← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची
अध्याय सोलह: वैकुंठ के दो द्वारपाल, जया और विजया, ऋषियों द्वारा शापित
3.16ब्रह्मोवाचइति तदगृणतां तेषां मुनीनां योगधर्मिणाम् ।
प्रतिनन्द्यजगादेदं विकुण्ठनिलयो विभु: ॥
१॥
ब्रह्मा उबाच--ब्रह्माजी ने कहा; इति--इस प्रकार; ततू--वाणी; गृणताम्-- प्रशंसा करते हुए; तेषाम्--उन; मुनीनाम्-चारोंमुनियों का; योग-धर्मिणाम्-ब्रह्म के साथ युक्त होने में लगे हुए; प्रतिनन्य --बधाई देकर; जगाद--कहा; इृदम्--ये शब्द;विकुण्ठ-निलय:--जिनका धाम चिन्ता से रहित है; विभु:-- भगवान् ने।
ब्रह्मजी ने कहा : इस तरह मुनियों को उनके मनोहर शब्दों के लिए बधाई देते हुएभगवद्धाम में निवास करनेवाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने इस प्रकार कहा।
श्रीभगवानुवाचएतौ तौ पार्षदी मह्ं जयो विजय एव च ।
कदर्थीकृत्य मां यद्वो बह्क्रातामतिक्रमम् ॥
२॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने कहा; एतौ--ये दोनों; तौ--वे; पार्षदौ--परिचर; महाम्--मेरे; जयः--जय नामक;विजय:--विजय नामक; एब--निश्चय ही; च--तथा; कदर्थी-कृत्य--अवहेलना करके; माम्--मुझको; यत्--जो; वः--तुम्हारे विरुद्ध; बहु-- अत्यधिक; अक्राताम्--किया है; अतिक्रमम्--अपराध |
भगवान् ने कहा : जय तथा विजय नामक मेरे इन परिचरों ने मेरी अवज्ञा करके आपके प्रतिमहान् अपराध किया है।
यस्त्वेतयोर्धृतो दण्डो भवद्धिर्मामनुव्रतेः ।
स एवानुमतोउस्माभिमुनयो देवहेलनात् ॥
३॥
यः--जो; तु--लेकिन; एतयो:--जय तथा विजय के विषय में; धृत:--दिया गया; दण्ड:--दण्ड; भवद्धि:--आपके द्वारा;मामू--मुझको; अनुव्रतेः -- भक्ति करने वाले; सः--वह; एव--निश्चय ही; अनुमतः-- अनुमोदित; अस्माभि:--मेरे द्वारा;मुनयः--हे मुनियो; देव--आपके विरुद्ध; हेलनातू--अपराध के कारण
हे मुनियो, आप लोगों ने उन्हें जो दण्ड दिया है उसका मैं अनुमोदन करता हूँ, क्योंकि आपमेरे भक्त हैं।
तद्ठः प्रसादयाम्यद्य ब्रह्म देव परं हि मे ।
तद्धीत्यात्मकृतं मन्ये यत्स्वपुम्भिरसत्कृता: ॥
४॥
तत्--इसलिए; वः--तुम मुनियों; प्रसादयामि-- तुमसे क्षमा चाहता हूँ; अद्य--अभी; ब्रह्म--ब्राह्मण; दैवम्-- अत्यन्त प्रियव्यक्ति; परमू--सर्वोच्च; हि-- क्योंकि; मे--मेरा; ततू--वह अपराध; हि-- क्योंकि ; इति--इस प्रकार; आत्म-कृतम्--मेरे द्वाराकिया हुआ; मन्ये--मानता हूँ; यत्--जो; स्व-पुम्भि: --मेंरे सेवकों द्वारा; असत्-कृता:--अनादरित |
मेरे लिए ब्राह्मण सर्वोच्च तथा सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति है।
मेरे सेवकों द्वारा दिखाया गयाअनादर वास्तव में मेरे द्वारा प्रदर्शित हुआ है, क्योंकि वे द्वारपाल मेरे सेवक हैं।
इसे मैं अपने द्वाराकिया गया अपराध मानता हूँ, इसलिए मैं घटी हुई इस घटना के लिए आपसे क्षमा चाहता हूँ।
यन्नामानि च गृह्ाति लोको भृत्ये कृतागसि ।
सोसाधुवादस्तत्कीर्ति हन्ति त्वचमिवामय: ॥
५॥
यत्--जिसके; नामानि--नाम; च--तथा; गृह्ाति--ग्रहण करता है; लोक:--सामान्य जन; भृत्ये--जब एक सेवक; कृत-आगसि--कुछ गलती कर चुकता है; सः--वह; असाधु-वाद:ः--दोष; तत्--उस व्यक्ति की; कीर्तिमू-- ख्याति; हन्ति--नष्टकरता है; त्वचम्--चमड़ी; इब--सहश; आमय:--कोढ़
किसी सेवक द्वारा किये गये गलत कार्य से सामान्य तौर पर लोग उसके स्वामी को दोष देतेहैं जिस तरह शरीर के किसी भी अंग पर श्वेत कुष्ट के धब्बे सारे चमड़ी को दूषित बना देते हैं।
यस्यथामृतामलयश: श्रवणावगाहःसद्यः पुनाति जगदाश्चपचाद्विकुण्ठ: ।
सोहं भवद्भ्य उपलब्धसुतीर्थकीर्ति-शिछन्द्यां स्वबाहुमपि वः प्रतिकूलवृत्तिम्ू ॥
६॥
