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अध्याय चौदह: सायंकाल दिति का गर्भाधान

3.14श्रीशुक उबाचनिशम्य कौषारविणोपवर्णितांहरे: कथां कारणसूकरात्मन: ।

पुनः स पप्रच्छ तमुद्यताझ्ञलि-न॑ चातितृप्तो विदुरो धृतव्रतः ॥

१॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; निशम्य--सुनकर; कौषारविणा--मैत्रेय मुनि द्वारा; उपवर्णिताम्‌--वर्णित;हरेः --भगवान्‌ की; कथाम्‌--कथा; कारण--पृथ्वी उठाने के कारण; सूकर-आत्मन:--सूकर अवतार; पुन:--फिर; सः--उसने; पप्रच्छ--पूछा; तम्‌--उस ( मैत्रेय ) से; उद्यत-अद्जधलि: --हाथ जोड़े हुए; न--कभी नहीं; च-- भी; अति-तृप्त:--अत्यधिक तुष्ट; विदुर:--विदुर; धृत-ब्रत:--ब्रत लिए हुए।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : महर्षि मैत्रेय से वराह रूप में भगवान्‌ के अवतार के विषय मेंसुनकर हढ़संकल्प विदुर ने हाथ जोड़कर उनसे भगवान्‌ के अगले दिव्य कार्यो के विषय मेंसुनाने की प्रार्थना की, क्योंकि वे ( विदुर ) अब भी तुष्ट अनुभव नहीं कर रहे थे।

विदुर उबाचतेनेव तु मुनिश्रेष्ठ हरिणा यज्ञमूर्तिना ।

आदिदैत्यो हिरण्याक्षो हत इत्यनुशुश्रुम ॥

२॥

विदुरः उबाच-- श्री विदुर ने कहा; तेन--उसके द्वारा; एब--निश्चय ही; तु--लेकिन; मुनि-श्रेष्ठ--हे मुनियों में श्रेष्ठ; हरिणा--भगवान्‌ द्वारा; यज्ञ-मूर्तिना--यज्ञ का स्वरूप; आदि--मूल; दैत्य:--असुर; हिरण्याक्ष:--हिरण्याक्ष नामक; हतः--मारा गया;इति--इस प्रकार; अनुशु श्रुम-- उसी क्रम में सुना है

श्री विदुर ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, मैंने शिष्य-परम्परा से यह सुना है कि आदि असुर हिरण्याक्षउन्हीं यज्ञ रूप भगवान्‌ ( वराह ) द्वारा मारा गया था।

तस्य चोद्धरतः क्षौणीं स्वदंष्टाग्रेण लीलया ।

दैत्यराजस्य च ब्रहान्कस्माद्धेतोरभून्मूधथ: ॥

३॥

तस्य--उसका; च-- भी ; उद्धरतः--उठाते हुए; क्षौणीम्‌-- पृथ्वी लोक को; स्व-दंष्ट-अग्रेण--अपनी दाढ़ के सिरे से;लीलया--अपनी लीला में; दैत्य-राजस्य--दैत्यों के राजा का; च--तथा; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; कस्मात्‌--किस; हेतो:-- कारणसे; अभूत्‌--हुआ; मृध:--युद्ध |

हे ब्राह्मण, जब भगवान्‌ अपनी लीला के रूप में पृथ्वी ऊपर उठा रहे थे, तब उस असुरराजतथा भगवान्‌ वराह के बीच, युद्ध का क्या कारण था ?

अ्रददधानाय भक्ताय ब्रूहि तज्जन्मविस्तरम्‌ ।

ऋषे न तृप्यति मनः परं कौतूहलं हि मे ॥

४॥

श्रह्धानाय-- श्रद्धावान पुरुष के लिए; भक्ताय--भक्त के लिए; ब्रूहि--कृपया बतलाएँ; तत्‌--उसका; जन्म--आविर्भाव;विस्तरम्‌--विस्तार से; ऋषे--हे ऋषि; न--नहीं; तृप्पति--सन्तुष्ट होता है; मनः--मन; परम्‌ू--अत्यधिक; कौतूहलम्‌--जिज्ञासु; हि--निश्चय ही; मे--मेरा |

मेरा मन अत्यधिक जिज्ञासु बन चुका है, अतएवं भगवान्‌ के आविर्भाव की कथा सुन करमुझे तुष्टि नहीं हो रही है।

इसलिए आप इस श्रद्धावान्‌ भक्त से और अधिक कहें।

ह कि जज तः कि सर कर न नमैत्रेय उवाचसाधु वीर त्वया पृष्टमवतारकथां हरे: ।

यच्त्वं पृच्छसि मर्त्यानां मृत्युपाशविशातनीम्‌ ॥

५॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; साधु-- भक्त; वीर--हे योद्धा; त्ववा--तुम्हारे द्वारा; पृष्टम[--पूछी गयी; अवतार-कथाम्‌--अवतार की कथाएँ; हरेः-- भगवान्‌ की; यत्‌--जो; त्वमू--तुम स्वयं; पृच्छसि--मुझसे पूछ रहे हो; मर्त्यानाम्‌--मर्त्यों के; मृत्यु-पाश--जन्म-मृत्यु की श्रृंखला; विशातनीम्‌--मोक्ष का स्त्रोत

महर्षि मैत्रेय ने कहा : हे योद्धा, तुम्हारे द्वारा की गई जिज्ञासा एक भक्त के अनुरूप है,क्योंकि इसका सम्बन्ध भगवान्‌ के अवतार से है।

वे मर्त्यों को जन्म-मृत्यु की श्रृंखला से मोक्षदिलाने वाले हैं।

ययोत्तानपदः पुत्रो मुनिना गीतयार्भकः ।

मृत्यो: कृत्वैव मूर्ध्न्यड्प्रिमारुरोह हरे: पदम्‌ ॥

६॥

यया--जिससे; उत्तानपदः--राजा उत्तानपाद; पुत्र:--पुत्र; मुनिना--मुनि द्वारा; गीतया--गाया जाकर; अर्भक:--शिशु;मृत्यो:--मृत्यु का; कृत्वा--रखते हुए; एव--निश्चय ही; मूर्थ्नि--सिर पर; अड्प्रिमू-पाँव; आरुरोह--चढ़ गया; हरे: --भगवान्‌ के; पदम्‌-- धाम तक।

इन कथाओं को मुनि ( नारद ) से सुनकर राजा उत्तानपाद का पुत्र ( ध्रुव ) भगवान्‌ के विषयमें प्रबुद्ध हो सका और मृत्यु के सिर पर पाँव रखते हुए वह भगवान्‌ के धाम पहुँच गया।

