← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 2 की सूची
अध्याय चार: निर्माण की प्रक्रिया
2.4सूत उवाचवैयासकेरिति वच्स्तत्त्व-निश्चयमात्मन: ।
उपधार्य मतिं कृष्णे औत्तरेय:सतीं व्यधात् ॥
१॥
सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; वैयासके :--शुकदेव गोस्वामी के; इति--इस प्रकार; वच:--शब्द; तत्त्व-निश्चयम्--सत्यकी पुष्टि करनेवाले; आत्मन:--अपने में; उपधार्य--ठीक से समझ करके; मतिम्--मन की एकाग्रता; कृष्णे--कृष्ण के प्रति;औत्तरेय:--उत्तरा के पुत्र ने; सतीम्--संयत, निष्ठावान; व्यधात्--लगाया।
।
सूत गोस्वामी ने कहा : शुकदेव गोस्वामी से आत्मा के सत्य के विषय में बातें सुनकर,उत्तरा के पुत्र महाराज परीक्षित ने आस्थापूर्वक अपना ध्यान भगवान् कृष्ण में लगा दिया।
आत्म-जाया-सुतागार-पशु-द्रविण-बन्धुषु ।
राज्ये चाविकले नित्यं विरूढां ममतां जहौ ॥
२॥
आत्म--शरीर; जाया-- पत्नी; सुत--पुत्र; आगार--महल; पशु--हाथी घोड़े; द्रविण--खजाना; बन्धुषु--मित्रों तथासम्बन्धियों में; राज्ये--राज्य में; च-- भी; अविकले--अविचल, निष्कंटक; नित्यम्--निरन्तर; विरूढाम्--गहरी; ममताम्--ममता, लगाव; जहौ--त्याग दिया।
।
भगवान् कृष्ण के प्रति एकनिष्ठ आकर्षण के फलस्वरूप महाराज परीक्षित ने अपने निजीशरीर, अपनी पत्नी, अपनी सन्तान, अपने महल, अपने पशु, हाथी-घोड़े, अपने खजाने, मित्रतथा सम्बन्धी और अपने निष्कंटक राज्य के प्रति प्रगाढ़ ममता त्याग दी।
पप्रच्छ चेममेवार्थ यन्मां पृच्छथ सत्तमा: ।
कृष्णानुभाव- श्रवणे श्रदधधानो महा-मना: ॥
३॥
संस्थां विज्ञाय सन्न्यस्य कर्म त्रै-वर्गिकं च यत् ।
वबासुदेवे भगवति आत्म-भावं हढे गत: ॥
४॥
पप्रच्छ-- पूछा; च-- भी; इमम्ू--यह; एव--इसी तरह; अर्थम्--प्रयोजन; यत्--जो; माम्--मुझसे; पृच्छथ-- आप पूछते हैं;सत्तमा:--हे महर्षियो; कृष्ण-अनुभाव--कृष्ण के विचार में लीन; श्रवणे--सुनने में; श्रदधान: -- श्रद्धा से पूर्ण; महा-मना:--महात्मा; संस्थाम्-- मृत्यु; विज्ञाय--जानकर; सन्न्यस्य--त्याग कर; कर्म--सकाम कर्म; त्रै-वर्गिकम्-- धर्म, अर्थ तथा कामनामक तीन सिद्धान्त; च--भी; यत्--जो भी हो; वासुदेवे-- भगवान् कृष्ण में; भगवति-- भगवान्; आत्म-भावम्--प्रेम काआकर्षण; हृढम्--ठीक से स्थिर; गत: --प्राप्त किया |
हे महर्षियो, महात्मा महाराज परीक्षित ने भगवान् कृष्ण के विचार में निरन्तर लीन रहते हुए,अपनी मृत्यु को आसन्न जानकर, सारे सकाम कर्म अर्थात् धर्म के कार्य, आर्थिक विकास तथाइन्द्रिय तृप्ति त्याग दिए और कृष्ण के लिए सहज प्रेम में अपने को हृढ़ता से स्थिर कर लिया।
