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अध्याय दो: भगवान कृष्ण का स्मरण

3.2श्रीशुक उबाचइति भागवत: पृष्ठ: क्षत्रा वार्ता प्रियाश्रयाम्‌ ।

प्रतिवक्तु न चोत्सेह औत्कण्ठ्यात्स्मारितेश्वरः ॥

१॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; भागवतः--महान्‌ भक्त; पृष्ट:--पूछे जाने पर; क्षत्रा--विदुर द्वारा; वार्तामू--सन्देश; प्रिय-आश्रयाम्‌--प्रियतम के विषय में; प्रतिवक्तुमू--उत्तर देने के लिए; न--नहीं; च--भी;उत्सेहे--उत्सुक हुआ; औत्कण्ठ्यात्‌--अत्यधिक उत्सुकता वश; स्मारित--स्मृति; ईश्वर: --ईश्वर

श्री शुकदेव गोस्वामी ने कहा : जब विदुर ने महान्‌ भक्त उद्धव से प्रियतम ( कृष्ण ) कासन्देश बतलाने के लिए कहा तो भगवान्‌ की स्मृति के विषय में अत्यधिक विह्लता के कारणउद्धव तुरन्त उत्तर नहीं दे पाये।

यः पञ्जञहायनो मात्रा प्रातरशाय याचित: ।

तन्नैच्छद्रचयन्यस्थ सपर्या बाललीलया ॥

२॥

यः--जो; पश्ञ--पाँच; हायन:--वर्ष का; मात्रा--अपनी माता द्वारा; प्रातः-आशाय--कलेवा के लिए; याचित:ः--बुलाये जानेपर; तत्‌--उस; न--नहीं; ऐच्छत्‌--चाहा; रचयन्‌--खेलते हुए; यस्य--जिसकी; सपर्याम्‌--सेवा; बाल-लीलया--बचपन।

वे अपने बचपन में ही जब पाँच वर्ष के थे तो भगवान्‌ कृष्ण की सेवा में इतने लीन हो जातेथे कि जब उनकी माता प्रातःकालीन कलेवा करने के लिए बुलातीं तो वे कलेवा करना नहींचाहते थे।

स कथं सेवया तस्य कालेन जरसं गतः ।

पूष्टो वार्ता प्रतिब्रूयाद्धर्तु: पादावनुस्मरन्‌ ॥

३॥

सः--उद्धव; कथम्‌--कैसे; सेवया--ऐसी सेवा से; तस्थ--उसका; कालेन--समय के साथ; जरसम्‌--अशक्तता को; गत:--प्राप्त; पृष्ट:--पूछे जाने पर; वार्तामू--सन्देश; प्रतिब्रूयात्‌ू--उत्तर देने के लिए; भर्तु:--भगवान्‌ के; पादौ--चरण कमलों का;अनुस्मरन्‌ू--स्मरण करते हुए।

इस तरह उद्धव अपने बचपन से ही लगातार कृष्ण की सेवा करते रहे और उनकीवृद्धावस्था में सेवा की वह प्रवृत्ति कभी शिधिल नहीं हुईं।

जैसे ही उनसे भगवान्‌ के सन्देश केविषय में पूछा गया, उन्हें तुरन्त उनके विषय में सब कुछ स्मरण हो आया।

स मुहूर्तमभूत्तृष्णी कृष्णाड्प्रिसुधया भूशम्‌ ।

तीब्रेण भक्तियोगेन निमग्नः साधु निर्वृतः ॥

४॥

सः--उद्धव; मुहूर्तम्‌-- क्षण भर के लिए; अभूत्‌--हो गया; तृष्णीम्‌--मौन; कृष्ण-अड्घ्रि-- भगवान्‌ के चरणकमलों के;सुधया--अमृत से; भूशम्‌--सुपक्व; तीव्रेण --अत्यन्त प्रबल; भक्ति-योगेन--भक्ति द्वारा; निमग्न: --डूबे हुए; साधु--उत्तम;निर्वृतः-प्रेम पूर्ण

वे क्षणभर के लिए एकदम मौन हो गये और उनका शरीर हिला-डुला तक नहीं।

वेभक्तिभाव में भगवान्‌ के चरणकमलों के स्मरण रूपी अमृत में पूरी तरह निमग्न हो गये औरउसी भाव में वे गहरे उतरते दिखने लगे।

पुलकोद्धिन्नसर्वाज्े मुझ्नन्मीलदृशा शुच्चः ।

पूर्णार्थो लक्षितस्तेन स्नेहप्रसरसम्प्लुत: ॥

५॥

पुलक-उद्ध्रिन्न--दिव्य भाव के शारीरिक परिवर्तन; सर्व-अड्डभ:--शरीर का हर भाग; मुझ्ननू--लेपते हुए; मीलत्‌--खोलते हुए;इहशा--आँखों द्वारा; शुचः--शोक के अश्रू; पूर्ण-अर्थ:--पूर्ण सिद्धि; लक्षित:--इस तरह देखा गया; तेन--विदुर द्वारा; स्नेह-प्रसर--विस्तृत प्रेम; सम्प्लुतः--पूर्णरूपेण स्वात्मीकृत |

