← श्रीमद्भागवतम् स्कन्ध 3 की सूची

अध्याय चार: विदुर मैत्रेय के पास पहुंचे

3.4उद्धव उबाचअथ ते तदनुज्ञाता भुक्त्वा पीत्वा च वारुणीम्‌ ।

तया विश्रंशितज्ञाना दुरुक्तैर्मर्म पस्पृशु; ॥

१॥

उद्धवः उवाच--उद्धव ने कहा; अथ--तत्पश्चात्‌; ते--वे ( यादवगण ); ततू्‌--ब्राह्मणों द्वारा; अनुज्ञाता:--अनुमति दिये जाकर;भुक्त्वा--खाकर; पीत्वा--पीकर; च--तथा; वारुणीम्‌--मदिरा; तया--उससे; विभ्रंशित-ज्ञाना:--ज्ञानसे विहीन होकर;दुरुक्ते:--कर्कश शब्दों से; मर्म--हृदय के भीतर; पस्पृशु:--छू गया।

तत्पश्चात्‌ उन सबों ने ( वृष्णि तथा भोज वंशियों ने ) ब्राह्मणों की अनुमति से प्रसाद काउच्छिष्ट खाया और चावल की बनी मदिरा भी पी।

पीने से वे सभी संज्ञाशून्य हो गये और ज्ञान सेरहित होकर एक दूसरे को वे मर्मभेदी कर्कश वचन कहने लगे।

तेषां मैरैयदोषेण विषमीकृतचेतसाम्‌ ।

निम्लोचति रवावासीद्वेणूनामिव मर्दनम्‌ ॥

२॥

तेषामू--उनके; मैरेय--नशे के; दोषेण--दोष से; विषमीकृत-- असंतुलित; चेतसामू--जिनके मन; निम्लोचति--अस्त होताहै; रवौ--सूर्य; आसीत्‌--घटित होता है; वेणूनाम्‌--बाँसों का; इब--सहश; मर्दनम्‌--विनाश

जिस तरह बाँसों के आपसी घर्षण से विनाश होता है उसी तरह सूर्यास्त के समय नशे केदोषों की अन्तःक्रिया से उनके मन असंतुलित हो गये और उनका विनाश हो गया।

भगवान्स्वात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः ।

सरस्वतीमुपस्पृश्य वृक्षमूलमुपाविशत्‌ ॥

३॥

भगवान्‌-- भगवान्‌; स्व-आत्म-मायाया: -- अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा; गतिम्‌ू-- अन्त; तामू--उसको; अवलोक्य--देखकर;सः--वे ( कृष्ण ); सरस्वतीम्‌--सरस्वती नदी का; उपस्पृश्य--जल का आचमन करके; वृक्ष-मूलम्‌--वृक्ष की जड़ के पास;उपाविशत्‌--बैठ गये।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी अन्तरंगा शक्ति से ( अपने परिवार का ) भावी अन्त देखकरसरस्वती नदी के तट पर गये, जल का आचमन किया और एक वृक्ष के नीचे बैठ गये।

अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरिण ह ।

बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सज्िहीर्षुणा ॥

४॥

अहम्‌-ैं; च--तथा; उक्त:ः--कहा गया; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा; प्रपन्न--शरणागत का; आर्ति-हरेण--कष्टों को हरण करनेवाले के द्वारा; ह--निस्सन्देह; बदरीम्‌--बदरी; त्वम्‌--तुम; प्रयाहि--जाओ; इति--इस प्रकार; स्व-कुलम्‌-- अपने ही परिवारको; सज्िहीर्षुणा--विनष्ट करना चाहा।

भगवान्‌ उनके कष्टों का विनाश करते हैं, जो उनके शरणागत हैं।

अतएव जब उन्होंने अपनेपरिवार का विनाश करने की इच्छा की तो उन्होंने पहले ही बदरिकाश्रम जाने के लिए मुझसेकह दिया था।

तथापि तदभिप्रेतं जानन्नहमरिन्दम ।

पृष्ठतोउन्वगमं भर्तु: पादविश्लेषणाक्षम: ॥

५॥

तथा अपि--तिस पर भी; तत्‌-अभिप्रेतम्‌-- उनकी इच्छा; जानन्‌--जानते हुए; अहमू--मैं; अरिम्‌-दम--हे शत्रुओं के दमनकर्ता( विदुर ); पृष्ठतः--पीछे; अन्वगमम्‌-- अनुसरण किया; भर्तु:--स्वामी का; पाद-विश्लेषण--उनके चरणकमलों से बिलगाव;अक्षम:--समर्थ न होकर।

हे अरिन्दम ( विदुर ), ( वंश का विनाश करने की ) उनकी इच्छा जानते हुए भी मैं उनकाअनुसरण करता रहा, क्‍योंकि अपने स्वामी के चरणकमलों के बिछोह को सह पाना मेरे लिए सम्भव न था।

अद्वाक्षमेकमासीनं विचिन्वन्दयितं पतिम्‌ ।

श्रीनिकेतं सरस्वत्यां कृतकेतमकेतनम्‌ ॥

६॥

अद्राक्षम्‌-मैंने देखा; एकम्‌-- अकेले; आसीनम्‌--बैठे हुए; विचिन्वन्‌--गम्भीर चिन्तन करते हुए; दवितम्‌--संरक्षक;पतिम्‌--स्वामी को; श्री-निकेतम्‌--लक्ष्मीजी के आश्रय को; सरस्वत्याम्‌ू--सरस्वती के तट पर; कृत-केतम्‌--आ श्रय लिएहुए; अकेतनम्‌ू--बिना आश्रय के स्थित