तब उन्होंने इन सारे प्रश्नों को उसी तरह पूछा जिस तरह तुम सब मुझसे पूछ रहे हो।
राजोवाचसमीचीन बचो ब्रह्मन् सर्व-ज्ञस्थ तवानघ ।
तमो विशीर्यते मह्यं हरेः कथयतः कथाम् ॥
५॥
राजा उबाच--राजा ने कहा; समीचीनम्--सर्वथा उचित; वच:--वाणी; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण; सर्व-ज्ञस्थ--सब कुछजाननेवाले का; तव--तुम्हारा; अनघ--निष्पाप; तम: --अज्ञान का अंधकार; विशीर्यते--क्रमशः लुप्त हो रहा है; महाम्--मेरेलिए; हरेः-- भगवान् की; कथयत:ः--जिस तरह आप कह रहे हैं; कथाम्ू--कथा ।
महाराज परीक्षित ने कहा : हे विद्वान ब्राह्मण, आप भौतिक दूषण से रहित होने के कारणसब कुछ जानते हैं, अतएव आपने मुझसे जो भी कहा है, वह मुझे पूर्ण रूप से उचित प्रतीत होताहै।
आपकी बातें क्रमश: मेरे अज्ञानरूपी अंधकार को दूर कर रही हैं, क्योंकि आप भगवान् कीकथाएँ कह रहे हैं।
भूय एवं विवित्सामि भगवानात्म-मायया ।
यथेदं सूजते विश्व दुर्विभाव्यमधी श्र: ॥
६॥
भूयः--फिर; एव--भी; विवित्सामि--मैं जानने का इच्छुक हूँ; भगवान्-- भगवान्; आत्म--निजी; मायया--शक्तियों से;यथा--जिस तरह; इृदम्--यह व्यवहार जगत; सृजते--सृजन करता है; विश्वम्--ब्रह्माण्ड को; दुर्विभाव्यमू-- अचिन्त्य;अधी श्वरैः--महान् देवताओं द्वारा।
मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि भगवान् किस प्रकार अपनी निजी शक्तियों से इस रूपमें इन दृश्य ब्रह्माण्डों की सृष्टि करते हैं, जो बड़े से बड़े देवताओं के लिए भी अचित्त्य हैं।
यथा गोपायति विभुर्यथा संयच्छते पुनः ।
यां यां शक्तिमुपश्रित्य पुरु-शक्ति: परः पुमान् ।
आत्मानं क्रीडयन् क्रीडन् करोति विकरोति च ॥
७॥
यथा--जिस तरह; गोपायति--पालन करता है; विभुः--महान्; यथा--जिस तरह; संयच्छते--समेट लेता है; पुनः--फिर; याम्याम्--जैसे-जैसे; शक्तिमू--शक्तियाँ; उपाश्रित्य--लगाकर; पुरु-शक्ति:--सर्वशक्तिमान; पर:--परम; पुमान्ू-- भगवान्आत्मानमू--पूर्ण अंश को; क्रीडबन्--उन्हें लगा करके; क्रीडन्--जिस तरह स्वयं भी लगे रहकर; करोति--करता है;विकरोति--करवाता है; च--तथा।
कृपया बतायें कि सर्व-शक्तिमान परमेश्वर किस तरह अपनी विभिन्न शक्तियों तथा विभिन्नअंशों को इस व्यवहार जगत के पालन करने में लगाते हैं और एक खिलाड़ी के खेल की तरहफिरसे इसे समेट लेते हैं ?
