणी; परिसेवितम्‌--दिव्य प्रेम में सेवित; विभुम्‌ू--परम शक्तिमान ।

ब्रह्माजी ने वैकुण्ठ लोक में उन श्रीभगवान्‌ को देखा जो सारे भक्त समुदाय के स्वामी,लक्ष्मीजी के पति, समस्त यज्ञों के स्वामी तथा ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं और जो नन्द, सुनन्द, प्रबलतथा अर्हूण आदि अपने अग्रणी पार्षदों द्वारा सेवित हैं।

भृत्य-प्रसादाभिमुखं हगासवंप्रसन्न-हासारुण-लोचनाननम्‌ ॥

किरीटिनं कुण्डलिनं चतुर्भुजंपीतांशुकं वक्षसि लक्षितं रिया ॥

१६॥

भृत्य--दास; प्रसाद--स्नेह; अभिमुखम्‌ हक्‌--दृष्टि; आसवम्‌--मादक पदार्थ; प्रसन्न--अत्यन्त प्रसन्न; हास--हँसी; अरुण--लाल; लोचन--नेत्र; आननम्‌--मुख; किरीटिनम्‌--मुकुटयुक्त; कुण्डलिनम्‌--कुण्डलों सहित; चतु:-भुजम्‌--चारों हाथों सेयुक्त; पीत--पीला; अंशुकम्‌--वस्त्र; वक्षस--छाती पर; लक्षितम्‌-- अंकित; थ्रिया--लक्ष्मी से ।

अपने प्रिय दासों की ओर कृपा दृष्टि डालते हुए, मादक तथा आकर्षक दृष्टि वाले भगवान्‌अत्यधिक तुष्ट लगे।

उनका मुस्काता मुख मोहक लाल रंग से सुशोभित था।

वे पीले वस्त्र पहनेथे और कानों में कुण्डल तथा सिर में मुकुट धारण किये हुए थे।

उनके चार हाथ थे और उनका वक्षस्थल लक्ष्मीजी की रेखाकृतियों से चिह्नित था।

अध्यरईणीयासनमास्थितं परंबृतं चतुः-षोडश-पञ्ञ-शक्तिभि: ।

युक्त भगैः स्वैरितरत्र चाश्रुवै:स्वएबव धामन्‌ रममाणमी श्वरम्‌ ॥

१७॥

अध्यर्हणीय--अत्यन्त पूज्य; आसनम्‌--सिंहासन पर; आस्थितम्‌--बैठे हुए; परम्‌--परमे श्वर; वृतम्‌--घिरे हुए; चतुः--चारःप्रकृति, पुरुष, महत्‌ तथा अहंकार; षोडश--सोलह; पञ्ञ--पाँच; शक्तिभि:--शक्तियों से; युक्तम्‌ू--युक्त; भगैः--ऐश्वर्य से;स्वै: -- अपने; इतरत्र--अन्य छोटे-छोटे पराक्रम; च--भी; अध्रुवै:-- क्षणिक; स्वे-- अपने; एव--निश्चय ही; धामन्‌ू-- धाम;रममाणम्‌--रमण करते हुए; ईश्वरम्‌-परमे श्वर ।

भगवान्‌ अपने सिंहासन पर विराजमान थे और विभिन्न शक्तियों से--यथा चार, सोलह,पाँच तथा छः प्राकृतिक ऐश्वर्यों के साथ अन्य छोटी एवं क्षणिक शक्तियों से घिरे हुए थे।

किन्तुवे वास्तविक परमेश्वर थे और अपने धाम में आनन्द ले रहे थे।

तदर्शनाह्नाद-परिप्लुतान्तरोहृष्यत्तनु: प्रेम-भराश्रु-लोचन: ।

ननाम पादाम्बुजमस्य विश्व-सूग्‌यत्‌ पारमहंस्येन पथाधिगम्यते ॥

१८॥

तत्‌--भगवान्‌ के उस; दर्शन--दर्शन से; आह्वाद-- प्रसन्नता; परिप्लुत--लबालब भरा हुआ, आप्लावित; अन्तर: --हृदय केभीतर; हृष्यत्‌--पुलकित; तनुः--शरीर; प्रेम-भर--पूर्ण दिव्य प्रेम में; अश्रु-- आँसू; लोचन: --आँखों में; ननाम--नतमस्तकहुआ; पाद-अम्बुजम्‌--चरणकमलों पर; अस्य-- भगवान्‌ के; विश्व-सृक्‌ --ब्रह्माण्ड का स्त्रष्टा; यत्‌--जो; पारमहंस्थेन -- परममुक्त पुरुष द्वारा; पथधा--पथ; अधिगम्यते--अनुसरण किया जाता है।

