← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय बारह: कुमारों और अन्य लोगों की रचना

3.12मैत्रेय उवाचइति ते वर्णित: क्षत्त: कालाख्य: परमात्मन: ।

महिमा वेदगर्भोथ यथास्त्राक्षीत्निबोध मे ॥

१॥

मैत्रेयः उवाच-- श्री मैत्रेय ने कहा; इति--इस प्रकार; ते--तुमसे; वर्णित:--वर्णन किया गया; क्षत्त:--हे विदुर; काल-आख्य:--नित्य काल नामक; परमात्मन:--परमात्मा की; महिमा-- ख्याति; वेद-गर्भ:--वेदों के आगार, ब्रह्मा; अथ--इसकेबाद; यथा--जिस तरह यह है; अस्त्राक्षीत्‌-उत्पन्न किया; निबोध--समझने का प्रयास करो; मे--मुझसे

श्री मैत्रेय ने कहा : हे विद्वान विदुर, अभी तक मैंने तुमसे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ के काल-रूप की महिमा की व्याख्या की है।

अब तुम मुझसे समस्त वैदिक ज्ञान के आगार ब्रह्मा की सृष्टिके विषय में सुन सकते हो।

ससजजग्रेउन्धतामिस्त्रमथ तामिस्त्रमादिकृत्‌ ।

महामोहं च मोहं च तमश्चाज्ञानवृत्तय: ॥

२॥

ससर्ज--उत्पन्न किया; अग्रे--सर्वप्रथम; अन्ध-तामिस्त्रमू--मृत्यु का भाव; अथ--तब; तामिस्त्रमू--हताशा पर क्रोध; आदि-कृत्‌ू--ये सभी; महा-मोहम्‌-- भोग्य वस्तुओं का स्वामित्व; च-- भी; मोहम्‌-- भ्रान्त धारणा; च-- भी; तम: -- आत्मज्ञान मेंअंधकार; च-- भी; अज्ञान--अविद्या; वृत्तय:--पेशे, वृत्तियाँ

ब्रह्मा ने सर्वप्रथम आत्मप्रवंचना, मृत्यु का भाव, हताशा के बाद क्रोध, मिथ्या स्वामित्व काभाव तथा मोहमय शारीरिक धारणा या अपने असली स्वरूप की विस्मृति जैसी अविद्यापूर्णवृत्तियों की संरचना की।

इृष्ठा पापीयसीं सृष्टि नात्मानं बह्मन्यत ।

भगवद्धयानपूतेन मनसान्यां ततोडसृजत्‌ ॥

३॥

इृष्ठा--देखकर; पापीयसीम्‌--पापमयी; सृष्टिम्‌--सृष्टि को; न--नहीं; आत्मानम्‌--स्वयं को; बहु--अत्यधिक हर्ष; अमन्यत--अनुभव किया; भगवत्‌-- भगवान्‌ का; ध्यान--ध्यान; पूतेन--उसके द्वारा शुद्ध; मनसा--मन से; अन्याम्‌--दूसरा; ततः--तत्पश्चात्‌; असृजत्‌--उत्पन्न किया

ऐसी भ्रामक सृष्टि को पापमय कार्य मानते हुए ब्रह्माजी को अपने कार्य में अधिक हर्ष काअनुभव नहीं हुआ, अतएव उन्होंने भगवान्‌ के ध्यान द्वारा अपने आपको परि शुद्ध किया।

तबउन्होंने सृष्टि की दूसरी पारी की शुरुआत की।

सनक॑ च सनन्दं च सनातनमथात्मभू: ।

सनत्कुमारं च मुनीन्निष्क्रियानूथ्वरितस: ॥

४॥

सनकम्‌--सनक; च-- भी; सनन्दम्‌ू-- सनन्‍्द; च--तथा; सनातनम्‌--सनातन; अथ--तत्पश्चात्‌; आत्म-भू:--स्वयं भू ब्रह्मा;सनत्‌-कुमारम्‌--सनत्कुमार; च-- भी; मुनीन्‌--मुनिगण; निष्क्रियानू--समस्त सकाम कर्म से मुक्त; ऊर्ध्व-रेतस:--वे जिनकावीर्य ऊपर की ओर प्रवाहित होता है।

सर्वप्रथम ब्रह्मा ने चार महान्‌ मुनियों को उत्पन्न किया जिनके नाम सनक, सननन्‍द, सनातनतथा सनत्कुमार हैं।

वे सब भौतिकतावादी कार्यकलाप ग्रहण करने के लिए अनिच्छुक थे,क्योंकि ऊर्ध्वरेता होने के कारण वे अत्यधिक उच्चस्थ थे।

तान्बभाषे स्वभू: पृत्रान्प्रजा: सृजत पुत्रका: ।

तन्नैच्छन्मोक्षधर्माणो वासुदेवपरायणा: ॥

५॥

तानू--उन कुमारों से, जिनका उल्लेख ऊपर हुआ है; बभाषे--कहा; स्वभू:--ब्रह्मा ने; पुत्रानू--पुत्रों से; प्रजा: --सन्तानें;सृजत--सृजन करने के लिए; पुत्रका: --मेरे पुत्रो; तत्‌ू--वह; न--नहीं; ऐच्छन्‌--चाहते हुए; मोक्ष-धर्माण:--मोक्ष केसिद्धान्तों के प्रति प्रतिज्ञाबद्ध; वासुदेव-- भगवान्‌ के प्रति; परायणा: --परायण, अनुरक्त |

पुत्रों को उत्पन्न करने के बाद ब्रह्मा ने उनसे कहा, 'पुत्रो, अब तुम लोग सन्‍्तान उत्पन्नकरो।

किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ वासुदेव के प्रति अनुरक्त होने के कारण उन्होंने अपनालक्ष्य मोक्ष बना रखा था, अतएव उन्होंने अपनी अनिच्छा प्रकट की।

सोउवध्यातः सुतैरेवं प्रत्याख्यातानुशासने: ।

क्रोधं दुर्विषहं जातं नियन्तुमुपचक्रमे ॥

६॥

सः--वह ( ब्रह्मा ); अवध्यात:--इस प्रकार अनादरित होकर; सुतैः--पुत्रों द्वारा; एवम्‌--इस प्रकार; प्रत्याख्यात--आज्ञा माननेसे इनकार; अनुशासनै:--अपने पिता के आदेश से; क्रोधम्‌--क्रो ध; दुर्विषहम्‌-- असहनीय; जातम्‌--इस प्रकार उत्पन्न;नियन्तुम्‌ू--नियंत्रण करने के लिए; उपचक्रमे-- भरसक प्रयत्न किया।

पुत्रों द्वारा अपने पिता के आदेश का पालन करने से इनकार करने पर ब्रह्मा के मन मेंअत्यधिक क्रोध उत्पन्न हुआ जिसे उन्होंने व्यक्त न करके दबाए रखना चाहा।

धिया निगृह्ममाणोपि भ्रुवोर्मध्यात्प्रजापते: ।

सद्योडजायत तन्मन्युः कुमारो नीललोहितः ॥

७॥

धिया--बुद्धि से; निगृह्ममाण:--नियंत्रित हुए; अपि--के बावजूद; भ्रुवो:--भौहों के; मध्यात्‌--बीच से; प्रजापते:--ब्रह्मा के;सद्यः--तुरन्त; अजायत--उत्पन्न हुआ; तत्‌--उसका; मन्यु:--क्रोध; कुमार: --बालक; नील-लोहितः--नीले तथा लाल कामिश्रण |