यस्य--जिसका; अमृत-- अमृत; अमल--दूषणरहित; यश: --यश, महिमा; श्रवण--सुनना; अवगाह: --प्रविष्ट करना;सद्यः--तुरन्त; पुनाति--पवित्र करती है; जगत्--ब्रह्माण्ड; आश्व-पचात्--कुत्ता-भक्षक तक; विकुण्ठ:--चिन्तारहित; सः--वह व्यक्ति; अहम्ू-मैं हूँ; भवद्भ्य:--आप से; उपलब्ध--प्राप्त; सु-तीर्थ--तीर्थयात्रा का सर्वोत्तम स्थान; कीर्ति:--यश;छिन्द्यामू--काट देगा; स्व-बाहुमू--अपनी भुजा; अपि--भी; वः--तुम्हारे प्रति; प्रतिकूल-वृत्तिम्ू--शत्रुवत् कार्य करते हुए
सम्पूर्ण संसार में कोई भी व्यक्ति, यहाँ तक कि चण्डाल भी जो कुत्ते का मांस पका करऔर खा कर जीता है, वह भी तुरन्त शुद्ध हो जाता है यदि वह मेरे नाम, यश आदि के गुणगानरूपी अमृत में कान से सुनते हुए स्नान करता है।
अब आप लोगों ने निश्चित रूप से मेरासाक्षात्कार कर लिया है, अतएव मैं अपनी ही भुजा को काटकर अलग करने में तनिक संकोचनहीं करूँगा, यदि इसका आचरण आपके प्रतिकूल लगे।
यत्सेवया चरणपद्पवित्ररेणुं सद्य: क्षताखिलमलं प्रतिलब्धशीलम् ।
न श्रीर्विरक्तमपि मां विजहाति यस्या:प्रेक्षालवार्थ इतरे नियमान्वहन्ति ॥
७॥
यत्--जिसकी; सेवया--सेवा द्वारा; चरण--पाँव; पद्य--कमल; पवित्र--पवित्र; रेणुम्-- धूल; सद्यः--तुरन्त; क्षत--पोंछीगई; अखिल--समस्त; मलम्--पापों को; प्रतिलब्ध--अर्जित; शीलम्ू--स्वभाव; न--नहीं; श्री:--लक्ष्मीजी; विरक्तम्--कोईआसक्ति न रखना; अपि--यद्यपि; माम्--मुझको; विजहाति--छोड़ती हैं; यस्या:-- लक्ष्मी का; प्रेक्षा-लव-अर्थ: --थोड़ी भीकृपा पाने के लिए; इतरे--अन्य, यथा ब्रह्मा जैसे; नियमान्--पवित्र ब्रतों को; वहन्ति--पालन करते हैं।
भगवान् ने आगे कहा : चूँकि मैं अपने भक्तों का सहायक हूँ, इसलिए मेरे चरणकमल इतनेपवित्र बन चुके हैं कि वे तुरन्त ही सारे पापों को धो डालते हैं और मुझे ऐसा स्वभाव प्राप्त होचुका है कि देवी लक्ष्मी मुझे छोड़ती नहीं, यद्यपि उसके प्रति मेरा कोई लगाव नहीं है और अन्यलोग उसके सौन्दर्य की प्रशंसा करते हैं तथा उसकी रंचमात्र कृपा पाने के लिए भी पवित्र व्रतरखते हैं।
नाह तथादि यजमानहविर्वितानेएच्योतद्धृतप्लुतमदन्हुतभुड्मुखेन ।
यद्वाह्मणस्य मुखतश्चरतो नुघासंतुष्टस्य मय्यवहितैर्निजकर्मपाकै: ॥
८ ॥
न--नहीं; अहम्--मैं; तथा--दूसरी ओर; अद्धि--खाता हूँ; यजमान--यज्ञकर्ता द्वारा; हविः--आहुति; विताने--यज्ञ-अग्नि में;श्च्योतत्--डालते हुए; घृत--घी; प्लुतमू--मिश्रित; अदन्--खाते हुए; हुत-भुक्ू--यज्ञ की अग्नि; मुखेन--मुँह से; यत्--क्योंकि; ब्राह्मणस्थ--ब्राह्मण के; मुखतः --मुख से; चरत:--कार्य करते हुए; अनुघासम्ू--कौर ; तुष्टस्य--तुष्ट; मयि-- मेरेलिए; अवहितैः--अर्पित किया गया; निज--अपना; कर्म--कार्यकलाप; पाकैः-- फलों के द्वारा यज्ञाग्नि में
जो मेरे ही निजी मुखों में से एक है, यज्ञकर्ताओं के द्वारा डाली गई आहुतियों मेंमुझे उतना स्वाद नहीं मिलता जितना कि घी से सिक्त उन व्यंजनों से जो उन ब्राह्मणों के मुख मेंअर्पित किये जाते हैं जिन्होंने अपने कर्मों के फल मुझे अर्पित कर दिये हैं और जो मेरे प्रसाद सेसदैव तुष्ट रहते हैं।
येषां बिभर्म्यहमखण्डविकुण्ठयोग-मायाविभूतिरमलाड्ध्रिरज: किरीटैः ।
विप्रांस्तु को न विषहेत यदर्हणाम्भःसद्यः पुनाति सहचन्द्रललामलोकान् ॥
९॥
येषाम्--ब्राह्मणों का; बिभर्मि-- धारण करता हूँ; अहम्ू--मैं; अखण्ड--अटूट; विकुण्ठ--बिना अवरोध के; योग-माया--अन्तरंगा शक्ति; विभूति:--ऐश्वर्य; अमल--शुद्ध; अड्घ्रि--पाँवों की; रज:--धूलि; किरीटैः --मेरे मुकुट पर; विप्रान्--ब्राह्मण; तु--लेकिन; कः --कौन; न--नहीं; विषहेत--ले जाते हैं; यत्-- भगवान् का; अर्हण-अम्भ:--पाँवों को धोने से प्राप्तजल; सद्यः --तुरन्त; पुनाति--पवित्र बनाता है; सह--सहित; चन्द्र-ललाम--शिवजी; लोकान्--तीनों लोकों को
मैं अपनी अबाधित अन्तरंगा शक्ति का स्वामी हूँ तथा गंगा जल मेरे पाँवों को धोने सेनिकलता हुआ जल है।
वही जल जिसे शिवजी अपने सिर पर धारण किए हुए हैं, उनको तथातीनों लोकों को पवित्र करता है।
यदि मैं वैष्णव के पैरों की धूल को अपने सिर पर धारण करूँ,तो मुझे ऐसा करने से कौन मना करेगा ?