अथात्रापीतिहासोयं श्रुतो मे वर्णित: पुरा ।

ब्रह्मणा देवदेवेन देवानामनुपृच्छताम्‌ ॥

७॥

अथ--अब; अत्र--इस विषय में; अपि-- भी; इतिहास:--इतिहास; अयम्‌--यह; श्रुतः--सुना हुआ; मे--मेरे द्वारा; वर्णित: --वर्णित; पुरा--वर्षो बीते; ब्रह्मणा--ब्रह्मा द्वारा; देव-देवेन--देवताओं में अग्रणी; देवानामू--देवताओं द्वारा; अनुपृच्छताम्‌--पूछने पर

वराह रूप भगवान्‌ तथा हिरण्याक्ष असुर के मध्य युद्ध का यह इतिहास मैंने बहुत वर्षों पूर्वतब सुना था जब यह देवताओं के अग्रणी ब्रह्मा द्वारा अन्य देवताओं के पूछे जाने पर वर्णनकिया गया था।

दिति्दाक्षायणी क्षत्तर्मारीचं कश्यपं पतिम्‌ ।

अपत्यकामा चकमे सन्ध्यायां हच्छयार्दिता ॥

८॥

दिति:ः--दिति; दाक्षायणी--दक्ष कन्या; क्षत्त:--हे विदुर; मारीचम्‌--मरीचि का पुत्र; कश्यपम्‌--कश्यप से; पतिमू-- अपनेपति; अपत्य-कामा--सन्तान की इच्छुक; चकमे--इच्छा की; सन्ध्यायाम्‌--सायंकाल; हत्‌-शय--यौन इच्छा से; अर्दिता--पीड़ित

दक्ष-कन्या दिति ने कामेच्छा से पीड़ित होकर संध्या के समय अपने पति मरीचि पुत्र कश्यपसे सन्तान उत्पन्न करने के उद्देश्य से संभोग करने के लिए प्रार्थना की।

इष्ठाग्निजिह्नं पयसा पुरुषं यजुषां पतिम्‌ ।

निम्लोचत्यर्क आसीनमग्न्यगारे समाहितम्‌ ॥

९॥

इश्ला--पूजा करके; अग्नि--अग्नि; जिहम्‌-- जीभ को; पयसा--आहुति से; पुरुषम्‌--परम पुरुष को; यजुषाम्‌--समस्त यज्ञोंके; पतिम्‌--स्वामी; निम्लोचति--अस्त होते हुए; अर्के-- सूर्य; आसीनम्‌--बैठे हुए; अग्नि-अगारे--यज्ञशाला में;समाहितम्‌-पूर्णतया समाधि में |

सूर्य अस्त हो रहा था और मुनि भगवान्‌ विष्णु को, जिनकी जीभ यज्ञ की अग्नि है, आहुतिदेने के बाद समाधि में आसीन थे।

दितिरुवाचएष मां त्वत्कृते विद्वन्काम आत्तशरासन: ।

दुनोति दीनां विक्रम्य रम्भामिव मतड़ज: ॥

१०॥

दितिः उबाच--सुन्दरी दिति ने कहा; एष:--ये सब; माम्‌--मुझको; त्वत्‌ू-कृते--आपके लिए; विद्वनू--हे विद्वान; काम: --कामदेव; आत्त-शरासन:--अपने तीर लेकर; दुनोति--पीड़ित करता है; दीनाम्‌ू--मुझ दीना को; विक्रम्य--आक्रमण करके;रम्भामू-केले के वृक्ष पर; इब--सह्ृश; मतम्‌-गज: --उन्मत्त हाथी

उस स्थान पर सुन्दरी दिति ने अपनी इच्छा व्यक्त की : हे विद्वान, कामदेव अपने तीर लेकरमुझे बलपूर्वक उसी तरह सता रहा है, जिस तरह उन्मत्त हाथी एक केले के वृक्ष को झकझोरताहै।

तद्धवान्दह्ममानायां सपत्लीनां समृद्द्धिभि: ।

प्रजावतीनां भद्गं ते मय्यायुड्ुमनुग्रहम्‌ ॥

११॥

ततू--इसलिए; भवान्‌--आप; दह्ममानायाम्‌--सताई जा रही; स-पत्लीनाम्‌ू--सौतों की; समृद्द्धभि: --समृद्धि द्वारा; प्रजा-वतीनाम्‌--सन्तान वालियों की; भद्गमू--समस्त समृद्धि; ते--तुमको; मयि--मुझको; आयुद्धाम्‌--सभी तरह से, मुझपर करें;अनुग्रहम्‌ू--कृपा।

अतएव आपको मुझ पर पूर्ण दया दिखाते हुए मेरे प्रति कृपालु होना चाहिए मुझे पुत्र प्राप्तकरने की चाह है और मैं अपनी सौतों का ऐश्वर्य देखकर अत्यधिक व्यथित हूँ।

इस कृत्य कोकरने से आप सुखी हो सकेंगे।

भर्तर्याप्तीरुमानानां लोकानाविशते यश: ।

पतिर्भवद्विधो यासां प्रजया ननु जायते ॥

१२॥

भर्तरि--पति द्वारा; आप्त-उरुमानानामू्‌-- प्रेयसियों का; लोकानू--संसार में; आविशते--फैलता है; यश: --यश; पति:-- पति;भवत्ू-विध:--आपकी तरह; यासाम्‌--जिसकी; प्रजया--सन्तानों द्वारा; ननु--निश्चय ही; जायते--विस्तार करता है।

एक स्त्री अपने पति के आशीर्वाद से संसार में आदर पाती है और सन्‍्तानें होने से आप जैसा पतिप्रसिद्धि पाएगा, क्योंकि आप जीवों के विस्तार के निमित्त ही हैं।

पुरा पिता नो भगवान्दक्षो दुहितृवत्सल: ।

कं वृणीत वरं वत्सा इत्यपृच्छत नः पृथक्‌ ॥

१३॥

पुरा--बुहत काल पूर्व; पिता--पिता; न:--हमारा; भगवान्‌--अत्यन्त ऐश्वर्यवान्‌; दक्ष:--दक्ष; दुहितृ-वत्सलः --अपनी पुत्रियोंके प्रति स्नेहिल; कम्‌--किसको; वृणीत--तुम स्वीकार करना चाहते हो; वरम्‌--अपना पति; वत्सा:--हे मेरी सन्‍्तानो; इति--इस प्रकार; अपृच्छत--पूछा; न:--हमसे; पृथक्‌ू--अलग अलग

बहुत काल पूर्व अत्यन्त ऐश्वर्यवान हमारे पिता दक्ष ने, जो अपनी पुत्रियों के प्रति अत्यन्तवत्सल थे, हममें से हर एक को अलग अलग से पूछा कि तुम किसे अपने पति के रूप में चुननाचाहोगी।