विदुर ने देखा कि उद्धव में सम्पूर्ण भावों के कारण समस्त दिव्य शारीरिक परिवर्तन उत्पन्नहो आये हैं और वे अपनी आँखों से विछोह के आँसुओं को पोंछ डालने का प्रयास कर रहे हैं।

इस तरह विदुर यह जान गये कि उद्धव ने भगवान्‌ के प्रति गहन प्रेम को पूर्णरूपेण आत्मसात्‌कर लिया है।

शनकैभं॑गवल्लोकान्नूलोक॑ पुनरागतः ।

विमृज्य नेत्रे विदुरं प्रीत्याहोद्धव उत्स्मयन्‌ ॥

६॥

शनकै:--धधीरे-धीरे; भगवत्‌-- भगवान्‌; लोकात्‌-- धाम से; नूलोकम्‌--मनुष्य लोक को; पुनः आगत:--फिर से आकर;विमृज्य--पोंछकर; नेत्रे-- आँखें; विदुरम्‌--विदुर से; प्रीत्या--स्नेहपूर्वक; आह--कहा; उद्धव:--उद्धव ने; उत्स्मयन्‌--उनस्मृतियों के द्वारा।

महाभागवत उद्धव तुरन्त ही भगवान्‌ के धाम से मानव-स्तर पर उतर आये और अपनी आँखेंपोंछते हुए उन्होंने अपनी पुरानी स्मृतियों को जगाया तथा वे विदुर से प्रसन्नचित्त होकर बोले।

उद्धव उबाचकृष्णद्युमणि निम्लोचे गीर्णेष्वजगरेण ह ।

कि नु नः कुशल ब्रूयां गतश्रीषु गृहेष्वहम्‌ ॥

७॥

उद्धवः उवाच-- श्री उद्धव ने कहा; कृष्ण-द्युमणि--कृष्ण सूर्य; निम्लोचे--अस्त होने पर; गीर्णेषु--निगला जाकर;अजगरेण---अजगर सर्प द्वारा; ह-- भूतकाल में; किम्‌--क्या; नु--अन्य; नः--हमारी; कुशलम्‌--कुशल-मंगल; ब्रूयामू--मैंकहूँ; गत--गई हुई, विहीन; श्रीषु गृहेषु--घर में; अहम्‌--मैं

श्री उद्धव ने कहा : हे विदुर, संसार का सूर्य कृष्ण अस्त हो चुका है और अब हमारे घर कोकाल रूपी भारी अजगर ने निगल लिया है।

मैं आपसे अपनी कुशलता के विषय में क्या कहसकता हूँ?

दुर्भगो बत लोकोयं यदवो नितरामपि ।

ये संवसन्तो न विदुर्हरिं मीना इबोडुपम्‌ ॥

८॥

दुर्भप:--अभागा; बत--निश्चय ही; लोक: --ब्रह्माण्ड; अयम्‌ू--यह; यदव:ः--यदुकुल; नितराम्‌--विशेषरूप से; अपि-- भी;ये--जो; संवसन्तः--एकसाथ रहते हुए; न--नहीं; विदु:--जान पाये; हरिम्‌-- भगवान्‌ को; मीना:--मछलियाँ; इब उडुपम्‌--चन्द्रमा की तरह।

समस्त लोकों समेत यह ब्रह्माण्ड अत्यन्त अभागा है।

युदुकुल के सदस्य तो उनसे भी बढ़करअभागे हैं, क्योंकि वे श्री हरि को भगवान्‌ के रूप में नहीं पहचान पाये जिस तरह मछलियाँअन्द्रमा को नहीं पहचान पातीं।

इड्डितज्ञा: पुरुप्रौढा एकारामाश्व सात्वता: ।

सात्वतामृषभं सर्वे भूतावासममंसत ॥

९॥

इड्ड्ति-ज्ञाः--मनोवैज्ञानिक अध्ययन में पटु; पुरु-प्रौढा: --अत्यन्त अनुभवी; एक--एक; आरामा:--विश्राम; च--भी;सात्वता:--भक्तगण या अपने ही लोग; सात्वताम्‌ ऋषभम्‌--परिवार का मुखिया; सर्वे--समस्त; भूत-आवासम्‌--सर्व-व्यापी;अमंसत--जान सके

यदुगण अनुभवी भक्त, विद्वान तथा मनोवैज्ञानिक अध्ययन में पटु थे।

इससे भी बड़ी बातयह थी कि वे सभी लोग समस्त प्रकार की विश्रान्ति में भगवान्‌ के साथ रहते थे, फिर भी वेउन्हें केवल उस ब्रह्म के रूप में जान पाये जो सर्वत्र निवास करता है।

देवस्य मायया स्पृष्टा ये चान्यद्सदाश्रिता: ।

भ्राम्यते धीर्न तद्वाक्यैरात्मन्युप्तात्मनो हरो ॥

१०॥

देवस्य-- भगवान्‌ की; मायया--माया के प्रभाव से; स्पृष्टा:--दूषित हुए; ये--जो लोग; च--तथा; अन्यत्‌--अन्य लोग;असतू--मायावी; आश्लिता: --वशी भूत; भ्राम्यते--मोहग्रस्त बनाते हैं; धीः--बुद्द्धि; न--नहीं; तत्‌--उनके ; वाक्यैः --वचनोंसे; आत्मनि--परमात्मा में; उप्त-आत्मन:--शरणागत आत्माएँ; हरौ--हरि के प्रति

