← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 2 की सूची
अध्याय पाँच: सभी कारणों का कारण
2.5नारद उवाचदेव-देव नमस्तेस्तु भूत-भावन पूर्वज ।
तद् विजानीहि यज्ज्ञानमात्म-तत्त्व-निरदर्शनम् ॥
१॥
नारद: उवाच-- श्री नारद ने कहा; देव--समस्त देवताओं के ; देव--देवता; नमः--नमस्कार; ते--तुमको; अस्तु--है; भूत-भावन--समस्त प्राणियों के जनक; पूर्व-ज--सर्वप्रथम जन्मा; तत् विजानीहि--उस ज्ञान को बताएँ; यत् ज्ञानमू--जो ज्ञान;आत्म-तत्त्व--दिव्य; निरदर्शनम्--विशेष रूप से निर्देश करता है।
श्री नारद मुनि ने ब्रह्माजी से पूछा : हे देवताओं में प्रमुख देवता, हे अग्रजन्मा जीव, मैंआपको सादर नमस्कार करता हूँ।
कृपा करके मुझे वह दिव्य ज्ञान बतायें, जो मनुष्य को आत्मातथा परमात्मा के सत्य तक ले जाने वाला है।
यद्वूपं यदथ्ष्ठानं यतः सृष्टमिदं प्रभो ।
यत्संस्थं यत्परं यच्च तत् तत्त्वं बद तत्त्वतः ॥
२॥
यत्--जो; रूपमू-- लक्षण; यत्--जो; अधिष्ठानम्--पृष्ठ भूमि; यत:ः--जहाँ से; सृष्टम्--उत्पन्न; इदम्--यह संसार; प्रभो--हेपिता; यत्--जिसमें; संस्थम्--प्रतिष्ठित; यत्--जो; परम्ू--वश में; यत्--जो हैं; च--तथा; तत्--इसका; तत्त्वम्-लक्षण;वबद--कृपया वर्णन करें; तत्त्वतः--वास्तव में |
है पिता, आप इस व्यक्त जगत के वास्तविक लक्षणों का वर्णन करें।
इसका आधार क्याहै? यह किस तरह उत्पन्न हुआ ? यह किस तरह संस्थित है? और यह सब किसके नियन्त्रण मेंकिया जा रहा है?
सर्व होतद् भवान् वेद भूत-भव्य-भवत्प्रभु: ।
'करामलक-वद् विश्व विज्ञानावसितं तव ॥
३॥
सर्वम्--सारी वस्तुएँ; हि--निश्चय ही; एतत्--यह; भवान्--आप; वेद--जानते हैं; भूत--जो भी उत्पन्न है; भव्य--जो उत्पन्नहोंगे; भवत् प्रभु;--आप, सबों के स्वामी; कर-आमलक-वत्--हथेली के आँवले के समान; विश्वम्--ब्रह्माण्ड; विज्ञान-अवसितम्--आपके वैज्ञानिक ज्ञान के अन्तर्गत; तब--आपका
हे पिता, आप यह सब वैज्ञानिक ढंग से जानते हैं, क्योंकि भूतकाल में जो कुछ रचा गया,भविष्य में जो भी रचा जायेगा या वर्तमान में जो कुछ रचा जा रहा है तथा इस ब्रह्माण्ड के भीतर जितनी सारी वस्तुएँ हैं, वे सब आपकी हथेली में आँवले के सहश हैं।
यद्विज्ञानो यदाधारो यत्परस्त्वं यदात्मकः ।
एकः सृजसि भूतानि भूतैरेवात्म-मायया ॥
४॥
यतू-विज्ञान:--ज्ञान का स्त्रोत; यत्ू-आधार:--जिसके संरक्षण में; यत्-पर:--जिसकी अधीनता में; त्वम्--तुम; यत्-आत्मक:ः--किस हैसियत से; एक:--अकेले; सृजसि--सृष्टि करते हो; भूतानि--जीवों को; भूतैः -- भौतिक तत्त्वों के द्वारा;एव--निश्चय ही; आत्म--स्व; मायया--शक्ति से |
है पिता, आपके ज्ञान का स्त्रोत क्या है? आप किसके संरक्षण में रह रहे हैं? आप किसकीअधीनता में कार्य करते हैं? आपकी वास्तविक स्थिति कया है? क्या आप अकेले ही सारे जीवोंको अपनी निजी शक्ति के द्वारा भौतिक तत्त्वों से उत्पन्न करते हैं ?