स विदित्वात्मजानां नो भावं सनन्‍्तानभावन: ।

त्रयोदशाददात्तासां यास्ते शीलमनुत्रता: ॥

१४॥

सः--दक्ष; विदित्वा--समझ करके; आत्म-जानाम्‌--अपनी पुत्रियों के; न:--हमारा; भावम्‌--संकेत; सन्‍्तान--सन्तानों का;भावन:--हितैषी; त्रयोदश--तेरह; अददातू-- प्रदान किया; तासामू--उन सबों का; या:--जो हैं; ते--तुम्हारे; शीलम्‌--आचरण; अनुक्रता:--सभी आज्ञाकारिणी |

हमारे शुभाकांक्षी पिता दक्ष ने हमारे मनोभावों को जानकर अपनी तेरहों कन्याएँ आपकोसमर्पित कर दीं और तबसे हम सभी आपकी आज्ञाकारिणी रही हैं।

अथ मे कुरु कल्याणं कामं कमललोचन ।

आर्तेपसर्पणं भूमन्नमोघं हि महीयसि ॥

१५॥

अथ--इसलिए; मे--मेरा; कुरू--कीजिये; कल्याणम्‌--कल्याण; कामम्‌--इच्छा; कमल-लोचन--हे कमल सहश नेत्र वाले;आर्त--पीड़ित; उपसर्पणम्‌--निकट आना; भूमन्‌--हे महान्‌; अमोघम्‌--जो विफल न हो; हि--निश्चय ही; महीयसि--महापुरुष के प्रति।

है कमललोचन, कृपया मेरी इच्छा पूरी करके मुझे आशीर्वाद दें।

जब कोई त्रस्त होकरकिसी महापुरुष के पास पहुँचता है, तो उसकी याचना कभी भी व्यर्थ नहीं होनी चाहिए।

इति तां बीर मारीचः कृपणां बहुभाषिणीम्‌ ।

प्रत्याहानुनयन्वाचा प्रवृद्धानड्रकश्मलाम्‌ ॥

१६॥

इति--इस प्रकार; तामू--उस; वीर--हे वीर; मारीच: --मरीचि पुत्र ( कश्यप ); कृपणाम्‌--निर्धन को; बहु-भाषिणीम्‌--अत्यधिक बातूनी को; प्रत्याह--उत्तर दिया; अनुनयन्‌--शान्त करते हुए; वाचा--शब्दों से; प्रवृद्ध--अत्यधिक उत्तेजित;अनड्ु--कामवासना; कश्मलामू--दूषित |

हे वीर ( विदुर ), इस तरह कामवासना के कल्मष से ग्रस्त, और इसलिए असहाय एवंबड़बड़ाती हुई दिति को मरीचिपुत्र ने समुचित शब्दों से शान्त किया।

एघ तेहं विधास्यामि प्रियं भीरु यदिच्छसि ।

तस्या: कामं॑ न कः कुर्यात्सिद्धिस्त्रेवर्गिकी यत: ॥

१७॥

एष:--यह; ते--तुम्हारी विनती; अहम्‌--मैं; विधास्थामि--सम्पन्न करूँगा; प्रियम्‌--अत्यन्त प्रिय; भीरू--हे डरी हुई; यत्‌--जो; इच्छसि--तुम चाह रही हो; तस्या:--उसकी ; कामम्‌--इच्छाएँ; न--नहीं; कः-- कौन; कुर्यात्‌ू--करेगा; सिद्धि: --मुक्तिकी सिद्धि; त्रैवर्गिकी-- तीन; यतः--जिससे |

हे भीरु, तुम्हें जो भी इच्छा प्रिय हो उसे मैं तुरन्त तृप्त करूँगा, क्योंकि तुम्हारे अतिरिक्तमुक्ति की तीन सिद्धियों का स्रोत और कौन है?

सर्वाश्रमानुपादाय सवा श्रमेण कलत्रवान्‌ ।

व्यसनार्णवमत्येति जलयानैर्यथार्णवम्‌ ॥

१८ ॥

सर्व--समस्त; आश्रमान्‌--सामाजिक व्यवस्थाओं, आश्रमों को; उपादाय--पूर्ण करके; स्व--अपने; आश्रमेण-- आश्रमों केद्वारा; कलत्र-वान्‌ू--अपनी पत्नी के साथ रहने वाला व्यक्ति; व्यसन-अर्गवम्‌--संसार रूपी भयावह सागर; अत्येति--पार करसकता है; जल-यानै:--समुद्री जहाजों द्वारा; यथा--जिस तरह; अर्णवम्‌--समुद्र को

जिस तरह जहाजों के द्वारा समुद्र को पार किया जा सकता है उसी तरह मनुष्य पत्नी के साथरहते हुए भवसागर की भयावह स्थिति से पार हो सकता है।

यामाहुरात्मनो ह्ार्थ श्रेयस्कामस्थ मानिनि ।

यस्यां स्वधुरमध्यस्य पुमां श्वरति विज्वर: ॥

१९॥

याम्‌--जिस पत्नी को; आहुः--कहा जाता है; आत्मन:--शरीर का; हि--इस प्रकार; अर्धम्‌--आधा; श्रेय:--कल्याण;कामस्य--सारी इच्छाओं का; मानिनि--हे आदरणीया; यस्याम्‌--जिसमें; स्व-धुरम्‌--सारे उत्तरदायित्व; अध्यस्य--सौंपकर;पुमान्‌--पुरुष; चरति--भ्रमण करता है; विज्वर: --निश्चिन्तहै

आदरणीया, पत्नी इतनी सहायताप्रद होती है कि वह मनुष्य के शरीर की अर्धांगिनीकहलाती है, क्योंकि वह समस्त शुभ कार्यों में हाथ बँटाती है।

पुरुष अपनी पत्नी परजिम्मेदारियों का सारा भार डालकर निश्चिन्त होकर विचरण कर सकता है।

यामाश्रित्येन्द्रियारातीन्दुर्जयानितरा श्रमै: ।

वयं जयेम हेलाभिर्दस्यून्दुर्गपतिर्यथा ॥

२०॥

याम्‌ू--जिसको; आश्नित्य--आश्रय बनाकर; इन्द्रिय--इन्द्रियाँ; अरातीन्‌--शत्रुगण; दुर्जवान्‌ू--जीत पाना कठिन; इतर--गृहस्थों के अतिरिक्त; आश्रमैः--आश्रमों द्वारा; वबम्‌--हम; जयेम--जीत सकते हैं; हेलाभि:-- आसानी से; दस्यून्‌--आक्रमणकारी लुटेरों को; दुर्ग-पति:--किले का सेनानायक; यथा--जिस तरह |

जिस तरह किले का सेनापति आक्रमणकारी लुटेरों को बहुत आसानी से जीत लेता है उसीतरह पत्नी का आश्रय लेकर मनुष्य उन इन्द्रियों को जीत सकता है, जो अन्य आश्रमों में अजेयहोती हैं।