इस तरह उनका पीछा करते हुए मैंने अपने संरक्षक तथा स्वामी ( भगवान्‌ श्रीकृष्ण ) कोसरस्वती नदी के तट पर आश्रय लेकर अकेले बैठे और गहन चिन्तन करते देखा, यद्यपि वे देवीलक्ष्मी के आश्रय हैं।

एयामावदातं विरजं प्रशान्तारुणलोचनम्‌ ।

दोर्भिश्वतुर्भिविंदितं पीतकौशाम्बरेण च ॥

७॥

श्याम-अवदातमू--श्याम वर्ण से सुन्दर; विरजम्‌-शुद्ध सतोगुण से निर्मित; प्रशान्त--शान्त; अरूण--लाल लाल; लोचनम्‌--नेत्र; दोर्भि:-- भुजाओं द्वारा; चतुर्भि:--चार; विदितम्‌--पहचाने जाकर; पीत--पीला; कौश--रेशमी; अम्बरेण--वस्त्र से;च--तथा

भगवान्‌ का शरीर श्यामल है, किन्तु वह सच्चिदानन्दमय है और अतीव सुन्दर है।

उनके नेत्रसदैव शान्त रहते हैं और बे प्रातःकालीन उदय होते हुए सूर्य के समान लाल हैं।

मैं उनके चारहाथों, विभिन्न प्रतीकों तथा पीले रेशमी वस्त्रों से तुरत पहचान गया कि वे भगवान्‌ हैं।

वाम ऊरावधिश्नित्य दक्षिणाड्प्रिसरोरूहम्‌ ।

अपश्षितार्भका श्रत्थमकृशं त्यक्तपिप्पलम्‌ ॥

८ ॥

वामे--बाईं; ऊरौ--जाँघ पर; अधिश्रित्य--रख कर; दक्षिण-अड्प्रि-सरोरुहम्‌ू--दाहिने चरणकमल को; अपाश्रित--टिकाकर; अर्भक--छोटा; अश्वत्थम्‌--बरगद का वृक्ष; अकृशम्‌-प्रसन्न; त्यक्त--छोड़े हुए; पिप्पलम्‌--घरेलू आराम।

भगवान्‌ अपना दाहिना चरण-कमल अपनी बाई जांघ पर रखे एक छोटे से बरगद वृक्ष का सहारा लिए हुए बैठे थे।

यद्यपि उन्होंने सारे घरेलू सुपास त्याग दिये थे, तथापि बे उस मुद्रा में पूर्णरुपेण प्रसन्न दीख रहे थे।

तस्मिन्महाभागवतो द्वैपायनसुहत्सखा ।

लोकाननुचरन्सिद्ध आससाद यहच्छया ॥

९॥

तस्मिन्‌ू--तब; महा-भागवतः-- भगवान्‌ का महान्‌ भक्त; द्वैघायन--कृष्ण द्वैपायन व्यास का; सुहृत्‌--हितैषी; सखा--मित्र;लोकानू--तीनों लोकों में; अनुचरन्‌--विचरण करते हुए; सिद्धे--उस आश्रम में; आससाद--पहुँचा; यहच्छया-- अपनी पूर्णइच्छा से

उसी समय संसार के अनेक भागों की यात्रा करके महान्‌ भगवद्भक्त तथा महर्षिकृष्णद्वैपायन व्यास के मित्र एवं हितैषी मैत्रेय अपनी इच्छा से उस स्थान पर आ पहुँचे।

" तस्यानुरक्तस्य मुनेर्मुकुन्दःप्रमोदभावानतकन्धरस्य ।

आश्रण्वतो मामनुरागहास-समीक्षया विश्रमयन्नुवाच ॥

१०॥

तस्य--उसका; अनुरक्तस्थ--अनुरक्त का; मुनेः--मुनि ( मैत्रेय ) का; मुकुन्दः--मोक्ष प्रदान करने वाले भगवान्‌; प्रमोद-भाव--प्रसन्न मुद्रा में; आनत--नीचे किये; कन्धरस्य--कन्धों का; आश्रृण्वतः--इस तरह सुनते हुए; माम्‌--मुझको; अनुराग-हास--दयालु हँसी से; समीक्षया--मुझे विशेष रूप से देखकर; विश्र-मयन्‌--मुझे विश्राम पूरा करने देकर; उवाच--कहा।

मैत्रेय मुनि उनमें ( भगवान्‌ में ) अत्यधिक अनुरक्त थे और वे अपना कंधा नीचे किये प्रसन्नमुद्रा में सुन रहे थे।

मुझे विश्राम करने का समय देकर, भगवान्‌ मुसकुराते हुए तथा विशेषचितवन से मुझसे इस प्रकार बोले।

