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अध्याय तेरह: भगवान वराह का प्राकट्य
3.13श्रीशुक उवाचनिशम्य वाचं वबदतो मुने: पुण्यतमां नूप ।
भूय: पप्रच्छ कौरव्यो वासुदेवकथाहतः ॥
१॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; निशम्य--सुन कर; वाचम्--बातें; वदत:--बोलते हुए; मुनेः --मैत्रेय मुनिका; पुण्य-तमाम्--अत्यन्त पुण्यमय; नृप--हे राजा; भूय:--तब फिर; पप्रच्छ--पूछा; कौरव्य: --कुरुओं में सर्वश्रेष्ठ ( विदुर );वासुदेव-कथा-- भगवान् वासुदेव विषयक कथाएँ; आहत: --जो इस तरह सादर पूजता है।
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजन्, मैत्रेय मुनि से इन समस्त पुण्यतम कथाओं कोसुनने के बाद विदुर ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की कथाओं के विषय में और अधिक पूछताछकी, क्योंकि इनका आदरपूर्वक सुनना उन्हें पसन्द था।
विदुर उवाचस बै स्वायम्भुव: सम्राट्प्रिय: पुत्र: स्वयम्भुवः ।
प्रतिलभ्य प्रियां पत्नीं कि चक्कार ततो मुने ॥
२॥
विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; सः--वह; बै--सरलता से; स्वायम्भुव:--स्वायम्भुव मनु; सम्राट्--समस्त राजाओं के राजा;प्रिय:--प्रिय ; पुत्र:--पुत्र; स्वयम्भुव: --ब्रह्मा का; प्रतिलभ्य--प्राप्त करके; प्रियाम्-- अत्यन्त प्रिय; पत्लीमू--पत्नी को;किम्--क्या; चकार--किया; ततः--तत्पश्चात्; मुने--हे मुनि
विदुर ने कहा : हे मुनि, ब्रह्मा के प्रिय पुत्र स्वायम्भुव ने अपनी अतीव प्रिय पत्नी को पाने केबाद क्या किया ?
चरितं तस्य राजर्षेरादिराजस्य सत्तम ।
ब्रृहि मे भ्रद्धानाय विष्वक्सेनाश्रयो हासौं ॥
३॥
चरितम्--चरित्र; तस्थ--उसका; राजर्षे: --ऋषितुल्य राजा का; आदि-राजस्य--आदि राजा का; सत्तम--हे अति पवित्र;ब्रूहि--कृपया कहें; मे--मुझसे; श्रद्धानाय--प्राप्त करने के लिए जो इच्छुक है उसे ; विष्वक्सेन-- भगवान् का; आश्रय:--जिसने शरण ले रखी है; हि--निश्चय ही; असौ--वह राजा
हे पुण्यात्मा श्रेष्ठ राजाओं का आदि राजा ( मनु ) भगवान् हरि का महान् भक्त था, अतएवउसके शुद्ध चरित्र तथा कार्यकलाप सुनने योग्य हैं।
कृपया उनका वर्णन करें।
मैं सुनने के लिएअतीव उत्सुक हूँ।
श्रुतस्य पुंसां सुचिरश्रमस्यनन्वझ्जसा सूरिभिरीडितोडर्थ: ।
तत्तदगुणानुश्रवर्ण मुकुन्द-पादारविन्दं हृदयेषु येषामू ॥
४॥
श्रुतस्य--ऐसे व्यक्तियों का जो सुन रहे हों; पुंसामू--ऐसे पुरुषों का; सुचिर--दीर्घकाल तक; श्रमस्य--कठिन श्रम करते हुए;ननु--निश्चय ही; अज्ञसा--विस्तार से; सूरिभि:--शुद्ध भक्तों द्वारा; ईडित:--व्याख्या किया गया:; अर्थ:--कथन; तत्--वह;तत्--वह; गुण--दिव्य गुण; अनुश्रवणम्--सोचते हुए; मुकुन्द--मुक्तिदाता भगवान् का; पाद-अरविन्दमू--चरणकमल;हृदयेषु--हृदय के भीतर; येषाम्--जिनके ।
जो लोग अत्यन्त श्रमपूर्वक तथा दीर्घकाल तक गुरु से श्रवण करते हैं उन्हें शुद्धभक्तों केचरित्र तथा कार्यकलापों के विषय में शुद्धभक्तों के मुख से ही सुनना चाहिए।
शुद्ध भक्त अपनेहृदयों के भीतर सदैव उन भगवान् के चरणकमलों का चिन्तन करते हैं, जो अपने भक्तों कोमोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
श्रीशुक उवाचइति ब्रुवाणं विदुरं विनीतंसहस््रशीर्ष्ण श्वरणोपधानम् ।
प्रहष्टरोमा भगवत्कथायांप्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥
५॥
श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; ब्रुवाणम्--बोलते हुए; विदुरम्--विदुर को; विनीतम्--अतीव नग्न; सहस्त्र-शीर्ष्ण:-- भगवान् कृष्ण; चरण---चरणकमल; उपधानम्--तकिया; प्रहष्ट-रोमा--आनन्द से जिसके रोमखड़े हो गये हों; भगवत्-- भगवान् के सम्बन्ध में; कथायाम्--शब्दों में; प्रणीयमान: --ऐसे आत्मा द्वारा प्रभावित हो कर;मुनिः--मुनि ने; अभ्यचष्ट--बोलने का प्रयास किया |
श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : भगवान् कृष्ण विदुर की गोद में अपना चरणकमल रख करप्रसन्न थे, क्योंकि विदुर अत्यन्त विनीत तथा भद्र थे।
मैत्रेय मुनि विदुर के शब्दों से अति प्रसन्न थेऔर अपनी आत्मा से प्रभावित होकर उन्होंने बोलने का प्रयास किया।
मैत्रेय उवाचयदा स्वभार्यया सार्ध जात: स्वायम्भुवो मनु: ।
प्राज्ललिः प्रणतश्चेदं वेदगर्भभभाषत ॥
६॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; यदा--जब; स्व-भार्यया-- अपनी पत्नी के; सार्धम्--साथ में; जात:--प्रकट हुआ;स्वायम्भुव:--स्वायम्भुव मनु; मनु;--मानवजाति का पिता; प्राज्ललि:--हाथ जोड़े; प्रणतः--नमस्कार करके; च--भी;इदम्--यह; वेद-गर्भभ्ू--वैदिक विद्या के आगार को; अभाषत--सम्बोधित किया।
मैत्रेय मुनि ने विदुर से कहा : मानवजाति के पिता मनु अपनी पत्नी समेत अपने प्राकट्य केबाद वेदविद्या के आगार ब्रह्मा को नमस्कार करके तथा हाथ जोड़ कर इस प्रकार बोले।
त्वमेक: सर्वभूतानां जन्मकृद्दुत्तिदः पिता ।
तथापि नः प्रजानां ते शुश्रूषा केन वा भवेत् ॥
७॥
त्वमू--तुम; एक: --एक; सर्व--समस्त; भूतानामू--जीवों के; जन्म-कृत्--जनक; वृत्ति-दः--जीविका का साधन; पिता--पिता; तथा अपि--तो भी; न:ः--हम; प्रजानाम्--उत्पन्न हुए सबों का; ते--तुम्हारी; शुश्रूषा--सेवा; केन--कैसे; वा-- अथवा;भवेत्--सम्भव हो सकती है।