यद्यपि उन्होंने अपने क्रोध को दबाए रखने का प्रयास किया, किन्तु वह उनकी भौंहों केमध्य से प्रकट हो ही गया जिससे तुरन्त ही नीललोहित रंग का बालक उत्पन्न हुआ।

उपज है।

स बै रुरोद देवानां पूर्वजो भगवान्भव: ।

नामानि कुरु मे धातः स्थानानि च जगदगुरो ॥

८॥

सः--वह; वै--निश्चय ही; रुरोद--जोर से चिल्लाया; देवानाम्‌ पूर्वज:--समस्त देवताओं में ज्येष्ठतम; भगवान्‌-- अत्यन्तशक्तिशाली; भव:ः--शिवजी; नामानि--विभिन्न नाम; कुरू--नाम रखो; मे--मेरा; धात:ः--हे भाग्य विधाता; स्थानानि--स्थान;च--भी; जगत्‌ू-गुरो--हे ब्रह्माण्ड के शिक्षक |

जन्म के बाद वह चिललाने लगा : हे भाग्यविधाता, हे जगदगुरु, कृपा करके मेरा नाम तथास्थान बतलाइये।

इति तस्य बच: पाद्ो भगवान्परिपालयन्‌ ।

अभ्यधाद्धद्रया वाचा मा रोदीस्तत्करोमि ते ॥

९॥

इति--इस प्रकार; तस्य--उसकी; वच:--याचना; पाद्म; --कमल के फूल से उत्पन्न हुआ; भगवान्‌--शक्तिशाली;'परिपालयन्‌--याचना स्वीकार करते हुए; अभ्यधात्‌--शान्त किया; भद्रया--भद्ग, मृदु; वाचा--शब्दों द्वारा; मा--मत;रोदीः--रोओ; तत्‌-- वह; करोमि-- करूँगा; ते--जैसा तुम चाहते हो |

कमल के फूल से उत्पन्न हुए सर्वशक्तिमान ब्रह्मा ने उसकी याचना स्वीकार करते हुए मृदुवाणी से उस बालक को शान्त किया और कहा--मत चिललाओ।

जैसा तुम चाहोगे मैं वैसा ही करूँगा।

यदरोदीः सुरश्रेष्ठ सोद्ठेग इव बालक: ।

ततस्त्वामभिधास्यन्ति नाम्ना रुद्र इति प्रजा: ॥

१०॥

यत्‌--जितना; अरोदी:ः--जोर से रोया; सुर-श्रेष्ठ--हे देवताओं के प्रधान; स-उद्देग: --अत्यधिक चिन्ता सहित; इब--सहश;बालक:ः--बालक; ततः --त त्पश्चात्‌; त्वामू-- तुमको; अभिधास्यन्ति--पुकारेंगे; नाम्ना--नाम लेकर; रुद्र:--रुद्र; इति--इसप्रकार; प्रजा:--लोग।

तत्पश्चात्‌ ब्रह्म ने कहा : हे देवताओं में प्रधान, सभी लोगों के द्वारा तुम रुद्र नाम से जानेजाओगे, क्योंकि तुम इतनी उत्सुकतापूर्वक चिल्लाये हो।

हृदिन्द्रियाण्यसुर्व्योम वायुरग्निर्जलं मही ।

सूर्यश्चन्द्रस्तपश्चेव स्थानान्यग्रे कृतानि ते ॥

११॥

हत्‌--हृदय; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; असु:--प्राणवायु; व्योम-- आकाश; वायु:--वायु; अग्नि:ः--आग; जलम्‌-- जल; मही--पृथ्वी; सूर्य :--सूर्य ; चन्द्र: --चन्द्रमा; तप:--तपस्या; च-- भी; एव--निश्चय ही; स्थानानि--ये सारे स्थान; अग्रे--इसके पहलेके; कृतानि--पहले किये गये; ते--तुम्हारे लिए।

हे बालक, मैंने तुम्हारे निवास के लिए पहले से निम्नलिखित स्थान चुन लिये हैं: हृदय,इद्रियाँ, प्राणवायु, आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा तथा तपस्या।

मन्युर्मनुर्महिनसो महाउिछव ऋतध्वज: ।

उमग्ररेता भव: कालो वामदेवो धृतव्रतः ॥

१२॥

मन्यु:, मनु:, महिनसः, महान्‌ू, शिव:, ऋतध्वज:, उग्ररेताः, भव:, काल:, वामदेव:, धृतब्रत:--ये सभी रुद्र के नाम हैं।

ब्रह्मजी ने कहा : हे बालक रुद्र, तुम्हारे ग्यारह अन्य नाम भी हैं-मन्यु, मनु, महिनस,महान, शिव, ऋतुध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव तथा धृतब्रत।

धीर्धृतिरसलोमा च नियुत्सर्पिरिलाम्बिका ।

इरावती स्वधा दीक्षा रुद्राण्यो रुद्र ते स्त्रियः ॥

१३॥

धी:, धृति, रसला, उमा, नियुत्‌, सर्पि,, इला, अम्बिका, इरावती, स्वधा, दीक्षा रुद्राण्य:--ये ग्यारह रुद्राणियाँ हैं; रुद्र--हे रुद्र;ते--तुम्हारी; स्त्रियः--पत्लियाँ ।

हे रुद्र, तुम्हारी ग्यारह पत्नियाँ भी हैं, जो रुद्राणी कहलाती हैं और वे इस प्रकार है-धी,धृति, रसला, उमा, नियुत्‌, सर्पि, इला, अम्बिका, इरावती, स्वधा तथा दीक्षा।

गृहाणैतानि नामानि स्थानानि च सयोषण: ।

एशि: सृज प्रजा बह्लीः प्रजानामसि यत्पति: ॥

१४॥

गृहाण--स्वीकार करो; एतानि--इन सारे; नामानि--विभिन्न नामों को; स्थानानि--तथा स्थानों को; च-- भी; स-योषण:--पत्नियों समेत; एभि:--उनके द्वारा; सृज--उत्पन्न करो; प्रजा:--सन्तानें; बह्नीः--बड़े पैमाने पर; प्रजानामू--जीवों के; असि--तुम हो; यत्‌--क्योंकि; पति:--स्वामी

हे बालक, अब तुम अपने तथा अपनी पत्नियों के लिए मनोनीत नामों तथा स्थानों कोस्वीकार करो और चूँकि अब तुम जीवों के स्वामियों में से एक हो अतः तुम व्यापक स्तर परजनसंख्या बढ़ा सकते हो।

इत्यादिष्ट: स्वगुरुणा भगवान्नीललोहितः ।

सत्त्वाकृतिस्वभावेन ससर्जात्मसमा: प्रजा: ॥

१५॥

इति--इस प्रकार; आदिष्ट:--आदेश दिये जाने पर; स्व-गुरुणा--अपने ही गुरु द्वारा; भगवान्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; नील-लोहितः--रुद्र, जिनका रंग नीले तथा लाल का मिश्रण है; सत्त्व--शक्ति; आकृति--शारीरिक स्वरूप; स्वभावेन--तथाअत्यन्त उग्र स्वभाव से; ससर्ज--उत्पन्न किया; आत्म-समा:--अपने ही तरह की; प्रजा: --सन्तानें |

