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अध्याय तीन: वृन्दावन से बाहर भगवान की लीलाएँ

3.3उद्धव उबाचततः स आगत्य पुरं स्वपित्रो-श्विकीर्षया शं बलदेवसंयुतः ।

निपात्य तुड्जद्रिपुयूथनाथंहतं व्यकर्षद्व्यसुमोजसोर्व्याम्‌ ॥

१॥

उद्धव: उबाच-- श्रीउद्धव ने कहा; तत:--तत्पश्चात्‌; सः--भगवान्‌; आगत्य--आकर; पुरम्‌ू--मथुरा नगरी में; स्व-पित्रो: --अपने माता पिता की; चिकीर्षया--चाहते हुए; शम्‌--कुशलता; बलदेव-संयुतः--बलदेव के साथ; निपात्य--नीचे खींचकर;तुड्जात्‌ू-सिंहासन से; रिपु-यूथ-नाथम्‌--जनता के शत्रुओं के मुखिया को; हतम्‌ू--मार डाला; व्यकर्षत्‌--खींचा; व्यसुम्‌--मृत; ओजसा--बल से; उर्व्याम्‌-पृथ्वी पर।

श्री उद्धव ने कहा : तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ कृष्ण श्री बलदेव के साथ मथुरा नगरी आये औरअपने माता पिता को प्रसन्न करने के लिए जनता के शत्रुओं के अगुवा कंस को उसके सिंहासनसे खींच कर अत्यन्त बलपर्वूक भूमि पर घसीटते हुए मार डाला।

सान्दीपने: सकृत््रोक्त ब्रह्माधीत्य सविस्तरम्‌ ।

तस्मै प्रादाद्वरं पुत्रं मृतं पश्ञजनोदरात्‌ ॥

२॥

सान्दीपने: --सान्दीपनि मुनि के; सकृतू--केवल एक बार; प्रोक्तम--कहा गया; ब्रह्म--ज्ञान की विभिन्न शाखाओं समेत सारेवेद; अधीत्य--अध्ययन करके; स-विस्तरम्‌--विस्तार सहित; तस्मै--उसको; प्रादात्‌ू--दिया; वरमू--वरदान; पुत्रमू--उसकेपुत्र का; मृतम्‌-मरे हुए; पञ्ञ-जन--मृतात्माओं का क्षेत्र; उदरात्‌ू--के भीतर से |

भगवान्‌ ने अपने शिक्षक सान्दीपनि मुनि से केवल एक बार सुनकर सारे वेदों को उनकीविभिन्न शाखाओं समेत सीखा और गुरुदक्षिणा के रूप में अपने शिक्षक के मृत पुत्र कोयमलोक से वापस लाकर दे दिया।

समाहुता भीष्मककन्यया येभ्रियः सवर्णेन बुभूषयैषाम्‌ ।

गान्धर्ववृत्त्या मिषतां स्वभागंजहे पद मूर्ध्नि दधत्सुपर्ण: ॥

३॥

समाहुता: --आमंत्रित; भीष्मक--राजा भीष्मक की; कन्यया--पुत्री द्वारा; ये--जो; भिय:--सम्पत्ति; स-वर्णेन--उसी तरह केक्रम में; बुभूषया--ऐसा होने की आशा से; एषाम्‌--उनका; गान्धर्व--ब्याह की; वृत्त्या--ऐसी प्रथा द्वारा; मिषताम्‌--ले जातेहुए; स्व-भागम्‌--अपना हिस्सा; जह्ढे--ले गया; पदम्‌--पाँव; मूर्ध्नि--सिर पर; दधत्‌--रखते हुए; सुपर्ण:--गरुड़ |

राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी के सौन्दर्य तथा सम्पत्ति से आकृष्ट होकर अनेक बड़े-बड़ेराजकुमार तथा राजा उससे ब्याह करने के लिए एकत्र हुए।

किन्तु भगवान्‌ कृष्ण अन्यआशावान्‌ अभ्यर्थियों को पछाड़ते हुए उसी तरह अपना भाग जान कर उसे उठा ले गये जिस तरहगरुड़ अमृत ले गया था।