हः न ऊ अ+ ८ न' न" श्रीभगवानुवाचवेदाहमन्तर्मनसीप्सितं तेददामि यत्तहुरवापमन्य: ।

सत्रे पुरा विश्वसृजां वसूनांमत्सिद्धिकामेन वसो त्वयेष्ट: ॥

११॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; वेद--जानता हूँ; अहम्‌-मैं; अन्तः-- भीतर; मनसि--मन में; ईप्सितम्‌--इच्छित; ते--तुम्हें; ददामि--देता हूँ; यत्‌--जो है; तत्‌ू--वह; दुरवापम्‌--प्राप्त कर पाना अतीव कठिन; अन्यै:--अन्यों द्वारा; सत्रे--यज्ञ में;पुरा--प्राचीन काल में; विश्व-सृजाम्‌--इस सृष्टि का सृजन करने वालों के; बसूनाम्‌--वसुओं का; मत्‌-सिद्धि-कामेन--मेरीसंगति प्राप्त करने की इच्छा से; वसो--हे वसु; त्वया--तुम्हारे द्वारा; इष्ट:--जीवन का चरम लक्ष्य

हे बसु, मैं तुम्हारे मन के भीतर से वह जानता हूँ, जिसे पाने की तुमने प्राचीन काल में इच्छाकी थी जब विश्व के कार्यकलापों का विस्तार करने वाले वसुओं तथा देवताओं ने यज्ञ किये थे।

तुमने विशेषरूप से मेरी संगति प्राप्त करने की इच्छा की थी।

अन्य लोगों के लिए इसे प्राप्त करपाना दुर्लभ है, किन्तु मैं तुम्हें यह प्रदान कर रहा हूँ।

स एष साधो चरमो भवानाम्‌आसादितस्ते मदनुग्रहो यत्‌ ।

यन्मां नूलोकान्रह उत्सूजन्तंदिष्टय्या दहश्रान्विशदानुवृत्त्या ॥

१२॥

सः--वह; एष:--उनका; साधो--हे साधु; चरम: --चरम; भवानाम्‌--तुम्हारे सारे अवतारों ( वसु रूप में ) में से; आसादित:--अब प्राप्त; ते--तुम पर; मत्‌--मेरी; अनुग्रह:--कृपा; यत्‌--जिस रूप में; यत्‌--क्योंकि; माम्‌--मुझको; नृू-लोकानू--बद्धजीवों के लोक; रह:--एकान्त में; उत्सृजन्तम्‌-त्यागते हुए; दिष्टठ्या--देखने से; ददश्चानू--जो तुम देख चुके हो; विशद-अनुवृत्त्या--अविचल भक्ति से

हे साधु तुम्हारा वर्तमान जीवन अन्तिम तथा सर्वोपरि है, क्योंकि तुम्हें इस जीवन में मेरीचरम कृपा प्राप्त हुई है।

अब तुम बद्धजीवों के इस ब्रह्माण्ड को त्याग कर मेरे दिव्य धाम वैकुण्ठजा सकते हो।

तुम्हारी शुद्ध तथा अविचल भक्ति के कारण इस एकान्त स्थान में मेरे पास तुम्हाराआना तुम्हारे लिए महान्‌ वरदान है।

पुरा मया प्रोक्तमजाय नाभ्ये'पदो निषण्णाय ममादिसर्गे ।

ज्ञानं परं मन्महिमावभासंयत्सूरयो भागवतं वदन्ति ॥

१३॥

पुरा--प्राचीन काल में; मया--मेरे द्वारा; प्रोक्तमू--कहा गया था; अजाय--ब्रह्मा से; नाभ्ये--नाभि से बाहर; पढो--कमल पर;निषण्णाय--स्थित; मम--मेरा; आदि-सर्गे --सृष्टि के प्रारम्भ में; ज्ञाममू--ज्ञान; परमू--परम; मत्‌ -महिमा--मेरी दिव्य कीर्ति;अवभासम्‌ू--जो निर्मल बनाती है; यत्‌--जिसे; सूरय:--महान्‌ विद्वान्‌ मुनि; भागवतम्‌-- श्रीमद्भागवत; वदन्ति--कहते हैं

हे उद्धव, प्राचीन काल में कमल कल्प में, सृष्टि के प्रारम्भ में मैंने अपनी नाभि से उगे हुएकमल पर स्थित ब्रह्म से अपनी उस दिव्य महिमाओं के विषय में बतलाया था, जिसे बड़े-बड़ेमुनि श्रीमद्भागवत कहते हैं।

इत्याहतोक्त: परमस्य पुंसःप्रतिक्षणानुग्रहभाजनोहम्‌ ।

स्नेहोत्थरोमा स्खलिताक्षरस्तंमुझ्नज्छुच: प्राज्लिराबभाषे ॥

१४॥

इति--इस प्रकार; आहत--अनुग्रह किये गये; उक्त:--सम्बोधित; परमस्यथ--परम का; पुंसः--भगवान्‌; प्रतिक्षण--हर क्षण;अनुग्रह-भाजन:--कृपापात्र; अहम्‌--मैं; स्नेह-- स्नेह; उत्थ--विस्फोट; रोमा--शरीर के रोएँ; स्खलित--शिथिल; अक्षर:--आँखों के; तम्‌--उसको; मुझ्नन्‌ू--पोंछकर; शुचः--आँसू; प्राज्ञलिः--हाथ जोड़े; आबभाषे--कहा |