भगवान्‌ की माया द्वारा मोहित व्यक्तियों के वचन किसी भी स्थिति में उन लोगों की बुद्धिको विचलित नहीं कर सकते जो पूर्णतया शरणागत हैं।

प्रदर्श्यातप्ततपसामवितृप्तदृशां नृणाम्‌ ।

आदायान्तरधाहामस्तु स्वबिम्बं लोकलोचनम्‌ ॥

११॥

प्रदर्श--दिखलाकर; अतप्त--बिना किये; तपसाम्‌--तपस्या; अवितृप्त-दशाम्‌--दर्शन को पूरा किया; नृणाम्‌--लोगों का;आदाय--लेकर; अन्त:-- अन्तर्धान; अधात्‌--सम्पन्न किया; यः--जिसने; तु--लेकिन; स्व-बिम्बम्‌-- अपने ही स्वरूप को;लोक-लोचनम्‌--सार्वजनिक दृष्टि में

भगवान्‌ श्रीकृष्ण, जिन्होंने पृथ्वी पर सबों की दृष्टि के समक्ष अपना नित्य स्वरूप प्रकटकिया था, अपने स्वरूप को उन लोगों की दृष्टि से हटाकर अन्‍्तर्धान हो गये जो वांछित तपस्या न कर सकने के कारण उन्हें यथार्थ रूप में देख पाने में असमर्थ थे।

यन्मर्त्यलीलौपयिकं स्वयोग-मायाबलं दर्शयता गृहीतम्‌ ।

विस्मापनं स्वस्थ च सौभगरद्ें:पर पदं भूषणभूषणाड्ुम्‌ ॥

१२॥

यत्‌--उनका जो नित्यरूप; मर्त्य--मर्त्पजगत; लीला-उपयिकम्‌--लीलाओं के लिए उपयुक्त; स्व-योग-माया-बलम्‌--अन्तरंगाशक्ति का बल; दर्शबता--अभिव्यक्ति के लिए; गृहीतम्‌ू--ढूँढ निकाला; विस्मापनम्‌-- अद्भुत; स्वस्य-- अपना; च--तथा;सौभग-ऋद्धेः--ऐ श्रर्यवान्‌ का; परम्‌--परम; पदम्‌--गन्तव्य; भूषण-- आभूषण; भूषण-अड्र्मू--आभूषणों का।

भगवान्‌ अपनी अन्तरंगा शक्ति योगमाया के द्वारा मर्त्यलोक में प्रकट हुए।

वे अपने नित्यरूप में आये जो उनकी लीलाओं के लिए उपयुक्त है।

ये लीलाएँ सबों के लिए आश्चर्यजनक थीं,यहाँ तक कि उन लोगों के लिए भी जिन्हें अपने ऐश्वर्य का गर्व है, जिसमें वैकुण्ठपति के रूप मेंभगवान्‌ का स्वरूप भी सम्मिलित है।

इस तरह उनका ( श्रीकृष्ण का ) दिव्य शरीर समस्तआभूषणों का आभूषण है।

यद्धर्मसूनोर्बत राजसूयेनिरीक्ष्य हकक्‍्स्वस्त्ययनं त्रिलोक: ।

कार्ल्स्येन चाद्येह गतं विधातुर्‌अर्वाक्सृतौ कौशलमित्यमन्यत ॥

१३॥

यत्‌--जो रूप; धर्म-सूनो:--महाराज युधिष्ठिर के; बत--निश्चय ही; राजसूये--राजसूय यज्ञ शाला में; निरीक्ष्य--देखकर;हक्‌--दृष्टि; स्वस्त्ययनम्‌--मनोहर; त्रि-लोक:--तीनों लोक के; कार्त्स्येन--सम्पूर्णत:; च--इस तरह; अद्य--आज; इह--इसब्रह्माण्ड के भीतर; गतम्‌--पार करके; विधातु:--स्त्रष्टा ( ब्रह्म ) का; अर्वाक्‌--अर्वाचीन मानव; सृतौ-- भौतिक जगत में;'कौशलम्‌--दक्षता; इति--इस प्रकार; अमनन्‍्यत--सोचा |

महाराज युधिष्टिर द्वारा सम्पन्न किये गये राजसूय यज्ञ शाला में उच्चतर, मध्य तथाअधोलोकों से सारे देवता एकत्र हुए।

उन सबों ने भगवान्‌ कृष्ण के सुन्दर शारीरिक स्वरूप को देखकर विचार किया कि वे मनुष्यों के स्त्रष्टा ब्रह्म की चरम कौशलपूर्ण सृष्टि हैं।