इस तरह भगवान्‌ को उनके पूर्ण रूप में देखकर ब्रह्माजी का हृदय आनन्द से आप्लावित होउठा और दिव्य प्रेम तथा आनन्द से उनके नेत्रों में प्रेमाशु आ गये।

वे भगवान्‌ के समक्षनतमस्तक हो गये।

जीव ( परमहंस ) के लिए परम सिद्धि की यही विधि है।

त॑ प्रीयमाणं समुपस्थितं कवि प्रजा-विसर्गे निज-शासनाईणम्‌ ।

बभाष ईषत्स्मित-शोचिषा गिरा रिय: प्रियं प्रीत-मना: करे स्पृशन्‌ ॥

१९॥

तम्‌--ब्रह्माजी को; प्रीयमाणम्‌--प्रिय पात्र; समुपस्थितम्‌--सामने उपस्थित; कविम्‌--महान्‌ विद्वान; प्रजा--जीवात्माओं की;विसगें-- सृष्टि के कार्य में; निज--अपना; शासन--नियन्त्रण; अर्हणम्‌-- उपयुक्त; बभाषे -- सम्बोधित किया; ईषत्‌--मन्द;मित--हँसते हुए; शोचिषा--उत्साहवर्धक; गिरा--वाणी; प्रियः--प्रिय; प्रियम्‌--प्रेमी को; प्रीत-मना:-- अत्यन्त प्रसन्न होकर;करे--हाथ से; स्पृशन्‌--छूते हुए

भगवान्‌ ने ब्रह्माजी को अपने समक्ष देखकर उन्हें जीवों की सृष्टि करने तथा जीवों कोअपनी इच्छानुसार नियन्त्रित करने के लिए उपुयक्त ( पात्र ) समझा।

इस प्रकार प्रसन्न होकरभगवान्‌ ने ब्रह्मा से मंद-मंद हँसते हुए हाथ मिलाया और उन्हें इस प्रकार से सम्बोधित किया।

श्री - भगवानुवाचत्वयाहं तोषितः सम्यगू वेद-गर्भ सिसृक्षया ।

चिरं भूतेन तपसा दुस्तोष: कूट-योगिनाम्‌ ॥

२०॥

श्री-भगवान्‌ उबाच--परम सुन्दर भगवान्‌ ने कहा; त्वया--तुम्हारे द्वारा; अहम्‌--मैं; तोषितः --प्रसन्न हूँ; सम्यक्‌ -- पूर्ण; बेद-गर्भ--बेद से संपृक्त; सिसृक्षया--उत्पत्ति के हेतु; चिरम्‌--दीर्घकाल से; भूतेन--संचित; तपसा--तपस्या से; दुस्तोष: --कठिनाई से प्रसन्न होने वाला; कूट-योगिनाम्‌--छद्योगियों के लिए॥

परम सुन्दर भगवान्‌ ने ब्रह्म को सम्बोधित किया-हे वेदों से संपृक्त ब्रह्मा, सृष्टि की इच्छासे की गई तुम्हारी दीर्घकालीन तपस्या से मैं अत्यन्त प्रसन्न हूँ।

मैं छद्ययोगियों से बहुत हीमुश्किल से प्रसन्न हो पाता हूँ।

वबरं वरय भद्रं ते वरेशं माभिवाउ्छतम्‌ ।

ब्रह्मज्छेय: -परिश्राम: पुंसां महर्शनावधि: ॥

२१॥

वरम्‌--वरदान; वरय--मुझसे माँगो; भद्रमू--कल्याण हो; ते--तुम्हारा; वर-ईशम्‌-- समस्त वरों के दाता; मा ( माम्‌ )--मुझसे;अभिवाउिछतम्‌--जो चाहो, मुँह माँगा; ब्रह्मनू--हे ब्रह्मा; श्रेय:--परम सफलता; परिश्राम: --समस्त तपस्या के लिए; पुंसाम्‌--सबों के लिए; मत्‌--मेरा; दर्शन--साक्षात्कार; अवधि: --पर्यवसान, अन्तिम सीमा |