नील-लोहित शारीरिक रंग वाले अत्यन्त शक्तिशाली रुद्र ने अपने ही समान स्वरूप, बलतथा उग्र स्वभाव वाली अनेक सस्तानें उत्पन्न कीं।

रुद्राणां रुद्रसृष्टानां समन्तादग्रसतां जगत्‌ ।

निशाम्यासड्ख्यशो यूथान्प्रजापतिरशब्डुत ॥

१६॥

" रुद्राणामू-रुद्र के पुत्रों का; रुद्र-सृष्टानाम्‌ू--रुद्र द्वारा उत्पन्न किये गये; समन्तात्‌ू--एकसाथ एकत्र होकर; ग्रसताम्‌ू--निगलतेसमय; जगत्‌--ब्रह्माण्ड; निशाम्य--उनके कार्यकलापों को देखकर; असड्ख्यश: --असीम; यूथान्‌--टोली, समूह; प्रजा-पतिः--जीवों के पिता; अशद्भुत-- भयभीत हो गया।

रुद्र द्वारा उत्पन्न पुत्रों तथा पौत्रों की संख्या असीम थी और जब वे एकत्र हुए तो वे सम्पूर्णब्रह्माण्ड को निगलने लगे।

जब जीवों के पिता ब्रह्मा ने यह देखा तो वे इस स्थिति से भयभीत होउठे।

अलं प्रजाभि: सूष्टाभिरीदशीभि: सुरोत्तम ।

मया सह दहन्तीभिर्दिशश्चक्षुभिसल्बणै: ॥

१७॥

अलमू--व्यर्थ; प्रजाभि:--ऐसे जीवों द्वारा; सूष्टाभि: --उत्पन्न; ईहशीभि: --इस प्रकार के; सुर-उत्तम--हे देवताओं में सर्वश्रेष्ठ;मया--मुझको; सह--सहित; दहन्तीभि: --जलती हुई; दिशः--सारी दिशाएँ; चश्लु्भि: --आँखों से; उल्बणै:--दहकती लपटें।

ब्रह्मा ने रुद्र से कहा: हे देवश्रेष्ठ, तुम्हें इस प्रकार के जीवों को उत्पन्न करने कीआवश्यकता नहीं है।

उन्होंने अपने नेत्रों की दहकती लपटों से सभी दिशाओं की सारी वस्तुओंको विध्वंस करना शुरू कर दिया है और मुझ पर भी आक्रमण किया है।

तप आतिष्ठ भद्गं ते सर्वभूतसुखावहम्‌ ।

तपसैव यथा पूर्व स्त्रष्टा विश्वमिदं भवान्‌ ॥

१८॥

तपः--तपस्या; आतिष्ठ --बैठिये; भद्रमू--शुभ; ते--तुम्हारा; सर्व--समस्त; भूत--जीव; सुख-आवहम्‌--सुख लानेवाली;तपसा--तपस्या द्वारा; एव--ही; यथा--जितना; पूर्वम्‌--पहले; स्त्रष्टा--उत्पन्न करेगा; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; इदमू--यह;भवान्‌ू--आप।

हे पुत्र, अच्छा हो कि तुम तपस्या में स्थित होओ जो समस्त जीवों के लिए कल्याणप्रद हैऔर जो तुम्हें सारे वर दिला सकती है।

केवल तपस्या द्वारा तुम पूर्ववत्‌ ब्रह्माण्ड की रचना करसकते हो।

तपसैव परं ज्योतिर्भगवन्तमधोक्षजम्‌ ।

सर्वभूतगुहावासमझ्जसा विन्दते पुमान्‌ ॥

१९॥

तपसा--तपस्या से; एब--एकमात्र; परम्‌ू--परम; ज्योति: -- प्रकाश; भगवन्तम्‌-- भगवान्‌ को; अधोक्षजम्‌--वह जो इन्द्रियोंकी पहुँच के परे है; सर्व-भूत-गुहा-आवासम्‌--सारे जीवों के हृदय में वास करने वाले; अज्जसा--पूर्णतया; विन्दते--जानसकता है; पुमानू--मनुष्य

एकमात्र तपस्या से उन भगवान्‌ के भी पास पहुँचा जा सकता है, जो प्रत्येक जीव के हृदयके भीतर हैं किन्तु साथ ही साथ समस्त इन्द्रियों की पहुँच के बाहर हैं।

मैत्रेय उवाचएवमात्मभुवादिष्ट: परिक्रम्य गिरां पतिम्‌ ।

बाढमित्यमुमामन्त्रय विवेश तपसे वनम्‌ ॥

२०॥

मैत्रेयः उवाच-- श्री मैत्रेय ने कहा; एवम्‌--इस प्रकार; आत्म-भुवा--ब्रह्मा द्वारा; आदिष्ट: --इस तरह प्रार्थना किये जाने पर;परिक्रम्य--प्रदक्षिणा करके; गिराम्‌--वेदों के; पतिम्‌--स्वामी को; बाढम्‌ू--उचित; इति--इस प्रकार; अमुम्‌--ब्रह्मा को;आमनन्‍्त्रय--इस प्रकार सम्बोधित करते हुए; विवेश--प्रविष्ट हुए; तपसे--तपस्या के लिए; वनम्‌--वन में |

श्री मैत्रेय ने कहा : इस तरह ब्रह्मा द्वारा आदेशित होने पर रुद्र ने वेदों के स्वामी अपने पिता की प्रदक्षिणा की।

हाँ कहते हुए उन्होंने तपस्या करने के लिए बन में प्रवेश किया।

अथाभिध्यायत: सर्ग दश पुत्रा: प्रजज्ञिरि ।

भगवच्छक्तियुक्तस्थ लोकसन्तानहेतव: ॥

२१॥

अथ--इस प्रकार; अभिध्यायत:--सोचते हुए; सर्गम्‌--सृष्टि; दश--दस; पुत्रा: --पुत्र; प्रजज्ञिरि--उत्पन्न करते हुए; भगवत्‌--श्रीभगवान्‌ से सम्बन्धित; शक्ति--ऊर्जा; युक्तस्य--शक्तिमान बने हुए; लोक--संसार; सन्‍्तान--संतति; हेतवः--कारण |

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ द्वारा शक्ति प्रदान किये जाने पर ब्रह्मा ने जीवों को उत्पन्न करने कीसोची और सन्तानों के विस्तार हेतु उन्होंने दस पुत्र उत्पन्न किये।

मरीचिरत्र्यद्धिरसौ पुलस्त्य: पुलहः क्रतु: ।

भृगुर्वसिष्ठो दक्षश्न दशमस्तत्र नारद: ॥

२२॥

मरीचि:, अत्रि, अड्विरसौ, पुलस्त्य:, पुलहः, क्रतु:, भृगु:, वसिष्ठ:, दक्ष:--ब्रह्मा के पुत्रों के नाम; च--तथा; दशम:--दसवाँ;तत्र--वहाँ; नारद:--नारद |

इस तरह मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भूगु, वसिष्ठ, दक्ष तथा दसवें पुत्रनारद उत्पन्न हुए।