ककुद्धिनोविद्धनसो दमित्वास्वयंवरे नाग्नजितीमुवाह ।

तद्धग्नमानानपि गृध्यतोज्ञा-अधघ्नेक्षत: शस्त्रभृतः स्वशस्त्रै: ॥

४॥

ककुद्चिन:--बैल जिनकी नाकें छिदी हुई नहीं थीं; अविद्ध-नस:ः--नाकें छिदी हुई; दमित्वा--दमन करके; स्वयंवरे--दुलहिनचुनने के लिए खुली स्पर्धा में; नाग्गजितीम्‌ू--राजकुमारी नाग्नजिती को; उवाह--ब्याहा; तत्‌-भग्नमानान्‌--इस तरह निराशहुओं को; अपि--यद्यपि; गृध्यत:--चाहा; अज्ञानू--मूर्खजन; जघ्ने--मारा तथा घायल किया; अक्षतः--बिना घायल हुऐ;शस्त्र-भृतः--सभी हथियारों से लैस; स्व-शस्त्रै:--अपने हथियारों से |

बिना नथ वाले सात बैलों का दमन करके भगवान्‌ ने स्वयंवर की खुली स्पर्धा मेंराजकुमारी नाग्नजिती का हाथ प्राप्त किया।

यद्यपि भगवान्‌ विजयी हुए, किन्तु उनके प्रत्याशियोंने राजकुमारी का हाथ चाहा, अतः युद्ध हुआ।

अतः शस्त्रों से अच्छी तरह लैस, भगवान्‌ ने उनसबों को मार डाला या घायल कर दिया, परन्तु स्वयं उन्हें कोई चोट नहीं आई।

प्रियं प्रभुग्राम्य इब प्रियायाविधित्सुरा्च्छ॑द्द्युतरुं यदर्थे ।

वह्गयाद्रवत्तं सगणो रुषान्ध:क्रीडामृगो नूनमयं वधूनाम्‌ ॥

५॥

प्रियम्‌--प्रिय पत्नी के; प्रभु:--स्वामी; ग्राम्य:ः--सामान्य जीव; इब--सहश; प्रियाया: --प्रसन्न करने के लिए; विधित्सु:--चाहते हुए; आर्च्छत्‌--ले आये; द्युतरुम्‌--पारिजात पुष्प का वृक्ष; यत्‌--जिसके; अर्थ--विषय में; बज्जी --स्वर्ग का राजा इन्द्र;आद्रवत्‌ तम्‌--उससे लड़ने आया; स-गण:--दलबल सहित; रुषा--क्रोध में; अन्ध: --अन्धा; क्रीडा-मृग: --कठपुतली;नूनमू--निस्सन्देह; अयम्‌--यह; वधूनाम्‌--स्त्रियों का।

अपनी प्रिय पत्नी को प्रसन्न करने के लिए भगवान्‌ स्वर्ग से पारिजात वृक्ष ले आये जिस तरहकि एक सामान्य पति करता है।

किन्तु स्वर्ग के राजा इन्द्र ने अपनी पत्नियों के उकसाने पर( क्योंकि वह स्त्रीवश्य था ) लड़ने के लिए दलबल सहित भगवान्‌ का पीछा किया।

सुतं मृथे खं वपुषा ग्रसन्तंइृष्ठा सुनाभोन्मथितं धरित्र्या ।

आमन्त्रितस्तत्तनयाय शेषंदत्त्वा तदन्तःपुरमाविवेश ॥

६॥

सुतम्‌--पुत्र को; मृधे --युद्ध में; खम्‌-- आकाश; वपुषा-- अपने शरीर से; ग्रसन्‍्तम्‌--निगलते हुए; हृष्टा--देखकर; सुनाभ--सुदर्शन चक्र से; उन्‍्मधितम्‌--मार डाला; धरित्र्या--पृथ्वी द्वारा; आमन्त्रित:--प्रार्थना किये जाने पर; तत्‌-तनयाय--नरकासुरके पुत्र को; शेषम्‌--उससे लिया हुआ; दत्त्वा--लौटा कर; तत्‌--उसके; अन्तः-पुरमू--घर के भीतर; आविवेश --घुसे |

