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अध्याय छह: पुरुष-सूक्त की पुष्टि

2.6ब्रह्मेवाचवाचां वहे्मुखं क्षेत्र छन्दसां सप्त धातवः ।

हव्य-कव्यामृतान्नानां जिह्ना सर्व-रसस्य च ॥

१॥

ब्रह्मा उबाच--ब्रह्माजी ने कहा; वाचाम्‌--वाणी का; वह्ढेः--अग्नि का; मुखम्‌--मुख ; क्षेत्रमू--जनन-विन्दु; छन्‍्दसाम्‌--वैदिक मन्त्रों का, यथा गायत्री का; सप्त--सात; धातवः--त्वचा तथा अन्य छः स्तर; हव्य-कव्य--देवताओं तथा पितरों को दीगई भेंट; अमृत--मनुष्यों का भोजन; अन्नानाम्‌ू--सभी प्रकार के खाद्य पदार्थों का; जिह्वा--जीभ; सर्व--समस्त; रसस्थ--समस्त व्यंजनों का; च-- भी ।

ब्रह्माजी ने कहा : विराट पुरुष का मुख वाणी का उद्गम-विन्दु है और उसका नियामक देवअग्नि है।

उनकी त्वचा तथा अन्य छह स्तर ( आवरण ) बैदिक मन्त्रों के उदूगम-विन्दु हैं औरउनकी जीभ देवताओं, पितरों तथा सामान्यजनों को अर्पित करनेवाले विभिन्न खाद्यों तथाव्यंजनों ( रसों ) का उदगम है।

सर्वासूनां च वायोश्व तन्नासे परमायणे ।

अश्विनोरोषधीनां च प्राणो मोद-प्रमोदयो: ॥

२॥

सर्व--सभी; असूनाम्‌--विभिन्न प्रकार की प्राणवायु; च--तथा; वायो: --वायु का; च--भी; तत्‌--उसकी; नासे--नाक में;'परम-आयणे--दिव्य जनन-बिच्ु में; अश्विनो:--अश्विनीकुमार देवताओं का; ओषधीनाम्‌--समस्त जड़ी-बूटियों का; च--भी;घ्राण:--पघ्राण-शक्ति; मोद-- आनन्द; प्रमोदयो:--विशिष्ट खेल ।

उनके दोनों नथुने हमारे श्वास के तथा अन्य सभी प्रकार के वायु के जनन-केन्द्र हैं; उनकी प्राण शक्ति से अश्विनीकुमार तथा समस्त प्रकार की जड़ी-बूटियाँ उत्पन्न होती हैं और उनकीश्वास-शक्ति से विभिन्न प्रकार की सुगन्धियाँ उत्पन्न होती हैं।

रूपाणां तेजसां चश्नुर्दिव: सूर्यस्य चाक्षिणी ।

कर्णों दिशां च तीर्थानां श्रोत्रमाकाश-शब्दयोः ॥

३॥

रूपाणाम्‌--सभी प्रकार के रूपों के लिए; तेजसाम्‌--सभी प्रकाशमानों का; चक्षु;--आँखें; दिवः--चमकने वाला; सूर्यस्य--सूर्य के; च--भी; अक्षिणी--नेत्र-गोलक; कर्णौ--दो कान; दिशाम्‌--समस्त दिशाओं का; च--तथा; तीर्थानाम्‌--समस्तवेदों का; श्रोत्रमू-- श्रवणेन्द्रि; आकाश---आकाश; शब्दयो:--सारी ध्वनियों का ६उनके नेत्र सभी प्रकार के रूपों के उत्पत्ति-केन्द्र हैं।

वे चमकते हैं तथा प्रकाशित करते हैं।

उनकी पुतलियाँ ( नेत्र-गोलक ) सूर्य तथा दैवी नक्षत्रों की भाँति हैं।

उनके कान सभी दिशाओं मेंसुनते हैं और समस्त वेदों को ग्रहण करनेवाले हैं।

उनकी श्रवणेन्द्रिय आकाश तथा समस्त प्रकारकी ध्वनियों की उदगम है।

तद्गात्र॑ वस्तु-साराणां सौभगस्य च भाजनम्‌ ।

त्वगस्थ स्पर्श-वायोश्व सर्व-मेधस्य चैव हि ॥

४॥

तत्‌--उसका; गात्रम्‌--शरीर; वस्तु-साराणाम्‌ू--सभी वस्तुओं के सार का; सौभगस्य--समस्त शुभ अवसरों का; च--तथा;भाजनम्‌--उत्पादन-दश्षेत्र; त्वक्‌्--त्वचा; अस्य--उसकी; स्पर्श--स्पर्श; वायो: --गतिशील वायु का; च--भी; सर्व--सभीप्रकार के; मेधस्य--यज्ञों का; च-- भी; एव--निश्चय ही; हि--सही-सही ।

उनके शरीर की ऊपरी सतह सभी वस्तुओं के सार एवं समस्त शुभ अवसरों की जन्म-स्थलीहै।

उनकी त्वचा गतिशील वायु की भाँति सभी प्रकार के स्पर्श का उद्गम तथा समस्त प्रकार केयज्ञों को सम्पन्न करने का स्थान है।

रोमाण्युद्धिजज-जातीनां येर्वा यज्ञस्तु सम्भूतः ।

केश-श्मश्रु-नखान्यस्य शिला-लोहा भ्र-विद्युताम्‌ ॥

५॥

रोमाणि--देह के रोम; उद्धिज॒--वनस्पति; जातीनामू--जातियों का; यैः--जिसके द्वारा; वा--या; यज्ञ:--यज्ञ; तु--लेकिन;सम्भूत:ः--विशेष रूप से सेवित; केश--बाल; श्मश्रु--मूछें; नखानि--नाखून; अस्य--उसका; शिला--पत्थर; लोह-- लौहअयस्कों; अभ्र--बादल; विद्युतामू--बिजली

उनके शरीर के रोम समस्त प्रकार की वनस्पति के कारण हैं, विशेष रूप से उन वृजश्षों के,जो यज्ञ की सामग्री ( अवयव ) के रूप में काम आते हैं।

उनके सिर तथा मुख के बाल बादलोंके आगार हैं और उनके नाखून बिजली, पत्थरों तथा लौह अयस्कों के उद्गम-स्थल हैं।

बाहवो लोक-पालानां प्रायशः क्षेम-कर्मणाम्‌ ॥

६॥

बाहवः--भुजाएँ; लोक-पालानाम्‌ू--लोकों के अधिपति या देवताओं के; प्रायश:--प्राय:; क्षेम-कर्मणाम्‌ू--जन-सामान्य केनेताओं तथा रक्षकों के ।