ये मे तनूद्विजवरान्दुहतीर्मदीयाभूतान्यलब्धशरणानि च भेदबुद्धया ।
द्रक्ष्यन्त्यघक्षतह्॒शो हाहिमन्यवस्तान्गृश्ना रुषा मम कुषन्त्यधिदण्डनेतु: ॥
१०॥
ये--जो पुरुष; मे--मेरा; तनू:--शरीर; द्विज-वरान्--ब्राह्मणों में सर्वश्रेष्ठ; दुहती: --गौवें; मदीया: --मुझसे सम्बन्धित;भूतानि--जीव; अलब्ध-शरणानि--आश्रयविहीन; च--तथा; भेद-बुद्धया--भिन्न मानते हुए; द्रक्ष्यन्ति--देखते हैं; अध--पापके द्वारा; क्षत--क्षतिग्रस्त; हशः--निर्णय की शक्ति; हि-- क्योंकि; अहि--सर्पवत्; मन्यव:--क्रुद्ध; तान्--उन्हीं व्यक्तियों को;गृक्नाः--गीध जैसे दूत; रुषा--क्रोध से; मम--मेरे; कुषन्ति--नोच डालते हैं; अधिदण्ड-नेतु:--दण्ड के अधीक्षक, यमराजकाब्राह्मण, गौवें तथा निस्सहाय प्राणी मेरे ही शरीर हैं।
जिन लोगों की निर्णय शक्ति अपने पापके कारण क्षतिग्रस्त हो चुकी है वे इन्हें मुझसे पृथक् रूप में देखते हैं।
वे क्रुद्ध सर्पों के समान हैंऔर वे पापी पुरुषों के अधीक्षक यमराज के गीध जैसे दूतों की चोचों से क्रोध में नोच डालेजाते हैं।
ये ब्राह्मणान्मयि धिया क्षिपतो<र्चयन्त-स्तुष्यद्धृद: स्मितसुधोक्षितपद्मवक्त्रा: ।
वाण्यानुरागकलयात्मजवद्गृणन्तःसम्बोधयन्त्यडमिवाहमुपाहतस्तैः ॥
११॥
ये--जो व्यक्ति; ब्राह्मणान्ू--ब्राह्मणजन; मयि--मुझमें; धिया--बुद्धिपूर्वक; क्षिपत:ः--कटुवचन बोलते हुए; अर्चयन्त: --आदर करते हुए; तुष्यत्--हर्षित हुए; हृद:ः --हृदय; स्मित--हँसी; सुधा-- अमृत; उक्षित--नम; पद्म-- कमल सहश; वकक्त्रा:--मुखमंडल; वाण्या--शब्दों से; अनुराग-कलया--प्रेम करते हुए; आत्मज-बत्--पुत्र के समान; गृणन्त:--प्रशंसा करते हुए;सम्बोधयन्ति--सान्त्वना देते हैं; अहम्ू--मैं; इब--सहृश; अहम्--मैं; उपाहृत:--नियंत्रित होकर; तैः--उनके द्वारा
दूसरी ओर ऐसे लोग जो हृदय में पुलकित रहते हैं और अमृततुल्य हँसी से आलोकित अपने'कमलमुखों से ब्राह्मणों द्वारा कटु वचन बोलने पर भी उनका आदर करते हैं, वे मुझे मोह लेते हैं।
वे ब्राह्मणों को मुझ जैसा ही मानते हैं और प्रियवचनों से उनकी प्रशंसा करके उन्हें उसी तरहशान्त करते हैं जिस तरह पुत्र अपने क्रुद्ध पिता को प्रसन्न करता है या मैं तुम लोगों को शान्त कररहा हूँ।
तन्मे स्वभर्तुरवसायमलक्षमाणौयुष्मद्व्यतिक्रमगतिं प्रतिपद्य सद्य: ।
भूयो ममान्तिकमितां तदनुग्रहो मेयत्कल्पतामचिरतो भृतयोरविवास: ॥
१२॥
तत्--इसलिए; मे--मेरा; स्व-भर्तु:--अपने स्वामी का; अवसायम्--मनोभाव; अलक्षमाणौ--न जानते हुए; युष्मत् -- तुम्हारेविरुद्ध; व्यतिक्रम--अपराध; गतिम्--फल; प्रतिपद्य--पाकर; सद्य:--तुरन्त; भूय:ः--पुन:; मम अन्तिकम्--मेरे निकट;इताम्-- प्राप्त करते हैं; तत्--वह; अनुग्रह:--कृपा; मे--मुझको; यत्--जो; कल्पताम्--व्यवस्थित हो; अचिरत:ः--शीघ्र ही;भूतयो:--इन दोनों सेवकों का; विवास:--निर्वासन, देश निकाला।
मेरे इन सेवकों ने अपने स्वामी के मनोभाव को न जानते हुए आपके प्रति अपराध किया है,इसलिए मैं इसे अपने प्रति किया गया अनुग्रह मानूँगा यदि आप यह आदेश दें कि वे मेरे पासशीघ्र ही लौट आयें तथा मेरे धाम से उनका निर्वासन-काल शीघ्र ही समाप्त हो जाय।
ब्रह्मोवाचअथ तसस््योशतीं देवीमृषिकुल्यां सरस्वतीम् ।
नास्वाद्य मन्युदष्टानां तेषामात्माप्यतृप्यत ॥
१३॥