धरित्री अर्थात्‌ पृथ्वी के पुत्र नरकासुर ने सम्पूर्ण आकाश को निगलना चाहा जिसके कारणयुद्ध में वह भगवान्‌ द्वारा मार डाला गया।

तब उसकी माता ने भगवान्‌ से प्रार्थना की।

इससेनरकासुर के पुत्र को राज्य लौटा दिया गया और भगवान्‌ उस असुर के घर में प्रविष्ट हुए।

तत्राहतास्ता नरदेवकन्याःकुजेन हृष्ठा हरिमार्तबन्धुम्‌ ।

उत्थाय सद्यो जगृहुः प्रहर्ष-ब्रीडानुरागप्रहितावलोकै: ॥

७॥

तत्र--नरकासुर के घर के भीतर; आहता:--अपहत, भगाई हुई; ताः--उन सबों को; नर-देव-कन्या: --अनेक राजाओं कीपुत्रियों को; कुजेन--असुर द्वारा; दृष्ठा--देखकर; हरिम्‌-- भगवान्‌ को; आर्त-बन्धुम्‌--दुखियारों के मित्र; उत्थाय--उठकर;सद्य:ः--वहीं पर, तत्काल; जगृहुः--स्वीकार किया; प्रहर्ष--हँसी खुशी के साथ; ब्रीड--लज्जा; अनुराग--आसक्ति; प्रहित-अवलोकै: --उत्सुक चितवनों से।

उस असुर के घर में नरकासुर द्वारा हरण की गई सारी राजकुमारियाँ दुखियारों के मित्रभगवान्‌ को देखते ही चौकन्नी हो उठीं।

उन्होंने अतीव उत्सुकता, हर्ष तथा लज्जा से भगवान कीओर देखा और अपने को उनकी पत्नियों के रूप में अर्पित कर दिया।

आसां मुहूर्त एकस्मिन्नानागारेषु योषिताम्‌ ।

सविध॑ जगूहे पाणीननुरूप: स्वमायया ॥

८॥

आसामू--सबों को; मुहूर्त --एक समय; एकस्मिन्‌ू--एकसाथ; नाना-आगारेषु--विभिन्न कमरों में; योषिताम्‌--स्त्रियों के; स-विधम्‌--विधिपूर्वक; जगृहे--स्वीकार किया; पाणीन्‌--हाथों को; अनुरूप:--के अनुरूप; स्व-मायया-- अपनी अन्तरंगाशक्ति से।

वे सभी राजकुमारियाँ अलग-अलग भवनों में रखी गई थीं और भगवान्‌ ने एकसाथ प्रत्येकराजकुमारी के लिए उपयुक्त युग्म के रूप में विभिन्न शारीरिक अंश धारण कर लिये।

उन्होंनेअपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा विधिवत्‌ उनके साथ पाणिग्रहण कर लिया।

तास्वपत्यान्यजनयदात्मतुल्यानि सर्वतः ।

एकैकस्यां दश दश प्रकृते्विबुभूषया ॥

९॥

तासु--उनके; अपत्यानि--सन्तानें; अजनयत्‌--उत्पन्न किया; आत्म-तुल्यानि--अपने ही समान; सर्वतः--सभी तरह से; एक-एकस्याम्‌--उनमें से हर एक में; दश--दस; दश--दस; प्रकृतेः-- अपना विस्तार करने के लिए; विबुभूषया--ऐसी इच्छा करतेहुए

अपने दिव्य स्वरूपों के अनुसार ही अपना विस्तार करने के लिए भगवान्‌ ने उनमें से हरएक से ठीक अपने ही गुणों वाली दस-दस सम्तानें उत्पन्न कीं।

'कालमागधशाल्वादीननीकै रुन्धतः पुरम्‌ ।

अजीघनत्स्वयं दिव्यं स्वपुंसां तेज आदिशत्‌ ॥

१०॥

काल--कालयवन; मागध--मगध का राजा ( जरासन्ध ); शाल्व--शाल्व राजा; आदीनू्‌--इत्यादि; अनीकै: --सैनिकों से;रुन्धतः--घिरा हुआ; पुरमू--मथुरा नगरी; अजीघनतू--मार डाला; स्वयमू्‌--स्वयं; दिव्यम्‌--दिव्य; स्व-पुंसामू-- अपने हीलोगों को; तेज:--तेज; आदिशत्‌-- प्रकट किया।