उत्सज्ञान्नारदो जज्ले दक्षोडुष्टात्स्वयम्भुव: ।

प्राणाद्वसिष्ठ: सञ्जातो भृगुस्त्वचि करात्क्रतु: ॥

२३॥

उत्सड़ात्‌ू--दिव्य विचार-विमर्श से; नारद: --महामुनि नारद; जज्ञे--उत्पन्न किया गया; दक्ष:--दक्ष; अद्जुष्ठात्‌-- अँगूठे से;स्वयम्भुव:ः--ब्रह्मा के; प्राणातू--प्राणवायु से या श्वास लेने से; वसिष्ठ:--वसिष्ठ; सज्भात:--उत्पन्न हुआ; भृगु:-- भूगु, मुनि;त्वचि--स्पर्श से; करातू--हाथ से; क्रतुः--क्रतु

मुनिनारद ब्रह्मा के शरीर के सर्वोच्च अंग मस्तिष्क से उत्पन्न पुत्र हैं।

वसिष्ठ उनकी श्वास से, दक्षअँगूठे से, भूगु उनके स्पर्श से तथा क्रतु उनके हाथ से उत्पन्न हुए।

पुलहो नाभितो जज्ने पुलस्त्य: कर्णयोरषि: ।

अड्डिरा मुखतो कषो त्रिर्मरीचिर्ममसो भवत्‌ ॥

२४॥

पुलहः--पुलह मुनि; नाभित:--नाभि से; जज्ञे--उत्पन्न किया; पुलस्त्य:--पुलस्त्यमुनि; कर्णयो:--कानों से; ऋषि: --महामुनि;अड्डिराः--अंगिरा मुनि; मुखतः--मुख से; अक्ष्ण:--आँखों से; अत्रि: --अत्रि मुनि; मरीचि:--मरीचि मुनि; मनस:--मन से;अभवत्‌--प्रकट हुए

पुलस्त्य ब्रह्मा के कानों से, अंगिरा मुख से, अत्रि आँखों से, मरीचि मन से तथा पुलह नाभिसे उत्पन्न हुए।

धर्म: स्तनाइक्षिणतो यत्र नारायण: स्वयम्‌ ।

अधर्म: पृष्ठतो यस्मान्मृत्युलेकभयड्भूर: ॥

२५॥

धर्म:--धर्म; स्तनातू--वक्षस्थल से; दक्षिणत:--दाहिनी ओर के; यत्र--जिसमें ; नारायण :--पर मे श्वर; स्वयम्‌-- अपने से;अधर्म: --अधर्म; पृष्ठतः--पीठ से; यस्मात्‌--जिससे; मृत्यु:--मृत्यु; लोक--जीव के लिए; भयम्‌-करः--भयकारक |

धर्म ब्रह्मा के वक्षस्थल से प्रकट हुआ जहाँ पर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ नारायण आसीन हैंऔर अधर्म उनकी पीठ से प्रकट हुआ जहाँ जीव के लिए भयावह मृत्यु उत्पन्न होती है।

हृदि कामो भ्रुवः क्रोधो लोभश्वाधरदच्छदात्‌ ।

आस्याद्वाक्सिन्धवो मेढ़ान्निरृतिः पायोरघाअ्रय: ॥

२६॥

हृदि--हृदय से; काम:--काम; भ्रुव:--भौंहों से; क्रो ध:--क्रो ध; लोभ: --लालच; च-- भी; अधर-दच्छदात्‌--ओठों के बीचसे; आस्यात्‌--मुख से; वाक्‌ू--वाणी; सिन्धव: --समुद्र; मेढ़ात्‌--लिंग से; निरृति:--निम्न कार्य; पायो:--गुदा से; अघ-आश्रयः--सारे पापों का आगार।

काम तथा इच्छा ब्रह्मा के हृदय से, क्रोध उनकी भौंहों के बीच से, लालच उनके ओठों केबीच से, वाणी की शक्ति उनके मुख से, समुद्र उनके लिंग से तथा निम्न एवं गहित कार्यकलापसमस्त पापों के स्रोत उनकी गुदा से प्रकट हुए।

छायाया: कर्दमो जज्ञे देवहूत्या: पति: प्रभु: ।

मनसो देहतश्रेदं जज्ञे विश्वकृतो जगत्‌ ॥

२७॥

छायाया:--छाया से; कर्दम: --कर्दम मुनि; जज्ञे-- प्रकट हुआ; देवहूत्या:--देवहूति का; पति: --पति; प्रभुः--स्वामी;मनसः--मन से; देहतः--शरीर से; च-- भी; इृदम्‌--यह; जज्ञे--उत्पन्न किया; विश्व--ब्रह्मण्ड; कृत:--स्त्रष्टा का; जगत्‌--विराट जगत।

महान्‌ देवहूति के पति कर्दम मुनि ब्रह्म की छाया से प्रकट हुए।

इस तरह सभी कुछ ब्रह्माके शरीर से या मन से प्रकट हुआ।

बाचं दुहितरं तन्वीं स्वयम्भूहरतीं मनः ।

अकामां चकमे क्षत्त: सकाम इति न: श्रुतम्‌ ॥

२८॥

वाचम्‌--वाक्‌; दुहितरम्‌--पुत्री को; तन्वीम्‌--उसके शरीर से उत्पन्न; स्वयम्भू:--ब्रह्मा; हरतीम्‌--आकृष्ट करते हुए; मनः--मन; अकामाम्‌--कामुक हुए बिना; चकमे--इच्छा की; क्षत्त:--हे विदुर; स-काम:ः--कामुक हुआ; इति--इस प्रकार; न: --हमने; श्रुतम्‌--सुना है।

हे विदुर, हमने सुना है कि ब्रह्मा के वाक्‌ नाम की पुत्री थी जो उनके शरीर से उत्पन्न हुई थीजिसने उनके मन को यौन की ओर आकृष्ट किया यद्यपि वह उनके प्रति कामासक्त नहीं थी।

तमधर्मे कृतमतिं विलोक्य पितरं सुता: ।

मरीचिमुख्या मुनयो विश्रम्भात्प्रत्यजो धयन्‌ ॥

२९॥

तम्‌--उस; अधर्मे--अनैतिकता में; कृत-मतिम्‌--ऐसे मन वाला; विलोक्य--देखकर; पितरम्‌--पिता को; सुताः --पुत्रों ने;मरीचि-मुख्या: --मरीचि इत्यादि; मुन॒यः--मुनिगण; विश्रम्भातू-- आदर सहित; प्रत्यवोधयन्‌--निवेदन किया

अपने पिता को अनैतिकता के कार्य में इस प्रकार मुग्ध पाकर मरीचि इत्यादि ब्रह्मा के सारेपुत्रों ने अतीव आदरपूर्वक यह कहा।

नैतत्पूर्वे: कृतं त्वद्यो न करिष्यन्ति चापरे ।

यस्त्वं दुहितरं गच्छेरनिगृह्याड्गजं प्रभु: ॥

३०॥

न--कभी नहीं; एतत्‌--ऐसी वस्तु; पूर्व: --किसी पूर्व कल्प में अन्य किसी ब्रह्मा द्वारा या तुम्हारे द्वारा; कृतम्‌--सम्पन्न; त्वत्‌--तुम्हारे द्वारा; ये--वह जो; न--न तो; करिष्यन्ति--करेंगे; च-- भी; अपरे-- अन्य कोई; यः--जो; त्वम्‌--तुम; दुहितरम्‌--पुत्रीके प्रति; गच्छे:--जायेगा; अनिगृह्य-- अनियंत्रित होकर; अड़जम्‌--कामेच्छा; प्रभु:--हे पिता।

है पिता, आप जिस कार्य में अपने को उलझाने का प्रयास कर रहे हैं उसे न तो किसी अन्यब्रह्मा द्वारा न किसी अन्य के द्वारा, न ही पूर्व कल्पों में आपके द्वारा, कभी करने का प्रयासकिया गया, न ही भविष्य में कभी कोई ऐसा दुस्साहस ही करेगा।

आप ब्रह्माण्ड के सर्वोच्चप्राणी हैं, अतः आप अपनी पुत्री के साथ संभोग क्‍यों करना चाहते हैं और अपनी इच्छा को वशमें क्‍यों नहीं कर सकते ?