न वयं प्रभवस्तां त्वामनुकर्तु गृहे श्वरि ।

अप्यायुषा वा कार्त्स्येन ये चान्ये गुणगृध्नवः ॥

२१॥

न--कभी नहीं; वयम्‌--हम; प्रभव:--समर्थ हैं; तामू--उस; त्वामू--तुमको; अनुकर्तुमू--वही करने के लिए; गृह-ईश्वरि--हेघर की रानी; अपि--के बावजूद; आयुषा--आयु के द्वारा; वा--अथवा ( अगले जन्म में ); कार्त्स्येन--सम्पूर्ण; ये--जो;च--भी; अन्ये-- अन्य; गुण-गृध्नव: --गुणों को पहचानने वाले।

हे घर की रानी, हम न तो तुम्हारी तरह कार्य करने में सक्षम हैं, न ही तुमने जो कुछ किया हैउससे उऋण हो सकते हैं, चाहे हम अपने जीवन भर या मृत्यु के बाद भी कार्य करते रहें।

तुमसे उऋण हो पाना उन लोगों के लिए भी असम्भव है, जो निजी गुणों के प्रशंसक होते हैं।

अथापि काममेतं ते प्रजात्ये करवाण्यलम्‌ ।

यथा मां नातिरोचन्ति मुहूर्त प्रतिपालय ॥

२२॥

अथ अपि--यद्यपि ( यह सम्भव नहीं है ); कामम्‌--यह कामेच्छा; एतम्‌--जैसी है; ते--तुम्हारा; प्रजात्यै--सन्तानों के लिए;करवाणि--मुझे करने दें; अलमू--बिना विलम्ब किये; यथा--जिस तरह; माम्‌--मुझको; न--नहीं; अतिरोचन्ति--निन्दा करें;मुहूर्तम्‌--कुछ क्षण; प्रतिपालय--प्रतीक्षा करो।

यद्यपि मैं तुम्हारे ऋण से उक्रण नहीं हो सकता, किन्तु मैं सन्‍्तान उत्पन्न करने के लिए तुम्हारीकामेच्छा को तुरन्त तुष्ट करूँगा।

किन्तु तुम केवल कुछ क्षणों तक प्रतीक्षा करो जिससे अन्यलोग मेरी भर्त्सना न कर सकें।

एषा घोरतमा वेला घोराणां घोरदर्शना ।

चरन्ति यस्यां भूतानि भूतेशानुचराणि ह ॥

२३॥

एषा--यह समय; घोर-तमा--सर्वाधिक भयावनी; वेला--घड़ी; घोराणाम्‌-- भयावने का; घोर-दर्शना-- भयावनी लगनेवाली;चरन्ति--विचरण करते हैं; यस्याम्‌--जिसमें; भूतानि-- भूत-प्रेत; भूत-ईश-- भूतों के स्वामी; अनुचराणि--नित्यसंगी; ह--निस्सन्देह।

यह विशिष्ट वेला अतीव अशुभ है, क्योंकि इस बेला में भयावने दिखने वाले भूत तथा भूतोंके स्वामी के नित्य संगी दृष्टिगोचर होते हैं।

एतस्यां साध्वि सन्ध्यायां भगवान्भूतभावन: ।

परीतो भूतपर्षद्धिर्वेषेणाटति भूतराट्‌ ॥

२४॥

एतस्याम्‌--इस वेला में; साध्वि--हे सती; सन्ध्यायाम्‌ू--दिन तथा रात के सन्धिकाल में ( संध्या समय ); भगवानू-- भगवान्‌;भूत-भावन: --भूतों के हितैषी; परीतः--घिरे हुए; भूत-पर्षद्धिः--भूतों के संगियों से; वृषेण--बैल की पीठ पर; अटति--भ्रमण करता है; भूत-राट्‌--भूतों का राजा

इस वेला में भूतों के राजा शिवजी, अपने वाहन बैल की पीठ पर बैठकर उन भूतों के साथविचरण करते हैं, जो अपने कल्याण के लिए उनका अनुगमन करते हैं।

एमशानचक्रानिलधूलिधूम्रविकीर्णविद्योतजटाकलाप: ।

भस्मावगुण्ठामलरुक्मदेहोदेवस्त्रिभि: पश्यति देवरस्ते ॥

२५॥

श्मशान--श्मशान भूमि; चक्र-अनिल--बवंडर; धूलि-- धूल; धूम्र-- धुआँ; विकीर्ण-विद्योत--सौन्दर्य के ऊपर पुता हुआ;जटा-कलापः--जटाओं के गुच्छे; भस्म--राख; अवगुण्ठ--से ढका; अमल--निष्कलंक; रुक्म--लाल; देह:--शरीर;देव:ः--देवता; त्रिभिः--तीन आँखों वाला; पश्यति--देखता है; देवर:--पति का छोटा भाई; ते--तुम्हारा

शिवजी का शरीर लालाभ है और वह निष्कलुष है, किन्तु वे उस पर राख पोते रहते हैं।

उनकी जटा एमशान भूमि की बवंडर की धूल से धूसरित रहती है।

वे तुम्हारे पति के छोटे भाईहैं--और वे अपने तीन नेत्रों से देखते हैं।

न यस्य लोके स्वजन: परो वानात्याहतो नोत कश्रिद्दिगहा: ।

वयं ब्रतैर्यच्चरणापविद्धा-माशास्महेजां बत भुक्तभोगाम्‌ ॥

२६॥

न--कभी नहीं; यस्य--जिसका; लोके --संसार में; स्व-जन:-- अपना; पर: --पराया; वा--न तो; न--न ही; अति-- अधिक;आहतः--अनुकूल; न--नहीं; उत--अथवा; कश्चित्‌--कोई; विगर्ह:-- अपराधी; वयम्‌--हम; ब्रतैः --ब्रतों के द्वारा; यत्‌ू--जिसके; चरण--पाँव; अपविद्धाम्‌--तिरस्कृत; आशास्महे--सादर पूजा करते हैं; अजाम्‌--महा-प्रसाद; बत--निश्चय ही;भुक्त-भोगाम्‌--उच्छिष्ट भोजन |

शिवजी किसी को भी अपना सम्बन्धी नहीं मानते फिर भी ऐसा कोई भी नहीं है, जो उनसेसम्बन्धित न हो।

वे किसी को न तो अति अनुकूल, न ही निन्दनीय मानते हैं।

हम उनके उच्छिष्टभोजन की सादर पूजा करते हैं और वे जिसका तिरस्कार करते हैं उसको हम शीश झुका करस्वीकार करते हैं।