भगवान्‌ की भुजाएँ बड़े-बड़े देवताओं तथा जनसामान्य की रक्षा करनेवाले अन्य नायकोंके उदगम-स्थल हैं।

विक्रमो भूर्भुवः स्वश्व क्षेमस्थ शरणस्य च ।

सर्व-काम-वरस्यापि हरेश्वरण आस्पदम्‌ ॥

७॥

विक्रम: --अगले चरण; भू: भुवः--अधो तथा ऊर्ध्व लोकों के; स्व:--तथा स्वर्ग का; च-- भी; क्षेमस्थ--हमारे पास जो कुछहै, उसकी सुरक्षा का; शरणस्य--निर्भयता का; च-- भी; सर्व-काम--वह सब, जिसकी हमें आवश्यकता पड़ती है; वरस्य--समस्त वरदानों का; अपि--ठीक-ठीक; हरेः-- भगवान्‌ के; चरण:--चरणकमल; आस्पदम्‌--शरण ।

भगवान्‌ के अगले डग ऊर्ध्व, अधो तथा स्वर्गलोकों के एवं हमें जो भी चाहिए, उसकेआश्रय हैं।

उनके चरणकमल सभी प्रकार के भय के लिए सुरक्षा का काम करते हैं।

अंपां वीर्यस्य सर्गस्य पर्जन्यस्य प्रजापते: ।

पुंसः शिश्न उपस्थस्तु प्रजात्यानन्द-निर्वृतेः ॥

८ ॥

अपाम्‌--जल का; वीर्यस्य--वीर्य का; सर्गस्य--सृष्टि का; पर्जन्यस्थ--वर्षा का; प्रजापते: --स्त्रष्टा का; पुंसः-- भगवान्‌ का;शिश्न: --जननांग; उपस्थ: तु--गुदा-भाग; प्रजाति--जन्म देने के कारण; आनन्द-- आनन्द के; निर्वृतेः--कारण ।

भगवान्‌ के जननांगों से जल, वीर्य, सृष्टि, वर्षा तथा प्रजापतियों का जन्म होता है।

उनके जननांग उस आनन्द के कारण-स्वरूप हैं, जिससे जनन के कष्ट का प्रतिकार किया जा सकता है।

पायुर्यमस्य मित्रस्य परिमोक्षस्य नारद ।

हिंसाया निर्क्रतेर्मुत्योर्निरयस्य गुदं स्मृत: ॥

९॥

पायु:--गुदा; यमस्य--मृत्यु का नियामक देव; मित्रस्य--मित्र का; परिमोक्षस्य--मलद्वार का; नारद--हे नारद; हिंसाया:--ईर्ष्या का; निर्क्रते: --दुर्भाग्य का; मृत्यो:--मृत्यु का; निरयस्थय--नरक का; गुदम्‌--गुदा; स्मृतः--समझा जाता है।

हे नारद, भगवान्‌ के विराट रूप का गुदाद्वार मृत्यु के नियामक देव, मित्र, का धाम है औरभगवान्‌ की बड़ी आँत का छोर ईर्ष्या, दुर्भाग्य, मृत्यु, नरक आदि का स्थान माना जाता है।

पराभूतेरधर्मस्य तमसश्चापि पश्चिम: ।

नाड्यो नद-नदीनां च गोत्राणामस्थि-संहति: ॥

१०॥

पराभूते: --उद्विग्नता का; अधर्मस्य--अनैतिकता का; तमस:--अज्ञान का; च--तथा; अपि-- भी; पश्चिम:--पीठ; नाड्य:--नसों का; नद--बड़ी नदियों का; नदीनाम्‌ू--नालों का; च--भी; गोत्राणाम्‌--पर्वतों की; अस्थि--हड्डियाँ; संहति: --संकलन

भगवान्‌ की पीठ समस्त प्रकार की उद्दिग्नता तथा अज्ञान एवं अनैतिकता का स्थान है।

उनकी नसों से नदियाँ तथा नाले प्रवाहित होते हैं और उनकी हड्डियों पर बड़े-बड़े पहाड़ बने हैं।

अव्यक्त-रस-सिन्धूनां भूतानां निधनस्य च ।

उदर॑ विदितं पुंसो हृदयं मनस: पदम्‌ ॥

११॥

अव्यक्त--निर्विशेष स्वरूप; रस-सिन्धूनाम्‌ू--जल के सागरों का; भूतानाम्‌ू-- भौतिक जगत में जन्म लेने वालों का; निधनस्य--संहार का; च-- भी; उदरम्‌--उसका पेट; विदितम्‌--बुद्ध्िमान लोगों द्वारा ज्ञेय; पुंस:--महापुरुष का; हृदयम्‌--हृदय;मनसः--सूक्ष्म शरीर का; पदम्‌--स्थान,पद

भगवान्‌ का निराकार स्वरूप महासागरों का धाम है और उनका उदर भौतिक दृष्टि से विनष्टजीवों का आश्रय है।

उनका हृदय जीवों के सूक्ष्म भौतिक शरीरों का धाम है।

बुद्धिमान लोग इसेइस प्रकार से जानते हैं।

धर्मस्य मम तुभ्यं च कुमाराणां भवस्य च ।

विज्ञानस्य च सत्त्वस्य परस्थात्मा परायणम्‌ ॥

१२॥

धर्मस्य--धार्मिक नियमों का या यमराज का; मम--मेरा; तुभ्यम्‌-तुम्हारा;।

च--तथा; कुमाराणाम्‌--चारों कुमारों का;भवस्य--शिवजी का; च--तथा; विज्ञानस्थ-दिव्य ज्ञान का; च--भी; सत्त्वस्य--सत्य का; परस्य--महापुरुष की; आत्मा--चेतना; परायणम्‌ू--आश्रित।

तथापि उस महापुरुष की चेतना धार्मिक सिद्धान्तों का, मेरा, तुम्हारा तथा चारों कुमारों--सनक, सनातन, सनत्कुमार तथा सनन्दन--का निवास-स्थान है।