नूनं भगवतो ब्रह्मन् हरेरद्भुत-कर्मण: ।
दुर्विभाव्यमिवाभाति कविभिश्चापि चेष्टितम् ॥
८ ॥
नूनम्-फिर भी अपर्याप्त; भगवत:--भगवान् का; ब्रह्मनू--हे विद्वान ब्राह्मण; हरे: -- भगवान् का; अद्भुत--आश्चर्यजनक;कर्मण:--कर्म करनेवाला; दुर्विभाव्यमू-- अचिन्त्य; इब--सूदश; आभाति--प्रतीत होता है; कविभि:--अत्यधिक दिद्वानों द्वाराभी; च-- भी; अपि--के होते हुए; चेष्टितम्--प्रयास करने पर भी ।
हे विद्वान ब्राह्मण, भगवान् के दिव्य कार्यकलाप अद्भुत हैं और वे अचिन्त्य प्रतीत होते हैं,क्योंकि अनेक विद्वान पंडितों के अनेक प्रयास भी उन्हें समझने में अपर्याप्त सिद्ध होते रहे हैं।
यथा गुणांस्तु प्रकृतेर्युगपत् क्रमशोपि वा ।
बिर्भर्ति भूरिशस्त्वेक: कुर्वन् कर्माणि जन्मभि: ॥
९॥
यथा--जिस तरह वे हैं; गुणान्ू--गुणों को; तु--लेकिन; प्रकृतेः--भौतिक शक्ति के; युगपत्--एकसाथ; क्रमश: -- धीरे-धीरे;अपि--भी; वा--अथवा; बिभर्ति--पालन करता है; भूरिश:--अनेक रूपों में; तु--लेकिन; एक:--सर्वोच्च एक; कुर्वन्--कार्य करते हुए; कर्माणि--कार्यकलाप; जन्मभि: --अवतारों के द्वारा।
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् एक हैं, चाहे वे प्रकृति के गुणों से अकेले कर्म करें या एकसाथकई रूपों में विस्तार करें या कि प्रकृति के गुणों के निर्देशन हेतु बारी-बारी से विस्तार करें।
विचिकित्सितमेतन्मे ब्रवीतु भगवान् यथा ।
शाब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परस्मिश्च॒ भवान्खलु ॥
१०॥
विचिकित्सितमू--सन्देहपूर्ण प्रश्न; एतत्--यह; मे--मुझे; ब्रवीतु--स्पष्ट करें; भगवान्-- भगवान् के समान शक्तिशाली;यथा--जिस तरह; शाब्दे--दिव्य शब्द में; ब्रह्मणि-- वैदिक साहित्य में; निष्णात:--पूर्णतया प्रबुद्ध या पारंगत; परस्मिनू--अध्यात्म में; च-- भी; भवान्ू-- आप; खलु--वास्तव में ।
कृपया इन सारे संशयप्रद प्रश्नों का निवारण कर दें, क्योंकि आप न केवल वैदिक साहित्यके परम विद्वान एवं अध्यात्म में आत्मसिद्ध हैं, अपितु आप भगवान् के महान् भक्त हैं अतएवआप भगवान् के ही समान हैं।
सूत उवाचइत्युपामन्त्रितो राज्ञा गुणानुकथने हरे: ।
हृषीकेशमनुस्मृत्य प्रतिवक्तु प्रचक्रमे ॥
११॥
सूतः उवाच--सूत गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उपामन्त्रितः--अनुरोध किये जाने पर; राज्ञा--राजा द्वारा; गुण-अनुकथने--दिव्य गुणों के वर्णन में; हरेः-- भगवान् के; हृषीकेशम्--इन्द्रियों के स्वामी को; अनुस्मृत्य--ठीक से स्मरणकरके; प्रतिवक्तुमू--उत्तर देने के लिए; प्रचक्रमे--औपचारकिताएँ पूरी कीं ।
