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अध्याय सत्रह: ब्रह्मांड की सभी दिशाओं पर हिरण्याक्ष की विजय

3.17मैत्रेय उवाचनिशम्यात्मभुवा गीत॑ कारणं शड्डयोज्झिता: ।

ततः सर्वे न्यवर्तन्त त्रेदिवाय दिवौकसः ॥

१॥

मैत्रेय: --मैत्रेय मुनि ने; उवाच--कहा; निशम्य--सुनकर; आत्म-भुवा--ब्रह्मा द्वारा; गीतम्‌ू--व्याख्या; कारणम्‌ू--कारण; शट्ढडया-- भय से; उज्झिता: --मुक्त; ततः--तब; सर्वे--सभी; न्यवर्तन्त--लौट गये; त्रि-दिवाय--स्वर्ग लोकको; दिव-ओकसः--देवतागण ( जो स्वर्गलोक के वासी हैं )।

श्रीमैत्रेय ने कहा-विष्णु से उत्पन्न ब्रह्म ने जब अन्धकार का कारण कह सुनाया,तो स्वर्गलोक के निवासी देवता समस्त भय से मुक्त हो गये।

इस प्रकार वे सभी अपने-अपने लोकों को वापस चले गये।

दितिस्तु भर्तुरादेशादपत्यपरिशड्डिनी ।

पूर्णे वर्षशते साध्वी पुत्रौ प्रसुषुवे यमौ ॥

२॥

दिति:--दिति; तु--लेकिन; भर्तु:ः--अपने पति की; आदेशात्‌--आज्ञा से; अपत्य--अपने बच्चों से; परिश्धिनी --शंकालु।

; पूर्णे--पूरे; वर्ष-शते--एक सौ वर्ष बाद; साध्वी--पतित्रता स्त्री ने; पुत्रौ--दो पुत्र; प्रसुषुबे--जन्म दिया;यमौ--जुड़वाँ |

साध्वी दिति अपने गर्भ में स्थित सन्‍्तानों से देवों के प्रति उपद्रव किये जाने के लिएअत्यधिक शंकालु थी और उसके पति ने भी यही भविष्यवाणी की थी।

अत: उसने एकसौ वर्षो के गर्भकाल के पश्चात्‌ जुड़वाँ पुत्रों को जन्म दिया।

उत्पाता बहवस्तत्र निपेतुर्जायमानयो: ।

दिवि भुव्यन्तरिक्षे च लोकस्योरुभयावहा: ॥

३॥

उत्पाता:--प्राकृतिक उपद्रव; बहवः--अनेक; तत्र--वहाँ; निपेतु:--घटित हुए; जायमानयो:--उनके जन्म के समय;दिवि--स्वर्गलोक में; भुवि--पृथ्वी पर; अन्तरिक्षे--बाह्य आकाश में; च--तथा; लोकस्य--संसार का; उरुू--अत्यधिक; भय-आवहा:--भय उत्पन्न करने वालाभयानक

दोनों असुरों के जन्म के समय स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा इन दोनों के मध्य केलोकों में अनेक प्राकृतिक उपद्रव हुए जो अत्यन्त भयावने एवं विस्मयपूर्ण थे।

सहाचला भुवश्लेलुर्दिश: सर्वा: प्रजज्वलु: ।

सोल्काश्चाशनयः पेतु: केतवश्चार्तिहितव: ॥

४॥

सह--के साथ साथ; अचला:--पर्वत; भुवः--पृथ्वी के; चेलु:--हिल उठी; दिश:--दिशाएँ; सर्वा:--समस्त;प्रजज्वलु:--अग्नि के समान धधक उठीं; स--साथ; उल्का:--उल्कापिंड; च--तथा; अशनय:--वज्; पेतु:--गिरपड़े; केतव:--पुच्छल तारे; च--तथा; आर्ति-हेतवः--समस्त अशुभों का कारण ।

पृथ्वी पर पर्वत काँपने लगे और ऐसा प्रतीत होने लगा मानो सर्वत्र अग्नि ही अग्निहो।

उल्काओं, पुच्छल तारों तथा वज्ों के साथ-साथ शनि जैसे अनेक अशुभ ग्रह दिखाईदेने लगे।