आत्मन् भावयसे तानि न पराभावयन् स्वयम् ।
आत्म-शक्तिमवष्टभ्य ऊर्णनाभिरिवाक्लम: ॥
५॥
आत्मन् ( आत्मनि )--अपने द्वारा; भावयसे-- प्रकट करते हैं; तानि--वे सब; न--नहीं; पराभावयन्--पराजित होकर;स्वयमू--खुद, अपने आप; आत्म-शक्तिम्--आत्मनिर्भर शक्ति; अवष्टभ्य--नियुक्त होकर; ऊर्ण-नाभि:--मकड़ी; इब--सहृश;अक्लम:--बिना सहायता के।
जिस प्रकार मकड़ी अपने जाले को सरलता से उत्पन्न करती है और अन्यों के द्वारा पराजितहुए बिना अपनी सृजन-शक्ति प्रकट करती है, उसी प्रकार आप अपनी आत्म-निर्भर शक्ति कोप्रयुक्त करके दूसरे से सहायता लिये बिना सृजन करते हैं।
नाहं वेद पर हास्मिन्नापरं न समं विभो ।
नाम-रूप-गुणैर्भाव्यं सदसत् किल्लिदन्यतः ॥
६॥
न--नहीं; अहम्--मैं; वेद-- जानता हूँ; परम्- श्रेष्ठ; हि--क्योंकि; अस्मिनू--इस संसार में; न--न तो; अपरम्--निकृष्ट; न--न तो; सममू--समान; विभो--हे महान्; नाम--नाम; रूप--लक्षण; गुणैः--योग्यता से; भाव्यम्--सूजित, सृष्ट; सत्ू--नित्य,शाश्वत; असतू--क्षण भंगुर; किल्ञित्--या अन्य इसी तरह की कोई वस्तु; अन्यतः--किसी अन्य स्त्रोत से ।
हम किसी विशेष वस्तु-श्रेष्ठ, निकृष्ट या समतुल्य, नित्य या क्षणिक--इनके नामों,लक्षणों तथा गुणों से जो भी समझ पाते हैं, वह आपके अतिरिक्त अन्य किसी स्त्रोत से सृजितनहीं होती, क्योंकि आप इतने महान् हैं।
स भवानचरद् घोरं यत् तप: सुसमाहितः ।
तेन खेदयसे नस्त्वं परा-शड्भां च यच्छसि ॥
७॥
सः--वह; भवान्--आपने; अचरत्--किया; घोरम्ू--कठिन; यत् तप: --ध्यान; सु-समाहितः --पूर्ण अनुशासन में; तेन--उसकारण से; खेदयसे--कष्ट देते हैं; न:--हमको; त्वमू--आप; परा--अन्तिम सत्य; शट्डामू--सन्देह; च--तथा; यच्छसि--हमेंअवसर प्रदान करते हैं।
फिर भी जब हम आपके द्वारा पूर्ण अनुशासन में रहते हुए सम्पन्न कठिन तपस्याओं के विषयमें सोचते हैं, तो हमें आपसे भी अधिक शक्तिशाली किसी व्यक्ति के अस्तित्व के विषय मेंआश्चर्य-चकित रह जाना होता है, यद्यपि आप सृष्टि के मामले में इतने शक्तिशाली हैं।
एतन्मे पृच्छतः सर्व सर्व-ज्ञ सकलेश्वर ।
विजानीहि यथैवेदमहं बुध्येडनुशसित: ॥
८ ॥
एतत्--यह सब; मे--मुझको; पृच्छत:--उत्सुक, जिज्ञासु; सर्वम्--जो कुछ पूछा जाता है; सर्व-ज्ञ--सब कुछ जाननेवाला;सकल--सप्पूर्ण; ईश्वर--नियन्ता; विजानीहि--कृपा करके बतायें; यथा--जिस तरह; एव--वे हैं; इदम्--यह; अहम्--मैं;बुध्ये--समझ सकूँ; अनुशासित:--आपसे सीखकर
हे पिता, आप सब कुछ जाननेवाले हैं और सबों के नियन्ता हैं।
अतएवं मैंने आपसे जितनेसारे प्रश्न किये हैं, उन्हें कृपा करके बताइये, जिससे मैं आपके शिष्य के रूप में उन्हें समझ सकूँ।
ब्रह्मोवाचसम्यक् कारुणिकस्येदं वत्स ते विचिकित्सितम् ।
यदहं चोदितः सौम्य भगदद्दीर्य-दर्शने ॥
९॥
ब्रह्मा उवाच--ब्रह्माजी ने कहा; सम्यक्ू--ठीक ढंग से; कारुणिकस्य--आपका, जो अत्यन्त दयालु हैं; इदम्--यह; वत्स--मेरेबच्चे; ते--तुम्हारी; विचिकित्सितम्--जिज्ञासा; यत्--जिससे; अहम्--मैं; चोदितः--प्रेरित; सौम्य--हे भद्र; भगवत्-- भगवान्का; वीर्य--पराक्रम के; दर्शने--सम्बन्ध में, विषयक ।
ब्रह्माजी ने कहा : हे मेरे वत्स नारद, तुमने सबों पर ( मुझ सहित ) करुणा करके ही ये सारेप्रश्न पूछे हैं, क्योंकि इनसे मैं भगवान् के पराक्रम को बारीकी से देखने के लिए प्रेरित हुआ हूँ।
नानृतं तव तच्चापि यथा मां प्रत्रवीषि भो: ।
अविज्ञाय परं मत्त एतावत्त्वं यतो हि मे ॥
१०॥
न--नहीं; अनृतम्--झूठ; तव--तुम्हारा; तत्ू--वह; च-- भी; अपि--जैसा तुमने कहा है; यथा--विषय में; माम्--मेरे;प्रत्रवीषि--जिस तरह तुम कहते हो; भो:--हे पुत्र; अविज्ञाय--बिना जाने; परम्--परम; मत्त:--मुझसे परे; एतावत्--जो कुछकहा है; त्वमू--तुमने; यतः--के कारण से; हि--निश्चय ही; मे--मेंरे विषय में