तुम्हारा कल्याण हो।

हे ब्रह्मा, तुम मुझसे जो चाहो माँग सकते हो, क्योंकि मैं समस्त वरोंका वरदाता हूँ; तुम्हें ज्ञात हो कि सारी तपस्या के फलस्वरूप जो अन्तिम वर प्राप्त होता है, वहमेरा दर्शन है।

मनीषितानुभावोयं मम लोकावलोकनम्‌ ।

यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तप: ॥

२२॥

मनीषित--पटुता; अनुभाव: -- दर्शन; अयम्‌ू--यह; मम--मेरा; लोक-- धाम; अवलोकनम्‌--वास्तविक अनुभव से देखते हुए;यत्‌--क्योंकि; उपश्रुत्य--सुनकर; रहसि--परम तप में; चकर्थ--सम्पन्न करके; परमम्‌--सर्वोच्च; तप:ः--तपस्या ।

सर्वोच्च सिद्धिमयी पटुता है मेरे धाम का साक्षात्‌ दर्शन और यह दर्शन तुम्हें मेरे आदेश केअनुसार कठिन तपस्या के प्रति तुम्हारी विनप्र प्रवृत्ति के कारण सम्भव हो सका है।

प्रत्यादिष्ट मया तत्र त्वयि कर्म-विमोहिते ।

तपो मे हृदयं साक्षादात्माहं तपसोनघ ॥

२३॥

प्रत्यादिष्टम-- आदेश प्राप्त; मया--मेरे द्वारा; तत्र--के कारण; त्वयि--तुमको; कर्म--कर्तव्य; विमोहिते--मोह ग्रस्त होकर;तपः--तपस्या; मे--मेरा; हृदयम्‌--हृदय; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष रूप से; आत्मा--जीवन तथा आत्मा; अहमू--मैं स्वयं; तपस:--तपस्या करने वाले का; अनघ--हे निष्पाप।

हे निष्पाप ब्रह्मा, तुम्हें ज्ञात हो कि जब तुम अपने कर्तव्य के प्रति असमंजस में थे तो सबसेपहले मैंने ही तुम्हें तपस्या करने का आदेश दिया था।

ऐसी तपस्या ही मेरा हृदय और मेरी आत्माहै, अतः तपस्या मुझसे अभिन्न है।

text:जामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।

बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्य मे दुश्चरं तप: ॥

२४॥

सृजामि-उत्पन्न करता हूँ; तपसा--तपस्या की उसी शक्ति से; एब--निश्चय ही; इृदम्‌--यह; ग्रसामि तपसा--उसी शक्ति से अपने में लीन करता हूँ; पुनः--फिर; बिभर्मि-- पालन करता हूँ; तपसा--तप से; विश्वम्‌--विश्व; वीर्यमू--शक्ति; मे-- मेरा; दुश्चवरम्‌--कठिन; तप: --तपस्या ।

मैं ऐसे ही तप से इस विश्व की रचना करता हूँ, इसी शक्ति से इसका पालन करता हूँ औरइसीसे इसको अपने में लीन करता हूँ।

अतः तप ही वास्तविक शक्ति है।

ब्रह्मेवाचभगवतन्‌ सर्व-भूतानामध्यक्षोवस्थितो गुहाम्‌ ।

वेद ह्यप्रतिरुद्धेन प्रज्ञानेन चिकीर्षितम्‌ ॥

२५॥

ब्रह्मा उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; भगवन्‌--हे भगवान्‌; सर्व भूतानाम्‌ू--समस्त जीवात्माओं का; अध्यक्ष: --नियन्ता;अवस्थित:--स्थित; गुहाम्‌ू--हृदय के भीतर; वेद--जानो; हि--निश्चय ही; अप्रतिरुद्धेन--बिना बाधा के; प्रज्ञानेन--अन्तःज्ञानद्वारा; चिकीर्षितम्‌ू-- प्रयास करता है|

ब्रह्माजी ने कहा, हे भगवान्‌, आप प्रत्येक जीवात्मा के हृदय में परम नियन्ता के रूप मेंस्थित हैं, अतः आप किसी भी प्रकार की बाधा के बिना अपने अन्तः-ज्ञान ( प्रज्ञा ) द्वारा समस्तप्रयासों से अवगत हैं।