ब्रह्मा--ब्रह्माजी ने; उबाच--कहा; अथ--अब; तस्य--परमे श्वर का; उशतीम्--मनोहर; देवीम्--चमकते; ऋषि-कुल्याम्--वैदिक स्तोत्रों की श्रृंखला के समान; सरस्वतीमू--वाणी; न--नहीं; आस्वाद्य--सुनकर; मन्यु--क्रोध; दष्टानामू--काटा गया;तेषाम्--उन मुनियों के; आत्मा--मन; अपि--यद्यपि; अतृप्यत--तुष्ट किया
ब्रह्म ने आगे कहा : यद्यपि मुनियों को क्रोध रूपी सर्प ने डस लिया था, किन्तु उनकीआत्माएँ भगवान् की उस मनोहर तथा तेजपूर्ण वाणी को सुनकर अघाई नहीं थीं जो वैदिक मंत्रोंकी श्रृंखला के समान थी।
सतीं व्यादाय श्रृण्वन्तो लघ्वीं गुर्वर्थगह्रराम् ।
विगाह्मागाधगम्भीरां न विदुस्तच्चिकीर्षितम् ॥
१४॥
सतीम्--सर्वोत्तम; व्यादाय-दध्यानपूर्वक सुनकर; श्रृण्वन्तः--सुनते हुए; लघ्वीम्--ठीक से रचा हुआ; गुरु--गहन; अर्थ--आशय; गह्नाम्ू--समझ पाना कठिन; विगाह्म--मनन करके; अगाध--गहरा; गम्भीराम्--गम्भीर; न--नहीं; विदु: --समझतेहैं; तत्-परमे श्वर का; चिकीर्षितम्ू--मनोभाव |
भगवान् की उत्कृष्ट वाणी इसके गहन आशय तथा इसके अत्यधिक गहन महत्व के कारणसमझी जाने में कठिन थी।
मुनियों ने उसे कान खोलकर सुना तथा उस पर मनन भी किया।
किन्तु सुनकर भी वे यह नहीं समझ पाये कि भगवान् कया करना चाह रहे हैं।
ते योगमाययारब्धपारमेष्ठयमहोदयम् ।
प्रोचु: प्राज्ललयो विप्रा: प्रहष्टा: क्षुभितत्वच: ॥
१५॥
ते--वे; योग-मायया--उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा; आरब्ध--प्रकट किया गया; पारमेष्ठयय-- भगवान् का; महा-उदयम् --बहुमुखी यश; प्रोचु:--बोले; प्रा्ललय:ः--हाथ जोड़कर; विप्रा:--चारों ब्राह्मण; प्रहष्टा:--अत्यधिक प्रसन्न; क्षुभित-त्वच: --रोमांचित |
तो भी चारों ब्राह्मण मुनि उन्हें देखकर अतीव प्रसन्न थे और उन्होंने अपने सम्पूर्ण शरीरों मेंरोमांच का अनुभव किया।
तब उन भगवान् से जिन्होंने अपनी योगमाया से परम पुरुष कीबहुमुखी महिमा को प्रकट किया था, वे इस प्रकार बोले।
ऋषय ऊचु:न बय॑ भगवन्विदास्तव देव चिकीर्षितम् ।
कृतो मेजनुग्रहश्चेति यदध्यक्ष: प्रभाषसे ॥
१६॥
ऋषय:--ऋषियों ने; ऊचु:--कहा; न--नहीं; वयम्ू--हम; भगवन्--हे भगवान्; विदा: --जानते थे; तब--तुम्हारा; देव--हेप्रभु; चिकीर्षितम्--करने की इच्छा; कृत:--किया हुआ; मे--मेरे प्रति; अनुग्रह:ः --कृपा; च--तथा; इति--इस प्रकार; यत्--जो; अध्यक्ष:--परम शासक; प्रभाषसे--तुम कहते हो |
ऋषियों ने कहा : हे भगवन्, हम यह नहीं जान पा रहे कि आप हमारे लिए क्या करनाचाहते हैं, क्योंकि आप सबों के परम शासक होते हुए भी हमारे पक्ष में बोल रहे हैं मानो हमनेआपके साथ कोई अच्छाई की हो।
ब्रह्मण्यस्य परं दैवं ब्राह्मणा: किल ते प्रभो ।
विप्राणां देवदेवानां भगवानात्मदैवतम् ॥
१७॥
ब्रह्मण्यस्थ--ब्राह्मण संस्कृति के परम निदशेक का; परम्--सर्वोच्च; दैवम्--स्थिति, पद; ब्राह्मणा:--ब्राह्मण जन; किल--अन्यों को शिक्षा देने के लिए; ते--तुम्हारा; प्रभो--हे प्रभु; विप्राणाम्--ब्राह्मणों का; देव-देवानाम्--देवताओं द्वारा पूजे जानेके लिए; भगवान्-- भगवान्; आत्म--स्वयं; दैवतम्-- पूज्य विग्रह।
हे प्रभु, आप ब्राह्मण संस्कृति के परम निदेशक हैं।
ब्राह्मणों को सर्वोच्च पद पर आपकेद्वारा माना जाना अन्यों को शिक्षा देने के लिए आपका उदाहरण है।
वस्तुतः आप न केवलदेवताओं के लिए, अपितु ब्राह्मणों के लिए भी परम पूज्य विग्रह हैं।
त्वत्त: सनातनो धर्मो रक्ष्यते तनुभिस्तव ।
धर्मस्य परमो गुह्यो निर्विकारो भवान्मतः ॥
१८॥