तेजीयसामपि होतन्न सुएलोक्यं जगदगुरो ।

यद्वत्तमनुतिष्ठन्वे लोक: क्षेमाय कल्पते ॥

३१॥

तेजीयसाम्‌--अत्यन्त शक्तिशालियों में; अपि-- भी; हि--निश्चय ही; एतत्‌--ऐसा कार्य; न--उपयुक्त नहीं; सु-श्लोक्यम्‌--अच्छा आचरण; जगतू-गुरो--हे ब्रह्माण्ड के गुरु; यत्‌--जिसका; वृत्तमू--चरित्र; अनुतिष्ठन्‌--पालन करते हुए; बै--निश्चयही; लोक:--जगत; क्षेमाय--सम्पन्नता के लिए; कल्पते--योग्य बन जाता है

यद्यपि आप सर्वाधिक शक्तिमान जीव हैं, किन्तु यह कार्य आपको शोभा नहीं देता क्योंकिसामान्य लोग आध्यात्मिक उन्नति के लिए आपके चरित्र का अनुकरण करते हैं।

तस्मै नमो भगवते य इदं स्वेन रोचिषा ।

आत्मस्थ॑ व्यज्ञयामास स धर्म पातुमहति ॥

३२॥

तस्मै--उसे; नम:--नमस्कार; भगवते-- भगवान्‌ को; यः --जो; इृदम्‌--इस; स्वेन--अपने; रोचिषा--तेज से; आत्म-स्थम्‌--अपने में ही स्थित; व्यज्ञयाम्‌ आस--प्रकट किया है; सः--वह; धर्मम्‌--धर्म की; पातुम्‌ू--रक्षा करने के लिए; अरहति--ऐसाकरे

हम उन भगवान्‌ को सादर नमस्कार करते हैं जिन्होंने आत्मस्थ होकर अपने ही तेज से इसब्रह्माण्ड को प्रकट किया है।

वे समस्त कल्याण हेतु धर्म की रक्षा करें!" स इत्थं गृणतः पुत्रान्पुरो दृष्ठा प्रजापतीन्‌प्रजापतिपतिस्तन्वं तत्याज ब्रीडितस्तदा ।

तां दिशो जगुहुर्घोरां नीहारं यद्विदुस्तम: ॥

३३॥

सः--वह ( ब्रह्मा ); इत्थम्‌--इस प्रकार; गृणतः--बोलते हुए; पुत्रान्‌ू--पुत्र; पुर: --पहले; हृष्ला-- देखकर; प्रजा-पतीन्‌--जीवोंके पूर्वजों को; प्रजापति-पति:ः--उन सबों के पिता ( ब्रह्मा ); तन्वम्‌--शरीर; तत्याज--त्याग दिया; ब्रीडित:--लज्जित; तदा--उस समय; ताम्‌ू--उस शरीर को; दिशः --सारी दिशाएँ; जगृहु:--स्वीकार किया; घोराम्‌--निन्दनीय; नीहारम्‌--नीहार, कुहरा;यतू--जो; विदुः--वे जानते हैं; तमः--अंधकार के रूप में ।

अपने समस्त प्रजापति पुत्रों को इस प्रकार बोलते देख कर समस्त प्रजापतियों के पिता ब्रह्माअत्यधिक लज्जित हुए और तुरन्त ही उन्होंने अपने द्वारा धारण किये हुए शरीर को त्याग दिया।

बाद में वही शरीर अंधकार में भयावह कुहरे के रूप में सभी दिशाओं में प्रकट हुआ।

कदाचिद्धयायतः सरष्टवेंदा आसं श्चतुर्मुखात्‌ ।

कथं स्त्रक्ष्याम्यह॑ लोकान्समवेतान्यथा पुरा ॥

३४॥

कदाचित्‌--एक बार; ध्यायतः--ध्यान करते समय; स्त्रष्ट:--ब्रह्म का; वेदाः--वैदिक वाड्मय; आसनू--प्रकट हुए; चतुः-मुखात्‌--चारों मुखों से; कथम्‌ स्त्रक्ष्यामि--मैं किस तरह सृजन करूँगा; अहम्‌--मैं; लोकान्‌--इन सारे लोकों को;समवेतान्‌--एकत्रित; यथा--जिस तरह वे थे; पुरा-- भूतकाल में |

एक बार जब ब्रह्माजी यह सोच रहे थे कि विगत कल्प की तरह लोकों की सृष्टि केसे कीजाय तो चारों वेद, जिनमें सभी प्रकार का ज्ञान निहित है, उनके चारों मुखों से प्रकट हो गये।

चातुहत्रं कर्मतन्त्रमुपवेदनयै: सह ।

धर्मस्य पादाश्चत्वारस्तथेवा श्रमवृत्तय: ॥

३५॥

चातु:--चार; होत्रमू--यज्ञ की सामग्री; कर्म--कर्म; तन्त्रमू--ऐसे कार्यकलापों का विस्तार; उपवेद--वेदों के पूरक; नयैः --तथा तर्कशास्त्रीय निर्णय; सह--साथ; धर्मस्थ--धर्म के; पादा:ः--सिद्धान्त; चत्वार:--चार; तथा एव--इसी प्रकार से;आश्रम--सामाजिक व्यवस्था; वृत्तय:--वृत्तियाँ, पेशे |

अग्नि यज्ञ को समाहित करने वाली चार प्रकार की साज-सामग्री प्रकट हुई।

ये प्रकार हैंयज्ञकर्ता, होता, अग्नि तथा उपवेदों के रूप में सम्पन्न कर्म।

धर्म के चार सिद्धान्त ( सत्य, तप,दया, शौच ) एवं चारों आश्रमों के कर्तव्य भी प्रकट हुए।

विदुर उवाचसबै विश्वसृजामीशो वेदादीन्मुखतो सृजत्‌ ।

यद्यद्येनासृजद्देवस्तन्मे ब्रूहि तपोधन ॥

३६॥

विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; सः--वह ( ब्रह्मा ); वै--निश्चय ही; विश्व--ब्रह्माण्ड; सृजामू--सृजनकर्ताओं का; ईशः --नियन्ता; वेद-आदीन्‌--वेद इत्यादि; मुखतः--मुख से; असृजत्‌--स्थापित किया; यत्‌--जो; यत्‌--जो; येन--जिससे;असृजत्‌--उत्पन्न किया; देव:--देवता; तत्‌--वह; मे--मुझसे; ब्रूहि--बतलाइये; तप:ः-धन--हे मुनि, तपस्या जिसका एकमात्रधन है।

विदुर ने कहा, हे तपोधन महामुनि, कृपया मुझसे यह बतलाएँ कि ब्रह्म ने किस तरह औरकिसकी सहायता से उस वैदिक ज्ञान की स्थापना की जो उनके मुख से निकला था।