तथापि नाथमानस्य नाथ नाथय नाथितम्‌ ।

परावरे यथा रूपे जानीयां ते त्वरूपिण: ॥

२६॥

तथा अपि--फिर भी; नाथमानस्थ--याचक का; नाथ--हे भगवान्‌; नाथय--प्रदान करो; नाधितम्‌--इच्छित; पर-अवबरे--संसारी तथा दिव्य विषयों में; यथा--जिस प्रकार; रूपे--रूप में; जानीयाम्‌--जान सकूँ; ते--तुम्हारा; तु--लेकिन;अरूपिण:--निराकार।

तथापि हे भगवान्‌, मेरी आपसे प्रार्थना है कि मेरी इच्छा पूरी करें।

कृपया मुझे बताएँ किदिव्य रूप के होते हुए भी आप संसारी रूप किस प्रकार धारण करते हैं, यद्यपि आपका ऐसाकोई रूप नहीं होता।

यथात्म-माया-योगेन नाना-शक्त्युपबूंहितम्‌ ।

विलुम्पन्‌ विसृजन्‌ गृह्नन्‌ बिश्रदात्मानमात्मना ॥

२७॥

यथा--जिस तरह; आत्म--स्व; माया--शक्ति; योगेन--संयोग से; नाना--विविध; शक्ति--शक्ति; उपबूृंहितम्‌--संचय द्वारा;विलुम्पन्‌ू--संहार के लिए; विसृजन्‌--सृष्टि के लिए; गृहन्‌ू--स्वीकृति के लिए; बिभ्रतू--पालन के लिए; आत्मानम्‌--अपनेआप को; आत्मना-- अपने द्वारा

तथा कृपा करके मुझे यह भी बताएँ कि आप अपने से किस प्रकार से विभिन्न संयोगों केद्वारा संहार, उत्पत्ति, स्वीकृति तथा पालन की विविध शक्तियों को प्रकट करते हैं।

क्रीडस्यमोघ-सड्डूल्प ऊर्णनाभिर्यथोर्णुते ।

तथा तद्ठविषयां धेहि मनीषां मयि माधव ॥

२८॥

क्रीडसि--जिस प्रकार खिलवाड़ करते हो; अमोघ--अचूक; सट्डूल्प--निश्चय; ऊर्णनाभि:--मकड़ी; यथा--जिस प्रकार;ऊर्णुत--ढक लेती है; तथा--उसी प्रकार; तत्‌-विषयाम्‌--उनके विषय में; धेहि--मुझे बताएँ; मनीषाम्‌--दार्शनिक विधि से;मयि--मुझको; माधव--समस्त शक्तियों के स्वामी |

हे माधव, मुझे उन सबके विषय में दार्शनिक विधि से बताएँ।

आप मकड़ी के समान खेल करने वाले हैं, जो अपनी ही शक्ति से अपने को ढक लेती है।

आपका संकल्प अचूक है।

भगवच्छिक्षितमहं करवाणि ह्यतन्द्रितः ।

नेहमानः प्रजा-सर्ग बध्येयं यदनुग्रहात्‌ ॥

२९॥

भगवत्‌--भगवान्‌ द्वारा; शिक्षितम्‌-शिक्षा प्राप्त; अहम्‌-मैं; करवाणि--कार्य के द्वारा; हि--निश्चय ही; अतन्द्रित:--'कारणस्वरूप; न--कभी नहीं; इहमान:--यद्यपि कार्य करते हुए; प्रजा-सर्गम्‌--जीवात्माओं की उत्पत्ति; बध्येयम्‌--बद्ध होऊँ;यत्‌--जिससे; अनुग्रहात्‌ू-कृपा से।

कृपा करके मुझे बतलाएँ जिससे आपकी आज्ञानुसार मैं इस विषय की शिक्षा प्राप्त करसकूँ और इस तरह ऐसे कार्यों से आबद्ध हुए बिना जीवात्माओं को यंत्रवत्‌ उत्पन्न करने का कार्यकरता रहूँ।