त्वत्तः--तुमसे; सनातन:--शा श्वत; धर्म:--वृत्ति; रक्ष्यते--रक्षा किया जाता है; तनुभि:--अनेक अभिव्यक्तियों द्वारा; तब--तुम्हारा; धर्मस्थ--धार्मिक सिद्धान्तों का; परम:--परम; गुहा: --विषय; निर्विकार: --अपरिवर्तनीय; भवान्ू--आप; मतः--हमारे मत से
आप सारे जीवों की शाश्वत वृत्ति के स्त्रोत हैं और भगवान् के नाना स्वरूपों द्वारा आपनेसदैव धर्म की रक्षा की है।
आप धार्मिक नियमों के परम लक्ष्य हैं और हमारे मत से आप अक्षयतथा शाश्वत रूप से अपरिवर्तनीय हैं।
'तरन्ति ह्यझ्जसा मृत्युं निवृत्ता यदनुग्रहात् ।
योगिनः स भवान्कि स्विदनुगृहोत यत्पर: ॥
१९॥
तरन्ति--पार करते हैं; हि-- क्योंकि; अज्लसा-- आसानी से; मृत्युमू--जन्म तथा मृत्यु को; निवृत्ता:--सारी भौतिक इच्छाओं कोछोड़ करके; यत्--तुम्हारे; अनुग्रहातू--कृपा से; योगिन:--योगीजन; सः--परमेश्वर; भवान्--आप; किम् स्वितू--कभीसम्भव नहीं; अनुगृह्मेत--अनुग्रह किया जा सकता है; यत्--जो; परैः--अन्यों द्वारा
भगवान् की कृपा से योगीजन तथा अध्यात्मवादी समस्त भौतिक इच्छाओं को छोड़करअज्ञान को पार कर जाते हैं।
इसलिए यह सम्भव नहीं कि कोई परमेश्वर पर अनुग्रह कर सके।
यं वै विभूतिरुपयात्यनुवेलमन्यै-रर्थारथिभि: स्वशिरसा धृतपादरेणु: ।
धन्यार्पिताड्घ्रितुलसीनवदामधाम्नोलोकं मधुव्रतपतेरिव कामयाना ॥
२०॥
यम्--जिसको; बै--निश्चय ही; विभूति:--लक्ष्मी जी; उपयाति--प्रतीक्षा में खड़ी रहती है; अनुवेलम्--यदा कदा; अन्यै:--अन्यों के द्वारा; अर्थ--भौतिक सुविधा; अर्थिभि:--चाहने वालों के द्वारा; स्व-शिरसा--अपने अपने सिरों पर; धृत--स्वीकारकरते हुए; पाद--पाँवों की; रेणु:-- धूल; धन्य--भक्तों के द्वारा; अर्पित--अर्पित; अड्प्रि-- आपके चरणों पर; तुलसी--तुलसीदल के; नव--नवीन; दाम--माला पर; धाम्न:--स्थान वाला; लोकम्--स्थान; मधु-ब्रत-पते:-- भौरों के राजा का; इब--सहश; काम-याना--प्राप्त करने के लिए उत्सुक है।
जिनके चरणों की धूल अन्य लोग अपने शिरों पर धारण करते हैं, वहीं लक्ष्मीदेवी आपकीपूर्व निर्धारित सेवा में रहती हैं, क्योंकि वे उन भौंरों के राजा के धाम में स्थान सुरक्षित करने केलिए उत्सुक रहती हैं, जो आपके चरणों पर किसी धन्य भक्त के द्वारा अर्पित तुलसीदलों कीताजी माला पर मँडराता है।
अस्तां विविक्तचरितैरनुवर्तमानांनात्याद्रियत्परमभागवतप्रसड़ः ॥
सत्वं द्विजानुपथपुण्यरज:पुनीतःश्रीवत्सलक्ष्म किमगा भगभाजनस्त्वम् ॥
२१॥
यः--जो; तामू--लक्ष्मी को; विविक्त--नितान्त शुद्ध; चरितैः-- भक्ति; अनुवर्तमानाम्--सेवा करते हुए; न--नहीं;अत्याद्वियत्--अनुरक्त; परम--सर्वाधिक; भागवत--भक्तगण; प्रसड़र:ः--अनुरक्त; सः--परमेश्वर; त्वमू-तुम; द्विज--ब्राह्मणोंके; अनुपथ--पथ पर; पुण्य--पवित्र की गई; रज:--धूल; पुनीत:--शुद्ध किया हुआ; श्रीवत्स-- श्रीवत्स का; लक्ष्म--चिह्;किम्--क्या; अगा:ः--तुमने प्राप्त किया है; भग--सारे ऐश्वर्य या सारे सदुगुण; भाजन:--आगार; त्वम्-तुम |
हे प्रभु, आप अपने शुद्ध भक्तों के कार्यों के प्रति अत्यधिक अनुरक्त रहते हैं फिर भी आपउन लक्ष्मीजी से कभी अनुरक्त नहीं रहते जो निरन्तर आपकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगी रहती हैं।
अतएव आप उस पथ की धूल द्वारा कैसे शुद्ध हो सकते हैं जिन पर ब्राह्मण चलते हैं, और अपनेवक्षस्थल पर श्रीवत्स चिन्ह के द्वारा आप किस तरह महिमामंडित या भाग्यशाली बन सकते हैं ?