आप सारे जीवों के पिता तथा उनकी जीविका के स्त्रोत हैं, क्योंकि वे सभी आपसे उत्पन्नहुए हैं।
कृपा करके हमें आदेश दें कि हम आपकी सेवा किस तरह कर सकते हैं।
तद्ठिधेहि नमस्तुभ्यं कर्मस्वीड्यात्मशक्तिषु ।
यत्कृत्वेह यशो विष्वगमुत्र च भवेद्गति: ॥
८॥
तत्--वह; विधेहि-- आदेश दें; नम:--मेरा नमस्कार; तुभ्यम्--तुमको; कर्मसु--कार्यो में; ईड्य--हे पूज्य; आत्म-शक्तिषु--हमारी कार्य क्षमता के अन्तर्गत; यत्--जो; कृत्वा--करके ; इह--इस जगत में; यश: --यश; विष्वक् --सर्वत्र; अमुत्र-- अगलेजगत में; च--तथा; भवेत्--इसे होना चाहिए; गति: --प्रगति ।
है आराध्य, आप हमें हमारी कार्यक्षमता के अन्तर्गत कार्य करने के लिए अपना आदेश देंजिससे हम इस जीवन में यश के लिए तथा अगले जीवन में प्रगति के लिए उसका पालन करसकें।
ब्रह्मोवाचप्रीतस्तुभ्यमहं तात स्वस्ति स्ताद्वां क्षितीश्वर ।
यन्निरव्यलीकेन हदा शाधि मेत्यात्मनार्पितम् ॥
९॥
ब्रह्म उवाच--ब्रह्मा ने कहा; प्रीतः--प्रसन्न; तुभ्यम्--तुम को; अहम्--मैं; तात-हे पुत्र; स्वस्ति--कल्याण; स्तात्ू--हो;वाम्--तुम दोनों को; क्षिति-ईश्वर--हे संसार के स्वामी; यत्--क्योंकि; निर्व्यलीकेन--बिना भेदभाव के; हृदा--हृदय से;शाधि--आदेश दीजिये; मा--मुझको; इति--इस प्रकार; आत्मना--आत्मा से; अर्पितमू--शरणागत
ब्रह्माजी ने कहा, हे प्रिय पुत्र, हे जगत् के स्वामी, मैं तुम से अति प्रसन्न हूँ और तुम्हारे तथातुम्हारी पत्नी दोनों ही के कल्याण की कामना करता हूँ।
तुमने मेरे आदेशों के लिए अपने हृदयसे बिना सोचे विचारे अपने आपको मेरे शरणागत कर लिया है।
एतावत्यात्मजैर्वीर कार्या ह्पचितिर्गुरौ ।
शत्त्याप्रमत्तैर्गुछेत सादर गतमत्सरै: ॥
१०॥
एतावती--ठीक इसी तरह; आत्मजै:--सनन््तान द्वारा; वीर--हे वीर; कार्या--सम्पन्न किया जाना चाहिए; हि--निश्चय ही;अपचिति:ः--पूजा; गुरौ--गुरुजन को; शक्त्या--पूरी क्षमता से; अप्रमत्तै:--विवेकवान द्वारा; गृह्ेत--स्वीकार किया जानाचाहिए; स-आदरम्--अतीव हर्ष के साथ; गत-मत्सरैः--ईर्ष्या की सीमा से परे रहने वालों के द्वारा।
हे वीर, तुम्हारा उदाहरण पिता-पुत्र सम्बन्ध के सर्वथा उपयुक्त है।
बड़ों की इस तरह कीपूजा अपेक्षित है।
जो ईर्ष्या की सीमा के परे है और विवेकी है, वह अपने पिता के आदेश कोप्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता है और अपने पूरी सामर्थ्य से उसे सम्पन्न करता है।
स त्वमस्यथामपत्यानि सहशान्यात्मनो गुणै: ।
उत्पाद्य शास धर्मेण गां यज्ञै: पुरुष यज ॥
११॥
सः--इसलिए वह आज्ञाकारी पुत्र; त्वम्-तुम जैसे; अस्याम्--उसमें; अपत्यानि--सन्तानें; सहशानि--समानरूप से योग्य;आत्मन:--तुम्हारी; गुणैः -गुणों से; उत्पाद्य--उत्पन्न किये जाकर; शास--शासन करते हैं; धर्मेण-- भक्ति के नियमों के साथ;गाम्ू--जगत; यज्ञैः--वज्ञों से; पुरुषम्-- भगवान् की; यज--पूजा करो
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त आज्ञाकारी पुत्र हो इसलिए मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि तुम अपनी पत्नीके गर्भ से अपने ही समान योग्य सन्तानें उत्पन्न करो।
तुम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति केसिद्धान्तों का पालन करते हुए सारे जगत पर शासन करो और इस तरह यज्ञ सम्पन्न करकेभगवान् की पूजा करो।
परं शुश्रूषणं महां स्यात्प्रजारक्षया नृप ।
भगवांस्ते प्रजाभर्तुईषीकेशो नुतुष्पति ॥
१२॥
'परम्--सबसे बड़ी; शुश्रूषणम्-- भक्ति; महामम्--मेरे प्रति; स्थात्ू--होनी चाहिए; प्रजा-- भौतिक जगत में उत्पन्न जीव; रक्षया--बिगड़ने से बचाकर; नृप--हे राजा; भगवान्-- भगवान्; ते--तुम्हारे साथ; प्रजा-भर्तु:--जीवों के रक्षक के साथ; हृषीकेश: --इन्द्रियों के स्वामी; अनुतुष्यति--तुष्ट होता है।
हे राजन, यदि तुम भौतिक जगत में जीवों को उचित सुरक्षा प्रदान कर सको तो मेरे प्रति वहसर्वोत्तम सेवा होगी।
जब परमेश्वर तुम्हें बद्धजीवों के उत्तम रक्षक के रूप में देखेंगे तो इन्द्रियों केस्वामी निश्चय ही तुम पर अतीव प्रसन्न होंगे।
येषां न तुष्टो भगवान्यज्ञलिझ्े जनार्दन: ।
तेषां श्रमो हापार्थाय यदात्मा नाहतः स्वयम् ॥
१३॥
येषाम्--उनका जिनके साथ; न--कभी नहीं; तुष्ट:--तुष्ट; भगवान्-- भगवान्; यज्ञ-लिड्र:--यज्ञ का स्वरूप; जनार्दन:--भगवान् कृष्ण या विष्णुतत्त्व; तेषामू--उनका; श्रम:-- श्रम; हि--निश्चय ही; अपार्थाय--बिना लाभ के; यत्--क्योंकि;आत्मा--परमात्मा; न--नहीं; आहत: --सम्मानित; स्वयम्--स्वयं |
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जनार्दन ( कृष्ण ) ही समस्त यज्ञ फलों को स्वीकार करने वाले हैं।
यदि वे तुष्ट नहीं होते तो प्रगति के लिए किया गया मनुष्य का श्रम व्यर्थ है।
वे चरम आत्मा हैं,अतएव जो व्यक्ति उन्हें तुष्ट नहीं करता वह निश्चय ही अपने ही हितों की उपेक्षा करता है।
मनुरुवाचआदेशेहं भगवतो वर्तेयामीवसूदन ।
स्थान त्विहानुजानीहि प्रजानां मम च प्रभो ॥
१४॥
मनु: उवाच-- श्री मनु ने कहा; आदेशे-- आदेश के अन्तर्गत; अहम्--मैं; भगवतः--शक्तिशाली आपका; वर्तेय--रूकूँगा;अमीव-सूदन--हे समस्त पापों के संहारक; स्थानम्--स्थान; तु--लेकिन; इह--इस जगत में; अनुजानीहि--कृपया मुझेबतलाइये; प्रजानाम्ू--मुझसे उत्पन्न जीवधारियों का; मम--मेरा; च-- भी; प्रभो--हे प्रभु