यावत्‌ सखा सख्युरिवेश ते कृतःप्रजा-विसगें विभजामि भो जनम्‌ ।

अविक्लव्स्ते परिकर्मणि स्थितोमा मे समुन्नद्ध-मदोजमानिन: ॥

३०॥

यावत्‌-- चूँकि; सखा--मित्र; सख्यु:--मित्र को; इब--समान; ईश--हे भगवान्‌; ते--तुम; कृतः--स्वीकार किया है; प्रजा--जीवात्माएँ; विसगें--सृष्टि के कार्य में; विभजामि--क्योंकि मैं इसे भिन्न रीति से करूँगा; भोः--हे भगवान्‌; जनम्‌--जन्म लेनेवाले; अविक्लव:--विचलित हुए बिना; ते--तुम्हारा; परिकर्मणि--सेवा कार्य में; स्थित:--स्थित; मा--कभी न हो; मे--मुझको; समुन्नद्ध--उदय होने पर; मद:ः--उन्माद; अज--हे अजन्मा; मानिन:--ऐसे माने जाने वाले ।

हे अजन्मा भगवान्‌, आपने मुझसे उसी प्रकार हाथ मिलाया है, जिस प्रकार कोई मित्र अपनेमित्र से मिलाता है ( मानो पद में समान हो )।

अब मैं विभिन्न जीवात्माओं की सृष्टि करने मेंलगूँगा और आपकी सेवा करता रहूँगा।

मैं किसी तरह विचलित नहीं होऊँगा।

किन्तु मेरी प्रार्थनाहै कि कहीं इन सबसे मुझे गर्व न हो जाय कि मैं ही परमेश्वर हूँ।

श्री - भगवानुवाचज्ञानं परम-गुह्मं मे यद्‌ विज्ञान-समन्वितम्‌ ।

सरहस्यं तदड़ं च गृहाण गदितं मया ॥

३१॥

श्री-भगवान्‌ उबाच-- श्रीभगवान्‌ ने कहा; ज्ञानमू--प्राप्त ज्ञान; परम--अत्यधिक ; गुहाम्‌--गोपनीय; मे--मेरा; यत्‌--जो;विज्ञान--बोध; समन्वितम्‌--से युक्त; स-रहस्यम्‌-- भक्ति सहित; तत्‌ू--उसकी; अड्रम्‌ च--आवश्यक सामग्री; गृहाण--ग्रहणकरने का यतल करो; गदितम्‌--व्याख्या की गईं; मया--मेरे द्वारा ।

श्रीभगवान्‌ ने कहा--शाम्त्रों में वर्णित मुझसे सम्बन्धित ज्ञान अत्यन्त गोपनीय है उसे भक्तिके समन्वय द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।

इस विधि के लिए आवश्यक सामग्री की व्याख्यामेरे द्वारा की जा चुकी है।

तुम इसे ध्यानपूर्वक ग्रहण करो।

यावानहं यथा-भावो यद्वूप-गुण-कर्मक: ।

तथेव तत्त्व-विज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्‌ू ॥

३२॥

यावान्‌--मेरे जितने दिव्य रूप हैं; अहम्‌ू--मैं; यथा--जिस प्रकार; भाव:--दिव्य अस्तित्व; यत्‌ू--उन; रूप--विभिन्न रूप तथारंग; गुण--गुण; कर्मक:--कार्य; तथा--उसी प्रकार से; एब--निश्चय ही; तत्त्व-विज्ञानम्‌ू--वास्तविक बोध; अस्तु--हो; ते--तुमको; मत्‌--मेरी; अनुग्रहात्‌-- अहैतुकी कृपा से।

मेरी अहैतुकी कृपा से तुम्हारे अन्तःकरण में उदय होने वाले वास्तविक बोध से तुम्हें मेरेविषय में सब कुछ--मेरा वास्तविक शाश्रत रूप तथा मेरा दिव्य अस्तित्व, रंग, गुण तथाकार्य--ज्ञात हो सकेगा।

अहमेवासमेवाग्रे नान्‍्यद्‌ यत्‌ सदसत्‌ परम्‌ ।

पश्चादहं यदेतच्च योउवशिष्येत सोस्म्यहम्‌ ॥

३३॥

अहमू--मैं, भगवान्‌; एव--निश्चय ही; आसम्‌-- था; एब--केवल; अग्रे--सृष्टि के पहिले; न--कभी नहीं; अन्यत्‌-- अन्यकुछ; यत्‌ू--जो; सत्‌--कार्य; असत्‌--कारण; परम्‌--परम; पश्चात्‌-- अन्त में; अहमू--मैं भगवान्‌; यत्‌--ये सब; एतत्‌--सृष्टि; च-- भी; यः--प्रत्येक वस्तु; अवशिष्येत--बचा रहता है; सः--वह; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं,भगवान्‌हे ब्रह्मा, वह मैं ही हूँ जो सृष्टि के पूर्व विद्यमान था, जब मेरे अतिरिक्त कुछ भी नहीं था।