धर्मस्य ते भगवतस्त्रियुग त्रिभि: स्वैःपद्धिश्चराचरमिदं द्विजदेवतार्थम् ।
नूनं भूत तदभिघाति रजस्तमश्चसत्त्वेन नो वरदया तनुवा निरस्य ॥
२२॥
धर्मस्थ--धधर्मस्वरूप; ते--तुम्हारा; भगवत:-- भगवान् का; त्रि-युग--तीनों युगों में प्रकट होने वाले आप; त्रिभि:--तीन;स्वै:--अपने; पद्धिः--पाँवों द्वारा; चर-अचरम्--चर तथा अचर; इृदम्--यह ब्रह्माण्ड; द्विज--दो बार जन्म लेने वाला;देवता--देवता; अर्थम्--के लिए; नूनम्-किन््तु; भृतम्--सुरक्षित; तत्--वे पाँव; अभिघाति--विनष्ट करते हुए; रज:--रजोगुण; तम:--तमोगुण; च--तथा; सत्त्वेन--सतोगुण का; न:--हमको; वर-दया--सारे आशीर्वाद देते हुए; तनुवा--अपनेदिव्य रूप द्वारा; निरस्थ-- भगाकर।
हे प्रभु, आप साक्षात् धर्म हैं।
अतः आप तीनों युगों में अपने को प्रकट करते हैं और इसतरह इस ब्रह्माण्ड की रक्षा करते हैं जिसमें चर तथा अचर प्राणी रहते हैं।
आप शुद्ध सत्त्व रूपतथा समस्त आशीषों को प्रदान करने वाली कृपा से देवताओं तथा द्विजों के रजो तथा तमो गुणोंको भगा दें।
गोप्ता वृष: स्वहणेन ससूनृतेन ।
तहाँव नड्छक्ष्यति शिवस्तव देव पन्थालोकोग्रहीष्यदषभस्य हि तत्प्रमाणम् ॥
२३॥
न--नहीं; त्वम्-तुम; द्विज--दो बार जन्म लेने वाले का; उत्तम-कुलम्--सर्वोच्च जाति; यदि--यदि; ह--निस्सन्देह; आत्म-गोपम्--आपके द्वारा रक्षित होने के योग्य; गोप्ता--रक्षक; वृष: --सर्वोत्कृष्ट; सु-अर्हणेन--पूजा द्वारा; स-सूनृतेन--मृदु शब्दोंके साथ साथ; तहि--तब; एव--निश्चय ही; नड्छ््यति--खो जायेगा; शिवः--शुभ; तब--तुम्हारा; देव--हे प्रभु; पन्था: --पथ; लोक:--सामान्यजन; अग्रहीष्यत्--स्वीकार करेगा; ऋषभस्य--सर्वोत्कृष्ट का; हि-- क्योंकि; तत्--वह; प्रमाणम्--प्रमाण |
हे प्रभु, आप सर्वोच्च द्विजों के रक्षक हैं।
यदि आप पूजा तथा मृदु वचनों को अर्पित करकेउनकी रक्षा न करें तो निश्चित है कि पूजा का शुभ मार्ग उन सामान्यजनों द्वारा परित्यक्त कर दियाजाएगा जो आपके बल तथा प्रभुत्व पर कर्म करते हैं।
तत्तेडनभीष्टमिव सत्त्वनिधेर्विधित्सो:क्षेमं जनाय निजशक्तिभिरुद्धृतारे: ।
नैतावता त्यधिपतेर्बत विश्वभर्तु-स्तेज: क्षतं त्ववनतस्य स ते विनोद: ॥
२४॥
तत्--शुभसूचक मार्ग का वह विनाश; ते--तुम्हारे द्वारा; अनभीष्टम्--पसन्द नहीं किया हुआ; इब--सहश; सत्त्व-निधे:--सारीअच्छाई का आगार; विधित्सो:--करने के लिए इच्छुक; क्षेममू--कल्याण; जनाय--सामान्य लोगों के लिए; निज-शक्तिभि: --अपनी ही शक्तियों द्वारा; उद्धृत--विनष्ट किया हुआ; अरे: --विरोधी तत्त्व; न--नहीं; एतावता--इससे; त्रि-अधिपते: --तीनप्रकार की सृष्टियों के स्वामी का; बत-हे प्रभु; विश्व-भर्तु:--ब्रह्माण्ड के पालक; तेज:--शक्ति; क्षतम्--न्यून; तु--लेकिन;अवनतस्य--विनीत; सः--वह; ते--आपका; विनोद: -- आनन्द प्रिय प्रभु
आप नहीं चाहते कि शुभ मार्ग को विनष्ट किया जाय, क्योंकि आप समस्त शिष्टाचार के आगार हैं।
आप सामान्य लोगों के लाभ हेतु अपनी बलवती शक्ति से दुष्ट तत्त्व कोविनष्ट करते हैं।
आप तीनों सृष्टियों के स्वामी तथा पूरे ब्रह्माण्ड के पालक हैं।
अतएव आपकेविनीत व्यवहार से आपकी शक्ति घटती नहीं, प्रत्युत इस विनम्रता द्वारा आप अपनी दिव्यलीलाओं का प्रदर्शन करते हैं।
यं वानयोर्दममधीश भवान्विधत्तेवृत्ति नु वा तदनुमन्महि निर्व्यलीकम् ।
अस्मासु वा य उचितो श्चियतां स दण्डोयेउनागसौ वयमयुड्छ्महि किल्बिषेण ॥
२५॥
यम्--जो; वा--अथवा; अनयो:--उन दोनों का; दमम्--दण्ड; अधीश--हे प्रभु; भवान्--आप; विधत्ते--प्रदान करता है;वृत्तिमू-- अच्छा जीवन; नु--निश्चय ही; वा--अथवा; तत्--वह; अनुमन्महि--हम स्वीकार करते हैं; निर्व्यलीकम्--द्वैतरहित;अस्मासु--हमको; वा--अथवा; य:--जो भी; उचित:--उचित हो; प्रियताम्-- प्रदान किया जाय; सः--वह; दण्ड: --दण्ड;ये--जो; अनागसौ--पापरहित; वयम्ू--हम; अयुद्छमहि--नियत किया है; किल्बिषेण--शाप से |
हे प्रभु, आप इन दोनों निर्दोष व्यक्तियों को या हमें भी जो दण्ड देना चाहेंगे उसे हम बिनाद्वैत के स्वीकार करेंगे।
हम जानते हैं कि हमने दो निर्दोष व्यक्तियों को शाप दिया है।