श्री मनु ने कहा : हे सर्वशक्तिमान प्रभु, हे समस्त पापों के संहर्ता, मैं आपके आदेशों कापालन करूँगा।
कृपया मुझे मेरा तथा मुझसे उत्पन्न जीवों के बसने के लिए स्थान बतलाएँ।
यदोकः सर्वभूतानां मही मग्ना महाम्भसि ।
अस्या उद्धरणे यत्नो देव देव्या विधीयताम् ॥
१५॥
यत्--क्योंकि; ओक:--वासस्थान; सर्व--सभी के लिए; भूतानाम्--जीवों के लिए; मही--पृथ्वी; मग्ना--डूबी हुई; महा-अम्भसि--विशाल जल में; अस्या:--इसके; उद्धरणे--उठाने में; यत्न:-- प्रयास; देव--हे देवताओं के स्वामी; देव्या:--इसपृथ्वी का; विधीयताम्--कराएँ |
है देवताओं के स्वामी, विशाल जल में डूबी हुई पृथ्वी को ऊपर उठाने का प्रयास करें,क्योंकि यह सारे जीवों का वासस्थान है।
यह आपके प्रयास तथा भगवान् की कृपा से ही सम्भवहै।
मैत्रेय उवाचपरमेष्ठी त्वपां मध्ये तथा सन्नामवेक्ष्य गाम् ।
कथमेनां समुन्नेष्य इति दध्यौ धिया चिरम् ॥
१६॥
मैत्रेयः उवाच-- श्री मैत्रेय मुनि ने कहा; परमेष्ठी --ब्रह्मा; तु-- भी; अपाम्--जल के ; मध्ये-- भीतर; तथा--इस प्रकार;सन्नामू--स्थित; अवेक्ष्य--देखकर; गाम्--पृथ्वी को; कथम्--कैसे; एनामू--यह; समुन्नेष्ये -- मैं उठा लूँगा; इति--इस प्रकार;दध ्यौ-- ध्यान दिया; धिया--बुद्धि से; चिरमू--दीर्घ काल तक |
श्री मैत्रेय ने कहा : इस प्रकार पृथ्वी को जल में डूबी हुई देखकर ब्रह्मा दीर्घकाल तकसोचते रहे कि इसे किस प्रकार उठाया जा सकता है।
सृजतो मे ्षितिर्वार्भि: प्लाव्यमाना रसां गताअथात्र किमनुष्ठेयमस्माभि: सर्गयोजितै: ।
यस्याहं हृदयादासं स ईशो विदधातु मे ॥
१७॥
सृजतः--सृजन करते समय; मे--मेरा; क्षिति:--पृथ्वी; वार्भि:--जल के द्वारा; प्लाव्यमाना-- आप्लावित की गई; रसामू--जलकी गहराई; गता--नीचे गया हुआ; अथ--इसलिए; अत्र--इस मामले में; किम्--क््या; अनुष्ठेयम्--क्या प्रयास किया जानाचाहिए; अस्माभि: --हमारे द्वारा; सर्ग--सृष्टि में; योजितैः--लगे हुए; यस्य--जिसका; अहम्--मैं; हृदयात्--हृदय से;आसमू--उत्पन्न; सः--वह; ईशः--पर मेश्वर; विदधातु--निर्देश कर सकते हैं; मे--मुझको |
ब्रह्म ने सोचा : जब मैं सृजन कार्य में लगा हुआ था, तो पृथ्वी बाढ़ से आप्लावित हो गईऔर समुद्र के गर्त में चली गई।
हम लोग जो सृजन के इस कार्य में लगे हैं भला कर ही क्यासकते हैं ? सर्वोत्तम यही होगा कि सर्वशक्तिमान हमारा निर्देशन करें।
इत्यभिध्यायतो नासाविवरात्सहसानघ ।
वराहतोको निरगादडुष्ठपरिमाणकः ॥
१८॥
इति--इस प्रकार; अभिध्यायत:--सोचते हुए; नासा-विवरात्--नथुनों से; सहसा--एकाएक; अनघ--हे निष्पाप; वराह-तोकः--वराह का लघुरूप ( सूअर ); निरगात्ू--बाहर आया; अद्डुष्ट--अँगूठे का ऊपरी हिस्सा; परिमाणक:--माप वाला
हे निष्पाप विदुर, जब ब्रह्माजी विचारमग्न थे तो उनके नथुने से सहसा एक सूअर ( वराह )का लघुरूप बाहर निकल आया।
इस प्राणी की माप अँगूठे के ऊपरी हिस्से से अधिक नहीं थी।
तस्याभिपष्टयत: खस्थ: क्षणेन किल भारत ।
गजमात्र:ः प्रववृधे तदद्भधुतमभून्महत् ॥
१९॥
तस्य--उसका; अभिपश्यत: --इस प्रकार देखते हुए; ख-स्थ:--आकाश में स्थित; क्षणेन--सहसा; किल--निश्चय ही;भारत--हे भरतवंशी; गज-मात्र:--हाथी के समान; प्रववृधे-- भलीभाँति विस्तार किया; तत्ू--वह; अद्भुतम्-- असामान्य;अभूत्--बदल गया; महत्--विराट शरीर में
हे भरतवंशी, तब ब्रह्मा के देखते ही देखते वह वराह विशाल काय हाथी जैसा अद्भुत विराट स्वरूप धारण करके आकाश में स्थित हो गया।
मरीचिप्रमुखैर्विप्रै: कुमारैर्मनुना सह ।
इृष्ठा तत्सौकरं रूप॑ं तर्कयामास चित्रधा ॥
२०॥
मरीचि--मरीचि मुनि; प्रमुखैः--इत्यादि; विप्रैः--सारे ब्राह्मणों; कुमारैः--चारों कुमारों सहित; मनुना--तथा मनु; सह--केसाथ; दृष्टा--देख कर; तत्--वह; सौकरम्--सूकर जैसा; रूपम्--स्वरूप; तर्कयाम् आस--परस्पर तर्क-वितर्क किया;चित्रधा--विविध प्रकारों से |
आकाश में अद्भुत सूकर जैसा रूप देखने से आश्वर्यचकित ब्रह्माजी मरीचि जैसे महान्ब्राह्मणों तथा चारों कुमारों एवं मनु के साथ अनेक प्रकार से तर्क-वितर्क करने लगे।
किमेतत्सूकरव्याजं सत्त्वं दिव्यमवस्थितम् ।
अहो बताश्चर्यमिदं नासाया मे विनिःसृतम् ॥
२१॥
किम्--क्या; एतत्--यह; सूकर--सूकर के; व्याजम्ू--बहाने से; सत्त्वम्--जीव; दिव्यम्ू--असामान्य; अवस्थितम्--स्थित;अहो बत--ओह, यह है; आश्चर्यम्--अत्यन्त अद्भुत; इदम्--यह; नासाया:--नाक से; मे--मेरी; विनिःसृतम्--बाहर आया।
क्या सूकर के बहाने से यह कोई असामान्य व्यक्तित्व आया है ? यह अति आश्चर्यप्रद है किवह मेरी नाक से निकला है।
इृष्टो डडुष्ठशिरोमात्र क्षणाद्गण्डशिलासम: ।
अपि स्विद्धगवानेष यज्ञों मे खेदयन्मन: ॥
२२॥
हृष्ठ;:--अभी-अभी देखा हुआ; अब्जुष्ठ --अँगूठे का; शिर:--सिरा; मात्र:--केवल; क्षणात्--तुरन्त; गण्ड-शिला--विशालपत्थर; सम:--सहृश; अपि स्वित्ू-- क्या; भगवान्-- भगवान्; एष: --यह; यज्ञ:--विष्णु; मे--मेरा; खेदयन्--खिन्न; मन: --मन
प्रारम्भ में यह सूकर अँगूठे के सिरे से बड़ा न था, किन्तु क्षण भर में वह शिला के समानविशाल बन गया।
मेरा मन विदश्लुब्ध है।
क्या वह पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु हैं ?