यही चेतना सत्य तथा दिव्यज्ञान का वास-स्थान है।

अहं भवान्‌ भवश्चैव त इमे मुनयोग्रजा: ।

सुरासुर-नरा नागा: खगा मृग-सरीसूपा: ॥

१३॥

गन्धर्वाप्सरसो यक्षा रक्षो -भूत-गणोरगा: ।

पशव: पितरः सिद्धा विद्याश्षाश्चारणा द्रुमा: ॥

१४॥

अन्ये च विविधा जीवा जल-स्थल-नभौकसः ।

ग्रहर्क्ष-केतवस्तारास्तडितः स्तनयित्ववः ॥

१५॥

सर्व पुरुष एवेदं भूतं भव्यं भवच्च यत्‌ ।

तेनेदमावृतं विश्व वितस्तिमधितिष्ठति ॥

१६॥

अहम्‌-मैं; भवानू-- आप; भवः--शिवजी; च-- भी; एव--निश्चय ही; ते--वे; इमे--सभी; मुनयः--मुनिगण; अग्र-जा:--तुमसे बड़े; सुर--देवता; असुर--असुर; नरा:--मनुष्य; नागा: --नागलोक के निवासी; खगा:--पक्षी; मृग--पशु;सरीसूपा:--रेंगनेवाले जीव; गन्धर्व-अप्सरस:, यक्षा:, रक्ष:-भूत-गण-उरगा:, पशव:, पितर:, सिद्धा:, विद्याश्रा:, चारणा:--विभिन्न लोकों के सारे वासी; द्रुमा:--वनस्पति जगत; अन्ये--अन्य अनेक; च--भी; विविधा: --विभिन्न प्रकार के; जीवा: --जीव; जल--जल; स्थल-- भूमि; नभ-ओकसः: --आकाश के वासी या पक्षी; ग्रह--ग्रह-नक्षत्र; ऋक्ष --प्रभावशाली नक्षत्र;केतवः--पुच्छलतारा; तारा:--सितारे; तडित: --बिजली; स्तनयित्तव:--बादलों का गर्जन; सर्वम्‌--हर वस्तु; पुरुष: --भगवान्‌; एव इृदमू--निश्चय ही ये सब; भूतम्‌--सूष्ट; भव्यम्‌--जो रचा जायेगा; भवत्‌--जो रचा जा चुका है; च-- भी; यत्‌--जो कुछ; तेन इदम्‌--वह सब उनके कारण है; आवृतम्‌--ढका हुआ; विश्वम्‌--विश्व; वितस्तिमू--एक बालिश्त;अधितिष्ठति--स्थित ।

मुझसे ( ब्रह्म से ) लेकर तुम तथा भव ( शिव ) तक जितने भी बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तुमसेपूर्व हुए हैं, वे, देवतागण, असुरगण, नाग, मनुष्य, पक्षी, पशु, सरीसूप आदि तथा समस्तब्रह्मण्डों की सारी दृश्य-अभिव्यक्तियाँ यथा ग्रह, नक्षत्र, पुच्छलतारे, सितारे, विद्युत, गर्जन तथाविभिन्न लोकों के वासी यथा गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष, राक्षस, भूतगण, उरग, पशु, पितर, सिद्ध,विद्याधर, चारण एवं अन्य विविध प्रकार के जीव जिनमें पश्ली, पशु तथा वृक्ष एवं अन्य जो कुछहो सकता है, सभी सम्मिलित हैं--वे सभी भूत, वर्तमान तथा भविष्य सभी कालों में भगवान्‌ केविराट रूप द्वारा आच्छादित हैं यद्यपि वे इन सबों से परे रहते हैं और सदैव एक बालिशएत आकारके रूप में रहते हैं।

स्व-धिष्ण्य॑ प्रतपन्‌ प्राणो बहिश्न प्रतपत्यसौ ।

एवं विराजं प्रतपंस्तपत्यन्तर्बहि: पुमान्‌ ॥

१७॥

स्व-धिष्ण्यम्‌--विकिरण, प्रकाश; प्रतपन्‌--विस्तार से; प्राण:--प्राण; बहि:ः--बाहर; च-- भी; प्रतपति-- प्रकाशित करता है;असौ--सूर्य; एवम्‌--इस तरह से; विराजम्‌--विराट स्वरूप; प्रतपन्‌--के विस्तार से; तपति--जीवन प्रदान करता है; अन्तः--भीतर से; बहि:ः--बाहर से; पुमान्‌--परम पुरुष।

सूर्य अपने विकिरणों का विस्तार करके भीतर तथा बाहर प्रकाश वितरित करता है।

इसीप्रकार से भगवान्‌ अपने विराट रूप का विस्तार करके इस सृष्टि में प्रत्येक वस्तु का भीतर सेतथा बाहर से पालन करते हैं।

सोमृतस्या भयस्येशो मर्त्यमन्न॑ यदत्यगात्‌ ।

महिमैष ततो ब्रह्मन्‌ पुरुषस्य दुरत्यय: ॥

१८॥

सः--वह ( भगवान्‌ ); अमृतस्य--अमरता का; अभयस्य--निर्भयता का; ईशः--नियन्ता; मर्त्यमू--मरणशील; अन्नम्‌ू--सकामकर्म; यत्‌ू--जो; अत्यगात्‌--पार कर गया है; महिमा--यश; एष:-- उसका; तत:ः--अतएव; ब्रह्मनू-हे ब्राह्मण नारद;पुरुषस्य--परम पुरुष का; दुरत्यय:-- अमाप्य।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ अमरता तथा निर्भयता के नियन्त्रक हैं और वे मृत्यु तथा भौतिकजगत के सकाम कर्मों से परे हैं।

हे नारद, हे ब्राह्मण, इसलिए परम पुरुष के यश का अनुमानलगा पाना कठिन है।

पादेषु सर्व-भूतानि पुंस: स्थिति-पदो विदुः ।

अमृतं क्षेममभयं त्रि-मूर््नो धायि मूर्थसु ॥

१९॥

पादेषु--एक चौथाई में; सर्व--सभी; भूतानि--जीव; पुंस:--परम पुरुष का; स्थिति-पदः--समस्त भौतिक ऐश्वर्य का आगार;विदु:--तुम जानो; अमृतम्‌-- अमरत्व; क्षेमम्‌ू--सुख, जरा, रोग आदि की चिन्ता से मुक्त; अभयम्‌--निर्भयता; त्रि-मूर्ध्न: --तीन उच्चतर लोकों से परे; अधायि--विद्यमान हैं; मूर्थसु-- भौतिक आवरणों के पार।

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ अपनी एक चौथाई शक्ति के द्वारा समस्त भौतिक ऐश्वर्य के परमआगार के रूप में जाने जाते हैं, जिसमें सारे जीव रह रहे हैं।

भगवान का धाम जो तीन उच्चतरलोकों से तथा भौतिक आवरणों से परे स्थित है उस में अमरता, निर्भयता तथा जरा और व्याधिसे चिन्तामुक्ति का नित्य निवास है।