श्रीभगवानुवाचएतौ सुरेतरगतिं प्रतिपद्य सद्यःसंरम्भसम्भूतसमाध्यनुबद्धयोगौ ।
भूयः सकाशमुपयास्यत आशु यो वःशापो मयैव निमितस्तदवेत विप्रा: ॥
२६॥
श्री-भगवान् उबाच-- भगवान् ने उत्तर दिया; एतौ--ये दोनों द्वारपाल; सुर-इतर--आसुरी; गतिम्ू--गर्भ; प्रतिपद्य--पाकर;सद्यः--शीघ्र ही; संरम्भ--क्रोध से; सम्भूत--सम्बर्धित होकर; समाधि--मन की एकाग्रता; अनुबद्ध--हृढ़तापूर्वक; योगौ--मुझसे बँधे; भूय:--पुत्र; सकाशम्--मेंरे पास; उपयास्यत:--लौटेंगे; आशु--शीघ्र ही; यः--जो; व:--तुम्हारा; शाप:--शाप;मया--मेरे द्वारा; एब--एकमात्र; निमित:--नियत; तत्--वह; अवेत--जानो; विप्रा:--हे ब्राह्मणो |
भगवान् ने उत्तर दिया : हे ब्राह्णो, यह जान लो कि तुमने उनको जो दण्ड दिया है, वह मूलतः मेरे द्वारा निश्चित किया गया था, अतः वे आसुरी परिवार में जन्म लेने के लिए पतित होंगे।
किन्तु वे क्रोध द्वारा वर्धित मानसिक एकाग्रता द्वारा मेरे विचार में मुझसे हढ़तापूर्वक संयुक्त होंगेऔर शीधघ्र ही मेरे पास लौट आयेंगे।
ब्रह्मोवाचअथ ते मुनयो दृष्ठा नयनानन्दभाजनम् ।
बैकुण्ठं तदधिष्ठानं विकुण्ठं च स्वयंप्रभम् ॥
२७॥
ब्रह्म उवाच--ब्रह्म ने कहा; अथ--अब; ते--वे; मुनयः --मुनिगण; हृध्ना-- देखकर; नयन--आँखों का; आनन्द--आननन््द;भाजनमू-त्पन्न करते हुए; वैकुण्ठम्--वैकुण्ठ लोक; तत्--उसका; अधिष्ठानम्ू-- धाम; विकुण्ठम्-- भगवान्; च--तथा;स्वयम्-प्रभम्ू--आत्म-ज्योतित |
ब्रह्माजी ने कहा : बैकुण्ठ के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को आत्मज्योतित वैकुण्ठललोकमें देखने के बाद मुनियों ने वह दिव्य धाम छोड़ दिया।
भगवन्तं परिक्रम्य प्रणिपत्यानुमान्य च ।
प्रतिजग्मु: प्रमुदिता: शंसन्तो वैष्णवीं अ्ियम् ॥
२८॥
भगवन्तम्-- भगवान् को; परिक्रम्य--प्रदक्षिणा करके; प्रणिपत्य--नमस्कार करके; अनुमान्य--जानकर; च--तथा;प्रतिजग्मु:--वापस आये; प्रमुदिता:--अतीव हर्षित; शंसन्त:--प्रशंसा करते हुए; वैष्णवीम्--वैष्णवों के; भ्रियम्--ऐश्वर्य की।
मुनियों ने भगवान् की प्रदक्षिणा की, उन्हें नमस्कार किया तथा दिव्य वैष्णव ऐश्वर्य को जानलेने पर वे अत्यधिक हर्षित होकर लौट आये।
भगवाननुगावाह यात॑ मा भेष्टमस्तु शम् ।
ब्रह्मतेज: समर्थोपि हन्तुं नेच्छे मतं तु मे ॥
२९॥
भगवानू्-- भगवान् ने; अनुगौ--अपने दोनों सेवकों ( अनुचरों ) से; आह--कहा; यातम्--इस स्थान से जाओ; मा--मत;भेष्टम्ू-- डरो; अस्तु--हो; शम्--सुख; ब्रह्म--ब्राह्मण का; तेज:--शाप; समर्थ:--समर्थ होने से; अपि-- भी; हन्तुम्--निरस्तकरने के लिए; न इच्छे--नहीं चाहता; मतम्--अनुमोदित; तु-- प्रत्युत; मे--मेरे द्वारा
तब भगवान् ने अपने सेवकों जय तथा विजय से कहा : इस स्थान से चले जाओ, किन्तुडरो मत।
तुम लोगों की जय हो।
यद्यपि मैं ब्राह्मणों के शाप को निरस्त कर सकता हूँ, किन्तु मैंऐसा करूँगा नहीं।
प्रत्युत इसे मेरा समर्थन प्राप्त है।
एतत्पुरैव निर्दिष्ट रमया क्रुद्धया यदा ।
पुरापवारिता द्वारि विशन्ती मय्युपारते ॥
३०॥
एतत्--यह प्रस्थान; पुरा--प्राचीन काल में; एब--निश्चय ही; निर्दिप्टम्--पहले से बतलाया गया; रमया--लक्ष्मी द्वारा;क्रुद्धया-क्रुद्ध; यदा--जब; पुरा--पहले; अपवारिता--रोकी गईं; द्वारि--द्वार पर; विशन्ती-- प्रवेश करते; मयि--जब मैं;उपारते--विश्राम कर रहा था
वैकुण्ठ से यह प्रस्थान लक्ष्मीजी ने पहले ही बतला दिया था।
वे क्रुद्ध थीं, क्योंकि जबउन्होंने मेरा धाम छोड़ा और वे फिर लौटीं तो तुमने उन्हें द्वार पर रोक लिया जब कि मैं सो रहाथा।
मयि संरम्भयोगेन निस्तीर्य ब्रह्महेलनम् ।
प्रत्येष्वतं निकाशं मे कालेनाल्पीयसा पुनः ॥
३१॥
मयि--मुझमें; संरम्भ-योगेन--क्रोध में योग के अभ्यास द्वारा; निस्तीर्य--से मुक्त किया गया; ब्रह्म-हेलनम्--ब्राह्मणों कीअवज्ञा का फल; प्रत्येष्यतम्--वापस आयेंगे; निकाशम्--निकट; मे--मेरे; कालेन--कालक्रम में; अल्पीयसा--अत्यन्त अल्प;पुनः--फिर।
भगवान् ने जय तथा विजय नामक दोनों वैकुण्ठवासियों को आश्वस्त किया : क्रोध मेंयोगाभ्यास द्वारा तुम ब्राह्मणों की अवज्ञा करने के पाप से मुक्त हो जाओगे और अत्यल्प अवधिमें मेरे पास वापस आ जाओगे।