तुमने मेरे विषय में जो कुछ कहा है, वह असत्य नहीं है, क्योंकि जब तक कोई उन भगवान्के विषय में अवगत नहीं हो लेता, जो मुझसे परे परम सत्य रूप हैं, तब तक वह मेरे सशक्तकार्यकलापों से निश्चित रूप से मोहित होता रहेगा।
येन स्व-रोचिषा विश्व रोचितं रोचयाम्यहम् ।
यथाकोग्निर्यथा सोमो यथर्क्नष-ग्रह-तारका: ॥
११॥
येन--जिसके द्वारा; स्व-रोचिषा--अपने तेज से; विश्वम्--सारा जगत; रोचितम्--पहले से रचा हुआ; रोचयामि-- प्रकट करताहूँ; अहम्ू-मैं; यथा--जिस तरह; अर्क: --सूर्य; अग्नि:--अग्नि; यथा--जिस तरह; सोम: --चन्द्रमा; यथा--जिस तरह;ऋक्ष--आकाश; ग्रह-- प्रभावशाली लोक; तारका:--तारे ।
भगवान् द्वारा अपने निजी तेज ( ब्रह्मज्योति ) से की गईं सृष्टि के बाद मैं उसी तरह सृजनकरता हूँ जिस तरह कि सूर्य द्वारा अग्नि प्रकट होने के बाद चन्द्रमा, आकाश, प्रभावशाली ग्रहतथा टिमटिमाते तारे भी अपनी चमक प्रकट करते हैं।
तस्मै नमो भगवते वासुदेवाय धीमहि ।
यन्मायया दुर्जयया मां वदन्ति जगदगुरुम्ू ॥
१२॥
तस्मै--उस; नम:ः--नमस्कार करता हूँ; भगवते-- भगवान् को; वासुदेवाय-- भगवान् कृष्ण को; धीमहि-- उनका ध्यान करताहूँ; यत्ू-जिस; मायया--शक्ति के द्वारा; दुर्जयया--दुर्जय; माम्--मुझको; वदन्ति--कहते हैं; जगत्--जगत; गुरुम्--स्वामी |
मैं उन भगवान् कृष्ण ( वासुदेव) को नमस्कार करता हूँ तथा उनका ध्यान करता हूँ,जिनकी दुर्जय शक्ति उन्हें ( अल्पज्ञ मनुष्यों को ) इस तरह प्रभावित करती है कि वे मुझे ही परमनियन्ता कहते हैं।
विलज्जमानया यस्य स्थातुमीक्षा-पथेउमुया ।
विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धिय: ॥
१३॥
विलज्ञममानया--लज्तत व्यक्ति द्वारा; यस्थ--जिसका; स्थातुम्ू--ठहरने के लिए; ईक्षा-पथे--समक्ष; अमुया-- भ्रामिका शक्तिद्वारा; विमोहिता:--जो मोहित हैं; विकत्थन्ते--प्रलाप करते हैं; मम--यह मेरा है; अहम्ू--मैं ही सब कुछ हूँ; इति--इस तरहभला-बुरा कहकर; दुर्धियः--इस प्रकार बुरा सोचा गया।
भगवान् की भ्रामिका शक्ति ( माया ) अपनी स्थिति से लज्जित होने के कारण सामने ठहरनहीं पाती, लेकिन जो लोग इसके द्वारा मोहित होते हैं, वे 'यह मैं हूँ!' और 'यह मेरा है' केविचारों में लीन रहने के कारण व्यर्थ की बातें करते हैं।
द्रव्यं कर्म च कालश्व स्वभावो जीव एव च ।
वासुदेवात्परो ब्रह्मन्न चान्योर्थोउस्ति तत्त्वतः ॥
१४॥
द्रव्यमू--अवयवब ( पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा आकाश ); कर्म--अन्योन्य क्रियाएँ; च--तथा; काल:--शाश्वत काल; च--भी; स्व-भाव:--स्वभाव; जीव: --जीव; एब--निश्चय ही; च--तथा; वासुदेवात्--वासुदेव से; पर:--भिन्न अंश; ब्रह्मनू--हेब्राह्मण; न--कभी नहीं; च-- भी; अन्य:--पृथक्; अर्थ:--महत्त्व; अस्ति--है; तत्त्वतः--वास्तव में
सृष्टि के पाँच मूल अवयव शाश्वत काल द्वारा उनसे उत्पन्न अन्योन्य क्रिया तथा जीव कास्वभाव--ये सब भगवान् वासुदेव के भिन्नांश हैं और सच बात तो यह है कि उनका कोई अन्यमहत्व नहीं है।
नारायण-परा वेदा देवा नारायणाड्ुजा: ।
नारायण-परा लोका नारायण-परा मखा: ॥
१५॥
नारायण--परमेश्वर; परा:--कारण-स्वरूप तथा उसी के निमित्त; बेदा:--ज्ञान; देवा:--देवता; नारायण--परमेश्वर के; अड्र-जा:--सहायक; नारायण-- भगवान्; परा: --के लिए; लोका:--सारे लोक; नारायण--परमेश्वर; परा:--उन््हें प्रसन्न करने केलिए; मखा:--सारे यज्ञ
सारे वैदिक ग्रंथ परमेश्वर से ही बने हैं और उन्हीं के निमित्त हैं।
देवता भी भगवान् के शरीरके अंगों के रूप में उन्हीं की सेवा के लिए हैं।
विभिन्न लोक भी भगवान् के निमित्त हैं औरविभिन्न यज्ञ उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए सम्पन्न किये जाते हैं।
नारायण-परो योगो नारायण-परं तपः ।
नारायण-परं ज्ञानं नारायण-परा गति: ॥
१६॥