इति मीमांसतस्तस्य ब्रह्मण: सह सूनुभिः ।
भगवान्यज्ञपुरुषो जगर्जागेन्द्रसन्निभ: ॥
२३॥
इति--इस प्रकार; मीमांसत: --विचार-विमर्श करते; तस्य--उस; ब्रह्मण: --ब्रह्मा के; सह--साथ-साथ; सूनुभि: --उनकेपुत्रगण; भगवान्--परमे श्वर; यज्ञ-- भगवान् विष्णु ने; पुरुष: --सर्व श्रेष्ठ पुरुष; जगर्ज--गर्जना की; अग-इन्द्र--विशाल पर्वत;सन्निभ:--सहृश
जब ब्रह्माजी अपने पुत्रों के साथ विचार-विमर्श कर रहे थे तो पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु नेविशाल पर्वत के समान गम्भीर गर्जना की।
ब्रह्माणं हर्षयामास हरिस्तांश्व द्विजोत्तमान् ।
स्वगर्जितेन ककुभः प्रतिस्वनयता विभु: ॥
२४॥
ब्रह्मणम्--ब्रह्मा को; हर्षबाम् आस--जीवन्त कर दिया; हरि:ः-- भगवान् ने; तानू--वे उन सबों को; च-- भी; द्विज-उत्तमानू--अति उच्च ब्राह्मणों को; स्व-गर्जितेन--अपनी असाधारण वाणी से; ककु भ:--सारी दिशाएँ; प्रतिस्वनयता--प्रतिध्वनित होउठीं; विभु:--सर्वशक्तिमान |
सर्वशक्तिमान भगवान् ने पुनः असाधारण वाणी से ऐसी गर्जना कर के ब्रह्मा तथा अन्यउच्चस्थ ब्राह्मणों को जीवन्त कर दिया, जिससे सारी दिशाओं में गूँज उठीं।
निशम्य ते घर्घरितं स्वखेद-क्षयिष्णु मायामयसूकरस्य ।
त्जनस्तपःसत्यनिवासिनस्ते रिभिः पवित्रैर्मुनयोगृणन्स्म ॥
२५॥
निशम्य--सुनकर; ते--वे; घर्घरितम्-- कोलाहलपूर्ण ध्वनि, घुरघुराहट; स्व-खेद--निजी शोक; क्षयिष्णु--विनष्ट करने वाला;माया-मय--सर्व कृपालु; सूकरस्य--सूकर का; जन:--जनलोक; तपः--तपोलोक ; सत्य--सत्यलोक के; निवासिन:--निवासी; ते--वे सभी; त्रिभि:--तीन वेदों से; पवित्रै: --शुभ मंत्रों से; मुन॒यः--महान् चिन्तकों तथा ऋषियों ने; अगृणन् स्म--उच्चारण किया।
जब जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक के निवासी महर्षियों तथा चिन्तकों ने भगवान्सूकर की कोलाहलपूर्ण वाणी सुनी, जो सर्वकृपालु भगवान् की सर्वकल्याणमय ध्वनि थी तोउन्होंने तीनों वेदों से शुभ मंत्रों का उच्चारण किया।
तेषां सतां वेदवितानमूर्ति-ब्रह्मावधार्यात्मगुणानुवादम् ।
विनद्य भूयो विबुधोदयायगजेन्द्रलीलो जलमाविवेश ॥
२६॥
तेषामू--उन; सताम्-महान् भक्तों के; वेद--सम्पूर्ण ज्ञान; वितान-मूर्तिः--विस्तार का स्वरूप; ब्रह्म--वैदिक ध्वनि;अवधार्य--इसे ठीक से जानकर; आत्म--अपना; गुण-अनुवादम्--दिव्य गुणगान; विनद्य--प्रतिध्वनित; भूय:--पुनः;विबुध--विद्वानों के; उदयाय--लाभ या उत्थान् हेतु; गजेन्द्र-लील:--हाथी के समान कीड़ा करते हुए; जलम्--जल में;आविवेश--प्रविष्ट हुआ
हाथी के समान क़ीड़ा करते हुए वे महान् भक्तों द्वारा की गई वैदिक स्तुतियों के उत्तर मेंपुनः गर्जना करके जल में घुस गये।
भगवान् वैदिक स्तुतियों के लक्ष्य हैं, अतएव वे समझ गयेकि भक्तों की स्तुतियाँ उन्हीं के लिए की जा रही हैं।
उत्क्षिप्तवाल: खचर: कठोरःसटा विधुन्वन्खररोमशत्वक् ।
खुराहताभ्र: सितदंष्र ईक्षाज्योतिर्बभासे भगवान्मही श्र: ॥
२७॥
उत्क्षिप्त-वाल:--पूँछ फटकारते; ख-चर:-- आकाश में; कठोर: -- अति कठोर; सटाः:--कंधे तक लटकते बाल; विधुन्चन् --हिलाता; खर--तेज; रोमश-त्वक् --रोओं से भरी त्वचा; खुर-आहत--खुरों से टकराया; अभ्र:--बादल; सित-दंष्ट: --सफेददाढ़ें; ईक्षा--चितवन; ज्योति:ः--चमकीली; बभासे--तेज निकालने लगा; भगवानू-- भगवान्; मही-क्ष:--जगत को धारणकरने वाला।
पृथ्वी का उद्धार करने के लिए जल में प्रवेश करने के पूर्व भगवान् वराह अपनी पूँछ'फटकारते तथा अपने कड़े बालों को हिलाते हुए आकाश में उड़े।
उनकी चितवन चमकीली थी।
और उन्होंने अपने खुरों तथा चमचमाती सफेद दाढ़ों से आकाश में बादलों को बिखरा दिया।
राणेन पृथ्व्या: पदवीं विजिप्रन् क्रोडापदेश: स्वयमध्वराड्र: ।
'करालदंध्टोउप्यकरालहग्भ्या-मुद्वीक्ष्य विप्रान्यूणतो उविशत्कम् ॥
२८॥
घ्राणेन--सूँघने से; पृथ्व्या:--पृथ्वी की; पदवीम्--स्थिति; विजिप्रन्ू--पृथ्वी की खोज करते हुए; क्रोड-अपदेश: --सूकर काशरीर धारण किये हुए; स्वयम्--स्वयं; अध्वर--दिव्य; अड्र:--शरीर; कराल-- भयावना; दंष्टः --दाँत ( दाढ़ें )) अपि--केबावजूद; अकराल--भयावना नहीं; दृग्भ्यामू--अपनी चितवन से; उद्दीक्ष्य--दृष्टि दौड़ाकर; विप्रान्ू--सारे ब्राह्मण भक्त;गृणतः-स्तुति में लीन; अविशतू-- प्रवेश दिया; कमू--जल में |
वे साक्षात् परम प्रभु विष्णु थे, अतएवं दिव्य थे, फिर भी सूकर का शरीर होने से उन्होंनेपृथ्वी को उसकी गंध से खोज निकाला।
उनकी दाढ़ें अत्यन्त भयावनी थीं।
उन्होंने स्तुति करने मेंव्यस्त भक्त-ब्राह्मणों पर अपनी दृष्टि दौड़ाई।
इस तरह वे जल में प्रविष्ट हुए।
स वज्ञकूटाड्निपातवेग-विशीर्णकुक्षि: स्तनयन्नुदन्वान् ।
उत्सृष्टदीर्घोर्मि भुजैरिवार्त-श्रुक्रोश यज्ञे ध्वर पाहि मेति ॥
२९॥