उद्धव ने कहा: हे विदुर, जब मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ द्वारा इस प्रकार से प्रतिक्षणकृपाभाजन बना हुआ था और उनके द्वारा अतीव स्नेहपूर्वक सम्बोधित किया जा रहा था, तो मेरीवाणी रुक कर आँसुओं के रूप में बह निकली और मेरे शरीर के रोम खड़े हो गये।

अपने आँसूपोंछ कर और दोनों हाथ जोड़ कर मैं इस प्रकार बोला।

को न्वीश ते पादसरोजभाजांसुदुर्लभो<रथेषु चतुर्ष्वपीह ।

तथापि नाहं प्रवृणोमि भूमन्‌भवत्पदाम्भोजनिषेवणोत्सुक: ॥

१५॥

कः नु ईश-हे प्रभु; ते--तुम्हारे; पाद-सरोज-भाजाम्‌--आपके चरणकमलों की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे भक्तों के; सु-दुर्लभ:--प्राप्त कर पाना अतीव कठिन; अर्थेषु--विषय में; चतुर्षु--चार पुरुषार्थों के; अपि--बावजूद; इह--इस जगत में;तथा अपि--फिर भी; न--नहीं; अहम्‌--मैं; प्रवृणोमि--वरीयता प्रदान करता हूँ; भूमन्‌--हे महात्मन्‌; भवत्‌-- आपके; पद-अम्भोज--चरणकमल; निषेवण-उत्सुक:--सेवा करने के लिए उत्सुक |

हे प्रभु, जो भक्तमण आपके चरणकमलों की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे हुए हैं उन्हें धर्म, अर्थ,काम तथा मोक्ष--इन चार पुरुषार्थों के क्षेत्र में कुछ भी प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती।

किन्तु हे भूमन्‌, जहाँ तक मेरा सम्बन्ध हैं मैंने आपके चरणकमलों की प्रेमाभक्ति में ही अपने कोलगाना श्रेयस्कर माना है।

कर्माण्यनीहस्य भवोभवस्य तेदुर्गाअ्रयोथारिभयात्पलायनम्‌ ।

कालात्मनो यत्प्रमदायुता श्रम:स्वात्मन्रतेः खिद्यति धीर्विदामिह ॥

१६॥

कर्माणि--कर्म; अनीहस्य--न चाहने वाले का; भवः--जन्म; अभवस्य--कभी भी न जन्मे का; ते--तुम्हारा; दुर्ग-आश्रय: --किले की शरण लेकर; अथ--तत्पश्चात्‌; अरि-भयात्‌--शत्रु के डर से; पलायनमू--पलायन, भागना; काल-आत्मन:--नित्यकाल के नियन्ता का; यत्‌--जो; प्रमदा-आयुत--स्त्रियों की संगति में; आ श्रम: --गृहस्थ जीवन; स्व-आत्मन्‌-- अपनीआत्मा में; रतेः--रमण करने वाली; खिद्यति--विचलित होती है; धीः--बुद्धि; विदाम्‌--विद्वान की; इह--इस जगत में

हे प्रभु, विद्वान मुनियों की बुद्धि भी विचलित हो उठती है जब वे देखते हैं कि आप समस्तइच्छाओं से मुक्त होते हुए भी सकाम कर्म में लगे रहते हैं; अजन्मा होकर भी जन्म लेते हैं; अजेयकाल के नियन्ता होते हुए भी शत्रुभय से पलायन करके दुर्ग में शरण लेते हैं तथा अपनी आत्मामें रमण करते हुए भी आप अनेक स्त्रियों से घिरे रहकर गृहस्थ जीवन का आनन्द लेते हैं।

मन्त्रेषु मां वा उपहूय यत्त्व-मकुण्ठिताखण्डसदात्मबोध: ।

पृच्छे: प्रभो मुग्ध इवाप्रमत्तस्‌तन्नो मनो मोहयतीव देव ॥

१७॥

मन्त्रेषु--मन्त्रणाओं या परामर्शो में; मामू-- मुझको; बै---अथवा; उपहूय-- बुलाकर; यत्‌--जितना; त्वमू--आप; अकुण्ठित--बिना हिचक के; अखण्ड--विना अलग हुए; सदा--सदैव; आत्म--आत्मा; बोध:--बुद्धिमान; पृच्छे:--पूछा; प्रभो--हे प्रभु;मुग्ध: --मोहग्रस्त; इब--मानो; अप्रमत्त:--यद्यपि कभी मोहित नहीं होता; तत्‌ू--वह; न:--हमारा; मन:--मन; मोहयति--मोहित करता है; इब--मानो; देव-हे प्रभु

हे प्रभु, आपकी नित्य आत्मा कभी भी काल के प्रभाव से विभाजित नहीं होती और आपकेपूर्णज्ञान की कोई सीमा नहीं है।

इस तरह आप अपने आप से परामर्श लेने में पर्याप्त सक्षम थे,किन्तु फिर भी आपने परामर्श के लिए मुझे बुलाया मानो आप मोहग्रस्त हो गए हैं, यद्यपि आपकभी भी मोहग्रस्त नहीं होते।