नारायण-पर:--नारायण को जानने के लिए; योग:--मन की एकाग्रता; नारायण-परम्--नारायण को प्राप्त करने के उद्देश्य से;तपः--तपस्या; नारायण-परम्--नारायण की झलक पाने के लिए; ज्ञानम्--दिव्य ज्ञान की संस्कृति; नारायण-परा--नारायणके धाम में प्रवेश करते ही मोक्ष का पथ समाप्त हो जाता है; गतिः--उत्तरोत्तर पथ।
सभी प्रकार के ध्यान या योग नारायण की अनुभूति प्राप्त करने के लिए हैं।
सारी तपस्याओंका लक्ष्य नारायण को प्राप्त करने के निमित्त है।
दिव्य ज्ञान का संवर्धन नारायण की झलकप्राप्त करने के लिए है और चरम मोक्ष तो नारायण के धाम में प्रवेश करने के लिए ही है।
तस्यापि द्रष्टरीशस्य कूट-स्थस्याखिलात्मन: ।
सृज्यं सृजामि सृष्टोहमी क्षयैवाभिचोदित: ॥
१७॥
तस्य--उसका; अपि--निश्चय ही; द्रष्ट:ः --देखनेवाले का; ईशस्थ--नियन्ता का; कूट-स्थस्य--जो सबों की बुद्द्धि के ऊपर है,उसका; अखिल-आत्मन:--परमात्मा का; सृज्यम्--पहले से सूष्ट; सृजामि--मैं खोजता हूँ; सृष्ट: --सृजित; अहम्--मैं;ईक्षया--झलक मात्र से; एबव--सही-सही; अभिचोदित:--उससे प्रेरित होकर ।
उनके ही द्वारा प्रेरित होकर मैं भगवान् नारायण द्वारा सर्वव्यापी परमात्मा के रूप में उनकीही दृष्टि के सामने पहले जो सृजित हो चुका है, उसी की फिर खोज करता हूँ और मैं भी केवलउन्हीं के द्वारा सृजित हूँ।
सत्त्वं रजस्तम इति निर्गुणस्य गुणास्त्रयः ।
स्थिति-सर्ग-निरोधेषु गृहीता मायया विभो: ॥
१८॥
सत्त्वम्--सतोगुण; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; इति--ये सब; निर्गुणस्थ--ब्रह्म के; गुणा: त्रयः--तीन गुण हैं; स्थिति--पालन; सर्ग--उत्पत्ति; निरोधेषु--संहार में; गृहीता:--स्वीकृत; मायया--बहिरंगा शक्ति के द्वारा; विभो:--परमेश्वर की ।
परमेश्वर अपने शुद्ध आध्यात्मिक रूप में सारे भौतिक गुणों से परे होते हैं, फिर भी भौतिकजगत की सृष्टि, उसके पालन तथा संहार के लिए वे अपनी बहिरंगा शक्ति के माध्यम से प्रकृतिके गुणों को--सतो, रजो तथा तमो गुणों को--स्वीकार करते हैं।
कार्य-कारण-कर्तृत्वे द्रव्य-ज्ञान-क्रिया श्रया: ।
बध्नन्ति नित्यदा मुक्त मायिनं पुरुष गुणा: ॥
१९॥
कार्य--प्रभाव, फल; कारण--कारण; कर्तृत्वे--कार्यो में; द्रव्य--पदार्थ; ज्ञान--ज्ञान; क्रिया-आश्रया:--ऐसे लक्षणों सेप्रकट; बध्नन्ति--बद्ध करते हैं; नित्यदा--नित्य; मुक्तम्ू--दिव्य; मायिनम्-- भौतिक शक्ति से प्रभावित; पुरुषम्--जीव को;गुणा:--भौतिक गुण।
भौतिक प्रकृति के ये तीनों गुण आगे चलकर पदार्थ, ज्ञान तथा क्रियाओं के रूप में प्रकटहोकर दिव्य जीव को कार्य-कारण के प्रतिबन्धों के अन्तर्गत डाल देते हैं और ऐसे कार्यों केलिए उसे उत्तरदायी बना देते हैं।
स एष भगवॉल्लिड्रैस्त्रिभिरेतैरधोक्षज: ।
स्वलक्षित-गतिर््रह्मन् सर्वेषां मम चेश्वर: ॥
२०॥
सः--वह; एषः--यह; भगवानू-- भगवान्; लिड्डैः--लक्षणों से; त्रिभिः:--तीन; एतैः--इन सबों से; अधोक्षज: --परम द्रष्टाब्रह्म; सु-अलक्षित-- अदृश्य; गति:ः--चाल-फेर; ब्रह्मनू--हे नारद; सर्वेषाम्--हर एक का; मम--मेरा; च-- भी; ईश्वर: --नियन्ता।
हे ब्राह्मण नारद, परम द्रष्टा परब्रह्म प्रकृति के उपर्युक्त तीनों गुणों के कारण जीवों कीइन्द्रियों की अनुभूति से परे हैं।
लेकिन वे मुझ समेत सबों के नियन्ता हैं।
कालं कर्म स्वभाव च मायेशो मायया स्वया ।
आत्मन् यहचच्छया प्राप्तं विबुभूषुरुपाददे ॥
२१॥
कालमू--नित्य काल; कर्म--जीव का भाग्य; स्वभावम्-- प्रकृति; च-- भी; माया--शक्ति; ईश:--नियन्ता; मायया--शक्तिसे; स्वया--अपनी; आत्मन्--( आत्मनि ) अपने को; यहच्छया--स्वतन्त्रतापूर्वक; प्राप्तम्--तदाकार होकर; विबुभूषु:--भिन्नदिखनेवाले; उपाददे--पुनः सृजित होना स्वीकार किया ।