तब इस सृष्टि की कारणस्वरूपा भौतिक प्रकृति भी नहीं थी।

जिसे तुम अब देख रहे हो, वह भी मैंही हूँ और प्रलय के बाद जो शेष रहेगा वह भी मैं ही हूं।

ऋतेथ यत्‌ प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।

तद्ठिद्यादात्मनो मायां यथाभासो यथा तम: ॥

३४॥

ऋते--रहित; अर्थम्‌--सार; यत्‌--जो; प्रतीयेत--प्रतीत होता है; न--नहीं; प्रतीयेत-- प्रतीत होता है; च--तथा; आत्मनि--मेरेप्रसंग में; तत्‌--वह; विद्यात्‌--तुम्हें जानना चाहिए; आत्मन:--मेरी; मायाम्‌--माया; यथा--जिस तरह; आभास: --प्रतिबिम्ब;यथा--जिस प्रकार; तम:--अंधकार।

हे ब्रह्म, जो भी सारयुक्त प्रतीत होता है, यदि वह मुझसे सम्बन्धित नहीं है, तो उसमें कोईवास्तविकता नहीं है।

इसे मेरी माया जानो, इसे ऐसा प्रतिबिम्ब मानो जो अन्धकार में प्रकट होताहै।

यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।

प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्‌ ॥

३५॥

यथा--जिस तरह; महान्ति--सर्वव्यापी; भूतानि--त तत्त्व; भूतेषु उच्च-अवचेषु--लघु तथा विराट में; अनु--पीछे; प्रविष्टानि--प्रवेश कर लिया; अप्रविष्टानि--प्रविष्ट नहीं; तथा--उसी तरह; तेषु--उनमें; न--नहीं; तेषु--उनमें; अहम्‌--मैं ।

हे ब्रह्मा, तुम यह जान लो कि ब्रह्माण्ड के सारे तत्त्व विश्व में प्रवेश करते हुए भी प्रवेश नहींकरते हैं।

उसी प्रकार मैं उत्पन्न की गई प्रत्येक वस्तु में स्थित रहते हुए भी साथ ही साथ प्रत्येकवस्तु से पृथक्‌ रहता हूँ।

एतावदेव जिज्ञास्य॑ तत्त्व-जिज्ञासुनात्मन: ।

अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां यत्‌ स्यात्‌ सर्वत्र सर्वदा ॥

३६॥

एतावत्‌--यहाँ तक; एव--निश्चय ही; जिज्ञास्यम्‌-पूछा जाना चाहिए; तत्त्व--परम सत्य; जिज्ञासुना--विद्यार्थी द्वारा;आत्मन:--स्व का; अन्वय- प्रत्यक्ष; व्यतिरिकाभ्याम्‌--अ प्रत्यक्ष रूप से; यत्‌ू--जो भी; स्यात्‌ू--सम्भव है; सर्वत्र--सभी जगहतथा सर्वकाल में; सर्वदा--समस्त परिस्थितियों में ।

जो व्यक्ति परम सत्य रूप श्रीभगवान्‌ की खोज में लगा हो उसे चाहिए कि वह समस्त परिस्थितियों में सर्वत्र और सर्वदा प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष दोनों ही प्रकार से इसकी खोज करे।

एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना ।

भवान्‌ कल्प-विकल्पेषु न विमुह्मति कहिंचित्‌ ॥

३७॥

एतत्‌--यह; मतम्‌--निष्कर्ष, निर्णय; समातिष्ठ--स्थित रहते हैं; परमेण ---परम; समाधिना--समाधि द्वारा, ध्यान केएकाग्रीकरण से; भवान्‌--आप; कल्प--बीच की प्रलय; विकल्पेषु-- अन्तिम प्रलय में; न विमुह्मति--मोहित नहीं करेगा;कह्िचित्‌--कुछ भी

हे ब्रह्मा तुम मन को एकाग्र करके इस निर्णय का पालन करो।

तुम्हें, न तो आंशिक और नही पूर्ण प्रलय के समय किसी प्रकार का गर्व विचलित कर सकेगा।