सूत गोस्वामी ने कहा : जब राजा ने शुकदेव गोस्वामी से इस प्रकार प्रार्थना की कि वेभगवान् की सृजनात्मक शक्ति का वर्णन करें, तो उन्होंने इन्द्रियों के स्वामी ( श्रीकृष्ण ) काठीक से स्मरण किया और उपयुक्त उत्तर देने के लिए इस प्रकार बोले।
श्री -शुक उवाचनमः परस्मै पुरुषाय भूयसेसदुद्धव-स्थान-निरोध-लीलया ।
गृहीत-शक्ति-त्रितयाय देहिना-मन्तर्भवायानुपलक्ष्य-वर्त्मने ॥
१२॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; नम:ः--नमस्कार; परस्मै--परम; पुरुषाय-- भगवान् को; भूयसे-- परम पूर्णको; सद्-उद्धव-- भौतिक जगत की सृष्टि; स्थान--इसका पालन-पोषण; निरोध--तथा इसका संहार, समेटा जाना; लीलया--लीलाओं से; गृहीत--स्वीकार किया; शक्ति--शक्ति; त्रितयाय--तीन गुण; देहिनाम्ू--समस्त देहधारियों का; अन्तः-भवाय--अन्तःकरण में निवास करनेवाले को; अनुपलक्ष्य--अचिन्त्य; वर्त्मने--ऐसी गतियों वाला।
शुकदेव गोस्वामी ने कहा : मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ, जोभौतिक जगत की सृष्टि के लिए प्रकृति के तीन गुणों को स्वीकार करते हैं।
वे प्रत्येक शरीर केभीतर निवास करनेवाले परम पूर्ण हैं और उनकी गतियाँ अचित्त्य हैं।
भूयो नम: सदवृजिन-च्छिदेउसता-मसम्भवायाखिल-सत्त्व-मूर्तये ।
पुंसां पुनः पारमहंस्य आश्रमेव्यवस्थितानामनुमृग्य-दाशुषे ॥
१३॥
भूयः--पुनः; नम: --मेरा नमस्कार; सत्--भक्तों या पुण्यात्माओं का; वृजिन--आपत्तियाँ; छिदे--मुक्तिदाता; असताम्--नास्तिकों या अभक्त असुरों का; असम्भवाय-- अगले दुखों का अन्त; अखिल--पूर्ण ; सत्त्त--सतोगुण; मूर्तये--पुरुष को;पुंसामू--योगियों का; पुनः--फिर; पारमहंस्ये-- आध्यात्मिक सिद्धि; आश्रमे--आ श्रम में; व्यवस्थितानाम्--विशिष्ट रूप सेस्थित; अनुमृग्य--लक्ष्य; दाशुषे--उद्धारकर्ता ।
मैं पुनः पूर्ण जगत-रूप तथा अध्यात्म-रूप उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ, जोपुण्यात्मा भक्तों को समस्त संकटों से मुक्ति दिलानेवाले तथा अभक्त असुरों की नास्तिकमनोवृत्ति की वृद्धि को विनष्ट करनेवाले हैं।
वे सर्वोच्च आध्यात्मिक सिद्धधि-प्राप्त योगियों कोउनके विशिष्ट पद प्रदान करने वाले हैं।
नमो नमस्तेस्त्वृषभाय सात्वतांविदूर-काष्ठाय मुहुः कुयोगिनाम् ।
निरस्त-साम्यातिशयेन राधसास्व-धामनि ब्रह्मणि रंस्थते नमः ॥
१४॥
नमः नमः ते--मैं आपको नमस्कार करता हूँ; अस्तु--हैं; ऋषभाय--महान् पार्षद को; सात्वताम्--यदुवंश के सदस्यों को;विदूर-काष्ठाय--संसारी द्वन्द्दों से दूर रहनेवाला; मुहुः--सदैव; कु-योगिनाम्--अभक्तों का; निरस्त-- ध्वस्त; साम्य--समान पद;अतिशयेन--महानता से; राधसा--ऐश्वर्य से; स्व-धामनि--अपने धाम में; ब्रह्मणि--वैकुण्ठ लोक में; रंस्थते-- भोग करता है;नमः--मैं नमस्कार करता हूँ।
मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ जो यदुवंशियों के संगी हैं और अभक्तों के लिए सदैवसमस्या बने रहते हैं।
वे भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों के परम भोक्ता हैं, फिर भी वेवैकुण्ठ स्थित अपने धाम का भोग करते हैं।
कोई भी उनके समतुल्य नहीं है, क्योंकि उनकादिव्य ऐश्वर्य अमाप्य है।
यत्कीर्तनं यत्स्मरणं यदीक्षणंयद्वन्दनं यच्छुवणं यदर्हणम् ।
लोकस्य सद्यो विधुनोति कल्मषंतस्मै सुभद्र-अ्रवसे नमो नम: ॥
१५॥
यत्--जिसका; कीर्तनम्ू--महिमागान; यत्--जिसका; स्मरणम्-- स्मरण; यत्--जिसका; ईक्षणम्--दर्शन्; यत्-- जिसका;वन्दनमू-प्रार्थना; यत्ू--जिसका; श्रवणम्-- श्रवण; यत्--जिसका; अर्हणम्--पूजा; लोकस्य--लोगों का; सद्यः --तुरन्त;विधुनोति--विशेष रूप से स्वच्छ करता है; कल्मषम्--पापों के प्रभावों को; तस्मै--उसको; सुभद्गर--मंगलमय; श्रवसे--श्रवण किया गया; नम:ः--नमस्कार; नमः--पुनः
पुनःमैं उन सर्वमंगलमय भगवान् श्रीकृष्ण को सादर नमस्कार करता हूँ जिनके यशोगान,स्मरण, दर्शन, वन्दन, श्रवण तथा पूजन से पाप करनेवाले के सारे पाप-फल तुरन्त धुल जाते हैं।
विचक्षणा यच्चरणोपसादनात्सड्डं व्युदस्यो भयतो न्तरात्मन: ।
विन्दन्ति हि ब्रह्म-गतिं गत-क्लमा-स्तस्मै सुभद्र-श्रवसे नमो नम: ॥
१६॥
विचक्षणा:--अत्यन्त बुद्धिमान; यत्--जिसका; चरण-उपसादनात्--चरणकमलों में आत्म-समर्पण करके; सड्रमू--आसक्ति;व्युदस्य--पूर्णतया त्यागकर; उभयतः--वर्तमान एवं भविष्य में; अन्तः-आत्मन: --हृदय तथा आत्मा का; विन्दन्ति--आगे प्रगतिकरता है; हि--निश्चय ही; ब्रह्म-गतिम्-- आध्यात्मिक जगत की ओर; गत-क्लमा:--बिना कठिनाई के; तस्मै-- उसको;सुभद्र--शुभ; श्रवसे--जो सुना गया है उसे; नम:--मेरा नमस्कार; नम:--पुनः पुनः ।
मैं सर्व-मंगलमय भगवान् श्रीकृष्ण को बारम्बार प्रणाम करता हूँ।
उनके चरण-कमलों कीशरण ग्रहण करने मात्र से उच्च कोटि के बुद्धिमान जन वर्तमान तथा भावी जगत की सारीआसक्तियों से छुटकारा पा जाते हैं और बिना किसी कठिनाई के आध्यात्मिक जगत की ओर अग्रसर होते हैं।
तपस्विनो दान-परा यशस्विनो मनस्विनो मन्त्र-विदः सुमड्रला: ।
क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणं तस्मै सुभद्र-अ्रवसे नमो नम: ॥
१७॥
तपस्विन:--बड़े-बड़े विद्वान् ऋषि; दान-परा:--बड़े-बड़े दानी; यशस्विन:--बड़े-बड़े लब्धप्रतिष्ठ; मनस्विन:--बड़े-बड़ेदार्शनिक या योगी; मन्त्र-विद: --वैदिक मन्त्रों के उच्चारण करनेवाले; सु-मड्डला:--वैदिक सिद्धान्तों के कट्टर अनुयायी;क्षेमम्--सकाम फल; न--कभी नहीं; विन्दन्ति--प्राप्त करते हैं; विना--रहित; यत्-अर्पणम्--समर्पण; तस्मै-- उसको;सुभद्र--शुभ; श्रवसे--उसके विषय में सुनकर; नम:--मेरा नमस्कार; नम:--पुनः पुनः ।