वबवौ वायु: सुदुःस्पर्श: फूत्कारानीरयन्मुहुः ।

उन्मूलयन्नगपतीन्वात्यानीको रजोध्वज: ॥

५॥

वबवबौ--बहने लगीं; वायु:--हवाएँ; सु-दुःस्पर्श:--छूने में बुरी लगने वाली; फूत्‌-कारानू--साँय-साँय का शब्द;ईरयन्‌ू--निकालती हुई; मुहुः--पुनःपुन:; उन्मूलयन्‌--उखाड़ती हुई; नग-पतीन्‌--विशाल वृक्षों को; वात्या--अंधड़;अनीकः--सेनाएँ; रज:-- धूल; ध्वज:--झंडे, पताकाएँ |

बारम्बार साँय-साँय करती तथा विशाल वृक्षों को उखाड़ती हुई अत्यन्त दुस्सह-स्पर्शी हवाएँ बहने लगीं।

उस समय अंधड़ उनकी सेनाएँ और धूल के मेघ उनकी ध्वजाएँलग रही थीं।

उद्धसत्तडिदम्भोद्घटया नष्टभागणे ।

व्योम्नि प्रविष्ठटमसा न सम व्याहृश्यते पदम्‌ ॥

६॥

उद्धसत्‌--जोर जोर से हँसकर; तडित्‌--बिजली; अम्भोद--बादलों के; घटया--समूह; नष्ट--विनष्ट; भा-गणे--नक्षत्र; व्योग्नि--आकाश में; प्रविष्ट--घिरा हुआ; तमसा--अंधकार से; न--नहीं; सम व्याहश्यते--दिखता था;पदम्‌--कोई स्थान

आकाश के नक्षत्रों को मेघों की घटाओं ने घेर लिया और उनमें कभी कभी बिजलीचमक जाती तो लगता मानो जोर से हँस रही हो।

चारों ओर अन्धकार का राज्य था औरकुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था।

चुक्रोश विमना वार्थिरुदूर्मि: क्षुभितोदर: ।

सोदपानाश्च सरितश्रुक्षुभु: शुष्कपड्डजा: ॥

७॥

चुक्रोश--जोर जोर से विलाप करने लगा; विमना:--दुखी; वार्धि: --समुद्र; उदूर्मि:ः-- ऊँची ऊँची लहरें; क्षुभित--विश्लुब्ध; उदरः--भीतर के प्राणी; स-उदपाना:--जलाशयों तथा कुंओं के पेयजल सहित; च--तथा; सरितः--नदियाँ; चुक्षुभुः--श्षुब्ध हुए; शुष्क--सूखे हुए; पड्ढूजा:--कमल पुष्प

उत्ताल तरंगों से युक्त सागर मानो शोक में जोर जोर से विलाप कर रहा था औरउसमें रहने वाले प्राणियों में हलचल मची थी।

नदियाँ तथा सरोवर भी विश्षुब्ध हो उठेऔर कमल मुरझा गये।

मुहुः परिधयो भूवन्सराह्ये: शशिसूर्ययो: ।

निर्घाता रथनिर्हठादा विवरेभ्य: प्रजज्ञिरि ॥

८॥

मुहुः--पुनः पुनः; परिधय:--कुहरे से युक्त मण्डल; अभूवन्‌--प्रकट हुआ; स-राह्वोः--ग्रहणों के समय; शशि--चन्द्रमा का; सूर्ययो: --सूर्य का; निर्घाता:--गर्जन; रथ-निर्हादा: --घर्घर करते रथों का सा शब्द; विवरेभ्य:--पर्वतकी गुफाओं से; प्रजज्ञिरि--उत्पन्न हो रहा था।

सूर्य तथा चन्द्रमा के चारों ओर ग्रहण लगने के समय अमंगल-सूचक मण्डल बार-बार दिखाई पड़ने लगा।

बिना बादलों के ही गरजने की ध्वनि और पर्वत की गुफाओं सेरथों जैसी घरघराहट सुनाई पड़ने लगी।

अन्तग्रमिषु मुखतो वमन्त्यो वह्िमुल्बणम्‌ ।

सृगालोलूकटड्डारैः प्रणेदुशशिवं शिवा: ॥

९॥

अन्तः--भीतर; ग्रामेषु--गाँवों के; मुखतः--उनके मुखों से; वमन्त्य:;--उगलते हुए; वह्विमू--आग; उल्बणम्‌--भयावनी; सृगाल--सियार; उलूक--उललू; टट्ढारै:--चीख से; प्रणेदु:--उत्पन्न; अशिवम्‌--अशुभ, अमंगलसूचक;शिवा:--सियारिनें