यस्यानवद्याचरितं मनीषिणोगुणन्त्यविद्यापटलं बिभित्सव: ।

निरस्तसाम्यातिशयोपि यत्स्वयंपिशाचचर्यामचरद्गति: सताम्‌ ॥

२७॥

यस्य--जिसका; अनवद्य--अनिंद्य; आचरितम्‌-- चरित्र; मनीषिण:--बड़े बड़े मुनिगण; गृणन्ति-- अनुगमन करते हैं;अविद्या--अज्ञान; पटलम्‌--पिंड; बिभित्सव:--उखाड़ फेंकने के लिए इच्छुक; निरस्त--निरस्त किया हुआ; साम्य--समता;अतिशयः--महानता; अपि--के बावजूद; यत्‌--क्योंकि; स्वयम्‌--स्वयं; पिशाच--पिशाच, शैतान; चर्याम्‌--कार्यकलाप;अचरत्‌--सम्पन्न किया; गति:--गन्तव्य; सताम्‌ू-- भगवद्भक्तों का।

यद्यपि भौतिक जगत में न तो कोई भगवान्‌ शिव के बराबर है, न उनसे बढ़कर है औरअविद्या के समूह को छिन्न-भिन्न करने के लिए उनके अनिंद्य चरित्र का महात्माओं द्वाराअनुसरण किया जाता है फिर भी वे सारे भगवदभक्तों को मोक्ष प्रदान करने के लिए ऐसे बनेरहते हैं जैसे कोई पिशाच हो।

हसन्ति यस्याचरितं हि दुर्भगाःस्वात्मच्रतस्थाविदुष: समीहितम्‌ ।

यैर्वस्त्रमाल्याभरणानुलेपनै:श्रभोजनं स्वात्मतयोपलालितम्‌ ॥

२८ ॥

हसन्ति--हँसते हैं; यस्थ--जिसका; आचरितम्‌--कार्य; हि--निश्चय ही; दुर्भगा: --अभागे; स्व-आत्मन्‌--अपने में; रतस्य--संलग्न रहने वाले का; अविदुष:--न जानने वाला; समीहितम्‌--उसका उद्देश्य; यैः--जिसके द्वारा; वस्त्र--वस्त्र; माल्य--मालाएँ; आभरण--आभूषण; अनु--ऐसे विलासी; लेपनैः:--लेप से; श्र-भोजनम्‌--कुत्तों का भोजन; स्व-आत्मतया--मानोस्वयं; उपलालितम्‌--लाड़-प्यार किया गया।

अभागे मूर्ख व्यक्ति यह न जानते हुए कि वे अपने में मस्त रहते हैं उन पर हँसते हैं।

ऐसे मूर्खव्यक्ति अपने उस शरीर को जो कुत्तों द्वारा खाये जाने योग्य है वस्त्र, आभूषण, माला तथा लेप सेसजाने में लगे रहते हैं।

ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपालायत्कारणं विश्वमिदं च माया ।

आज्ञाकरी यस्य पिशाचचर्याअहो विभूम्नश्वरितं विडम्बनम्‌ ॥

२९॥

ब्रह्य-आदय: --ब्रह्मा जैसे देवतागण; यत्‌--जिसका; कृत--कार्यकलाप; सेतु--धार्मिक अनुष्ठान; पाला:--पालने वाले;यत्‌--जो है; कारणम्‌--उद्गम; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड का; इृदम्‌--इस; च-- भी; माया-- भौतिक शक्ति; आज्ञा-करी-- आदेशपूरा करने वाला; यस्थय--जिसका; पिशाच--शैतानवत्‌; चर्या--कर्म; अहो-हे प्रभु; विभूम्न:--महान्‌ का; चरितम्‌--चरित्र;विडम्बनम्‌--केवल विडम्बना |

ब्रह्मा जैसे देवता भी उनके द्वारा अपनाये जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों का पालन करते हैं।

वेउस भौतिक शक्ति के नियन्ता हैं, जो भौतिक जगत का सृजन करती है।

वे महान्‌ हैं, अतएवउनके पिशाचवत्‌ गुण मात्र विडम्बना हैं।

मैत्रेय उवाचसैवं संविदिते भर्त्रां मन्मथोन्मथितेन्द्रिया ।

जग्राह वासो ब्रह्मर्षेवृषघलीव गतत्रपा ॥

३०॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय ने कहा; सा--वह; एवम्‌--इस प्रकार; संविदिते--सूचित किए जाने पर भी; भर्त्रा--पति द्वारा; मन्मथ--कामदेव द्वारा; उनन्‍्मधित--विवश की गई; इन्द्रिया--इन्द्रियों के द्वारा; जग्राह--पकड़ लिया; वास:--वस्त्र; ब्रह्म-ऋषे:--उसमहान्‌ ब्राह्मण ऋषि का; वृषली--वेश्या; इब--सहृश; गत-त्रपा--लज्जारहित

मैत्रेय ने कहा : इस तरह दिति अपने पति द्वारा सूचित की गई, किन्तु वह संभोग-तुष्टि हेतुकामदेव द्वारा विवश कर दी गई।

उसने उस महान्‌ ब्राह्मण ऋषि का वस्त्र पकड़ लिया जिस तरहएक निर्लज् वेश्या करती है।

स विदित्वाथ भार्यायास्तं निर्बन्धं विकर्मणि ।

नत्वा दिष्टाय रहसि तयाथोपविवेश हि ॥

३१॥

सः--उसने; विदित्वा--समझकर; अथ--तत्पश्चात्‌; भार्याया:-- पत्नी की; तम्‌--उस; निर्बन्धम्‌--जड़ता या दुराग्रह को;विकर्मणि--निषिद्ध कार्य में; नत्वा--नमस्कार करके; दिष्टाय--पूज्य भाग्य को; रहसि--एकान्त स्थान में; तया--उसके साथ;अथ--इस प्रकार; उपविवेश--लेट गया; हि--निश्चय ही |

अपनी पली के मन्तव्य को समझकर उन्हें वह निषिद्ध कार्य करना पड़ा और तब पूज्यप्रारब्ध को नमस्कार करके वे उसके साथ एकान्त स्थान में लेट गये।

अथोपस्पृश्य सलिलं प्राणानायम्य वाग्यतः ।

ध्यायज्जजाप विरजं ब्रह्म ज्योति: सनातनम्‌ ॥

३२॥

अथ--त्पश्चात्‌; उपस्पृश्य--जल का स्पर्श करके या जल में स्नान करके; सलिलम्‌--जल; प्राणान्‌ आयम्य--समाधि काअभ्यास करके; वाक्‌ू-यतः--वाणी को नियंत्रित करते हुए; ध्यायन्‌-- ध्यान करते हुए; जजाप--मुख के भीतर जप किया;विरजम्‌--शुद्ध; ब्रह्म -- गायत्री मंत्र; ज्योतिः--तेज; सनातनम्‌--नित्य |

तत्पश्चात्‌ उस ब्राह्मण ने जल में स्नान किया और समाधि में नित्य तेज का ध्यान करते हुएतथा मुख के भीतर पवित्र गायत्री मंत्र का जप करते हुए अपनी वाणी को वश में किया।