यस्थानुरागप्लुतहासरास-लीलावलोकप्रतिलब्धमाना: ।

ब्रजस्त्रियो हश्भिरनुप्रवृत्तधियोवतस्थु: किल कृत्यशेषा: ॥

१४॥

यस्य--जिसकी; अनुराग--आसक्ति; प्लुत--वर्धित; हास--हँसी; रास--मजाक, विनोद; लीला--लीलाएँ; अवलोक--चितवन; प्रतिलब्ध--से प्राप्त; माना:--व्यथित; ब्रज-स्त्रिय:--व्रज की बालाएँ; हग्भि:ः--आँखों से; अनुप्रवृत्त-- अनुगमनकरती; धिय:--बुद्धि द्वारा; अवतस्थु:--चुपचाप बैठ गईं; किल--निस्सन्देह; कृत्य-शेषा:--घर का काम काज।

हँसी, विनोद तथा देखादेखी की लीलाओं के पश्चात्‌ ब्रज की बालाएँ कृष्ण के चले जानेपर व्यधित हो जातीं।

वे अपनी आँखों से उनका पीछा करती थीं, अतः वे हतबुद्धि होकर बैठजातीं और अपने घरेलू कामकाज पूरा न कर पातीं।

स्वशान्तरूपेष्वितरैः स्वरूपै-रभ्यर््रमानेष्वनुकम्पितात्मा ।

परावरेशो महदंशयुक्तोहाजोपि जातो भगवान्यथाग्नि: ॥

१५॥

स्व-शान्त-रूपेषु-- अपने शान्त भक्तों के प्रति; इतरैः--अन्यों, अभक्तों; स्व-रूपैः--अपने गुणों के अनुसार; अभ्यर्द्मानेषु --सताए जाकर; अनुकम्पित-आत्मा--सर्वदयामय भगवान्‌; पर-अवर--आध्यात्मिक तथा भौतिक; ईशः --नियंत्रक; महत्‌-अंश-युक्त:--महत्‌ तत्त्व अंश के साथ; हि--निश्चय ही; अज:--अजन्मा; अपि--यद्यपि; जात: --उत्पन्न है; भगवानू-- भगवान्‌;यथा--मानो; अग्निः--आग।

आध्यात्मिक तथा भौतिक सृष्टियों के सर्वदयालु नियन्ता भगवान्‌ अजन्मा हैं, किन्तु जबउनके शान्त भक्तों तथा भौतिक गुणों वाले व्यक्तियों के बीच संघर्ष होता है, तो वे महत्‌ तत्त्व केसाथ उसी तरह जन्म लेते हैं जिस तरह अग्नि उत्पन्न होती है।

मां खेदयत्येतदजस्य जन्म-विडम्बनं यद्वसुदेवगेहे ।

ब्रजे च वासोरिभयादिव स्वयंपुरादव्यवात्सीद्यदनन्तवीर्य: ॥

१६॥

माम्‌--मुझको; खेदयति--पीड़ा पहुँचाता है; एतत्‌ू--यह; अजस्य--अजन्मा का; जन्म--जन्म; विडम्बनमू--मोहित करना;यत्‌--जो; वसुदेव-गेहे --वसुदेव के घर में; ब्रजे--वृन्दावन में; च-- भी; वास:--निवास; अरि--शत्रु के; भयात्‌-- भय से;इवब--मानो; स्वयमू--स्वयं; पुरात्‌--मथुरा पुरी से; व्यवात्सीतू-- भाग गया; यत्‌--जो हैं; अनन्त-वीर्य:--असीम बलशाली।

जब मैं भगवान्‌ कृष्ण के बारे में सोचता हूँ कि वे अजन्मा होते हुए किस तरह वसुदेव केबन्दीगृह में उत्पन्न हुए थे, किस तरह अपने पिता के संरक्षण से ब्रज चले गये और वहाँ शत्रु-भयसे प्रच्छन्न रहते रहे तथा किस तरह असीम बलशाली होते हुए भी वे भयवश मथुरा से भागगये--ये सारी भ्रमित करने वाली घटनाएँ मुझे पीड़ा पहुँचाती हैं।

दुनोति चेतः स्मरतो ममैतद्‌यदाह पादावभिवन्द्य पित्रो: ।

ताताम्ब कंसादुरुशल्वितानांप्रसीदतं नोकृतनिष्कृतीनाम्‌ ॥

१७॥

दुनोति--मुझे पीड़ा पहुँचाता है; चेत:--हृदय; स्मरतः--सोचते हुए; मम--मेरा; एतत्‌--यह; यत्‌--जितना; आह--कहा;पादौ--चरणों की; अभिवन्द्य--पूजकर; पित्रो:--माता-पिता के; तात--हे पिता; अम्ब--हे माता; कंसात्‌--कंस से; उरू--महान; श्धितानाम्‌-- भयभीतों का; प्रसीदतम्‌--प्रसन्न हों; न: --हमारा; अकृत--सम्पन्न नहीं हुआ; निष्कृतीनामू--आपकीसेवा करने के कर्तव्य

भगवान्‌ कृष्ण ने अपने माता-पिता से उनके चरणों की सेवा न कर पाने की अपनी ( कृष्णतथा बलराम की ) अक्षमता के लिए क्षमा माँगी, क्योंकि कंस के विकट भय के कारण वे घरसे दूर रहते रहे।