गाँवों के भीतर सियारिनें अपने मुखों से दहकती आग उगलती हुई अमंगल सूचकशब्द करने लगीं।

इस रोने में सियार तथा उल्लू भी साथ हो लिये।

सड्डीतवद्रोदनवदुन्नमय्य शिरोधराम्‌ ।

व्यमुझ्जन्विविधा वाचो ग्रामसिंहास्ततस्ततः ॥

१०॥

सड़ीत-वत्‌--मानो गा रहे हों; रोदन-वत्‌--रोने के समान; उन्नमय्य--उठाकर; शिरोधराम्‌-र्दन; व्यमुझ्नन्‌ --निकालते हुए; विविधा:--नाना प्रकार की; वाच: --चीत्कार; ग्राम-सिंहा: -- कुत्ते; ततः ततः--जहाँ तहाँ

जहाँ तहाँ कुत्ते अपनी गर्दन ऊपर उठा उठाकर शब्द करने लगे मानो कभी वे गा रहेहों और कभी विलाप कर रहे हों।

खराश्च कर्कशैः क्षत्त: खुरर्घ्नन्तो धरातलम्‌ ।

खार्काररभसा मत्ताः पर्यधावन्वरूथश: ॥

११॥

खराः--गधे; च--तथा; कर्कशैः--कटु; क्षत्त:--हे विदुर; खुरैः--अपने खुरों से; घ्नन्तः--मारते हुए; धरा-तलम्‌--पृथ्वी पर; खा:-कार--रेंकते हुए; रभसा:--बुरी तरह से संलग्न; मत्ता:--प्रमत्त, पागल; पर्यधावन्‌--इधर उधर दौड़नेलगे; वरूथशः --झुंडों में ।

हे विदुर, झुंड के झुंड गधे अपने कठोर खुरों से पृथ्वी पर प्रहार करते हुए तथा जोरजोर से रेंकते हुए इधर उधर दौड़ने लगे।

रुदन्तो रासभत्रस्ता नीडादुदपतन्खगा: ।

घोषेरण्ये च पशव: शकृन्मूत्रमकुर्बवत ॥

१२॥

रुदन्तः--रोते हुए; रासभ--गधों के द्वारा; त्रस्ता:-- भयभीत; नीडात्‌--घोंसले से; उदपतन्‌--ऊपर उड़ने लगे;खगा:--पक्षी; घोषे--गोशाला में; अरण्ये--जंगल में; च--तथा; पशव:--पशु; शकृत्‌--मल; मूत्रम्‌--मूत्र;अकुर्वत--त्याग दिया।

गधों के रेंकने से भयभीत होकर पक्षी अपने घोसलों से निकलकर चीख चीख करउड़ने लगे और गोशालाओं तथा जंगलों में पशु मल-मूत्र त्यागने लगे।

गावोअत्रसन्नसूग्दोहास्तोयदा: पूयवर्षिण: ।

व्यरुदन्देवलिड्भानि द्रुमा: पेतुर्विनानिलम्‌ ॥

१३॥

" गावः-गाएँ; अत्रसन्‌-- भयभीत थीं; असूक्‌ --रक्त; दोहा:--प्रदान किया; तोयदा:--बादल; पूय--पीब;वर्षिण:--वर्षा करते हुए; व्यरूदन्‌ू--अश्रुपात करने लगे; देव-लिड्जनि--देवों के विग्रह; द्रुमा: --वृक्ष; पेतु:--गिरपड़े; विना--की अनुपस्थिति में; अनिलमू--हवा का झोंका, आँधी |

भयभीत होने के कारण गौवें दूध के स्थान पर रक्त देने लगीं, बादलों से पीब बरसनेलगा, मन्दिरों में देवों के विग्रहों से आँसू निकलने लगे और वृक्ष बिना आँधी के ही गिरनेलगे।

ग्रहान्पुण्यतमानन्ये भगणांश्चापि दीपिता: ।

अतिचेरुव॑ क्रगत्या युयुधुश्ष परस्परम्‌ ॥

१४॥

ग्रहानू-ग्रह ( लोक ); पुण्य-तमान्‌--अत्यन्त शुभ; अन्ये--अन्य ( क्रूर ग्रह ); भ-गणान्‌--नक्षत्र समूह; च--यथा;अपि--भी; दीपिता:-- प्रकाशमान; अतिचेरु: --अध्यारोपित; वक्र-गत्या--टेढ़ी मेढ़ी चाल से; युयुधु:--परस्पर भिड़गये; च--तथा; परः-परम्‌--एक दूसरे से |