कालयवन, मगध के राजा तथा शाल्व ने मथुरा नगरी पर आक्रमण किया, किन्तु जब नगरीउनके सैनिकों से घिर गई तो भगवान्‌ ने अपने जनों की शक्ति प्रदर्शित करने के उद्देश्य से उनसबों को स्वयम्‌ नहीं मारा।

शम्बरं द्विविदं बाणं मुरें बल्वलमेव च ।

अन्‍्यांश्व दन्‍तवक्रादीनवधीत्कां श्र घातयत्‌ ॥

११॥

शम्बरम्‌ू--शम्बर; द्विविदमू--द्विविद; बाणम्‌ू--बाण; मुरम्‌--मुर; बल्वलम्‌--बल्वल; एव च--तथा; अन्यान्‌ू--अन्यों को;च--भी; दन्तवक्र-आदीनू्‌--दन्तवक्र इत्यादि को; अवधीत्‌--मारा; कान्‌ च--तथा अनेक अन्यों को; घातयत्‌--मरवाया।

शम्बर, द्विविद, बाण, मुर, बल्वल जैसे राजाओं तथा दन्तवक़र इत्यादि बहुत से असुरों में सेकुछ को उन्होंने स्वयं मारा और कुछ को अन्यों ( यथा बलदेव इत्यादि ) द्वारा मरवाया।

अथ ते क्रातृपुत्राणां पक्षयो: पतितान्नूपान्‌ ।

चचाल भू: कुरुक्षेत्र येघामापततां बलै: ॥

१२॥

अथ--तत्पश्चात्‌; ते--तुम्हारे; भ्रातृ-पुत्राणाम्‌ू-- भतीजों के; पक्षयो:--दोनों पक्षों के; पतितानू--मारे गये; नृपान्‌ू--राजाओंको; चचाल--हिला दिया; भू:--पृथ्वी; कुरुक्षेत्रमू--कुरुक्षेत्र युद्धस्थल; येषामू--जिसके; आपतताम्‌--चलते समय; बलै:--बल द्वारा

तत्पश्चात्‌, हे विदुर, भगवान्‌ ने शत्रुओं को तथा लड़ रहे तुम्हारे भतीजों के पक्ष के समस्तराजाओं को कुरुक्षेत्र के युद्ध में मरवा डाला।

वे सारे राजा इतने विराट तथा बलवान थे कि जब वे युद्धभूमि में विचरण करते तो पृथ्वी हिलती प्रतीत होती ।

स कर्णदु:शासनसौबलानांकुमन्त्रपषाकेन हतथ्रियायुषम्‌ ।

सुयोधन सानुचरं शयानंभग्नोरुमूर्व्या न ननन्द पश्यन्‌ ॥

१३॥

सः--वह ( भगवान्‌ ); कर्ण--कर्ण; दुःशासन--दुःशासन; सौबलानाम्‌ू--सौबल; कुमन्त्र-पाकेन--कुमंत्रणा की जटिलता से;हत-भ्रिय--सम्पत्ति से विहीन; आयुषम्‌--आयु से; सुयोधनम्‌--दुर्योधन; स-अनुचरम्‌-- अनुयायियों सहित; शयानम्‌--लेटेहुए; भग्न--टूटी; ऊरुम्‌--जंघाएँ; ऊर्व्याम्‌--अत्यन्त शक्तिशाली; न--नहीं; ननन्द-- आनन्द मिला; पश्यन्‌ू--इस तरह देखतेहुए

कर्ण, दुःशासन तथा सौबल की कुमंत्रणा के कपट-योग के कारण दुर्योधन अपनी सम्पत्तितथा आयु से विहीन हो गया।

यद्यपि वह शक्तिशाली था, किन्तु जब वह अपने अनुयायियोंसमेत भूमि पर लेटा हुआ था उसकी जाँघें टूटी थीं।