उन्होंने कहा, 'हे माता, हे पिता, हमारी असमर्थता के लिए हमें क्षमा करें'।

भगवान्‌ का यह सारा आचरण मेरे हृदय को पीड़ा पहुँचाता है।

को वा अमुष्याड्ध्रिसरोजरेणुंविस्मर्तुमीशीत पुमान्विजिप्रनू ।

यो विस्फुरद्भ्रूविटपेन भूमे-भरिं कृतान्तेन तिरश्चकार ॥

१८॥

'कः--और कौन; वा--अथवा; अमुष्य-- भगवान्‌ के; अड्ध्रि--पाँव; सरोज-रेणुम्‌--कमल की धूल; विस्मर्तुमू-- भुलाने केलिए; ईशीत--समर्थ हो सके ; पुमानू--मनुष्य; विजिप्रन्‌--सूँघते हुए; यः--जो; विस्फुरत्‌--विस्तार करते हुए; भ्रू-विटपेन--भौहों की पत्तियों के द्वारा; भूमेः --पृथ्वी का; भारम्‌-- भार; कृत-अन्तेन-- मृत्यु प्रहारों से; तिरश्चकार--सम्पन्न किया।

भला ऐसा कौन होगा जो उनके चरणकमलों की धूल को एकबार भी सूँघ कर उसे भुलासके ? कृष्ण ने अपनी भौहों की पत्तियों को विस्तीर्ण करके उन लोगों पर मृत्यु जैसा प्रहार कियाहै, जो पृथ्वी पर भार बने हुए थे।

इृष्टा भवद्धिर्ननु राजसूयेचैद्यस्य कृष्णं द्विषतोपि सिद्धि: ।

यां योगिन: संस्पृहयन्ति सम्यग्‌योगेन कस्तद्विरहं सहेत ॥

१९॥

इृष्टा--देखी गयी; भवद्धिः--आपके द्वारा; ननु--निस्सन्देह; राजसूये --महाराज युधथिष्टिर द्वारा सम्पन्न राजसूय यज्ञ की सभा में;चैद्यस्थ--चेदिराज ( शिशुपाल ) के; कृष्णम्‌--कृष्ण के प्रति; द्विषत:--ईर्ष्या से; अपि--के बावजूद; सिद्द्ध:--सफलता;यामू--जो; योगिन:--योगीजन; संस्पृहयन्ति--तीव्रता से इच्छा करते हैं; सम्यक्‌--पूर्णरूपेण; योगेन--योग द्वारा; क:ः--कौन;तत्‌--उनका; विरहम्‌--विच्छेद; सहेत--सहन कर सकता है।

आप स्वयं देख चुके हैं कि चेदि के राजा ( शिशुपाल ) ने किस तरह योगाभ्यास में सफलताप्राप्त की यद्यपि वह भगवान्‌ कृष्ण से ईर्ष्या करता था।

वास्तविक योगी भी अपने विविधअभ्यासों द्वारा ऐसी सफलता की सुरुचिपूर्वक कामना करते हैं।

भला उनके विछोह को कौनसह सकता है ?

तथेव चान्ये नरलोकवीराय आहवे कृष्णमुखारविन्दम्‌ ।

नेत्रै: पिबन्तो नयनाभिरामंपार्थास्त्रपूत: पदमापुरस्थ ॥

२०॥

तथा-- भी; एव च--तथा निश्चय ही; अन्ये-- अन्य; नर-लोक--मानव समाज; वीरा:--योद्धा; ये--जो; आहवे --युद्धभूमि( कुरुक्षेत्र की ) में; कृष्ण-- भगवान्‌ कृष्ण का; मुख-अरविन्दम्‌--कमल के फूल जैसा मुँह; नेत्रै:--नेत्रों से; पिबन्त:--देखतेहुए; नयन-अभिरामम्‌-- आँखों को अतीव अच्छा लगने वाले; पार्थ--अर्जुन के; अस्त्र-पूत:--बाणों से शुद्ध हुआ; पदम्‌--धाम; आपु:--प्राप्त किया; अस्य--उनका |

निश्चय ही कुरुक्षेत्र युद्धस्थल के अन्य योद्धागण अर्जुन के बाणों के प्रहार से शुद्ध बन गयेऔर आँखों को अति मनभावन लगने वाले कृष्ण के कमल-मुख को देखकर उन्होंने भगवद्धामप्राप्त किया।

स्वयं त्वसाम्यातिशयस्त्यधीश:स्वाराज्यलक्ष्म्याप्ससमस्तकाम: ।

बलि हरद्धिश्चिरलोकपालै:किरीटकोट्बग्रेडितपादपीठ: ॥

२१॥

स्वयम्‌--स्वयं; तु--लेकिन; असाम्य--अद्वितीय; अतिशय: --महत्तर; त्रि-अधीश:--तीन का स्वामी; स्वाराज्य--स्वतंत्र सत्ता;लक्ष्मी--सम्पत्ति; आप्त--प्राप्त किया; समस्त-काम:--सारी इच्छाएँ; बलिमू--पूजा की साज सामग्री; हरद्धिः--प्रदत्त; चिर-लोक-पालै:--सृष्टि की व्यवस्था को नित्य बनाये रखने वालों द्वारा; किरीट-कोटि--करोड़ों मुकुट; एडित-पाद-पीठ:--स्तुतियों द्वारा सम्मानित पाँव |