आपका यह कार्य मुझे मोहग्रस्त कर रहा है।

ज्ञान पर स्वात्मरह:प्रकाशंप्रोवाच कस्मै भगवान्समग्रम्‌ ।

अपि क्षमं नो ग्रहणाय भर्त-व॑दाज्जसा यद्वृजिनं तरेम ॥

१८॥

ज्ञानम्‌ू-ज्ञान; परम्‌--परम; स्व-आत्म--निजी आत्मा; रह:--रहस्य; प्रकाशम्‌-- प्रकाश; प्रोवाच--कहा; कस्मै--क( ब्रह्मजी ) से; भगवान्‌-- भगवान्‌; समग्रम्‌--पूर्ण रूपेण; अपि--यदि ऐसा; क्षमम्‌--समर्थ; न: --मुझको; ग्रहणाय--स्वीकार्य; भर्त:--हे प्रभु; वद--कहें; अज्ञसा--विस्तार से; यत्‌--जिससे; वृजिनम्‌--कष्टों को; तरेम--पार कर सकूँ |

हे प्रभु, यदि आप हमें समझ सकने के लिए सक्षम समझते हों तो आप हमें वह दिव्य ज्ञानबतलाएँ जो आपके विषय में प्रकाश डालता हो और जिसे आपने इसके पूर्व ब्रह्माजी कोबतलाया है।

इत्यावेदितहार्दाय महां स भगवान्पर: ।

आदिदेशारविन्दाक्ष आत्मन: परमां स्थितिम्‌ू ॥

१९॥

इति आवेदित-मेरे द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये जाने पर; हार्दाय--मेरे हृदय के भीतर से; महाम्‌--मुझको; सः--उन;भगवानू्‌-- भगवान्‌ ने; पर: --परम; आदिदेश-- आदेश दिया; अरविन्द-अक्ष:--कमल जैसे नेत्रों वाला; आत्मन:--अपनी ही;'परमाम्‌--दिव्य; स्थितिम्‌--स्थिति |

जब मैंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ से अपनी यह हार्दिक इच्छा व्यक्त की तो कमलनेत्रभगवान्‌ ने मुझे अपनी दिव्य स्थिति के विषय में उपदेश दिया।

स एवमाराधितपादतीर्थाद्‌अधीततत्त्वात्मविबोधमार्ग: ।

प्रणम्य पादौ परिवृत्य देव-मिहागतोहं विरहातुरात्मा ॥

२०॥

सः--अतएव मैं; एवम्‌--इस प्रकार; आराधित--पूजित; पाद-तीर्थात्‌-- भगवान्‌ से; अधीत--अध्ययन किया हुआ; तत्त्व-आत्म--आत्मज्ञान; विबोध--ज्ञान, जानकारी; मार्ग:--पथ; प्रणम्य--प्रणाम करके; पादौ--उनके चरणकमलों पर;परिवृत्य--प्रदक्षिणा करके; देवम्‌-- भगवान्‌; इह--इस स्थान पर; आगत:--पहुँचा; अहम्‌--मैं; विरह--वियोग; आतुर-आत्मा--आत्मा में दुखी, दुखित आत्मा से ।

मैंने अपने आध्यात्मिक गुरु भगवान्‌ से आत्मज्ञान के मार्ग का अध्ययन किया है, अतएवउनकी प्रदक्षिणा करके मैं उनके विरह-शोक से पीड़ित होकर इस स्थान पर आया हूँ।

सोहं तहर्शनाह्ादवियोगार्तियुतः प्रभो ।

गमिष्ये दयितं तस्य बरदर्याश्रममण्डलम्‌ ॥

२१॥

सः अहमू्‌--इस तरह स्वयं मैं; तत्‌--उसका; दर्शन--दर्शन; आह्ाद--आनन्द के; वियोग--विरह; आर्ति-युतः--दुख सेपीड़ित; प्रभो--हे प्रभु; गमिष्ये--जाऊँगा; दवितम्‌--इस तरह उपदेश दिया गया; तस्य--उसका; बदर्याअ्रम--हिमालय स्थितबदरिकाश्रम; मण्डलम्‌--संगति |

हे विदुर, अब मैं उनके दर्शन से मिलने वाले आनन्द के अभाव में पागल हो रहा हूँ और इसेकम करने के लिए ही अब मैं संगति के लिए हिमालय स्थित बदरिकाश्रम जा रहा हूँ जैसा किउन्होंने मुझे आदेश दिया है।

यत्र नारायणो देवो नरश्च भगवानृषि: ।

मृदु तीब्रं तपो दीर्घ तेपाते लोकभावनौ ॥

२२॥

यत्र--जहाँ; नारायण: -- भगवान्‌; देव:--अवतार से; नरः--मनुष्य; च-- भी; भगवान्‌-- स्वामी; ऋषि:--ऋषि; मृदु--मिलनसार; तीब्रमू--कठिन; तपः--तपस्या; दीर्घम्‌--दीर्घकाल; तेपाते--करते हुए; लोक-भावनौ--सारे जीवों का मंगल।

वहाँ बदरिकाश्रम में नर तथा नारायण ऋषियों के रूप में अपने अवतार में भगवान्‌अनादिकाल से समस्त मिलनसार जीवों के कल्याण हेतु महान्‌ तपस्या कर रहे हैं।