समस्त शक्तियों के नियन्ता भगवान् अपनी ही शक्ति से नित्य काल, समस्त जीवों के भाग्यतथा उनके विशिष्ट स्वभाव की सृष्टि करते हैं और फिर स्वतन्त्र रूप से उन्हें अपने में विलीन कर लेते हैं।
कालाद् गुण-व्यतिकरः परिणाम: स्वभावत: ।
कर्मणो जन्म महतः पुरुषाधिष्ठितादभूत् ॥
२२॥
कालात्--नित्यकाल से; गुण-व्यतिकर:--प्रतिक्रिया द्वारा गुणों का रूपान्तर; परिणाम: --रूपान्तर; स्वभावत:--स्वभाव से;कर्मण:--कर्मो से; जन्म--सृष्टि; महतः --महत्तत्व का; पुरुष-अधिष्टितात्-- भगवान् के पुरुष-अवतार के कारण; अभूत्--हुआ,
्रथम पुरुष के अवतार ( कारणार्णवशायी विष्णु ) के बाद महत्ू-तत्त्व अथवा भौतिक सृष्टिके तत्त्व अर्थात् भौतिक सृष्टि के सिद्धान्त घटित होते हैं, तब काल प्रकट होता है और काल-क्रम से तीनों गुण प्रकट होते हैं।
प्रकृति का अर्थ है तीन गुणात्मक अभिव्यक्तियाँ, जो कार्यों मेंरूपान्तरित होती हैं।
महतस्तु विकुर्वाणाद्रज: -सत्त्वोपबूंहितात् ।
तमः -प्रधानस्त्वभवद् द्रव्य-ज्ञान-क्रियात्मक ४ ॥
२३॥
महतः--महत् तत्त्व का; तु--लेकिन; विकुर्वाणात्--रूपान्तरित होकर; रज:--रजोगुण; सत्त्व--सतोगुण; उपबूंहितात्ू--बढ़जाने से; तम:ः--तमोगुण; प्रधान: --प्रमुख होने से; तु--लेकिन; अभवत्--घटित हुआ; द्रव्य--पदार्थ; ज्ञान-- भौतिक ज्ञान;क्रिया-आत्मक:--प्रधानतः भौतिक कार्यकलाप ।
महत् तत्त्व के विश्लुब्ध होने पर भौतिक क्रियाएँ उत्पन्न होती हैं।
सर्वप्रथम सतो तथा रजोगुणोंका रूपान्तरण होता है और बाद में तमोगुण के कारण पदार्थ, ज्ञान तथा ज्ञान के विभिन्नकार्यकलाप प्रकट होते हैं।
सोहड्ढार इति प्रोक्तो विकुर्वन् समभूत्तिधा ।
वैकारिकस्तैजसश्व॒ तामसश्नेति यद्धिदा ।
द्रव्य-शक्ति: क्रिया-शक्तिर्ज्ञान-शक्तिरिति प्रभो ॥
२४॥
सः--वही; अहड्ढार:--अहंकार; इति--इस प्रकार; प्रोक्त:--कहा गया; विकुर्वन्--रूपान्तरित होकर; समभूत्--प्रकट हुआ;त्रिधा--तीन रूपों में; वैकारिक:--सतो गुणो में; तैजस:--रजोगुण में; च--तथा; तामस:--तमोगुण में; च-- भी; इति--इसप्रकार; यत्--जो है; भिदा--विभक्त; द्रव्य-शक्ति:--पदार्थ को विकसित करनेवाली शक्ति; क्रिया-शक्ति:--सृजन करने कीप्रेरणा; ज्ञान-शक्ति: --मार्गदर्शक बुद्धि; इति--इस तरह; प्रभो--हे स्वामी ।
इस प्रकार आत्म-केन्द्रित भौतिकतावादी अहंकार तीनों स्वरूपों में रूपान्तरित होकरसतोगुण, रजोगुण तथा तमोगुण बन जाता है।
ये तीन स्वरूप हैं : पदार्थ को विकसित करनेवाली शक्तियाँ, भौतिक सृष्टियों का ज्ञान तथा ऐसी भौतिकतावादी क्रियाओं का मागदर्शनकरनेवाली बुद्धि।
हे नारद, तुम इसे समझने के लिए पूर्ण सक्षम हो।
तामसादपि भूतादेर्विकुर्वाणादभून्नभ: ।
तस्य मात्रा गुण: शब्दो लिड़ं यद् द्रष्ट-हश्ययो: ॥
२५॥
तामसात्--मिथ्या अहंकार के अंधकार से; अपि--निश्चय ही; भूत-आदेः -- भौतिक तत्त्वों का; विकुर्वाणात्ू--रूपान्तरण केकारण; अभूत्--उत्पन्न हुआ; नभ:--आकाश; तस्य--उसका; मात्रा--सूक्ष्म रूप; गुण:--गुण; शब्द: --ध्वनि; लिड्रम्ू--लक्षण; यत्--जो; द्रष्ट--द्रष्टा; हश्ययो:--देखे गये का |
मिथ्या अंहकार के अंधकार से पाँच तत्त्वों में से पहला तत्त्व आकाश उत्पन्न होता है।
इसका सूक्ष्म रूप शब्द का गुण है, ठीक उसी प्रकार जिस तरह द्रष्टा का दृश्य से सम्बन्ध होता है।
नभसोथ विकुर्वाणादभूत् स्पर्श-गुणोनिल: ।
परान्वयाच्छब्दवां श्र प्राण ओज: सहो बलम् ॥
२६॥
वबायोरपि विकुर्वाणात् काल-कर्म-स्वभावतः ।
उदपद्यत तेजो वै रूपवत् स्पर्श-शब्दबत् ॥
२७॥
तेजसस्तु विकुर्वाणादासीदम्भो रसात्मकम् ।
रूपवत् स्पर्शवच्चाम्भो घोषवच्च परान्वयात् ॥
२८॥
विशेषस्तु विकुर्वाणादम्भसो गन्धवानभूत् ।
परान्वयाद् रस-स्पर्श-शब्द-रूप-गुणान्वितः ॥
२९॥