मंगल तथा शनि जैसे क्रूर ग्रह बृहस्पति, शुक्र तथा अनेक शुभ नक्षत्रों को लाँघधकरतेजी से चमकने लगे।

टेढ़े मेढ़े रास्तों में घूमने के कारण ग्रहों में परस्पर टक्कर होने लगी।

इष्टान्यांश्व महोत्पातानतत्तत्त्वविदः प्रजा: ।

ब्रह्मपुत्रानृते भीता मेनिरे विश्वसम्प्लवम्‌ ॥

१५॥

इष्ठा--देखकर; अन्यानू--अन्य लोग; च--यथा; महा--महान; उत्पातान्‌ू--अपशकुन; अ-ततू-तत्त्व-विद: --रहस्यको न जानते हुए; प्रजा:--लोग; ब्रह्म-पुत्रान्‌--ब्रह्मा के पुत्रों ( चारों कुमारों ); ऋते--के सिवाय; भीता:--अन्यन्तडरे हुए; मेनिरे--सोचा; विश्व-सम्प्लवम्‌--विश्व का विलय |

इस प्रकार के तथा अन्य अनेक अपशकुनों को देखकर ब्रह्मा के चारों ऋषि-पुत्र,जिन्हें जय तथा विजय के पतन एवं दिति के पुत्रों के रूप में जन्म लेने का ज्ञान था, उनके अतिरिक्त सभी लोग भयभीत हो उठे।

उन्हें इन उत्पातों के मर्म का पता न था औरवे सोच रहे थे कि ब्रह्माण्ड का प्रलय होने वाला है।

तावादिदैत्यौ सहसा व्यज्यमानात्मपौरुषौ ।

ववृधातेश्मसारेण कायेनाद्विपती इव ॥

१६॥

तौ--वे दोनों; आदि-दैत्यौ--सृष्टि के प्रारम्भ में उत्पन्न असुर; सहसा--शीघ्र, तेजी से; व्यज्यमान--प्रकट होकर;आत्म--अपने; पौरुषौ--शौर्य ; ववृधाते--बड़े हुए; अश्म-सारेण--इस्पात तुल्य; कायेन--शरीर से; अद्वि-पती--दोविशाल पर्वत; इव--सहृश |

पुराकाल में प्रकट इन दोनों असुरों के शरीर में शीघ्र ही असामान्य लक्षण प्रकट होनेलगे, उनके शारीरिक ढाँचे इस्पात के समान थे और वे दो विशाल पर्वतों के समान बढ़नेलगे।

दिविस्पृूशौ हेमकिरीटकोटिभिर्‌निरुद्धकाष्ठो स्फुरदड्रदाभुजौ ।

गां कम्पयन्तौ चरणै: पदे पदेकट्य़ा सुकाा्च्यार्कमतीत्य तस्थतुः ॥

१७॥

दिवि-स्पूृशौ--आकाश को छूने वाला; हेम--स्वर्णिम; किरीट--उनके मुकुटों का; कोटिभि: --शिखरों से;निरुद्ध--अवरुद्ध; काष्टौ--दिशाएँ; स्फुरत्‌ू--चमकीले; अड्भदा--बाजूबंद; भुजौ--जिनकी बाँहों में; गाम्‌--पृथ्वी को; कम्पयन्तौ--हिलाते हुए; चरणैः--अपने पाँवों से; पदे पदे--पत्येक पद पर; कट्या--अपनी कमर से; सु-काउ्च्या--आभूषित करधनियों से; अर्कम्‌--सूर्य; अतीत्य--पार करके; तस्थतु:--वे खड़े हुए

उनके शरीर इतने ऊँचे हो गये कि उनके स्वर्ण-मुकुटों के शिखर मानो आकाश कोचूम रहे हों।

उनके कारण सभी दिशाएँ अवरुद्ध हो जाती थीं और जब वे चलते तो उनकेप्रत्येक पग पर पृथ्वी हिलती थी।