सः--वह; वज़्-कूट-अड्गभ--विशाल पर्वत जैसा शरीर; निपात-वेग--डुबकी लगाने का वेग; विशीर्ण--दो भागों में करते हैं;कुक्षिः--मध्य भाग को; स्तनयन्--के समान गुँजाते; उदन्वान्--समुद्र; उत्सूष्ट--उत्पन्न करके; दीर्घ--ऊँची; ऊर्मि-- लहरें;भुजै:--बाँहों से; इब आर्त:--दुखी पुरुष की तरह; चुक्रोश--तेज स्वर से स्तुति की; यज्ञ-ईश्वर--हे समस्त यज्ञों के स्वामी;पाहि--कृपया बचायें; मा--मुझको; इति--इस प्रकार।
दानवाकार पर्वत की भाँति जल में गोता लगाते हुए भगवान् वराह ने समुद्र के मध्यभाग कोविभाजित कर दिया और दो ऊँची लहरें समुद्र की भुजाओं की तरह प्रकट हुईं जो उच्च स्वर सेआर्तनाद कर रही थीं मानो भगवान् से प्रार्थना कर रही हों,'हे समस्त यज्ञों के स्वामी, कृपया मेरेदो खण्ड न करें।
कृपा करके मुझे संरक्षण प्रदान करें।
खरे: क्षुरप्रैर्दरयंस्तदापउत्पारपारं त्रिपरू रसायाम् ।
ददर्श गां तत्र सुघुप्सुरग्रेयां जीवधानीं स्वयमभ्यधत्त ॥
३०॥
खुरै:--खुरों से; क्षुरप्रै:--तेज हथियार के समान; दरयन्--घुस कर; तत्--वह; आप:--जल; उत्पार-पारम्ू--असीम् की सीमापा ली; त्रि-परुः--सभी यज्ञों का स्वामी; रसायामू--जल के भीतर; ददर्श--पाया; गाम्-- पृथ्वी को; तत्र--वहाँ; सुषुप्सु:--लेटे हुए; अग्रे--प्रारम्भ में; यामू--जिसको; जीव-धानीम्--सभी जीवों की विश्राम की स्थली; स्वयम्--स्वयं; अभ्यधत्त--ऊपर उठा लिया।
भगवान् वराह तीरों जैसे नुकीले अपने खुरों से जल में घुस गये और उन्होंने अथाह समुद्र कीसीमा पा ली।
उन्होंने समस्त जीवों की विश्रामस्थली पृथ्वी को उसी तरह पड़ी देखा जिस तरहवह सृष्टि के प्रारम्भ में थी और उन्होंने उसे स्वयं ऊपर उठा लिया।
स्वदंष्टयोद्धृत्य महीं निमग्नांस उत्थितः संरुरुचे रसाया: ।
तत्रापि दैत्यं गदयापतन्तंसुनाभसन्दीपिततीत्रमन्यु; ॥
३१॥
स्व-दंष्टया--अपनी ही दाढ़ों से; उद्धृत्य--उठाकर; महीम्--पृथ्वी को; निमग्नामू--डूबी हुई; सः--उसने; उत्थित: -- ऊपरउठाकर; संरुरुचे--अतीव भव्य दिखाई पड़ा; रसाया:--जल से; तत्र--वहाँ; अपि-- भी; दैत्यम्-- असुर को; गदया--गदा से;आपतन्तम्--उसकी ओर दौड़ाते हुए; सुनाभ--कृष्ण का चक्र; सन्दीपित--चमकता हुआ; तीब्र-- भयानक; मन्यु:--क्रोध |
भगवान् वराह ने बड़ी ही आसानी से पृथ्वी को अपनी दाढ़ों में ले लिया और वे उसे जल से बाहर निकाल लाये।
इस तरह वे अत्यन्त भव्य लग रहे थे।
तब उनका क्रोध सुदर्शन चक्र कीतरह चमक रहा था और उन्होंने तुरन्त उस असुर ( हिरण्याक्ष ) को मार डाला, यद्यपि वह भगवान्से लड़ने का प्रयास कर रहा था।
जघान रुन्धानमसहाविक्रमंस लीलयेभं॑ मृगराडिवाम्भसि ।
तद्रक्तपड्डाद्डितगण्डतुण्डोयथा गजेन्द्रो जगतीं विभिन्दन् ॥
३२॥
जघान--वध किया; रुन्धानम्--अवरोध उत्पन्न करनेवाला शत्रु; असहा--असहनीय; विक्रमम्--पराक्रम; सः --उसने;लीलया--सरलतापूर्वक; इभम्--हाथी; मृग-राट्--सिंह; इब--सहश; अम्भसि--जल में; तत्-रक्त--उसके रक्त का; पड्ढू-अड्वित--कीचड़ से रँगा हुआ; गण्ड--गाल; तुण्ड:--जीभ; यथा--मानो; गजेन्द्र:--हाथी; जगतीम्--पृथ्वी को; विभिन्दन्--खोदते हुए
तत्पश्चात् भगवान् वराह ने उस असुर को जल के भीतर मार डाला जिस तरह एक सिंह हाथीको मारता है।
भगवान् के गाल तथा जीभ उस असुर के रक्त से उसी तरह रँगे गये जिस तरहहाथी नीललोहित पृथ्वी को खोदने से लाल हो जाता है।
तमालनीलं सितदन्तकोट्याक्ष्मामुत्क्षिपन्तं गजलीलयाड़ु ।
प्रज्ञाय बद्धाज्ललयोनुवाकै-विरिश्विमुख्या उपतस्थुरीशम् ॥
३३॥
तमाल--नीला वृक्ष जिसका नाम तमाल है; नीलम्--नीले रंग का; सित-- श्वेत; दन््त--दाँत; कोट्या--टेढ़ी कोर वाला;क्ष्मामू-पृथ्वी; उत्क्षिपन्तमू--लटकाये हुए; गज-लीलया--हाथी की तरह क्रीड़ा करता; अड्ग--हे विदुर; प्रज्ञाय--इसे जान लेने पर; बद्ध--जोड़े हुए; अज्ञललयः--हाथ; अनुवाकै:--वैदिक मंत्रों से; विरिश्चि-- ब्रह्मा; मुख्या: --इत्यादि; उपतस्थु:--स्तुतिकी; ईशम्-- भगवान्
के प्रतितब हाथी की तरह क्रीड़ा करते हुए भगवान् ने पृथ्वी को अपने सफेद टेढ़े दाँतों के किनारेपर अटका लिया।
उनके शरीर का वर्ण तमाल वृक्ष जैसा नीलाभ हो गया और तब ब्रह्मा इत्यादिऋषि उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् समझ सके और उन्होंने सादर नमस्कार किया।
ऋषय ऊचु:जितं जितं तेडजित यज्ञभावनञ्रयीं तनुं स्वां परिधुन्वते नमः ।
यद्वोमगर्तेषु निलिल्युरद्धय-स्तस्मै नमः कारणसूकराय ते ॥
३४॥
ऋषय: ऊचु:--यशस्वी ऋषि बोल पड़े; जितम्--जय हो; जितम्--जय हो; ते--तुम्हारी; अजित--हे न जीते जा सकने वाले;यज्ञ-भावन--यज्ञ सम्पन्न करने पर जाना जाने वाले; त्रयीम्--साक्षात् वेद; तनुम्--ऐसा शरीर; स्वामू--अपना; परिधुन्वते--हिलाते हुए; नम:ः--नमस्कार; यत्--जिसके; रोम--रोएँ; गर्तेषु--छेदों में; निलिल्यु:--डूबे हुए; अद्धवः--सागर; तस्मै--उसको; नमः --नमस्कार करते हुए; कारण-सूकराय--सकारण शूकर विग्रह धारण करने वाले; ते--तुमको |
सारे ऋषि अति आदर के साथ बोल पड़े' हे समस्त यज्ञों के अजेय भोक्ता, आपकी जयहो, जय हो, आप साक्षात् वेदों के रूप में विचरण कर रहे हैं और आपके शरीर के रोमकूपों मेंसारे सागर समाये हुए हैं।