पादास्त्रयो बहिश्वासन्नप्रजानां य आश्रमा: ।

अन्तस्त्रि-लोक्यास्त्वपरो गृह-मेधो बृहद्व्रत: ॥

२०॥

पादाः त्रयः--भगवान्‌ की शक्ति के तीन चौथाई का जगत; बहि:--इस प्रकार बाहर स्थित; च--तथा; आसनू--थे;अप्रजानाम्‌--जिनका पुनर्जन्म नहीं होता; ये--जो; आश्रमा:--जीवन के स्तर; अन्तः--भीतर; त्रि-लोक्या:--तीनों जगतों का;तु--लेकिन; अपरः:--अन्य; गृह-मेध:--गृहस्थी में आसक्त; अबृहतू-ब्रतः--कठोर ब्रह्मचर्य ब्रत का पालन किये बिना।

आध्यात्मिक जगत, जो भगवान्‌ की तीन चौथाई शक्ति से बना है, इस भौतिक जगत से परेस्थित है और यह उन लोगों के निमित्त है, जिनका पुनर्जन्म नहीं होता।

अन्य लोगों को जो गृहस्थजीवन के प्रति आसक्त हैं और ब्रह्मचर्य व्रत का कठोरता से पालन नहीं करते, तीन लोकों केअन्तर्गत रहना ही होता है।

भक्तिमय सेवा के स्वामी हैं।

वे समस्त परिस्थितियों में अविद्या तथा विद्या दोनों के परम स्वामीहैं।

text:सूती विचक्रमे विश्वडः साशनानशने उभे ।

यदविद्या च विद्या च पुरुषस्तृभयाश्रयः: ॥

२१॥

सृती--जीवों की गति; विचक्रमे--होती है; विश्वड़--सर्वव्यापी भगवान्‌; साशन--प्रभुता जतानेवाले कार्यकलाप; अनशने-- भक्ति के कार्यकलाप; उभे--दोनों; यत्‌--जो है; अविद्या--अज्ञान; च-- भी; विद्या-- वास्तविक ज्ञान; च--तथा; पुरुष:-- परम पुरुष; तु--लेकिन; उभय--दोनों के लिए; आश्रय:--स्वामी |

सर्व-व्यापी भगवान्‌ अपनी शक्तियों के कारण व्यापक अर्थों में नियनत्रण-कार्यों के तथा भक्तिमय सेवा के स्वामी हैं।

वे समस्त परिस्थितियों में अविद्या तथा विद्या दोनों के परम स्वामी हैं।

यस्मादण्डं विराड्‌ जज्ञे भूतेन्द्रिय-गुणात्मक: ।

तद्‌ द्रव्यमत्यगाद्‌ विश्व गोभिः सूर्य इबातपन्‌ ॥

२२॥

यस्मात्‌ू--जिससे; अण्डमू--ब्रह्माण्ड; विराट्‌ू--तथा विराट रूप; जज्ञे-- प्रकट हुआ; भूत--तत्त्व; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; गुण-आत्मक:--गुणात्मक; तत्‌ द्रव्यमू--ब्रह्मण्ड तथा विराट रूप आदि; अत्यगात्‌--पार कर गया; विश्वम्‌--समस्त ब्रह्माण्डों को;गोभि:--किरणों से; सूर्य: --सूर्य; इब--सदहृश; आतपन्‌--किरणों तथा ताप को वितरित किया।

भगवान्‌ से सारे ब्रह्माण्ड तथा समस्त भौतिक तत्त्वों, गुणों एवं इन्द्रियों से युक्त विराट रूपउत्पन्न होते हैं।

फिर भी वे ऐसे भौतिक प्राकट्यों से उसी तरह पृथक्‌ रहते हैं जिस तरह सूर्यअपनी किरणों तथा ताप से पृथक्‌ रहता है।

यदास्य नाभ्यान्नलिनादहमासं महात्मन: ।

नाविदं यज्ञ-सम्भारान्‌ पुरुषावयवानृते ॥

२३॥

यदा--जब; अस्य--उसकी; नाभ्यात्‌ू--नाभि से; नलिनातू--कमल के फूल से; अहम्‌--मैंने; आसम्‌--जन्म लिया; महा-आत्मन:--महापुरुष की; न अविदम्‌--नहीं जाना; यज्ञ--यज्ञ की; सम्भारान्‌ू--सामग्री; पुरुष-- भगवान्‌ के; अवयवान्‌--शरीरके अंग; ऋते-- के बिना।

जब मैं महापुरुष भगवान्‌ ( महा-विष्णु ) के नाभि-कमल पुष्प से उत्पन्न हुआ था, तो मेरेपास यज्ञ-अनुष्ठानों के लिए उस महापुरुष के शारीरिक अंगों के अतिरिक्त अन्य कोई सामग्री नथी।

तेषु यज्ञस्य पशव: सवनस्पतयः कुशा: ।

इदं च देव-यजनं कालश्नोरु-गुणान्वित: ॥

२४॥

तेषु--ऐसे यज्ञों में; यज्ञस्य--यज्ञ की सम्पन्नता का; पशव:--पशु या यज्ञ की सामग्री; स-बनस्पतय:--फल-फूल सहित;कुशा:--कुश; इृदम्‌--ये सब; च-- भी; देव-यजनम्‌--यज्ञ की वेदी; काल: --उपुयक्त समय; च-- भी; उरुू--अत्यधिक;गुण-अन्वित:--योग्य ।

यज्ञोत्सवों को सम्पन्न करने के लिए फूल, पत्ती, कुश जैसी यज्ञ-सामग्रियों के साथ-साथयज्ञ-वेदी तथा उपयुक्त समय ( वसन्‍्त ) की भी आवश्यकता होती है।

वस्तून्योषधय: स्नेहा रस-लोह-मृदो जलम्‌ ।

ऋतचो यजूंषि सामानि चातुर्ोत्रं च सत्तम ॥

२५॥

वस्तूनि--पात्र; ओषधय: --अन्न; स्नेहा:--घी; रस-लोह-मृदः --शहद, सोना तथा मिट्टी; जलमू--जल; ऋच:--ऋग्वेद;यजूंषि--यजुर्वेद; सामानि--सामवेद; चातु:-होत्रमू--यज्ञ सम्पन्न करनेवाले चार व्यक्ति; च--ये सब; सत्तम--हे परम पवित्र |

यज्ञ की अन्य आवश्यकताएँ हैं--पात्र, अन्न, घी, शहद, सोना, मिट्टी, जल, ऋग्वेद,यजुर्वेद, सामवेद तथा यज्ञ सम्पन्न करानेवाले चार पुरोहित।

नाम-धेयानि मन्त्राश्न दक्षिणाश्व ब्रतानि च ।

देवतानुक्रम: कल्प: सड्डूल्पस्तन्त्रमेव च ॥

२६॥

नाम-धेयानि--देवाताओं के नामों का आवाहन; मन्त्रा:--देवता-विशेष को अर्पित किये जानेवाले विशिष्ट मन्त्र; च-- भी;दक्षिणा: --पुरस्कार; च--तथा; ब्रतानि--ब्रत; च--तथा; देवता-अनुक्रम:-- एक-एक करके सारे देवता; कल्प:--विशिष्टशास्त्र; सड्डूल्प:--विशिष्ट प्रयोजन; तन्त्रमू--विशिष्ट विधि; एब--वे जैसी हैं; च-- भी ।