श्रीशुक उवाचइत्युद्धवादुपाकर्णय्य सुहृदां दु:सहं वधम्‌ ।

ज्ञानेनाशमयक्ष्षत्ता शोकमुत्पतितं बुध: ॥

२३॥

श्री-शुकः उबाच-- श्री शुकगोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; उद्धवात्‌--उद्धव से; उपाकर्ण्य--सुनकर; सुहृदाम्‌-मित्रोंतथा सम्बन्धियों का; दुःसहम्‌--असहा; वधम्‌--संहार; ज्ञानेन--दिव्य ज्ञान से; अशमयत्‌--स्वयं को सान्त्वना दी; क्षत्ता--विदुर ने; शोकम्‌--वियोग; उत्पतितम्‌--उत्पन्न हुआ; बुध: --विद्वान्‌ |

श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : उद्धव से अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों के संहार के विषय मेंसुनकर दिद्वान्‌ विदुर ने स्वयं के दिव्य ज्ञान के बल पर अपने असह्य शोक को प्रशमित किया।

स तं महाभागवतं ब्रजन्तं कौरवर्षभः ।

विश्रम्भादभ्यधत्तेदं मुख्यं कृष्णपरिग्रहे ॥

२४॥

सः-विदुर ने; तम्‌--उद्धव से; महा- भागवतम्‌-- भगवान्‌ का महान्‌ भक्त; ब्रजन्तम्‌--जाते हुए; कौरव-ऋषभ:--कौरवों मेंसर्वश्रेष्ठ; विश्रम्भातू-विश्वास वश; अभ्यधत्त--निवेदन किया; इृदम्‌--यह; मुख्यम्‌-प्रधान; कृष्ण-- भगवान्‌ कृष्ण की;परिग्रहे-- भगवद्भक्ति में |

भगवान्‌ के प्रमुख तथा अत्यन्त विश्वस्त भक्त उद्धव जब जाने लगे तो विदुर ने स्नेह तथाविश्वास के साथ उनसे प्रश्न किया।

विदुर उवाचज्ञानं परे स्वात्मरहःप्रकाशंयदाह योगेश्वर ई श्वरस्ते ।

वक्तुं भवान्नोहति यद्द्धि विष्णोभृत्या: स्वभृत्यार्थकृतश्चवरन्ति ॥

२५॥

विदुरः उवाच--विदुर ने कहा; ज्ञानमू--ज्ञान; परमू--दिव्य; स्व-आत्म--आत्मा विषयक; रह:--रहस्य; प्रकाशम्‌--प्रबुद्धता;यत्‌--जो; आह--कहा; योग-ईश्वर: -- समस्त योगों के स्वामी; ईश्वर: -- भगवान्‌ ने; ते--तुमसे; वक्तुमू--कहने के लिए;भवान्‌ू--आप; न:ः--मुझसे; अर्हति--योग्य हैं; यत्‌--क्योंकि; हि--कारण से; विष्णो: -- भगवान्‌ विष्णु के; भृत्या:--सेवक ;स्व-भृत्य-अर्थ-कृतः--अपने सेवकों के हित के लिए; चरन्ति--विचरण करते हैं |

विदुर ने कहा : हे उद्धव, चूँकि भगवान्‌ विष्णु के सेवक अन्यों की सेवा के लिए विचरणकरते हैं, अतः यह उचित ही है कि आप उस आत्मज्ञान का वर्णन करें जिससे स्वयं भगवान्‌ नेआपको प्रबुद्ध किया है।

उद्धव उबाचननु ते तत्त्वसंराध्य ऋषि: कौषारवोन्तिके ।

साक्षाद्धगवतादिष्टो मर्त्सलोक॑ जिहासता ॥

२६॥

उद्धवः उवाच--उद्धव ने कहा; ननु--लेकिन; ते--तुम्हारा; तत्त्व-संराध्य:--दिव्य ज्ञान को ग्रहण करने के लिए पूजनीय;ऋषि:--विद्वान्‌; कौषारव:--कौषारु पुत्र ( मैत्रेय ) को; अन्तिके--निकट; साक्षात्‌- प्रत्यक्ष; भगवता-- भगवान्‌ द्वारा;आदिष्ट:--आदेश दिया गया; मर्त्य-लोकम्‌--मर्त्बलोक को; जिहासता--छोड़ते हुए

श्री उद्धव ने कहा : आप महान्‌ विद्वान ऋषि मैत्रेय से शिक्षा ले सकते हैं, जो पास ही में हैंऔर जो दिव्य ज्ञान की प्राप्ति के लिए पूजनीय हैं।

जब भगवान्‌ इस मर्त्यलोक को छोड़ने वालेथे तब उन्होंने मैत्रेय को प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा दी थी।

श्रीशुक उवाचइति सह विदुरेण विश्वमूर्ते-गुणकथया सुधया प्लावितोरुताप: ।

क्षणमिव पुलिने यमस्वसुस्तांसमुषित औपगविर्निशां ततोगात्‌ ॥

२७॥

श्री-शुकः उबाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; इति--इस प्रकार; सह--साथ; विदुरेण--विदुर के; विश्व-मूर्तें:--विराटपुरुष का; गुण-कथया--दिव्य गुणों की बातचीत के दौरान; सुधया--अमृत के तुल्य; प्लावित-उरू-ताप:--अत्यधिक कष्ट सेअभिभूत; क्षणम्‌-- क्षण; इब--सहश; पुलिने--तट पर; यमस्वसु: ताम्‌--उस यमुना नदी के; समुषित: --बिताया;औपगवि:--औपगव का पुत्र ( उद्धव ); निशाम्‌--रात्रि; ततः--तत्पश्चात्‌ अगातू--चला गया।