दितिस्तु ब्रीडिता तेन कर्मावद्चेन भारत ।

उपसडूुम्य विप्रर्षिमधोमुख्यभ्यभाषत ॥

३३॥

दिति:--कश्यप-पत्ली दिति ने; तु--लेकिन; ब्रीडिता--लज्जित; तेन--उस; कर्म--कार्य से; अवद्येन--दोषपूर्ण; भारत--हेभरतवंश के पुत्र; उपसड्रम्ध--पास जाकर; विप्र-ऋषिम्‌--ब्राह्मण ऋषि के; अध: -मुखी -- अपना मुख नीचे किये;अभ्यभाषत--विनप्र होकर कहा।

है भारत, इसके बाद दिति अपने पति के और निकट गई।

उसका मुख दोषपूर्ण कृत्य केकारण झुका हुआ था।

उसने इस प्रकार कहा।

दितिरुवाचन मे गर्भमिमं ब्रह्मन्भूतानामृषभो उवधीत्‌ ।

रुद्र: पतिरह्हि भूतानां यस्याकरवमंहसम्‌ ॥

३४॥

दितिः उबाच--सुन्दरी दिति ने कहा; न--नहीं; मे--मेरा; गर्भमू--गर्भ; इमम्‌--यह; ब्रह्मनू--हे ब्राह्मण; भूतानाम्‌--सारे जीवोंका; ऋषभः --सारे जीवों में सबसे नेक; अवधीतू--मार डाले; रुद्र:--शिवजी; पति:--स्वामी; हि--निश्चय ही; भूतानाम्‌--सारे जीवों का; यस्थ--जिसका; अकरवम्‌--मैंने किया है; अंहसम्‌--अपराध |

सुन्दरी दिति ने कहा : हे ब्राह्मण, कृपया ध्यान रखें कि समस्त जीवों के स्वामी भगवान्‌शिव द्वारा मेरा यह गर्भ नष्ट न किया जाय, क्योंकि मैंने उनके प्रति महान्‌ अपराध किया है।

नमो रुद्राय महते देवायोग्राय मीदुषे ।

शिवाय न्यस्तदण्डाय धृतदण्डाय मन्यवे ॥

३५॥

नमः--नमस्कार; रुद्राय--क्रुद्ध शिवजी को; महते--महान्‌ को; देवाय--देवता को; उमग्राय--उग्र को; मीढुषे--समस्तइच्छाओं को पूरा करने वाले को; शिवाय--सर्व कल्याण-कर को; न्यस्त-दण्डाय-- क्षमा करने वाले को; धृत-दण्डाय--तुरन्तदण्ड देने वाले को; मन्यवे--क्रुद्ध को |

मैं उन क्रुद्ध शिवजी को नमस्कार करती हूँ जो एक ही साथ अत्यन्त उग्र महादेव तथा समस्तइच्छाओं को पूरा करने वाले हैं।

वे सर्वकल्याणप्रद तथा क्षमाशील हैं, किन्तु उनका क्रोध उन्हेंतुरन्त ही दण्ड देने के लिए चलायमान कर सकता है।

स नः प्रसीदतां भामो भगवानुर्वनुग्रह: ।

व्याधस्याप्यनुकम्प्यानां स्त्रीणां देव: सतीपति: ॥

३६॥

सः--वह; न:--हम पर; प्रसीदताम्‌--प्रसन्न हों; भाम:--बहनोई; भगवान्‌--समस्त एऐश्वर्यों वाले व्यक्ति; उरू--अति महान;अनुग्रह:--कृपालु; व्याधस्य--शिकारी का; अपि--भी; अनुकम्प्यानाम्‌ू--कृपा के पात्रों का; स्त्रीणाम्‌--स्त्रियों के; देव: --आराध्य स्वामी; सती-पति:--सती ( साध्वी ) के पति।

वे हम पर प्रसन्न हों, क्योंकि वे मेरी बहिन सती के पति, मेरे बहनोई हैं।

वे समस्त स्त्रियों केआशध्य देव भी हैं।

वे समस्त ऐश्वर्यों के व्यक्ति हैं और उन स्त्रियों के प्रति कृपा प्रदर्शित करसकते हैं, जिन्हें असभ्य शिकारी भी क्षमा कर देते हैं।

मैत्रेय उवाचस्वसर्गस्याशिषं लोक्यामाशासानां प्रवेपतीम्‌ ।

निवृत्तसन्ध्यानियमो भार्यामाह प्रजापति: ॥

३७॥

मैत्रेयः उवाच--महर्षि मैत्रेय ने कहा; स्व-सर्गस्थ--अपनी ही सन्‍्तानों का; आशिषम्‌--कल्याण; लोक्याम्‌--संसार में;आशासानाम्‌--इच्छा करते हुए; प्रवेपतीम्‌--काँपते हुए; निवृत्त--टाल दिया; सन्ध्या-नियम:--संध्याकालीन विधि-विधान;भार्यामू--पत्नी से; आह--कहा; प्रजापति:--जनक ।

मैत्रेय ने कहा : तब महर्षि कश्यप ने अपनी पत्नी को सम्बोधित किया जो इस भय से काँपरही थी कि उसके पति का अपमान हुआ है।

वह समझ गई कि उन्हें संध्याकालीन प्रार्थना करनेके नैत्यिक कर्म से विरत होना पड़ा है, फिर भी वह संसार में अपनी सनन्‍्तानों का कल्याण चाहतीथी।

कश्यप उबाचअप्रायत्यादात्मनस्ते दोषान्मौहूर्तिकादुत ।

मन्निदेशातिचारेण देवानां चातिहेलनात्‌ ॥

३८॥

कश्यप: उवाच--विद्वान ब्राह्मण कश्यप ने कहा; अप्रायत्यात्‌ू--दूषण के कारण; आत्मन:--मन के; ते--तुम्हारे; दोषात्‌ --अपवित्र होने; मौहूर्तिकात्‌--मुहूर्त भर में; उत-- भी; मत्‌--मेरा; निदेश--निर्देश; अतिचारेण--अत्यधिक उपेक्षा करने से;देवानामू--देवताओं का; च-- भी; अतिहेलनात्‌--- अत्यधिक अवहेलित होकर ।

विद्वान कश्यप ने कहा : तुम्हारा मन दूषित होने, मुहूर्त विशेष के अपवित्र होने, मेरे निर्देशोंकी तुम्हारे द्वारा उपेक्षा किये जाने तथा तुम्हारे द्वारा देवताओं की अवहेलना होने से सारी बातेंअशुभ थीं।

भविष्यतस्तवाभद्रावभद्रे जाठराधमौ ।

लोकान्सपालांस्त्रीं श्रण्डि मुहुराक्रन्दयिष्यत:ः ॥

३९॥

भविष्यत: --जन्म लेगा; तब--तुम्हारा; अभद्रौ --दो अभद्र पुत्र; अभद्रे--हे अभागिन; जाठर-अधमौ--निन्दनीय गर्भ से उत्पन्न;लोकानू--सारे लोकों; स-पालान्‌--उनके शासकों समेत; त्रीन्‌--तीन; चण्डि--गर्वीली; मुहुः--निरन्तर; आक्रनू-दयिष्यत: --शोक के कारण बनेंगे।