भगवान्‌ श्रीकृष्ण समस्त त्रयियों के स्वामी हैं और समस्त प्रकार के सौभाग्य की उपलब्धिके द्वारा स्वतंत्र रूप से सर्वोच्च हैं।

वे सृष्टि के नित्य लोकपालों द्वारा पूजित हैं, जो अपने करोड़ोंमुकुटों द्वारा उनके पाँवों का स्पर्श करके उन्हें पूजा की साज-सामग्री अर्पित करते हैं।

तत्तस्य कैड्डर्यमलं भूृतान्नोविग्लापयत्यडु यदुग्रसेनम्‌ ।

तिष्ठन्निषण्णं परमेष्ठिधिष्ण्येन्‍्यबोधयद्देव निधारयेति ॥

२२॥

तत्‌--इसलिए; तस्य--उसकी; कैड्डर्यम्‌ू--सेवा; अलम्‌--निस्सन्देह; भृतान्‌ू--सेवकों को; नः--हम; विग्लापयति--पीड़ा देतीहै; अड्रन--हे विदुर; यत्‌--जितनी कि; उग्रसेनम्‌--राजा उग्रसेन को; तिष्ठन्‌--बैठे हुए; निषण्णम्‌--सेवा में खड़े; परमेष्टि-धिष्ण्ये--राजसिंहासन पर; न्यबोधयत्‌--निवेदन किया; देव--मेरे प्रभु को सम्बोधित करते हुए; निधारय--आप जान लें;इति--इस प्रकार।

अतएबव हे विदुर, क्या उनके सेवकगण हम लोगों को पीड़ा नहीं पहुँचती जब हम स्मरणकरते हैं कि वे ( भगवान्‌ कृष्ण ) राजसिंहासन पर आसीन राजा उग्रसेन के समक्ष खड़े होकर,'हे प्रभु, आपको विदित हो कि ' यह कहते हए सारे स्पष्टीकरण प्रस्तत करते थे।

अहो बकी यं स्तनकालकूटंजिघांसयापाययदप्यसाध्वी ॥

लेभे गतिं धात्र्युचितां ततो३न्यंक॑ वा दयालुं शरणं ब्रजेम ॥

२३॥

अहो--ओह; बकी--असुरिनी ( पूतना ); यम्‌--जिसको; स्तन--अपने स्तन में; काल--घातक; कूटम्‌--विष; जिघांसया --ईर्ष्यावश; अपाययत्‌--पिलाया; अपि--यद्यपि; असाध्वी--कृतघ्ल; लेभे--प्राप्त किया; गतिम्‌ू--गन्तव्य; धात्री-उचिताम्‌ू--धाई के उपयुक्त; ततः--जिसके आगे; अन्यम्‌--दूसरा; कम्‌--अन्य कोई; वा--निश्चय ही; दयालुमू--कृपालु; शरणम्‌--शरण; ब्रजेम--ग्रहण करूँगा।

ओह, भला मैं उनसे अधिक दयालु किसी और की शरण कैसे ग्रहण करूँगा जिन्होंने उसअसुरिनी ( पूतना ) को माता का पद प्रदान किया, यद्यपि वह कृतघ्त थी और उसने अपने स्तनसे पिलाए जाने के लिए घातक विष तैयार किया था ?

मन्येडसुरान्भागवतांस्त्रयधीशेसंरम्भमार्गाभिनिविष्टचित्तान्‌ ।

ये संयुगेडचक्षत ताश््च्यपुत्र-मंसे सुनाभायुधमापतन्तम्‌ ॥

२४॥

मन्ये--मैं सोचता हूँ; असुरान्‌ू--असुरों को; भागवतानू-महान्‌ भक्तों को; त्रि-अधीशे--तीन के स्वामी को; संरम्भ--शत्रुता;मार्ग--मार्ग से होकर; अभिनिविष्ट-चित्तानू--विचारों में मग्न; ये--जो; संयुगे--युद्ध में; अचक्षत--देख सका; तार्श््य-पुत्रम्‌--भगवान्‌ के वाहन गरुड़ को; अंसे--कन्धे पर; सुनाभ--चक्र; आयुधम्‌--हथियार धारण करनेवाला; आपतन्तम्‌--सामने आताहुआ।

मैं उन असुरों को जो भगवान्‌ के प्रति शत्रुभाव रखते हैं, भक्तों से बढ़कर मानता हूँ, क्योंकिशत्रुता के भावों से भरे वे सभी युद्ध करते हुए भगवान्‌ को तार्क्ष्य ( कश्यप ) पुत्र गरुड़ के कन्धोंपर बैठे तथा अपने हाथ में चक्रायुध लिए देख सकते हैं।

वसुदेवस्य देवक्यां जातो भोजेन्द्रबन्धने ।

चिकीरषुभ्भगवानस्या: शमजेनाभियाचित: ॥

२५॥

वसुदेवस्य--वसुदेव की पत्नी के; देवक्‍्याम्‌--देवकी के गर्भ में; जात:--उत्पन्न; भोज-इन्द्र-- भोजों के राजा के; बन्धने--बन्दीगृह में; चिकीर्ष;--करने के लिए; भगवान्‌-- भगवान्‌; अस्या:--पृथ्वी का; शम्‌--कल्याण; अजेन--ब्रह्म द्वारा;अभियाचित:--याचना किये जाने पर।