यज्ञ की अन्य आवश्यकताओं में देवताओं का विभिन्न नामों से विशिष्ट मंत्रों तथा दक्षिणा केब्रतों द्वारा आवाहन सम्मिलित हैं।

ये आवाहन विशिष्ट प्रयोजनों से तथा विशिष्ट विधियों द्वाराविशेष शास्त्र के अनुसार होने चाहिए।

गतयो मतयश्चैव प्रायश्चित्तं समर्पणम्‌ ।

पुरुषावयवैरेते सम्भारा: सम्भृता मया ॥

२७॥

गतय:--चरम लक्ष्य ( विष्णु ) की प्राप्ति; मतय:ः--देवताओं की पूजा; च-- भी; एब--निश्चय ही; प्रायश्चित्तम्‌--पश्चात्ताप;समर्पणम्‌-- अन्तिम रूप से भेंट; पुरुष-- भगवान्‌; अवयवै:-- भगवान्‌ के शरीर के अंगों से; एते--ये; सम्भारा:--अवयव,सामग्री; सम्भूता:--आयोजित; मया--मेरे द्वारा ।

इस प्रकार मुझे भगवान्‌ के शारीरिक अंगों से ही यज्ञ के लिए इन आवश्यक सामग्रियों कीतथा साज-सामान की व्यवस्था करनी पड़ी।

देवताओं के नामों के आवाहन से चरम लक्ष्य विष्णुकी क्रमशः प्राप्ति हुई और इस प्रकार प्रायश्चित्त तथा पूर्णाहुति पूरी हुई।

इति सम्भूत-सम्भार: पुरुषावयवैरहम्‌ ।

तमेव पुरुष यज्ञं तेनेवायजमी श्ररम्‌ ॥

२८॥

इति--इस प्रकार; सम्भृत--सम्पन्न किया गया; सम्भार: --अपने को अच्छी तरह तत्पर किया; पुरुष-- भगवान्‌; अवयवबै:--अंशों द्वारा; अहमू--मैं; तम्‌ एब--उनके; पुरुषम्‌-- भगवान्‌ को; यज्ञम्‌--समस्त यज्ञों के भोक्ता को; तेन एब--उन सबके द्वाराही; अयजम्‌--पूजा की; ईश्वरम्‌--परम नियन्ता की।

इस प्रकार मैंने यज्ञ के भोक्ता परमेश्वर के शरीर के अंगों से यज्ञ के लिए सारी सामग्री तथासाज-समान उत्पन्न किये और भगवान्‌ को प्रसन्न करने के लिए मैंने यज्ञ सम्पन्न किया।

ततस्ते भ्रातर इमे प्रजानां पतयो नव ।

अयजन्‌ व्यक्तमव्यक्तं पुरुष सु-समाहिता: ॥

२९॥

ततः--तत्पश्चात्‌; ते--तुम्हारे; भ्रातर:-- भाई; इमे--ये; प्रजानाम्‌--प्राणियों के; पतय:--स्वामी; नव--नौ; अयजनू--यज्ञकिया; व्यक्तम्‌ू-प्रकट; अव्यक्तम्‌--अप्रकट; पुरुषम्‌--पुरुष को; सु-समाहिता:--उचित अनुष्ठानों से

हे पुत्र, तत्पश्चात्‌ तुम्हारे नौ भाइयों ने, जो प्रजापति हैं, व्यक्त तथा अव्यक्त दोनों प्रकार केपुरुषों को प्रसन्न करने के लिए समुचित अनुष्ठानों सहित यज्ञ सम्पन्न किया।

ततश्च मनव: काले ईजिरे ऋषयोउपरे ।

पितरो विबुधा दैत्या मनुष्या: क्रतुभिर्विभुम्‌ ॥

३०॥

ततः--तत्पश्चात्‌: च-- भी; मनवः--मानव जाति के पूर्वज, सारे मनु; काले--कालान्तर में; ईजिरे--पूजा की; ऋषय:--ऋषिगण; अपरे--अन्य; पितर:--पुरखे; विबुधा:--विद्वान पंडित; दैत्या:--देवताओं के महान्‌ भक्त; मनुष्या:--मानव जाति;क्रतुभिः विभुम्‌-परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए यज्ञों के द्वारा ।

तत्पश्चात्‌, मनुष्यों के पिताओं यानी मनुओं, महर्षियों, पितरों, विद्वान्‌ पंडितों, दैत्यों तथा मनुष्यों ने परमेश्वर को प्रसन्न करने के निमित्त यज्ञ सम्पन्न किये।

नारायणे भगवति तदिदं विश्वमाहितम्‌ ।

गृहीत-मायोरु-गुण: सर्गादावगुण: स्वतः ॥

३१॥

नारायणे--नारायण में; भगवति-- भगवान्‌; तत्‌ इदम्‌--ये समस्त भौतिक अभिव्यक्तियाँ; विश्वम्‌--सारे ब्रह्माण्ड; आहितम्‌--स्थित; गृहीत--स्वीकार; माया-- भौतिक शक्तियाँ; उरु-गुण: --अत्यन्त शक्तिमान; सर्ग-आदौ--सृजन, पालन तथा संहार में;अगुण:ः-गुणों के प्रति किसी प्रकार की आसक्ति से रहित; स्वत:ः--स्वयमेव, आत्म-निर्भरतापूर्वक ।

अतएव सारे ब्रह्मण्डों की भौतिक अभिव्यक्तियाँ उनकी शक्तिशाली भौतिक शक्तियों मेंस्थित हैं, जिन्हें वे स्वतः स्वीकार करते हैं, यद्यपि वे भौतिक गुणों से नित्य निर्लिप्त रहते हैं।

सृजामि तन्नियुक्तोहं हरो हरति तद्बशः ।

विश्व॑ं पुरुष-रूपेण परिपाति त्रि-शक्ति-धृक्‌ ॥

३२॥

सृजामि--सृजन करता हूँ; तत्‌--उसके द्वारा; नियुक्त:--नियुक्त होकर; अहम्‌--मैं; हर: --शिवजी; हरति--नाश करता है;ततू-वशः--उनके अधीन; विश्वम्‌--सम्पूर्ण विश्व का; पुरुष-- भगवान्‌; रूपेण--अपने नित्य रूप से; परिपाति--पालन करताहै; त्रि-शक्ति-धृक्‌ू--तीन शक्तियों का नियन्त्रक ।