हे अभिमानी स्त्री! तुम्हारे निंदित गर्भ से दो अभद्र पुत्र उत्पन्न होंगे।

अरी अभागिन! वे तीनोंलोकों के लिए निरन्तर शोक का कारण बनेंगे।

प्राणिनां हन्यमानानां दीनानामकृतागसाम्‌ ।

स्त्रीणां निगृह्ममाणानां कोपितेषु महात्मसु ॥

४०॥

प्राणिनामू--जब जीवों का; हन्यमानानाम्‌--मारे जाते हुए; दीनानामू--दीनों का; अकृत-आगसाम्‌--निर्दोषों का; स्त्रीणाम्‌--स्त्रियों का; निगृह्ममाणानाम्‌--सताये जाते हुओं का; कोपितेषु--क्रुद्ध हुओं का; महात्मसु--महात्माओं का।

वे दीन, निर्दोष जीवों का वध करेंगे, स्त्रियों को सताएँगे तथा महात्माओं को क्रोधित करेंगे।

तदा विश्वेश्वरः क्रुद्धो भगवाल्लोकभावन: ।

हनिष्यत्यवतीर्यासौ यथाद्रीन्शतपर्वधृक्‌ू ॥

४१॥

तदा--उस समय; विश्व-ई श्र: -- ब्रह्माण्ड के स्वामी; क्रुद्ध:--अतीव क्रोध में; भगवान्‌-- भगवान्‌; लोक-भावन:--सामान्यजनों का कल्याण चाहने वाले; हनिष्यति--वध करेगा; अवतीर्य--स्वयं अवतरित होकर; असौ--वह; यथा--मानो; अद्रीन्‌--पर्वतों को; शत-पर्व-धृक्‌ू--वज् का नियन्ता ( इन्द्र ) |

उस समय ब्रह्माण्ड के स्वामी पुरुषोत्तम भगवान्‌ जो कि समस्त जीवों के हितैषी हैं अवतरितहोंगे और उनका इस तरह वध करेंगे जिस तरह इन्द्र अपने वज्ज से पर्वतों को ध्वस्त कर देता है।

दितिरुवाचवधं भगवता साक्षात्सुनाभोदारबाहुना ।

आशसे पुत्रयोर्महां मा क्रुद्धाद्राह्मणादप्रभो ॥

४२॥

दितिः उबाच--दिति ने कहा; वधम्‌--मारा जाना; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष रूप से; सुनाभ--अपने सुदर्शनअक्र द्वारा; उदार--अत्यन्त उदार; बाहुना--बाहों द्वारा; आशासे-- मेरी इच्छा है; पुत्रयोः--पुत्रों की; महाम्‌--मेरे; मा--क भीऐसा न हो; क्रुद्धात्‌-क्रोध से; ब्राह्मणात्‌--ब्राह्मण के; प्रभो--हे पति।

दिति ने कहा: यह तो अति उत्तम है कि मेरे पुत्र भगवान्‌ द्वारा उनके सुदर्शन चक्र सेउदारतापूर्वक मारे जायेंगे।

हे मेरे पति, वे ब्राह्मण-भक्तों के क्रोध से कभी न मारे जाँय।

श़" न ब्रह्मठण्डदग्धस्य न भूतभयदस्य च ।

नारकाश्चानुगृहन्ति यां यां योनिमसौ गत: ॥

४३॥

न--कभी नहीं; ब्रह्म-दण्ड--ब्राह्मण द्वारा दिया गया दण्ड; दग्धस्य--इस तरह से दण्डित होने वाले का; न--न तो; भूत-भय-दस्य--उसका, जो जीवों को सदा डराता रहता है; च-- भी; नारका:--नरक जाने वाले; च--भी; अनुगृहन्ति--कोई अनुग्रहकरते हैं; याम्‌ यामू--जिस जिस को; योनिमू--जीव योनि को; असौ--अपराधी; गत:--जाता है|

जो व्यक्ति ब्राह्मण द्वारा तिरस्कृत किया जाता है या जो अन्य जीवों के लिए सदैव भयप्रदबना रहता है, उसका पक्ष न तो पहले से नरक में रहने वालों द्वारा, न ही उन योनियों में रहनेवालों द्वारा लिया जाता है, जिसमें वह जन्म लेता है।

कश्यप उबाचकृतशोकानुतापेन सद्य: प्रत्यवमर्शनात्‌ ।

भगवत्युरुमानाच्च भवे मय्यपि चादरात्‌ू ॥

४४॥

पुत्रस्यैव च पुत्राणां भवितैक: सतां मतः ।

गास्यन्ति यद्यशः शुद्ध भगवद्यशसा समम्‌ ॥

४५ ॥

कश्यप: उवाच--विद्वान कश्यप ने कहा; कृत-शोक--शोक कर चुकने पर; अनुतापेन--पक्चात्ताप द्वारा; सद्यः--तुरन्त;प्रत्यवरमर्शनात्‌--उचित विचार-विमर्श द्वारा; भगवति-- भगवान्‌ के प्रति; उरू--अत्यधिक; मानात्‌-- प्रशंसा; च--तथा; भवे--शिव के प्रति; मयि अपि--मुझको भी; च--तथा; आदरात्‌ू--आदर से; पुत्रस्य--पुत्र का; एब--निश्चय ही; च--तथा;पुत्राणाम्‌--पुत्रों का; भविता--उत्पन्न होगा; एक:--एक; सताम्‌-- भक्तों का; मतः--अनुमोदित; गास्यन्ति--प्रचार करेगा;यत्‌--जिसको; यशः--ख्याति; शुद्धम्‌-दिव्य; भगवत्‌-- भगवान्‌ को; यशसा--ख्याति से; समम्‌ू--समान रूप से।

विद्वान कश्यप ने कहा : तुम्हारे शोक, पश्चात्ताप तथा समुचित वार्तालाप के कारण तथापूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ में तुम्हारी अविचल श्रद्धा एवं शिवजी तथा मेरे प्रति तुम्हारी प्रशंसा केकारण भी तुम्हारे पुत्र ( हिरण्यकशिपु ) का एक पुत्र ( प्रह्द ) भगवान्‌ द्वारा अनुमोदित भक्तहोगा और उसकी ख्याति भगवान्‌ के ही समान प्रचारित होगी।

योगैह्मेव दुर्वर्ण भावयिष्यन्ति साधव: ।

निर्वेरादिभिरात्मानं यच्छीलमनुवर्तितुम्‌ ॥

४६॥

योगै:--शुद्द्रिकरण की विधि से; हेम--सोना; इब--सहश ; दुर्वर्णप्‌--निम्न गुण; भावयिष्यन्ति--शुद्ध कर देगा; साधव:--साधु पुरुष; निर्वैर-आदिभि:--शत्रुता इत्यादि से मुक्त होने के अभ्यास से; आत्मानम्‌--आत्मा; यत्‌ू--जिसका; शीलम्‌--चरित्र; अनुवर्तितुमू--चरणचिह्नों का अनुगमन करना |