उनके बाहुओं में चमकीले बाजूबन्द सुशोभित थे।

उनकी कमर में परम सुन्दर करधनियाँ बँधी थीं और जब वे खड़े होते तो ऐसा लगतामानो उनकी कमर से सूर्य ढक गया हो।

प्रजापतिर्नाम तयोरकार्षीद्‌यः प्राक्स्वदेहाद्यममयोरजायत ।

तं वै हिरण्यकशिपुं विदुः प्रजायं तं हिरण्याक्षमसूत साग्रतः ॥

१८॥

प्रजापति:--कश्यप ने; नाम--नाम; तयो:--दोनों के; अकार्षीत्‌--रखा; यः:--जो; प्राक्‌-- प्रथम; स्व-देहात्‌ --अपने शरीर से; यमयो: --जुड़वों में से; अजायत--उत्पन्न हुआ; तम्‌--उसको; बै--निस्सन्देह; हिरण्यकशिपुम्‌ू--हिरण्यकशिपु; विदुः--जानते हैं; प्रजा:--लोग; यम्‌--जिसको; तम्‌--उसको; हिरण्याक्षम्‌--हिरण्याक्ष; असूत--जन्म दिया; सा--वह ( दिति ); अग्रतः--पहले |

जीवात्माओं के सृष्ठा कश्यप ने अपने जुड़वां पुत्रों का नामकरण किया।

जो पहलेउत्पन्न हुआ उसका नाम उन्होंने हिरण्याक्ष रखा और जिसको दिति ने पहले गर्भ में धारणकिया था उसका नाम हिरण्यकश्पु रखा।

चक्रे हिरण्यकशिपुर्दो भ्या ब्रह्मवरेण च ।

वशे सपालॉल्लोकांस्त्रीनकुतोमृत्युरुद्धत: ॥

१९॥

चक्रे--बनाया; हिरण्यकशिपु:--हिरण्यकशिपु; दोर्भ्याम्‌ू--अपने दोनों हाथों से; ब्रह्म-वरेण--ब्रह्मा के वरदान से;च--तथा; वशे--नियन्त्रण में; स-पालानू--उनके पालने वालों सहित; लोकान्‌--लोक; त्रीनू--तीन; अकुतः-मृत्यु:--किसी से भी मृत्यु का भय न होना; उद्धतः--गर्वित, उद्धत।

ज्येष्ट पुत्र हिरण्यकशिपु को तीनों लोकों में किसी से भी अपनी मृत्यु का भय न था,क्योंकि उसे ब्रह्मा से वरदान प्राप्त हुआ था।

इस वरदान के कारण यह अत्यन्त दंभी तथाअभिमानी हो गया था और तीनों लोकों को अपने वश्ञ में करने में समर्थ था।

हिरण्याक्षोनुजस्तस्य प्रिय: प्रीतिकृदन्वहम्‌ ।

गदापाणिर्दिवं यातो युयुत्सुर्मृगयन्रणम्‌ ॥

२०॥

हिरण्याक्ष:--हिरण्याक्ष; अनुज:--छोटा भाई; तस्थ--उसका; प्रिय:--प्रिय; प्रीति-कृत्‌--प्रसन्न करने के लिए उद्यत;अनु-अहम्‌--प्रतिदिन; गदा-पाणि:--गदा धारण किये; दिवम्‌ू--उच्च लोकों को; यात:--घूमा; युयुत्सु:--लड़ने कीइच्छावाला; मृगयन्‌--खोजते हुए; रणम्‌--युद्ध |

छोटा भाई हिरण्याक्ष अपने कार्यों से अपने अग्रज भ्राता को प्रसन्न रखने के लिएउद्यत रहता था।

हिरण्यकशिपु को प्रसन्न रखने के उद्देश्य से ही उसने अपने कंधे पर गदारखी और लड़ने की इच्छा से पूरे ब्रह्माण्ड में घूम आया।

त॑ वीक्ष्य दुःसहजवं रणत्काञझ्जननूपुरम्‌ ।

वैजयन्त्या स्त्रजा जुष्टमंसन्यस्तमहागदम्‌ ॥

२१॥

तम्‌--उसको; वीक्ष्य--देखकर; दुःसह--वश में करना कठिन; जवम्‌--वेग; रणत्‌--बजती हुई; काञ्लन--स्वर्ण;नूपुरमू--नूपुर, पाँव का आभूषण; वैजयन्त्या सत्रजा--वैजयन्ती माला से; जुष्टमू-- आभूषित; अंस--कंधे पर;न्यस्त--टिका; महा-गदम्‌--बड़ी गदा।