शुकदेव गोस्वामी ने कहा : हे राजनू, इस तरह यमुना नदी के तट पर विदुर से ( भगवान्‌के ) दिव्य नाम, यश, गुण इत्यादि की चर्चा करने के बाद उद्धव अत्यधिक शोक से अभिभूतहो गये।

उन्होंने सारी रात एक क्षण की तरह बिताईं।

तत्पश्चात्‌ वे वहाँ से चले गये।

राजोबाचनिधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-घ्वधिरथयूथपयूथपेषु मुख्य: ।

सतु कथमवशिष्ट उद्धवो यद्‌धरिरपि तत्यज आकृति तज्यधीशः ॥

२८॥

राजा उबाच--राजा ने पूछा; निधनम्‌--विनाश; उपगतेषु--हो जाने पर; वृष्णि--वृष्णिवंश; भोजेषु-- भोजबंश का; अधिरथ--महान्‌ सेनानायक; यूथ-प--मुख्य सेनानायक; यूथ-पेषु--उनके बीच; मुख्य: --प्रमुख; सः--वह; तु--केवल; कथम्‌--कैसे;अवशिष्ट:--बचा रहा; उद्धव: --उद्धव; यत्‌--जबकि; हरि: -- भगवान्‌ ने; अपि-- भी; तत्यजे--समाप्त किया; आकृतिम्‌--सम्पूर्ण लीलाएँ; त्रि-अधीश:--तीनों लोकों के स्वामी |

राजा ने पूछा : तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण की लीलाओं के अन्त में तथा उन वृष्णि एवंभोज वंशों के सदस्यों के अन्तर्धान होने पर, जो महान्‌ सेनानायकों में सर्वश्रेष्ठ थे, अकेले उद्धवक्यों बचे रहे ?

श्रीशुक उवाचब्रह्यशापापदेशेन कालेनामोघवाउ्छत:ः ।

संहृत्य स्वकुलं स्फीतं त्यक्ष्यन्देहमचिन्तयत्‌ ॥

२९॥

श्री-शुकः उवाच-- श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; ब्रह्य-शाप--ब्रह्मणों द्वारा शाप दिया जाना; अपदेशेन--बहाने से; कालेन--नित्य काल द्वारा; अमोघ-- अचूक; वाउ्छित:--ऐसा चाहने वाला; संहत्य--बन्द करके; स्व-कुलम्‌--अपने परिवार को;स्फीतम्‌--असंख्य; त्यक्ष्यन्‌ू--त्यागने के बाद; देहम्‌--विश्व रूप को; अचिन्तयत्‌--अपने आप में सोचा।

शुकदेव गोस्वामी ने उत्तर दिया : हे प्रिय राजन, ब्राह्मण का शाप तो केवल एक बहाना था,किन्तु वास्तविक तथ्य तो भगवान्‌ की परम इच्छा थी।

वे अपने असंख्य पारिवारिक सदस्यों कोभेज देने के बाद पृथ्वी के धरातल से अन्तर्धान हो जाना चाहते थे।

उन्होंने अपने आप इस तरहसोचा।

अस्माल्लोकादुपरते मयि ज्ञानं मदाश्रयम्‌ ।

अ्त्युद्धव एवाद्धा सम्प्रत्यात्मवतां वर: ॥

३०॥

अस्मात्‌--इस ( ब्रह्माण्ड ) से; लोकात्‌--पृथ्वी से; उपरते--ओझल होने पर; मयि--मेरे विषय के; ज्ञानमू--ज्ञान; मतू-आश्रयम्‌--मुझसे सम्बन्धित; अर्हति--योग्य होता है; उद्धवः--उद्धव; एव--निश्चय ही; अद्धघा-प्रत्यक्षत: ; सम्प्रति--इससमय; आत्मवताम्‌-भक्तों में; बर:--सर्वोपरि।

अब मैं इस लौकिक जगत की दृष्टि से ओझल हो जाऊँगा और मैं समझता हूँ कि मेरे भक्तोंमें अग्रणी उद्धव ही एकमात्र ऐसा है, जिसे मेरे विषय का ज्ञान प्रत्यक्ष रूप से सौंपा जा सकताहै।

नोद्धवोण्वपि मन्न्यूनो यदगुणैर्नादितः प्रभु: ।

अतो मद्ठयुनं लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥

३१॥

न--नहीं; उद्धव: --उद्धव; अणु--रंचभर; अपि-- भी; मत्‌-- मुझसे; न्यून:--घटकर; यत्‌-- क्योंकि; गुणैः -- प्रकृति के गुणोंके द्वारा; न--न तो; अर्दित:--प्रभावित; प्रभु:--स्वामी; अत:--इसलिए; मत्‌-वयुनम्‌--मेरा ( भगवान्‌ का ) ज्ञान; लोकमू--संसार; ग्राहयन्‌-- प्रसार करने के लिए; इह--इस संसार में; तिष्ठतु--रहता रहे |

उद्धव किसी भी तरह मुझसे घटकर नहीं है, क्योंकि वह प्रकृति के गुणों द्वारा कभी भीप्रभावित नहीं हुआ है।