श़" द्वाःस्थावादिश्य भगवान्विमानश्रेणिभूषणम् ।
सर्वातिशयया लक्ष्म्या जुष्ट स्वं धिष्णयमाविशत् ॥
३२॥
द्वाः-स्थौ--द्वारपालों को; आदिश्य--आदेश देकर; भगवान्-- भगवान्; विमान- श्रेणि- भूषणम् -- उच्च कोटि के विमानों सेसदैव विभूषित; सर्व-अतिशयया--हर प्रकार से अत्यधिक एऐश्वर्यशाली; लक्ष्म्या--ऐश्वर्य; जुष्टमू-- से सजाया गया; स्वम्ू--अपने; धिष्ण्यम्ू-- धाम में; आविशत्--वापस चले गये ।
वैकुण्ठ के द्वार पर इस प्रकार बोलकर भगवान् अपने धाम लौट गये जहाँ पर अनेकस्वर्गिक विमान तथा सर्वोपरि सम्पत्ति तथा चमक-दमक रहती है।
तौ तु गीर्वाणऋषभौ दुस्तराद्धरिलोकतः ।
हतश्रियौ ब्रह्मशापादभूतां विगतस्मयौ ॥
३३॥
तौ--वे दोनों द्वारपाल; तु--लेकिन; गीर्वाण-ऋषभौ--देवताओं में सर्वश्रेष्ठ; दुस्तरात्--बच सकने में असमर्थ; हरि-लोकतः--हरि के धाम वैकुण्ठ से; हत-भ्रियौ--सौन्दर्य तथा कान्ति से हीन; ब्रह्म -शापात्--ब्राह्मण के शाप से; अभूताम्--हो गये;विगत-स्मयौ--खिन्न |
किन्तु वे दोनों द्वारपाल, जो कि देवताओं में सर्वश्रेष्ठ थे, जिनका सौन्दर्य तथा कान्ति ब्राह्मणों के शाप से उतर गए थे, खिन्न हो गये और भगवान् के धाम बैकुण्ठ से नीचे गिर गये।
तदा विकुण्ठधिषणात्तयोर्निपतमानयो: ।
हाहाकारो महानासीद्विमानाछयेषु पुत्रका: ॥
३४॥
तदा--तब; विकुण्ठ--परमे श्वर के; धिषणात्-- धाम से; तयो:--दोनों; निपतमानयो: --गिर रहे थे; हाहा-कारः --निराशा मेंगर्जते हुए; महान्ू--महान्; आसीतू--घटित हुआ; विमान-अछयेषु--सर्वोत्तम विमानों में; पुत्र॒का:--हे देवताओ |
तब, जब जय तथा विजय भगवान् के धाम से गिरे तो अपने भव्य विमानों में बैठे हुए सारेदेवताओं ने निराश होकर उत्कट हाहाकार किया।
तावेब ह्धुना प्राप्तौ पार्षदप्रवरौ हरे: ।
दितेर्जठरनिर्विष्ट काश्यपं तेज उल्बणम् ॥
३५॥
तौ--वे दोनों द्वारपाल; एब--निश्चय ही; हि--सम्बोधन किया; अधुना--अब; प्राप्तौ--प्राप्त करके; पार्षद-प्रवरौ-- महत्त्वपूर्णसंगी; हरेः-- भगवान् के; दितेः--दिति के; जठर--गर्भ; निर्विष्टम्ू-- प्रवेश करते हुए; काश्यपम्--कश्यप मुनि का; तेज: --वीर्य; उल्बणम्--अत्यन्त प्रबल |
ब्रह्म ने आगे कहा : भगवान् के उन दो प्रमुख द्वारपालों ने अब दिति के गर्भ में प्रवेश कियाहै और कश्यप मुनि के बलशाली वीर्य से वे आवृत हो चुके हैं।
तयोरसुरयोरद्य तेजसा यमयोहि वः ।
अआक्षिप्तं तेज एतहिं भगवांस्तद्विधित्सति ॥
३६॥
तयो:--उन; असुरयो:--दोनों असुरों के; अद्य--आज; तेजसा--तेज से; यमयो:--जुड़वों का; हि--निश्चय ही; व:--तुम सारेदेवताओं का; आशक्षिप्तम्ू-- क्षुब्ध; तेज:--शक्ति; एतहिं--इस प्रकार निश्चय ही; भगवान्-- भगवान्; तत्--वह; विधित्सति--करना चाहता है।
यह इन जुड़वे असुरों का तेज है, जिसने तुम सबों को विचलित किया है, क्योंकि इसनेतुम्हारी शक्ति को कम कर दिया है।
किन्तु मेरी शक्ति में कोई इसका उपचार नहीं है, क्योंकिभगवान् स्वयं ही यह सब करना चाहते हैं।
विश्वस्य यः स्थितिलयोद्धवहेतुराद्योयोगेश्वरैरपि दुरत्यययोगमाय: ।
क्षेमं विधास्यति स नो भगवांस्त्रयधीश-स्तत्रास्मदीयविमृशेन कियानिहार्थ: ॥
३७॥
विश्वस्य--ब्रह्मण्ड का; यः--जो; स्थिति--पालन-पोषण; लय--विनाश; उद्धव--सृष्टि; हेतु:--कारण; आद्य: --सबसेप्राचीन पुरुष; योग-ईश्वरः--योग के स्वामियों द्वारा; अपि-- भी; दुरत्यय-- आसानी से समझा नहीं जा सकता; योग-माय:--उनकी योगमाया शक्ति; क्षेममू--कल्याण, मंगल; विधास्यति--करेगा; सः--वह; नः--हमारा; भगवान्-- भगवान्; त्रि-अधीशः--तीनों गुणों के नियन्ता; तत्र--वहाँ; अस्मदीय--हमारे द्वारा; विमुशेन--विचार-विमर्श; कियान्-- क्या; इह--इसविषय में; अर्थ: --लाभ
हे प्रिय पुत्रो, भगवान् प्रकृति के तीनों गुणों के नियन्ता हैं और वे ब्रह्माण्ड की सृष्टि, पालनतथा संहार के लिए उत्तरदायी हैं।
उनकी अद्भुत सृजनात्मक शक्ति योगमाया योगेश्वरों तक सेआसानी से नहीं समझी जा सकती।
सबसे प्राचीन पुरुष भगवान् ही हमें बचा सकते हैं।
किन्तुइस विषय पर विचार-विमर्श करने से हम उन की ओर से और कया कर सकते हैं ?