मैत्रेय उवाचऋग्यजु:सामाथर्वाख्यान्वेदान्पूर्वादिभि्मुखै: ।

शास्त्रमिज्यां स्तुतिस्तोमं प्रायश्ित्तं व्यधात्क्रमात्‌ ॥

३७॥

मैत्रेयः उवाच--मैत्रेय ने कहा; ऋक्‌-यजु:-साम-अथर्व--चारों वेद; आख्यान्‌ू--नामक; वेदान्‌--वैदिक ग्रन्थ; पूर्व-आदिभिः:--सामने से प्रारम्भ करके ; मुखैः--मुखों से; शास्त्रमू--पूर्व अनुच्चरित वैदिक मंत्र; इज्याम्‌--पौरोहित्य अनुष्ठान;स्तुति-स्तोमम्‌--बाँचने वालों की विषयवस्तु; प्रायश्चित्तम्‌-दिव्य कार्य; व्यधात्‌--स्थापित किया; क्रमात्‌ू--क्रमश: |

मैत्रेय ने कहा : ब्रह्म के सामने वाले मुख से प्रारम्भ होकर क्रमशः चारों वेद--ऋक्‌, यजु:,साम और अथर्व-आविर्भूत हुए।

तत्पश्चात्‌ इसके पूर्व अनुच्चरित वैदिक स्त्तोत्र, पौरोहित्यअनुष्ठान, पाठ की विषयवस्तु तथा दिव्य कार्यकलाप एक-एक करके स्थापित किये गये।

आयुर्वेदं धनुर्वेदं गान्धर्व वेदमात्मन: ।

स्थापत्यं चासूजद्देदं क्रमात्पूर्वांदिभि्मुखै: ॥

३८ ॥

आयु:-वेदम्‌--औषधि विज्ञान; धनु:-वेदम्‌--सैन्य विज्ञान; गान्धर्वम्‌--संगीतकला; वेदम्‌ू--ये सभी वैदिक ज्ञान हैं; आत्मन: --अपने से; स्थापत्यम्‌--वास्तु सम्बन्धी विज्ञान; च--भी; असृजत्‌--सृष्टि की; वेदम्‌--ज्ञान; क्रमात्‌--क्रमशः ; पूर्व-आदिभि: --सामने वाले मुख से प्रारम्भ करके; मुखै:--मुखों द्वारा

उन्होंने ओषधि विज्ञान, सैन्य विज्ञान, संगीत कला तथा स्थापत्य विज्ञान की भी सृष्टि वेदों से की।

ये सभी सामने वाले मुख से प्रारम्भ होकर क्रमश: प्रकट हुए।

इतिहासपुराणानि पशञ्ञमं वेदमी श्वरः ।

सर्वेभ्य एव वक्त्ेभ्य: ससूजे सर्वदर्शन: ॥

३९॥

इतिहास--इतिहास; पुराणानि--पुराण ( पूरक वेद ); पञ्षमम्‌--पाँचवाँ; वेदम्‌--वैदिक वाड्मय; ईश्वर: -- भगवान्‌; सर्वेभ्य: --सब मिला कर; एव--निश्चय ही; वक्टेभ्य: --अपने मुखों से; ससृजे--उत्पन्न किया; सर्व--चारों ओर; दर्शन:--जो हर समयदेख सकता है।

तब उन्होंने अपने सारे मुखों से पाँचवें वेद-पुराणों तथा इतिहासों-की सृष्टि की, क्योंकिवे सम्पूर्ण भूत, वर्तमान तथा भविष्य को देख सकते थे।

षोडश्युक्थौ पूर्ववक्त्रात्पुरीष्यग्निष्ठटतावथ ।

आप्तोर्यामातिरात्रौ च वाजपेयं सगोसवम्‌ ॥

४०॥

घोडशी-उक्थौ --यज्ञ के प्रकार; पूर्व-वक्त्रात्‌--पूर्वी मुँह से; पुरीषि-अग्निष्ठतौ--यज्ञ के प्रकार; अथ--तब; आप्तोर्याम-अतिरात्रौ--यज्ञ के प्रकार; च--तथा; वाजपेयम्‌--एक प्रकार का यज्ञ; स-गोसवम्‌--एक प्रकार का यज्ञ |

ब्रह्मा के पूर्वी मुख से विभिन्न प्रकार के समस्त अग्नि यज्ञ (षोडशी, उक्थ, पुरीषि,अग्निष्टोम, आप्तोर्याम, अतिरात्र, वाजपेय तथा गोसव ) प्रकट हुए।

विद्या दानं तपः सत्य धर्मस्येति पदानिच ।

आश्रमांश्व यथासड्ख्यमसृजत्सह वृत्तिभि: ॥

४१॥

विद्या--विद्या; दानमू-- दान; तपः--तपस्या; सत्यमू--सत्य; धर्मस्य-- धर्म का; इति--इस प्रकार; पदानि--चार पाँव; च--भी; आश्रमान्‌ू--आश्रमों; च-- भी; यथा--वे जिस प्रकार के हैं; सड्ख्यम्‌--संख्या में; असृजत्‌ू--रचना की; सह--साथ-साथ; वृत्तिभि:--पेशों या वृत्तियों के द्वारा।

शिक्षा, दान, तपस्या तथा सत्य को धर्म के चार पाँव कहा जाता है और इन्हें सीखने के लिएचार आश्रम हैं जिनमें वृत्तियों के अनुसार जातियों ( वर्णों ) का अलग-अलग विभाजन रहता है।

ब्रह्मा ने इन सबों की क्रमबद्ध रूप में रचना की।

सावित्र प्राजापत्यं च ब्राह्मं चाथ बृहत्तथा ।

वार्ता सजञ्नयशालीनशिलोउज्छ इति वै गृहे ॥

४२॥

सावित्रम्‌-द्विजों का यज्ञोपवीत संस्कार; प्राजापत्यमू--एक वर्ष तक ब्रत रखने के लिए; च--तथा; ब्राह्ममू--वेदों कीस्वीकृति; च--तथा; अथ-- भी; बृहत्‌--यौनजीवन से पूर्ण विरक्ति; तथा--तब; वार्ता--वैदिक आदेश के अनुसार वृत्ति;सञ्नय--वृत्तिपरक कर्तव्य; शालीन--किसी का सहयोग माँगे बिना जीविका; शिल-उड्छः -त्यक्त अन्नों को बीनना; इति--इस प्रकार; वै--यद्यपि; गृहे--गृहस्थ जीवन में ।

तत्पश्चात्‌ द्विजों के लिए यज्ञोपवीत संस्कार ( सावित्र ) का सूत्रपात हुआ और उसी के साथवेदों की स्वीकृति के कम से कम एक वर्ष बाद तक पालन किये जाने वाले नियमों( प्राजापत्यम्‌ ), यौनजीवन से पूर्ण विरक्ति के नियम ( बृहत्‌ ), वैदिक आदेशों के अनुसारवृत्तियाँ ( वार्ता ), गृहस्थ जीवन के विविध पेशेवार कर्तव्य ( सञ्ञय ) तथा परित्यक्त अन्नों कोबीन कर ( शिलोज्छ ) एवं किसी का सहयोग लिए बिना ( अयाचित ) जीविका चलाने कीविधि का सूत्रपात हुआ।