नभसः--आकाश का; अथ--इस प्रकार; विकुर्वाणात्--रूपान्तरित होकर; अभूत्--उत्पन्न हुआ; स्पर्श--स्पर्श; गुण:--गुण;अनिलः--वायु; पर--पूर्ववर्ती, पिछली; अन्वयात्--परम्परा से; शब्दवान्-- ध्वनि से पूर्ण; च-- भी; प्राण:--प्राण, जीवन;ओज:--इन्द्रिय बोध; सह:--मोटा; बलम्--बल; वायो:--वायु के; अपि-- भी; विकुर्वाणात्--रूपान्तरण से; काल--समय;कर्म--पिछले कर्म; स्वभावतः--स्वभाव के अनुसार; उदपद्यत--उत्पन्न हुआ; तेज:--अग्नि; बै--ठीक से; रूपवत्--रूप केसाथ; स्पर्श--स्पर्श; शब्दवत्--शब्द के साथ भी; तेजस:ः--अग्नि का; तु--लेकिन; विकुर्वाणात्--रूपान्तरित होकर;आसीतू--ऐसा हुआ; अम्भ:--जल; रस-आत्मकम्--रस से निर्मित; रूपवत्--रूप के साथ; स्पर्शवत्--स्पर्श के साथ; च--तथा; अम्भ:--जल; घोषवत्-- ध्वनि के साथ; च--तथा; पर--पूर्व; अन्बयात्--परम्परा से; विशेष: --नानारूपता; तु--लेकिन; विकुर्वाणात्--रूपान्तरण से; अम्भस:--जल का; गन्धवान्--सुगन्धित; अभूत्--हो गया; पर--पूर्व; अन्बयात्--परम्परा से; रस--रस; स्पर्श--स्पर्श; शब्द-- ध्वनि; रूप-गुण-अन्वित: --गुणात्मक रूप से ।
चूँकि आकाश रूपान्तरित होता है, अतएव स्पर्शगुण से युक्त वायु उत्पन्न होती है और पूर्वपरम्परा के अनुसार वायु शब्द तथा आयु के मूलभूत तत्त्वों अर्थात् स्पर्श, मानसिक-शक्ति तथाशारीरिक बल से भी पूर्ण होती है।
काल तथा प्रकृति के साथ ही जब वायु रूपान्तरित होती है,तो अग्नि उत्पन्न होती है और यह स्पर्श तथा ध्वनि का रूप धारण करती है।
चूँकि अग्नि भीरूपान्तरित होती है, अतएव जल प्रकट होता है, जो रस तथा स्वाद से पूरित होता है।
परम्परानुसार यह भी रूप, स्पर्श तथा शब्द से परिपूर्ण होता है।
और जब यही जल अपनीनानारूपता समेत पृथ्वी में रूपान्तरित होता है, तब वह सुगन्धिमय प्रतीत होता है औरपरम्परानुसार यह रस, स्पर्श, शब्द तथा रूप के गुणों से पूरित हो उठता है।
वैकारिकान्मनो जज्ञे देवा वैकारिका दश ।
दिग्वातार्क-प्रचेतोश्वि-वह्लीन्द्रोपेन्द्र-मित्र-का: ॥
३०॥
वैकारिकात्--सतोगुण से; मन:--मन; जज्ने--उत्पन्न किया; देवा:--देवता; वैकारिका:--सतोगुण में; दश--दस; दिक्--दिशाओं का अधिष्ठाता; वात--वायु का अधिष्ठाता; अर्क--सूर्य; प्रचेत:--वरुण; अश्वि--अश्विनीकुमार; वहि--अग्निदेव;इन्द्र--स्वर्ग का राजा; उपेन्द्र-स्वर्ग का देव ( श्री विग्रह ); मित्र--बारह आदित्यों में से एक; काः--प्रजापति ब्रह्मा |
सतोगुण से मन उत्पन्न होकर व्यक्त होता है, साथ ही शारीरिक गतियों के नियन्त्रक दसदेवता भी प्रकट होते हैं।
ऐसे देवता दिशाओं के नियन्त्रक, वायु के नियन्त्रक, सूर्यदेव, दक्षप्रजापति के पिता, अश्विनीकुमार, अग्निदेव, स्वर्ग का राजा (इन्द्र), स्वर्ग के पूजनीयअर्चाविग्रह, आदित्यों के प्रमुख तथा प्रजापति ब्रह्माजी कहलाते हैं।
सभी इस तरह अस्तित्व में लक्ष्य है।
तैजसात् तु विकुर्वाणादिन्द्रियणि दशाभवन् ।
ज्ञान-शक्तिः क्रिया-शक्तिर्बुद्धि: प्राणश्चव तैजसौ ।
श्रोत्रं त्वग्प्राण-हग्जिह्ना वाग्दोमेंढ्रा्डपप्रे-पायव: ॥
३१॥
तैजसात्ू--रजोगुणी अहंकार से; तु--लेकिन; विकुर्वाणात्--रूपान्तरण से; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; दश--दस; अभवनू--उत्पन्नकी गई; ज्ञान-शक्ति:--ज्ञान प्राप्त करने की पाँच इन्द्रियाँ, ज्ञानेन्द्रियाँ; क्रिया-शक्ति:--कार्य की पाँच इन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ;बुद्धिः--बुद्धि; प्राण:--जीवनशक्ति; च-- भी; तैजसौ--रजोगुण के सारे पदार्थ; श्रोत्रमू--सुनने की इन्द्रिय; त्वक्--स्पर्शेन्द्रिय; प्राण--सूँघने की इन्द्रिय; हक्--देखने की इन्द्रिय; जिह्ला:--स्वाद लेने की इन्द्रिय; वाकु--बोलने की इन्द्रिय;दोः-ग्रहण करने की इन्द्रिय; मेढ्र--जननेन्द्रिय; अद्धघ्रि--पाँव; पायव: --मल-विसर्जन इन्द्रिय ।
रजोगुण में और अधिक विकार आने से बुद्धि तथा प्राण के साथ ही श्रवण, त्वचा, नाक,आँख, जीभ, मुँह, हाथ, जननेन्द्रिय, पाँव तथा मल विसर्जन की इन्द्रियाँ सभी उत्पन्न होती हैं।