उसके पदचिन्हों का अनुसरण करने के लिए सन्त पुरुष शत्रुता से मुक्त होने का अभ्यासकरके उसके चरित्र को आत्मसात्‌ करना चाहेंगे जिस तरह शुद्द्विकरण की विधियाँ निम्न गुणवाले सोने को शुद्ध कर देती हैं।

यत्प्रसादादिदं विश्व प्रसीदति यदात्मकम्‌ ।

स स्वहग्भगवान्यस्य तोष्यतेनन्यया हशा ॥

४७॥

यत्‌--जिसके; प्रसादात्‌ू-कृपा से; इदम्‌--यह; विश्वम्‌--ब्रह्माण्ड; प्रसीदति--सुखी बनता है; यत्‌--जिसके; आत्मकम्‌--सर्वव्यापक होने से; सः--वह; स्व-हक्‌--अपने भक्तों की विशेष परवाह करने वाले; भगवान्‌-- भगवान्‌; यस्य--जिसका;तोष्यते--प्रसन्न होता है; अनन्यया--बिना विचलन के; दृशा--बुद्धि से

हर व्यक्ति उनसे प्रसन्न रहेगा, क्योंकि ब्रह्माण्ड के परम नियन्ता भगवान्‌ सदैव ऐसे भक्त सेतुष्ट रहते हैं, जो उनके अतिरिक्त और किसी वस्तु की इच्छा नहीं करता।

सब महाभागवतो महात्मामहानुभावो महतां महिष्ठ: ।

प्रवृद्धभकत्या ह्मनुभाविताशयेनिवेश्य वैकुण्ठमिमं विहास्यति ॥

४८॥

सः--वह; वै--निश्चय ही; महा-भागवतः--सर्वोच्च भक्त; महा-आत्मा--विशाल बुद्द्धि; महा-अनुभाव:--विशाल प्रभाव;महताम्‌--महात्माओं का; महिष्ठ:--सर्वोच्च; प्रवृद्ध--पूर्णतया प्रौढ़; भक्त्या--भक्ति से; हि--निश्चय ही; अनुभावित-- भावकी अनुभाव दशा को प्राप्त: आशये--मन में; निवेश्य--प्रवेश करके; वैकुण्ठम्‌-- आध्यात्मिक आकाश में; इमम्‌--इसको( भौतिक जगत ) को; विहास्यति--छोड़ देगा।

भगवान्‌ का सर्वोच्च भक्त विशाल बुद्धि तथा विशाल प्रभाव वाला होगा और महात्माओं मेंसबसे महान्‌ होगा।

परिपक्व भक्तियोग के कारण वह निश्चय ही दिव्य भाव में स्थित होगा औरइस संसार को छोड़ने पर बैकुण्ठ में प्रवेश करेगा।

अलम्पट: शीलधरो गुणाकरोहृष्टः परद्धर्या व्यथितो दुःखितेषु ।

अभूतशत्रुर्जगतः शोकहर्तानैदाधिकं तापमिवोडुराज: ॥

४९॥

अलम्पट:--पुण्यशील; शील-धर: --योग्य; गुण-आकरः--समस्त सदगुणों की खान; हृष्ट:--प्रसन्न; पर-ऋद्धयधा--अन्य केसुख से; व्यथित:ः--दुखी; दुःखितेषु--अन्यों के दुख में; अभूत-शत्रु;--शत्रुरहित, अजातशत्रु; जगत:--सारे ब्रह्माण्डका;शोक-हर्ता--शोक का विनाशक; नैदाधिकम्‌--ग्रीष्मकालीन घाम से; तापम्‌--कष्ट; इब--सहृश; उडु-राज:-- चन्द्रमा |

वह समस्त सदगुणों का अतीव सुयोग्य आगार होगा, वह प्रसन्न रहेगा और अन्यों के सुख मेंसुखी, अन्यों के दुख में दुखी होगा तथा उसका एक भी शत्रु नहीं होगा।

वह सारे ब्रह्माण्डों केशोक का उसी तरह नाश करने वाला होगा जिस तरह ग्रीष्मकालीन सूर्य के बाद सुहावनाचन्द्रमा ।

अन्तर्बहिश्चामलमब्जनेत्रंस्वपूरुषेच्छानुगृहीतरूपम्‌ ।

पौत्रस्तव श्रीललनाललामंद्रष्टा स्फुरत्कुण्डलमण्डिताननम्‌ ॥

५०॥

अन्तः-- भीतर से; बहि:--बाहर से; च-- भी; अमलम्‌--निर्मल; अब्ज-नेत्रमू--कमल नेत्र; स्व-पूरुष--अपना भक्त; इच्छा-अनुगृहीत-रूपम्‌--इच्छानुरूप शरीर धारण करके; पौत्र:--नाती; तब--तुम्हारा; श्री-ललना--सुन्दर लक्ष्मीजी; ललामम्‌--अलंकृत; द्रष्टा--देखेगा; स्फुरत्‌-कुण्डल--चमकीले कुंडलों से; मण्डित--सुशोभित; आननम्‌--मुख |

तुम्हारा पौत्र भीतर तथा बाहर से उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ का दर्शन कर सकेगा जिन की पत्नी सुन्दरी लक्ष्मीजी हैं।

भगवान्‌ भक्त द्वारा इच्छित रूप धारण कर सकते हैं और उनकामुखमण्डल सदैव कुण्डलों से सुन्दर ढंग से अलंकृत रहता है।

मैत्रेय उवाचश्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिभूशम्‌ ।

पुत्रयोश्च वध कृष्णाद्विदित्वासीन्‍न्महामना: ॥

५१॥

मैत्रेय: उवाच--मैत्रेय मुनि ने कहा; श्रुत्वा--सुनकर; भागवतम्‌-- भगवान्‌ के महान्‌ भक्त होने के लिए; पौत्रम्‌ू--पौत्र को;अमोदत--आनन्द का अनुभव किया; दिति:ः --दिति ने; भूशम्‌--अत्यधिक; पुत्रयो: --दोनों पुत्रों का; च-- भी; वधम्‌--वध;कृष्णात्‌-कृष्ण द्वारा; विदित्वा--जानकर; आसीत्‌--हो गईं; महा-मना:--मन में अतीव हर्षित |

मैत्रेय मुनि ने कहा : यह सुनकर कि उसका पौत्र महान्‌ भक्त होगा और उसके पुत्र भगवान्‌कृष्ण द्वारा मारे जायेंगे, दिति मन में अत्यधिक हर्षित हुई।

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