आपने किन्हीं कारणों से ( पृथ्वी का उद्धार करने के लिए ) अब सूकरका रूप धारण किया है।
रूप तवैतन्ननु दुष्कृतात्मनां दुर्दर्शनं देव यदध्वरात्मकम् ।
छन््दांसि यस्य त्वचि बर्हिरोम-स्वाज्यं दृशि त्वड्टप्रिषु चातुहोंत्रम् ॥
३५॥
रूपम्--स्वरूप; तब--तुम्हारा; एतत्--यह; ननु--लेकिन; दुष्कृत-आत्मनाम्--दुष्टात्माओं का; दुर्दर्शनम्ू--देख पाना कठिन;देव-हे प्रभु; यत्ू--वह; अध्वर-आत्मकम्--यज्ञ सम्पन्न करने के कारण पूजनीय; छन्दांसि--गायत्री तथा अन्य छंद; यस्य--जिसके; त्वचि--त्वचा का स्पर्श; बह्हि:--कुश नामक पवित्र घास; रोमसु--शरीर के रोएँ; आज्यम्--घी; दहशि--आँखों में;तु--भी; अद्प्रिषु--चारों पाँवों पर; चातुः-होत्रमू--चार प्रकार के सकाम कर्म |
हे प्रभु, आपका स्वरूप यज्ञ सम्पन्न करके पूजा के योग्य है, किन्तु दुष्टात्माएँ इसे देख पाने मेंअसमर्थ हैं।
गायत्री तथा अन्य सारे वैदिक मंत्र आपकी त्वचा के सम्पर्क में हैं।
आपके शरीर केरोम कुश हैं, आपकी आँखें घृत हैं और आपके चार पाँव चार प्रकार के सकाम कर्म हैं।
स्रक्तुण्ड आसीत्ख्रुव ईश नासयो-रिडोदरे चमसाः कर्णरन्श्रे ।
प्राशित्रमास्ये ग्रसने ग्रहास्तु तेयच्चर्वणं ते भगवजन्नग्निहोत्रम्ू ॥
३६॥
सत्रकू--यज्ञ का पात्र; तुण्डे--जीभ पर; आसीत्ू-- है; स्त्रुवः--यज्ञ का दूसरा पात्र; ईश-हे प्रभु; नासयो:--नथुनों का; इडा--खाने का पात्र; उदरे--पेट में; चमसा: --यज्ञ का अन्य पात्र, चम्मच; कर्ण-रन्ध्रे--कान के छेदों में; प्राशित्रमू--ब्रह्मा नामक पात्र; आस्ये--मुख में; ग्रसने-- गले में; ग्रहा: --सोम पात्र; तु--लेकिन; ते--तुम्हारा; यत्--जो; चर्वणम्--चबाना; ते--तुम्हारा; भगवन्--हे प्रभु; अग्नि-होत्रमू--अपनी यज्ञ-अग्नि के माध्यम से तुम्हारा भोजन है।
हे प्रभु, आपकी जीभ यज्ञ का पात्र ( स्रक् ) है, आपका नथुना यज्ञ का अन्य पात्र ( स्त्रुवा )है।
आपके उदर में यज्ञ का भोजन-पात्र ( इडा ) है और आपके कानों के छिठ्रों में यज्ञ का अन्यपात्र ( चमस ) है ॥
आपका मुख ब्रह्मा का यज्ञ पात्र (् प्राशित्र ) है, आपका गला यज्ञ पात्र है,जिसका नाम सोमपात्र है तथा आप जो भी चबाते हैं वह अग्निहोत्र कहलाता है।
दीक्षानुजन्मोपसद: शिरोधरंत्वं प्रायणीयोदयनीयदंप्र: ।
जिह्ा प्रवर्ग्यस्तव शीर्षक॑ क्रतो:सत्यावसथ्यं चितयोसवो हि ते ॥
३७॥
दीक्षा--दीक्षा; अनुजन्म--आध्यात्मिक जन्म या बारम्बार अवतार; उपसदः--तीन प्रकार की इच्छाएँ ( सम्बन्ध, कर्म तथा चरमलक्ष्य ); शिर:-धरम्--गर्दन; त्वमू--तुम; प्रायणीय--दीक्षा के परिणाम के बाद; उदयनीय--इच्छाओं का अन्तिम संस्कार;दंष्टः --दाढ़ें; जिह्वा--जीभ; प्रवर्ग्य;--पहले के कार्य; तब--तुम्हारा; शीर्षकम्--सिर; क्रतोः--यज्ञ का; सत्य--यज्ञ के बिनाअग्नि; आवसशथ्यम्--पूजा की अग्नि; चितय:--समस्त इच्छाओं का समूह; असव:--प्राणवायु; हि--निश्चय ही; ते--तुम्हारा
हे प्रभु, इसके साथ ही साथ सभी प्रकार की दीक्षा के लिए आपके बारम्बार प्राकट्य कीआकांक्षा भी है।
आपकी गर्दन तीनों इच्छाओं का स्थान है और आपकी दाढ़ें दीक्षा-फल तथासभी इच्छाओं का अन्त हैं, आप की जिव्हा दीक्षा के पूर्व-कार्य हैं, आपका सिर यज्ञ रहित अग्नितथा पूजा की अग्नि है तथा आप की जीवनी-शक्ति समस्त इच्छाओं का समुच्चय है।
सोमस्तु रेत: सवनान्यवस्थिति:संस्थाविभेदास्तव देव धातवः ।
सत्राणि सर्वाणि शरीरसन्धि-स्त्वं सर्वयज्ञक्रतुरिष्टिबन्धन: ॥
३८॥
सोम: तु रेत:--आपका वीर्य सोमयज्ञ है; सवनानि--प्रातःकाल के अनुष्ठान; अवस्थिति:--शारीरिक वृद्धि की विभिन्नअवस्थाएँ; संस्था-विभेदा:--यज्ञ के सात प्रकार; तब--तुम्हारा; देव--हे प्रभु; धातवः--शरीर के अवयव यथा त्वचा एवं मांस;सत्राणि--बारह दिनों तक चलने वाले यज्ञ; सर्वाणि--सारे; शरीर--शारीरिक; सन्धि:--जोड़; त्वमू--आप; सर्व--समस्त;यज्ञ--असोम यज्ञ; क्रतु:--सोम यज्ञ; इष्टि--चरम इच्छा; बन्धन:--आसक्ति |
हे प्रभु, आपका वीर्य सोम नामक यज्ञ है।
आपकी वृद्धि प्रातःकाल सम्पन्न किये जाने वालेकर्मकाण्डीय अनुष्ठान हैं।
आपकी त्वचा तथा स्पर्श अनुभूति अग्निष्टोम यज्ञ के सात तत्त्व हैं।
आपके शरीर के जोड़ बारह दिनों तक किये जाने वाले विविध यज्ञों के प्रतीक हैं।
अतएव आपसोम तथा असोम नामक सभी यज्ञों के लक्ष्य हैं और आप एकमात्र यज्ञों से बंधे हुए हैं।
नमो नमस्ते खिलमन्त्रदेवता-द्रव्याय सर्वक्रतवे क्रियात्मने ।
वैराग्यभक्त्यात्मजयानु भावित-ज्ञानाय विद्यागुरवे नमो नमः ॥
३९॥
नमः नमः--नमस्कार है; ते--आपको, जो कि आराध्य है; अखिल--सभी सम्मिलित रूप से; मन्त्र--मंत्र; देवता-- भगवान्;द्रव्याय--यज्ञ सम्पन्न करने की समस्त सामग्रियों को; सर्व-क्रतवे--सभी प्रकार के यज्ञों को; क्रिया-आत्मने-- सभी यज्ञों केपरम रूप आपको; वैराग्य--वैराग्य; भक्त्या--भक्ति द्वारा; आत्म-जय-अनुभावित--मन को जीतने पर अनुभूत किए जानेवाले; ज्ञानाय--ऐसे ज्ञान को; विद्या-गुरवे--समस्त ज्ञान के परम गुरु को; नमः नमः--मैं पुनः सादर नमस्कार करता हूँ।