यदैतेडसड़ता भावा भूतेन्द्रिय-मनो-गुणा: ।
यदायतन-निर्माणे न शेकुर्ब्रह्य-वित्तम ॥
३२॥
यदा--जब तक; एते--ये सब; असड्भता:--एकत्र हुए बिना; भावा:--इस तरह स्थित होकर; भूत--तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ;मनः--मन; गुणा:-- प्रकृति के गुण; यदा--जब तक; आयतन--शरीर; निर्माणे--निर्मित होता रहता है; न शेकु:--सम्भवनहीं था; ब्रह्म-वित्-तम--हे दिव्य ज्ञान के दाता नारद |
हे योगियों में श्रेष्ठ नारद, जब तक ये सृजित अंग यथा तत्त्व, इन्द्रियाँ, मन तथा प्रकृति केगुण जुड़ नही जाते, तब तक शरीर स्वरूप धारण नहीं कर सकता।
जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्ति के बल से ये सब एकत्र हो गये तो सृष्टि से मूल तथागौण कारणों को स्वीकार करते हुए यह ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया।
तदा संहत्य चान्योन्यं भगवच्छक्ति-चोदिता: ।
सदसत्त्वमुपादाय चोभयं ससूजुर्दहादः ॥
३३॥
तदा--वे सब; संहत्य--समवेत होकर; च-- भी; अन्योन्यम्--एक दूसरे को; भगवत्-- भगवान् द्वारा; शक्ति--शक्ति;चोदिता: --प्रयुक्त होकर; सत्-असत्त्वम्-मूलत: तथा गौणत:; उपादाय-- स्वीकार करके; च-- भी; उभयम्--दोनों;ससृजु:--उत्पन्न हुआ; हि--निश्चय ही; अद:--यह संसार |
जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्ति के बल से ये सब एकत्र हो गये तो सृष्टि से मूल तथा गौण कारणों को स्वीकार करते हुए यह ब्रह्माण्ड अस्तित्व में आया।
वर्ष-पूग-सहस्त्रान्ते तदण्डमुदकेशयम् ।
काल-कर्म-स्वभाव-स्थो जीवोजीवमजीवयतू ॥
३४॥
वर्ष-पूग--अनेक वर्ष; सहस्त्र-अन्ते--हजारों वर्षों का; तत्ू--वह; अण्डम्--ब्रह्माण्ड; उदके --कारण-जल में; शयम्--डूबकर; काल--नित्य समय; कर्म--कर्म; स्वभाव-स्थ:--प्रकृति के गुणों के अनुसार; जीव:ः--जीवों के स्वामी; अजीवम्--अचर; अजीवयतू्--जीवित किया
इस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड हजारों युगों तक जल के भीतर ( कारण-जल में ) पड़े रहे।
समस्तजीवों के स्वामी ने उन सबमें प्रवेश करके उन्हें पूरी तरह सजीव बनाया।
स एव पुरुषस्तस्मादण्डं निर्भिद्य निर्गतः ।
सहस्त्रोर्वड्पप्रि-बाह्ृक्ष: सहस्त्रानन-शीर्षवान् ॥
३५॥
सः--वह ( भगवान् ); एव--साक्षात्; पुरुष:-- भगवान्; तस्मात्--ब्रह्माण्ड के भीतर से; अण्डम्ू--हिरण्यगर्भ; निर्भिद्य--विभाजित करके; निर्गतः--बाहर निकल आया; सहस्त्र-हजारों; ऊरू--जाँघें; अड्प्रि--पाँव; बाहु-- भुजाएँ; अक्ष:--आँखें;सहस्त्र--हजारों; आनन-- मुँह; शीर्षवान्ू--सिर सहित ।
यद्यपि भगवान् ( महाविष्णु ) कारणार्णव में शयन करते रहते हैं, किन्तु वे उससे बाहरनिकल कर और अपने को हिरण्यगर्भ के रूप में विभाजित करके प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट होगये और उन्होंने हजारों-हजारों पाँव, भुजा, मुँह, सिर वाला विराट रूप धारण कर लिया।
यस्येहावयवैलॉकान् कल्पयन्ति मनीषिण: ।
कट्यादिभिरध: सप्त सप्तोर्ध्व जघनादिभि: ॥
३६॥
यस्य--जिसका; इह--इस ब्रह्माण्ड में; अवयवै:--शरीर के अंगों के द्वारा; लोकानू--सारे लोक; कल्पयन्ति--कल्पना करतेहैं; मनीषिण:--बड़े-बड़े दार्शनिक; कटि-आदिभि:--कमर से नीचे; अध:--नीचे की ओर; सप्त--सात लोक; सप्तऊर्ध्वमू--तथा सात लोक ऊपर की ओर; जघन-आदिभि:--सामने का हिस्सा।
बड़े-बड़े दार्शनिक कल्पना करते हैं कि ब्रह्माण्ड में सारे लोक भगवान् के विराट शरीर केविभिन्न ऊपरी तथा निचले अंगों के प्रदर्शन हैं।
पुरुषस्य मुखं ब्रह्म क्षत्रमेतस्थ बाहवः ।
ऊर्वोर्वैश्यो भगवतः पद्भ्यां शूद्रो व्यजायत ॥
३७॥
पुरुषस्थ-- भगवान् का; मुखम्-- मुँह; ब्रह्म--ब्राह्मण हैं; क्षत्रम्--क्षत्रिय; एतस्थ-- इसके; बाहव:-- भुजाएँ; ऊर्वो: --जाँवें;वैश्य:--वणिक वर्ग; भगवत:--भगवान् के; पद्भ्याम्-पाँवों से; शूद्र: -- श्रमिक वर्ग; व्यजायत--प्रकट हुआ |