उनकी इच्छा से मैं सृजन करता हूँ, शिवजी विनाश करते हैं और स्वयं वे अपने नित्यभगवान्‌ रूप से सबों का पालन करते हैं।

वे इन तीनों शक्तियों के शक्तिमान नियामक हैं।

इति तेभिहितं तात यथेदमनुपृच्छसि ।

नान्यद्धगवत: किज्ञिद्धाव्यं सदसदात्मकम्‌ ॥

३३॥

इति--इस प्रकार; ते--तुमको; अभिहितम्‌--बताया; तात--हे पुत्र; यथा--जिस प्रकार; इदम्‌--ये सब; अनुपृच्छसि--तुमनेपूछा है; न--कभी नहीं; अन्यत्‌--अन्य कुछ; भगवत: -- भगवान्‌ से परे; किल्ञित्‌--कुछ भी; भाव्यम्‌--कभी सोचने योग्य;सत्‌--कारण; असत्‌--कार्य; आत्मकम्‌--के विषय में

प्रिय पुत्र, तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, उसको मैंने इस तरह तुम्हें बतला दिया।

तुम यहनिश्चय जानो कि जो कुछ भी यहाँ है ( चाहे वह कारण हो या कार्य, दोनों ही--आध्यात्मिकतथा भौतिक जगतों में ) वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ पर आश्रित है।

न भारती मेड्ग मृषोपलक्ष्यतेन वै क्वचिन्मे मनसो मृषा गति: ।

न मे हषीकाणि पतनन्‍्त्यसत्पथेयन्मे हृदौत्कण्ठ्यवता धृतो हरि: ॥

३४॥

न--नहीं; भारती--कथन; मे--मन; अड्भ--हे नारद; मृषा--असत्य; उपलक्ष्यते-- प्रमाणित होता है; न--कभी नहीं; बै--निश्चय ही; क्वचित्‌--क भी; मे--मेरा; मनस:-- मन को; मृषा--असत्य; गति:-- प्रगति; न--न तो; मे--मेरी; हषीकाणि--इन्द्रियाँ; पतन्ति--पतित होती हैं; असत्‌-पथे--अस्थायी पदार्थ में; यत्‌--क्योंकि; मे--मेरे; हृदा--हृदय में; औत्कण्ठ्यवता--महान्‌ उत्कण्ठा के द्वारा; धृत:--धारण किया; हरि:-- भगवान्‌हे नारद, चूँकि मैंने भगवान्‌ हरि के चरणकमलों को अत्यन्त उत्कण्ठा के साथ पकड़ रखाहै, अतएव मैं जो कुछ कहता हूँ, वह कभी असत्य नहीं होता।

न तो मेरे मन की प्रगति कभीअवरुद्ध होती है, न ही मेरी इन्द्रियाँ कभी भी पदार्थ की क्षणिक आसक्ति से पतित होती हैं।

सोहं समाम्नायमयस्तपोमय:प्रजापतीनामभिवन्दितः पति: ।

आस्थाय योग निपुणं समाहित-स्तं नाध्यगच्छे यत आत्म-सम्भव: ॥

३५॥

सः अहम्‌-मैं स्वयं ( महान्‌ ब्रह्मा ); समाम्नाय-मय:--वैदिक ज्ञान की शिष्य-परम्परा की श्रेणी में; तप:ः-मयः--समस्ततपस्याओं से युक्त; प्रजापतीनाम्‌--जीवों के समस्त पुरखों का; अभिवन्दित: --पूज्य; पति: --स्वामी; आस्थाय--सफलतापूर्वकअभ्यास किया हुआ; योगम्‌--योगशक्ति; निपुणम्‌ू--अत्यन्त पटु; समाहित: --स्वरूप-सिद्ध; तम्‌--परमेश्वर को; न--नहीं;अध्यगच्छम्‌ू--ठीक से समझा; यत:--जिससे; आत्म--स्वयं; सम्भव:--उत्पन्न )।

यद्यपि मैं वैदिक ज्ञान की शिष्य-परम्परा में दक्ष महान्‌ ब्रह्मा के रूप में विख्यात हूँ औरयद्यपि मैंने सारी तपस्याएँ की हैं तथा यद्यपि मैं योगशक्ति एवं आत्म-साक्षात्कार में पटु हूँ औरमुझे सादर प्रणाम करनेवाले जीवों के महान्‌ प्रजापति मुझे इसी रूप में मानते हैं, तो भी मैं उनभगवान्‌ को नहीं समझ सकता, जो मेरे जन्म के मूल उद्गम हैं।

नतोअस्म्यहं तच्चरणं समीयुषांभवच्छिदं स्वस्त्ययनं सुमड्रलम्‌ ।

यो ह्यात्म-माया-विभवं सम पर्यगाद्‌यथा नभः स्वान्तमथापरे कुतः ॥

३६॥

नतः--नमस्कार करता हूँ; अस्मि--हूँ; अहम्‌--मैं; तत्‌ू--उस भगवान्‌ के; चरणम्‌--चरणों पर; समीयुषाम्‌--शरणागत का;भवतू-छिदम्‌--जन्म-मरण के चक्र को रोकनेवाला; स्वस्ति-अयनम्‌--समस्त सुख की अनुभूति; सु-मड्गरलम्‌--शुभकल्याणप्रद; यः--जो; हि--निश्चय ही; आत्म-माया--व्यक्तिगत शक्ति; विभवम्‌--शक्ति; स्म--निश्चय ही; पर्यगात्‌ू--अनुमाननहीं लगा सकता; यथा--जिस तरह; नभ: --आकाश; स्व-अन्तम्‌--अपनी सीमा; अथ--अतएव; अपरे-- अन्य; कुतः--किसतरह।

अतएव मेरे लिए श्रेयस्कर होगा कि मैं उनके चरणों में आत्म-समर्पण कर दूँ, क्योंकिकेवल वे ही मनुष्य को जन्म-मृत्यु के चक्र से उबार सकते हैं।

ऐसा आत्म-समर्पण कल्याण प्रदहै और इससे समस्त सुख की अनुभूति होती है।

आकाश भी अपने विस्तार की सीमाओं काअनुमान नहीं लगा सकता।

अतएव जब भगवान्‌ ही अपनी सीमाओं का अनुमान लगाने में अक्षमरहते हैं, तो भला दूसरे क्या कर सकते हैं ?