हिरण्याक्ष के आवेग को नियंत्रण कर पाना कठिन था।

उसके पैरों में सोने के नूपुरोंकी झनकार हो रही थी, उसके गले में विशाल माला सुशोभित थी और वह अपनीविशाल गदा को अपने एक कंधे पर धारण किये था।

मनोवीर्यवरोत्सिक्तमसृण्यमकुतो भयम्‌ ।

भीता निलिल्यरे देवास्ताक्च्यत्रस्ता इवाहय: ॥

२२॥

मनः-वीर्य--मनोबल तथा शारीरिक बल; वर--वरदान से; उत्सिक्तम्‌-दंभी, गर्वीला; असृण्यम्‌--रोक पाने मेंअसमर्थ; अकुतः-भयम्‌--किसी से न डरने वाला; भीता:--डरे हुए; निलिल्यिरि--छिपा लिया; देवा:--देवताओं ने;ताक्ष्य--गरुड़ से; त्रस्ताः-- भयभीत; इव--के समान; अहयः--सर्प

उसके मनोबल, शारीरिक बल तथा ब्रह्मा द्वारा प्राप्त वरदान ने उसे दंभी बना दियाथा।

उसे न तो किसी से अपनी मृत्यु का भय था और न उस पर किसी का अंकुश था।

अतः देवता उसे देखकर ही भयभीत हो उठते थे और अपने को उसी प्रकार छिपा लेतेजिस तरह गरुड़ के भय से सर्प छिप जाते हैं।

स वे तिरोहितान्दष्ठा महसा स्वेन दैत्यराट्‌ ।

सेन्द्रान्देवगणान्क्षीबानपश्यन्व्यनदद्भुशम्‌ ॥

२३॥

सः--उसने; वै--निस्सन्देह; तिरोहितानू--लुप्त; दृष्टा--देखकर; महसा--शक्ति से; स्वेन--अपनी; दैत्य-राट्‌--दैत्यों( असुरों ) का प्रधान; स-इन्द्रान्‌--इन्द्र सहित; देव-गणान्‌--देवताओं को; क्षीबान्‌ू--मदान्ध; अपश्यनू--न पाकर;व्यनदत्‌-गर्जना की; भूशम्‌--उच्च स्वर से |

पहले अपनी शक्ति के मद से चूर रहने वाले इन्द्र तथा अन्य देवताओं को अपनेसमक्ष न पाकर तथा यह देखकर कि उसकी शक्ति के सम्मुख वे सभी छिप गये हैं, उसदैत्यराज ने गम्भीर गर्जना की।

ततो निवृत्त: क्रीडिष्यन्गम्भीरं भीमनिस्वनम्‌ ।

विजगाहे महासत्त्वो वार्थि मत्त इव द्विप: ॥

२४॥

ततः--तब ; निवृत्त:--लौट आया; क्रीडिष्यन्‌ू--क्रीड़ा ( कौतुक ) करने के लिए; गम्भीरम्‌--गहरे; भीम-निस्वनम्‌--घोर गर्जना करता; विजगाहे--डुबकी लगाई; महा-सत्त्व:--शक्तिमान प्राणी; वार्थिम्‌--समुद्र में; मत्त: --क्रोध में;इब--समान; द्विप:--हाथी

स्वर्गलोक से लौटने के बाद मतवाले हाथी के समान उस महाबली असुर नेभयानक गर्जना करते हुए गहरे समुद्र में क्रीड़ावश डुबकी लगाई।

तस्मिन्प्रविष्ट वरूणस्य सैनिकायादोगणा: सन्नधिय: ससाध्वसा: ।

अहन्यमाना अपि तस्य वर्चसाप्रधर्षिता दूरतरं प्रदुद्वुबुः ॥

२५॥

तस्मिन्‌ प्रविष्ट--समुद्र में घुसने पर; वरुणस्य--वरुण के; सैनिका:--रक्षक; याद:-गणा:--जलचर जीव; सन्न-धिय:--हकबकाये हुए; स-साध्वसा: --डर से; अहन्यमाना: --न मारा जाकर; अपि-- भी; तस्य--उनकी ; वर्चसा--धाक से; प्रधर्षिता:--घबड़ाकर; दूर-तरम्‌--बहुत दूर; प्रदुद्रबुः--तेजी से भाग गये।