पृथ्वी पर कल्याण लाने के लिए ब्रह्मा द्वारा याचना किये जाने पर भगवान्‌ श्री कृष्ण कोभोज के राजा के बन्दीगृह में वसुदेव ने अपनी पत्नी देवकी के गर्भ से उत्पन्न किया।

ततो नन्दव्रजमितः पित्रा कंसाद्विबिभ्यता ।

एकादश समास्तत्र गूढाचि: सबलोवसत्‌ ॥

२६॥

ततः--तत्पश्चात्‌; नन्द-ब्रजम्‌--नन्द महाराज के चरागाहों में; इत:--पाले-पोषे जाकर; पित्रा--अपने पिता द्वारा; कंसातू--कंससे; विबिभ्यता-- भयभीत होकर; एकादश--ग्यारह; समा: --वर्ष ; तत्र--वहाँ; गूढ-अर्चि:--प्रच्छन्न अग्नि; स-बल:--बलरामसहित; अवसत्‌--रहे

तत्पश्चात्‌ कंस से भयभीत होकर उनके पिता उन्हें नन्द महाराज के चरागाहों में ले आये जहाँ वे अपने बड़े भाई बलदेव सहित ढकी हुईं अग्नि की तरह ग्यारह वर्षों तक रहे।

परीतो वत्सपैर्व॑त्सां श्वारयन्व्यहरद्विभु: ।

यमुनोपवने कूजद्दिवजसड्डू लिताड्प्रिपे ॥

२७॥

'परीतः--घिरे; वत्सपैः:--ग्वालबालों से; वत्सान्‌--बछड़ों को; चारयन्‌ू--चराते हुए; व्यहरत्‌--विहार का आनन्द लिया;विभु:--सर्वशक्तिमान; यमुना--यमुना नदी; उपवने--तट के बगीचे में; कूजत्‌--शब्दायमान; द्विज--पक्षी; सह्ढु लित--सघन;अड्टप्निपे--वृक्षों में

अपने बाल्यकाल में सर्वशक्तिमान भगवान्‌ ग्वालबालों तथा बछड़ों से घिरे रहते थे।

इस तरह वे यमुना नदी के तट पर सघन वृक्षों से आच्छादित तथा चहचहाते पक्षियों की ध्वनि सेपूरित बगीचों में विहार करते थे।

कौमारीं दर्शयंश्रैष्टां प्रेक्षणीयां त्रजौकसाम्‌ ।

रुदन्निव हसन्मुग्धवालसिंहावलोकनः ॥

२८॥

कौमारीमू--बचपन के लिए उपयुक्त; दर्शयन्‌--दिखलाते हुए; चेष्टाम्‌ू--कार्यकलाप; प्रेक्षणीयाम्‌--देखने के योग्य, दर्शनीय;ब्रज-ओकसाम्‌ू--वृन्दावन के वासियों द्वारा; रुदन्‌ू--चिल्लाते; इब--सहश; हसन्‌-- हँसते; मुग्ध-- आश्चर्यचकित; बाल-सिंह--सिंह-शावक; अवलोकन:--उसी तरह का दिखते हुए

जब भगवान्‌ ने बालोचित कार्यो का प्रदर्शन किया, तो वे एकमात्र वृन्दावनवासियों को हीइृष्टिगोचर थे।

वे शिशु की तरह कभी रोते तो कभी हँसते और ऐसा करते हुए वे सिंह के बच्चेके समान प्रतीत होते थे।

स एव गोधन लक्ष्म्या निकेतं सितगोवृषम्‌ ।

चारयब्ननुगान्गोपान्रणद्वेणुररीरमत्‌ ॥

२९॥

सः--वह ( कृष्ण ); एब--निश्चय ही; गो-धनम्‌--गौ रूपी खजाना; लक्ष्म्या:--ऐश्वर्य से; निकेतम्‌ू--आगार; सित-गो-वृषम्‌--सुन्दर गौवें तथा बैल; चारयन्‌--चराते हुए; अनुगान्‌-- अनुयायियों को; गोपान्‌ू--ग्वाल बालों को; रणत्‌--बजती हुई;बेणु:--वंशी; अरीरमत्‌--उल्लसित किया।

अत्यन्त सुन्दर गाय-बैलों को चराते हुए समस्त ऐश्वर्य तथा सम्पत्ति के आगार भगवान्‌अपनी वंशी बजाया करते।

इस तरह वे अपने श्रद्धावान्‌ अनुयायी ग्वाल-बालों को प्रफुल्लितकरते थे।

प्रयुक्तान्भोजराजेन मायिन: कामरूपिण: ।

लीलया व्यनुदत्तांस्तान्बाल: क्रीडनकानिव ॥

३०॥

प्रयुक्तान्‌ू--लगाये गये; भोज-राजेन--कंस द्वारा; मायिन:--बड़े-बड़े जादूगर, मायावी; काम-रूपिण:--इच्छानुसार रूपधारण करने वाले; लीलया--लीलाओं के दौरान; व्यनुदत्‌--मार डाला; तानू--उनको; तानू--जैसे ही वे निकट आये;बाल:--बालक; क़्रीडनकान्‌--खिलौनों; इब--सहृश |