भगवान्‌ इस दृश्य को देखकर प्रसन्न नहीं थे।

कियान्भुवोयं क्षपितोरु भारोयद्द्रोणभीष्मार्जुनभीममूलै: ।

अष्टादशाक्षौहिणिको मदंशै-रास्ते बल॑ दुर्विषहं यदूनाम्‌ ॥

१४॥

कियान्‌--यह क्या है; भुव:ः--पृथ्वी पर; अयम्‌--यह; क्षपित--घटा हुआ; उरू--बहुत बड़ा; भार: -- भार, बोझा; यत्‌--जो;द्रोण--द्रोण; भीष्म-- भीष्म; अर्जुन--अर्जुन; भीम-- भीम; मूलैः --सहायता से; अष्टादइश--अठारह; अक्षौहिणिक:--सैन्यबलकी व्यूह रचना ( देखें भागवत ११६३४ ); मत्‌-अंशै:--मेरे बंशजों के साथ; आस्ते--अब भी हैं; बलम्‌--महान्‌ शक्ति;दुर्विषहम्‌--असहा; यदूनाम्‌--यदुवंश की |

कुरुक्षेत्र युद्ध की समाप्ति पर भगवान्‌ ने कहा अब द्रोण, भीष्म, अर्जुन तथा भीम कीसहायता से अठारह अक्षौहिणी सेना का पृथ्वी का भारी बोझ कम हुआ है।

किन्तु यह कया है?अब भी मुझी से उत्पन्न यदुवंश की विशाल शक्ति शेष है, जो और भी अधिक असह्ाय बोझ बनसकती है।

मिथो यदैषां भविता विवादोमध्वामदाताप्रविलोचनानाम्‌ ।

नैषां वधोपाय इयानतोउन्योमय्युद्यतेउन्तर्दधते स्वयं सम ॥

१५॥

मिथ: --परस्पर; यदा--जब; एषाम्‌--उनके; भविता--होगा; विवाद: --झगड़ा; मधु-आमद--शराब पीने से उत्पन्न नशा;आताम्र-विलोचनानाम्‌ू--ताँबे जैसी लाल आँखों के; न--नहीं; एषाम्‌--उनके; वध-उपाय:--लोप का साधन; इयान्‌ू--इसजैसा; अत:--इसके अतिरिक्त; अन्यः--वैकल्पिक; मयि--मुझ पर; उद्यते--लोप; अन्तः-दधते--विलुप्त होंगे; स्वयम्‌-- अपनेसे; स्म--निश्चय है

जब वे नशे में चूर होकर, मधु-पान के कारण ताँबें जैसी लाल-लाल आँखें किये, परस्परलड़ेंगे-झगड़ेंगे तभी वे विलुप्त होंगे अन्यथा यह सम्भव नहीं है।

मेरे अन्तर्धान होने पर यह घटना घटेगी।

एवं सद्धिन्त्य भगवान्स्वराज्ये स्थाप्य धर्मजम्‌ ।

नन्दयामास सुहृदः साधूनां वर्त्म दर्शयन्‌ ॥

१६॥

एवम्‌--इस प्रकार; सश्ञिन्त्य-- अपने मन में सोचकर; भगवान्‌-- भगवान्‌ ने; स्व-राज्ये-- अपने राज्य में; स्थाप्य--स्थापितकरके; धर्मजम्‌--महाराज युधिष्ठिर को; नन्दयाम्‌ आस--हर्षित किया; सुहृदः--मित्र गणों; साधूनाम्‌--सन्तों के; वर्त्म--मार्ग;दर्शयन्‌ू--दिखलाते हुए।

इस तरह अपने आप सोचते हुए भगवान्‌ कृष्ण ने पुण्य के मार्ग में प्रशासन का आदर्शप्रदर्शित करने के लिए संसार के परम नियन्ता के पद पर महाराज युध्चिष्ठिर को स्थापित किया।