समुद्र में उसके प्रवेश करते ही वरुण के सैनिक समस्त जलचर प्राणी डर गये औरबहुत दूर भाग गये।

इस प्रकार बिना वार किये ही हिरण्याक्ष ने अपनी धाक जमा ली।

स वर्षपूगानुदधौ महाबल-श्वरन्महोर्मी ज्छुसनेरितान्मुहु: ।

मौर्व्याभिजघ्ने गदया विभावरी-मासेदिवांस्तात पुरी प्रचेतस: ॥

२६॥

सः--वह; वर्ष-पूगानू--अनेक वर्षों तक; उदधौ--समुद्र में; महा-बलः--शक्तिशाली; चरन्‌--घूमते हुए; महा-ऊर्मीन्‌--उत्ताल तरंगें; श्रसन--वायु से; ईरितानू--ऊपर नीचे उठते हुए; मुहुः--पुनः पुनः; मौर्व्या--लोहे की;अभिजघ्ने--वार किया; गदया--गदा से; विभावरीम्‌--विभावरी; आसेदिवान्‌--पहुँचा; तात--हे विदुर; पुरीम्‌--राजधानी; प्रचेतस:--वरुण की हे विदुर

वह महाबली हिरण्याक्ष अनेकानेक वर्षो तक समुद्र में घूमता हुआ वायु सेदोलायमान उत्ताल तरंगों पर अपनी लोहे की गदा से बारम्बार प्रहार करता हुआ वरुण की राजधानी विभावरी में जा पहुँचा।

तत्रोपलभ्यासुरलोकपालक॑यादोगणानामृषभं प्रचेतसम्‌ ।

स्मयन्प्रलब्धुं प्रणिपत्य नीचव-ज्जगाद मे देहयाधिराज संयुगम्‌ ॥

२७॥

तत्र--वहाँ; उपलभ्य--पहुँचकर; असुर-लोक--असुरों के रहने के भूभाग का; पालकम्‌--रक्षक; यादः-गणानाम्‌--जलचरों का; ऋषभम्‌--राजा; प्रचेतसम्‌--वरुण; स्मयन्‌--हँसते हुए; प्रलब्धुम्‌-हँसी उड़ाते;प्रणिपत्य--झुक करके; नीच-वत्‌--नीच मनुष्य की तरह; जगाद--कहा; मे-- मुझको; देहि--दो; अधिराज--हेमहान्‌ राजा; संयुगम्‌-युद्ध |

विभावरी वरुण की पुरी है और वरुण समस्त जलचरों का स्वामी तथा ब्रह्माण्ड केअध: क्षेत्रों का रक्षक है, जहाँ सामान्य रूप से असुर वास करते हैं।

वहाँ पहुँचकरहिरण्याक्ष नीच पुरुष के समान वरुण के चरणों पर गिर पड़ा और उसकी हँसी उड़ाने केलिए उसने मुस्कुराते हुए कहा, ' हे परमेश्वर, मुझे युद्ध की भिक्षा दीजिये।

!त्वं लोकपालोधिपतिर्॑हच्छुवावीर्यापहो दुर्मदवीरमानिनाम्‌ ।

विजित्य लोके खिलदैत्यदानवान्‌यद्राजसूयेन पुरायजत्प्रभो ॥

२८॥

त्वमू--तुम ( वरुण ); लोक-पाल:--लोक का रक्षक; अधिपतिः --शासक; बृहत्‌ू-श्रवा: --कीर्तिवान्‌; वीर्य--शक्ति; अपह:--घटा हुआ; दुर्मद--घमंडी का; वीर-मानिनाम्‌--अपने को महान्‌ वीर समझते हुए; विजित्य--जीतकर; लोके --संसार में; अखिल--समस्त; दैत्य--असुर; दानवान्‌--दानवों को; यत्‌--जहाँ से; राज-सूयेन--राजसूय यज्ञ द्वारा; पुरा--प्राचीनकाल में; अथजत्‌--पूजा की; प्रभो--हे भगवान्‌

आप समस्त गोलक के रक्षक तथा अत्यन्त कीर्तिवान शासक हैं।

आपने अहंकारी तथा मोहग्रस्त वीरों के दर्प को दल कर तथा इस संसार के सभी दैत्यों तथा दानवों कोजीत कर भगवान्‌ के हेतु एक बार राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया था।