नाहं न यूयं यहतां गतिं विदु-न॑ बामदेव: किमुतापरे सुरा: ।

तन्मायया मोहित-बुद्धयस्त्विदंविनिर्मितं चात्म-समं विचक्ष्महे ॥

३७॥

न--न तो; अहम्‌--मैं; न--न तो; यूयम्‌--तुम सब मेरे पुत्र; यत्‌ू--जिसका; ऋताम्‌--वास्तविक; गतिम्‌--गति; विदु:--जानते हैं; न--न तो; वामदेव: --शिवजी; किम्‌-- क्या; उत-- और कुछ; अपरे-- अन्य; सुराः--देवता; तत्‌--उसकी;मायया--माया से; मोहित--मुग्ध; बुद्धयः--ऐसी बुद्धि से; तु--लेकिन; इृदम्‌--यह; विनिर्मितम्‌--जो उत्पन्न किया जाता है;च--भी; आत्म-समम्‌-- अपनी शक्ति के बल पर; विचक्ष्महे -- देखते हैं।

जब न शिवजी, न तुम और न मैं ही आध्यात्मिक आनन्द की सीमाएँ तय कर सके हैं, तोअन्य देवता इसे कैसे जान सकते हैं ? चूँकि हम सभी भगवान्‌ की माया से मोहित हैं, अतएव हम अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही इस व्यक्त विश्व को देख सकते हैं।

यस्यावतार-कर्माणि गायन्ति ह्यस्मदादयः ।

न यं विदन्ति तत्त्वेन तस्मे भगवते नमः ॥

३८॥

यस्य--जिसका; अवतार--अवतार; कर्माणि--कार्यकलाप; गायन्ति-- महिमा का गायन करते हैं; हि--निस्सन्देह; अस्मत्‌-आदयः--हम जैसे व्यक्ति; न--नहीं; यमू--जिसको; विदन्ति--जानते हैं; तत्त्वेन--शत-प्रतिशत उसी रूप में; तस्मै-- उन;भगवते-- भगवान्‌ श्रीकृष्ण को; नम:--नमस्कार करता हूँ।

हम उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ को सादर प्रणाम करते हैं, जिनके अवतारों तथा कार्य-कलापों का गायन हमारे द्वारा उनके महिमा-मण्डन के लिए किया जाता है, यद्यपि वे अपनेयथार्थ रूप में बड़ी कठिनाई से ही जाने जा सकते हैं।

स एष आद्यः पुरुष: कल्पे कल्पे सृजत्यज: ।

आत्मात्मन्यात्मनात्मानं स संयच्छति पाति च ॥

३९॥

सः--वह; एष:--वही; आद्य:--आदि भगवान्‌; पुरुष: --महाविष्णु अवतार, गोविन्द, श्रीकृष्ण के पूर्णाश; कल्पे कल्पे--प्रत्येक कल्प में; सृजति--सृष्टि करता है; अज:--अजन्मा; आत्मा--स्वयं; आत्मनि--स्वयं में; आत्मना--स्वयं से;आत्मानमू--स्वयं को; सः--वह; संयच्छति--लीन कर लेता है; पाति--पालन करता है; च--भी

वे परम आदि भगवान्‌ श्रीकृष्ण, प्रथम अवतार महाविष्णु के रूप में अपना विस्तार करकेइस व्यक्त जगत की सृष्टि करते हैं, किन्तु वे अजन्मा रहते हैं।

फिर भी सृष्टि उन्हीं से है, भौतिकपदार्थ तथा अभिव्यक्ति भी वे ही हैं।

वे कुछ काल तक उनका पालन करते हैं और फिर उन्हेंअपने में समाहित कर लेते हैं।

विशुद्धं केवल ज्ञानं प्रत्यक्‌ सम्यगवस्थितम्‌ ।

सत्य॑ पूर्णमनाचमन्तं निर्गुणं नित्यमद्दयम्‌ ॥

४०॥

ऋषे विदन्ति मुनय: प्रशान्तात्मेन्द्रियाशया: ।

यदा तदेवासत्तकैंस्तिरोधीयेत विप्लुतम्‌ ॥

४१॥

विशुद्धमू-- भौतिक कल्मष के बिना; केवलम्‌--शुद्ध तथा पूर्ण ; ज्ञामम्‌--ज्ञान; प्रत्यक्‌--सर्वव्यापी; सम्यक्‌ --पूर्ण रूप से;अवस्थितम्‌--स्थित; सत्यम्‌--सत्य; पूर्णम्‌-पूर्ण; अनादि--जिसका आदि न हो; अन्तम्‌--जिसका अन्त न हो; निर्गुणम्‌--गुणों से रहित; नित्यमू--शाश्वत; अद्दबम्‌--अद्वितीय; ऋषे--हे ऋषि नारद; विदन्ति--समझ सकते हैं; मुनयः--बड़े-बड़ेविचारक; प्रशान्त--शान्त-चित्त; आत्म--स्वयं; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; आशया: --शरणागत; यदा--जब; तत्‌--वह; एव--निश्चयही; असत्‌--न लागू होनेवाला; तर्क: --तर्को द्वारा; तिर:-धीयेत--विलुप्त हो जाता है; विप्लुतम्‌ू--विकृत ।

भगवान्‌ पवित्र हैं और भौतिक क्लेश के समस्त कल्मष से रहित हैं।

वे परम सत्य हैं औरसाक्षात्‌ पूर्ण ज्ञान हैं।

वे सर्वव्यापी, अनादि, अनन्त तथा अद्ढय हैं।

हे नारद, हे ऋषि, बड़े-बड़े मुनि उन्हें तभी जान सकते हैं, जब वे समस्त भौतिक लालसाओं से मुक्त हो जाते हैं औरअविचलित इन्द्रियों की शरण ग्रहण कर लेते हैं।

अन्यथा व्यर्थ के तर्कों से सब कुछ विकृत होजाता है और भगवान्‌ हमारी दृष्टि से ओझल हो जाते हैं।

आद्योवतार: पुरुष: परस्यकाल: स्वभाव: सदसन्मनश्च ।

द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणिविराट स्वराट्‌ स्थास्नु चरिष्णु भूम्न: ॥

४२॥

आद्यः--प्रथम; अवतार:--अवतार; पुरुष:--कारणार्णवशायी विष्णु; परस्थ-- भगवान्‌ का; काल: --काल, समय;स्वभाव:--आकाश; सत्‌--फल; असत्‌--कारण; मन: -- मन; च-- भी; द्रव्यम्‌--तत्त्व; विकार: -- भौतिक अहंकार; गुण: --प्रकृति के गुण; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; विराट्‌--पूर्ण शरीर; स्व॒राट्‌--गर्भोदकशायी विष्णु; स्थास्नु--अचर; चरिष्णु--चर;भूम्:--भगवान्‌ का |