उत्तरायां धृतः पूरोर्वश: साध्वभिमन्युना ।

स वे द्रौण्यस्त्रसम्प्लुष्ट: पुनर्भगवता धृतः ॥

१७॥

उत्तरायाम्‌--उत्तरा के; धृतः--स्थापित; पूरो: --पूरु का; वंश:--उत्तराधिकारी; साधु-अभिमन्युना--वीर अभिमन्यु द्वारा; सः--वह; बै--निश्चय ही; द्रौि-अस्त्र--द्रोण के पुत्र द्रोणि के हथियार द्वारा; सम्प्लुष्ट: --जलाया जाकर; पुनः--दुबारा; भगवता--भगवान्‌ द्वारा; धृतः--बचाया गया था।

महान्‌ वीर अभिमन्यु द्वारा अपनी पत्नी उत्तरा के गर्भ में स्थापित पूरु के वंशज का भ्रूणद्रोण के पुत्र के अस्त्र द्वारा भस्म कर दिया गया था, किन्तु बाद में भगवान्‌ ने उसकी पुनः रक्षाकी।

अयाजयद्धर्मसुतमश्रमेधेस्त्रिभिर्विभु: ।

सोडपि क्ष्मामनुजै रक्षत्रेमे कृष्णमनुत्रतः ॥

१८ ॥

अयाजयत्‌--सम्पन्न कराया; धर्म-सुतम्‌--धर्म के पुत्र ( महाराज युधिष्टिर ) द्वारा; अश्वमेथे: --यज्ञ द्वारा; त्रिभिः--तीन; विभु:--परमेश्वर; सः--महाराज युधिष्ठटिर; अपि-- भी; क्ष्माम्‌-पृथ्वी को; अनुजैः--अपने छोटे भाइयों सहित; रक्षन्‌--रक्षा करते हुए;रेमे--भोग किया; कृष्णम्‌-- भगवान्‌ कृष्ण; अनुव्रतः--निरन्तर अनुगामी |

भगवान्‌ ने धर्म के पुत्र महाराज युथ्रिष्ठिर को तीन अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न करने के लिए प्रेरितकिया और उन्होंने भगवान्‌ कृष्ण का निरन्तर अनुगमन करते हुए अपने छोटे भाइयों की सहायता" से पृथ्वी की रक्षा की और उसका भोग किया।

भगवानपि विश्वात्मा लोकवेदपथानुग: ।

कामान्सिषेवे द्वार्वत्यामसक्त: साड्ख्यमास्थित: ॥

१९॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; अपि-- भी; विश्व-आत्मा--ब्रह्माण्ड के परमात्मा; लोक--लोक व्यवहार; बेद--वैदिक सिद्धान्त; पथ-अनुग:ः--मार्ग का अनुकरण करने वाला; कामान्‌--जीवन की आवश्यकताएँ; सिषेबे--भोग किया; द्वार्वत्यामू-दद्वारका पुरी में;असक्त:--बिना आसक्त हुए; साइड्ख्यम्‌--सांख्य दर्शन के ज्ञान में; आस्थित: --स्थित होकर।

उसी के साथ-साथ भगवान्‌ ने समाज के वैदिक रीति-रिवाजों का हढ़ता से पालन करते हुएद्वारकापुरी में जीवन का भोग किया।

वे सांख्य दर्शन प्रणाली के द्वारा प्रतिपादित बैराग्य तथाज्ञान में स्थित थे।

स्निग्धस्मितावलोकेन वाचा पीयूषकल्पया ।

चरित्रेणानवद्येन श्रीनिकेतेन चात्मना ॥

२०॥

स्निग्ध--सौम्य; स्मित-अवलोकेन--मृदुहँसी से युक्त चितवन द्वारा; वाचा--शब्दों से; पीयूष-कल्पया--अमृत के तुल्य;चरित्रेण--चरित्र से; अनवद्येन--दोषरहित; श्री--लक्ष्मी; निकेतेन-- धाम; च-- तथा; आत्मना-- अपने दिव्य शरीर से।

वे वहाँ पर लक्ष्मी देवी के निवास, अपने दिव्य शरीर, में सदा की तरह के अपने सौम्य तथामधुर मुसकान युक्त मुख, अपने अमृतमय वचनों तथा अपने निष्क॑लक चरित्र से युक्त रह रहे थे।