वैखानसा वालखिल्यौदुम्बरा: फेनपा वने ।

न्यासे कुटीचकः पूर्व बह्लोदो हंसनिष्क्रियौं ॥

४३॥

वैखानसाः--ऐसे मनुष्य जो सक्रिय जीवन से अवकाश लेकर अध-उबले भोजन पर निर्वाह करते हैं; वालखिल्य--वह जोअधिक अन्न पाने पर पुराने संग्रह को त्याग देता है; औदुम्बरा:--बिस्तर से उठकर जिस दिशा की ओर आगे जाने पर जो मिलेउसी पर निर्वाह करना; फेनपा:--वृक्ष से स्वतः गिरे हुए फलों को खाकर रहने वाला; वने--जंगल में; न्यासे--संन्यास आश्रममें; कुटीचकः--परिवार से आसक्तिरहित जीवन; पूर्वम्‌--प्रारम्भ में; बल्लेद:--सारे भौतिक कार्यो को त्याग कर दिव्य सेवा मेंलगे रहना; हंस--दिव्य ज्ञान में पूरी तरह लगा रहने वाला; निष्क्रियौ--सभी प्रकार के कार्यों को बन्द करते हुए।

वानप्रस्थ जीवन के चार विभाग हैं--वैखानस, वाल-खिल्य, औदुम्बर तथा फेनप।

संन्यासआश्रम के चार विभाग हैं-कुटीचक, बह्नोद, हंस तथा निष्क्रिय ।

ये सभी ब्रह्मा से प्रकट हुए थे।

आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता दण्डनीतिस्तथेव च ।

एवं व्याहतयश्चासन्प्रणवो हास्य दह्ुतः ॥

४४॥

आन्वीक्षिकी--तर्क ; त्रयी--तीन लक्ष्य जिनके नाम धर्म, अर्थ तथा मोक्ष हैं; वार्ता--इन्द्रियतृप्ति; दण्ड--विधि तथा व्यवस्था;नीतिः:--आचरण सम्बन्धी संहिता; तथा-- भी; एव च--क्रमश: ; एवम्‌--इस प्रकार; व्याहतय:-- भू: भुवः तथा स्व: नामकविख्यात स्तोत्र; च-- भी; आसन्‌ू--उत्पन्न हुए; प्रणव: --»कार; हि--निश्चय ही; अस्य--उसका ( ब्रह्मा का ); दहतः--हृदयसे

तर्कशास्त्र विज्ञानजीवन के वैदिक लक्ष्य, कानून तथा व्यवस्था, आचार संहिता तथा भू:भुवः स्व: नामक विख्यात मंत्र-ये सब ब्रह्मा के मुख से प्रकट हुए और उनके हृदय से प्रणव कार प्रकट हुआ।

'तस्योष्णिगासील्लोमभ्यो गायत्री च त्वचो विभो: ।

त्रिष्ठम्मांसात्स्नुतोनुष्ठुब्जगत्यस्थ्न: प्रजापते: ॥

४५॥

तस्य--उसका; उष्णिकू--एक वैदिक छन्द; आसीतू--उत्पन्न हुआ; लोमभ्य:--शरीर पर के रोमों से; गायत्री-- प्रमुख वैदिकस्तोत्र; च--भी; त्वच:--चमड़ी से; विभो: --प्रभु के ; त्रिष्टपू--एक विशेष प्रकार का छन्द; मांसातू--मांस से; स्नुत:--शिराओंसे; अनुष्ठप्‌ू-- अन्य छन्‍्द; जगती--एक अन्य छन्द; अस्थ्:--हड्डियों से; प्रजापतेः --जीवों के पिता के |

तत्पश्चात्‌ सर्वशक्तिमान प्रजापति के शरीर के रोमों से उष्णिक अर्थात्‌ साहित्यिक अभिव्यक्तिकी कला उत्पन्न हुई।

प्रमुख वैदिक मंत्र गायत्री जीवों के स्वामी की चमड़ी से उत्पन्न हुआ, त्रिष्ट॒ुप्‌उनके माँस से, अनुष्ठुप्‌ उनकी शिराओं से तथा जगती छन्द उनकी हड्डियों से उत्पन्न हुआ।

मज्जाया: पड्डि रुत्पन्ना बृहती प्राणतो भवत्‌ ॥

४६॥

मज्जाया: --अस्थिमज्ञा से; पड़्ि :--एक विशेष प्रकार का श्लोक; उत्पन्ना--उत्पन्न हुआ; बृहती --अन्य प्रकार का श्लोक;प्राणतः--प्राण से; अभवत्‌--उत्पन्न हुआ

पंक्ति श्लोक लिखने की कला का उदय अस्थिमज्जा से हुआ और एक अन्य एलोक बृहतीलिखने की कला जीवों के स्वामी के प्राण से उत्पन्न हुई।

स्पर्शस्तस्याभवज्जीव: स्वरो देह उदाहतऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुरन्त:स्था बलमात्मन: ।

स्वरा: सप्त विहारेण भवन्ति सम प्रजापते: ॥

४७॥

स्पर्शः:--क से म तक के अक्षरों का समूह; तस्य--उसका; अभवत्‌--हुआ; जीव:--आत्मा; स्वर: --स्वर; देह: --उनका शरीर;उदाहतः--व्यक्त किये जाते हैं; ऊष्माणम्‌--श, ष, स तथा ह अक्षर; इन्द्रियाणि--इन्द्रियाँ; आहुः--कहलाते हैं; अन्तः-स्था: --य, र, ल तथा व ये अन्तस्थ अक्षर हैं; बलमू--शक्ति; आत्मन:--उसका; स्वरा:--संगीत; सप्त--सात; विहारेण--ऐन्द्रियकार्यकलाप के द्वारा; भवन्ति स्म--प्रकट हुए; प्रजापते:--जीवों के स्वामी का।

ब्रह्मा की आत्मा स्पर्श अक्षरों के रूप में, उनका शरीर स्वरों के रूप में, उनकी इन्द्रियाँ ऊष्मअक्षरों के रूप में, उनका बल अन्तःस्थ अक्षरों के रूप में और उनके ऐन्द्रिय कार्यकलाप संगीतके सप्त स्वरों के रूप में प्रकट हुए।

शब्दब्रह्मात्मनस्तस्य व्यक्ताव्यक्तात्मन: पर: ।

ब्रह्मावभाति विततो नानाशक्त्युपबूंहित: ॥

४८ ॥

शब्द-ब्रह्म --दिव्य ध्वनि; आत्मनः --परमे श्वर श्रीकृष्ण; तस्य--उनका; व्यक्त--प्रकट; अव्यक्त-आत्मन:-- अव्यक्त का; पर: --दिव्य; ब्रह्मा--परम; अवभाति--पूर्णतया प्रकट; वितत:--वितरित करते हुए; नाना--विविध; शक्ति--शक्तियाँ; उपबूंहित:--से युक्त

ब्रह्मा दिव्य ध्वनि के रूप में भगवान्‌ के साकार स्वरूप हैं, अतएव वे व्यक्त तथा अव्यक्तश़ की धारणा से परे हैं।

ब्रह्म परम सत्य के पूर्ण रूप हैं और नानाविध शक्तियों से समन्वित हैं।

ततोपरामुपादाय स सर्गाय मनो दधे ॥

४९॥

ततः--तत्पश्चात्‌: अपराम्‌-- अन्य; उपादाय-- स्वीकार करके; सः--वह; सर्गाय--सृष्टि विषयक; मनः--मन; दधे--ध ध्यानदिया।