कारणार्णवशायी विष्णु ही परमेश्वर के प्रथम अवतार हैं।

वे नित्य काल, आकाश, कार्य-कारण, मन, तत्त्वों, भौतिक अहंकार, प्रकृति के गुणों, इन्द्रियों, भगवान्‌ के विराट रूप,गर्भोदकशायी विष्णु तथा समस्त चर एवं अचर जीवों के स्वामी हैं।

अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशादक्षादयो ये भवदादयश्च ।

स्वर्लोक-पाला: खगलोक-पालानूलोक-पालास्तललोक-पाला: ॥

४३॥

गन्धर्व-विद्याधर-चारणेशाये यक्ष-रक्षोरग-नाग-नाथा: ।

ये वा ऋषीणामृषभा: पितृणांदैल्येन्द्र-सिद्धेश्वर-दानवेन्द्रा: ।

अन्ये च ये प्रेत-पिशाच-भूत--कृष्माण्ड-यादो-मृग-पक्ष्यधीशा: ॥

४४॥

यत्किञ्ञ लोके भगवन्महस्व-दोज:-सहस्वद्‌ बलवत्‌ क्षमावत्‌ ।

श्री-ही-विभूत्यात्मवदद्भुतार्णतत्त्वं परं रूपवदस्व-रूपम्‌ ॥

४५॥

अहम्‌ ( ब्रह्मा )) भव:--शिवजी; यज्ञ:-- भगवान्‌ विष्णु; इमे--ये सब; प्रजा-ईशा:--जीवों के पिता; दक्ष-आदय:--दक्ष,मरीचि, मनु, आदि; ये--जो; भवत्‌--आप; आदय: च--तथा कुमारगण ( सनत्कुमार तथा उनके भाई ); स्वलोॉक-पाला:--स्वर्ग लोक के नायक; खगलोक-पाला:--अन्तरिक्ष यात्रियों के नायक; नूलोक-पाला: --मनुष्यों के नेता; तललोक-पाला:--निम्नलोकों के नायक; गन्धर्व--गन्धर्वलोक-वासी; विद्याधर--विद्याधर लोक के वासी; चारण-ईशा:--चारणों के नेता; ये--तथा अन्य; यक्ष--यक्षों के नेता; रक्ष--राक्षस; उरग--सर्प; नाग-नाथा:--नागलोक ( पृथ्वी के नीचे ) के नायक; ये--अन्य;वा--भी; ऋषीणाम्‌--ऋषियों के; ऋषभा: -- प्रमुख; पितृणाम्‌--पितरों के; दैत्य-इन्द्र--नास्तिकों के नायक; सिद्ध-ईश्वर--सिद्धलोक के नायक ( अन्तरिक्ष पुरुष ); दानव-इन्द्रा:--अनार्यों के नायक; अन्ये--उनके अतिरिक्त; च-- भी; ये--जो; प्रेत--मृतक; पिशाच--दुष्टात्माएँ; भूत--जिन्न; कृष्माण्ड--विशेष प्रकार का पिशाच; याद:--जलचर; मृग--पशु; पश्षि-अधीशा:--विशाल चील्ह; यत्‌--कुछ भी; किम्‌ च--तथा प्रत्येक वस्तु; लोके --संसार में; भगवत्‌-- भगयुक्त या अद्वितीयशक्तिसम्पन्न; महस्वत्‌--विशेष मात्रा का; ओज:-सहस्वत्‌--विशिष्ट मानसिक तथा ऐंद्रिय कौशल; बलवत्‌--बल से सम्पन्न;क्षमावत्‌--क्षमा से युक्त; श्री--सौन्दर्य; ही--पाप कृत्य से लज्जित; विभूति--धन; आत्मवत्‌--बुद्धि-सम्पन्न; अद्भुत--आश्चर्यजनक; अर्गमू--जाति; तत्त्वम्‌ू--विशिष्ट सत्य; परम्‌--दिव्य; रूपवत्‌--रूपवाला; अस्व-रूपम्‌-- भगवत्स्वरूप कानहीं।

मैं स्वयं (ब्रह्मा), शिवजी, भगवान्‌ विष्णु, दक्ष आदि प्रजापति, तुम (नारद तथा कुमारगण ), इन्द्र तथा चन्द्र जैसे देवता, भूलोक के नायक, भूलोक के नायक, अधोलोक केनायक, गन्धर्वलोक के नायक, विद्याधटलोक के नायक, चारणलोक के नायक, यक्षों, राक्षसोंतथा उरगों के नेता, ऋषि, बड़े-बड़े देत्य, बड़े-बड़े नास्तिक तथा अन्तरिक्ष पुरुष तथा मृतक,प्रेत, शैतान, जिन्न, कृष्माण्ड, बड़े-बड़े जलचर, बड़े-बड़े पशु तथा पक्षी आदि या अन्य शब्दोंमें ऐसी कोई भी वस्तु जो बल, ऐश्वर्य, मानसिक तथा ऐन्द्रिय कौशल, शक्ति, क्षमा, सौन्दर्य,विनप्रता, ऐश्वर्य तथा प्रजनन से युक्त हो, चाहे रूपवान या रूप-विहीन, वे सब भले ही विशिष्टसत्य तथा भगवान्‌ के रूप प्रतीत हों, लेकिन वास्तव में वे वैसे हैं नहीं।

वे सभी भगवान्‌ कीदिव्य शक्ति के अंशमात्र हैं।

प्राधान्यतो यानृष आमनन्तिलीलावतारान्‌ पुरुषस्य भूम्न: ।

आपीयतां कर्ण-कषाय-शोषा-ननुक्रमिष्ये त इमान्‌ सुपेशान्‌ ॥

४६॥

प्राधान्यतः--मुख्यतया; यान्‌ू--वे सब; ऋषे--हे नारद; आमनन्ति--पूजते हैं; लीला--लीलाएँ; अवतारान्‌ू--सभी अवतार;पुरुषस्थ-- भगवान्‌ के; भूम्त:--सर्व श्रेष्ठ, परम; आपीयताम्‌--तुम्हारे द्वारा आस्वादन के लिए; कर्ण--कान; कषाय--मैल;शोषानू-- भाप बन जानेवाला; अनुक्रमिष्ये--एक के बाद एक वर्णन करेंगे; ते--वे; इमान्‌--जिस रूप में वे मेरे हृदय में हैं;सु-पेशान्‌--सुनने में मधुर।

हे नारद, अब मैं एक-एक करके भगवान्‌ के दिव्य अवतारों का वर्णन करूँगा, जो लीलाअवतार कहलाते हैं।

उनके कार्यकलापों के सुनने से कान में संचित सारा मैल हट जाता है।

येलीलाएँ सुनने में मधुर हैं और आस्वाद्य हैं, अतएव ये मेरे हृदय में सदैव बनी रहती हैं।

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