अतएवं भगवान्‌ के विशिष्ट ज्ञान का प्रसार करने के लिए वह इस जगतमें रहता रहे।

एवं त्रिलोकगुरुणा सन्दिष्ट: शब्दयोनिना ।

बदर्याश्रममासाद्य हरिमीजे समाधिना ॥

३२॥

एवम्‌--इस तरह; त्रि-लोक--तीनों जगत के; गुरुणा-- गुरु द्वारा; सन्दिष्ट:--ठीक से शिक्षा दी जाकर; शब्द-योनिना--जोसमस्त वैदिक ज्ञान का स्त्रोत है उसके द्वारा; बदर्याअ्रमम्‌--बदरिकाश्रम के तीर्थस्थान में; आसाद्य--पहुँचकर; हरिम्‌ू-- भगवान्‌को; ईजे--तुष्ट किया; समाधिना--समाधि द्वारा

शुकदेव गोस्वामी ने राजा को सूचित किया कि इस तरह समस्त वैदिक ज्ञान के स्रोत औरतीनों लोकों के गुरु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌ द्वारा उपदेश दिये जाने पर उद्धव बदरिकाश्रमतीर्थस्थल पहुँचे और भगवान्‌ को तुष्ट करने के लिए उन्होंने अपने को समाधि में लगा दिया।

विदुरोप्युद्धवाच्छुत्वा कृष्णस्य परमात्मन: ।

क्रीडयोपात्तदेहस्य कर्माणि एलाघितानि च ॥

३३॥

विदुर:--विदुर; अपि--भी; उद्धवात्‌--उद्धव के स्त्रोत से; श्रुत्वा--सुनकर; कृष्णस्य-- भगवान्‌ कृष्ण का; परम-आत्मन:--परमात्मा का; क्रीडया--मर्त्यलोक में लीलाओं के लिए; उपात्त--असाधारण रूप से स्वीकृत; देहस्य--शरीर के; कर्माणि--दिव्य कर्म; एलाघितानि--अत्यन्त प्रशंसनीय; च-- भी |

विदुर ने उद्धव से इस मर्त्यलोक में परमात्मा अर्थात्‌ भगवान्‌ कृष्ण के आविर्भाव तथातिरोभाव के विषय में भी सुना जिसे महर्षिगण बड़ी ही लगन के साथ जानना चाहते हैं।

देहन्यासं च तस्यैवं धीराणां धैर्यवर्धनम्‌ ।

अन्येषां दुष्करतरं पशूनां विक्लवात्मनाम्‌ ॥

३४॥

देह-न्यासम्‌ू--शरीर में प्रवेश; च-- भी; तस्य--उसका; एवम्‌-- भी; धीराणाम्‌--महर्षियों का; धैर्य--धीरज; वर्धनम्‌--बढ़ातेहुए; अन्येषाम्‌--अन्यों के लिए; दुष्कर-तरम्‌--निश्चित कर पाना अत्यन्त कठिन; पशूनामू--पशुओं के; विक्लब--बेचैन;आत्मनाम्‌--ऐसे मन का।

भगवान्‌ के यशस्वी कर्मों तथा मर्त्यलोक में असाधारण लीलाओं को सम्पन्न करने के लिएउनके द्वारा धारण किये जाने वाले विविध दिव्य रूपों को समझ पाना उनके भक्तों के अतिरिक्तअन्य किसी के लिए अत्यन्त कठिन है और पशुओं के लिए तो वे मानसिक विश्षोभ मात्र हैं।

आत्मानं च कुरुश्रेष्ठ कृष्णेन मनसेक्षितम्‌ ।

ध्यायन्गते भागवते रुरोद प्रेमविहलः ॥

३५॥

आत्मानम्‌--स्वयं; च-- भी; कुरु-श्रेष्ठ--हे कुरुओं में श्रेष्ठ; कृष्णेन--कृष्ण द्वारा; मनसा--मन से; ईक्षितम्‌--स्मरण कियागया; ध्यायन्‌--इस तरह सोचते हुए; गते--चले जाने पर; भागवते-- भक्त के; रुरोद--जोर से चिल्लाया; प्रेम-विहल: --प्रेमभाव से अभिभूत हुआ।

यह सुनकर कि ( इस जगत को छोड़ते समय ) भगवान्‌ कृष्ण ने उनका स्मरण किया था,विदुर प्रेमभाव से अभिभूत होकर जोर-जोर से रो पड़े।

तकालिन्द्या: कतिभिः सिद्ध अहोभिर्भरतर्षभ ।

प्रापद्यत स्वःसरितं यत्र मित्रासुतो मुनि: ॥

३६॥

कालिन्द्या:--यमुना के तट पर; कतिभि:--कुछ; सिद्धे--बीत जाने पर; अहोभि: --दिन; भरत-ऋषभ--हे भरत वंश में श्रेष्ठ;प्रापद्यत--पहुँचा; स्व:-सरितम्‌--स्वर्ग की गंगा नदी; यत्र--जहाँ; मित्रा-सुतः--मित्र का पुत्र; मुनिः--मुनि।

यमुना नदी के तट पर कुछ दिन बिताने के बाद स्वरूपसिद्ध आत्मा विदुर गंगा नदी के तटपर पहुँचे जहाँ मैत्रेय मुनि स्थित थे।

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