तत्पश्चात्‌ ब्रह्म ने दूसरा शरीर धारण किया जिसमें यौन जीवन निषिद्ध नहीं था और इस तरहवे आगे सृष्टि के कार्य में लग गये।

ऋषीणां भूरिवीर्याणामपि सर्गमविस्तृतम्‌ ।

ज्ञात्वा तद्धृदये भूयश्चविन्तयामास कौरव ॥

५०॥

ऋषीणाम्‌--ऋषियों का; भूरि-वीर्याणाम्‌--अत्यधिक पराक्रम से; अपि--के बावजूद; सर्गम्‌--सृष्टि; अविस्तृतम्‌-विस्तृतनहीं; ज्ञात्वा--जानकर; तत्‌ू--वह; हृदये --हृदय में; भूय:--पुन; चिन्तयाम्‌ आस--विचार करने लगा; कौरब--हे कुरुपुत्र |

हे कुरुपुत्र, जब ब्रह्मा ने देखा कि अत्यन्त वीर्यवान ऋषियों के होते हुए भी जनसंख्या मेंपर्याप्त वृद्धि नहीं हुई तो वे गम्भीरतापूर्वक विचार करने लगे कि जनसंख्या किस तरह बढ़ायीजाय।

अहो अद्भुतमेतन्मे व्यापृतस्यापि नित्यदा ।

न होधन्ते प्रजा नूनं दैवमत्र विघधातकम्‌ ॥

५१॥

अहो--हाय; अद्भुतम्‌-- अद्भुत है; एतत्‌ू--यह; मे--मेरे लिए; व्यापृतस्य--व्यस्त होते हुए; अपि--यद्यपि; नित्यदा--सदैव;न--नहीं; हि--निश्चय ही; एधन्ते--उत्पन्न करते हैं; प्रजा:--जीव; नूनम्‌--किन्तु; दैवम्‌-- भाग्य; अत्र--यहाँ; विधातकम्‌--विरुद्धविपरीत

ब्रह्म ने अपने आप सोचा : हाय! यह विचित्र बात है कि मेरे सर्वत्र फैले हुए रहने पर भीब्रह्माण्ड भर में जन-संख्या अब भी अपर्याप्त है।

इस दुर्भाग्य का कारण एकमात्र भाग्य केअतिरिक्त और कुछ भी नहीं है।

एवं युक्तकृतस्तस्य दैवं चावेक्षतस्तदा ।

'कस्य रूपमभूदद्वेधा यत्कायमभिचक्षते ॥

५२॥

एवम्‌--इस प्रकार; युक्त--सोच विचार करते; कृत:--ऐसा करते हुए; तस्थ--उसका; दैवम्‌--दैवी शक्ति; च-- भी;अवेक्षतः--देखते हुए; तदा--उस समय; कस्य--ब्रह्माण्ड; रूपम्‌--स्वरूप; अभूत्‌--प्रकट हो गया; द्वेधा--दोहरा; यत्‌--जोहै; कायम्‌--उसका शरीर; अभिचक्षते--कहा जाता है।

जब वे इस तरह विचारमग्न थे और अलौकिक शक्ति को देख रहे थे तो उनके शरीर से दोअन्य रूप उत्पन्न हुए।

वे अब भी ब्रह्मा के शरीर के रूप में विख्यात हैं।

ताभ्यां रूपविभागाभ्यां मिथुनं समपद्यत ॥

५३॥

ताभ्याम्‌--उनके; रूप--रूप; विभागाभ्यामू-- इस तरह विभक्त होकर; मिथुनम्‌--यौन सम्बन्ध; समपद्यत--ठीक से सम्पन्नकिया।

ये दोनों पृथक्‌ हुए शरीर यौन सम्बन्ध में एक दूसरे से संयुक्त हो गये।

यस्तु तत्र पुमान्सोभून्मनु: स्वायम्भुवः स्वराट्‌ ।

स्त्री यासीच्छतरूपाख्या महिष्यस्य महात्मन: ॥

५४॥

यः--जो; तु-- लेकिन; तत्र--वहाँ; पुमान्‌ू--नर; सः-- वह; अभूत्‌--बना; मनुः--मनुष्यजाति का पिता; स्वायम्भुव:--स्वायंभुव नामक; स्व-राट्‌--पूर्णतया स्वतंत्र; स्त्री--नारी; या--जो; आसीत्‌-- थी; शतरूपा--शतरूपा; आख्या--नामक;महिषी--रानी; अस्य-- उसकी ; महात्मन:--महात्मा |

इनमें से जिसका नर रूप था वह स्वायंभुव मनु कहलाया और नारी शतरूपा कहलायी जोमहात्मा मनु की रानी के रुप में जानी गई।

तदा मिथुनधर्मेण प्रजा होधाम्बभूविरि ॥

५५॥

तदा--उस समय; मिथुन--यौन जीवन; धर्मेण--विधि-विधानों के अनुसार; प्रजा:--सन्‍्तानें; हि--निश्चय ही; एधाम्‌--बढ़ीहुईं; बभूविरि--घटित हुई |

तत्पश्चात्‌ उन्होंने सम्भोग द्वारा क्रमशः एक एक करके जनसंख्या की पीढ़ियों में वृद्धि की।

स चापि शतरूपायां पशञ्ञापत्यान्यजीजनत्‌प्रियव्रतोत्तानपादौ तिस्त्र: कन्याश्व भारत ।

आकूतिर्देवहूतिश्व प्रसूतिरिति सत्तम ॥

५६॥

सः--वह ( मनु ); च-- भी; अपि--कालान्तर में; शतरूपायाम्‌--शतरूपा में; पञ्ञ--पाँच; अपत्यानि--सन्तानें; अजीजनतू --उत्पन्न किया; प्रियव्रत--प्रियब्रत; उत्तानपादौ--उत्तानपाद; तिस्त्रः--तीन; कन्या:--कन्याएँ; च-- भी; भारत--हे भरत के पुत्र;आकृति:--आकूति; देवहूति:--देवहूति; च--तथा; प्रसूति: --प्रसूति; इति--इस प्रकार; सत्तम-हे सर्वश्रेष्ठ |

हे भरतपुत्र, समय आने पर उसने ( मनु ने ) शतरूपा से पाँच सन्तानें उत्पन्न कौं-दो पुत्रप्रियत्रत तथा उत्तानपाद एवं तीन कन्याएँ आकृति, देवहूति तथा प्रसूति।

आकूतिं रुचये प्रादात्कर्दमाय तु मध्यमाम्‌ ।

दक्षायादात्प्रसूतिं च यत आपूरितं जगत्‌ ॥

५७॥

आकृतिम्‌--आकूति नामक कन्या; रुचये--रूचि मुनि को; प्रादात्‌-प्रदान किया; कर्दमाय--कर्दम मुनि को; तु--लेकिन;मध्यमाम्‌--बीच की ( देवहूति ); दक्षाय--दक्ष को; अदात्‌--प्रदान किया; प्रसूतिमू--सबसे छोटी पुत्री को; च-- भी; यतः--जिससे; आपूरितम्‌--पूर्ण है; जगतू--सारा संसारपिता

मनु ने अपनी पहली पुत्री आकृति रुचि मुनि को दी, मझली पुत्री देवहूति कर्दम मुनिको और सबसे छोटी पुत्री प्रसूति दक्ष को दी।

उनसे सारा जगत जनसंख्या से पूरित हो गया।

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