हे प्रभु, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और वैश्विक-प्रार्थनाओं, वैदिक मंत्रों तथा यज्ञ कीसामग्री द्वारा पूजनीय हैं।
हम आपको नमस्कार करते हैं।
आप समस्त हृश्य तथा अदृश्य भौतिककल्मष से मुक्त शुद्ध मन द्वारा अनुभवगम्य हैं।
हम आपको भक्ति-योग के ज्ञान के परम गुरु केरूप में सादर नमस्कार करते हैं।
दंष्टाग्रकोट्या भगवंस्त्वया धृताविराजते भूधर भू: सभूधरा ।
यथा वनान्निःसरतो दता धृतामतड़जेन्द्रस्थ सपत्रपदिनी ॥
४०॥
दंट्र-अग्र--दाढ़ के अगले भाग; कोट्या--किनारों के द्वारा; भगवन्--हे भगवान्; त्ववा--आपके द्वारा; धृता--धारण किया;विराजते--सुन्दर ढंग से स्थित है; भू-धर--हे पृथ्वी के उठाने वाले; भू:--पृथ्वी; स-भूधरा--पर्वतों सहित; यथा--जिस तरह;वनातू--जल से; निःसरतः--बाहर आते हुए; दता--दाँत से; धृता--पकड़े हुए है; मतम्-गजेन्द्रस्थ--क्रुद्ध हाथी; स-पत्र--पत्तियों सहित; पद्चिनी--कमलिनी |
हे पृथ्वी के उठाने वाले, आपने जिस पृथ्वी को पर्वतों समेत उठाया है, वह उसी तरह सुन्दरलग रही है, जिस तरह जल से बाहर आने वाले क्रुद्ध हाथी के द्वारा धारण की गई पत्तियों सेयुक्त एक कमलिनी।
तअ्रयीमयं रूपमिदं च सौकरंभूमण्डलेनाथ दता धृतेन ते ।
चकास्ति श्रृड्रेडघनेन भूयसाकुलाचलेन्द्रस्य यथेव विभ्रम: ॥
४१॥
त्रयी-मयम्--साक्षात् वेद; रूपम्--स्वरूप; इदम्ू--यह; च-- भी; सौकरम्--सूकर का; भू-मण्डलेन-- भूलोक द्वारा; अथ--अब; दता--दाढ़ के द्वारा; धृतेन-- धारण किया गया; ते--तुम्हारी; चकास्ति--चमक रही है; श्रूड़ु-ऊढ--शिखरों द्वारा धारित;घनेन--बादलों द्वारा; भूयसा--अत्यधिक मंडित; कुल-अचल-इन्द्रस्य--विशाल पर्वतों के; यथा--जिस तरह; एब--निश्चयही; विभ्रम:--अलंकरण
हे प्रभु, जिस तरह बादलों से अलंकृत होने पर विशाल पर्वतों के शिखर सुन्दर लगने लगतेहैं उसी तरह आपका दिव्य शरीर सुन्दर लग रहा है, क्योंकि आप पृथ्वी को अपनी दाढ़ों के सिरेपर उठाये हुए हैं।
संस्थापयैनां जगतां सतस्थुषांलोकाय पत्नीमसि मातरं पिता ।
विधेम चास्यै नमसा सह त्वयायस्यां स्वतेजोग्निमिवारणावधा: ॥
४२॥
संस्थापय एनाम्ू--इस पृथ्वी को उठाओ; जगताम्--चर; स-तस्थुषाम्--तथा अचर दोनों; लोकाय--उनके निवास स्थान केलिए; पतीम्--पतली; असि--हो; मातरमू--माता; पिता--पिता; विधेम--हम अर्पित करते हैं; च-- भी; अस्यै--माता को;नमसा--नमस्कार; सह--समेत; त्वया--तुम्हारे साथ; यस्याम्ू--जिसमें; स्व-तेज:-- अपनी शक्ति द्वारा; अग्निमू-- अग्नि;इब--सहश; अरणौ--अरणि काष्ठ में; अधा:--निहित |
हे प्रभु, यह पृथ्वी चर तथा अचर दोनों प्रकार के निवासियों के रहने के लिए आपकी पत्नीहै और आप परम पिता हैं।
हम उस माता पृथ्वी समेत आपको सादर नमस्कार करते हैं जिसमेंआपने अपनी शक्ति स्थापित की है, जिस तरह कोई दक्ष यज्ञकर्ता अरणि काष्ट में अग्नि स्थापितकरता है।
'कः श्रद्धीतान्यतमस्तव प्रभोरसां गताया भुव उद्विबरहणम् ।
न विस्मयोसौ त्वयि विश्वविस्मयेयो माययेदं ससृजेडतिविस्मयम् ॥
४३॥
कः--और कौन; श्रदधीत-- प्रयास कर सकता है; अन्यतम:--आपके अतिरिक्त अन्य कोई; तब--तुम्हारा; प्रभो--हे प्रभु;रसाम्--जल में; गताया:--पड़ी हुई; भुवः--पृथ्वी को; उद्विबहणम्--उद्धार; न--कभी नहीं; विस्मय:--आश्चर्यमय; असौ--ऐसा कार्य; त्वयि--तुमको; विश्व--विश्व के ; विस्मये--आश्चर्यों से पूर्ण; यः--जो; मायया--शक्तियों द्वारा; इदमू--यह;ससृजे--उत्पन्न किया; अतिविस्मयमू--सभी आश्चर्यो से बढ़कर।
हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, आपके अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो जल के भीतर से पृथ्वी काउद्धार कर सकता? किन्तु यह आपके लिए बहुत आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि ब्रह्माण्ड केसृजन में आपने अति अद्भुत कार्य किया है।
अपनी शक्ति से आपने इस अद्भुत विराट जगतकी सृष्टि की है।
विधुन्वता वेदमयं निजं वबपु-ज॑नस्तपःसत्यनिवासिनो वयम् ।
सटाशिखोद्धूतशिवाम्बुबिन्दुभि-विंमृज्यमाना भूशमीश पाविता: ॥
४४॥
विधुन्वता--हिलाते हुए; वेद-मयम्--साक्षात् वेद; निजमू--अपना; वपु:--शरीर; जन:ः--जनलोक; तप:--तपोलोक; सत्य--सत्यलोक; निवासिन:--निवासी; वयम्--हम; सटा--कन्धे तक लटकते बाल; शिख-उद्धृूत--चोटी ( शिखा ) के द्वारा धारणकिया हुआ; शिव--शुभ; अम्बु--जल; बिन्दुभि:--कणों के द्वारा; विमृज्यमाना: --छिड़के जाते हुए हम; भृूशम्--अत्यधिक;ईश--हे परमेश्वर; पाविता:--पवित्र किये गये।
हे परमेश्वर, निस्सन्देह, हम जन, तप तथा सत्य लोकों जैसे अतीव पवित्र लोकों के निवासीहैं फिर भी हम आपके शरीर के हिलने से आपके कंधों तक लटकते बालों के द्वारा छिड़के गएजल की बूँदों से शुद्ध बन गये हैं।
सबेै बत भ्रष्टमतिस्तवैषतेयः कर्मणां पारमपारकर्मण: ।