मैं समस्त मंगलमय भगवान् श्रीकृष्ण को पुनः पुनः सादर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि बड़े-बड़े विद्वान ऋषि, बड़े-बड़े दानी, यश-लब्ध कार्यकर्ता, बड़े-बड़े दार्शनिक तथा योगी, बड़े बड़े वेदपाठी तथा बड़े-बड़े वैदिक सिद्धान्तों के बड़े-बड़े अनुयायी तक भी ऐसे महान् गुणों कोभगवान् की सेवा में समर्पित किये बिना कोई क्षेम ( कुशलता ) प्राप्त नहीं कर पाते।
किरात-हूणान्श्र-पुलिन्द-पुल्कशाआभीर-शुम्भा यवना: खसादय: ।
येडन्ये च पापा यदपाश्रया श्रयाःशुध्यन्ति तस्मै प्रभविष्णवे नम: ॥
१८॥
किरात--प्राचीन भारत का एक प्रान्त; हूण--जर्मनी तथा रूस का एक अंग; आन्ध्र--दक्षिणी भारत का प्रान्त; पुलिन्द--ग्रीक;पुल्कशा: --अन्य प्रान्त; आभीर--प्राचीन सिंध का एक भाग; शुम्भा:--अन्य प्रान्त; यवना: --तुर्क; खस-आदय: --मंगोल काप्रान्त; ये--वे भी; अन्ये--अन्य; च-- भी; पापा:--पाप में प्रवृत्त रहनेवाले; यत्ू--जिसका; अपाश्रय-आश्रया: -- भगवद्भक्तोंकी शरण ग्रहण करके; शुध्यन्ति--तुरन्त शुद्ध हो जाते हैं; तस्मै--उस; प्रभविष्णवे--शक्तिमान विष्णु को; नम:--मेरा सादरनमस्कार।
किरात, हूण, आन्श्र, पुलिन्द, पुल्कश, आभीर, शुम्भ, यवन, खस आदि जातियों के सदस्यतथा अन्य लोग, जो पाप कर्मों में लिप्त रहते हुए परम शक्तिशाली भगवान् के भक्तों की शरणग्रहण करके शुद्ध हो सकते हैं, मैं उन भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ।
सएष आत्मात्मवतामधी श्वर-स्त्रयीमयो धर्ममयस्तपोमय: ।
गत-व्यलीकैरज-शड्भूरादिभि-विंतर्क्य-लिड्रो भगवान् प्रसीदताम् ॥
१९॥
सः--वह; एष:--यह है; आत्मा--परमात्मा; आत्मवताम्--स्वरूपसिद्धों का; अधी श्वर:--परमे श्वर; त्रयी-मय:--साक्षात् वेद;धर्म-मयः--साक्षात् शास्त्र; तप:ः-मयः--साक्षात् तप; गत-व्यलीकै: --आडंबररहितों द्वारा; अज--ब्रह्माजी; शड्भूर-आदिभि:--शिवजी तथा अन्यों द्वारा; वितर्क्य-लिड्र:--आश्चर्य तथा सम्मान के साथ देखा जानेवाला; भगवान्-- भगवान् प्रसीदताम्--मेरेप्रति दयालु हों ।
वे परमात्मा हैं तथा समस्त स्वरूपसिद्ध पुरुषों के परमेश्वर हैं।
वे साक्षात् वेद, धर्मग्रंथ( शास्त्र ) तथा तपस्या हैं।
वे ब्रह्मजी, शिवजी तथा कपट से रहित समस्त व्यक्तियों द्वारा पूजितहैं।
आश्चर्य तथा सम्मान से ऐसे पूजित होनेवाले पूर्ण पुरुषोत्तम मुझ पर प्रसन्न हों।
श्रिय: पतिर्यज्ञ-पतिः प्रजा-पति-घिंयां पतिलोक-पतिर्धरा-पति: ।