इमं लोकममुं चैव रमयन्सुतरां यदून्‌ ।

रेमे क्षणदया दत्तक्षणस्त्रीक्षणसौहद: ॥

२१॥

इममू--यह; लोकम्‌--पृथ्वी; अमुमू--तथा अन्य लोक; च-- भी; एव--निश्चय ही; रमयन्‌--मनोहर; सुतराम्‌--विशेष रूप से;यदून्‌ू--यदुओं को; रेमे--आनन्द लिया; क्षणदया--रात में; दत्त--प्रदत्त; क्षण--विश्राम; स्त्री--स्त्रियों के साथ; क्षण--दाम्पत्य प्रेम; सौहद: --मैत्री |

भगवान्‌ ने इस लोक में तथा अन्य लोकों में ( उच्च लोकों में ), विशेष रूप से यदुवंश कीसंगति में अपनी लीलाओं का आनन्द लिया।

रात्रि में विश्राम के समय उन्होंने अपनी पत्नियों केसाथ दाम्पत्य प्रेम की मैत्री का आनन्द लिया।

तस्यैवं रममाणस्य संवत्सरगणान्बहून्‌ ।

गृहमेधेषु योगेषु विरागः समजायत ॥

२२॥

तस्य--उसका; एवम्‌--इस प्रकार; रममाणस्थ--रमण करने वाले; संवत्सर--वर्षो; गणान्‌ू--अनेक; बहूनू--कई; गृहमेधेषु --गृहस्थ जीवन में; योगेषु--यौन जीवन में; विराग:--विरक्ति; समजायत--जागृत हुईं

इस तरह भगवान्‌ अनेकानेक वर्षों तक गृहस्थ जीवन में लगे रहे, किन्तु अन्त में नश्वर यौनजीवन से उनकी विरक्ति पूर्णतया प्रकट हुई।

दैवाधीनेषु कामेषु दैवाधीनः स्वयं पुमान्‌ ।

को विश्रम्भेत योगेन योगेश्वरमनुत्रत: ॥

२३॥

" दैव--अलौकिक; अधीनेषु--नियंत्रित होकर; कामेषु--इन्द्रिय भोग विलास में; दैव-अधीन:--अलौकिक शक्ति द्वारा नियंत्रित;स्वयम्‌--अपने आप; पुमान्‌--जीव; कः--जो भी; विश्रम्भेत-- श्रद्धा रख सकता हो; योगेन--भक्ति से; योगेश्वरम्‌-- भगवान्‌में; अनुब्रत:--सेवा करते हुए।

प्रत्येक जीव एक अलौकिक शक्ति द्वारा नियंत्रित होता है और इस तरह उसका इन्द्रिय भोगभी उसी अलौकिक शक्ति के नियंत्रण में रहता है।

इसलिए कृष्ण के दिव्य इन्द्रिय-कार्यकलापोंमें वही अपनी श्रद्धा टिका सकता है, जो भक्ति-मय सेवा करके भगवान्‌ का भक्त बन चुकाहो।

पुर्या कदाचित्क्रीडद्धिर्यदुभोजकुमारकै: ।

कोपिता मुनयः शेपुर्भगवन्मतकोविदा: ॥

२४॥

पुर्यामू-द्वारका पुरी में; कदाचित्‌--एक बार; क्रीडद्धि:--क्रीड़ाओं द्वारा; यदु--यदुबंशी; भोज-- भोज के वंशज;कुमारकैः--राजकुमारों द्वारा; कोपिता:--क्रुद्ध हुए; मुनयः--मुनियों ने; शेपु:--शाप दिया; भगवत्‌-- भगवान्‌ की; मत--इच्छा; कोविदा:--जानकार।

एक बार यदुवंशी तथा भोजवंशी राजकुमारों की क्रीड़ाओं से महामुनिगण क्रुद्ध हो गये तोउन्होंने भगवान्‌ की इच्छानुसार उन राजकुमारों को शाप दे दिया।