ब्राह्मण वर्ग भगवान् के मुख का, क्षत्रिय उनकी भुजाओं का और वैश्य उनकी जाँघों काप्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि शूद्र वर्ग उनके पाँवों से उत्पन्न हुआ है।
भूलोंक: कल्पित: पद्भ्यां भुवर्लोकोस्थ नाभित: ।
हृदा स्वर्लोक उरसा महलोको महात्मन: ॥
३८॥
भूः--पाताल तक सारे अधःलोक; लोक:--लोक; कल्पित:--कल्पना किया गया या कहा गया; पद्भ्याम्--पाँवों से;भुव:--ऊर्ध्व; लोक:--लोक; अस्य--उसकी ( भगवान् की ); नाभित:ः--नाभि से; हृदा--हृदय से; स्वर्लोक:--देवताओं द्वारानिवासित लोक; उरसा--वक्षस्थल से; महलोक:--ऋषियों मुनियों से विभूषित लोक; महा-आत्मन:--भगवान् का
पृथ्वी-तल तक सारे अधोलोक उनके पाँवों में स्थित हैं।
भुवलोक इत्यादि मध्य लोक उनकीनाभि में स्थित हैं और इनसे भी उच्चतर लोक, जो देवताओं तथा सुसंस्कृत ऋषियों-मुनियों द्वारानिवसित हैं, वे भगवान् के वक्षस्थल में स्थित हैं।
ग्रीवायां जनलोकोस्य तपोलोक: स्तन-द्वयात् ।
मूर्थभि: सत्यलोकस्तु ब्रह्मलोक: सनातन: ॥
३९॥
ग्रीवायामू-गर्दन तक; जनलोक:--जनलोक; अस्य--उसका; तपोलोक:--तपोलोक; स्तन-द्वयात्--वक्षस्थल से प्रारम्भहोकर; मूर्थभि:ः--सिर से; सत्यलोक:--सत्यलोक; तु--लेकिन; ब्रह्मलोक: --आध्यात्मिक लोक; सनातन:--शा श्वत ।
भगवान् के विराट रूप के वश्चस्थल से गर्दन तक के प्रदेश में जनलोक तथा तपोलोकस्थित हैं जबकि सर्वोच्च लोक, सत्यलोक, इस विराट रूप के सिर पर स्थित है।
किन्तुआध्यात्मिक लोक शाश्वत हैं।
तत्कटगां चातलं क्ल॒प्तमूरु भ्यां वितलं विभो: ।
जानुभ्यां सुतलं शुद्ध जज्जाभ्यां तु ततातलम् ॥
४०॥
महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम् ।
पातालं पाद-तलत इति लोकमय: पुमान् ॥
४१॥
तत्--उसकी; कट्याम्--कमर में; च-- भी; अतलम्--पृथ्वी के नीचे प्रथम लोक; क्लृप्तम्--स्थित; ऊरु भ्याम्ू--जाँचों में;वितलम्--नीचे का द्वितीय लोक; विभो: -- भगवान् का; जानुभ्याम्ू--घुटनों में; सुतलम्--नीचे का तृतीय लोक; शुद्धम्--शुद्ध; जज्ञभ्याम्--जोड़ों में; तु--लेकिन; तलातलम्--नीचे का चौथा लोक; महातलम्--नीचे का पाँचवाँ लोक; तु--लेकिन; गुल्फाभ्याम्--टखने या पिण्डलियों में; प्रपदाभ्यामू--पाँवों के ऊपरी या सामने के भाग पर; रसातलम्--नीचे का छठालोक; पातालमू--नीचे का सातवाँ लोक; पाद-तलतः--पाँवों के तलुओं में; इति--इस प्रकार; लोक-मयः --लोकों से पूर्ण;पुमानू-- भगवान्।
हे पुत्र नारद, तुम मुझसे जान लो कि चौदह लोकों में से सात अधोलोक हैं।
इनमें पहलालोक अतल है, जो कटि में स्थित है, दूसरा लोक वितल जाँघों में स्थित है, तीसरा लोक सुतलघुटनों में, चौथा लोक तलातल पिंडलियों में, पाचवाँ लोक महातल टखनों में, छठा लोकरसातल है, जो पाँवों के ऊपरी भाग में स्थित है तथा सातवाँ लोक पाताल लोक है, जो तलवों मेंस्थित है।
इस प्रकार भगवान् का विराट रूप समस्त लोकों से पूर्ण है।
भूलोंक: कल्पित: पद्भ्यां भुवर्लोकोस्थ नाभित: ।
स्वरलोक: कल्पितो मूर्धना इति वा लोक-कल्पना ॥
४२॥
भूलोक:ः--पाताल से लेकर धरालोक तक के समग्र लोक; कल्पित:--कल्पना पर आधारित; पद्भ्यामू--पाँवों पर स्थित;भुवर्लोक:-- भुवलोक; अस्य-- भगवान् के विश्व-रूप की; नाभित:--नाभि से; स्वलोक:--स्वर्गलोक से प्रारम्भ होने वालेऊर्ध्व लोक; कल्पित:--कल्पना किये गये; मूर्धना--वक्षस्थल से लेकर सिर तक; इति--इस प्रकार; वा--अथवा; लोक--लोक; कल्पना--कल्पना।
अन्य लोग सम्पूर्ण लोकों को तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं।
इनके नाम हैं--परमपुरुष के पाँवों पर अधोलोक ( पृथ्वी तक ), नाभि पर मध्यलोक तथा वक्षस्थल से सिर तक ऊर्ध्व लोक ( स्वर्गतक )।