स एवमुत्सिक्तमदेन विद्विषाहढं प्रलब्धो भगवानपां पति: ।

रोषं समुत्थं शमयन्स्वया धियाव्यवोचदड्रपशमं गता वयम्‌ ॥

२९॥

सः--वरुण; एवम्‌--इस प्रकार; उत्सिक्त--चूर; मदेन--मद से; विद्विषा--शत्रु के द्वारा; हहम्‌--अत्यधिक;प्रलब्ध: --हँसी उड़ाए जाने पर; भगवान्‌-- पूज्य; अपाम्‌--जल का; पति: --स्वामी; रोषम्‌ू--क्रो ध; समुत्थम्‌--उठकर; शमयन्‌--शान्त करते हुए; स्वया धिया--अपने तर्क से; व्यवोचत्‌--उसने उत्तर दिया; अड़-नहे प्रिय;उपशमम्‌--युद्ध से विरत; गता:--गये हुए; वयम्‌--हम |

अत्यन्त दंभी शत्रु के द्वारा इस प्रकार उपहास किये जाने पर जल के पूज्य स्वामी कोक्रोध तो आया, किन्तु तर्क के बल पर वे उस क्रोध को पी गये और उन्होंने इस प्रकारउत्तर दिया-हे प्रिय, युद्ध के लिए अत्यधिक बूढ़ा होने के कारण अब मैं युद्ध से दूररहता हूँ।

पश्यामि नान्य॑ पुरुषात्पुरातनाद्‌यः संयुगे त्वां रणमार्गकोविदम्‌ ।

आराधयिष्यत्यसुरष भेहि तंमनस्विनो य॑ं गृणते भवाहशा: ॥

३०॥

पश्यामि--देखता हूँ; न--नहीं; अन्यम्‌ू--अन्य; पुरुषातू-पुरुष की अपेक्षा; पुरातनात्‌--अत्यन्त प्राचीन; यः--जो;संयुगे--युद्ध में; त्वामू--तुमको; रण-मार्ग--युद्ध कला में; कोविदम्‌--अत्यन्त पटु; आराधयिष्यति--सन्तोषमिलेगा; असुर-ऋषभ--हे असुरों के प्रमुख; इहि--पास जाओ; तम्‌--उसको; मनस्विन:--बहादुर; यम्‌--जिसको;गृणते--प्रशंसा करते हैं; भवाहशा: --तुम्हारी तरह ।

तुम युद्ध में इतने कुशल हो कि मुझे परम पुरातन पुरुष भगवान्‌ विष्णु के अतिरिक्तकोई ऐसा नहीं दिखता, जो तुम्हें युद्ध में तुष्टि प्रदान कर सके।

अतः हे असुरश्रेष्ठ, तुमउन्हीं के पास जाओ, जिनकी तुम जैसे योद्धा भी बड़ाई करते हैं।

त॑ वीरमारादभिपद्य विस्मय:शयिष्यसे वीरशये श्रभिर्वृतः ।

यस्त्वद्विधानामसतां प्रशान्तयेरूपाणि धत्ते सदनुग्रहेच्छया ॥

३१॥

तमू--उसको; वीरम्‌--परम वीर; आरातू--तुरन्‍्त; अभिपद्य--पहुँचने पर; विस्मय:--गर्व से रहित; शविष्यसे--तुमसो जाओगे; वीरशये--युद्ध भूमि में; श्रभिः--कुत्तों के द्वारा; वृत:--घिरे हुए; यः--जो; त्वत्‌-विधानाम्‌ू--तुमसमान; असताम्‌--दुष्ट पुरुषों का; प्रशान्तये--मार भगाने; रूपाणि--विविध रूप; धत्ते--धारण करता है; सत्‌--सत्पुरुषों के लिए; अनुग्रह--अपनी कृपा दिखाने के लिए; इच्छया--इच्छा से |

वरुण ने आगे कहा--उनके पास पहुँचते ही तुम्हारा सारा अभिमान दूर हो जाएगाऔर तुम युद्धभूमि में कुत्तों से घिरकर चिर निद्रा में सो जाओगे।

तुम जैसे दुष्टों को मारभगाने तथा सत्पुरुषों पर अपनी कृपा प्रदर्शित करने के लिए ही वे वराह जैसे विविधरूपों में अवतरित होते रहते हैं।

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