ततः कतिपयैर्मासैर्वृष्णिभोजान्धकादयः ।

ययु: प्रभासं संहष्टा रथेदेवविमोहिता: ॥

२५॥

ततः--तत्पश्चात्‌; कतिपयैः --कुछेक; मासैः--मास बिता कर; वृष्णि--वृष्णि के वंशज; भोज--भोज के वंशज; अन्धक-आदयः--अन्धक के पुत्र इत्यादि; ययु:--गये; प्रभासम्‌--प्रभास नामक तीर्थस्थान; संहृष्टा:-- अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक; रथै:--अपने अपने रथों पर; देव--कृष्ण द्वारा; विमोहिता:--मोह ग्रस्त |

कुछेक महीने बीत गये तब कृष्ण द्वारा विमोहित हुए समस्त वृष्णि, भोज तथा अन्धक वंशी,जो कि देवताओं के अवतार थे, प्रभास गये।

किन्तु जो भगवान्‌ के नित्य भक्त थे वे द्वारका में हीरहते रहे।

तत्र स्नात्वा पितृन्देवानृषी क्षेव तदम्भसा ।

तर्पयित्वाथ विप्रेभ्यो गावो बहुगुणा ददुः ॥

२६॥

" तत्र--वहाँ पर; स्नात्वा--स्नान करके; पितृनू--पितरों को; देवानू--देवताओं को; ऋषीन्‌--ऋषियों को; च-- भी; एव--निश्चय ही; तत्‌ू--उसके; अम्भसा--जल से; तर्पयित्वा--प्रसन्न करके; अथ--तत्पश्चात्‌; विप्रेभ्य:--ब्राह्मणों को; गाव: --गौवें;बहु-गुणा: --अत्यन्त उपयोगी; ददुः--दान में दीं

वहाँ पहुँचकर उन सबों ने स्नान किया और उस तीर्थ स्थान के जल से पितरों, देवताओं तथाऋषियों का तर्पण करके उन्हें तुष्ट किया।

उन्होंने राजकीय दान में ब्राह्मणों को गौवें दीं।

हिरण्यं रजतं शय्यां वासांस्यजिनकम्बलान्‌ ।

यान॑ रथानिभान्कन्या धरां वृत्तिकरीमपि ॥

२७॥

हिरण्यम्‌--सोना; रजतम्‌ू--रजत; शब्याम्‌--बिस्तर; वासांसि--वस्त्र; अजिन--आसन के लिए पशुचर्म; कम्बलानू--कम्बल;यानमू--घोड़े; रथान्‌ू--रथ; इभान्‌ू--हाथी; कन्या:-- लड़कियाँ; धराम्‌-- भूमि; वृत्ति-करीम्‌--आजीविका प्रदान करने केलिए; अपि-- भी ।

ब्राह्मणों को दान में न केवल सुपोषित गौवें दी गईं, अपितु उन्हें सोना, चाँदी, बिस्तर, वस्त्र,पशुचर्म के आसन, कम्बल, घोड़े, हाथी, कन्याएँ तथा आजीविका के लिए पर्याप्त भूमि भी दीगई।

अन्न चोरुरसं तेभ्यो दत्त्ता भगवदर्पणम्‌ ।

गोविप्रार्थासव: शूरा: प्रणेमुर्भुवि मूर्थभि: ॥

२८॥

अन्नम्‌ू--खाद्यवस्तुएँ; च-- भी; उरू-रसम्‌ू--अत्यन्त स्वादिष्ट; तेभ्य:--ब्राह्मणों को; दत्त्वा--देकर; भगवत््‌-अर्पणम्‌--जिन्‍्हेंसर्वप्रथम भगवान्‌ को अर्पित किया गया; गो--गौवें; विप्र--ब्राह्मण; अर्थ--प्रयोजन, उद्देश्य; असव:--जीवन का प्रयोजन;शूराः--सारे बहादुर क्षत्रिय; प्रणेमु:--प्रणाम किया; भुवि-- भूमि छूकर; मूर्थभि:--अपने सिरों से

तत्पश्चात्‌ उन्होंने सर्वप्रथम भगवान्‌ को अर्पित किया गया अत्यन्त स्वादिष्ट भोजन उनब्राह्मणों को भेंट किया और तब अपने सिरों से भूमि का स्पर्श करते हुए उन्हें सादर नमस्कारकिया।

वे गौवों तथा ब्राह्मणों की रक्षा करते हुए भलीभाँति रहने लगे।

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