यदोगमायागुणयोगमोहितंविश्व समस््तं भगवन्विधेहि शम् ॥
४५॥
सः--वह; वै--निश्चय ही; बत--हाय; भ्रष्टटमति:--मतिक्रष्ट, मूर्ख; तब--तुम्हारी; एघते--इच्छाएँ; यः--जो; कर्मणाम्--कर्मो का; पारम्ू--सीमा; अपार-कर्मण:--असीम कर्मों वाले का; यत्--जिससे; योग--योगशक्ति; माया--शक्ति; गुण--भौतिक प्रकृति के गुण; योग--योग शक्ति; मोहितम्--मोह ग्रस्त; विश्वम्-ब्रह्माण्ड; समस्तम्--सम्पूर्ण; भगवन्--हे भगवान्;विधेहि--वर दें; शम्--सौ भाग्य ।
हे प्रभु, आपके अदभुत कार्यों की कोई सीमा नहीं है।
जो भी व्यक्ति आपके कार्यों कीसीमा जानना चाहता है, वह निश्चय ही मतिशभ्रष्ट है।
इस जगत में हर व्यक्ति प्रबल योगशक्तियों सेबँधा हुआ है।
कृपया इन बद्धजीवों को अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान करें।
मैत्रेय उवाचइत्युपस्थीयमानोसौ मुनिभि्रह्ववादिभि: ।
सलिले स्वखुराक्रान्त उपाधत्तावितावनिम् ॥
४६॥
मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; इति--इस प्रकार; उपस्थीयमान: --प्रशंसित होकर; असौ-- भगवान् वराह; मुनिभि:--मुनियों द्वारा; ब्रह्य-वादिभि:--अध्यात्मवादियों द्वारा; सलिले--जल में; स्व-खुर-आक्रान्ते-- अपने ही खुरों से स्पर्श हुआ;उपाधत्त--रखा; अविता--पालनकर्ता; अवनिम्--पृथ्वी को |
मैत्रेय मुनि ने कहा : इस तरह समस्त महर्षियों तथा दिव्यात्माओं के द्वारा पूजित होकरभगवान् ने अपने खुरों से पृथ्वी का स्पर्श किया और उसे जल पर रख दिया।
स इत्थं भगवानुर्वी विष्वक्सेन: प्रजापति: ।
रसाया लीलयोन्नीतामप्सु न्यस्य ययौ हरि; ॥
४७॥
सः--वह; इत्थम्--इस तरह से; भगवान्-- भगवान्; उर्बीम्-पृथ्वी को; विष्वक्सेन:--विष्णु का अन्य नाम; प्रजा-पति: --जीवों के स्वामी; रसाया:--जल के भीतर से; लीलया--आसानी से; उन्नीताम्ू--उठाया हुआ; अप्सु--जल में; न्यस्य--रखकर;ययौ--अपने धाम लौट गये; हरि: -- भगवान्
इस प्रकार से समस्त जीवों के पालनहार भगवान् विष्णु ने पृथ्वी को जल के भीतर सेउठाया और उसे जल के ऊपर तैराते हुए रखकर वे अपने धाम को लौट गये।
य एवमेतां हरिमेधसो हरेःकथां सुभद्रां कथनीयमायिन: ।
श्रण्वीत भक्त्या श्रवयेत वोशतींजनार्दनोस्याशु हृदि प्रसीदति ॥
४८ ॥
यः--जो; एवम्--इस प्रकार; एताम्--यह; हरि-मेधस:-- भक्त के भौतिक शरीर को विनष्ट करनेवाला; हरेः --भगवान् की;कथाम्--कथा; सु-भद्रामू--मंगलकारी; कथनीय--कहने योग्य; मायिन: --उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा कृपालु का;श्रुण्वीत--सुनता है; भक्त्या--भक्तिपूर्वक; श्रवयेत--अन्यों को भी सुनाता है; वा-- अथवा; उशतीम्--अत्यन्त सुहावना;जनार्दन:--भगवान्; अस्य--उसका; आशु--तुरन््त; हृदि--हृदय के भीतर; प्रसीदति--प्रसन्न हो जाता है।
यदि कोई व्यक्ति भगवान् वराह की इस शुभ एवं वर्णनीय कथा को भक्तिभाव से सुनता हैअथवा सुनाता है, तो हर एक के हृदय के भीतर स्थित भगवान् अत्यधिक प्रसन्न होते हैं।
तस्मिन्प्रसन्ने सकलाशिषां प्रभौकिं दुर्लभं ताभिरलं लवात्मभि: ।
अनन्यहदृष्टय्या भजतां गुहाशय:स्वयं विधत्ते स्वगतिं पर: पराम् ॥
४९॥
तस्मिन्ू--उन; प्रसन्ने--प्रसन्न होने पर; सकल-आशिषाम्--सारे आशीर्वादों का; प्रभौ-- भगवान् को; किम्--वह क्या है;दुर्लभम्-प्राप्त कर सकना अतीव कठिन; ताभि:--उनके साथ; अलम्--दूर; लब-आत्मभि:--क्षुद्र लाभ सहित; अनन्य-इष्यया--अन्य कुछ से नहीं अपितु भक्ति से; भजताम्-भक्ति में लगे हुओं का; गुहा-आशय: --हृदय के भीतर निवास करनेवाले; स्वयम्--स्वयं; विधत्ते--सम्पन्न करता है; स्व-गतिम्--अपने धाम में; पर:--परम; पराम्ू--दिव्य |
जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् किसी पर प्रसन्न होते हैं, तो उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहींरहता।
दिव्य उपलब्धि के द्वारा मनुष्य अन्य प्रत्येक वस्तु को नगण्य मानता है।
जो व्यक्ति दिव्यप्रेमाभक्ति में अपने को लगाता है, वह हर व्यक्ति के हृदय में स्थित भगवान् के द्वारा सर्वोच्चसिद्धावस्था तक ऊपर उठा दिया जाता है।
को नाम लोके पुरुषार्थसारवित्पुराकथानां भगवत्कथासुधाम् ।
आपीय कर्णाज्जलिभिर्भवापहा-महो विरज्येत विना नरेतरम् ॥
५०॥
कः--कौन; नाम--निस्सन्देह; लोके--संसार में; पुरुष-अर्थ--जीवन-लक्ष्य; सार-वित्--सार को जानने वाला; पुरा-कथानाम्--सारे विगत इतिहासों में; भगवत्-- भगवान् विषयक; कथा-सुधाम्-- भगवान् विषयक कथाओं का अमृत;आपीय--पीकर; कर्ण-अद्जलिभि:--कानों के द्वारा ग्रहण करके; भव-अपहाम्--सारे भौतिक तापों को नष्ट करने वाला;अहो--हाय; विरज्येत--मना कर सकता है; विना--बिना; नर-इतरम्--मनुष्येतर प्राणी ।
बेइन्गूमनुष्य के अतिरिक्त ऐसा प्राणी कौन है, जो इस जगत में विद्यमान हो और जीवन के चरमलक्ष्य के प्रति रुचि न रखता हो? भला कौन ऐसा है, जो भगवान् के कार्यो से सम्बन्धित उनकथाओं के अमृत से मुख मोड़ सके जो मनुष्य को समस्त भौतिक तापों से उबार सकती हैं ?