पतिर्गतिश्वान्धक-वृष्णि-सात्वतांप्रसीदतां मे भगवान् सतां पति: ॥
२०॥
भ्रिय:--समस्त ऐश्वर्य; पति: --स्वामी; यज्ञ--यज्ञ का; पति:--निर्देशक ; प्रजा-पति:--समस्त जीवों के नायक; धियाम्--बुद्धधिका; पतिः--स्वामी; लोक-पति:--समस्त लोकों के स्वामी; धरा--पृथ्वी का; पति:--परम; पति:-- अग्रणी; गति:-- गन्तव्य;च--भी; अन्धक--यदुवंश के राजाओं में से एक; वृष्णि--यदुवंश का पहला राजा; सात्वतामू--यदुगण; प्रसीदताम्-कृपालुहों; मे--मुझ पर; भगवान्-- श्रीकृष्ण; सताम्-- भक्तों के; पति:--स्वामी ।
भगवान् श्रीकृष्ण, जो समस्त भक्तों द्वारा पूज्य हैं, यदुवंश के अंधक तथा वृष्णि जैसे समस्त राजाओं के रक्षक तथा उनके यश्ञ हैं, लक्ष्मी देवी के पति, समस्त यज्ञों के निर्देशक अतएवसमस्त जीवों के अग्रणी, समस्त बुद्धि के नियन्ता, समस्त दिव्य एवं भौतिक लोकों के अधिष्ठातातथा पृथ्वी पर परम अवतार ( सर्वेसर्वा ) हैं, वे मुझ पर कृपालु हों।
यदड्ख्रूयभिध्यान-समाधि-धौतयाधियानुपश्यन्ति हि तत्त्वमात्मनः ।
वदन्ति चेतत् कवयो यथा-रुचंस मे मुकुन्दो भगवान् प्रसीदताम् ॥
२१॥
यत्-अड्घ्रि--जिसके चरणकमल; अभिध्यान--प्रत्येक क्षण चिन्तन करते; समाधि--समाधि; धौतया-- धुल जाने से; धिया--ऐसी विमल बुद्धि से; अनुपश्यन्ति--महापुरुषों का अनुसरण करते हुए देखते हैं; हि--निश्चय ही; तत्त्वमू--परम सत्य को;आत्मन:--परमेश्वर का तथा अपना; वदन्ति--कहते हैं; च-- भी; एतत्--यह; कवय: --दार्शनिक या विद्वान पंडित; यथा-रुचम्--जैसा वह सोचता है; सः--वह; मे--मेरा; मुकुन्दः-- भगवान् कृष्ण ( जो मुक्ति के दाता हैं ); भगवान्-- भगवान्;प्रसीदताम्--मुझ पर प्रसन्न हों ।
भगवान् श्रीकृष्ण ही मुक्तिदाता हैं।
भक्त प्रतिपल उनके चरण-कमलों का चिन्तन करकेऔर महापुरुषों के चरणचिन्हों पर चलते हुए समाधि में परम सत्य का दर्शन कर सकता है।
तथापि विद्वान ज्ञानीजन उनके विषय में अपनी सनक के अनुसार चिन्तन करते हैं।
ऐसे भगवान्मुझ पर प्रसन्न हों।
प्रचोदिता येन पुरा सरस्वतीवितन्वताजस्य सत्तीं स्मृतिं हृदि ।
स्व-लक्षणा प्रादुरभूत् किलास्यतःस मे ऋषीणामृषभः प्रसीदताम् ॥
२२॥
प्रचोदिता-- प्रेरित; येन--जिसके द्वारा; पुरा--सृष्टि के प्रारम्भ में; सरस्वती--विद्या की देवी; वितन््वता--विस्तारित; अजस्य--प्रथम जीव ब्रह्मा का; सतीम् स्मृतिमू--शक्तिशाली स्मरण शक्ति; हृदि--हृदय में; स्व-- अपना; लक्षणा--लक्षित; प्रादुरभूत् --उत्पन्न किया गया; किल--मानो; आस्यतः --मुँह से; सः--वह; मे--मुझ पर; ऋषीणाम्--शिक्षकों का; ऋषभ:--प्रमुख;प्रसीदताम्--प्रसन्न हों।