भोज के राजा कंस ने कृष्ण को मारने के लिए बड़े-बड़े जादूगरों को लगा रखा था, जोकैसा भी रूप धारण कर सकते थे।

किन्तु अपनी लीलाओं के दौरान भगवान्‌ ने उन सबों कोउतनी ही आसानी से मार डाला जिस तरह कोई बालक खिलौनों को तोड़ डालता है।

विपन्नान्विषपानेन निगृह्म भुजगाधिपम्‌ ।

उत्थाप्यापाययदगावस्तत्तोय॑ प्रकृतिस्थितम्‌ ॥

३१॥

विपन्नान्‌ू--महान्‌ विपदाओं में परेशान; विष-पानेन--विष पीने से; निगृह्य--दमन करके; भुजग-अधिपम्‌--सर्पों के मुखियाको; उत्थाप्प--बाहर निकाल कर; अपाययत्‌--पिलाया; गाव: --गौवें; तत्‌--उस; तोयम्‌--जल को; प्रकृति--स्वाभाविक;स्थितम्‌--स्थिति में |

वृन्दावन के निवासी घोर विपत्ति के कारण परेशान थे, क्योंकि यमुना के कुछ अंश काजल सर्पों के प्रमुख ( कालिय ) द्वारा विषाक्त किया जा चुका था।

भगवान्‌ ने सर्पपाज को जलके भीतर प्रताड़ित किया और उसे दूर खदेड़ दिया।

फिर नदी से बाहर आकर उन्होंने गौवों को जल पिलाया तथा यह सिद्ध किया कि वह जल पुन: अपनी स्वाभाविक स्थिति में है।

अयाजयदगोसवेन गोपराजं द्विजोत्तमै: ।

वित्तस्य चोरु भारस्य चिकीर्षन्सद्व्ययं विभु: ॥

३२॥

अयाजयत्‌--सम्पन्न कराया; गो-सवेन--गौवों की पूजा द्वारा; गोप-राजम्‌--्वालों के राजा; द्विज-उत्तमै:--विद्वान ब्राह्मणोंद्वारा; वित्तस्य--सम्पत्ति का; च-- भी; उरु-भारस्य--महान्‌ ऐश्वर्य; चिकीर्षन्‌ू--कार्य करने की इच्छा से; सतू-व्ययम्‌--उचितउपभोग; विभु:--महान्‌ |

भगवान्‌ कृष्ण महाराज नन्द की ऐश्वर्यशशाली आर्थिक शक्ति का उपयोग गौबों की पूजा केलिए कराना चाहते थे और वे स्वर्ग के राजा इन्द्र को भी पाठ पढ़ाना चाह रहे थे।

अतः उन्होंनेअपने पिता को सलाह दी थी कि बे विद्वान ब्राह्मणों की सहायता से गो अर्थात्‌ चरागाह तथागौवों की पूजा कराएँ।

वर्षतीन्द्रे ब्रज: कोपाद्धग्नमानेठतिविहल: ।

गोत्रलीलातपत्रेण त्रातो भद्गरानुगृह्ता ॥

३३॥

वर्षति--जब बरसात में; इन्द्रे--इन्द्र द्वारा; ब्रज:--गौवों की भूमि ( वृन्दावन ); कोपात्‌ भग्नमाने--अपमानित होने से क्रुद्ध;अति--अत्यधिक; विह॒लः--विचलित; गोत्र--गायों के लिए पर्वत; लीला-आतपत्रेण--छाता की लीला द्वारा; त्रात:--बचालिये गये; भद्ग--हे सौम्य; अनुगृह्वता--कृपालु भगवान्‌ द्वारा।

हे भद्र विदुर, अपमानित होने से राजा इन्द्र ने वृन्दावन पर मूसलाधार वर्षा की।

इस तरहगौवों की भूमि ब्रज के निवासी बहुत ही व्याकुल हो उठे।

किन्तु दयालु भगवान्‌ कृष्ण ने अपनेलीलाछत्र गोवर्धन पर्वत से उन्हें संकट से उबार लिया।

शरच्छशिकरैर्मृ्ट मानयत्रजनीमुखम्‌ ।

गायन्कलपदं रेमे स्त्रीणां मण्डलमण्डन: ॥

३४॥

शरत्‌--शरद्‌ कालीन; शशि--चन्द्रमा की; करैः --किरणों से; मृष्टमू--चमकीला; मानयन्‌--सोचते हुए; रजनी-मुखम्‌--रातका मुख; गायन्‌--गाते हुए; कल-पदम्‌--मनोहर गीत; रेमे--विहार किया; स्त्रीणाम्‌--स्त्रियों का; मण्डल-मण्डन:-स्त्रियोंकी सभा के मुख्य आकर्षण के रूप में |

वर्ष की तृतीय ऋतु में भगवान्‌ ने स्त्रियों की सभा के मध्यवर्ती सौन्दर्य के रूप में चाँदनी सेउजली हुई शरद्‌ की रात में अपने मनोहर गीतों से उन्हें आकृष्ट करके उनके साथ विहार किया।

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