श्री शुक उवाचसम्प्रदिश्यैवमजनो जनानां परमेष्ठिनम्‌ ।

पश्यतस्तस्य तद्‌ रूपमात्मनो न्यरुणद्धरिः ॥

३८ ॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; सम्प्रदिश्य--ब्रह्माजी को पूरी तरह उपदेश देकर; एवम्‌--इस प्रकार;अजनः--परसे श्वर; जनानाम्‌ू--जीवात्माओं के; परमेष्ठिनम्‌--परम नेता, ब्रह्मा को; पश्यत:--देखते हुए; तस्य--उसका; तत्‌रूपम्‌--उस दिव्य रूप को; आत्मन: --परमे श्वर का; न्यरुणत्‌-- अन्तर्धान हो गये; हरिः-- भगवान्‌ |

शुकदेव गोस्वामी ने महाराज परीक्षित से कहा--जीवात्माओं के नायक ब्रह्मा को अपनेदिव्य रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ हरि इस प्रकार उपदेश देते दिखे और फिर अन्तर्धान होगये।

अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरये विहिताझञलि: ।

सर्व-भूतमयो विश्व ससर्जेदं स पूर्ववत्‌ ॥

३९॥

अन्तर्हित--अन्तर्धान होने पर; इन्द्रिय-अर्थाय--समस्त इन्द्रियों के लक्ष्य, श्रीभगवान्‌ के लिए; हरये--भगवान्‌ के लिए; विहित-अज्जलि:--हाथ जोड़कर; सर्व-भूत--समस्त जीवात्माओं; मय: --से पूर्ण; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; ससर्ज--उत्पन्न किया; इृदम्‌--यह; सः--उसने ( ब्रह्माजी ); पूर्व-वत्‌--पहले की भाँति।

भक्तों की इन्द्रियों को दिव्य आनन्द प्रदान करने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ हरि केअन्तर्धान हो जाने पर ब्रह्माजी हाथ जोड़े हुए ब्रह्माण्ड की जीवात्माओं से पूर्ण वैसी ही सृष्टि पुनःकरने लगे जिस प्रकार वह इसके पूर्व थी।

प्रजापतिर्धर्म-पतिरेकदा नियमान्‌ यमान्‌ ।

भद्रं प्रजानामन्विच्छन्नातिष्ठत्‌ स्वार्थ-काम्यया ॥

४०॥

प्रजा-पति: --समस्त जीवात्माओं के पूर्वज; धर्म-पति:--धर्म के पिता; एकदा--एक बार; नियमान्‌--विधि-विधानों; यमान्‌ू--संयम के नियम; भद्रमू--कल्याण; प्रजानाम्‌ू--जीवों का; अन्विच्छन्‌--इच्छा से; आतिष्ठत्‌--स्थित; स्व-अर्थ--अपना हित;काम्यया--कामना करते हुए।

एक बार जीवों के पूर्वज तथा धर्म के पिता ब्रह्माजी ने समस्त जीवात्माओं के कल्याण में हीअपना हित समझते हुए विधिपूर्वक यम-नियमों को धारण किया।

त॑ नारद: प्रियतमो रिक्थादानामनुव्रतः ।

शुश्रूषमाण: शीलेन प्रश्रयेण दमेन च ॥

४१॥

तम्‌--उसको; नारद: --नारद मुनि; प्रियतम: --अत्यन्त प्रिय; रिक्थ-आदानाम्‌--उत्तराधिकारी पुत्रों का; अनुव्रत:--अत्यन्तआज्ञाकारी; शुश्रूषमाण:-- सदैव सेवा के लिए उद्यत; शीलेन--सदाचरण से; प्रश्रयेण--विनयशीलता से; दमेन--इन्द्रिय-संयमसे; च--भी

ब्रह्मा के उत्तराधिकारी पुत्रों में सर्वाधिक प्रिय नारद अपने पिता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं और अपने पिता के उपदेशों का अत्यन्त संयम, विनय तथा सौम्यता से पालन करते हैं।

मायां विविदिषन्‌ विष्णोर्मायेशस्यथ महा-मुनिः ।

महा-भागवतो राजन पितरं पर्यतोषयत्‌ ॥

४२॥

मायाम्‌-शक्तियाँ; विविदिषन्‌--जानने की इच्छा से; विष्णो:-- भगवान्‌ की; माया-ईशस्य--समस्त शक्तियों के स्वामी का;महा-मुनि:--ऋषि; महा- भागवत: -- भगवान्‌ का उत्कृष्ट भक्त; राजन्‌ू--हे राजा; पितरम्‌-- अपने पिता को; पर्यतोषयत्‌--अत्यन्त प्रसन्न किया।