जिन्होंने सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा के हृदय में शक्तिशाली ज्ञान का विस्तार किया और सृष्टितथा अपने विषय में पूर्ण ज्ञान की प्रेरणा दी और जो ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुए प्रतीत हुए, वेभगवान् मुझ पर प्रसन्न हों।
भूतैर्महद्धिर्य इमा: पुरो विभु-निर्माय शेते यदमूषु पूरूष: ।
भुड़े गुणान् षोडश षोडशात्मक:सोउलड्कृषीष्ट भगवान् वचांसि मे ॥
२३॥
भूतैः--तत्त्वों के द्वारा; महद्धिः--भौतिक सृष्टि के; यः--जो; इमाः--ये सब; पुरः--शरीर; विभु:-- भगवान् के ; निर्माय--तैयार करने के लिए; शेते--लेटते हैं; यत् अमूषु--अवतीर्ण होनेवाला; पूरुष:-- भगवान् विष्णु; भुड्ढे --प्रभावित करते हैं;गुणान्--तीनों गुणों को; षोडश--सोलह भागों में; षोडश-आत्मक:--इन सोलह का जनक होने से; सः--वह; अलड्डू षीष्ट--सुसज्जित करे; भगवान्-- भगवान्; वचांसि--वाणी को; मे--मेरी ।
ब्रह्माण्ड के भीतर लेटकर जो तत्त्वों से निर्मित शरीरों को प्राणमय बनाते हैं और जो अपनेपुरुष-अवतार में जीव को भौतिक गुणों के सोलह विभागों को, जो जीव के जनक रूप हैंअधीन करते हैं, वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मेरे प्रवचचनों को अलंकृत करने के लिए प्रसन्न हों।
नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय वेधसे ।
पपुरज्ानमयं सौम्या यन्मुखाम्बुरुहासवम् ॥
२४॥
नमः--मेरा नमस्कार है; तस्मै--उस; भगवते-- भगवान् को; वासुदेवाय--वासुदेव या उनके अवतारों को; वेधसे--वैदिक ग्रंथोंके संकलनकर्ता; पपु:--पान किया गया; ज्ञानमू--ज्ञान; अयम्--यह वैदिक ज्ञान; सौम्या:-- भक्तगण, विशेष रूप से भगवान्कृष्ण की प्रेमिकाएँ; यत्--जिनके ; मुख-अम्बुरुह--कमल सहश मुख का; आसवम्--अमृत |
मैं साक्षात् वासुदेव के अवतार उन श्रील व्यासदेव को सादर नमस्कार करता हूँ जिन्होंने वैदिक शास्त्रों का संकलन किया।
शुद्ध भक्तगण भगवान् के कमल सद्ृश मुख से टपकते हुएअपृतोपम दिव्य ज्ञान का पान करते हैं।
'एतदेवात्म-भू राजन् नारदाय विपृच्छते ।
वेद-गर्भो भ्यधात् साक्षाद् यदाह हरिरात्मन: ॥
२५॥
एतत्--इस विषय में; एब--इसी तरह; आत्म-भू:--प्रथम जन्मा ( ब्रह्माजी ); राजन्--हे राजा; नारदाय--नारदमुनि से;विपृच्छते--पूछा जाकर; बेद-गर्भ:--जन्म से ही वैदिक ज्ञान से संपृक्त है, जो; अभ्यधात्--बतलाया; साक्षात्-- प्रत्यक्ष; यत्आह--उसने जो कहा; हरिः -- भगवान्; आत्मन:--अपने ही से ब्रह्मा से ) |
हे राजन, नारद द्वारा पूछे जाने पर प्रथम-जन्मा ब्रह्माजी ने इस विषय में ठीक वही बातबतलाई जो भगवान् ने अपने पुत्र ( ब्रह्मा ) से प्रत्यक्ष कही थी जो जन्म से ही वैदिक ज्ञान सेसंपृक्त थे।