हे राजन, नारद ने अपने पिता को अत्यधिक प्रसन्न कर लिया और समस्त शक्तियों के स्वामीविष्णु की शक्तियों के विषय में जानने की इच्छा प्रकट की, क्योंकि नारद समस्त ऋषियों तथासमस्त भक्तों में सर्वोपरि हैं।

तुष्टे निशाम्य पितरं लोकानां प्रपितामहम्‌ ।

देवर्षि: परिपप्रच्छ भवान्यन्‌ मानुपृच्छति ॥

४३॥

तुष्टमू-प्रसन्न; निशाम्य--देखकर; पितरम्‌--पिता को; लोकानाम्‌--सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का; प्रपितामहम्‌--परदादा; देवर्षि: --नारद ऋषि ने; परिपप्रच्छ--पूछा; भवान्‌ू--तुम; यत्‌--जो; मा--मुझसे; अनुपृच्छति -- पूछ रहे हो ।

जब नारद ने देखा कि समस्त ब्रह्माण्ड के प्रपितामह ब्रह्माजी मुझ पर प्रसन्न हैं, तो महर्षिनारद ने अपने पिता से विस्तार में भी पूछा।

तस्मा इदं भागवतं पुराणं दश-लक्षणम्‌ ।

प्रोक्ते भगवता प्राह प्रीत: पुत्राय भूत-कृत्‌ ॥

४४॥

तस्मै--तत्पश्चात्‌; इदम्‌--यह; भागवतम्‌-- भगवान्‌ की महिमा, अथवा भगवद्‌-ज्ञान; पुराणम्‌--उपवेद; दश-लक्षणम्‌--दसविशिष्टताएँ; प्रोक्तमू--वर्णित; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; प्राह--कहा; प्रीत:--संतुष्ट होकर; पुत्राय--पुत्र से; भूत-कृत्‌--ब्रह्माण्ड के सतरष्टा)।

तब जाकर पिता ( ब्रह्मा ) ने अपने पुत्र नारद को श्रीमद्भागवत नामक उपवेद पुराण कहसुनाया जिसका वर्णन श्रीभगवान्‌ ने उनसे किया था और जो दस लक्षणों से युक्त है।

नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नूप ।

ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामित-तेजसे ॥

४५॥

नारद:--नारद मुनि ने; प्राह--उपदेश दिया; मुनये-- मुनि को; सरस्वत्या:--सरस्वती नदी के; तटे--तट पर; नृप--हे राजन;ध्यायते-- ध्यानमग्न; ब्रह्य--परम सत्य; परमम्‌--परमे श्वर; व्यासाय-- श्रील व्यासदेव के लिए; अमित--अपार; तेजसे --शक्तिमान को।

हे राजनू, उसी परम्परा में नारद मुनि ने श्रीमद्भागवत का उपदेश अनन्त शक्तिमान उनव्यासदेव को दिया जो सरस्वती नदी के तट पर भक्ति में स्थित होकर परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तमभगवान्‌ का ध्यान कर रहे थे।

यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्‌ पुरुषादिदम्‌ ।

यथासीत्तदुपाख्यास्ते प्रश्नानन्यांश्व॒ कृत्सनश: ॥

४६॥

यत्‌--जो; उत-हैं; अहम्‌--मैं; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; पृष्ट:--पूछा जाकर; वैराजातू--विराट रूप; पुरुषात्‌-- भगवान्‌ से;इदम्‌--यह जगत; यथा--जिस प्रकार; आसीत्‌--था; तत्‌--वह; उपाख्यास्ते--मैं कहूँगा; प्रश्नान्‌ू--समस्त प्रश्न; अन्यानू--अन्य; च--भी; कृत्स्नश:--विस्तार से

हे राजन्‌, तुम्हारे इस प्रश्न का कि यह ब्रह्माण्ड भगवान्‌ के विराट रूप से किस प्रकार प्रकटहुआ तथा अन्य प्रश्नों का उत्तर मैं पूर्वोक्त चारों शलोकों की व्याख्या के रूप में विस्तारपूर्वक दूँगा।

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